হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1521)


1521 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مفتاح الصلاة الطُهور، وتحريمها التكبير، وتحليلها التسليم".

حسن: رواه أبو داود (61) والترمذي (3) وابن ماجه (275) كلهم من طريق سفيان، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن محمد ابن الحنفية، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

قلت: إسناده حسن للكلام في عبد الله بن محمد بن عقيل، غير أنه حسين الحديث.

قال النووي في"المجموع" (3/ 289):"رواه أبو داود والترمذي وغيرهما بإسناد صحيح" وقال الحافظ في"التلخيص" (1/ 216):"وصحّحه الحاكم وابن السكن".

قال الترمذي: هذا الحديث أصحّ شيء في هذا الباب وأحسن، وعبد الله بن محمد بن عقيل هو صدوق، وقد تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه، قال: سمعت محمد بن إسماعيل يقول: كان أحمد بن حنبل وإسحاق بن إبراهيم والحميدي يحتجون بحديث عبد الله بن محمد بن عقيل، قال محمد (البخاري): وهو مقارب الحديث. انتهى كلام الترمذي.

ومحمد ابن الحنفية هو: محمد بن علي بن أبي طالب، نسب إلى أمه: خولة بنت جعفر الحنفية، من بني حنيفة.

ثم قال الترمذي في كتاب الصلاة، باب ما جاء في تحريم الصلاة وتحليلها (238) بعد أن روى حديث أبي سعيد الخدري:"حديث علي بن أبي طالب في هذا أجود إسنادًا وأصحّ من حديث أبي سعيد، وقد كتبناه في أول كتاب الوضوء".

وقال عن حديث أبي سعيد:"حديثٌ حسن صحيح" انتهى.

والصواب أن حديث أبي سعيد ضعيف؛ فقد أخرجه هو في الموضع المشار إليه أعلاه، وابن ماجه (276) كلاهما من طريق أبي سفيان طريف بن شهاب، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد مرفوعًا، ولفظه: مفتاح الصلاة الطهور، وتحريمها التكبير، وتحليلها التسليم"، وزاد الترمذي:"ولا صلاة لمن لم يقرأ بالحمد وسورةٍ في فريضة أو غيرها".
وأبو سفيان طريف بن شهاب السعدي ضعيف؛ فقد ضعّفه ابن معين وأبو حاتم، وقال البخاري: ليس بالقوي. وقال أبو داود: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث.

وأما ما رواه الحاكم (1/ 132) من طريق سعيد بن مسروق الثوري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد به مثله وقال:"صحيح الإسناد على شرط مسلم" فيبدو أنه وقع خطأ في الطباعة، لأنه يقول عقبه: وشواهده عن أبي سفيان عن أبي نضرة كثيرة. فقد رواه أبو حنيفة وحمزة الزيات وأبو مالك النخعي وغيرهم عن أبي سفيان" ولم يسبق ذكر أبي سفيان أصلًا. فذكر سعيد بن مسروق الثوري خطأ من الناسخ أو من الطابع وإنما هو أبو سفيان، وكون الذهبي ذكر في تلخيصه أيضًا سعيد بن مسروق فإما أن يكون هو الآخر من وهم لوجوده في نسخة الحاكم هكذا، أو أن المصححين أثبتوه ليكون موافقًا لما في الأصل. وممن أخرج حديث أبي سعيد من طريق أبي سفيان المذكور الدارقطني (1/ 359) من شيوخ الحاكم إلَّا أنه لم يذكر الواسطة بينه وبين أبي سعيد وهو أبو نضرة. وأما الزيلعي فتجاهل ذكر سعيد بن مسروق أو أبي سفيان وإنما نقل قول الحاكم:"وحديث عبد الله بن عقيل عن ابن الحنفية عن علي أشهر إسنادًا، لكن الشيخين أعرضا عن ابن عقيل أصلًا" وهذا يدل على أن الطريق الذي رواه الحاكم هو الذي فيه أبو سفيان، ولو كان سعيد بن مسروق لجعله متابعًا له، وقوَّى أمره، والحمد لله على توفيقه.




আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সালাতের চাবি হলো পবিত্রতা, আর এর শুরু (যা অন্য কাজ হারাম করে দেয়) হলো তাকবীর, আর এর শেষ (যা অন্য কাজ হালাল করে দেয়) হলো সালাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1522)


1522 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا توضأ العبد المسلم فغسل وجهه خرجت من وجهه كلُّ خطيئةٍ نظر إليها بعينيه مع الماء، (أو مع آخر قطر الماء)، فإذا غسل يديه خرجت من يديه كلُّ خطيئةٍ بطشتها يداه مع الماء (أو مع آخر قطر الماء)، فإذا غسل رجليه خرجت كلُّ خطيئةٍ مشتها رجلاه مع الماء (أو مع آخر قطر الماء)، حتَّى يخرج نقيًّا من الذنوب".

صحيح: رواه مالك في الطهارة (31) عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. ومن طريقه رواه مسلم في الطهارة (244).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো মুসলিম বান্বা ওযু করে এবং তার মুখমণ্ডল ধৌত করে, তখন তার চোখ দিয়ে দেখা প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) তার মুখমণ্ডল থেকে ঝরে যায়। আর যখন সে তার দুই হাত ধৌত করে, তখন তার দুই হাত দ্বারা কৃত (বা স্পর্শ করা) প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) তার হাত থেকে ঝরে যায়। আর যখন সে তার দুই পা ধৌত করে, তখন তার দুই পা দ্বারা হেঁটে যাওয়া প্রতিটি গুনাহ পানির সাথে (অথবা পানির শেষ বিন্দুর সাথে) ঝরে যায়। এভাবে সে গুনাহ থেকে পবিত্র অবস্থায় বেরিয়ে আসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1523)


1523 - عن عثمان بن عفان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من توضأ فأحسن الوضوء خرجَتْ خطاياه من جسدِه، حتَّى تخرج من تحت أَظْفاره".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (245) عن محمد بن معمر بن ربعي، حدَّثنا أبو هشام المخزومي، عن عبد الواحد، (وهو ابن زياد) حدَّثنا عثمان بن حكيم، حدَّثنا محمد بن المنكدر، عن حُمْران، عن عثمان بن عفان .. فذكر الحديث.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি উত্তমরূপে ওযু সম্পন্ন করে, তার শরীর থেকে তার পাপরাশি বের হয়ে যায়, এমনকি তা তার নখের নিচ থেকেও বের হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1524)


1524 - عن حُمْران مولى عثمان قال: أتيت عثمان بن عفان بوضوء، فتوضأ ثم قال:
إن ناسًا يتحدَّثون عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أحاديث لا أدري ما هي؟ إلَّا أنِّي رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضأ مثل وضوئي هذا، ثم قال:"من توضأ هكذا غُفر له ما تقدم من ذنبه، وكانت صلاته ومشيه إلى المسجد نافلة".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (229) عن قتيبة بن سعيد، وأحمد بن عبدة الضبِّي، ثنا عبد العزيز - وهو الدراوردي -، عن زيد بن أسلم، عن حُمْران مولى عثمان .. فذكره.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম হুমরান বলেন: আমি উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য ওযুর পানি নিয়ে আসলাম। অতঃপর তিনি ওযু করলেন এবং বললেন: কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এমন কিছু হাদীস বর্ণনা করে, যা সম্পর্কে আমি অবগত নই (অর্থাৎ সেগুলোর সত্যতা সম্পর্কে আমি নিশ্চিত নই)। তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঠিক আমার এই ওযুর মতো ওযু করতে দেখেছি। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি এভাবে ওযু করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে এবং তার সালাত এবং মসজিদে হেঁটে যাওয়া নফল (অতিরিক্ত পুণ্যের) হিসাবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1525)


