হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1788)


1788 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشق على المؤمنين لأمرتُهم
بتأخير العِشاءِ، وبالسواك عند كل صلاة".

صحيح: رواه أبو داود (46)، وابن ماجة (690) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

وقد سبق تخريج هذا الحديث في كتاب الطهارة، باب السواك من طريق مالك عن الزناد، به

إلا أن مالكًا لم يذكر في حديثه تأخير العِشاء، وهو الذي اعتمده الشيخان كما أن مُسلما رواه من حديث سفيان ولم يذكر فيه تأخير العِشاء أيضًا، وروى عنه عدد منهم قتيبة بن سعيد، وعنه رواه أبو داود عن سفيان وجمع بين تأخير العشاء وبين السواك عند كل صلاة.

قال ابن خزيمة (139) بعد أن أخرج الحديث من طرق منها سعيد بن عبد الرحمن المخزومي، عن سفيان:"لم يؤكد المخزومي تأخير العِشاء".

فالذي يظهر أن الرواة اختلفوا على سفيان بن عيينة، فالأكثر منهم لم يذكروا تأخير العشاء.

وأما مالك فلم يختلف الرواة عليه، فكل من روى عنه لم يذكروا تأخير العشاء أكَّد ذلك ابن خزيمة بعد أن رواه من طريق روح بن عبادة، عن مالك قال: ورواه الشافعي وبشر بن عمر كرواية روح وهو:"لولا أن أَشُقَّ على أمتي لأمرتُهم بالسواك مع كل وضوء". انتهى.

ولحديث أبي هريرة إسناد آخر رواه الترمذي (167) وابن ماجة (691) كلاهما عن عبيد الله بن عمر، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشق على أمتي لأخرتُ صلاة العِشاء إلى ثلث الليل، أو نصف الليل".

هكذا بالشك من"ثلث الليل" أو"نصف الليل"، ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 146) من طريق عبد الرحمن السراج، عن سعيد، عن أبي هريرة وفيه:"إلى نصف الليل" بغير شك مع ذكر السواك.

قال الحاكم: وهو صحيح على شرطهما وليس له علة.

وعبد الرحمن سراج هو: ابن عبد الله البصري.

فالذي يظهر من هذا أن الشك من أحد الرواة عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، وللحديث أسانيد، أخرى انظر مسند الإمام أحمد (2/ 258، 259).

قال الترمذي: حديث أبي هريرة حديث حسن صحيح.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি না আমি মু'মিনদের জন্য কষ্টকর মনে করতাম, তবে আমি তাদেরকে ইশার সালাত বিলম্বিত করার এবং প্রত্যেক সালাতের জন্য মিসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1789)


1789 - عن جابر بن عبد الله قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم على أصحابه ذات ليلة وهم ينتظرون العِشَاء فقال:"صَلَّى الناس ورَقَدوا، وأنتم تنتظرونها، أما إنكم في صلاةٍ ما انتظرتُموها" ثم قال:"لولا ضَعْفُ الضعيفٍ، وكِبرُ الكبير، لأخَّرتُ هذه الصلاة إلى شطر اللَّيلِ".

صحيح: أخرجه أبو يعلى (2/ 367) (1935 تحقيق الأثري)، قال: حدثنا أبو خيثمة، حدثنا محمد
ابن حازم (وهو أبو معاوية الضرير)، حدثنا داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن جابر فذكر مثله.

ومن طريق أبي يعلى - أخرجه ابن حبان في صحيحه (1529) مثله.

وتابعه ابن أبي شيبة (1/ 402) وسعدان بن نصر عند البيهقي (1/ 375) فرويا عن أبي معاوية به مثله.

وله طريق آخر عند أحمد (14949) عن أبي الجَوَّاب، حدثنا عمَّار بن رُزيق، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: جَهَّز رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جيشًا ليلةً حتى ذهب نصفُ الليلِ، أو بلغ ذلك، ثم خرج فقال:"قد صلَّى الناس ورقدوا، وأنتم تنتظرون هذه الصلاة، أما إنكم لن تزالوا في صلاةٍ ما انتظرتموها". وهي متابعة قوية ورجال الإسنادين ثقات.

وأبو الجوَّاب هو: الأحوص بن جوَّاب - بفتح الجيم، وتشديد الواو - الضَّبِّي - وثَّقه ابن معين، وأخرج له مسلم، قال أبو حاتم: صدوق، وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق ربما وهم".

وأبو سفيان هو: طلحة بن نافع الواسطي وهو:"صدوق".

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 312):"رواه أحمد وأبو يعلى، وإسناد أبي يعلى رجاله رجال الصحيح".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের কাছে বের হলেন যখন তারা ইশার (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে, আর তোমরা এর (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করছ। শোনো, তোমরা যতক্ষণ এর জন্য অপেক্ষা করছো, ততক্ষণ তোমরা সালাতের মধ্যেই আছো।" তারপর তিনি বললেন: "যদি দুর্বল ব্যক্তির দুর্বলতা এবং বয়স্ক লোকের বার্ধক্য না থাকত, তাহলে আমি এই সালাতকে অর্ধ রাত পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1790)


1790 - عن عائشة قالت: سُئِل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن وقت العشاء فقال:"إذا ملأ الليلُ بطن كُلِّ وادٍ".

