হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1561)


1561 - عن البراء بن عازب، أنه قال لِبَنيه: اجتمعوا فَلِأُريكم كيف كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ؟ وكيف كان يُصلّي؟ فاني لا أدري ما قَدْرُ صُحبتي إياكم. قال: فجمع بَنيه وأهلَه ودعا بوِضوءٍ فمضمض واستنثر، وغسل وجْهَه ثلاثًا، وغسل اليدَ اليُمنى ثلاثًا، وغسل يده هذه ثلاثًا - يعني اليسرى، ثم مسح رأسه وأُذنيه ظاهِرَهما وباطنَهما، وغسل هذه الرجلَ - يعني اليمني - ثلاثًا، وغسل هذه الرجلَ ثلاثًا - يعني اليسرى، قال: هكذا ما ألوتُ أن أريكم كيف كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ، ثم دخل بيته، فصلى صلاةً لا ندري ما هي، ثم خرج، فأمر بالصلاة. فأقيمت، فصلَّي بنا الظهر، فأحسبُ أنِّي سمعتُ منه آيات من {يس} ثم صلَّى العصر، ثم صلَّى بنا المغرب، ثم صلَّى بنا العِشاءَ، وقال: ما ألوتُ أن أريكم كيف كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ، وكيف كان يُصَلِّي.

حسن: أخرجه الإمام أحمد (18537) قال: حدَّثنا إسماعيل، حدَّثنا سعيد الجُرَيري، عن أبي عائذ سيفٍ السعدي - وأثنى عليه خيرًا - عن يزيد بن البراء بن عازب - وكان أميرًا بعُمان، وكان كخير الأُمراء -، قال: قال أبي: فذكر الحديث.

رجاله ثقات غير سيف أبي عائذ السعدي - قال البخاري: سماه ابن علية بعوانة، مشهور بكنيته، روى عن يزيد بن البراء بن عازب، عن أبيه في الوضوء، وعنه سعيد الجُريري، وأثنى عليه خيرًا. وذكره ابن حبان في الثقات. كذا في"التعجيل" (244).

ويزيد بن البراء بن عازب وثَّقه العجلي، وأثنى عليه أبو عائذ قائلًا:"وكان كخير الأُمراء" وذكره ابن حبان في الثقات. وجعله الحافظ في درجة"صدوق، وهو من رجال أبي داود والنسائي.

وقال الهيثمي في المجمع (2684):"رواه أحمد، ورجاله ثقات".




বারা ইবনু 'আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রদেরকে বললেন: তোমরা একত্রিত হও, যেন আমি তোমাদের দেখাতে পারি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কীভাবে উযু করতেন এবং কীভাবে সালাত আদায় করতেন? কারণ, তোমাদের সাথে আমার সাহচর্য কতদিন থাকবে তা আমি জানি না। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি তাঁর পুত্র ও পরিবারকে একত্রিত করলেন এবং উযুর পানি আনতে বললেন। অতঃপর তিনি কুলি করলেন ও নাকে পানি দিলেন, তাঁর মুখমণ্ডল তিনবার ধুলেন, ডান হাত তিনবার ধুলেন, আর এই হাতটিও তিনবার ধুলেন - অর্থাৎ বাম হাত। তারপর তিনি তাঁর মাথা ও কানদ্বয়—উভয়ের বাইরের ও ভেতরের অংশ মাসেহ করলেন। আর এই পা অর্থাৎ ডান পা তিনবার ধুলেন, এবং এই পা অর্থাৎ বাম পা তিনবার ধুলেন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কীভাবে উযু করতেন, তা আমি তোমাদের দেখাতে কোনো ত্রুটি করিনি। অতঃপর তিনি তাঁর ঘরে প্রবেশ করলেন এবং একটি সালাত আদায় করলেন, যা (কোন সালাত) আমরা জানি না। তারপর তিনি বেরিয়ে এলেন এবং সালাতের নির্দেশ দিলেন। অতঃপর ইকামাত দেওয়া হলো, তিনি আমাদের নিয়ে যোহরের সালাত আদায় করলেন। আমার ধারণা, আমি তাঁর কাছ থেকে সূরা ইয়াসীনের কিছু আয়াত শুনেছিলাম। এরপর তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন, তারপর মাগরিবের সালাত আদায় করলেন, এরপর আমাদের নিয়ে ইশার সালাত আদায় করলেন। এবং তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কীভাবে উযু করতেন এবং কীভাবে সালাত আদায় করতেন, তা তোমাদের দেখাতে আমি কোনো ত্রুটি করিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (1562)


1562 - عن المغيرة بن شعبة أنه سُئِل: هل أَمَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أحدٌ من هذه الأمة غيرُ أبي بكر رضي الله عنه؟ فقال: نعم كنَّا مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم في سَفَر، فلما كان من السَّحَر، ضَرَبَ عُنقَ راحلتي، فظننتُ أن له حاجة، فعَدَلتُ معه، فانطلقنا حتَّى بَرَزْنا عن الناس، فنزل عن راحلته، ثم انطَلقَ فتغيَّب عني حتَّى ما أراه، فمكثَ طويلًا، ثم جاء فقال:"حاجَتَكَ يا مُغِيرَة؟" قلت: ما لي حاجة. فقال:"هَلْ مَعكَ ماءٌ" فقلت: نعم، فقمتُ إلى قِرْبَةٍ أو إلى سَطِيحَةٍ معلّقةٍ في آخِرَةِ الرَّحْل، فأتيتُه بماء، فصببتُ عليه، فغسلَ يَدَيْه، فأحسن غَسْلَهما - قال: وأشكُّ أقالَ: دَلكهما بتراب أم لا - ثم غسل وجهه، ثم ذهب يحْسُرُ عن يديه وعليه جُبّةٌ شاميّة ضيقةُ الكُمَّين، فضاقت، فأخرج يَدَيْه من تحتها إخراجًا، فغسل وجهه ويديه - قال فيجيء في الحديث غسل
الوجه مرتين؟ قال: لا أدري أهكذا كان أم لا - ثم مسحَ بناصيته، ومسح على العِمامة، ومسح على الخفين، وركبنا فأدركنا الناسَ وقد أُقيمتِ الصلاةُ، فتقدَّمهم عبد الرحمن بن عوف، وقد صلَّى بهم ركعةً، وهمَّ في الثانية، فذهبتُ أُوذِنُه، فنهاني، فصلَّينا الركعة التي أدركْنا، وقضينا الركعة التي سُبِقْنا.

صحيح: رواه الإمام أحمد (18134) قال: حدَّثنا إسماعيل، أخبرنا أيوب، عن محمد، عن عمرو بن وهب الثقفي قال: كنَّا مع المغيرة بن شعبة فسئل فذكر الحديث.

وإسناده صحيح. إسماعيل هو: ابن علية. وأيوب هو: السختياني (أيوب بن أبي تميمة). ومحمد هو: ابن سيرين.

ورواه الطبراني في الكبير (20 / برقم 1039) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن رجل يكنى أبا عبد الله، عن عمرو بن وهب الثقفي فذكر الحديث. فجعل بين محمد بن سيرين وبين عمرو بن وهب رجلًا. وقد أكَّد ذلك أيضًا ابن معين كما ذكره الحافظ في"التهذيب" في ترجمة ابن سيرين.

