হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1781)


1781 - عن أبي موسى قال: كنت أنا وأصْحابي الذين قدِموا معي في السَّفِينة نُزولًا في بَقِيع بُطْحان، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة، فكان يتناوبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عند صلاةِ العِشاءِ كلَّ ليلَةٍ نفرٌ منهم، قال أبو موسى: فوافَقْنَا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أنا وأصْحابي، وله بعضُ الشُّغْل في أمره، حتى أَعْتَمَ بالصَّلاةِ حتى أبهارَّ اللَّيلُ، ثم خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فصَلَّى بهم، فلَمَّا قضَى صلاتَه قال لمن حضره:"على رِسْلِكم أُعْلِمكم، وأَبْشِرُوا، أنَّ من نعمة الله عليكم أنه ليس من الناس أحد يُصَلِّي هذه الساعة غيرُكم" أو قال:"ما صَلَّى هذه الساعة أحد غيرُكم" - لا ندري أي الكلمتين قال.

قال أبو موسى: فرجعنا فرحين بما سمعنا من رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (567)، ومسلم في المساجد (641) كلاهما عن أبي أسامة، عن بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكر الحديث.

قوله: بقيع بُطحان - البقيع من الأرض المكان المتسع، قال ابن الأثير: لا يسمى بقيعًا إلا وفيه شجر أو أُصولها، وبُطحان: موضع بعينه واد بالمدينة.

وقوله:"يتناوب" فاعله: نفر، أي يأتيه كل ليلةٍ عدة رجال متناوبين غير مجتمعين.

وقوله:"ابهار الليل": انتصف، وبهرةُ كل شيء وسطه، ويؤيد هذا المعنى لما في بعض الروايات: حتى إذا كان قريبًا من نصف الليل.

والشُّغُل المذكور كان في تجهيز جيش، رواه الطبري من وجه صحيح عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، ذكره الحافظ في"الفتح" (2/ 48).




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং আমার সাথীরা, যারা আমার সাথে নৌকায় করে এসেছিলাম, আমরা বাকী'উ বুত্বহানে অবস্থান করছিলাম, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তখন মদীনায় ছিলেন। তাদের মধ্য থেকে একদল লোক প্রতি রাতে ইশার সালাতের সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পালাক্রমে যেত।

আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর একদিন আমি ও আমার সাথীরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পৌঁছলাম। তাঁর (রাসূলের) কোনো কাজে কিছু ব্যস্ততা ছিল, ফলে তিনি সালাত আদায় করতে দেরি করলেন, এমনকি রাতের অর্ধেক পার হয়ে গেল।

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বেরিয়ে আসলেন এবং তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন সেখানে উপস্থিত লোকদের উদ্দেশ্য করে বললেন: "ধীরে থাকুন! আমি তোমাদেরকে জানাচ্ছি এবং তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো। তোমাদের প্রতি আল্লাহর একটি অনুগ্রহ হলো, এই সময়ে তোমাদের ছাড়া আর কোনো মানুষ সালাত আদায় করেনি।" অথবা তিনি বললেন: "তোমাদের ছাড়া এই সময়ে আর কেউ সালাত আদায় করেনি।" — (বর্ণনাকারী বলেন) আমরা জানি না, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দু'টি বাক্যের মধ্যে কোনটি বলেছিলেন।

আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছ থেকে যা শুনলাম, তাতে আনন্দিত হয়ে ফিরে আসলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1782)


1782 - عن ابن عباس يقول: أَعْتَمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ العِشَاءَ، قال: حتى رَقَد ناسٌ واستَيْقَظُوا، ورقدوا واستيقظوا فقام عمر بن الخطاب فقال: الصلاةَ! فقال عطاء: قال ابن عباس: فخرج نبي الله صلى الله عليه وسلم كأنّي أنظر إليه الآن، يَقْطُر رأسه ماءً واضِعًا يدَه على شقِّ رأسِه قال:"لولا أن يَشُقَّ على أُمتي لأمرتُهم أن يُصَلُّوها كذلك".

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (571)، ومسلم في المساجد (642) كلاهما من حديث عبد الرزاق، قال أخبرني ابن جريج، قال: قلت لعطاء: أيُّ حين أَحَبُّ إليك أن أُصَلِّي العِشَاءَ التي يقولُها الناس العَتَمَةَ إِمَامًا وخِلْوًا؟ قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر الحديث.

والحديث في مصنف عبد الرزاق (2112) من هذا الوجه.

ورواه أيضًا عن محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن عطاء، قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر مثله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত এত দেরিতে আদায় করলেন যে, কিছু লোক ঘুমিয়ে গেল এবং জাগলো, আবার ঘুমালো এবং আবার জাগলো। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, 'সালাত!' ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, যেন আমি তাকে এখনই দেখছি, তার মাথা থেকে পানি ঝরছিল এবং তিনি তার হাত তার মাথার একপাশে রেখেছিলেন। তিনি বললেন: "যদি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর না হতো, তবে আমি তাদের এভাবেই (দেরিতে) সালাত আদায়ের নির্দেশ দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1783)


1783 - عن جابر بن سمرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُؤَخِّرُ صلاةَ العشاء الآخِرَةِ.

وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الصلوات نحوًا من صَلاتِكم، وكان يُؤَخِّرُ العَتَمَةَ بعد صلاتكم شيئًا، وكان يُخِفُّ الصلاةَ، وفي رواية: يُخَفِّفُ.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (643) عن أبي الأحوص، عن سماك، عن جابر، والرواية الثانية: عن أبي عوانة، عن سماك به مثله.

ورواه أبو داود الطيالسي في مسنده (810) عن قيس، عن سماك، عن جابر بن سمرة ولفظه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يصلي الظهر نحو صلاتكم، والعَصْرَ نحو صلاتكم، والمغربَ نحو صلاتكم، وكان يُؤَخِّر العِشاءَ شيئًا.




জাবির ইবনু সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত বিলম্ব করতেন।

আরেক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের সালাতের মতোই অন্যান্য সালাত আদায় করতেন, এবং তিনি তোমাদের সালাতের চেয়ে ঈষৎ বিলম্বে 'আতামাহ' (ইশা) সালাত আদায় করতেন। আর তিনি সালাত সংক্ষিপ্ত করতেন। (অন্য বর্ণনায়: তিনি হালকা করতেন।)

আবু দাউদ আত-তায়ালিসির বর্ণনায় (শব্দাবলী সহ) এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের মতো করে যুহরের সালাত আদায় করতেন না, তোমাদের মতো করে আসরের সালাত আদায় করতেন না, এবং তোমাদের মতো করে মাগরিবের সালাতও আদায় করতেন না। আর তিনি ইশার সালাত কিছুটা বিলম্ব করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1784)


1784 - عن زيد بن خالد الجهني قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لولا أن أشُقَّ على أمتي لأمرتهم بالسواك عند كل صلاة، ولأخَّرتُ صلاة العِشاءِ إلى ثُلثِ الليل".

صحيح: رواه الترمذي (23) قال: حدثنا هنَّاد، حدثنا عبدة بن سليمان، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن زيد بن خالد الجهني فذكر الحديث. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: فيه محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ومن طريقه رواه أيضًا أبو داود (47)، والنسائي في الكبري (3/ 291) إلا أنهما لم يذكرا"تأخير صلاة العشاء" وسبق تخريجه في كتاب الطهارة، باب ما جاء في السواك.

وللحديث إسناد آخر رواه الإمام أحمد (17048) قال: حدثنا عبد الصمد، قال: حدثنا حرب - يعني ابن شدَّاد - عن يحيى، حدثنا أبو سلمة، عن زيد بن خالد الجهني فذكر الحديث في السواك
بدون تأخير صلاة العشاء، وهذا إسناد صحيح، ويحيي هو: ابن أبي كثير.




যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যদি আমি আমার উম্মতের উপর কষ্টকর মনে না করতাম, তবে আমি তাদেরকে প্রত্যেক সালাতের (নামাযের) সময় মিসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম, এবং আমি ইশার সালাতকে রাতের এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1785)


1785 - عن النعمان بن بشير قال: أنا أعلم الناس بوقت هذه الصلاة، كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّيها لسقوط القمر الثالثة.

صحيح: أخرجه أبو داود (419)، والترمذي (165)، والنسائي (529) كلهم من طريق أبي عوانة، عن أبي بِشْرٍ، عن بَشِير بن ثابتٍ، عن حبيب بن سالم، عن النعمان بن بشير فذكر مثله.

وإسناده صحيح، إلا أنه اختلف على أبي بِشْرٍ وهو: جعفر بن إياس فرواه أبو عوانة كما تراه وتابعه شعبة فروي عن أبي بِشْرٍ نحو رواية أبي عوانة.

ومن طريق شعبة رواه الإمام أحمد (18396) والدارقطني (1/ 270)، والحاكم (1/ 194) كلهم من طريق يزيد بن هارون عنه، ولفظه في المسند: إني لأعلم الناس - أو من أعلم الناس - بوقت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم العِشَاء، كان يُصَلِّيها مقدارَ ما يَغيبُ القمر ليلةَ ثالثةٍ أو رابعةٍ.

قال الدارقطني: شك شعبة.

قال الترمذي: حديث أبي عوانة أصَحُّ عندنا، لأن يزيد بن هارون روي عن شعبة، عن أبي بِشْرٍ نحو رواية أبي عوانة. انتهى

قال الدارقطني: ورواه هُشيم ورَقَبة وسفيان بن حسين، عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب، عن النعمان وقالوا: ليلة ثالثة، ولم يذكروا بَشيرًا. انتهى.

قلت: من طريق هُشَيم رواه ابن أبي شيبة (1/ 330)، والحاكم (1/ 194)، قال الحاكم: تابعه رَقَبة بن مصقلة، عن أبي بِشْرٍ.

هكذا اتفق رَقَبة وهُشيم على رواية هذا الحديث عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب بن سالم، وهو إسناد صحيح، وخالفهما شُعبة وأبو عوانة فقالا: عن أبي بِشْرٍ عن بَشِير بن ثابت، عن حبيب بن سالم. انتهى.