حسن: أخرجه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (1/ 434) (567) عن علي بن سعيد الرازي، ثنا قطن بن نُسير الذِّراع، ثنا جعفر بن سليمان الضبعي، عن محمد بن عمرو، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن، قطن بن نُسير الغُبري الذراع وجعفر بن سليمان ومحمد بن عمرو - الليثي كلهم صدوق، لا يرتقون إلى درجة الثقة، وإن كان كلهم من رجال مسلم. ولذا قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 313): رجاله رجال الصحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইশার নামাযের সময় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "যখন রাত প্রতিটি উপত্যকার পেট (গভীরতা) পূর্ণ করে দেবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1791)


1791 - عن ابن مسعود قال: أخَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ العشاءِ ثم خرج إلى المسجد، فإذا الناس ينتظرون الصلاة قال:"أما إنه ليس من أهل هذه الأديان أحدٌ يذْكر الله هذه الساعة غيرَكم". قال: وأنزل هؤلاء الآيات: {لَيْسُوا سَوَاءً مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ} حتى بلغ: {وَمَا يَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ يُكْفَرُوهُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ} [آل عمران: 113 - 115].

حسن: أخرجه أحمد (3760)، وأبو يعلى (5/ 139) (5285 الأثري)، والبزار"كشف الأستار" (1/ 190)، والحارث بن أبي أسامة: في"بغية الباحث" (1/ 255) (132) كلهم من طريق عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه الطبراني في"الكبير" (10209) من طريق الأعمش، عن زِرّ به.
وإسناده حسن لأجل عاصم وهو: ابن أبي النجود.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 312) رواه أحمد وأبو يعلى والبزار والطبراني في"الكبير" ورجال أحمد ثقات، ليس فيهم غير عاصم بن أبي النجود، وهو مختلف في الاحتجاج به، وفي إسناد الطبراني: عبيد الله بن زَخْر وهو ضعيف". انتهى.

وأورده أيضًا البوصيري في"إتحاف الخيرة" (2/ 69 - 70) وعزاه أيضًا إلى أبي بكر بن أبي شيبة، والنسائي في"الكبري"، وابن حبان في"صحيحه" كلهم من طرق عن عاصم (بن أبي النجود).

وقوله:"أهل الأديان" المراد بهم اليهود والنصارى في المدينة وما يجاورها، لا على الأرض إطلاقًا، لأن ذكر الله تعالى لا تتوقف في أي ساعة من ساعات الليل والنهار.

وخلاصة القول في وقت صلاة العشاء:

قال الحافظ الزيلعي: تكلم الطحاوي في"شرح معاني الآثار" (1/ 158) ههنا كلامًا حسنًا ملخصه أنه قال:"يظهر من مجموع الأحاديث أن آخر وقت العشاء حين يطلع الفجْرُ، وذلك أن ابن عباس وأبا موسى والخضرمي رووا أن النبي صلى الله عليه وسلم في أخَّرها إلى ثلث اللَّيلِ، وروى أبو هريرة وأنس أنه أخرها حتى انتصف الليلُ، وروى ابن عمر أنه أخَّرها حتى ذهب ثلث الليل، وروَتْ عائشهُ أنه أعْتَمَ بها حتى ذهب عامهُ اللَّيلِ، وكل هذه الروايات في"الصحيح" قال: فثبت بهذا أنَّ اللَّيلَ كله وقت لها، ولكنَّه على أوقات ثلاثة: فإما من حين يدخلُ وقْتُها إلى أن يَمْضِيَ ثلثُ اللَّيلِ فأفضلُ وقتٍ صُلِّيَت فيه، وأما بعد ذلك إلى أن يَتم نصفُ اللَّيل في الفضل دون ذلك، وأما بعد نصفِ اللَّيلِ فدونه، ثم ساق بسنده عن نافع بن جبير، قال: كتب عمر بن الخطاب إلى أبي موسى: وصَلِّ العشاء أيَّ اللَّيلِ شئتَ، ولا تَغْفَلْها. ولمسلم في قصة التعريس عن أبي قتادة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في النوم تفريط، إنما التفريط أن يؤخر صلاةً حتى يدخلُ وَقْتُ الأُخْرى، فدلَّ على بقاء الأولى إلى أن يدخل وقتُ الأُخرى، وهو طلوع الفجر الثاني".

انظر:"نصب الراية" (1/ 234 - 235).

هذا كلام حسن ولكن في بعضه نظر، وقد سبق أن بَيَّنتُ معنى حديث عائشة:"ذهب عامة الليل" بأنه كثير منه … إلخ




আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত বিলম্বিত করলেন। এরপর তিনি মাসজিদে আসলেন। তখন দেখলেন যে লোকজন সালাতের জন্য অপেক্ষা করছে। তিনি বললেন, “জেনে রেখো! এই সকল ধর্মাবলম্বীদের মধ্যে এমন কেউ নেই যারা এই সময়ে তোমাদের ব্যতীত আল্লাহকে স্মরণ করে।” তিনি বলেন, তখন এই আয়াতসমূহ নাযিল হয়: {আহলে কিতাবদের সকলে সমান নয়…} [সূরা আলে ইমরান: ১১৩] থেকে এই পর্যন্ত: {আর তারা যে সৎকর্মই করুক না কেন, তাদের প্রতিদান অস্বীকার করা হবে না। আর আল্লাহ মুত্তাকীদের সম্পর্কে সম্যক অবগত।} [সূরা আলে ইমরান: ১১৫]।









আল-জামি` আল-কামিল (1792)


1792 - عن عبد الله بن عمر قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تَغْلِبَنَّكُم الأَعْرَابُ على اسم صلاتِكم، أَلا إِنَّها العِشَاءُ، وهم يُعْتِمُونَ بالإِبِل".