ولكن أثبت البخاري في"التاريخ الكبير" (6/ 377) سماعه منه.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (18164) من طريق أيوب، عن محمد بن سيرين قال: دخلتُ مسجد الجامع، فإذا عمرو بن وهب الثقفي قد دخل من الناحية الأُخرى، فالتقينا قريبًا من وسط المسجد، فابتدأني بالحديث، وكان يُحبُّ ما ساق إليَّ من خير فذكر الحديث.

وأكَّد الدارقطني في علله (7/ 109) أن القول هو قول من لم يذكر الرجلَ المبهم كأيوب وقتادة ومن تابعهما.

فلعلّ محمد بن سيرين سمع من وجهين، سمع أوَّلًا من رجل، عن عمرو بن وهب، ثم لقيه وسمع منه، فصحَّ الحديث من وجهين. انظر باقي الحديث في المسح على الخفين.

وفي الحديث جواز المسح على العمامة. انظر التفصيل في باب ما جاء في المسح على الخفين والعمامة والناصية.




মুগীরা ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত এই উম্মতের অন্য কেউ কি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইমামতি করেছেন?

তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমরা একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। যখন সাহরীর সময় হলো, তখন তিনি আমার উটের ঘাড়ে আঘাত করলেন। আমি মনে করলাম তাঁর কোনো প্রয়োজন আছে, তাই আমি তাঁর সাথে চললাম। আমরা চলতে লাগলাম যতক্ষণ না আমরা লোকালয় থেকে দূরে চলে গেলাম। তখন তিনি তাঁর উট থেকে নামলেন এবং হেঁটে চলতে লাগলেন এবং আমার দৃষ্টির বাইরে চলে গেলেন। তিনি দীর্ঘক্ষণ থাকলেন। তারপর ফিরে এসে বললেন: "হে মুগীরা, তোমার কী প্রয়োজন?"

আমি বললাম: আমার কোনো প্রয়োজন নেই। তিনি বললেন: "তোমার সাথে কি পানি আছে?" আমি বললাম: হ্যাঁ। আমি হাওদার পেছনের দিকে ঝুলন্ত একটি মশকের (চামড়ার থলি) বা চ্যাপ্টা মশকের দিকে গেলাম এবং তাঁর জন্য পানি আনলাম। আমি তাঁর উপর পানি ঢেলে দিলাম। তিনি তাঁর হাত ধুলেন এবং উত্তমরূপে ধুলেন। [বর্ণনাকারী] বলেন: আমার সন্দেহ আছে, তিনি কি মাটি দিয়ে হাত মলেছিলেন, নাকি না? এরপর তিনি তাঁর মুখমণ্ডল ধুলেন। তারপর তিনি হাত বের করতে চাইলেন, কিন্তু তাঁর পরিধানে ছিল সংকীর্ণ হাতার একটি শামী জুব্বা। হাত সংকীর্ণ হওয়ায় তিনি জুব্বার নিচ থেকে কোনোমতে তাঁর হাত বের করলেন এবং তাঁর মুখমণ্ডল ও হাত ধুলেন। [বর্ণনাকারী বলেন, হাদীসে কি মুখমণ্ডল দু’বার ধোয়ার কথা এসেছে? তিনি বললেন: আমার জানা নেই, এটি এমন ছিল কিনা।] এরপর তিনি তাঁর কপালের উপরিভাগে মাসাহ করলেন, তাঁর পাগড়ীর উপর মাসাহ করলেন এবং মোজার উপর মাসাহ করলেন। এরপর আমরা আরোহণ করলাম এবং লোকজনের কাছে পৌঁছলাম। ইতোমধ্যে সালাতের ইকামত হয়ে গিয়েছিল। আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ইমামতি করতে অগ্রসর হয়েছিলেন এবং এক রাকাত সালাত আদায় করে দ্বিতীয় রাকাতের জন্য উদ্যোগী ছিলেন। আমি তাঁকে [ইমামতি থেকে সরে যাওয়ার জন্য] অবহিত করতে গেলাম, কিন্তু তিনি আমাকে নিষেধ করলেন। অতঃপর আমরা সেই রাকাতটি আদায় করলাম যা আমরা পেয়েছি এবং যে রাকাতটি আমাদের ছুটে গিয়েছিল, তা পূরণ করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1563)


1563 - عن أبي مالك الأشعري أنه جمع أصحابه فقال: هَلُمَّ أصَلِّي صلاة نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم - قال: وكان رجلًا من الأشعريين - قال: فدعا بجفْنةٍ من ماء، فغسل يديه ثلاثًا، ومضمضَ واستنشق، وغسل وجهه ثلاثًا، وذراعيه ثلاثًا، ومسح برأسه وأذنيه، وغسَل قدميه. قال: فصلَّى الظهر فقرأ فيها بفاتحة الكتاب، وكبَّر ثنتين وعشرينِ تكبيرةً.

حسن: رواه الإمام أحمد (22893) والطبراني (3412، 3414) كلاهما من طريق قتادة، عن شهر بن حوشب، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن أبي مالك الأشعري فذكر الحديث.
وإسناده حسن للكلام في شهر بن حوشب إلَّا أنه حسن الحديث ما لم يخالف، وقتادة مُدلِّس وقد عنعن، ولكن رواه ابن ماجه (417) من طريق ليث بن أبي سُليم، عن شهر بن حوشب، عن أبي مالك الأشعري قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ ثلاثًا، ثلاثًا.

وليث بن أبي سُليم تكلم فيه مِن قِبَل حِفظه، لأنه اختلط أخيرًا وكان عابدًا صالحًا، وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق" وهذا الحديث مما لم يختلط فيه لمتابعة قتادة له، كما أن لحديثه شواهد من الصحابة الآخرين.




আবূ মালিক আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর সাথীদেরকে একত্রিত করে বললেন: "এসো! আমি তোমাদেরকে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের মতো সালাত আদায় করে দেখাই।" (রাবী বলেন, তিনি আশআরী গোত্রের লোক ছিলেন)। তিনি এক পাত্র পানি চাইলেন, অতঃপর তাঁর দুই হাত তিনবার ধুলেন, কুলি করলেন এবং নাকে পানি দিলেন, তাঁর মুখমণ্ডল তিনবার ধুলেন, তাঁর দুই বাহু তিনবার ধুলেন, মাথা ও কান মাসাহ করলেন, এবং তাঁর দুই পা ধুলেন। এরপর তিনি যুহরের সালাত আদায় করলেন এবং তাতে ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) পড়লেন, এবং তিনি বাইশটি তাকবীর বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1564)


1564 - عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ، فمضمض ثلاثًا، واستنشق ثلاثًا، وغسل وجهه ثلاثًا، وغسل يديه ثلاثًا، ومسح برأسه، ووضَّأَ قدَميه.

حسن: رواه الإمام أحمد (8577) والطبراني في الأوسط -"مجمع البحرين" كلاهما عن همام، عن عامر - يعني الأحول، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال الهيثمي في المجمع (1/ 230): رواه الطبراني في الأوسط بإسناد، رجاله رجال الصحيح.

قلت: وهو كما قال غير عامر وهو: ابن عبد الواحد الأحول البصري وهو وإن كان من رجال مسلم إلَّا أنه اختلف فيه فقال أبو حاتم: ثقة لا بأس به، وقال ابن عدي: لا أرى برواياته بأسًا، وذكره ابن حبان في الثقات. وقال الإمام أحمد: ليس حديثه بشيء، وقال النسائي: ليس بالقوى. والخلاصة فيه كما قال الحافظ:"صدوق يخطئ".

