হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1508)


1508 - عن أسماء بنت عميس قالت: قلت: يا رسول الله! إن فاطمة بنت أبي حُبَيش اُستحيضتْ منذ كذا وكذا؛ فلم تصلّ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سبحان الله! إن هذا من الشيطان، لتجلس في مِركن، فإذا رأت صفرةً فوق الماء فلتغتسل للظهر والعصر غسلًا واحدًا، وتغتسل للمغرب والعشاء غُسلًا واحدًا، وتغتسل للفجر غسلًا وأحدًا، وتتوضأ فيما بين ذلك".

حسن: رواه أبو داود (296) قال: ثنا وهب بن بقية، ثنا خالد بن عبد الله) عن سهيل - يعني ابن أبي صالح - عن الزهري، عن عروة بن الزبير، عن أسماء بنت عميس، فذكرت الحديث.

وإسناده حسن ورجاله ثقات غير سهيل بن أبي صالح، إلَّا أنه صدوق، كما مضى.

قال أبو داود: رواه مجاهد، عن ابن عباس: لما اشتدّ عليها الغسل أمرها أن تجمع بين الصلاتين. قال أبو داود: ورواه إبراهيم عن ابن عباس، وهو قول إبراهيم النخعي وعبد الله بن شدَّاد. انتهى.




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নিশ্চয়ই ফাতিমা বিনত আবি হুবাইশ এতো এতো সময় ধরে ইস্তিহাদার রক্তপাতের শিকার হচ্ছেন, তাই তিনি সালাত আদায় করেননি? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুবহানাল্লাহ! এটি তো শয়তানের পক্ষ থেকে। সে যেন একটি পাত্রে বসে। অতঃপর যখন সে পানির উপর হলদে আভা দেখতে পাবে, তখন সে যেন যুহর ও আসরের জন্য একবার গোসল করে, মাগরিব ও ইশার জন্য একবার গোসল করে এবং ফজরের জন্য একবার গোসল করে। আর এর মধ্যবর্তী সময়ে সে যেন (প্রত্যেক ওয়াক্তের জন্য) ওযু করে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1509)


1509 - عن حَمْنة بنت جَحْش قالت: كنتُ أُستحاضُ حيضةً كثيرة شديدةً، فأتيتُ
رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أستفتيه وأُخْبره، فوجدته في بيت أختي زينبَ بنتِ جَحْشٍ، فقلت: يا رسول الله! إنِّي امرأة أُستحاضُ حيضة كثيرة شديدة، فما ترى فيها؟ قد منعتني الصلاة والصوم! فقال:"أنْعَتُ لكِ الكُرْسُفَ؛ فإنه يُذْهِبُ الدمَ". قالت: هو أكثر من ذلك! قال:"اتّخذِي ثوبًا" قالت: هو أكثر من ذلك! إنَّما أثجُّ ثجًّا. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سآمرك بأمرين أيَّهما فعلتِ أجزأ عنك من الآخر، وإن قويتِ عليهما فأنت أعلم"، قال لها:"إنَّما هذه رَكْضةٌ من رَكضاتِ الشيطان، فتحيَّضي سِتّة أيام أو سبعة في علم الله، ثم اغْتَسِلي، حتَّى إذا رأيت أنك قد طهُرتِ واستنقأتِ فصَلِّي ثلاثًا وعشرين ليلة، أو أربعًا وعشرين ليلة وأيامَها، وصُومي؛ فإنَّ ذلك يُجزيك، وكذلك فافعلِي في كل شهر كما تحيض النساءُ، وكما يَطْهُرنَ ميقات حَيضهن وطُهْرِهن، وإن قويت على أن تُؤَخِّري الظهرَ وتُعَجِّلي العصرَ فتغتسلين وتجمعين بين الصلاتين الظهرَ والعصرَ، وتُؤخِّرين المغربَ وتُعَجِّلين العشاء، ثم تَغْتَسِلين وتجمعين بين الصلاتين فافعلي، وتَغْتَسِلين مع الفجر فافعلي، وصُومي إن قدرتِ على ذلك". قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وهذا أعجبُ الأمرين إليّ".

حسن: رواه أبو داود (287) والترمذي (128) وابن ماجه (622، 627) كلهم من حديث عبد الله بن محمد بن عقيل، عن إبراهيم بن محمد بن طلحة، عن عَمِّه عمران بن طلحة، عن أمه حَمْنة بنت جَحْش فذكرته، واللفظ لأبي داود.

واختصره غيره، وجعله ابن ماجه عن أم حبيبة بنت جحش، ولفظه: قالت: كنتُ أستحاض حيضة كثيرة طويلة، قالت: فجئت إلى النبي صلى الله عليه وسلم أستفتيه وأخبره، قالت: فوجدته عند أختي زينب، قالت: قلت: يا رسول الله! إن لي إليك حاجةً، قال:"وما هي؟ أي هَنَتَاه"، قلت: إنِّي أُستحاضُ حيضةً طويلةً كبيرةً، وقد منعتني الصلاةَ والصوم؛ فما تأمرني فيها؟ قال:"أنْعتُ لكِ الكُرْسُفَ؛ فإنه يُذهِب الدمَ" قلت: هو أكثر. فذكر نحو حديث شريك. انتهى.

قلت: حديث شريك الذي أحال إليه ابن ماجه رواه هو (برقم 625) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة وإسماعيل بن موسى، قالا: حدَّثنا شريك، عن أبي اليقظان، عن عدي بن ثابت، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المستحاضة تَدَعُ الصلاة أيام أقْرائها، ثم تَغْتسِلُ وتوضأ لكل صلاة، وتصومُ وتُصلِّي". وإسناده ضعيف لضعف شريك وشيخه أبي اليقظان.

وسيأتي ذكره في آخر باب في كتاب الحيض.

و"هنتاه": قال الجوهري: هذه اللفظة تختص بالنداء.

والكُرسُف: القطن.
قال الترمذي عن حديث حَمنة: حسن صحيح.

قلت: الصواب أنه حسن فقط، فقد اختلف في عبد الله بن محمد بن عقيل؛ فضعفه يحيى بن معين. ووثّقه العجلي فقال: مدني تابعي جائز الحديث. وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق في حديثه لين، ويقال: تغير بآخره".