وفي رواية:"فإنها في كتاب الله العِشاءُ، وإنَّها تُعْتِمُ بحلابِ الإِبل".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (644) من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي لبيد، عن أبي
سلمة، عن عبد الله بن عمر فذكره.

قوله:"يُعتمون" - معناه يُؤخرون حلب الإبل، ويسمون الصلاة باسم وقت الحلاب، ويقال: فلان عالم القِرى، إذا كان نزل به الأضياف لم يُعجل قراهم، قاله الخطابي في شرح أبي داود (5/ 261).

وقوله:"اسمها في كتاب الله العِشاء"، إشارة إلى قوله تعالى: {وَمِنْ بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ} [سورة النور: 58].

ولكن جاء في الأحاديث الصحيحة تسميتُها بالعَتَمَةِ كحديث:"لو يعلمون ما في الصبح والعتمة لأتوهما ولو حبوًا".

وفي حديث عبد الله بن عمر تسمية العشاء العتمة وهو الحديث الآتي.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের সালাতের নামের উপর বেদুঈনরা যেন তোমাদেরকে জয়ী না করে। সাবধান! নিশ্চয়ই তা হলো 'আল-ইশা' (রাতের সালাত), আর তারা উটের কারণে ই'তিম (বিলম্ব) করে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "নিশ্চয়ই তা আল্লাহর কিতাবে 'আল-ইশা', আর এটি উট দোহনের কারণে ই'তিম (বিলম্বিত) হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1793)


1793 - عن عبد الله بن عمر قال: صلَّى لنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليلةً الصلاةَ العِشاء - وهي التي يدعو الناسُ العتمةَ - ثم انصرف، فأقبل علينا فقال:"أرأيتُم ليلتكم هذه، فإن رأس مائة سنةٍ منها لا يبقى ممن هو على ظهر الأرض أحدٌ".

متفق عليه: رواه البخاري في مواقيت الصلاة (564) ومسلم في فضائل الصحابة (2537) كلاهما من طريق الزهري، قال سالم: أخبرني عبد الله فذكره، واللفظ للبخاري.

والجمع بين هذه الأحاديث من وجوه:

منها: بيان جواز تسمية العتمة للعشاء، فالنهي للتنزيه لا للتحريم.

ومنها: مخاطبة الناس بما يعرفون.

ومنها: تعليمهم بترك ما لا يناسب.

ومنها: لئلا يتوهموا أنها المغرب، لأن العشاء عندهم كانت تطلق على المغرب.

ومنها: لعل الرواة هم الذين تصرفوا في تسمية العتمة للعشاء.

والخلاصة: أن تسمية الإسلام لصلاة العشاء - هي العشاء، فلا يستحسن العدول عنها إلى العتمة، لئلا تغلب السنةُ بالجاهلية، مع ذلك لا يحرم استعمالها بدليل استعمال النبي صلى الله عليه وسلم واستعمال الصحابة بعده.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে এক রাতে 'ঈশার সালাত আদায় করলেন—যা মানুষ 'আতামাহ' বলে ডাকে—এরপর তিনি ফিরলেন এবং আমাদের দিকে মুখ করে বললেন: "তোমরা কি তোমাদের এই রাতটিকে দেখতে পাচ্ছো? কেননা এর (এই রাতের) একশ বছর পূর্ণ হওয়ার পর, যারা বর্তমানে পৃথিবীর বুকে রয়েছে, তাদের একজনও অবশিষ্ট থাকবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1794)


1794 - عن عبد الله بن مغفل المزني، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تَغْلِبَنَّكُم الأعْرابُ على اسمِ صلاتِكم المغرب" قال: وتقول الأعرابُ: هي العِشاءُ.

صحيح: رواه البخاري في المواقيت (563) عن أبي معمر، (وهو عبد الله بن عمرو) قال: حدثنا عبد الوارث، عن الحسين، قال: حدثنا عبد الله بن بُريدة، قال: حدثنا عبد الله المزني فذكر الحديث.

والحسين هو: المعلم، وعبد الله المزني هو: عبد الله بن مغفْل.
وكره اسم العشاء عليها لئلا يقع الالتباس بالصلاة الأخرى، ولكن لو قُيد بأن يقال: العشاء الأولى فلا يكره كما ثبت في الصحيح: العشاء الآخرة من قول أنس:"أخَّر النبي صلى الله عليه وسلم العِشاء الآخرة" البخاري"الفتح" (2/ 44).




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের সালাত মাগরিবের নামের ব্যাপারে বেদুঈনরা যেন তোমাদের উপর প্রাধান্য লাভ করতে না পারে।" তিনি বলেন, বেদুঈনরা এটিকে ‘ঈশা’ বলে।









আল-জামি` আল-কামিল (1795)


1795 - عن أبي برزة قال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يكره النوم قبل العشاء والحديث بعدها".

متفق عليه: وهو جزء من حديث أبي برزة السابق في باب ما جاء في توقيت الصلوات.




আবূ বারযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার পূর্বে ঘুমানো এবং তার (এশার) পরে কথাবার্তা বলা অপছন্দ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1796)


1796 - عن أنس قال: نظرنا النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة حتى كان شطرُ اللَّيلِ يَبْلُغُه، فجاء فصَلَّى لنا، ثم خَطَبَنا فقال:"ألا إن الناس قد صَلُّوا ثم رقدوا، وإنكم لم تزالوا في صلاةٍ ما انتظرتم الصلاة".