فالظاهر فيه أنه لم يخطئ في رواية هذا الحديث لموافقة الثقات له ولتواتر الرواية بأن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ ثلاثًا ثلاثًا كما مضى، ورواه ابن ماجه (415) مجملًا بأن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ ثلاثًا ثلاثًا. رواه عن أبي كُريب، قال: حدَّثنا خالد بن حيَّان، عن سالم أبي المهاجر، عن ميمون بن مهران، عن عائشة وأبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ ثلاثًا ثلاثًا. ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو يعلى في مسنده (4676 تحقيق الأثرى).

ورجاله ثقات غير خالد بن حيَّان وهو: الرقي فوثَّقه ابن معين. وقال أحمد: لا بأس به، وقال النسائي: ليس به بأس. وقال ابن سعد: كان ثقة ثبتًا. فهو لا ينزل عن مرتبة"صدوق" ولكن جعله الحافظ في مرتبة"صدوق يخطئ".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করলেন, অতঃপর তিনি তিনবার কুলি করলেন, তিনবার নাকে পানি দিলেন (ইনশতিনশাক করলেন), তিনবার তাঁর মুখমণ্ডল ধুলেন, তিনবার তাঁর দুই হাত ধুলেন, তাঁর মাথা মাসেহ করলেন এবং তাঁর দুই পা ধুলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1565)


1565 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ ثلاثًا ثلاثًا.

حسن: رواه ابن ماجه (415) مقرونًا بأبي هريرة كما سبق عن أبي كريب، قال: حدَّثنا خالد بن حيَّان، عن سالم أبي المهاجر، عن ميمون بن مهران، عن عائشة وأبي هريرة فذكر الحديث.

وسبق بيانه بأن رجاله ثقات غير خالد بن حيَّان وهو"صدوق" أيضًا. هكذا رواه ميمون بن مهران عن عائشة مجملًا. ورواه أبو عبد الله سالم سَبَلان مُفصَّلًا. رواه النسائي (100) عن الحسين بن حُرَيْث، قال: حدَّثنا الفضل بن موسى، عن جعيد بن عبد الرحمن، قال: أخبرني عبد الملك بن
مروان بن الحارث بن أبي ذُباب قال: أخبرني أبو عبد الله سالم سَبَلان قال: وكانت عائشة تستعجبُ بأمانته وتستأجره، فأرتني كيف كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ، فمضمضتْ واستنثرتْ ثلاثًا، وغسلتْ وجْهَها ثلاثًا، ثم غسلَتْ يدها اليمنى ثلاثًا، واليُسرى ثلاثًا، ووضعتْ يدها في مقَّدمة رأسها ثم مسحتْ رأسها مسحةٌ واحدةٌ إلى مؤخره، ثم أمرّتْ يديها بأذُيَها ثم أمرَّت على الخدين.

قال سالم: كنت آتيها مكاتبًا ما تختفي منِّي، فتجلسُ بين يديَّ وتتحدثُ معي، حتَّى جئتُها ذات يوم فقلت: ادعي لي بالبركة يا أم المؤمنين. قالت: وما ذاك؟ قلت: أعتقني اللهُ. قالت: بارك الله لك، وأرختِ الحجابَ دوني فلم أرها بعد ذلك اليوم.

ورجاله ثقات غير عبد الملك بن مروان بن الحارث فهو"مقبول" لأنه لم يوثقه غير ابن حبان. فهذا التفصيل لعله يعود إلى الإجمال الذي ذكره ميمون بن مهران عن عائشة.

وقوله:"مسحت رأسها مسحة واحدة إلى مؤخّره" هذه لفظة مجملة تطلق على من مسح من المقدّم إلى المؤخّر، ومن المؤخّر إلى المقدّم، ويطلق عليها أيضًا مرة واحدة - كما في الأحاديث السابقة -.

وقوله:"كنتُ آتيها مكاتبًا" هذا مبني على أن المكاتب عبدٌ ما بقي عليه درهم، ولعل ذلك من مذهبها. والله أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার করে (প্রত্যেক অঙ্গ) ওযূ করতেন।

(এ সংক্রান্ত বিস্তারিত বর্ণনায় এসেছে যে) আবু আবদুল্লাহ সালিম সাবালান বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার (সালিমে সাবালানের) সততায় মুগ্ধ ছিলেন এবং তাকে মজুরি দিয়ে কাজ করাতেন। অতঃপর তিনি আমাকে দেখালেন কিভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযূ করতেন। তখন তিনি (আয়িশা) তিনবার কুলি করলেন এবং তিনবার নাকে পানি দিলেন। আর তিনি তাঁর চেহারা তিনবার ধুলেন। এরপর তাঁর ডান হাত তিনবার ধুলেন এবং বাম হাত তিনবার ধুলেন। আর তিনি তাঁর হাত মাথার অগ্রভাগে রেখে পেছন পর্যন্ত একবার মাথা মাসাহ করলেন। এরপর তিনি তাঁর উভয় হাত কানদ্বয়ের উপর দিয়ে চালনা করলেন এবং এরপর দুই গালের উপর দিয়ে চালনা করলেন।

সালিম বললেন: আমি যখন তার মুকাতাব দাস ছিলাম, তখন আমি তার কাছে যেতাম, আর তিনি আমার থেকে পর্দা করতেন না। তিনি আমার সামনে বসতেন এবং আমার সাথে কথা বলতেন। এমনকি একদিন আমি তাঁর কাছে এসে বললাম: হে উম্মুল মু'মিনীন! আমার জন্য বরকতের দু'আ করুন। তিনি বললেন: তা কী? আমি বললাম: আল্লাহ আমাকে আযাদ (মুক্ত) করে দিয়েছেন। তিনি বললেন: আল্লাহ তোমার জন্য বরকত দিন। এরপর তিনি আমার সামনে পর্দা ঝুলিয়ে দিলেন। সেই দিনের পর আমি তাঁকে আর দেখিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (1566)


1566 - عن أبي جبير الكندي أنه قدم على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَوضُوءٍ وقال:"توضأ يا أبا جبير!" فبدأ بفيه، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لا تبدأ بفيك، فإنَّ الكافر يبدأ بفيه" ثم دعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَوضوءٍ، فغسل يَديه حتَّى أنقاهُما، ثم تمضمض واستنثر، ثم غسل وجْهَه ثلاثًا، ثم غسل يده اليمنى إلى المرفق ثلاثًا، ثم غسل يده اليُسرى إلى المرفق ثلاثًا، ثم مسح برأسه وغسل رجليه.

حسن: رواه ابن حبان (1089) قال: أخبرنا ابن قتيبة، قال: حدَّثنا حرملة بن يحيى، قال: حدَّثنا ابن وهب، قال: حدثني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه أن أبا جبير فذكر الحديث.

ورواه البيهقي (1/ 46) من طريق الليث بن سعد، عن معاوية به صالح به مثله.

وإسناده حسن لأجل معاوية بن صالح وهو: ابن حُدير - بالمهلمة، مصغرًا - الحضرمي من رجال مسلم. إلّا أنه تُكلِّم فيه من ناحية حفظه غير أنه حسن الحديث.