ولما قال ابن منده:"حديث منة لا يصح عندهم من وجه من الوجوه؛ لأنه من رواية ابن عقيل، وقد أجمعوا على ترك حديثه" ردّ عليه ابن التركماني قائلًا:"واعلم أن هذا من ابن منده عجيب؛ فإنَّ أحمد وإسحاق والحميدي كانوا يحتجون بحديثه، وحسن البخاري حديثه، وصحّحه ابن حنبل والترمذي كما تقدم، وقد ذكرنا فيما مضى أن الترمذي صحّح في أبواب الفرائض حديثًا آخر وحسنه، وفي سنده ابن عقيل"."الجوهر النقي" (1/ 339).

ولكن شكّ البخاري في سماع ابن عقيل من إبراهيم؛ فأجاب ابن التركماني: بأن ابن عقيل سمع من ابن عمر وجابر وأنس وغيرهم، وهم نظراء شيوخ إبراهيم، فكيف يُنكر سماعه منه. انتهى. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 227 - 229).

وقوله:"ركضة من ركضات الشيطان" قال الخطابي:"أصل الركض الضرب بالرِّجل، والإصابة بها، يريد به الإضرار والإفساد، كما تركض الدابة وتصيب برجلها. ومعناه - والله أعلم -: أن الشيطان قد وجد بذلك طريقًا إلى التلبيس عليها في أمر دينها ووقت طهرها وصلاتها حتَّى أنساها ذلك؛ فصار في التقدير كأنه ركضة نالتها من ركضاته. وإضافة النسيان في هذا إلى فعل الشيطان كما هو في قوله تعالى: {فَأَنْسَاهُ الشَّيْطَانُ ذِكْرَ رَبِّهِ} [سورة يوسف: 42] وكقول النبي صلى الله عليه وسلم:"إن أنساني الشيطانُ شيئًا من صلاتي فسَبِّحوا" أو كما قال، أي: إن لبَّس عليَّ". (معالم السنن:




হামনাহ বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার অনেক বেশি এবং তীব্র রক্তস্রাব (ইস্তিহাযাহ) হতো। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে এ বিষয়ে ফতোয়া জানতে চাইলাম এবং তাঁকে বিষয়টি জানালাম। আমি তাঁকে আমার বোন যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে পেলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি একজন নারী, আমার অনেক বেশি এবং তীব্র রক্তস্রাব হয়। আপনি এ ব্যাপারে কী আদেশ করেন? এটি আমাকে সালাত ও সাওম থেকে বিরত রেখেছে!

তিনি বললেন: "আমি তোমাকে তুলো (কারসুফ) ব্যবহারের পরামর্শ দিচ্ছি, কারণ তা রক্ত দূর করবে (শুষে নেবে)।" তিনি বললেন: এটি তার চেয়েও বেশি! তিনি বললেন: "তুমি একটি কাপড় ব্যবহার করো।" তিনি বললেন: এটি তার চেয়েও বেশি! রক্ত যেন ঝর্ণার মতো প্রবাহিত হয়।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে দুটি কাজের নির্দেশ দেব। তুমি এর মধ্যে যে কোনো একটি করলে অন্যটি থেকে যথেষ্ট হবে। আর যদি তুমি দু'টিই করার ক্ষমতা রাখো, তবে তুমিই ভালো জানো।" তিনি তাকে বললেন: "এটি শয়তানের আঘাতসমূহের (উস্কানির) একটি আঘাত মাত্র। তুমি আল্লাহর জ্ঞানের ভিত্তিতে ছয় দিন অথবা সাত দিন হায়েয (মাসিক) গণ্য করো। তারপর গোসল করো। যখন তুমি দেখবে যে তুমি পবিত্র হয়ে গেছো এবং রক্ত বন্ধ হয়ে গেছে, তখন তেইশ রাত অথবা চব্বিশ রাত ও এর দিনগুলোতে সালাত আদায় করো এবং সাওম পালন করো। কারণ এতেই তোমার জন্য যথেষ্ট হবে। অন্যান্য নারীরা তাদের হায়েযের সময় এবং পবিত্র থাকার সময় যেভাবে করে, তুমিও প্রতি মাসে হায়েয ও পবিত্র থাকার সময় অনুসারে তা-ই করবে। আর যদি তুমি যুহরের সালাত বিলম্বে আদায় করতে এবং আসরের সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করতে সক্ষম হও—অতঃপর গোসল করে যুহর ও আসরকে একত্র করে আদায় করো। এবং মাগরিবের সালাত বিলম্বে ও ঈশার সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করতে সক্ষম হও—অতঃপর গোসল করে এই দুই সালাতকে একত্র করে আদায় করো, তবে তা করো। আর ফজরের সময়ও গোসল করতে পারলে করো, এবং সম্ভব হলে সাওম পালন করো।"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আর এই শেষোক্ত ব্যাপারটি আমার কাছে দুটি কাজের মধ্যে অধিক পছন্দনীয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1510)


1510 - عن عائشة قالت: جاءت فاطمة بنت أبي حُبَيش إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسولَ الله! إنِّي امرأة أُستحاضُ فلا أطْهر؛ أفأدعُ الصلاةَ؟ قال:"لا؛ إنَّما ذلك عِرقٌ، وليستْ بالحيضة، فإذا أقبلت حيضتكِ فدعي الصلاةَ، وإذا أدبرتْ فاغْسِلي عنكِ الدمَ ثمَّ صلِّي".

قال: وقال أبي: ثمَّ توضَّئي لكلِّ صلاةٍ حتَّى يجيء ذلك الوقت.

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الوضوء (228) عن محمد، قال: ثنا أبو معاوية، ومسلم (333) عن يحيى بن يحيى، عن أبي معاوية، مقرونًا بعبد العزيز بن محمد. ومن طرقٍ أُخرى كلُّهم عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة .. فذكرت الحديثَ. واللفظ للبخاري. ومحمد هذا غير منسوبٍ، ولأبي ذرٍّ:"هو ابن سلام".
وقوله:"قال" أي: هشام بن عروة. وقوله:"قال أبي" أي: عروة بن الزبير.

فاختلف أهل العلم في هذا الجزء من الحديث؛ هل هو متصل أم معلق؟ فذهب الزيلعي وغيره إلى أنه معلق، وذهب الحافظ ابن حجر في الفتح (1/ 332) إلى أنه متصل، قال رحمه الله تعالى:"وادعى بعضُهم أن هذا معلق، وليس بصواب، بل هو بالإسناد المذكور عن محمد، عن أبي معاوية، عن هشام. وقد بيّن ذلك الترمذي في روايته. وادّعى آخر أن قوله"ثم توضّئي" من كلام عروة موقوفًا عليه. وفيه نظر؛ لأنه لو كان كلامه لقال:"ثم تتوضأ" بصيغة الإخبار، فلما أتي بصيغة الأمر شاكله الأمر الذي في المرفوع وهو قوله:"فاغتسلي" انتهى.