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (600) من طريق قُرة بن خالد، قال: انتظرنا الحسنَ، وراثَ علينا، حتى قَربنا من وقت قيامه، فجاء فقال: دعانا جيرانُنا هؤلاء - ثم قال: قال أنس فذكر الحديث.

قال الحسن:"وإن القومَ لا يزالونَ بخير ما انتظروا الخيرَ".

قال قُرَّة: هو من حديث أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، انتهى

قول قُرة: هو حديث أنس - أي الكلام الأخير الذي لم يرفعه الحسنُ وهو قوله:"إن القوم لا يزالون بخير …" فأراد قُرة أن يؤكد للناس أنه مرفوع أيضًا.

وقوله: وراث - بمعنى أبطأ - والواو للحال.

ورواه مسلم في المساجد (640) من أوجه أخرى نحوه. انظر: باب ما جاء في تأخير العشاء.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: এক রাতে আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অপেক্ষা করছিলাম, এমনকি প্রায় অর্ধেক রাত হয়ে গেল। অতঃপর তিনি এলেন এবং আমাদের সাথে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে, কিন্তু তোমরা যতক্ষণ সালাতের অপেক্ষায় থাকো, ততক্ষণ তোমরা সালাতের মধ্যেই থাকো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1797)


1797 - عن عبد الله بن عمر قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم في صلاةَ العِشَاء في آخر حياته، فلما سلَّم قام النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أَرأيتُم ليلتكم هذه، فإنَّ رأسَ مائةِ سنةٍ لا يَبْقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض أحدٌ" فوَهِلَ الناسُ في مقالة رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى ما يتحدثون من هذه الأحاديث عن مائة سنة. وإنما قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يبقى ممن هو اليوم على ظهر الأرض" يريد بذلك أنَّها تخرِمُ ذلك القرنَ.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (601)، ومسلم في فضائل الصحابة (2537) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني سالم بن عبد الله وأبو بكر بن سليمان، أن عبد الله بن عمر قال، فذكر الحديث، والبخاري رواه أيضًا في كتاب العلم، باب السمر في العلم (116).

وسيعاد الحديث في فضائل الصحابة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবনের শেষদিকে ইশার সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন: "তোমরা কি তোমাদের আজকের এই রাতটি দেখছো? কেননা, এই রাতের একশ বছর পূর্ণ হলে বর্তমানে পৃথিবীর বুকে যারা আছে, তাদের কেউই অবশিষ্ট থাকবে না।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথাকে কেন্দ্র করে লোকজন একশ বছর (আয়ু) সম্পর্কে আলোচনায় ভুল বুঝেছিল। অথচ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুধুমাত্র এ কথাই বলেছিলেন, "বর্তমানে যারা পৃথিবীর বুকে আছে, তাদের কেউই অবশিষ্ট থাকবে না।" এর দ্বারা তিনি মূলত সেই প্রজন্মটির সমাপ্তির উদ্দেশ্য করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1798)


1798 - عن عمر بن الخطاب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسْمُرُ مع أبي بكر في الأمر من أمور المسلمين، وأنا معهما.

صحيح: رواه الترمذي (169) قال: حدثنا أحمد بن منيع، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عمر بن الخطاب فذكر الحديث.

قال الترمذي: حديث حسن.

قلت: بل هو حديث صحيح، ورجاله ثقات.

وللحديث إسناد آخر كما قال الترمذي:"وقد روي هذا الحديثَ الحسنُ بن عبيد الله، عن إبراهيم، عن علقمة، عن رجل من جُعفيَ يقال له"قيس" أو"ابن قيس" عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هذا الحديث في قصة طويلة". انتهى.

قلت: في قول الترمذي إشارة إلى أن علقمة لم يسمع من عمر بن الخطاب، أو أنه روي علي وجهين: مرة بدون واسطة، وأخرى بالواسطة، وهذا هو الصحيح، فقد ثبت لقاء علقمة،"وهو: ابن قيس النخعي" من عائشة وعمر بن الخطاب.

وأما القصة التي يشير إليها الترمذي فهي ما رواه أحمد (175) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة قال: جاء رجل إلى عمر وهو بعرفة.

قال أبو معاوية: وحدثنا الأعمش، عن خيثمة، عن قيس بن مروان أنه أتى عمر فذكر القصة.

فساق أبو معاوية إسنادين في أحدهما: علقمة أنه حضر القصة في عرفة.

وأما حديث الحسن بن عبيد الله فأخرجه أيضًا الإمام أحمد (265) عن عفان، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا الحسن بن عبيد الله، حدثنا إبراهيم، عن علقمة، عن القَرْثع، عن قيس، أو ابن قيس - رجل من جُعْفِيّ - عن عمر بن الخطاب فذكر القصة إلا أنه لم يذكر قصة السمر.

ويظهر منه أنه وقع خطأ في نسخة الترمذي فإن علقمة لا يروي عن رجل يقال له"قيس أو ابن قيس" كما قال الترمذي، وإنما يروي عن القرثع - الضبي - عن قيس، أو ابن قيس.

وأما القصة فانظر في فضائل عبد الله بن مسعود.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের কোনো একটি গুরুত্বপূর্ণ বিষয় নিয়ে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে রাত্রি জেগে আলোচনা করতেন, আর আমিও তাঁদের দুজনের সাথে ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1799)


1799 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك ركعةً من الصلاة فقد أدرك الصلاة".

متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (15) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث. وعن مالك رواه البخاري في المواقيت (580)، ومسلم في المساجد (607).

وفي رواية عند مسلم:"من أدركَ ركعةً من الصَلاة مع الإمام فقد أدرك ركعة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের এক রাকাত পেল, সে সালাত পেল।"

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে ব্যক্তি ইমামের সাথে সালাতের এক রাকাত পেল, সে (সেই) রাকাতটি পেল।"









আল-জামি` আল-কামিল (1800)


1800 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك من الصُّبْحِ ركعةً قبل أن تطلُعَ
الشمسُ فقد أدرك الصُّبْحَ، ومن أدرك ركعةً من العَصْرِ قبل أن تَغْرُبَ الشمسُ فقد أدرك العَصْرَ".

متفق عليه: رواه مالك في وقت الصلاة (5) عن زيد بن أسْلَم، عن عطاء بن يسار وبُسْر بن سَعيد والأعرج، كلهم يُحَدِّثون عن أبي هريرة.

وعن مالك رواه البخاري في المواقيت (579) ومسلم في المساجد (608) ورواه أيضًا مسلم (608) من وجه آخر عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، عن أبي هريرة نحوه.

ورواه البخاري أيضًا (556) من وجه آخر عن أبي نعيم، قال: حدثنا شيان، عن يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة ولفظه:"إذا أدرك أحدكم سجدةً من صلاة العَصْرِ قبل أن تغرُبَ الشمْسُ فَلْيُتِمَّ صلاتَه؟ وإذا أدرك سجدةً من صلاة الصُّبْح قبل أن تَطْلُعَ الشمسُ فَلْيُتِمَّ صلاته".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সূর্যোদয়ের পূর্বে ফজরের এক রাকাত পায়, সে ফজর (এর সালাত) পেল। আর যে ব্যক্তি সূর্যাস্তের পূর্বে আসরের এক রাকাত পায়, সে আসর (এর সালাত) পেল।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "যদি তোমাদের কেউ সূর্যাস্তের পূর্বে আসরের সালাতের একটি সিজদা পায়, তবে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে। আর যদি সে সূর্যোদয়ের পূর্বে ফজরের সালাতের একটি সিজদা পায়, তবে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1801)


1801 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك من العَصْر سَجْدَةً قبل أن تغربَ الشمسُ، أو من الصُبْحِ قبل أن تطلعَ فقد أدركها" والسجدةُ إنما هي الركعة.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (609) من طرق عن يونس، عن ابن شهاب، أنَّ عروة بن الزبير حدَّثه عن عائشة فذكرت مثله.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সূর্যাস্তের পূর্বে আসরের এক সিজদা পেল, অথবা সূর্যোদয়ের পূর্বে ফজরের এক সিজদা পেল, সে তা (সালাত) লাভ করল।" আর সিজদা বলতে এখানে (আসলে) এক রাকাত বোঝানো হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1802)


1802 - عن * *




১৮০২ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (1803)


1803 - عن ابن عمر أنه كان يقول: كان المسلمون حين قدموا المدينة يجتمعون فيتحيَّنون الصلاة ليس يُنادَي لها، فتكلموا يومًا في ذلك، فقال بعضُهم: اتخذوا ناقوسًا مثل ناقوس النصارى، وقال بعضهم: بل بوقًا مثل قرن اليهود. فقال عمر: أَوَلا تبعثون رجلًا ينادي بالصلاة؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا بلال قُم فنادِ بالصلاة".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (604) واللفظ له، ومسلم في الصلاة (377) كلاهما من طريق عبد الرزاق وهو في مصنفه (1/ 456) قال: أخبرنا ابن جُريج، قال: أخبرني نافع، أن عبد الله بن عمر كان يقول فذكر الحديث، ولم يذكر مسلم"بوقًا" بل قال:"قرْنًا مثل قرْن اليهود".

وقوله: قم يا بلال فناد بالصلاة - أي الصلاة الصلاة، وليس الأذان المعهود الذي رآه عبد الله بن زيد.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: মুসলিমরা যখন মদিনায় আগমন করেন, তখন তারা একত্রিত হতেন এবং নামাজের জন্য অপেক্ষা করতেন। কিন্তু নামাজের জন্য কোনো আহ্বান করা হতো না। একদিন তারা এই বিষয়ে আলোচনা করলেন। তাদের কেউ কেউ বললেন: খ্রিস্টানদের ঘণ্টার মতো একটি ঘণ্টা তৈরি করুন। আর কেউ কেউ বললেন: বরং ইহুদিদের শিঙ্গার মতো একটি শিঙ্গা তৈরি করুন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কি এমন একজন লোককে পাঠাবে না, যে নামাজের জন্য আহ্বান করবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে বিলাল! দাঁড়াও এবং সালাতের জন্য আহ্বান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1804)


1804 - عن أنس بن مالك قال: ذكروا النارَ والناقوس، فذكروا اليهودَ والنصارىَ، فأمر بلالا أن يشفع الأذان، وأن يُوتر الإقامة.

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (603)، ومسلم في الصلاة (378) كلاهما من طريق عبد الوهاب الثقفي، حدثنا خالد الحذَّاء، عن أبي قلابة، عن أنس فذكره واللفظ للبخاري، وفي لفظ المسلم: وذكروا أن يعلموا وقت الصلاة بشيء يعرفونه، فذكروا أن يُنَوِّروا نارًا، أو يضربوا ناقوسًا. فأُمر بلال أن يشفع الأذان ويُوتر الإقامة.