1525 - عن إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص قال: حدثني أبي، عن أبيه قال: كنت عند عثمان بن عفان، فدعا بطهور فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ مسلم تحضره صلاة مكتوبة، فيُحسن وضوءها وخشوعها وركوعها إلَّا كانت كفارةً لما قبلها من الذنوب، ما لم يُؤت كبيرةً، وذلك الدهرُ كله".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (228) عن عبد بن حميد، وحجاج الشاعر، كلاهما عن أبي الوليد: حدَّثنا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص به.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'যে কোনো মুসলিম ব্যক্তির ওপর যখন কোনো ফরয সালাতের সময় উপস্থিত হয়, আর সে তার উযূ, তার বিনয় (খুশু) এবং তার রুকূ সুন্দরভাবে সম্পন্ন করে, তবে তা তার পূর্বের সকল গুনাহের জন্য কাফফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে কোনো কবীরা গুনাহ করে। আর এই (প্রতিদান) সর্বদা (সব যুগের জন্য) প্রযোজ্য।'









আল-জামি` আল-কামিল (1526)


1526 - عن حُمْران بن أبان قال: كنت أضع لعثمان طهوره، فما أتي عليه يومٌ إلَّا وهو يفيض عليه نُطفةً. وقال عثمان: حدَّثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عند انصرافنا من صلاتنا هذه - قال مِسعر: أراها العصر - فقال:"لا أدري أُحدِّثكم بشيء أو أسكت"، فقلنا: يا رسول الله! إن كان خيرًا فحدَّثنا، وإن كان غيرَ ذلك فالله ورسوله أعلم، قال:"ما من مسلم يتطهر، فيتم الطهور الذي كتب الله عليه، فيصلي هذه الصلوات الخمس، إلَّا كانت كفارات لما بينها".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (231) عن أبي كُرَيب محمد بن العلاء، وإسحاق بن إبراهيم جميعًا، عن وكيعٍ. قال أبو كريب: حدَّثنا وكيع، عن مسعر، عن جامع بن شدَّاد، قال: سمعت حُمْران .. فذكر مثله.




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর খাদেম হুমরান ইবনু আবান বলেন: আমি উসমানের জন্য উযূর পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। এমন কোনো দিন যেত না, যখন তিনি সেই পানি নিজের শরীরে প্রবাহিত করতেন না। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের এই সালাত (নামায) থেকে ফিরে আসার সময়—মিসআর বলেন: আমার মনে হয়, তিনি আসরের সালাতের কথা বলেছেন—আমাদের বললেন: “আমি জানি না, আমি কি তোমাদেরকে কিছু বলব, নাকি চুপ থাকব?” আমরা বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি তা কল্যাণকর হয়, তবে আমাদের বলুন। আর যদি তা অন্য কিছু হয়, তবে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: “যে কোনো মুসলিম পবিত্রতা অর্জন করে এবং আল্লাহ তার ওপর যে পরিপূর্ণ পবিত্রতা ফরয করেছেন, তা সম্পূর্ণ করে, অতঃপর এই পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করে, তবে তা এই (সালাতগুলোর) মধ্যবর্তী (গুনাহসমূহের) কাফফারা হয়ে যায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1527)


1527 - عن حُمْران مولى عثمان قال: توضأ عثمان يوما وضوءًا حسنًا، ثم قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضأ فأحسن الوضوء، ثم قال:"من توضأ هكذا، ثم خرج إلى المسجد لا يَنْهَزُه إلَّا الصلاة غُفِر له ما خلا من ذَنْبه".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (232) عن هارون بن سعيد الأيلي، حدَّثنا ابن وهبٍ، وأخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، عن حُمْران .. فذكر مثله.

وقوله: (ما خلا من ذنبه) أي: ما مضى من ذنبه.




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম হুমরান বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন উত্তমরূপে ওযু করলেন, অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি উত্তমরূপে ওযু করলেন, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি এভাবে ওযু করে, এরপর মসজিদের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং সালাত (নামাজ) ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্য তাকে চালিত না করে, তার অতীতের গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1528)


1528 - عن أبي مالك الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطهور شطر الإيمان،
والحمد لله تملأُ الميزان، وسبحان الله والحمد لله تملآن ما بين السموات والأرض، والصلاة نور، والصدقة برهان، والصبر ضياء، والقرآن حجة لك أو عليك، كل الناس يغدو فبايع نفسه فمُعْتِقها أو موبقها".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (223). عن إسحاق بن منصور، حدَّثنا حَبَّان بن هلال، حدَّثنا أبان، حدَّثنا يحيى، أن زيدًا حدثه، أن أبا سلام حدثه، عن أبي مالك الأشعري قال: فذكر الحديث.

قلت: هذا من جملة المواضيع التي تكلم فيها الدارقطني في"التتبع" (رقم 34) وأعَلَّ هذا الطريق بالانقطاع بين أبي سلام وأبي مالك الأشعري، بناء على ما رواه معاوية بن سلام، عن أخيه زيد بن سلام، عن جده أبي سلام، عن عبد الرحمن بن غَنْم، أن أبا مالك الأشعري حدثه فذكر الحديث، فأدخل معاوية بن سلام بين أبي سلام وبين أبي مالك"عبد الرحمن بن غَنْم" فجعل آل الرجل أدرى بروايته من غيرهم، فمعاوية أدرى برواية أخيه من يحيى (وهو ابن أبي كثير) الذي روى من طريقه مسلم.

وممن رجح رواية معاوية بن سلام - النسائي في"عمل اليوم والليلة" (168) فإنه بعد أن أخرج من طريق يحيى بن أبي كثير قال: وخالفه معاوية بن سلام - رواه عن أخيه زيد، عن أبي سلام، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن أبي مالك فذكر الحديث مُختصرًا، وأجاب عنه النووي في شرحه لمسلم قائلًا:"بأن الظاهر من حال مسلم أنه علم سماع أبي سلام لهذا الحديث من أبي مالك، فيكون أبو سلام سمعه من أبي مالك: وسمعه أيضًا من عبد الرحمن بن غَنْم، عن أبي مالك. فرواه مرة عنه، ومرة عن عبد الرحمن، وكيف كان فالمتن صحيح لا مطعن فيه".

وتعقبه العلائي في"جامع التحصيل" (ص 138) قائلًا:"ورجح بعضهم قول الدارقطني بأن أبا مالك الأشعري توفي في طاعون عمواس سنة ثماني عشرة، وقد قالوا في رواية أبي سلام عن علي وحذيفة وأبي ذر أنها مرسلة، فروايته عن أبي مالك أولى بالإرسال".

قلت: إن صحَّ ما نقله العلائي في تاريخ وفاة أبي مالك فلا شك أن رواية مسلم مرسلة، وهي مبنية على أن أبا مالك الأشعري غير الحارث بن الحارث الأشعري الذي يكنى أيضًا أبا مالك، وأما أبو مالك شيخ عبد الرحمن بن غَنْم فهو مختلف في اسمه فقيل: كعب بن عاصم، وقيل عبيد، وقيل: عمرو، وقيل: الحارث وقيل غير ذلك. فقد ثبت سماع أبي سلام من الحارث بن الحارث الأشعري الذي تأخرت وفاته، ولم يثبت سماعه من أبي مالك الذي توفي في طاعون عمواس عام ثماني عشرة. لأن أبا سلام ولد بعد وفاة أبي مالك الأشعري. فتنبه لذلك فإنَّ في بعض الروايات تصريح أبي سلام بالتحديث من الحارث الأشعري كما في حديث:"إن الله أمر يحيى بن زكريا بخمس كلمات أن يعمل بها ويأمر بني إسرائيل أن يعملوا بها …" الحديث بطوله في كتاب الايمان.