هذا كلام جيد، وأبو معاوية لم ينفرد برواية زيادة قوله:"توضّئي …" بل تابعه غيره، وإن كان أهل العلم قد اختلفوا في هذه الزيادة. انظر: كلام الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على جامع الترمذي.

ورواه أبو داود (298) وابن ماجه (624) كلاهما من حديث وكيع، عن الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عروة بن الزبير، عن عائشة .. وفيه:"أجتنبي الصلاة أيام محيضكِ، ثمَّ اغتسلي وتوضَّئي لكلِّ صلاةٍ وإن قطر الدم على الحصيرِ".

وحبيب بن أبي ثابت ثقةٌ، وثقه ابن معين، والنسائي، إلَّا أنَّه كان كثير الإرسال والتدليس. وقد يقال: إنَّه لم يسمع من عروة.

وضعَّف هذا الإسناد أبو داود كما سيأتي.

وذهب أكثر الفقهاء إلى أنَّ المستحاضة تتوضَّأ لكلِّ صلاةٍ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাতিমা বিনত আবি হুবাইশ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন এবং বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এমন একজন নারী, যার ইস্তিহাযার রক্ত ঝরে, ফলে আমি পবিত্র হই না। আমি কি সালাত (নামায) ছেড়ে দেবো?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। এটাতো শিরা থেকে নির্গত রক্ত, এটা মাসিক (হায়িয) নয়। যখন তোমার মাসিকের সময় আসে, তখন তুমি সালাত ছেড়ে দাও। আর যখন মাসিকের সময় চলে যায়, তখন তুমি তোমার রক্ত ধুয়ে ফেলো এবং সালাত আদায় করো।" [বর্ণনাকারী বলেন:] আর আমার পিতা (উরওয়াহ) বলেছেন: তারপর সেই সময় আসা পর্যন্ত তুমি প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (1511)


1511 - عن فاطمة بنت أبي حُبَيش أنها كانت تُستحاض، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا كان دمُ الحيضة - فإنه دم أسود يُعرف - فإذا كان ذلك فأمْسكي عن الصلاة، فإذا كان الآخر فتوضّئِي وصَلِّي؛ فإنما هو عرق".

حسن: رواه أبو داود (286) قال: حدَّثنا محمد بن المثنى، حدَّثنا محمد بن أبي عدي، عن محمد - يعني ابن عمرو - قال: حدثني ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن فاطمة بنت أبي حُبَيش، فذكرت الحديث.

قال أبو داود: وقال ابن المثنى: حدَّثنا به ابن أبي عدي من كتابه هكذا، ثم حدَّثنا به بعدُ حفظًا، قال: حدَّثنا محمد بن عمرو، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة أن فاطمة كانت تُستحاض، فذكر معناه. فرجع الحديث إلى مسند عائشةَ.

ورجاله ثقات غير محمد بن عمرو بن علقمة؛ فإنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.

وأمَّا حديث عدي بن ثابت عن أبيه، عن جده عن النبي صلى الله عليه وسلم:"تدعُ الصلاةَ أيام أقْرائِها التي كانت تحيض فيها، ثم تغتسل وتتوضَّأ عند كل صلاة، وتصوم وتصلي" فهو ضعيف. رواه أبو داود (297) والترمذي (126) وابن ماجه (625) كلهم من طريق شريك، عن أبي اليقظان، عن عدي بن ثابت.
قال الترمذي: هذا حديث قد تفرد به شريك، عن أبي اليقظان. وسألت محمدًا عن هذا الحديث فقلت: علي بن ثابت، عن أبيه، عن جده؛ جدّ عدي ما اسمه؟ فلم يعرف محمد اسمه، وذكرت لمحمد قول يحيى بن معين: إن اسمه (دينار) فلم يعبأ به.

وقال أبو داود: حديث عدي بن ثابت والأعمش، عن حبيب وأيوب أبي العلاء كلها ضعيفة لا تصح. انتهى.

قلت: علته شريك، وهو ابن عبد الله النخعي الكوفي القاضي، قال ابن معين: ثقة يغلط. وقال يعقوب بن سفيان: ثقة سيئ الحفظ. والخلاصة كما قال الحافظ: صدوق يخطئ كثيرا، تغير حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة، وكان عادلًا فاضلًا عابدًا شديدًا على أهل البدعة.

وأبو اليقظان هو عثمان بن عُمير - بالتصغير - الكوفي الأعمى: ضعيف اختلط، وكان يدلس ويغلو في التشيع" التقريب.

انظر للمزيد:"المنة الكبرى (1/ 225).




ফাতেমা বিন্তে আবী হুবাইশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি অবিরাম রক্তস্রাবে (ইস্তিহাদায়) আক্রান্ত ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যখন ঋতুর রক্ত আসে—তা হলো কালো রক্ত, যা চেনা যায়—যখন তা দেখবে, তখন তুমি সালাত থেকে বিরত থাকবে। আর যখন অন্য রক্ত দেখবে, তখন তুমি উযু করে সালাত আদায় করবে; কারণ তা একটি রগের (শিরা) রক্ত।"

হাসান (সহীহ): এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাউদ (২৮৬)। তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আবী আদী, মুহাম্মাদ (অর্থাৎ ইবনু আমর) থেকে; তিনি বলেন: আমার নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু শিহাব, উরওয়াহ ইবনু যুবাইর থেকে, ফাতেমা বিনতে আবী হুবাইশ থেকে। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।

আবূ দাউদ বলেন: ইবনুল মুসান্না বলেছেন: ইবনু আবী আদী তার কিতাব (লিখনী) থেকে আমাদের নিকট এভাবেই তা বর্ণনা করেছেন। অতঃপর পরবর্তীতে তিনি আমাদের নিকট মুখস্থ বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আমর, যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যে, ফাতেমা মুস্তাহাদা ছিলেন। অতঃপর তিনি একই অর্থের হাদীস উল্লেখ করেন। সুতরাং হাদীসটি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুসনাদে প্রত্যাবর্তন করে।

তবে এর বর্ণনাকারীগণ বিশ্বস্ত, মুহাম্মাদ ইবনু আমর ইবনু আলকামা ব্যতীত; কেননা তিনি ভুল না করলে তার হাদীস হাসান (গ্রহণযোগ্য) হয়।