وأما مسح الرقبة والعنق فلم يثبت فيه شيء، ولذلك قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى:"لم يصح عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه مسح على عنقه في الوضوء، بل ولا روي عنه ذلك في حديث صحيح، بل الأحاديث الصحيحة التي فيها صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن يمسح على عنقه؛ ولهذا لم يستحب ذلك جمهور العلماء كمالك والشافعي وأحمد في ظاهر مذهبهم، ومن استحبه فاعتمد
فيه على أثر يُروي عن أبي هريرة رضي الله عنه أو حديث يضعف نقله: أنه مسح رأسه حتى بلغ القذال، ومثل ذلك لا يصلح عمدة، ولا يعارض ما دلت عليه الأحاديث، ومن ترك مسح العنق فوضوؤه صحيح باتفاق العلماء، والله أعلم" مجموع الفتاوى (21/ 127 - 128).

وحديث القذال هو ما رواه الإمام أحمد (15951) وأبو داود (132) والبيهقي (1/ 60) كلهم عن ليث، عن طلحة بن مصرف، عن أبيه، عن جده، قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم مسح رأسه مرة واحدة، حتى بلغ القذال، وهو أول القفا.

قال أبو داود: قال مسدد: مسح رأسه من مقدمه إلى مؤخره، حتى أخرج يديه من تحت أذنيه، هذا لفظ أبي داود.

ولفظ أحمد: أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح رأسه حتى بلغ القذال، وما يليه من مقدم العنق يمرة، قال: القذال: السالفة العنق.

قال أبو داود: قال مسدد: فحدثت به يحيى فأنكره.

قال أبو داود: سمعت أحمد بن حنبل يقول: إن ابن عيينة زعموا أنه كان ينكره، ويقول: إيش هذا؟ يعني: طلحة عن أبيه عن جده. انتهى.

وفيه ليث وهو ابن أبي سليم سيء الحفظ؛ لأنه اختلط أخيرا ولم يتميز حديثه، فترك، ولذا ضعفه جمهور أهل العلم، فقال أحمد: مضطرب الحديث. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث، وقال أبو زرعة: لين الحديث، لا تقوم به الحجة عند أهل العلم بالحديث. وفيه مصرف أبو طلحة اليامي، لم يرو عنه إلا ابنه، ولم يوثقه أحد فهو"مجهول". وأما جد طلحة فاختلف في صحبته.

قال علي بن عبد الله المديني: قلت لسفيان: إن ليثًا روى عن طلحة بن مصرف عن أبيه، عن جده، أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم توضأ؛ فأنكر ذلك سفيان يعني ابن عيينة، وعجب أن يكون جد طلحة لقي النبي صلى الله عليه وسلم، قال علي: وسألت عبد الرحمن يعني ابن مهدي عن نسب جد طلحة فقال: عمرو بن كعب أو كعب بن عمرو وكانت له صحبة، وقال غيره: عمرو بن كعب لم يشك فيه.

عن عباس بن محمد الدوري قال: قلت ليحيى بن معين: طلحة بن مصرف عن أبيه عن جده، رأي جده النبي صلى الله عليه وسلم فقال يحيى: المحدثون يقولون: قد رآه وأهل بيت طلحة يقولون: ليست له صحبة.

ذكر هذا كله البيهقي في سننه (1/ 50) وذهب غيرهم إلى أن عمرو بن كعب أو كعب بن عمرو كانت له صحبة.

وبهذا يعرف أن هذا الحديث ضعيف، وقد ضعفه النووي في المجموع (1/ 360) وكذلك الحافظ ابن حجر في التلخيص (1/ 433) وغيرهم.

وقال النووي أيضا: (1/ 464 - 465):"وأما الحديث المروي عن طلحة بن مصرف، عن أبيه، عن جده، … فهو ضعيف بالاتفاق".
وفي معناه حديث آخر وهو ما رواه البزار (4488) عن إبراهيم بن سعيد، قال: نا محمد بن حجر، عن أبيه، عن أمه، عن وائل بن حجر قال: شهدت النبي صلى الله عليه وسلم، وأتي بإناء فيه ماء، فأكفأ على يمينه ثلاثا … فذكر الحديث بطوله، وجاء فيه:"ومسح ظاهر رقبته وباطن لحيته ثلاثا".

ومن هذا الطريق أيضا رواه الطبراني في الكبير (22/ 49 - 50) ولفظه:"ثم مسح رقبته وباطن لحيته من فضل ماء الوجه".

قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 232):"وفيه سعيد بن عبد الجبار، قال النسائي: ليس بالقوي، وذكره ابن حبان في الثقات، ومحمد بن حجر وهو ضعيف".

وقال أيضا: (2/ 134 - 135):"وفيه محمد بن حجر، قال البخاري: فيه بعض النظر، وقال الذهبي: له مناكير"، انتهى.

وقال البخاري في التاريخ الكبير (1/ 69):"فيه نظر".

وفي معناه حديث آخر ذكره الغزالي في الوسيط (1/ 287 - 288) مرفوعا:"مسح الرقبة أمان من الغل".

قال النووي في شرح المهذب (1/ 465):"هذا موضوع، ليس من كلام النبي صلى الله عليه وسلم".




আবূ জুবাইর আল-কিন্দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট আগমন করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাহাবীদেরকে) ওযুর জন্য পানির ব্যবস্থা করতে নির্দেশ দিলেন এবং বললেন, "হে আবূ জুবাইর! ওযু করো।" অতঃপর তিনি (আবূ জুবাইর) তার মুখ দ্বারা শুরু করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন, "তুমি তোমার মুখ দিয়ে শুরু করো না, কেননা কাফের মুখ দিয়ে শুরু করে।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আবার ওযুর পানি আনালেন। তিনি (প্রথমে) উভয় হাত এমনভাবে ধুলেন যেন তা পরিষ্কার হয়ে গেল। এরপর তিনি কুলি করলেন ও নাকে পানি দিয়ে ঝেড়ে ফেললেন। তারপর তিনি তার মুখমণ্ডল তিনবার ধুলেন, এরপর তার ডান হাত কনুই পর্যন্ত তিনবার ধুলেন, এরপর তার বাম হাত কনুই পর্যন্ত তিনবার ধুলেন, তারপর তিনি তার মাথা মাসেহ করলেন এবং উভয় পা ধুলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1567)


1567 - عن النزال بن سبرة قال: رأيتُ عليًا رضي الله عنه صلَّى الظهر، ثم قعد لحوائج الناس، فلما حضرتِ العصرُ أُتي بِتَوْرٍ من ماء، فأخذ منه كفًا فمسح به وجهه وذراعيه، ورأسه ورجليه، ثم أخذ فضله فشرب قائمًا، وقال: إن الناس يكرهون هذا، وقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله، وهذا وضوء من لم يُحدث.

صحيح: رواه النسائي (130) عن عمرو بن يزيد قال: حدَّثنا بهز بن أسد، قال: حدَّثنا شعبة، عن عبد الملك بن ميسرة، قال: سمعت النزال بن سبرة فذكر مثله.

وبوَّب عليه النسائي بقوله:"صفة الوضوء من غير حدث" ورواه ابن خزيمة في صحيحه (16) من طريق محمد بن جعفر، قال: ثنا شعبة به مثله وبوَّب عليه بقوله:"صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم على طُهر من غير حدث كان مما لا يوجب الوضوء" وأصل الحديث في صحيح البخاري في الأشربة (5616) عن آدم، عن شعبة به ولفظه:"أنه رضي الله عنه صلَّى الظهر، ثم قعد في حوائج الناس في رحبة الكوفة، حتَّى حضرت صلاةُ العصر، ثم أُتي بماء فشرب، وغسل وجْهَه ويديه - وذكر رأسه ورجليه - ثم قام فشرب فضْلَه وهو قائم ثم قال: إن ناسًا يكرهون الشرب قائمًا، وإن النبي صلى الله عليه وسلم صنع مثل ما صنعتُ".