رواه الترمذي في الأمثال (2863) وابن خزيمة (930) والحاكم (1/ 236) كلهم من طريق زيد
ابن سلام، أن أبا سلام حدَّثه، أن الحارث الأشعري حدَّثه فذكر الحديث.




আবু মালিক আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পবিত্রতা হলো ঈমানের অর্ধেক, আর ‘আলহামদু লিল্লাহ’ (আল্লাহর জন্য সকল প্রশংসা) মিযানকে পরিপূর্ণ করে দেয়, আর ‘সুবহানাল্লাহ ওয়াল হামদুলিল্লাহ’ (আল্লাহ পবিত্র এবং সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য) আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী স্থানকে পূর্ণ করে দেয়। আর সালাত হলো আলো, আর সাদকা হলো প্রমাণ, আর সবর হলো উজ্জ্বল আলো। আর কুরআন তোমার পক্ষে অথবা বিপক্ষে প্রমাণস্বরূপ। প্রত্যেক ব্যক্তি সকালে বের হয় এবং তার আত্মাকে বিক্রি করে দেয়। অতঃপর সে তাকে মুক্তকারী হয় অথবা ধ্বংসকারী হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1529)


1529 - عن أبي أمامة قال: قال عمرو بن عَبَسة السُّلَمي: كنتُ وأنا في الجاهلية أظن أن الناس على ضلالة، وأنهم ليسوا على شيء وهم يعبدون الأوثان، فسمعتُ برجل بمكة يُخبر أخبارًا، فقعدت على راحلتي فقدمت عليه، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم مستخفيًا، جُرَءَاءُ عليه قومُه، فتلطّفُ حتَّى دخلت عليه بمكة، فقلت له: ما أنت؟ قال:"أنا نبي"، فقلت: وما نبي؟ قال:"أرسلني الله"، فقلت: وبأي شيء أرسلك؟ قال:"أرسلني بصلة الأرحام وكسر الأوثان وأن يُوحَّد الله لا يُشرَكُ به شيء"، قلت له: فمن معك على هذا؟ قال:"حرّ وعبد". - قال: ومعه يومئذ أبو بكر وبلال ممن آمن به - فقلت: إنِّي متّبعك! قال:"إنك لا تستطيع ذلك يومك هذا، ألا ترى حالي وحال الناس؟ ولكن ارجع إلى أهلك، فإذا سمعت بي قد ظَهرتُ فأتني". قال: فذهبت إلى أهلي، وقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة، وكنت في أهلي، فجعلت أتخبر الأخبار وأسأل الناس حين قدم المدينة، حتَّى قدم عليَّ نفر من أهل يثرب من أهل المدينة، فقلت: ما فعل هذا الرجل الذي قدم المدينة؟ فقالوا: الناس إليه سِراع، وقد أراد قومه قتله فلم يستطيعوا ذلك. فقدمتُ المدينة، فدخلت عليه، فقلتُ: يا رسول الله! أتعرفني، قال:"نعم، أنت الذي لقيتني بمكة؟"، فقلتُ: بلى، فقلت: يا نبي الله! أخبرني عما علّمك الله وأجهلُه، أخبرني عن الصلاة؟ قال:"صلّ صلاة الصبح، ثم أَقْصِر عن الصلاة حتَّى تطْلُعَ الشمسُ حتَّى ترتفع، فإنها تطلع حين تطلع بين قرنَي شيطان، وحينئذٍ يسجد لها الكفار، ثم صلّ، فإنَّ الصلاة مشهودة محضورة، حتَّى يستقل الظلُّ بالرُّمْح، ثم أَقْصِر عن الصلاة، فإنَّ حينئذ تُسجَرُ جهنم، فإذا أقبل الفيءُ فصلِّ، فإنَّ الصلاة مشهودة محضورة حتَّى تصلي العصر، ثم أَقْصِر عن الصلاة حتَّى تغرب الشمس، فإنها تغرب بين قرنَي شيطان، وحينئذ يسجد لها الكفار". قال: قلت: يا نبي الله! فالوضوء، حدثني عنه، قال:"ما منكم رجلٌ يُقرّب وَضُوءَه فيتمضمض ويستنشق فينتشر إلَّا خرَّت خطايا وجهه وفِيه وخَياشيمه، ثم إذا غسل وجهه كما أمره الله إلَّا خرَّت خطايا وجهه من أطراف لِحيته مع الماء، ثم يغسل يديه إلى المرفقين إلَّا خرَّت خطايا يديه من أنامله مع الماء، ثم يمسح رأسه إلَّا خرَّت خطايا رأسه من أطراف شعره مع الماء، ثم يغسلُ قدميه إلى الكعبين إلَّا خرَّت خطايا رجليه من أنامله مع الماء، فإن هو قام فصلَّى، فحمد الله وأثنى عليه،
ومجَّده بالذي هو له أهل، وفرَّغ قلبه لله، إلَّا انصرف من خطيئته كهيئته يوم ولدته أمه".

فحدث عمرو بن عَبَسة بهذا الحديث أبا أمامة صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له أبو أُمامة: يا عمرو بن عبسة! انظر ما تقول في مقام واحد يُعْطى هذا الرجل؟ فقال عمرو: يا أبا أُمامة! لقد كَبِرَت سنِّي، ورقَّ عظمي، واقترب أجلي، وما بي حاجة أن أكذب على الله، ولا على رسول الله، لو لم أسمعه من رسول الله صلى الله عليه وسلم إلَّا مرة أو مرتين أو ثلاثًا - حتَّى عدَّ سبع مرات - ما حدَّثت به أبدًا، ولكنِّي سمعته أكثر من ذلك.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (832)، عن أحمد بن جعفر المَعقري، حدَّثنا النضرُ بن محمد، حدَّثنا عكرمة بن عمَّار، حدَّثنا شدَّاد بن عبد الله أبو عمَّار، ويحيى بن أبي كثيرٍ، عن أبي أُمامة .. فذكر الحديثَ.

واقتصر النسائي (147) على الوضوء.

قوله:"يقرب وَضوءه" - بفتح الواو - هو الماء الذي يتوضأ به.




আমর ইবনে আবাসা আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জাহিলিয়্যাতের যুগে থাকাকালে মনে করতাম, মানুষ পথভ্রষ্টতার ওপর রয়েছে। তারা কোনো কিছুর ওপর নেই, কারণ তারা মূর্তিপূজা করত। আমি মক্কায় এক ব্যক্তির খবর শুনলাম যিনি কিছু সংবাদ দিচ্ছেন। তখন আমি আমার বাহনে আরোহণ করে তাঁর কাছে গেলাম। (সেখানে গিয়ে দেখি) তিনি হলেন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম। তিনি গোপনে ছিলেন, কারণ তাঁর কওম তাঁর প্রতি সাহস দেখাচ্ছিল। আমি কৌশলে চেষ্টা করে মক্কায় তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, 'আপনি কে?' তিনি বললেন, "আমি একজন নবী।" আমি বললাম, 'নবী কী?' তিনি বললেন, "আল্লাহ আমাকে পাঠিয়েছেন।" আমি বললাম, 'আল্লাহ আপনাকে কী দিয়ে পাঠিয়েছেন?' তিনি বললেন, "তিনি আমাকে আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখা, মূর্তি ভেঙে ফেলা এবং একমাত্র আল্লাহর ইবাদত করা, আর তাঁর সাথে যেন কোনো কিছুকে শরীক না করা হয়— এই নির্দেশ দিয়ে পাঠিয়েছেন।"

আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, 'আপনার সাথে এই পথে আর কে আছে?' তিনি বললেন, "একজন স্বাধীন এবং একজন দাস।" (বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাঁর সাথে যারা ঈমান এনেছিলেন, তাঁদের মধ্যে আবূ বকর ও বেলাল ছিলেন।) আমি বললাম, 'আমি অবশ্যই আপনাকে অনুসরণ করব!' তিনি বললেন, "আজ এই মুহূর্তে তুমি তা পারবে না। তুমি কি আমার এবং মানুষের অবস্থা দেখছো না? বরং তুমি তোমার পরিবারের কাছে ফিরে যাও। যখন তুমি শুনবে যে আমি প্রকাশ্যে এসেছি, তখন আমার কাছে এসো।" তিনি বললেন: অতঃপর আমি আমার পরিবারের কাছে চলে গেলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনায় হিজরত করলেন। আমি আমার পরিবারে থাকতেই মদীনায় তাঁর আগমনের খবর জানতে এবং মানুষকে জিজ্ঞেস করতে শুরু করলাম। অবশেষে ইয়াসরিবের (মদীনার) কিছু লোক আমার কাছে এলো। আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'মদীনায় যে লোকটি এসেছেন, তিনি কী করেছেন?' তারা বলল, 'মানুষ দ্রুত তাঁর দিকে যাচ্ছে। আর তাঁর কওম তাঁকে হত্যা করতে চেয়েছিল, কিন্তু তারা পারেনি।' তখন আমি মদীনায় এসে তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম এবং বললাম, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি আমাকে চিনতে পারছেন?' তিনি বললেন, "হ্যাঁ, তুমিই তো সেই ব্যক্তি, যে মক্কায় আমার সাথে সাক্ষাৎ করেছিল?" আমি বললাম, 'হ্যাঁ।'

আমি বললাম, 'হে আল্লাহর নবী! আল্লাহ আপনাকে যা শিখিয়েছেন, আর যা আমি জানি না, সে সম্পর্কে আমাকে জানান। আমাকে সালাত (নামায) সম্পর্কে বলুন।' তিনি বললেন, "তুমি ফজরের সালাত আদায় করো, তারপর সালাত পড়া থেকে বিরত থাকো যতক্ষণ না সূর্য উঠে এবং বেশ উপরে উঠে যায়। কারণ সূর্য যখন উদিত হয়, তখন তা শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে উদিত হয়, আর সেই সময় কাফিররা তাকে সিজদা করে। তারপর তুমি সালাত আদায় করো। কারণ এই সালাত (ফেরেশতাগণ দ্বারা) প্রত্যক্ষকৃত ও উপস্থিত হয়, যতক্ষণ না বর্শার ছায়া একদম খাড়া হয়ে যায় (অর্থাৎ দ্বিপ্রহর)। তারপর সালাত পড়া থেকে বিরত থাকো। কারণ এই সময় জাহান্নামকে দাউ দাউ করে জ্বালানো হয়। অতঃপর যখন ছায়া পশ্চিম দিকে হেলে যায়, তখন সালাত আদায় করো। কারণ এই সালাতও প্রত্যক্ষকৃত ও উপস্থিত হয়, যতক্ষণ না তুমি আসরের সালাত আদায় করো। অতঃপর সূর্যাস্ত হওয়া পর্যন্ত সালাত পড়া থেকে বিরত থাকো। কারণ সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে অস্ত যায়, আর সেই সময় কাফিররা তাকে সিজদা করে।"

আমি বললাম, 'হে আল্লাহর নবী! ওযূর ব্যাপারে আমাকে জানান।' তিনি বললেন, "তোমাদের মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি নেই, যে ওযূর জন্য পানি প্রস্তুত করে, অতঃপর কুলি করে এবং নাকে পানি দেয় ও নাক পরিষ্কার করে, কিন্তু তার মুখ, মুখগহ্বর এবং নাকের ছিদ্রের পাপসমূহ ঝরে পড়ে না। এরপর যখন সে আল্লাহ যেভাবে নির্দেশ দিয়েছেন সেভাবে তার মুখমণ্ডল ধৌত করে, তখন তার মুখমণ্ডলের পাপসমূহ পানির সাথে তার দাড়ির প্রান্তদেশ থেকে ঝরে পড়ে। এরপর যখন সে কনুই পর্যন্ত তার দুই হাত ধৌত করে, তখন তার হাতের পাপসমূহ পানির সাথে তার আঙুলের প্রান্তদেশ থেকে ঝরে পড়ে। এরপর যখন সে তার মাথা মসেহ করে, তখন তার মাথার পাপসমূহ পানির সাথে তার চুলের প্রান্তদেশ থেকে ঝরে পড়ে। এরপর যখন সে তার দুই পা গোড়ালী পর্যন্ত ধৌত করে, তখন তার পায়ের পাপসমূহ পানির সাথে তার আঙুলের প্রান্তদেশ থেকে ঝরে পড়ে। অতঃপর সে যদি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করে, আল্লাহর প্রশংসা করে, তাঁর গুণগান করে, এবং তাঁর প্রাপ্য মহিমা ঘোষণা করে, আর নিজের অন্তরকে সম্পূর্ণরূপে আল্লাহর জন্য উৎসর্গ করে, তবে সে তার পাপ থেকে এমনভাবে মুক্ত হয়ে যায়, যেমন সে দিন ছিল যেদিন তার মা তাকে প্রসব করেছিলেন।"

আমর ইবনে আবাসা এই হাদীসটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবী আবূ উমামাহকে শোনালেন। তখন আবূ উমামাহ তাঁকে বললেন, 'হে আমর ইবনে আবাসা! চিন্তা করে বলুন, মাত্র একটি স্থানে (ওযূ করে সালাত আদায়ে) এই ব্যক্তিকে এতো বড় পুরস্কার দেওয়া হয়?' আমর বললেন, 'হে আবূ উমামাহ! আমি বৃদ্ধ হয়ে গেছি, আমার হাড় দুর্বল হয়ে গেছে, এবং আমার মৃত্যুর সময় নিকটে। আল্লাহ বা তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওপর মিথ্যা বলার আমার কোনো প্রয়োজন নেই। যদি আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এটি মাত্র একবার, দুইবার বা তিনবারও না শুনতাম— (এভাবে তিনি সাতবার পর্যন্ত গণনা করলেন)— তবুও আমি কখনও এটি বর্ণনা করতাম না। কিন্তু আমি এটি এর চেয়েও বেশিবার শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1530)


1530 - عن أبي أُمامة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من خرج من بيته مُتطهِّرًا إلى صلاةٍ مكتوبةٍ فأجره كأجر الحاج المُحرِم، ومن خرج إلى تسبيح الضُحى لا ينصبه إلَّا إياه فأجره كأجر المُعتَمِر، وصلاةٌ إثرَ صلاةٍ لا لَغوَ بينهما كتابٌ في عِلِّيِّين".

حسن: رواه أبو داود (558) عن أبي توبة، حدَّثنا الهيثم بن حُميد، عن يحيى بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أُمامة فذكر مثله.