আর আদী ইবনু সাবিত তার পিতা থেকে, তিনি তার দাদা থেকে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত হাদীস: "সে তার ঋতুর (পবিত্রতার) দিনগুলোতে সালাত ত্যাগ করবে, অতঃপর গোসল করবে এবং প্রত্যেক সালাতের জন্য উযু করবে, আর সাওম পালন করবে ও সালাত আদায় করবে" - এটি যঈফ (দুর্বল)। এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাউদ (২৯৭), তিরমিযী (১২৬) এবং ইবনু মাজাহ (৬২৫)। সকলেই শারীক-এর সূত্রে, আবূল ইয়াকযান থেকে, তিনি আদী ইবনু সাবিত থেকে বর্ণনা করেছেন।

তিরমিযী বলেন: এই হাদীসটি শারীক আবূল ইয়াকযান থেকে বর্ণনা করার ক্ষেত্রে একক (তাফার্রুদ) হয়ে গেছেন। আমি মুহাম্মাদকে (আল-বুখারী) এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম এবং বলেছিলাম: আলী ইবনু সাবিত, তার পিতা থেকে, তার দাদা থেকে—আদীর দাদার নাম কী? মুহাম্মাদ তার নাম জানতে পারেননি। আমি মুহাম্মাদকে ইয়াহইয়া ইবনু মা'ঈনের উক্তি উল্লেখ করেছিলাম যে, তার নাম (দিনার), কিন্তু তিনি তাতে ভ্রুক্ষেপ করেননি।

আবূ দাউদ বলেন: আদী ইবনু সাবিত এবং আ'মাশ, হাবী ও আয়্যুব আবুল আলা-এর হাদীসগুলো সবই দুর্বল, সহীহ নয়। সমাপ্ত।

আমি (গ্রন্থকার) বলি: এর দুর্বলতার কারণ শারীক। তিনি হলেন ইবনু আবদুল্লাহ আন-নাখঈ আল-কূফী আল-কাদী। ইবনু মা'ঈন বলেছেন: তিনি বিশ্বস্ত, তবে ভুল করেন। ইয়া'কূব ইবনু সুফইয়ান বলেছেন: তিনি বিশ্বস্ত, তবে তার স্মৃতিশক্তি দুর্বল। হাফিয (ইবনু হাজার)-এর বক্তব্য অনুসারে সারমর্ম হলো: তিনি সত্যবাদী, তবে অধিক ভুল করেন। কূফায় বিচারকের (ক্বাদী) দায়িত্ব গ্রহণের পর তার স্মৃতিশক্তি পরিবর্তিত হয়ে গিয়েছিল। তবে তিনি ন্যায়পরায়ণ, সৎগুণসম্পন্ন, ইবাদতকারী এবং বিদ'আতপন্থীদের প্রতি কঠোর ছিলেন।

আর আবূল ইয়াকযান হলেন উসমান ইবনু উমাইর (নামটি ছোট করে লেখা হয়েছে) আল-কূফী আল-আ'মা (অন্ধ): তিনি দুর্বল, ইখতিলাত (স্মৃতিভ্রম) হয়ে গিয়েছিল। তিনি তাদলীস করতেন এবং শিয়া মতবাদে বাড়াবাড়ি করতেন (আত-তাকরীব)। আরও দেখুন: "আল-মিন্না আল-কুবরা (১/২২৫)।"









আল-জামি` আল-কামিল (1512)


1512 - عن * *




১৫১২ - থেকে **









আল-জামি` আল-কামিল (1513)


1513 - عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنما الأعمال بالنيات، وإنما لكل امرئ ما نوى؛ فمن كانت هجرته إلى الله ورسوله فهجرته إلى الله ورسوله، ومن كانت هجرته لدنيا يُصيبها، أو امرأةٍ يتزوجها فهجرته إلى ما هاجر إليه".

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري (1) ومسلم (1907)، كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم، عن علقمة بن وقاص الليثي قال: سمعت عمر بن الخطاب، فذكر الحديث.

وبه بوّب ابن خزيمة في صحيحه (1/ 73) قائلًا:"باب إيجاب إحداث النية".

واشتراط النية في الوضوء مذهب جمهور أهل العلم منهم مالك والشافعي وأحمد.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই (সকল) আমল নিয়ত অনুযায়ী হয়, এবং প্রত্যেক ব্যক্তি যা নিয়ত করে, সে তাই লাভ করে। সুতরাং যার হিজরত আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের দিকে, তার হিজরত আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের দিকেই (গৃহীত)। আর যার হিজরত পার্থিব কোনো বস্তু লাভ করার জন্য অথবা কোনো নারীকে বিবাহ করার উদ্দেশ্যে, তার হিজরত সেই উদ্দেশ্যের জন্যই হবে, যার জন্য সে হিজরত করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1514)


1514 - عن أنس قال: طلب بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وضوءًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هل مع أحدٍ منكم ماءٌ؟". فوضع يده في الماء ويقول:"توضئوا باسم الله"، فرأيت الماء يخرج من بين أصابعه حتَّى توضئوا من عند آخرهم. قال ثابت: قلت لأنس: كم تراهم؟ قال: نحوًا من سبعين.

صحيح: رواه النسائي (78) وأحمد (12694) كلاهما من حديث عبد الرزاق - وهو في مصنفه (20535) - قال: حدَّثنا معمر، عن ثابت وقتادة، عن أنس فذكر مثله. وصحّحه ابن خزيمة (144) فأخرجه من طريق عبد الرزاق به.

واستدل به النسائي وابن خزيمة على مشروعية التسمية عند الوضوء وبوّبا به. وأصل القصة في الصحيحين بدون ذكر التسمية وسيأتي في معجزات النبي صلى الله عليه وسلم.

وقال البيهقي بعد أن أخرج الحديث:"إنه أصح ما في التسمية" السنن الكبرى (1/ 43).

وأما ما رُوي عن أبي هريرة، وعائشة، وأبي سعيد، وسهل بن سعد، وأسماء بنت سعيد بن زيد عن أبيها من قول النبي صلى الله عليه وسلم:"لا وضوء لمن لم يذكر اسم الله عليه، فكلها معلولة؛ ولذا قال الإمام أحمد بن حنبل:"لا أعلم في هذا الباب حديثًا له إسناد جيّد".