اختار البخاري رحمه الله تعالى رواية آدم علي بهز بن أسد، لأنه ذكر في حديثه غسل الوجه واليدين على المعروف - وأما قوله: وذكر رأسه ورجليه - فلعله يقصد به مسحهما لأن أكثر الرواة
قالوا مثله، قال البيهقي في"السنن الكبرى" (1/ 75) بعد أن أخرج الحديث من طريق آدم:"وفي هذا الحديث الثابت دلالة على أن الحديث الذي روي عن النبي صلى الله عليه وسلم في المسح على الرجلين إن صحَّ، فإنما عُني به، وهو طاهر غير مُحِدث، إلَّا أن بعض الرواة كأنه اختصر الحديث فلم ينقل قوله: هذا وضوء من لم يُحدِث".



وأما حديث ابن عمر فرواه الدارقطني (1/ 97 - 98) من طرق عن ابن عمر مرفوعا، وبين أن رفعه وهم، والصواب وقفه، وكذا رجح وقفه ابن حجر في نكته على ابن الصلاح (1/ 414).

وأما حديث أبي موسى الأشعري فرواه الدارقطني (1/ 102) من طريق علي بن جعفر بن زياد الأحمر، حدثنا عبد الرحيم بن سليمان، حدثنا أشعث، عن الحسن، عن أبي موسى، فذكره مرفوعا.

قال الدارقطني عقبه:"والصواب موقوف، والحسن لم يسمع من أبي موسى".

وقال ابن أبي حاتم في العلل (133):"قال أبي: ذاكرت أبا زرعة بهذا الحديث، فقال: حدثنا إبراهيم بن موسى، عن عبد الرحيم، فقال: عن أبي موسى الأشعري موقوف" أهـ.

وروي أيضا عن صحابة آخرين، منهم أبو هريرة، وعائشة، وأنس، وأسماء بنت يزيد، ولا يصح منها شيء مرفوعا.

وقال حرب: قلت لأبي عبد الله - يعني أحمد بن حنبل -: الأذنان من الرأس؟ قال: نعم. قلت: صح فيه شيء عن النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: لا أعلم.

تنقيح التحقيق




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাযযাল ইবন সাবরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি তাঁকে যুহরের সালাত আদায় করতে দেখলাম, অতঃপর তিনি মানুষের প্রয়োজন পূরণের জন্য বসলেন। যখন আসরের সময় হলো, তখন তাঁর নিকট এক পাত্র পানি আনা হলো। তিনি তা থেকে এক অঞ্জলি পানি নিলেন এবং তা দিয়ে তাঁর মুখমণ্ডল, দুই হাত, মাথা এবং দুই পা মাসেহ করলেন। এরপর অবশিষ্ট পানি নিয়ে দাঁড়িয়ে পান করলেন এবং বললেন: 'নিশ্চয়ই লোকেরা এই কাজ অপছন্দ করে। অথচ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটি করতে দেখেছি। আর এটি হচ্ছে এমন ব্যক্তির ওযু, যে নতুন করে অপবিত্র হয়নি।'









আল-জামি` আল-কামিল (1568)


1568 - عن عثمان بن عفان أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُخلِّل لِحيتَه.

حسن: رواه الترمذي (31) وابن ماجه (430) كلاهما من حديث عبد الرزاق، عن إسرائيل، عن عامر بن شقيق، عن أبي وائل، عن عثمان، فذكر مثله.

ورجاله ثقات غير عامر بن شقيق، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وقال الحاكم (1/ 149) - بعد أن أخرجه من طريق الإمام أحمد بن حنبل، عن عبد الرزاق به مثله:"هذا إسناد صحيح، قد احتجا بجميع رواته غير عامر بن شقيق، ولا أعلم في عامر بن شقيق طعنًا بوجه من الوجوه"، وتعقبه الذهبي فقال:"ضعَّفه ابن معين، وله شاهد صحيح".

قلت: لا يبعد أن يكون مثله حسنَ الحديث، وقد قال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح.

ونقل البيهقي في سننه (1/ 54) عن البخاري أنه سئل عن هذا الحديث فقال:"هو حسن"، وقال:"أصح شيء عندي في التخليل حديث عثمان".

وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (151)، وابن حبَّان (1081).

ونقل الترمذيّ عن البخاريّ أنه قال: أصح شيء في هذا الباب حديث عامر بن شقيق، عن أبي وائل، عن عثمان.




উসমান ইবন আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দাড়ি খিলাল করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1569)


1569 - عن عائشة قالت: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا توضأ خلَّل لحيته بالماء.

حسن: رواه الإمام أحمد (25970 و 25971) من وجهين عن عمر بن أبي وهب، وإسحاق في
مسنده (1371) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن عمر بن أبي وهب، الخزاعي، ثنا موسى بن ثروان، عن طلحة بن عبد الله بن كَريز، عن عائشة، فذكرت الحديث.

ورجاله ثقات غير عمر بن أبي وهب، ترجم له ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (6/ 140) ونُقل توثيقه عن ابن معين. وقال أحمد: ما أعلم به بأسًا. وقال أبو حاتم: لا بأس به.

وموسى بن ثروان - بالثاء المثلثة، ويقال بالفاء بدل المثلثة - العجْلي المُعلم البصري، ثقة من رجال مسلم.

أورده الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 235) وقال: رواه أحمد، ورجاله موثقون. وحسَّنَ إسنادَه الحافظ في التلخيص (1/ 86).

وأما حديث حسَّان بن بِلال قال: رأيتُ عمَّار بن ياسر توضّأ فخلَّل لحيته، فقيل له، أو قال: فقلت له: أتُخلِّل لحيتك؟ قال: وما يمنعني؟ ولقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يخلِّل لحيته.

فهو ضعيف: رواه الترمذي (30) وابن ماجه (429) قالا: حدَّثنا ابن أبي عمر، حدَّثنا سفيان بن عيينة، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن حسَّان فذكر الحديث.

ورجاله ثقات، إلَّا أن الحافظ أعلَّه بأنَّ ابن عينة لم يسمعه من سعيد، ولا قتادة من حسَّان. التلخيص (1/ 86).

وأعله أيضًا أبو حاتم بالانقطاع. العلل (1/ 32).

وللحديث إسناد آخر رواه الترمذي وابن ماجه فقالا: حدَّثنا ابن أبي عمر، حدَّثنا سفيان بن عيينة، عن عبد الكريم بن أبي المُخارق أبي أمية، عن حسَّان بن بلال، فذكر الحديث.

وهذا الإسناد ضعيف؛ فإنَّ فيه عبد الكريم بن أبي المخارق وهو ضعيف، وأخطأ من قال: إنه عبد الكريم بن مالك الجزري؛ لأنه في طبقته، إلَّا أنه ثقة، كما أن عبد الكريم بن أبي المخارق لم يسمع من حسَّان بن بلال حديث التخليل، نقله الترمذي عن ابن عيينة.