وإسناده حسن لأجل الكلام في القاسم بن عبد الرحمن الشامي الدمشقي، غير أنه حسن الحديث.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি নিজ ঘর থেকে পবিত্রতা অর্জন করে কোনো ফরয সালাতের জন্য বের হয়, তার সওয়াব ইহরাম বাঁধা হাজীর সওয়াবের ন্যায়। আর যে ব্যক্তি চাশতের (দুহা) তাসবীহ (সালাত)-এর জন্য বের হয় এবং এর উদ্দেশ্য তা ব্যতীত আর কিছুই নয়, তার সওয়াব উমরাহকারীর সওয়াবের ন্যায়। আর এক সালাতের পর আরেক সালাত, যার মাঝে কোনো অনর্থক কাজ না থাকে, তা ইল্লিয়্যীনে লিপিবদ্ধ করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1531)


1531 - عن أبي أُمامة صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم. - وقال عبد الوهاب: أبو أُمامة الحِمصي صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم - أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الوضوء يُكفِّر ما قبله، ثم تصير الصلاة نافلة".

فقيل له: أسمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، غير مرة، ولا مرتين، ولا ثلاث، ولا أربع، ولا خمس.

حسن: رواه أحمد (22162) قال: حدَّثنا محمد بن بشر، حدَّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن شهر بن حوشب وعبد الوهاب، عن هشام وأزهر بن القاسم، حدَّثنا هشام، عن قتادة، عن شهر بن حوشب، عن أبي أُمامة.

ورواه أيضًا أبو داود الطيالسي (2/ 541 رقم 1225) والطبراني في الكبير (7570) كلاهما من طريق سعيد بن أبي عروبة به.
ورجاله ثقات غير شهر بن حوشب؛ فقد تكلم فيه ابن حبان وابن عدي. وقال ابن معين: ثبت. وقال أبو زرعة: لا بأس به. وقال العجلي: شامي تابعي ثقة. وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق كثير الإرسال والأوهام".

إلَّا أنه لم ينفرد به، بل توبع؛ فقد رواه أبو داود الطيالسي (1231) واللّفظ له، وأحمد (5/ 254) والطبراني في الكبير (8071) كلهم من طريق أبي غالب، عن أبي أُمامة قال:"إذا توضأ المسلم فأحسن الوضوء خرجت ذنوبه من سمعه وبصره ويديه ورجليه؛ فإنْ قعد قعد مغفورًا له، وإن صلَّى كانت له فضيلة"، فقيل له: أو نافلة؟ فقال:"إنما كانت النافلة للنبي صلى الله عليه وسلم". اختلف في رفعه ووقفه، والصواب رفعه.

وأبو غالب صدوق.

ورواه مسدد ومحمد بن يحيى بن أبي عمر من طريق شمر بن عطية، عن أبي أُمامة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا توضأ الرجل المسلم خرجت ذنوبه من سمعه وبصره ويديه ورجليه؛ فإنْ قعد قعد مغفورًا له".

ويبدو أنه سقط بعد شمر بن عطية (شهر بن حوشب)؛ فإنَّ شمر بن عطية لم يلق أبا أُمامة.

ورواه أحمد بن منيع من طريق أبي مسلم قال: دخلت على أبي أُمامة وهو يتفلَّى في المسجد ويَدْفُن القمل في الحصا، فقلت: يا أبا أُمامة! إن رجلًا حدثني عنك أنك قلت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من توضأ فأسبغ الوضوء؛ غسل يديه ووجهه، ومسح رأسه وأذنيه، ثم قام إلى صلاة مفروضة، غفر الله له في ذلك اليوم ما مشت إليه رجليه، وقبضت عليه يديه، وسمعت إليه أذنيه، ونظرت إليه عينيه، وحدثت به نفسه من سوء" فقال: والله لقد سمعته من نبي الله صلى الله عليه وسلم ما لا أحصيه.

هكذا رجليه ويديه وأذنيه وعينيه، والصواب أن تكون هذه الكلمات مرفوعة.

وللحديث طرق أُخرى أوردها البوصيري في"إتحاف الخيرة" (1/ 396 - 397). وأبو عبيد في الطهور (20 - 23).




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওযু তার পূর্বের গুনাহসমূহকে মোচন করে দেয় (কাফফারা হয়), অতঃপর সালাত (নামাজ) নফল (ঐচ্ছিক/অতিরিক্ত সওয়াব) হয়ে যায়।"

তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: "আপনি কি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছেন?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, একবার নয়, দু’বারও নয়, তিনবারও নয়, চারবারও নয়, এমনকি পাঁচবারও নয় (বরং বহুবার শুনেছি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (1532)


1532 - عن عقبة بن عامر قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"رجلان من أمتي يقوم أحدهما من الليل يُعالج نفسه إلى الطهور، وعليه عُقَد، فيتوضأ، فإذا وضَّأ يديه انحلتْ عقدةٌ، فإذا وضَّأ وجْهَه انحلتْ عقدةٌ، وإذا مسح برأسه انحلتْ عقدةٌ، وإذا وضَّأ رجليه انحلتْ عقدةٌ؛ فيقول الله للذين وراء الحجاب: انظروا إلى عبدي هذا يُعالج نَفْسَه يسألني، ما سألني عبدي فهو له".

صحيح: رواه أحمد (17791) والطبراني في الكبير (17/ رقم 301) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، أن أبا عُشَّانة حدثه، أنه سمع عقبة بن عامر، فذكر الحديث. واللفظ لأحمد.
وإسناده صحيح رجاله ثقات. وأبو عُشَّانة هو حيُّ بن يؤمِن المصري، مشهور بكنيته، وثقه أحمد وابن معين وغيرهما. وقد صحّحه ابن حبان (2555)، ورواه من هذا الوجه.

والحديث رواه أيضًا الإمام أحمد في مواضع أُخرى، ولكن فيه ابن لهيعة. انظر: (17458)، ولكن في بعض طرقه روى عنه عبد الله بن المبارك، وهو ممن سمع منه قديمًا، وروايته عنه صحيحة. وفي الباب أحاديث أُخرى. انظر: صلاة الليل.

وأما ما رُوِي عن عبد الله الصُنابحي مرفوعًا بلفظ:"إذا توضأ العبدُ المؤمن فتمضمض، خرجتِ الخطايا من فيه، وإذا استشر خرجتي الخطايا من أنفه. فإذا غسل وجهَه خرجتِ الخطايا من وجهه، حتَّى تخرجَ من تحت أشْفار عينيه. فإذا غسل يديه خرجتِ الخطايا من يديه حتَّى تخرج من تحت أظفار يديه، فإذا مسح برأسه خرجتي الخطايا من رأسه حتَّى تخرجَ من أُذنيه. فإذا غسل رجليه خرجتِ الخطايا من رجليه حتَّى تخرج من تحت أظفار رجليه قال:"ثم كان مشيُه إلى المسجد وصلاته نافلة له".

رواه مالك في الطهارة (30) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله الصُنابحي فذكر مثله.

ورواه النسائي (103) من طريق مالك به، وابن ماجه (282) من وجه آخر عن زيد بن أسلم به مثله.

والصواب أن الحديث مرسل، فإنَّ عبد الله الصُنابحي من التابعين.

قال ابن عبد البر في"الاستذكار" (2/ 190):"قال أبو عيسى الترمذي: سألت محمد بن إسماعيل البخاري عن حديث مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله الصنابحي فذكر الحديث. فقال لي: وهم مالك في قوله: عبد الله الصُنابحي، وإنما هو أبو عبد الله، واسمه: عبد الرحمن بن عُسيلة، ولم يسمع من النبي صلى الله عليه وسلم. والحديث مرسل".