وقال أحمد بن حفص السّعدي:"سئل أحمد عن التّسمية في الوضوء فقال: لا أعلم فيه حديثًا
يثبت. أقوى شيء فيه حديث كثير بن زيد، عن رُبيح (وهو ابن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدريّ)، ثم ذكر رُبيحا - أي: من هو؟ ومن أبوه؟ يعني: الذي روى حديث سعيد بن زيد أنهم مجهولون، وضعَّف إسناده. المغني (1/ 146).

وقال ابن ملقِّن:"هذا الحديث مشهورٌ، وله طرقٌ متكلَّم في كلِّها".

انظر:"البدر المنير" (2/ 69).

وقال الإمام البخاري:"أحسن شيء في هذا الباب حديث رباح بن عبد الرحمن".

قلت: هذا حديث رباح بن عبد الرحمن بن أبي سفيان بن حويطب، عن جدته، عن أبيها، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا وضوء لمن لم يذكر اسم الله عليه" رواه الترمذي (25) من طريق بشر بن المُفضَّل، عن عبد الرحمن بن حرملة، عن أبي ثِفال المُرّي، عن رباح، ثم رواه أيضًا (26) من وجه آخر عن يزيد بن عياض، عن أبي ثفال المُرّي به، ولم يذكر لفظ الحديث، وإنما أحال على الحديث السابق. ورواه أيضًا ابن ماجه (398) من طريق يزيد بن عياض به، وزاد في أول الحديث:"لا صلاة لمن لا وضوء له".

ومداره على أبي ثفال وهو: ثُمامة بن وائل بن حُصين المُرِّي بضم الميم ثم راء - مشهور بكنيته، قال فيه البخاري: في حديثه نظر. وذكره ابن حبان في الثقات (8/ 157 - 158) وبعد ما ذكر الحديث قال:"ولكن في القلب من هذا الحديث؛ لأنه قد اختلف على أبي ثفال فيه".

وفي إسناد ابن ماجه أيضًا يزيد بن عياض الليثي أبو الحكم المدني نزيل البصرة كذّبه مالك وغيره، وضعّفه ابن المديني والدارقطني. وقال البخاري ومسلم: منكر الحديث. إلَّا أن الترمذي رواه من طريق عبد الرحمن بن حرملة.

أما رباح بن عبد الرحمن بن أبي سفيان نفسه فلم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات على قاعدته، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول"؛ أي: إذا توبع، وإلا فلين الحديث.

فإذا كان هذا حال حديث رباح بن عبد الرحمن الذي قال فيه الإمام البخاري:"أحسن شيء في هذا الباب" فما بال أحاديث غيره، إلَّا أن بعض أهل العلم يرون أن مجموع الشواهد يجعل الحديث حسنًا لغيره. انظر تخريج هذه الأحاديث في نصب الراية (2/ 64 - 66).

قال المنذري في الترغيب والترهيب:"ولا شك أن الأحاديث التي وردت فيها وإن كان لا يسلم شيء منها عن مقال، فإنها تتعاضد بكثرة طرقها، وتكتسب قوة".

ولذا قال الإمام أحمد في رواية أنها واجبة، وحكى الترمذي عن إسحاق بن راهويه:"إنْ تركها عامدًا أعاد الوضوء، وإن كان ناسيًا أو متأوِّلًا أجزأه".

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 134، 135).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী ওযুর জন্য পানি চাইলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কারো কাছে কি পানি আছে?" অতঃপর তিনি [রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] পানিতে তাঁর হাত রাখলেন এবং বললেন: "বিসমিল্লাহ বলে ওযু করো।" আমি দেখতে পেলাম যে, তাঁর আঙ্গুলসমূহের মধ্য থেকে পানি নির্গত হচ্ছে, যতক্ষণ না তাদের শেষ ব্যক্তিটিও ওযু সম্পন্ন করল। সাবিত (রাহঃ) বলেন: আমি আনাসকে জিজ্ঞেস করলাম, তাদের সংখ্যা কতজন হবে বলে আপনি মনে করেন? তিনি বললেন: সত্তর জনের কাছাকাছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1515)


1515 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُقبل صلاةُ أحدكم إذا أحدث حتَّى يتوضأ".

متَّفقٌ عليه: أخرجه البخاري في الوضوء (135) وفي كتاب الحِيَل (6954) واللفظ له ومسلم في الطهارة (225) وفي رواية عند البخاري: فقال رجلٌ من حضرموت: ما الحَدَثُ يا أبا هريرة؟ قال: فُساءٌ أو ضُراط.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কারো সালাত (নামায) কবুল হবে না, যখন সে পবিত্রতা ভঙ্গ করে, যতক্ষণ না সে ওযু করে নেয়।"

মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারীর এক বর্ণনায় আছে, হাদরামাওতের জনৈক ব্যক্তি জিজ্ঞাসা করলেন: হে আবু হুরায়রা! 'হাদাস' (পবিত্রতা ভঙ্গ হওয়া) কী? তিনি বললেন: নিঃশব্দে বায়ু নিঃসরণ অথবা শব্দ করে বায়ু নিঃসরণ।









আল-জামি` আল-কামিল (1516)


1516 - عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقبل الله صلاة بغير طهور ولا صدقة من غُلول".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (224) وفيه: عن مصعب بن سعد قال: دخل عبد الله بن عمر على ابن عامر يعوده وهو مريض، فقال: ألا تدعو الله لي يا ابن عمر! قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول، فذكر الحديث، ثم قال له: كنتَ على البصرة.

"فمعناه أنك لست بسالم من الغلول، فقد كنتَ واليًا على البصرة، وتعلقت بك تبعات من حقوق الله تعالى وحقوق العباد، ولا يقبل الدعاء لمن كان هذه صفته، كما لا تُقبل الصلاة والصدقة إلَّا من مُتَصوِّنٍ".