وفي رواية:"أن يورُوا نارًا".

وقوله:"أن يوروا نارًا" أي يوقدوا ويشعلوا.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁরা আগুন (জ্বালানো) ও নাকুস (ঘণ্টা) নিয়ে আলোচনা করলেন। তখন তাঁরা ইহুদি ও খ্রিস্টানদের কথা স্মরণ করলেন। অতঃপর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেলালকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি আযানকে জোড় (শব্দগুলো দুইবার করে) এবং ইকামাতকে বেজোড় (শব্দগুলো একবার করে) করেন।

আর মুসলিমের বর্ণনায় আছে: তাঁরা আলোচনা করলেন যে, এমন কিছু দ্বারা সালাতের সময় ঘোষণা করা হোক যা দ্বারা সবাই অবগত হতে পারে। তাই তাঁরা আগুন প্রজ্বলিত করা কিংবা ঘণ্টা বাজানোর কথা আলোচনা করলেন। অতঃপর বেলালকে আযান জোড় করতে এবং ইকামাত বেজোড় করতে আদেশ দেওয়া হলো।

অপর এক বর্ণনায় আছে, "যেন তারা আগুন প্রজ্জ্বলিত করে"।

আর "أن يورُوا نارًا" (তারা আগুন প্রজ্জ্বলিত করুক) এর অর্থ হলো: তারা আগুন জ্বালাক ও প্রজ্জ্বলিত করুক।









আল-জামি` আল-কামিল (1805)


1805 - عن أبي محذُورة أن النبي صلى الله عليه وسلم علَّمه هذا الأذان:"الله أكبر الله أكبر، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن محمدًا رسول الله، أشهد أنَّ محمدًا رسولُ الله" ثم يعود فيقول:"أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن محمدًا رسول الله، أشهد أن محمدًا رسول الله. حيَّ على الصلاة (مرتين) حيَّ على الفلاح (مرتين) زاد إسحاق: الله أكبر الله أكبر، لا إله إلا الله".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (379) عن أبي غسان المِسْمَعي مالك بن عبد الواحد وإسحاق بن
إبراهيم، قال أبو غسَّان: حدثنا مُعاذ: وقال إسحاق: أخبرنا معاذ بن هشام صاحب الاستوائي، وحدثني أبي، عن عامر الأحول، عن مكحول، عن عبد الله بن مُحَيرِيز، عن أبي محذُورة فذكر الحديث.

قلت: اختلف في أذان أبي محذورة بين تثنية التكبير في أول الأذان وتربيعه.

فأما التثنية فكما ترى رواه مسلم - هكذا في النسخ الموجودة، ولكن قال القاضي عياض: ووقع في بعض طرق الفارسي في صحيح مسلم"أربع مرات" قاله النووي في شرح مسلمه.

فالظاهر أنه وقع خطأ في النقل، وإلا فجمعٌ من الرواة رووا عن معاذ بن هشام وذكروا فيه التربيع، منهم: ما أخرجه أبو عوانة في مسنده عن علي بن المديني، والبيهقي (1/ 391) عن عبد الله بن سعد، والنسائي (2/ 405) من طريق إسحاق بن إبراهيم (وهو ابن راهويه شيخ مسلم) فهؤلاء جميعًا رووا عن معاذ بن هشام بالتربيع.

قال ابن القطان: إن الصحيح عن عامر المذكور في هذا الحديث إنما هو التربيع، هكذا رواه عنه جماعة منهم: عفان وسعيد بن عامر وحجاج، وبذلك يصح كون الأذان تسع عشرة كلمة كما ورد. انتهى. انظر:"نصب الراية" (1/ 258).

وكذلك أخرجه أبو داود (502) عن همام (ابن يحيى): ثنا عامر الأحول، حدثني مكحول، أن ابن مُحيريز حدَّثه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم علَّمه الأذان تسع عشرة كلمة. والإقامة سبع عشرة كلمة فذكر الأذان بالتفصيل ورواه أيضًا النسائي (630) عن همام بن يحيى به إلا أنه اكتفى بقوله: الأذان تسع عشرة كلمة، والإقامة سبع عشرة كلمة، ثم عدَّها أبو محذورة تسع عشرة كلمة وسبع عشرة.

قال ابن عبد البر:"اختلفت الروايات عن أبي محذورة، إذ علَّمه رسول الله صلى الله عليه وسلم الأذان بمكة عام حنين، فروي عنه فيه تربيع التكبير في أوله، وروي عنه فيه تثنيتُه. والتربيع فيه من روايات الثقات الحُفّاظ، وهي زيادة يجب قبولها، والعمل عندهم بمكة في آل أبي محذورة بذلك إلى زماننا، وهو في حديث عبد الله بن زيد في قصة المنام، وبه قال أبو حنيفة والشافعي وأحمد، انظر: نصب الراية (1/ 258).

وأما مالك فذهب إلى تثنية التكبير، ولعل من أدله حديث أبي داود (505) عن نافع بن عمر الجمحي، عن عبد الملك بن أبي محذورة، أخبره عن عبد الله بن مُحيريز الجمحي، عن أبي محذورة، وكذا رواه أيضًا النسائي (629) عن بشر بن معاذ قال: حدثني إبراهيم بن عبد العزيز بن عبد الملك بن أبي محذورة قال: حدثني أبي، عبد العزيز وجدي، عبد الملك، عن أبي محذورة أن النبي صلى الله عليه وسلم أقعده فألقى عليه الأذان حَرْفًا حَرْفًا، قال إبراهيم: هو مثلُ أذاننا هذا.