قال ابن عبد البر:"هو كما قال البخاري". ونقل في"التمهيد" (4/ 3 - 4) عن ابن معين: أن أحاديثه مرسلة ليست له صحبة. ثم قال:"صدق يحيى بن معين، ليس في الصحابة أحد يقال له عبد الله الصُنابحي" وإنما في الصحابة الصنابح الأحمسي، وهو الصُنابح بن الأعسر كوفي، روى عنه قيس بن أبي حازم أحاديث، منها حديثه في الحوض، ولا في التابعين أيضًا أحد يقال له: عبد الله الصُنابحي، فهذا أصح قول من قال إنه: أبو عبد الله، لأن أبا عبد الله الصُنابحي مشهور في التابعين، كبير من كبرائهم، واسمه: عبد الرحمن بن عُسيلة، وهو جليل، كان عبادة بن الصامت كثير الثناء عليه" انتهى.

فهؤلاء ثلاثة وهم يحيى بن معين والبخاري وابن عبد البر من أساطين هذا الفن شهدوا على أن عبد الله الصُنابحي هو: أبو عبد الله الصُنابحي من التابعين وحديثه مرسل. وإن مالكًا وهم فجعله صحابيًّا.




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "আমার উম্মতের দু’জন লোক রয়েছে। তাদের একজন রাতের বেলা উঠে পবিত্রতা অর্জনের জন্য নিজেকে প্রস্তুত করে, অথচ তার উপর (শয়তানের) কিছু গিঁট থাকে। অতঃপর সে উযু করে, যখন সে তার দুই হাত ধোয়, তখন একটি গিঁট খুলে যায়। যখন সে তার মুখমণ্ডল ধোয়, তখন একটি গিঁট খুলে যায়। যখন সে তার মাথা মাসেহ করে, তখন একটি গিঁট খুলে যায়। আর যখন সে তার দুই পা ধোয়, তখন একটি গিঁট খুলে যায়। তখন আল্লাহ তা‘আলা পর্দার আড়ালের ফেরেশতাদের বলেন, 'তোমরা আমার এই বান্দার দিকে তাকিয়ে দেখ! সে নিজেকে প্রস্তুত করেছে এবং আমার কাছে প্রার্থনা করছে। আমার বান্দা যা কিছু চেয়েছে, তা-ই তার জন্য রয়েছে।'"









আল-জামি` আল-কামিল (1533)


1533 - عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لبلال عند صلاة الفجر:"يا بلال! حدِّثني بأرجى عمل عملتَه في الإسلام، فاني سمعتُ دفَّ نعليك بين يديَّ في الجنة" قال: ما عملت عملًا أرجى عندي، أنِّي لم أتطهر طُهورًا في ساعة ليل أو نهارٍ إلَّا صلَّيتُ بذلك الطهور ما كُتِب لي أن أصَلِي.

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في التهجد (1149) ومسلم في فضائل الصحابة (2458) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن أبي حيَّان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة فذكر مثله واللفظ للبخاري.

وفي لفظ مسلم:"يا بلال! حدِّثني بأرجى عمل عملته عندك في الإسلام منفعةً، فإني سمعتُ الليلة خَشْفَ نعليك بين يدي في الجنة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতের সময় বিলালকে বললেন: "হে বিলাল! তুমি ইসলামে যে আমল করেছ, তার মধ্যে সবচেয়ে আশাব্যঞ্জক আমলটি সম্পর্কে আমাকে বলো। কারণ, আমি জান্নাতে আমার সামনে তোমার জুতার মৃদু শব্দ শুনতে পেয়েছি।" বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার নিকট এর চেয়ে বেশি আশাব্যঞ্জক কোনো আমল করিনি যে, আমি দিন বা রাতের যে কোনো সময়েই ওযু করি না কেন, সেই ওযু করার পর আমার জন্য যতটুকু সালাত (নফল) লেখা থাকে, ততটুকু সালাত আমি আদায় করি।









আল-জামি` আল-কামিল (1534)


1534 - عن حُمْران مولى عثمان بن عفان، أن عثمان بن عفان جلس على المقاعد، فجاء المؤذن فآذنه بصلاة العصر، فدعا بماء فتوضأ، ثم قال: والله! لأحدِّثنكم حديثًا لولا أنه في كتاب الله ما حدَّثتكموه، ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ يتوضأ فيحسن الوضوء، ثم يصلي الصلاة إلَّا غفر له ما بينه وبين الصلاة الأُخرى حتَّى يُصليها".

قال يحيى: قال مالك: أُراه يريد هذه الآية: {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ اللَّيْلِ إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ ذَلِكَ ذِكْرَى لِلذَّاكِرِينَ} [سورة هود: 114].

متَّفقٌ عليه: رواه مالك في الطهارة (29) واللفظ له، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن حُمْران به. ورواه البخاري في الوضوء (160) من وجه آخر عن ابن شهاب، ومسلم في الطهارة (227) من وجه آخر عن هشام، كلاهما عن عروة، عن حُمْران به، وفيهما: قال عروة: الآية: {إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ} [سورة البقرة 159]، ولم تقع في رواية مالك تعيين الآية، فقال من قبل نفسه. وسيأتي تفصيل الوضوء في صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছু আসনে বসেছিলেন। এরপর মুয়াজ্জিন এসে তাঁকে আসরের সালাতের সময় হওয়ার কথা জানালেন। তিনি পানি চাইলেন এবং ওযু করলেন। তারপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের একটি হাদীস বলব। যদি এটি আল্লাহর কিতাবে (অর্থাৎ এর ফযীলতের প্রমাণ) না থাকত, তবে আমি তোমাদেরকে তা বলতাম না। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে কোনো ব্যক্তি উত্তমরূপে ওযু করে এবং তারপর (ফরজ) সালাত আদায় করে, তার ঐ সালাত এবং পরবর্তী সালাতের মধ্যবর্তী সময়ের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়—যতক্ষণ না সে পরবর্তী সালাত আদায় করে।" ইয়াহইয়া বলেন: মালিক বলেছেন: আমি মনে করি, তিনি এই আয়াতটি বোঝাতে চেয়েছেন: "আর দিনের দুই প্রান্তে এবং রাতের কিছু অংশে সালাত কায়েম কর। নিশ্চয়ই নেক কাজসমূহ মন্দ কাজসমূহকে দূরীভূত করে দেয়। উপদেশ গ্রহণকারীদের জন্য এটি এক উপদেশ।" [সূরা হূদ: ১১৪]।









আল-জামি` আল-কামিল (1535)


1535 - عن أبي هريرة أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"أرأيتم لو أن نهرًا بباب أحدكم يغتسل فيه كل يوم خمسًا، ما تقول ذلك، يُبقي من دَرَنه؟" قالوا: لا يُبقي من دَرَنه شيئًا، قال:"فذلك مثل الصلوات الخمس؛ يمحو الله بِهِنَّ الخطايا".

مَّتفقٌ عليه: رواه البخاري في مواقيت الصلاة (528) واللفظ له ومسلم في المساجد (667) كلاهما من طريق يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفي رواية:"مثل الصلوات الخمس كمثل نهر جار على باب أحدكم يغتسل منه كل يوم خمس
مرات، فماذا يبقين من دَرَنه؟". رواه أحمد (9692) من وجه آخر صحيح عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: “তোমরা কি মনে করো, যদি তোমাদের কারো দরজায় একটি নদী থাকে এবং সে তাতে প্রতিদিন পাঁচবার গোসল করে, তবে কি তার শরীরের কোনো ময়লা অবশিষ্ট থাকবে?” তারা বললেন, “তার শরীরের কোনো ময়লা অবশিষ্ট থাকবে না।” তিনি বললেন, “পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের দৃষ্টান্তও অনুরূপ। এর মাধ্যমে আল্লাহ পাপসমূহ মুছে দেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (1536)


1536 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل الصلوات الخمس كمثل نهرٍ جارٍ غَمْرٍ على باب أحدكم يغتسل منه كل يومٍ خمس مرات".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (668)، عن أبي بكر بن أبي شيبة، وأبو كريب، قالا: حدَّثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر .. فذكره.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের দৃষ্টান্ত হলো তোমাদের কারো দরজার সামনে দিয়ে বয়ে যাওয়া একটি বহমান, গভীর নদীর মতো, যেখান থেকে সে প্রতিদিন পাঁচবার গোসল করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (1537)


1537 - عن عثمان قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"أرأيت لو كان بفِناء أحدِكم نهرٌ يجري يغتسل منه كل يوم خمس مرات، ما كان يبقى من دَرَنه؟" قال: لا شيء، قال:"فإنَّ الصلاة تُذهب الذنوب كما يُذهب الماءُ الدرنَ".