"والظاهر - والله أعلم - أن ابن عمر قَصَد زجْرَ ابنِ عامر، وحثَّه على التوبة، وتحريضَه على الإقلاع عن المخالفات، ولم يُرِدِ القَطْعَ حقيقةً بأن الدعاء للفُساق لا ينفع؛ فلم يَزَلِ النبي صلى الله عليه وسلم والسلف والخلف يدعون للكفار وأصحاب المعاصي بالهداية والتوبة". كذا في شرح مسلم للنووي.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তাআলা পবিত্রতা ব্যতীত কোনো সালাত (নামায) এবং অবৈধভাবে অর্জিত সম্পদ (غلول) থেকে কোনো সাদকা (দান) কবুল করেন না।"

(সহীহ মুসলিম, তাহারাত (২২৪)-এ বর্ণিত আছে, তাতে রয়েছে: মুসআব ইবনু সা’দ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনু আমির অসুস্থ থাকা অবস্থায় তাঁকে দেখতে যান। ইবনু আমির বললেন: হে ইবনু উমর! আপনি কি আমার জন্য আল্লাহর কাছে দু'আ করবেন না? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি [তারপর উপরোক্ত হাদীসটি উল্লেখ করলেন]। এরপর তিনি (ইবনু উমর) তাকে (ইবনু আমিরকে) বললেন: আপনি তো বসরা'র শাসনকর্তা ছিলেন।

এর অর্থ হলো, আপনি অবৈধ অর্জন (غلول) থেকে মুক্ত নন। কারণ আপনি বসরা'র শাসক ছিলেন, এবং আপনার উপর আল্লাহর ও বান্দাদের অধিকার সংক্রান্ত দায়ভার জড়িয়ে আছে। যার এই অবস্থা, তার দু'আ কবুল করা হয় না; যেমন পবিত্র ব্যক্তি ছাড়া সালাত ও সাদকা কবুল করা হয় না।

তবে স্পষ্টত—আল্লাহই ভালো জানেন—ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনু আমিরকে সতর্ক করতে চেয়েছেন, তাঁকে তাওবা করতে উৎসাহিত করেছেন এবং আল্লাহর নির্দেশ লঙ্ঘনের পথ ছেড়ে দিতে প্রেরণা দিয়েছেন। তিনি কঠোরভাবে এই সিদ্ধান্ত দিতে চাননি যে, পাপাচারীদের জন্য দু'আ করা সত্যিই কোনো উপকারে আসে না; কেননা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং সালাফ ও খালাফগণ সর্বদা কাফির ও পাপাচারীদের জন্য হেদায়েত ও তাওবার দু'আ করেছেন। এটি ইমাম নববীর শারহু মুসলিম গ্রন্থে রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1517)


1517 - عن ابن عباس قال: كُنَّا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتى الخلاءَ، ثم إنه رجع فأُتِيَ بطعام. فقلت: يا رسول الله! ألا تتوضأ؟ فقال:"لِمَ؟ أَأُصَلِّي فأتوضأ؟".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (374) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن ابن عينية، عن عمرو بن دينار، سمع سعيد بن الحُوَيْرِث يقول: عن ابن عباس فذكر مثله. ورواه البيهقي أيضا في سننه (1/ 42) واللفظ ما.

ورواه أصحاب السنن غير ابن ماجه - أبو داود (3760) والترمذي (1847) والنسائي (123) كلهم من طريق ابن عُلية، قال: حدَّثنا أيوب، عن ابن أبي مُليكة، عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج من الخَلاء فقُرِّب إليه طعام، فقالوا: ألا نأتيك بوَضوءٍ؟ ، فقال:"إنما أُمرت بالوضوء إذا قمت إلى الصلاة".

وقد صحّحه ابن خزيمة (35) فرواه من طريق ابن عُلية وهو إسماعيل.
قال الترمذي: حسن.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন তিনি প্রকৃতির ডাকে (শৌচাগারে) গেলেন। অতঃপর তিনি ফিরে আসলেন এবং তাঁর সামনে খাবার আনা হলো। আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি উযূ করবেন না?' তিনি বললেন, 'কেন? আমি কি সালাত আদায় করব যে ওযু করব?'









আল-জামি` আল-কামিল (1518)


1518 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُقبل صلاةٌ بغير طُهور، ولا صدقة من غُلول".

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (1/ 133 رقم 252) عن محمد بن مسكين، ثنا يحيى بن حسَّان، ثنا سليمان، عن كثير، عن الوليد، عن أبي هريرة، فذكره.

قال البزار:"لا نعلمه يُروي عن أبي هريرة إلَّا بهذا الإسناد، وقد رواه عن كثير غير سليمان".

قلت: ومن غير سليمان: ما رواه عبد العزيز بن أبي حازم، عن كثير بن زيد به مثله. رواه ابن خزيمة (1/ 8 رقم 10) من طريق أبي عمار الحسن بن حُرَيْث، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم به.

وكثير بن زيد الأسلمي قال فيه الحافظ الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 227):"وثقه ابن حبان وابن معين في رواية. وقال أبو زرعة: صدوق فيه لين. وضعّفه النسائي. وقال محمد بن عبد الله بن عمار الموصلي: ثقة" انتهى.

قلت: هو من رجال التهذيب، أخرج عنه أصحاب السنن غير النسائي، واختلف فيه قول ابن معين، فرواه عبد الله بن الدورقي عنه: ليس به بأس، ورواه معاوية بن صالح وغيره عنه: صالح، ورواه ابن أبي خيثمة عنه: ليس بذاك. وممن ضعّفه أيضًا يعقوب بن شيبة، فقال: ليس بذاك الساقط وإلى الضعف ما هو. وقال أبو حاتم: صالح ليس بالقوي يكتب حديثه.

وأما الإمام أحمد فقال فيه:"ما أرى به بأسًا".

وقال ابن عدي: تُروَى عنه نُسَخ، ولم أر به بأسًا، وأرجو أنه لا بأس به.

وخلاصة القول فيه أنه يُحسن حديثه، وقد قال فيه الحافظ:"صدوق يخطئ". وأرجو أنه لم يخطئ في هذا؛ لشواهده، وقد رواه ابن خزيمة (9) بإسناد آخر من طريق عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكر الحديث بمثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: পবিত্রতা (তাহারা) ব্যতীত কোনো সালাত কবুল হয় না এবং খিয়ানতের সম্পদ থেকে দেওয়া কোনো সাদকাও কবুল হয় না।









আল-জামি` আল-কামিল (1519)


1519 - عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يقبل الله صلاة بغير طهور، ولا صدقة من غُلول".

صحيح: رواه الطبراني في الكبير (18/ 206) قال: حدَّثنا عبد العلي بن أحمد بن عبد الله بن الفضل الحميدي، ورجاء البزار، قالا: ثنا بن الحباب، ثنا شعبة، عن قتادة، عن أبي السوار العدوي، عن عمران بن حصين، فذكر الحديث.

وأبو السوار العدوي اسمه: حسَّان بن حُرَيْث، وقيل بالعكس، وقيل غير ذلك، إلَّا أنه مشهور بكنيته، وهو ثقة من رجال الشيخين.