قلت له: أعِد عليَّ فذكر نحوه وثنى فيه:"الله أكبر".

والظاهر أنه وقع فيه غلط من الرواة فإن الصحيح الثابت عن عبد الملك بن أبي محذورة وعبد الله بن محيريز عن أبي محذورة التربيع، واستمر عليه العمل في مكة في آل أبي محذورة وهي تسع عشرة كلمة، والإقامة سبع عشرة كلمة كما سبق.
وقد ثبت التربيع أيضًا في حديث عبد الله بن زيد.




আবু মাহযূরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে এই আযান শিক্ষা দিয়েছিলেন: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ, আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ।" এরপর তিনি ফিরে এসে বলতেন: "আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ, আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ। হাইয়্যা আলাস সালাহ (দুইবার)। হাইয়্যা আলাল ফালাহ (দুইবার)।" ইসহাক অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (1806)


1806 - عن أبي عمير بن أنس، عن عمومة له من الأنصار، قال: اهتم النبي صلى الله عليه وسلم للصلاة، كيف يجمع الناس لها؟ فقيل له: انصب راية عند حضور الصلاة، فإذا رأوها آذن بعضهم بعضًا، فلم يعجبه ذلك، قال: فذكر له القُنْع - يعني الشَّبُّور - وقال زياد: شبور اليهود، فلم يعجبه ذلك، وقال:"هو من أمر اليهود"، قال: فذكر له الناقوس، فقال:"هو من أمر النصاري" فانصرف عبد الله بن زيد [بن عبد ربه] وهو مهتم لهمّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأرِي الأذان في منامه، قال: فغدا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال: يا رسولَ الله! إني لبين نائم ويقظان إذ أتاني آتٍ فأراني الأذان، قال: وكان عمر بن الخطاب رضي الله عنه، قد رآه قبل ذلك فكتمه عشرين يومًا، قال: ثم أخبر النبي صلى الله عليه وسلم، فقال له:"ما منعك أن تخبرني؟" فقال: سبقني عبد الله بن زيْد، فاستحييت، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا بلالُ! قُمْ فانظر ما يأمرك به عبد الله بن زيْد فافعله" قال: فأذَّن بلال، قال أبو بشر: فأخبرني أبو عمير أن الأنصار تزعم أن عبد الله بن زيد لولا أنه كان يومئذ مريضًا لجعله رسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذنًا.

صحيح: رواه أبو داود (498) عن عباد بن موسى الختّلي وزياد بن أيوب، وحديث عباد أتم، قالا: حدثنا هُشَيم، عن أبي بشْر، قال زياد: أخبرنا أبو بشر، عن أبي عمير بن أنس فذكره.

إسناده صحيح، ورجاله ثقات غير أبي عمير بن أنس بن مالك فقد تكلم فيه بعض أهل العلم إلا أنه ثقة أيضًا قال فيه ابن سعد: كان ثقة قليل الحديث. وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال الحافظ في"التقريب":"ثقة"، وصحَّح هذا الإسناد في"الفتح" (2/ 81) وقال: قال أبو عمر بن عبد البر: روي قصة عبد الله بن زيد جماعة من الصحابة بألفاظ مختلفة، ومعان متقاربة، وهي من وجوه حسان وهذا أحسنها".




আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের (নামাজের) জন্য চিন্তিত ছিলেন যে, কিভাবে লোকদেরকে এর জন্য একত্রিত করা যায়? তখন তাঁকে বলা হলো: সালাতের সময় হলে একটি পতাকা উত্তোলন করুন। যখন তারা তা দেখবে, তখন একে অপরকে জানিয়ে দেবে। তিনি এটি পছন্দ করলেন না।

বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তাঁর কাছে শিঙার (কুন‘) কথা উল্লেখ করা হলো—অর্থাৎ শিঙ্গাধ্বনি (শাব্বুর)। যিয়াদ বলেছেন: এটি ছিল ইহুদিদের শিঙা। কিন্তু তিনি এটিও পছন্দ করলেন না এবং বললেন: "এটি ইহুদিদের রীতি।" বর্ণনাকারী বললেন: এরপর তাঁর কাছে নাকূস (ঘন্টা) এর কথা উল্লেখ করা হলো। তিনি বললেন: "এটি নাসারাদের (খ্রিস্টানদের) রীতি।"

এরপর আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ ইবনে আব্দি রাব্বিহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই চিন্তায় নিজেও চিন্তিত হয়ে ফিরে গেলেন। অতঃপর তিনি স্বপ্নে আযান দেখতে পেলেন। বর্ণনাকারী বলেন: তিনি দ্রুত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং তাঁকে জানালেন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি ঘুমন্ত ও জাগ্রত অবস্থার মাঝামাঝি ছিলাম, তখন আমার কাছে একজন আগন্তুক আসলেন এবং আমাকে আযান দেখালেন।"

বর্ণনাকারী বলেন: আর এর পূর্বে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও তা দেখেছিলেন, কিন্তু তিনি তা বিশ দিন পর্যন্ত গোপন রেখেছিলেন। তিনি (উমার) বলেন: এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানালেন। তখন তিনি (নবী) তাঁকে বললেন: "আমাকে জানাতে তোমাকে কিসে বাধা দিল?" তিনি (উমার) বললেন: আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ আমার আগে জানিয়ে ফেলেছেন, তাই আমি লজ্জিত হয়েছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে বিলাল! ওঠো এবং আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ তোমাকে যা নির্দেশ দেয়, তা দেখে সেই অনুযায়ী কাজ করো।" বর্ণনাকারী বলেন: এরপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আযান দিলেন।