وفي تهذيب التهذيب في ترجمة حسَّان بن بلال: وأنكر البخاري وابن عيينة سماع عبد الكريم منه.

وكذلك حديث أنس الذي أخرجه أبو داود (145) أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا توضأ أخذ كفًّا من ماء فأدخله تحت حنكهـ فخلَّل به لحيته، وقال:"هكذا أمرني ربي عز وجل" ففيه الوليد بن زوران، يروي عن أنس، وهو مجهول الحال. ورواه أيضًا ابن ماجه (431) بإسناد آخر، ولفظه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا توضأ خلَّل لحيته وفرّج أصابعه مرتين.

ففيه يحيى بن كثير أبو النضر صاحب البصري، وشيخه يزيد الرقاشي ضعيفان.

وفي الباب أيضًا عن أم سلمة وأبي أُمامة وأبي الدرداء وابن عمر وعبد الله بن عكبرة وواثلة وعبد الله بن مسعود وغيرهم، أوردها الهيثمي في مجمع الزوائد، والحافظ في التلخيص (1/ 85 - 86)، ولكن كلها معلولة. وقد قال الإمام أحمد: ليس في تخليل اللحية شيء صحيح. وقال ابن
أبي حاتم عن أبيه: لا يثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم في تخليل اللحية شيء. انظر: التلخيص.

قلت: نفي الصحة لا يلزم نفي الحسن؛ ولذا ذهب الجمهور إلى استحباب تخليل اللحية، قال الترمذي: وقال بهذا أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم ومن بعدهم؛ رأَوا تخليل اللحية، وبه قال الشافعي. وقال أحمد: إن سها عن تخليل اللحية فهو جائز. وقال إسحاق: إن تركهـ ناسيًا أو متأوِّلًا أجزأه، وإن تركه عمدًا أعاد.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ওযু করতেন, তখন পানি দ্বারা তাঁর দাড়ি খেলাল করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1570)


1570 - عن عاصم بن لَقيط بن صَبرة، عن أبيه قال: كنت وافد بني المُنْتَفِق، أو في وفد بني المنتَفِق إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر قصة نزوله على عائشة، وأنها أمرت لنا بصنع خزيرة إلى أن لقي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله! أخبرني عن الوضوء، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أسبغ الوضوء، وخلِّل بين الأصابع، وبالغ في الاستنشاق إلَّا أن تكون صائمًا".

صحيح: رواه أبو داود (142) مُطوَّلًا واللفظ له، والترمذي (38)، والنسائي (114)، وابن ماجه (407، 448) مُختصرًا. كلهم من حديث إسماعيل بن كثير أبي هاشم المكي، عن عاصم بن لَقيط به.

وفي بعض الروايات:"إذا توضأت فمضمض".

ورجال الإسناد ثقات. قال الترمذي:"حسن صحيح". وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (150) وابن حبان - الموارد (159) - والحاكم (1/ 147 - 148) وقال: صحيح.

وقال الترمذي: والعمل على هذا عند أهل العلم؛ أنه يخلِّل أصابع رجليه في الوضوء، وبه يقول أحمد وإسحاق. وقال إسحاق: يخلِّل أصابع يديه ورجليه في الوضوء.

والخزيرة: هي لحم يقطع صغارًا، ويُصَبُّ عليه ماء كثير، فإذا نضج درّ عليه الدقيق.




লাক্বীত ইবনু সবরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (লাক্বীত ইবনু সবরাহ) বলেন, আমি বনু মুনতাফিক গোত্রের প্রতিনিধি হিসেবে, অথবা বনু মুনতাফিক গোত্রের একটি প্রতিনিধি দলের সাথে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে গিয়েছিলাম। এরপর তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাদের অবতরণ করার ঘটনা বর্ণনা করলেন, আর (বললেন) তিনি (আয়েশা) আমাদের জন্য খাযিরা (এক প্রকার খাবার) প্রস্তুত করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সাক্ষাৎ হয়। অতঃপর তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে ওযু সম্পর্কে বলুন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "ওযু পূর্ণভাবে করো, আঙ্গুলসমূহ খিলাল করো, আর যদি তুমি রোযাদার না হও, তবে নাকে পানি দেওয়ার ক্ষেত্রে খুব বেশি বাড়াবাড়ি করো (গভীরভাবে নাও)।"









আল-জামি` আল-কামিল (1571)


1571 - عن المُستَوْرد بن شدَّاد قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا توضأ يدلك أصابع رجليه بخنصره.

حسن: رواه أبو داود (148) والترمذي (40) وابن ماجه (446) كلهم من طريق قتيبة بن سعيد، حدَّثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن عمرو، عن أبي عبد الرحمن الحُبُليِّ، عن المُستَوْرد بن شدَّاد فذكر مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريبٌ لا نعرفه إلَّا من حديث ابن لهيعة" انتهى.

كذا صرح الترمذي بانفراده به، لكن الأمر ليس كذلك بل تابعه الليث بن سعد وعمرو بن الحارث كما ذكره البيهقي (1/ 76) ثم هو رواه أيضًا عن عبد الله بن وهب، كما رواه أيضًا الطبراني في الكبير من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، كلاهما عن ابن لهيعة. والجمهور على أن رواية ابن وهب وابن يزيد كان قبل احتراق كتب ابن لهيعة - أي قبل اختلاطه. ولذا صحّحه ابن القطان في
كتابه:"الوهم والإيهام" (5/ 264) وكذا ذكره أيضًا الحافظ في التلخيص (1/ 94).




মুসতাওরিদ ইবন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, যখন তিনি উযু করতেন, তখন তাঁর ছোট আঙুল দ্বারা তাঁর পায়ের আঙুলগুলি ডলতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1572)


1572 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا توضأت فخلِّل بين أصابع يديك ورجليك".

حسن: رواه الترمذي (39) وابن ماجه (447) كلاهما عن إبراهيم بن سعيد وهو الجوهري، ثنا سعد بن عبد الحميد بن جعفر، ثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن صالح مولى التوأمة، عن ابن عباس. واللفظ للترمذي، ولفظ ابن ماجه:"إذا قمت إلى الصلاة فأسبغ الوضوء، واجعل الماء بين أصابع يديك ورجليك". قال الترمذي: حسن غريب

قلت: ورجاله ثقات سوى صالح مولى التوأمة؛ فإنه قد اختلط في آخر عمره، ولكن قال البوصيري في زوائد ابن ماجه:"صالح وإن اختلط بآخره فإنما روى عنه موسى بن عقبة قبل اختلاطه". ونقل الحافظ في التلخيص (1/ 94) تحسينه عن البخاري.

وصالح هو: ابن نبْهان المدني، مولى التوأَمة - بفتح المثناة وسكون الواو وبعدها همزة مفتوحة - وثقه العجلي، وقال ابن عدي: لا بأس برواية القدماء عنه كابن أبي ذئب وابن جريج. قال الحافظ:"صدوق اختلط بآخره".

وأما عبد الرحمن بن أبي الزناد فهو مختلف فيه. فقال العجلي: ثقةٌ وقال ابن عدي: وهو ممن يكتب حديثه. وتكلم فيه ابن معين وأحمد والنسائي.

والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوقٌ تغير حفظه لما قدم بغداد وكان فقيهًا، ولي خراج المدينة فحُمِدَ". وسيأتي رواية الإمام أحمد (2604) عن سليمان بن داود الهاشمي، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد وفيه زيادة:"إذا ركعت فضع كفيك على ركبتيك …" في الصلاة باب وضع الأكُفِّ على الركبة.