قلت: أما رواية رَقَبة بن مصقلة فأخرجها النسائي (528) عن جعفر بن إياس وهو: أبو بِشْرٍ بن أبي وَحْشِيَّة. وأبو بِشْرٍ وإن كان ثقةً إلا أن شعبةَ ضَعَّفَه في حبيب بن سَالِم.

وأما حديث سفيان بن حسين، عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب بن سالم عن النعمان فقد أشار إليه الدارقطني كما مضى.

وقد رجح الترمذي وأبو زرعة وغيرهما رواية من أثبت (بشير بن ثابت) بين أبي بِشْرٍ وحبيب بن سالم، بل وقد خطأ أبو بكر بن العربي في"عارضة الأحوذي" (1/ 277) قائلًا:"وخطأ من أخطأ فيه لا يُخرجه عن الصحة".

وقال شعبة: أبو بِشْرٍ لم يسمع من حبيب بن سالم ولذا ضَعَّفه فيه، كما سبق.

وبهذا صَحَّ قول الترمذي بأن حديث أبي عَوانة أصَحُّ عندنا.

والحديث يدل على تعجيل صلاة العِشاء بعد دخول وقتها، والأحاديث الأخرى تدل على
استحباب تأخيرها، والضابط في هذا ما ذكره جابر بن عبد الله بأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي العِشاءَ أحيانًا وأحيانًا، إذا رآهم اجتمعوا عجَّل، وإذا رآهم أبطأوا أخَّر كما مضى في باب التوقيت.




নু'মান ইবন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমিই লোকদের মধ্যে এই সালাতের সময় সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি অবগত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম চাঁদ তৃতীয় রাতে (অস্তমিত হয়ে গেলে) এই সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1786)


1786 - عن أبي سعيد الخدري قال: صَلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ العَتَمَةِ، فلم يخرجْ حتى مَضَى نحو من شَطر اللَّيلِ فقال:"خذوا مقاعدكم" فأخذنا مقاعدنا، فقال:"إن الناس قد صَلُّوا وأخذوا مَضَاجِعَهم، وإنَّكم لن تَزَالُوا في صلاةٍ ما انتظرتُم الصلاةَ، ولولا ضَعْفُ الضِّعِيفِ، وسُقْمُ السَّقيم لأخَّرتُ هذه الصلاةَ إلى شطر اللَّيلِ".

صحيح: أخرجه أبو داود (422)، والنسائي (538)، وابن ماجة (693) كلهم من طريق داود ابن أبي هند، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد فذكره.

واللفظ لأبي داود. وأبو نَضْرة هو: المنذر بن مالك بن قُطَعة العَبدي.

وقوله:"صلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة العتمةِ" - أي صلاة المغرب كما في النسائي وابن ماجة، لأن العرب كانوا يطلقون على صلاة المغرب العَتَمة، وقد نُهينا عن ذلك.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، صحّحه ابن خزيمة، وأخرجه في صحيحه (345) من طرق عن داود بن أبي هند.

هكذا رواه بِشْرٍ بن المفضل وغيره عن داود بن أبي هند، وخالفهم أبو معاوية الضرير، عن داود ابن أبي هند فقال: عن جابر بن عبد الله، وهو سيأتي فيما بعد.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে 'আতামাহর সালাত আদায় করলাম। তিনি বের হলেন না, যতক্ষণ না রাতের প্রায় অর্ধেকটা অতিবাহিত হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের নিজ নিজ জায়গায় বসো।" তখন আমরা আমাদের নিজ নিজ জায়গায় বসে পড়লাম। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই লোকেরা সালাত আদায় করেছে এবং তাদের বিছানায় শুয়ে পড়েছে। আর তোমরা যতক্ষণ পর্যন্ত সালাতের জন্য অপেক্ষা করতে থাকবে, ততক্ষণ পর্যন্ত তোমরা সালাতের মধ্যেই থাকবে। যদি দুর্বল লোকের দুর্বলতা এবং অসুস্থ লোকের অসুস্থতা না থাকত, তবে আমি এই সালাতকে রাতের অর্ধেক পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1787)


1787 - عن معاذ بن جبل يقول: بَقَينا النبي صلى الله عليه وسلم في صلاة العَتَمَة فأَخَّر حتى ظنَّ الظَّان أنه ليس بخارج، والقائل منا يقول: صَلَّى، فإنا لكذلك، حتى خرج النبي صلى الله عليه وسلم فقالوا له كما قالوا: فقال لهم:"أَعْتِنموا بهذه الصلاة، فإنكم قد فُضِّلْتُم بها على سائر الأمم، ولم تُصَلِّها أمةٌ قبلكم".

صحيح: أخرجه أبو داود (421) قال: حدثنا عمرو بن عثمان الحِمصي، ثنا أبي، ثنا حَريز - يعني ابن عثمان - عن راشد بن سعد، عن عاصم بن حُميد السَّكوني، أنه سمع معاذ بن جبل يقول: فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات غير عاصم بن حُميد السكوني صاحب معاذ فقد شك البزار في سماعه من معاذ، والصواب أنه سمع منه، وهو الحمصي المخضرم من الطبقة العليا من تابعي أهل الشام.