حسن: رواه ابن ماجه (1397) قال: حدثنا عبد الله بن أبي زياد، ثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني ابنُ أخي ابن شهاب، عن عمه، حدثني صالح بن عبد الله بن أبي فروة، أن عامر بن سعد أخبره قال: سمعتُ أبان بن عثمان يقول: قال عثمان، فذكر الحديث.

رجاله ثقات إلَّا صالح بن عبد الله بن أبي فروة؛ فقال عباس الدوري عن ابن معين: صالح بن عبد الله بن أبي فروة وإخوته ثقات إلَّا إسحاق. وقال أبو جعفر الطبري في التهذيب: ليس بمعروف في أهل النقل عندهم. وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 462) وقال: يروي عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، وعنه الزهري، مات سنة (120).

قلت: ومثله يكون"صدوقًا".

وابن أخي ابن شهاب هو: محمد بن عبد الله بن مسلم بن عبد الله بن عبد الله بن شهاب الزهري، وعمه هو محمد بن مسلم بن شهاب الإمام.




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা কি মনে করো, যদি তোমাদের কারো বাড়ির আঙ্গিনায় একটি প্রবহমান নদী থাকত এবং সে প্রতিদিন পাঁচবার সেখানে গোসল করত, তাহলে তার শরীরে কোনো ময়লা অবশিষ্ট থাকত?" তাঁরা বললেন, "কিছুই বাকি থাকবে না।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই সালাত গুনাহসমূহকে দূর করে দেয়, যেভাবে পানি ময়লা দূর করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1538)


1538 - عن سعد وناس من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولون: كان رجلان أخوان في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان أحدهما أفضل من الآخر، فتوفي الذي هو أفضلهما، ثم عُمِّر الآخر بعده أربعين ليلة، ثم توفي، فذُكِر لرسول الله صلى الله عليه وسلم فضل الأوَّل على الآخر، فقال:"ألم يكن يُصلي؟" فقالوا: بلى يا رسول الله! فكان لا بأس به، فقال:"ما يدريكم ماذا بلغت به صلاتُه"، ثم قال عند ذلك:"إنما مثل الصلاة كمثل نَهرِ جارٍ بباب رجل، غَمْرٍ عَذْب، يقتحم فيه كلَّ يوم خمس مرات، فماذا ترون يُبقي ذلك من دَرَنه".

حسن: رواه أحمد (1534) قال: حدَّثنا هارون بن معروف - قال عبد الله: وسمعته أنا من هارون - حدَّثنا عبد الله بن وهب، حدثني مخرمة، عن أبيه، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص قال: سمعت سعدًا، فذكر الحديث.
وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (310) والحاكم (1/ 200) وروياه من طريق عبد الله بن وهب. قال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، فإنهما لم يخرجا لمخرمة بن بكير، والعلة فيه أن طائفة من أهل مصر ذكروا أنه لم يسمع من أبيه لصغر سنه، وأثبت بعضهم سماعه منه" انتهى.

وإسناده حسن من أجل مخرمة فإنه مختلف فيه، فوثَّقه أحمد وابن سعد، وضعَّفه ابن معين. وقال النسائي: ليس به بأس. وقال أبو حاتم: صالح الحديث.

والحديث في موطأ مالك في كتاب قصر الصلاة (91) إلَّا أنه رواه بلاغًا عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه، وفيه:"ألم يكن الآخر مسلمًا؟" بدلًا من"ألم يكن يصلي؟"، كما أنه كرر فيه آخر الحديث:"لا تدرون ما بلغت به صلاته".

و"النهر الغمر": الكثير الماء.

وحديث سعد بن وقاص هو الأصح.

وقد رُوِي عن طلحة بن عبيد الله قال: إن رجلين من بَلِيِّ قدما على رسول الله صلى الله عليه وسلم وكان إسلامهما جميعًا، فكان أحدهما أشدَّ اجتهادًا من الآخر، فغزا المجتهد منهما فاستشْهِد، ثم مكث الآخر بعده سنة، ثم توفي.

قال طلحةُ: فرأيت في المنام: بينا أنا عند باب الجنة إذا أنا بهما، فخرج خارج من الجنة، فأذِن للذي توفي الآخر منهما، ثم خرج، فأذن للذي استشهد، ثم رجع إليَّ فقال: ارجع فإنك لم يأنِ لك بعد. فأصبح طلحةُ يحدث به الناسَ، فعجبوا لذلك. فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم وحدَّثوه الحديثَ فقال:"من أي ذلك تعجبون؟" فقالوا: يا رسول الله! هذا كان أشدَّ الرجلين اجتهادًا، ثم استشهد، ودخل هذا الآخر الجنةَ قبله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"أليس قد مكث هذا بعده سنةً؟" قالوا: بلى، قال:"وأدرك رمضان فصام، وصلَّى كذا وكذا من سجدة في السنة؟" قالوا: بلى، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فما بينهما أبعد مما بين السماء والأرض".

رواه ابن ماجه (3925) وابن حبان (2952) وأحمد (1403) والبيهقي (3/ 371 - 372) كلهم من طريق يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن طلحة بن عبيد الله فذكر مثله، وفيه انقطاع، فإنَّ أبا سلمة بن عبد الرحمن لم يسمع من طلحة بن عبيد الله شيئًا، كما قال علي بن المدني وابن معين وغيرهما.

ولكن رواه محمد بن عمرو، عن أبي سلمة فأدخل بينهما أبا هريرة. هكذا رواه الإمام أحمد (8399) عن محمد بن بشر، حدَّثنا محمد بن عمرو، حدَّثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة قال: كان رجلَان من بَليٍّ - حَيٍّ من قُضاعة - أسلما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، واستُشهد أحدُهما، وأخِّر الآخر سنة. قال طلحة بن عبيد الله: فأريتُ الجنة. فرأيتُ المؤخر منهما أدخل الجنة قبل الشهيد، فتعجبت لذلك، فأصبحتُ فذكرتُ ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، أو ذُكِر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أليس
قد صام بعده رمضان، وصلَّى ستة آلاف ركعة - أو كذا وكذا ركعة - صلاة السنة؟" ثم رواه الإمام أحمد أيضًا (8400) عن يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن طلحة بن عبيد الله فذكر الحديث. فاضطرب فيه محمد بن عمرو بن علقمة بن وقاص الليثي، وهو وإن كان من رجال الجماعة ولكن سئل عنه ابن معين فقال: ما زال الناس يتقون حديثه، قيل له: وما علة ذلك؟ قال: كان يحدث مرة عن أبي سلمة بالشيء من روايته، ثم يحدث به مرة أُخرى عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. وقال الجوزجاني: ليس بقويِّ الحديث، ويُشتَهى حديثه.