وأما ما جاء في تحريك الخاتم في الأصبع عند غسل اليدين فهو ضعيف، رواه ابن ماجه (449) قال: حدَّثنا عبد الملك بن محمد الرقاشي، ثنا معمر بن محمد بن عبيد الله بن أبي رافع، ثنا أبي، عن عبد الله بن أبي رافع، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا توضأ حرَّك خاتَمه.

قال البوصيري في زوائد ابن ماجه: إسناده ضعيف؛ لضعف معمر وأبيه محمد بن عبيد الله. انتهى.

قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ معمر بن محمد ينفرد عن أبيه بنسخة أكثرها مقلوبة، لا يجوز الاحتجاج به كما قال ابن حبان."كتاب المجروحين" (3/ 38). وقال البخاري: منكر الحديث. وقال ابن معين: لم يكن من أهل الحديث.

وأما أبوه محمد بن عبيد الله بن أبي رافع فهو ضعيف؛ قال أبو حاتم: ضعيف الحديث منكر الحديث جدًّا ذاهب. وقال الدارقطني: متروك له مُعضِلات.

وقال البيهقي بعد أن نقل عن البخاري في معمر: الاعتماد في هذا الباب على الأثر عن علي
وغيره. ثم روى بإسناده عن مجمع بن عتاب بن شمير، عن أبيه قال: وضَّأت عليًّا فكان إذا توضأ حرّك خاتمه. قال ابن التركماني: فيه عبد الصمد الضبي، ضعَّفه ابن معين، وشيخه مجمع بن عتاب عن أبيه لم أعرف حالهما.

وروى أيضًا بإسناده عن الأزرق بن قيس قال: رأيت ابن عمر إذا توضَّأ حرّك خاتمه.

قال ابن التركماني: فيه يحيى بن عبد الحميد الحماني قال البخاري في"كتاب الضعفاء": يتكلمون فيه، روى عن شريك وغيره. وقال أحمد بن حنبل: كان يكذب جِهارًا، ما زلنا نعرفه يسرق الأحاديث. وقال محمد بن عبد الله بن نمير: كذاب. وقال الجوزجاني: تُرِك حديثه. انتهى.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি ওযু করবে, তখন তোমার হাত ও পায়ের আঙ্গুলগুলির মধ্যভাগে (পানি দিয়ে) খিলাল করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1573)


1573 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا استيقظ أحدكم من منامه فتوضأ فلينتثر ثلاثًا، فإنَّ الشيطان يبيت على خيشومه".

متفق عليه: رواه البخاري (3295) ومسلم (238)، كلاهما من طريق محمد بن إبراهيم، عن عيسى بن طلحة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ ঘুম থেকে জাগে এবং ওযু করে, তখন সে যেন তিনবার নাক ঝেড়ে পানি ফেলে দেয় (নাসারন্ধ্রে পানি দিয়ে তা পরিষ্কার করে), কারণ শয়তান তার নাসারন্ধ্রে রাত কাটায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1574)


1574 - عن وعن عبد الله بن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استنثِروا مرتين بالِغَتين أو ثلاثًا".

حسن: رواه أبو داود (141) وابن ماجه (408) كلاهما من طريق وكيع، عن ابن أبي ذئب، عن قارظ بن شيبة، عن أبي غَطَفان المُريّ، عن ابن عباس، فذكر الحديث.

وإسناده حسن ورجاله ثقات، غير قارظ بن شيبة؛ فإنه لا بأس به، قال ابن سعد: كان قليل الحديث. وقال النسائي: ليس به بأس. وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 327). فمثله يحسن حديثه.

وانظر بقية أحاديث المضمضة في باب صفة وضوء النبيِّ صلى الله عليه وسلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা পূর্ণভাবে দুইবার অথবা তিনবার ইস্তিনশার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1575)


1575 - عن عبد الله بن مغفل، أنه سمع ابنه يقول: اللَّهم إنِّي أسألك القصر الأبيض عن يمين الجنة إذا دخلتها، فقال: أي بني! سل الله الجنة، وتعوذ به من النار؛ فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنه سيكون في هذه الأمة قوم يعتدون في الطُّهور والدعاء".

صحيح: رواه أبو داود (96) وابن ماجه (3864)، كلاهما من طريق حماد بن سلمة، ثنا سعيد الجُريري، عن أبي نعامة، عن عبد الله بن مغفل، فذكر الحديث، إلَّا أنّ ابن ماجه لم يذكر"الطهور"؛ ولذا أكرر ذكر الحديث في الدعاء.

وإسناده صحيح. وصحّحه الحافظ ابن حجر في"التلخيص الحبير" (1/ 144) وصحّحه أيضًا ابن حبان (1714) والحاكم (1/ 162، 540) إلَّا أن الذهبي قال في التلخيص: فيه إرسال.
قلت: لعله التبس عليه أبو نَعامة اسمه قيس بن عباية بأبي نعامة الآخر: واسمه عمرو بن عيسى بن سُوَيد الذي كان من أتباع التابعين، روى له مسلم وغيره، وأما قيس بن عَباية فهو من التابعين مات ما بين عشر إلى عشرين ومائه، روي عن عبد الله بن مغفل وابنه، وعنه سعيد الجُريري. قال ابن عبد البر: هو ثقة عند جميعهم، ووثقه أيضًا ابن معين.

وأما الحديث المشهور الذي كان يرويه سعد، أنه كان يتوضأ فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما هذا السرف؟"، فقال: أفي الوضوء إسراف؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"نعم، وإن كنت على نهر جار". فهو حديث ضعيف، رواه ابن ماجه (425) من طريق ابن لهيعة، عن حُييّ بن عبد الله المعافري، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلِّي، عن عبد الله بن عمرو، عن سعد.

قال البوصيري: هذا إسناد ضعيف؛ لضعف حيّى بن عبد الله وعبد الله بن لهيعة.

وكذلك الحديث المشهور الذي يرويه أُبَي بن كعب مرفوعًا:"إن للوضوء شيطانًا يقال له: وَلَهان، فاتقوا وسْواس الماء"، فهو ضعيف أيضًا.

رواه الترمذي (75) وابن ماجه (421)، وفيه خارجة بن مصعب ضعيف، قال الترمذي: حديث أُبَي بن كعب حديث غريب، وليس إسناده بالقوي، لا نعلم أحدًا أسنده غير خارجة، وقد رُوِي هذا الحديث من غير وجه عن الحسن قوله، ولا يصح في هذا الباب عن النبي صلى الله عليه وسلم شيء، وخارجة ليس بالقوي عند أصحابنا، وضعَّفه ابن المبارك. انتهى.

وقال ابن أبي حاتم في العلل (رقم 130): سئل أبو زرعة عن هذا الحديث، فقال: رَفْعُه إلى النبي صلى الله عليه وسلم مُنكر.