والإعتام - الدخول في العَتَمة، وهي ظلمة الليل.

وقوله: بَقَينا - بفتح الباء والقاف، بوزن رَمينا.

قال الخطابي:"معناه - انتظرنا. يقال: بَقَيتُ الرجل أبقيه إذا انتظرته".




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা 'আতামাহ (ইশার) সালাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অপেক্ষা করছিলাম। অতঃপর তিনি এত দেরি করলেন যে, অনুমানকারী (উপস্থিত ব্যক্তিরা) ধারণা করতে লাগলো, তিনি আর বের হবেন না। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ বলতে শুরু করলো: তিনি (সম্ভবত ভেতরে) সালাত আদায় করে নিয়েছেন। আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন। অতঃপর লোকেরা তাঁর কাছে (তাদের অপেক্ষার) কথাগুলো বললেন। তখন তিনি তাঁদের বললেন: "তোমরা এই সালাতকে (ইশার সালাতকে বিলম্বে আদায়ের সুযোগকে) গুরুত্ব সহকারে গ্রহণ করো। কেননা, এই সালাতের মাধ্যমে তোমাদেরকে অন্যান্য সকল উম্মতের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দান করা হয়েছে। তোমাদের পূর্বে অন্য কোনো জাতি এই সালাত আদায় করেনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1788)


1788 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشق على المؤمنين لأمرتُهم
بتأخير العِشاءِ، وبالسواك عند كل صلاة".

صحيح: رواه أبو داود (46)، وابن ماجة (690) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

وقد سبق تخريج هذا الحديث في كتاب الطهارة، باب السواك من طريق مالك عن الزناد، به

إلا أن مالكًا لم يذكر في حديثه تأخير العِشاء، وهو الذي اعتمده الشيخان كما أن مُسلما رواه من حديث سفيان ولم يذكر فيه تأخير العِشاء أيضًا، وروى عنه عدد منهم قتيبة بن سعيد، وعنه رواه أبو داود عن سفيان وجمع بين تأخير العشاء وبين السواك عند كل صلاة.

قال ابن خزيمة (139) بعد أن أخرج الحديث من طرق منها سعيد بن عبد الرحمن المخزومي، عن سفيان:"لم يؤكد المخزومي تأخير العِشاء".

فالذي يظهر أن الرواة اختلفوا على سفيان بن عيينة، فالأكثر منهم لم يذكروا تأخير العشاء.

وأما مالك فلم يختلف الرواة عليه، فكل من روى عنه لم يذكروا تأخير العشاء أكَّد ذلك ابن خزيمة بعد أن رواه من طريق روح بن عبادة، عن مالك قال: ورواه الشافعي وبشر بن عمر كرواية روح وهو:"لولا أن أَشُقَّ على أمتي لأمرتُهم بالسواك مع كل وضوء". انتهى.

ولحديث أبي هريرة إسناد آخر رواه الترمذي (167) وابن ماجة (691) كلاهما عن عبيد الله بن عمر، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشق على أمتي لأخرتُ صلاة العِشاء إلى ثلث الليل، أو نصف الليل".

هكذا بالشك من"ثلث الليل" أو"نصف الليل"، ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 146) من طريق عبد الرحمن السراج، عن سعيد، عن أبي هريرة وفيه:"إلى نصف الليل" بغير شك مع ذكر السواك.

قال الحاكم: وهو صحيح على شرطهما وليس له علة.

وعبد الرحمن سراج هو: ابن عبد الله البصري.

فالذي يظهر من هذا أن الشك من أحد الرواة عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، وللحديث أسانيد، أخرى انظر مسند الإمام أحمد (2/ 258، 259).

قال الترمذي: حديث أبي هريرة حديث حسن صحيح.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি না আমি মু'মিনদের জন্য কষ্টকর মনে করতাম, তবে আমি তাদেরকে ইশার সালাত বিলম্বিত করার এবং প্রত্যেক সালাতের জন্য মিসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1789)


1789 - عن جابر بن عبد الله قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم على أصحابه ذات ليلة وهم ينتظرون العِشَاء فقال:"صَلَّى الناس ورَقَدوا، وأنتم تنتظرونها، أما إنكم في صلاةٍ ما انتظرتُموها" ثم قال:"لولا ضَعْفُ الضعيفٍ، وكِبرُ الكبير، لأخَّرتُ هذه الصلاة إلى شطر اللَّيلِ".

صحيح: أخرجه أبو يعلى (2/ 367) (1935 تحقيق الأثري)، قال: حدثنا أبو خيثمة، حدثنا محمد
ابن حازم (وهو أبو معاوية الضرير)، حدثنا داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن جابر فذكر مثله.

ومن طريق أبي يعلى - أخرجه ابن حبان في صحيحه (1529) مثله.

وتابعه ابن أبي شيبة (1/ 402) وسعدان بن نصر عند البيهقي (1/ 375) فرويا عن أبي معاوية به مثله.