قلت: هو حسن الحديث إذا لم يخالف عليه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবী থেকে বর্ণিত, তারা বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দুজন সহোদর ভাই ছিল। তাদের মধ্যে একজন অন্যজনের চেয়ে উত্তম ছিল। অতঃপর তাদের মধ্যে যে উত্তম ছিল, সে মারা গেল। এরপর অন্যজন তার পরে চল্লিশ রাত জীবিত ছিল, তারপর সেও মারা গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রথম জনের অন্য জনের উপর শ্রেষ্ঠত্বের কথা আলোচনা করা হলো। তখন তিনি বললেন: "সে কি সালাত আদায় করত না?" সাহাবীগণ বললেন: "অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল! সে ভালোই ছিল।" তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কী করে জানো, তার সালাত তাকে কতটুকু মর্তবা দান করেছে?" এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সালাতের উপমা হলো এমন বহমান নদীর মতো, যা কোনো ব্যক্তির দরজার সামনে দিয়ে প্রবাহিত। এটি হলো প্রচুর ও সুস্বাদু পানিযুক্ত নদী। সে ব্যক্তি প্রতিদিন তাতে পাঁচবার ডুব দেয়। তোমরা কী মনে করো, এর ফলে তার শরীরে কোনো ময়লা অবশিষ্ট থাকবে?"









আল-জামি` আল-কামিল (1539)


1539 - عن أبي بكر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من رجل يُذنب ذنبًا فيتوضأ، فيُحسن الوضوء، ثم يصلي ركعتين، ويستغفر الله إلَّا غفر الله له".

حسن: رواه أبو داود (1521) والترمذي في تفسير سورة آل عمران، وحسّنه، وابن ماجه (1395) كلهم من طرق عن عثمان بن المغيرة الثقفي، عن علي بن ربيعة الوالبيّ، عن أسماء بن الحكم الفزاري، عن علي بن أبي طالب قال: كنت إذا سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثًا نفعني الله بما شاء منه، وإذا حدثني عنه غيري استحلفته، فإذا حلف لي صدقته، وإن أبا بكر حدّثني - وصدق أبو بكر - أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم قال، فذكر الحديث.

وإسناده حسن؛ لأجل أسماء بن الحكم؛ فإنه صدوق.

إلَّا أنَّه أُعِلَّ الحديثُ به، فإنَّ أسماء بن الحكم الفزاري مختلف فيه؛ فقال البزار (رقم 11): إنه مجهول. وقال البخاري بعد أن ذكر الحديث في التاريخ الكبير (2/ 54):"لم يُرو عنه إلَّا هذا الحديث، وحديث آخر لم يتابع عليه، وقد روى أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم بعضهم عن بعضٍ ولم يحلف بعضهم بعضا".

قلت: أسماء بن الحكم الفزاري قال فيه موسى بن هارون: ليس بمجهول. ووثّقه العجلي وابن حبان، وأخرج هذا الحديث في صحيحه، وحسنه الترمذي. وروى عنه علي بن ربيعة والركين بن الربيع، وجوَّد الحافظ ابن حجر إسناد هذا الحديث، وقال في التقريب:"صدوق".

وأما قول البخاري:"لم يتابع عليه" فقال المزي في ترجمة أسماء بنت الحكم من تهذيب الكمال:"ما ذكره البخاري رحمه الله لا يقدحُ في صحَّة هذا الحديث، ولا يوجب ضَعفه، وأمَّا كونه لم يُتابع عليه؛ فليس شرطًا في صحَّة كلِّ حديثٍ صحيح أن يكون لراويه مُتابعٌ عليه، وفي الصحيح عدَّة أحاديثَ لا تُعرف إلَّا من وجهٍ واحدٍ".

ثمَّ قال:"وأمَّا ما أنكره من الاستحلافِ؛ فليس فيه أنَّ كلَّ واحدٍ من الصحابةِ كان يستحلف من حدَّثه عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، بل فيه أنَّ عليًّا رضي الله عنه كان يفعل ذلك، وليس ذلك بمنكرٍ، أن يحتاط في حديث النبيِّ صلى الله عليه وسلم، كما فعل عمر في سؤاله البيِّنة مِن بعض مَن كان يروي له شيئًا عن النبيِّ
- صلى الله عليه وسلم، كما هو مشهورٌ عنه، والاستحلافُ أيسر من سؤال البيِّنة".

قلت: وبخاصة في أواخر عهد علي رضي الله عنه عند وقوع الفتن.

والجزء المرفوع من الحديث لا بأس به في الشواهِدِ؛ لأنَّه لم يوجد فيه من اتُّهِم.




আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এমন কোনো ব্যক্তি নেই, যে কোনো গুনাহ করার পর উঠে উত্তমরূপে ওযু করে, অতঃপর দুই রাকাত সালাত আদায় করে এবং আল্লাহর নিকট ক্ষমা প্রার্থনা করে, তবে আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (1540)


1540 - عن زيد بن خالد الجُهَني أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من توضأ فأحسن وضوءه، ثم صلَّى ركعتين لا يسهو فيهما، غُفِر له ما تقدم من ذنبه".

صحيح: رواه أبو داود (905) حدَّثنا أحمد بن محمد بن حنبل، حدَّثنا عبد الملك بن عمرو، حدَّثنا هشام - يعني ابن سعد - عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن زيد بن خالد الجُهَني، فذكر الحديث. والحديث في مسند الإمام أحمد (17054).

وإسناده صحيح، صحّحه الحاكم (1/ 131) وقال: صحيح على شرط مسلم، ولا أحفظ له علة توهنها.

قلت: هشام بن سعد أقام هذا الإسناد. وكذلك الليث بن سعد، عن زيد بن أسلم به مثله رواه أبو عبيد في"الطهور" (10) من طريق حسَّان بن عبد الله، عن الليث بن سعد به، ورواه غيرهما عن زيد بن أسلم، عن زيد بن خالد، وهو منقطع. هكذا رواه الإمام أحمد (21691) عن سريج، ثنا عبد العزيز - يعني الدراوردي - عن زيد بن أسلم، عن زيد بن خالد، فذكر الحديث.

وما رُوِي عن أنس بن مالك - ولفظه:"الصلوات الخمس، والجمعة إلى الجمعة كفارات لما بينهن ما اجتُنِبت الكبائر"، وقال:"من الجمعة لَساعة لا يوافقها مسلم ولا مسلمة يسأل الله فيها خيرًا إلَّا أعطاه"، وقال صلى الله عليه وسلم:"مثل الصلوات الخمس كنهر غَمْر بباب أحدكم يغتسل كل يوم فيه خمس مرات، فما يبقين من دَرَنه؟" - فهو ضعيف.

رواه البزار (كشف الأستار 1/ 175 رقم 347) قال: حدَّثنا أحمد بن مالك القشيري، ثنا زائدة بن أبي الرُّقّاد، عن زياد النميري، عن أنس، فذكر الحديث. وقال: زائدة بن أبي الرُّقّاد ضعيف، وزياد النميري ليس به بأس؛ حدّث عنه جماعة بصريون، ولو عرفنا هذا عند غيره لحدَّثنا به عنه. انتهي.

وهو كما قال، فزائدة ضعيف، وزياد النميري ضعَّفه الأكثرون.

ورواه أبو نعيم في الحلية (9/ 249 - 250) عن عبد الحكيم عن أنس بن مالك، فذكره، وفيه:"وزيادة ثلاثةِ أيَّامٍ". وعبد الحكيم هو ابن عبد الله القسملي ضعيف كما قال الحافظ في التقريب.




যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি উত্তমরূপে উযু করল, অতঃপর এমনভাবে দু’রাকআত সালাত আদায় করল যে, তাতে তার কোনো ভুল-ভ্রান্তি (অন্য মনস্কতা) হলো না, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়।"