قال الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 228): رجاله رجال الصحيح.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ পবিত্রতা (ওযু) ছাড়া কোনো সালাত কবুল করেন না এবং আত্মসাৎকৃত (অন্যায়ভাবে উপার্জিত/খেয়ানতকৃত) সম্পদ থেকে কোনো সাদাকা (দান) কবুল করেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1520)


1520 - عن أُسامة بن عُمير الهُذَلي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقبل الله عز وجل صدقةً من غُلول، ولا صلاةً بغير طُهور".

صحيح: رواه أبو داود (59) والنسائي (139) وابن ماجه (271) كلهم من طريق قتادة، عن أبي المَليح بن أسامة، عن أسامة بن عُمير الهُذَلي، فذكر الحديث.

رجاله ثقات وإسناده صحيح.

وأبو المَليح: هو عامر، وقيل: زيد، وقيل: زياد بن أسامة بن عمير، وثقه أبو زرعة وغيره، وروى له الجماعة.

وفي هذا المعنى رُوي عن غير هؤلاء، ولكن كلها معلولة.




উসামা ইবনু উমাইর আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: “আল্লাহ তাআলা খেয়ানত করে উপার্জন করা কোনো সাদাকা কবুল করেন না এবং পবিত্রতা (পাক-পবিত্রতা) ছাড়া কোনো সালাত কবুল করেন না।”









আল-জামি` আল-কামিল (1521)


1521 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مفتاح الصلاة الطُهور، وتحريمها التكبير، وتحليلها التسليم".

حسن: رواه أبو داود (61) والترمذي (3) وابن ماجه (275) كلهم من طريق سفيان، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن محمد ابن الحنفية، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

قلت: إسناده حسن للكلام في عبد الله بن محمد بن عقيل، غير أنه حسين الحديث.

قال النووي في"المجموع" (3/ 289):"رواه أبو داود والترمذي وغيرهما بإسناد صحيح" وقال الحافظ في"التلخيص" (1/ 216):"وصحّحه الحاكم وابن السكن".

قال الترمذي: هذا الحديث أصحّ شيء في هذا الباب وأحسن، وعبد الله بن محمد بن عقيل هو صدوق، وقد تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه، قال: سمعت محمد بن إسماعيل يقول: كان أحمد بن حنبل وإسحاق بن إبراهيم والحميدي يحتجون بحديث عبد الله بن محمد بن عقيل، قال محمد (البخاري): وهو مقارب الحديث. انتهى كلام الترمذي.

ومحمد ابن الحنفية هو: محمد بن علي بن أبي طالب، نسب إلى أمه: خولة بنت جعفر الحنفية، من بني حنيفة.

ثم قال الترمذي في كتاب الصلاة، باب ما جاء في تحريم الصلاة وتحليلها (238) بعد أن روى حديث أبي سعيد الخدري:"حديث علي بن أبي طالب في هذا أجود إسنادًا وأصحّ من حديث أبي سعيد، وقد كتبناه في أول كتاب الوضوء".

وقال عن حديث أبي سعيد:"حديثٌ حسن صحيح" انتهى.

والصواب أن حديث أبي سعيد ضعيف؛ فقد أخرجه هو في الموضع المشار إليه أعلاه، وابن ماجه (276) كلاهما من طريق أبي سفيان طريف بن شهاب، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد مرفوعًا، ولفظه: مفتاح الصلاة الطهور، وتحريمها التكبير، وتحليلها التسليم"، وزاد الترمذي:"ولا صلاة لمن لم يقرأ بالحمد وسورةٍ في فريضة أو غيرها".
وأبو سفيان طريف بن شهاب السعدي ضعيف؛ فقد ضعّفه ابن معين وأبو حاتم، وقال البخاري: ليس بالقوي. وقال أبو داود: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث.

وأما ما رواه الحاكم (1/ 132) من طريق سعيد بن مسروق الثوري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد به مثله وقال:"صحيح الإسناد على شرط مسلم" فيبدو أنه وقع خطأ في الطباعة، لأنه يقول عقبه: وشواهده عن أبي سفيان عن أبي نضرة كثيرة. فقد رواه أبو حنيفة وحمزة الزيات وأبو مالك النخعي وغيرهم عن أبي سفيان" ولم يسبق ذكر أبي سفيان أصلًا. فذكر سعيد بن مسروق الثوري خطأ من الناسخ أو من الطابع وإنما هو أبو سفيان، وكون الذهبي ذكر في تلخيصه أيضًا سعيد بن مسروق فإما أن يكون هو الآخر من وهم لوجوده في نسخة الحاكم هكذا، أو أن المصححين أثبتوه ليكون موافقًا لما في الأصل. وممن أخرج حديث أبي سعيد من طريق أبي سفيان المذكور الدارقطني (1/ 359) من شيوخ الحاكم إلَّا أنه لم يذكر الواسطة بينه وبين أبي سعيد وهو أبو نضرة. وأما الزيلعي فتجاهل ذكر سعيد بن مسروق أو أبي سفيان وإنما نقل قول الحاكم:"وحديث عبد الله بن عقيل عن ابن الحنفية عن علي أشهر إسنادًا، لكن الشيخين أعرضا عن ابن عقيل أصلًا" وهذا يدل على أن الطريق الذي رواه الحاكم هو الذي فيه أبو سفيان، ولو كان سعيد بن مسروق لجعله متابعًا له، وقوَّى أمره، والحمد لله على توفيقه.




আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সালাতের চাবি হলো পবিত্রতা, আর এর শুরু (যা অন্য কাজ হারাম করে দেয়) হলো তাকবীর, আর এর শেষ (যা অন্য কাজ হালাল করে দেয়) হলো সালাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1522)


1522 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا توضأ العبد المسلم فغسل وجهه خرجت من وجهه كلُّ خطيئةٍ نظر إليها بعينيه مع الماء، (أو مع آخر قطر الماء)، فإذا غسل يديه خرجت من يديه كلُّ خطيئةٍ بطشتها يداه مع الماء (أو مع آخر قطر الماء)، فإذا غسل رجليه خرجت كلُّ خطيئةٍ مشتها رجلاه مع الماء (أو مع آخر قطر الماء)، حتَّى يخرج نقيًّا من الذنوب".