وله طريق آخر عند أحمد (14949) عن أبي الجَوَّاب، حدثنا عمَّار بن رُزيق، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: جَهَّز رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جيشًا ليلةً حتى ذهب نصفُ الليلِ، أو بلغ ذلك، ثم خرج فقال:"قد صلَّى الناس ورقدوا، وأنتم تنتظرون هذه الصلاة، أما إنكم لن تزالوا في صلاةٍ ما انتظرتموها". وهي متابعة قوية ورجال الإسنادين ثقات.

وأبو الجوَّاب هو: الأحوص بن جوَّاب - بفتح الجيم، وتشديد الواو - الضَّبِّي - وثَّقه ابن معين، وأخرج له مسلم، قال أبو حاتم: صدوق، وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق ربما وهم".

وأبو سفيان هو: طلحة بن نافع الواسطي وهو:"صدوق".

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 312):"رواه أحمد وأبو يعلى، وإسناد أبي يعلى رجاله رجال الصحيح".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের কাছে বের হলেন যখন তারা ইশার (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে, আর তোমরা এর (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করছ। শোনো, তোমরা যতক্ষণ এর জন্য অপেক্ষা করছো, ততক্ষণ তোমরা সালাতের মধ্যেই আছো।" তারপর তিনি বললেন: "যদি দুর্বল ব্যক্তির দুর্বলতা এবং বয়স্ক লোকের বার্ধক্য না থাকত, তাহলে আমি এই সালাতকে অর্ধ রাত পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1790)


1790 - عن عائشة قالت: سُئِل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن وقت العشاء فقال:"إذا ملأ الليلُ بطن كُلِّ وادٍ".

حسن: أخرجه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (1/ 434) (567) عن علي بن سعيد الرازي، ثنا قطن بن نُسير الذِّراع، ثنا جعفر بن سليمان الضبعي، عن محمد بن عمرو، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن، قطن بن نُسير الغُبري الذراع وجعفر بن سليمان ومحمد بن عمرو - الليثي كلهم صدوق، لا يرتقون إلى درجة الثقة، وإن كان كلهم من رجال مسلم. ولذا قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 313): رجاله رجال الصحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইশার নামাযের সময় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "যখন রাত প্রতিটি উপত্যকার পেট (গভীরতা) পূর্ণ করে দেবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1791)


1791 - عن ابن مسعود قال: أخَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ العشاءِ ثم خرج إلى المسجد، فإذا الناس ينتظرون الصلاة قال:"أما إنه ليس من أهل هذه الأديان أحدٌ يذْكر الله هذه الساعة غيرَكم". قال: وأنزل هؤلاء الآيات: {لَيْسُوا سَوَاءً مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ} حتى بلغ: {وَمَا يَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ يُكْفَرُوهُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ} [آل عمران: 113 - 115].

حسن: أخرجه أحمد (3760)، وأبو يعلى (5/ 139) (5285 الأثري)، والبزار"كشف الأستار" (1/ 190)، والحارث بن أبي أسامة: في"بغية الباحث" (1/ 255) (132) كلهم من طريق عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه الطبراني في"الكبير" (10209) من طريق الأعمش، عن زِرّ به.
وإسناده حسن لأجل عاصم وهو: ابن أبي النجود.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 312) رواه أحمد وأبو يعلى والبزار والطبراني في"الكبير" ورجال أحمد ثقات، ليس فيهم غير عاصم بن أبي النجود، وهو مختلف في الاحتجاج به، وفي إسناد الطبراني: عبيد الله بن زَخْر وهو ضعيف". انتهى.

وأورده أيضًا البوصيري في"إتحاف الخيرة" (2/ 69 - 70) وعزاه أيضًا إلى أبي بكر بن أبي شيبة، والنسائي في"الكبري"، وابن حبان في"صحيحه" كلهم من طرق عن عاصم (بن أبي النجود).

وقوله:"أهل الأديان" المراد بهم اليهود والنصارى في المدينة وما يجاورها، لا على الأرض إطلاقًا، لأن ذكر الله تعالى لا تتوقف في أي ساعة من ساعات الليل والنهار.

وخلاصة القول في وقت صلاة العشاء:

قال الحافظ الزيلعي: تكلم الطحاوي في"شرح معاني الآثار" (1/ 158) ههنا كلامًا حسنًا ملخصه أنه قال:"يظهر من مجموع الأحاديث أن آخر وقت العشاء حين يطلع الفجْرُ، وذلك أن ابن عباس وأبا موسى والخضرمي رووا أن النبي صلى الله عليه وسلم في أخَّرها إلى ثلث اللَّيلِ، وروى أبو هريرة وأنس أنه أخرها حتى انتصف الليلُ، وروى ابن عمر أنه أخَّرها حتى ذهب ثلث الليل، وروَتْ عائشهُ أنه أعْتَمَ بها حتى ذهب عامهُ اللَّيلِ، وكل هذه الروايات في"الصحيح" قال: فثبت بهذا أنَّ اللَّيلَ كله وقت لها، ولكنَّه على أوقات ثلاثة: فإما من حين يدخلُ وقْتُها إلى أن يَمْضِيَ ثلثُ اللَّيلِ فأفضلُ وقتٍ صُلِّيَت فيه، وأما بعد ذلك إلى أن يَتم نصفُ اللَّيل في الفضل دون ذلك، وأما بعد نصفِ اللَّيلِ فدونه، ثم ساق بسنده عن نافع بن جبير، قال: كتب عمر بن الخطاب إلى أبي موسى: وصَلِّ العشاء أيَّ اللَّيلِ شئتَ، ولا تَغْفَلْها. ولمسلم في قصة التعريس عن أبي قتادة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في النوم تفريط، إنما التفريط أن يؤخر صلاةً حتى يدخلُ وَقْتُ الأُخْرى، فدلَّ على بقاء الأولى إلى أن يدخل وقتُ الأُخرى، وهو طلوع الفجر الثاني".