আব্দুল্লাহ ইবন মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বলতে শুনলেন: "হে আল্লাহ! আমি যখন জান্নাতে প্রবেশ করব, তখন এর ডান দিকের সাদা প্রাসাদটি চাই।" তখন তিনি (আব্দুল্লাহ ইবন মুগাফ্ফাল) বললেন: "হে বৎস! তুমি আল্লাহর কাছে জান্নাত চাও এবং জাহান্নামের আগুন থেকে তাঁর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয়ই আমার এই উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক আসবে, যারা পবিত্রতা অর্জন (তাহারাত) এবং দো‘আর ক্ষেত্রে সীমালঙ্ঘন করবে।'"









আল-জামি` আল-কামিল (1576)


1576 - عن أبي هريرة قال: أسْبِغوا الوضوء؛ فإنَّ أبا القاسم قال:"ويلٌ للأعقاب من النار".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (165) واللفظ له، ومسلم في الطهارة (242) كلاهما من طريق شعبة، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة أنه رأى قومًا يتوضؤون من المِطْهَرة. وفي مسلم من طريق الربيع بن مسلم، عن محمد بن زياد عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا لم يغسل عقِبيه فقال:"ويلٌ للأعقاب من النار".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা উযূ পূর্ণভাবে করো (উযূর অঙ্গসমূহ ভালোভাবে ধৌত করো); কারণ আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আগুন থেকে গোড়ালির জন্য দুর্ভোগ।









আল-জামি` আল-কামিল (1577)


1577 - عن جابر بن عبد الله قال: أخبرني عمر بن الخطاب أن رجلًا توضّأ فترك موضع ظُفْر على قدمه، فأبصره النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ارجع! فأحسن وضوءك". فرجع ثم صلَّى.

رواه مسلم في الطهارة (243) عن سلمة بن شبيب، حدَّثنا الحسن بن محمد بن أعين، حدَّثنا معقل، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر الحديث.




জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানিয়েছেন যে, এক ব্যক্তি ওযু করল। কিন্তু সে তার পায়ের নখের সমপরিমাণ স্থান (ধোয়া থেকে) বাদ রেখে দিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা দেখে বললেন: "ফিরে যাও! আর উত্তমরূপে তোমার ওযু সম্পন্ন করো।" অতঃপর সে ফিরে গেল এবং (উত্তমরূপে ওযু করে) সালাত আদায় করল।









আল-জামি` আল-কামিল (1578)


1578 - عن عائشة، أنها سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ويلٌ للأعقاب من النار".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (240) عن سالم بن عبد الله مولى شدَّاد قال: دخلت على عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم يوم توفي سعد بن أبي وقاص، فدخل عبد الرحمن بن أبي بكر فتوضأ عندها، فقالت: يا عبد الرحمن! أسبغ الوضوء؛ فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول، فذكرت الحديث.

وفي رواية عند ابن ماجه (452) وأحمد (24123) كلاهما من طريق ابن عجلان، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي سلمة، قال: رأتْ عائشةُ عبدَ الرحمن وهو يتوضأ فقالت: أسبغ الوضوء؛ فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ويلٌ للعراقيب من النار". وابن عجلان صدوق.

(والعراقيب) جمع عرقوب، والعرقوب من الإنسان هو: وتر غليظ فوق عقبه، ومن الدابة: ما يكون في رجلها بمنزلة الركبة في يدها."المعجم الوسيط".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "আগুনের কারণে গোড়ালিসমূহের জন্য দুর্ভোগ (বা সর্বনাশ)!"

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি (আয়িশা রাঃ) আব্দুল রহমান ইবনু আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ওযূ করতে দেখে বলেছিলেন: হে আব্দুল রহমান! ওযূ পরিপূর্ণ করো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "আগুনের কারণে গোড়ালিসমূহের জন্য দুর্ভোগ!")









আল-জামি` আল-কামিল (1579)


1579 - عن عبد الله بن عمرو قال: تخلف النبي صلى الله عليه وسلم عنا في سفرةٍ سافرناها، فأدركنا وقد أرهقنا العصر، فجعلنا نتوضأ ونمسح على أرجلنا، فنادى بأعلى صوته:"ويلٌ للأعقاب من النار" مرتين أو ثلاثًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (163) واللفظ له، ومسلم في الطهارة (241) كلاهما عن أبي عوانة، عن أبي بشْر، عن يوسف بن ماهَك، عن عبد الله بن عمرو به. وعند مسلم: وقد حضرت صلاةُ العصر. وفي رواية قال: رجعنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من مكة إلى المدينة، حتَّى إذا كنا بماء بالطريق تعجّل قوم عند العصر، فتوضّأوا وهم عِجال، فانتهينا إليهم وأعقابهم تلوح لم يمسَّها الماءُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ويلٌ للأعقاب من النار؛ أسبغوا الوضوء". وتم تخريجه في"المنة الكبرى" (1/ 154).




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যে সফরে গিয়েছিলাম, তাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের থেকে কিছুটা পিছনে রয়ে গিয়েছিলেন। এরপর তিনি এসে আমাদের কাছে পৌঁছলেন যখন আসরের ওয়াক্ত ঘনিয়ে এসেছিল। তখন আমরা ওযু করতে লাগলাম এবং তাড়াহুড়ো করে কেবল আমাদের পাগুলো মাসাহ করছিলাম। তখন তিনি উচ্চৈঃস্বরে ডাক দিয়ে বললেন: "আগুনের (জাহান্নামের) শাস্তি হবে ঐসব গোড়ালির জন্য!"— এ কথা তিনি দু'বার অথবা তিনবার বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1580)


1580 - عن عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ويلٌ للأعقاب وبُطونِ الأَقدامِ من النار".

حسن: رواه الإمام أحمد (17710) قال: حدَّثنا حسن (وهو ابن موسى) قال: حدَّثنا ابن لهيعة، حدَّثنا حيوة بن شُريح، عن عُقبة بن مسلم قال: سمعتُ عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي فذكر الحديث.

وإسناده ضعيف لأجل ابن لهيعة، ولكنه توبع، فقد رواه ابن خزيمة (163) والدارقطني (1/ 95) والحاكم (1/ 162) والبيهقي (1/ 70) كلهم من طريق الليث بن سعد، عن حيوة بن شريح به مثله.

قال الحاكم: حديث صحيح ولم يخرجا ذكر بطون الأَقدام.

ولعل الحافظ الهيثمي لم يقف على هذا المرفوع، وإنما وقف على الموقوف الذي أخرجه الإمام أحمد (17706) عن هارون، حدَّثنا عبد الله بن وهب، قال: حدثني حيوةُ، عن عقبة بن مسلم التجيبي، قال: سمعتُ عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يقول: ويلٌ للأعقاب وبطون الأَقدام من النار يوم القيامة.
فقال في"مجمع الزوائد" (1/ 240) رواه أحمد هكذا، وقال الطبراني في الكبير عن عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ويلٌ للأعقاب وبطون الأَقدام من النار" وقال: رجال أحمد والطبراني ثقات.

قلت: وهو كذلك إلَّا أنه رُوِي مرفوعًا من طريق ابن لهيعة كما مضى. وتم تخريجه في"المنة الكبرى" (1/ 155)، وقال ابن أبي عاصم في"الآحاد والمثاني" (2484): لا نعلم بطون الأَقدام إلَّا في هذا الحديث وحده. وهذا يوجب غسل الرجلين، ولا نعلم أحدًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم سُمع منه غيره". انتهى.




আবদুল্লাহ ইবনে হারিস ইবনে জায্‍ আয-যুবাইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আগুন থেকে গোড়ালি ও পায়ের তলাগুলোর জন্য ধ্বংস (বা কঠিন শাস্তি) রয়েছে।"