صحيح: رواه مالك في الطهارة (31) عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. ومن طريقه رواه مسلم في الطهارة (244).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো মুসলিম বান্বা ওযু করে এবং তার মুখমণ্ডল ধৌত করে, তখন তার চোখ দিয়ে দেখা প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) তার মুখমণ্ডল থেকে ঝরে যায়। আর যখন সে তার দুই হাত ধৌত করে, তখন তার দুই হাত দ্বারা কৃত (বা স্পর্শ করা) প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) তার হাত থেকে ঝরে যায়। আর যখন সে তার দুই পা ধৌত করে, তখন তার দুই পা দ্বারা হেঁটে যাওয়া প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) ঝরে যায়। এভাবে সে গুনাহ থেকে পবিত্র অবস্থায় বেরিয়ে আসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1523)


1523 - عن عثمان بن عفان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من توضأ فأحسن الوضوء خرجَتْ خطاياه من جسدِه، حتَّى تخرج من تحت أَظْفاره".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (245) عن محمد بن معمر بن ربعي، حدَّثنا أبو هشام المخزومي، عن عبد الواحد، (وهو ابن زياد) حدَّثنا عثمان بن حكيم، حدَّثنا محمد بن المنكدر، عن حُمْران، عن عثمان بن عفان .. فذكر الحديث.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি উত্তমরূপে ওযু সম্পন্ন করে, তার শরীর থেকে তার পাপরাশি বের হয়ে যায়, এমনকি তা তার নখের নিচ থেকেও বের হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1524)


1524 - عن حُمْران مولى عثمان قال: أتيت عثمان بن عفان بوضوء، فتوضأ ثم قال:
إن ناسًا يتحدَّثون عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أحاديث لا أدري ما هي؟ إلَّا أنِّي رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضأ مثل وضوئي هذا، ثم قال:"من توضأ هكذا غُفر له ما تقدم من ذنبه، وكانت صلاته ومشيه إلى المسجد نافلة".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (229) عن قتيبة بن سعيد، وأحمد بن عبدة الضبِّي، ثنا عبد العزيز - وهو الدراوردي -، عن زيد بن أسلم، عن حُمْران مولى عثمان .. فذكره.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম হুমরান বলেন: আমি উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য ওযুর পানি নিয়ে আসলাম। অতঃপর তিনি ওযু করলেন এবং বললেন: কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এমন কিছু হাদীস বর্ণনা করে, যা সম্পর্কে আমি অবগত নই (অর্থাৎ সেগুলোর সত্যতা সম্পর্কে আমি নিশ্চিত নই)। তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঠিক আমার এই ওযুর মতো ওযু করতে দেখেছি। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি এভাবে ওযু করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে এবং তার সালাত এবং মসজিদে হেঁটে যাওয়া নফল (অতিরিক্ত পুণ্যের) হিসাবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1525)


1525 - عن إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص قال: حدثني أبي، عن أبيه قال: كنت عند عثمان بن عفان، فدعا بطهور فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ مسلم تحضره صلاة مكتوبة، فيُحسن وضوءها وخشوعها وركوعها إلَّا كانت كفارةً لما قبلها من الذنوب، ما لم يُؤت كبيرةً، وذلك الدهرُ كله".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (228) عن عبد بن حميد، وحجاج الشاعر، كلاهما عن أبي الوليد: حدَّثنا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص به.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'যে কোনো মুসলিম ব্যক্তির ওপর যখন কোনো ফরয সালাতের সময় উপস্থিত হয়, আর সে তার উযূ, তার বিনয় (খুশু) এবং তার রুকূ সুন্দরভাবে সম্পন্ন করে, তবে তা তার পূর্বের সকল গুনাহের জন্য কাফফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে কোনো কবীরা গুনাহ করে। আর এই (প্রতিদান) সর্বদা (সব যুগের জন্য) প্রযোজ্য।'









আল-জামি` আল-কামিল (1526)


1526 - عن حُمْران بن أبان قال: كنت أضع لعثمان طهوره، فما أتي عليه يومٌ إلَّا وهو يفيض عليه نُطفةً. وقال عثمان: حدَّثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عند انصرافنا من صلاتنا هذه - قال مِسعر: أراها العصر - فقال:"لا أدري أُحدِّثكم بشيء أو أسكت"، فقلنا: يا رسول الله! إن كان خيرًا فحدَّثنا، وإن كان غيرَ ذلك فالله ورسوله أعلم، قال:"ما من مسلم يتطهر، فيتم الطهور الذي كتب الله عليه، فيصلي هذه الصلوات الخمس، إلَّا كانت كفارات لما بينها".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (231) عن أبي كُرَيب محمد بن العلاء، وإسحاق بن إبراهيم جميعًا، عن وكيعٍ. قال أبو كريب: حدَّثنا وكيع، عن مسعر، عن جامع بن شدَّاد، قال: سمعت حُمْران .. فذكر مثله.




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর খাদেম হুমরান ইবনু আবান বলেন: আমি উসমানের জন্য উযূর পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। এমন কোনো দিন যেত না, যখন তিনি সেই পানি নিজের শরীরে প্রবাহিত করতেন না। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের এই সালাত (নামায) থেকে ফিরে আসার সময়—মিসআর বলেন: আমার মনে হয়, তিনি আসরের সালাতের কথা বলেছেন—আমাদের বললেন: “আমি জানি না, আমি কি তোমাদেরকে কিছু বলব, নাকি চুপ থাকব?” আমরা বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি তা কল্যাণকর হয়, তবে আমাদের বলুন। আর যদি তা অন্য কিছু হয়, তবে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: “যে কোনো মুসলিম পবিত্রতা অর্জন করে এবং আল্লাহ তার ওপর যে পরিপূর্ণ পবিত্রতা ফরয করেছেন, তা সম্পূর্ণ করে, অতঃপর এই পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করে, তবে তা এই (সালাতগুলোর) মধ্যবর্তী (গুনাহসমূহের) কাফফারা হয়ে যায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1527)


1527 - عن حُمْران مولى عثمان قال: توضأ عثمان يوما وضوءًا حسنًا، ثم قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضأ فأحسن الوضوء، ثم قال:"من توضأ هكذا، ثم خرج إلى المسجد لا يَنْهَزُه إلَّا الصلاة غُفِر له ما خلا من ذَنْبه".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (232) عن هارون بن سعيد الأيلي، حدَّثنا ابن وهبٍ، وأخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، عن حُمْران .. فذكر مثله.

وقوله: (ما خلا من ذنبه) أي: ما مضى من ذنبه.




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম হুমরান বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন উত্তমরূপে ওযু করলেন, অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি উত্তমরূপে ওযু করলেন, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি এভাবে ওযু করে, এরপর মসজিদের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং সালাত (নামাজ) ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্য তাকে চালিত না করে, তার অতীতের গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।”