انظر:"نصب الراية" (1/ 234 - 235).

هذا كلام حسن ولكن في بعضه نظر، وقد سبق أن بَيَّنتُ معنى حديث عائشة:"ذهب عامة الليل" بأنه كثير منه … إلخ




আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত বিলম্বিত করলেন। এরপর তিনি মাসজিদে আসলেন। তখন দেখলেন যে লোকজন সালাতের জন্য অপেক্ষা করছে। তিনি বললেন, “জেনে রেখো! এই সকল ধর্মাবলম্বীদের মধ্যে এমন কেউ নেই যারা এই সময়ে তোমাদের ব্যতীত আল্লাহকে স্মরণ করে।” তিনি বলেন, তখন এই আয়াতসমূহ নাযিল হয়: {আহলে কিতাবদের সকলে সমান নয়…} [সূরা আলে ইমরান: ১১৩] থেকে এই পর্যন্ত: {আর তারা যে সৎকর্মই করুক না কেন, তাদের প্রতিদান অস্বীকার করা হবে না। আর আল্লাহ মুত্তাকীদের সম্পর্কে সম্যক অবগত।} [সূরা আলে ইমরান: ১১৫]।









আল-জামি` আল-কামিল (1792)


1792 - عن عبد الله بن عمر قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تَغْلِبَنَّكُم الأَعْرَابُ على اسم صلاتِكم، أَلا إِنَّها العِشَاءُ، وهم يُعْتِمُونَ بالإِبِل".

وفي رواية:"فإنها في كتاب الله العِشاءُ، وإنَّها تُعْتِمُ بحلابِ الإِبل".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (644) من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي لبيد، عن أبي
سلمة، عن عبد الله بن عمر فذكره.

قوله:"يُعتمون" - معناه يُؤخرون حلب الإبل، ويسمون الصلاة باسم وقت الحلاب، ويقال: فلان عالم القِرى، إذا كان نزل به الأضياف لم يُعجل قراهم، قاله الخطابي في شرح أبي داود (5/ 261).

وقوله:"اسمها في كتاب الله العِشاء"، إشارة إلى قوله تعالى: {وَمِنْ بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ} [سورة النور: 58].

ولكن جاء في الأحاديث الصحيحة تسميتُها بالعَتَمَةِ كحديث:"لو يعلمون ما في الصبح والعتمة لأتوهما ولو حبوًا".

وفي حديث عبد الله بن عمر تسمية العشاء العتمة وهو الحديث الآتي.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের সালাতের নামের উপর বেদুঈনরা যেন তোমাদেরকে জয়ী না করে। সাবধান! নিশ্চয়ই তা হলো 'আল-ইশা' (রাতের সালাত), আর তারা উটের কারণে ই'তিম (বিলম্ব) করে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "নিশ্চয়ই তা আল্লাহর কিতাবে 'আল-ইশা', আর এটি উট দোহনের কারণে ই'তিম (বিলম্বিত) হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1793)


1793 - عن عبد الله بن عمر قال: صلَّى لنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليلةً الصلاةَ العِشاء - وهي التي يدعو الناسُ العتمةَ - ثم انصرف، فأقبل علينا فقال:"أرأيتُم ليلتكم هذه، فإن رأس مائة سنةٍ منها لا يبقى ممن هو على ظهر الأرض أحدٌ".

متفق عليه: رواه البخاري في مواقيت الصلاة (564) ومسلم في فضائل الصحابة (2537) كلاهما من طريق الزهري، قال سالم: أخبرني عبد الله فذكره، واللفظ للبخاري.

والجمع بين هذه الأحاديث من وجوه:

منها: بيان جواز تسمية العتمة للعشاء، فالنهي للتنزيه لا للتحريم.

ومنها: مخاطبة الناس بما يعرفون.

ومنها: تعليمهم بترك ما لا يناسب.

ومنها: لئلا يتوهموا أنها المغرب، لأن العشاء عندهم كانت تطلق على المغرب.

ومنها: لعل الرواة هم الذين تصرفوا في تسمية العتمة للعشاء.

والخلاصة: أن تسمية الإسلام لصلاة العشاء - هي العشاء، فلا يستحسن العدول عنها إلى العتمة، لئلا تغلب السنةُ بالجاهلية، مع ذلك لا يحرم استعمالها بدليل استعمال النبي صلى الله عليه وسلم واستعمال الصحابة بعده.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে এক রাতে 'ঈশার সালাত আদায় করলেন—যা মানুষ 'আতামাহ' বলে ডাকে—এরপর তিনি ফিরলেন এবং আমাদের দিকে মুখ করে বললেন: "তোমরা কি তোমাদের এই রাতটিকে দেখতে পাচ্ছো? কেননা এর (এই রাতের) একশ বছর পূর্ণ হওয়ার পর, যারা বর্তমানে পৃথিবীর বুকে রয়েছে, তাদের একজনও অবশিষ্ট থাকবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1794)


1794 - عن عبد الله بن مغفل المزني، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تَغْلِبَنَّكُم الأعْرابُ على اسمِ صلاتِكم المغرب" قال: وتقول الأعرابُ: هي العِشاءُ.

صحيح: رواه البخاري في المواقيت (563) عن أبي معمر، (وهو عبد الله بن عمرو) قال: حدثنا عبد الوارث، عن الحسين، قال: حدثنا عبد الله بن بُريدة، قال: حدثنا عبد الله المزني فذكر الحديث.

والحسين هو: المعلم، وعبد الله المزني هو: عبد الله بن مغفْل.
وكره اسم العشاء عليها لئلا يقع الالتباس بالصلاة الأخرى، ولكن لو قُيد بأن يقال: العشاء الأولى فلا يكره كما ثبت في الصحيح: العشاء الآخرة من قول أنس:"أخَّر النبي صلى الله عليه وسلم العِشاء الآخرة" البخاري"الفتح" (2/ 44).




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের সালাত মাগরিবের নামের ব্যাপারে বেদুঈনরা যেন তোমাদের উপর প্রাধান্য লাভ করতে না পারে।" তিনি বলেন, বেদুঈনরা এটিকে ‘ঈশা’ বলে।









আল-জামি` আল-কামিল (1795)


1795 - عن أبي برزة قال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يكره النوم قبل العشاء والحديث بعدها".

متفق عليه: وهو جزء من حديث أبي برزة السابق في باب ما جاء في توقيت الصلوات.




আবূ বারযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার পূর্বে ঘুমানো এবং তার (এশার) পরে কথাবার্তা বলা অপছন্দ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1796)


1796 - عن أنس قال: نظرنا النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة حتى كان شطرُ اللَّيلِ يَبْلُغُه، فجاء فصَلَّى لنا، ثم خَطَبَنا فقال:"ألا إن الناس قد صَلُّوا ثم رقدوا، وإنكم لم تزالوا في صلاةٍ ما انتظرتم الصلاة".

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (600) من طريق قُرة بن خالد، قال: انتظرنا الحسنَ، وراثَ علينا، حتى قَربنا من وقت قيامه، فجاء فقال: دعانا جيرانُنا هؤلاء - ثم قال: قال أنس فذكر الحديث.

قال الحسن:"وإن القومَ لا يزالونَ بخير ما انتظروا الخيرَ".

قال قُرَّة: هو من حديث أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، انتهى

قول قُرة: هو حديث أنس - أي الكلام الأخير الذي لم يرفعه الحسنُ وهو قوله:"إن القوم لا يزالون بخير …" فأراد قُرة أن يؤكد للناس أنه مرفوع أيضًا.

وقوله: وراث - بمعنى أبطأ - والواو للحال.

ورواه مسلم في المساجد (640) من أوجه أخرى نحوه. انظر: باب ما جاء في تأخير العشاء.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: এক রাতে আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অপেক্ষা করছিলাম, এমনকি প্রায় অর্ধেক রাত হয়ে গেল। অতঃপর তিনি এলেন এবং আমাদের সাথে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে, কিন্তু তোমরা যতক্ষণ সালাতের অপেক্ষায় থাকো, ততক্ষণ তোমরা সালাতের মধ্যেই থাকো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1797)


1797 - عن عبد الله بن عمر قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم في صلاةَ العِشَاء في آخر حياته، فلما سلَّم قام النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أَرأيتُم ليلتكم هذه، فإنَّ رأسَ مائةِ سنةٍ لا يَبْقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض أحدٌ" فوَهِلَ الناسُ في مقالة رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى ما يتحدثون من هذه الأحاديث عن مائة سنة. وإنما قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يبقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض" يريد بذلك أنَّها تخرِمُ ذلك القرنَ.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (601)، ومسلم في فضائل الصحابة (2537) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني سالم بن عبد الله وأبو بكر بن سليمان، أن عبد الله بن عمر قال، فذكر الحديث، والبخاري رواه أيضًا في كتاب العلم، باب السمر في العلم (116).

وسيعاد الحديث في فضائل الصحابة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবনের শেষদিকে ইশার সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন: "তোমরা কি তোমাদের আজকের এই রাতটি দেখছো? কেননা, এই রাতের একশ বছর পূর্ণ হলে বর্তমানে পৃথিবীর বুকে যারা আছে, তাদের কেউই অবশিষ্ট থাকবে না।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথাকে কেন্দ্র করে লোকজন একশ বছর (আয়ু) সম্পর্কে আলোচনায় ভুল বুঝেছিল। অথচ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুধুমাত্র এ কথাই বলেছিলেন, "বর্তমানে যারা পৃথিবীর বুকে আছে, তাদের কেউই অবশিষ্ট থাকবে না।" এর দ্বারা তিনি মূলত সেই প্রজন্মটির সমাপ্তির উদ্দেশ্য করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1798)


1798 - عن عمر بن الخطاب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسْمُرُ مع أبي بكر في الأمر من أمور المسلمين، وأنا معهما.

صحيح: رواه الترمذي (169) قال: حدثنا أحمد بن منيع، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عمر بن الخطاب فذكر الحديث.

قال الترمذي: حديث حسن.

قلت: بل هو حديث صحيح، ورجاله ثقات.

وللحديث إسناد آخر كما قال الترمذي:"وقد روي هذا الحديثَ الحسنُ بن عبيد الله، عن إبراهيم، عن علقمة، عن رجل من جُعفيَ يقال له"قيس" أو"ابن قيس" عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هذا الحديث في قصة طويلة". انتهى.

قلت: في قول الترمذي إشارة إلى أن علقمة لم يسمع من عمر بن الخطاب، أو أنه روي علي وجهين: مرة بدون واسطة، وأخرى بالواسطة، وهذا هو الصحيح، فقد ثبت لقاء علقمة،"وهو: ابن قيس النخعي" من عائشة وعمر بن الخطاب.

وأما القصة التي يشير إليها الترمذي فهي ما رواه أحمد (175) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة قال: جاء رجل إلى عمر وهو بعرفة.

قال أبو معاوية: وحدثنا الأعمش، عن خيثمة، عن قيس بن مروان أنه أتى عمر فذكر القصة.

فساق أبو معاوية إسنادين في أحدهما: علقمة أنه حضر القصة في عرفة.

وأما حديث الحسن بن عبيد الله فأخرجه أيضًا الإمام أحمد (265) عن عفان، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا الحسن بن عبيد الله، حدثنا إبراهيم، عن علقمة، عن القَرْثع، عن قيس، أو ابن قيس - رجل من جُعْفِيّ - عن عمر بن الخطاب فذكر القصة إلا أنه لم يذكر قصة السمر.

ويظهر منه أنه وقع خطأ في نسخة الترمذي فإن علقمة لا يروي عن رجل يقال له"قيس أو ابن قيس" كما قال الترمذي، وإنما يروي عن القرثع - الضبي - عن قيس، أو ابن قيس.

وأما القصة فانظر في فضائل عبد الله بن مسعود.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের কোনো একটি গুরুত্বপূর্ণ বিষয় নিয়ে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে রাত্রি জেগে আলোচনা করতেন, আর আমিও তাঁদের দুজনের সাথে ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1799)


1799 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك ركعةً من الصلاة فقد أدرك الصلاة".

متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (15) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث. وعن مالك رواه البخاري في المواقيت (580)، ومسلم في المساجد (607).

وفي رواية عند مسلم:"من أدركَ ركعةً من الصَلاة مع الإمام فقد أدرك ركعة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের এক রাকাত পেল, সে সালাত পেল।"

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে ব্যক্তি ইমামের সাথে সালাতের এক রাকাত পেল, সে (সেই) রাকাতটি পেল।"









আল-জামি` আল-কামিল (1800)


1800 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك من الصُّبْحِ ركعةً قبل أن تطلُعَ
الشمسُ فقد أدرك الصُّبْحَ، ومن أدرك ركعةً من العَصْرِ قبل أن تَغْرُبَ الشمسُ فقد أدرك العَصْرَ".

متفق عليه: رواه مالك في وقت الصلاة (5) عن زيد بن أسْلَم، عن عطاء بن يسار وبُسْر بن سَعيد والأعرج، كلهم يُحَدِّثون عن أبي هريرة.

وعن مالك رواه البخاري في المواقيت (579) ومسلم في المساجد (608) ورواه أيضًا مسلم (608) من وجه آخر عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، عن أبي هريرة نحوه.

ورواه البخاري أيضًا (556) من وجه آخر عن أبي نعيم، قال: حدثنا شيان، عن يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة ولفظه:"إذا أدرك أحدكم سجدةً من صلاة العَصْرِ قبل أن تغرُبَ الشمْسُ فَلْيُتِمَّ صلاتَه؟ وإذا أدرك سجدةً من صلاة الصُّبْح قبل أن تَطْلُعَ الشمسُ فَلْيُتِمَّ صلاته".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সূর্যোদয়ের পূর্বে ফজরের এক রাকাত পায়, সে ফজর (এর সালাত) পেল। আর যে ব্যক্তি সূর্যাস্তের পূর্বে আসরের এক রাকাত পায়, সে আসর (এর সালাত) পেল।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "যদি তোমাদের কেউ সূর্যাস্তের পূর্বে আসরের সালাতের একটি সিজদা পায়, তবে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে। আর যদি সে সূর্যোদয়ের পূর্বে ফজরের সালাতের একটি সিজদা পায়, তবে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে।"