আবূ বিশর বলেন: আবূ উমাইর আমাকে জানিয়েছেন যে, আনসারগণ ধারণা করেন, আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেদিন অসুস্থ না থাকলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তাঁকে মুয়াযযিন বানাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1807)


1807 - عن عبد الله بن زيد: لما أصبحنا أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبرته بالرؤيا فقال:"إن هذه الرؤيا حق، فقم مع بلال، فإنه أندي، أو أمدَّ - صوتًا منك، فألق عليه ما قيل لك، فينادي بذلك" قال: ففعلت، فلما سمع عمر بن الخطاب نداء بلال بالصلاة خرج إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يجر رداءه وهو يقول: يا رسول الله! والذي بعثك بالحق! لقد رأيت مثل الذي قال: فقال رسول الله:"فلله الحمد".

حسن: بهذا السياق رواه ابن خزيمة (363) من طريق سعيد بن يحيى بن سعيد الأموي، عن أبيه، نا محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث، عن محمد بن عبد الله بن زيد، عن أبيه فذكر الحديث.
ومن طريق سعيد بن يحيى: أخرجه الترمذي (189) مثله، وأخرجه أبو داود (899) وابن ماجه (706) كلاهما من طريق ابن إسحاق قال: حدثنا محمد بن إبراهيم التيمي فذكرا الأذان بكامل ألفاظه.

وفيه تصريح ابن إسحاق بالتحديث فانتفت عنه تهمة التدليس.

وسياقهما أيضًا يدل على أن أذانه كان بعد حديث ابن عمر، وإليكم الآن ألفاظ الأذان:

"الله أكبر الله أكبر، الله أكبر الله أكبر، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن محمدًا رسولُ الله، أشهد أن محمدًا رسول الله، حيَّ على الصلاة حيَّ على الصلاة، حيَّ على الفلاح حيَّ على الفلاح، الله أكبر الله أكبر، لا إله إلا الله".

قال: وتقول إذا أقمت الصلاة:"الله أكبر الله أكبر، أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن محمدًا رسول الله، حيَّ على الصلاة حيَّ على الفلاح، قد قامتِ الصلاةُ، قد قامتِ الصلاةُ، الله أكبر الله أكبر، لا إله إلا الله".

قال الخطابي: روي هذا الحديث والقصة بأسانيد مختلفة وهذا الإسناد أصَحُّها، وفيها أنه ثنَّى الأذان، وأفرد الإقامة.

وقد نقل البيهقي في"السنن الكبرى" (1/ 391) تصحيح البخاري له.

قال ابن خزيمة: سمعت محمد بن يحيى يقول: ليس في أخبار عبد الله بن زيد في قصة الأذان خبر أصح من هذا، لأن محمد بن عبد الله بن زيد سمعه من أبيه، وعبد الرحمن بن أبي ليلى لم يسمعه من عبد الله بن زيد". صحيح ابن خزيمة (1/ 193).

والمقصود من حديث ابن أبي ليلى هو: ما رواه ابن أبي ليلى، عن عمرو بن مرة، عن عبد الرحمن ابن أبي ليلى، عن عبد الله بن زيد قال: كان أذان رسول الله صلى الله عليه وسلم شفعًا شفعًا في الأذان والإقامة.

قال الدارقطني (1/ 241) بعد أن رواه من طريق عقبة بن خالد، عن ابن أبي ليلى:"ابن أبي ليلى هو: القاضي محمد بن عبد الرحمن ضعيف الحديث سيء الحفظ، وابن أبي ليلى [يعني عبد الرحمن ابن أبي ليلى] لا يثبتُ سماعه من عبد الله بن زيد، وقال الأعمش والمسعودي عن عمرو بن مرة، عن ابن أبي ليلى، عن معاذ بن جبل ولا يثبت، والصواب ما رواه الثوري وشعبة، عن عمرو بن مرة وحسين بن عبد الرحمن، عن ابن أبي ليلى مرسلا، وحديث ابن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن محمد بن عبد الله بن زيد، عن أبيه متصل، وهو خلاف ما رواه الكوفيون. انتهى.

وقال محمد بن يحيى الذهلي: ابن أبي ليلى لم يدرك ابن زيد قال ابن خزيمة: فهذا خبر العراقيين الذين احتجوا به عن عبد الله بن زيد في تثنية الأذان والإقامة، وفي أسانيدهم من التخليط ما بينتُه، وعبد الرحمن بن أبي ليلى لم يسمع من معاذ بن جبل، ولا من عبد الله بن زيد بن عبد ربه صاحب الأذان، فغير جائز أن يحتج بخبر غير ثابت على أخبار ثابتة" صحيح ابن خزيمة (1/ 200).

وقال البيهقي:"والحديث مع الاختلاف في إسناده مرسل، لأن عبد الرحمن بن أبي ليلى لم
يدرك معاذًا ولا عبد الله بن زيد، ولم يُسمِّ من حدَّثه عنهما، ولا عن أحدهما: ثم نقل كلام ابن خزيمة كما ذكرته، ثم قال: وقد رُوي في هذا الباب أخبار من أوجه أخرى كلها ضعيفة، وبيَّنت ضعفَها في الخلافيات، وأمثل إسناد روي في تثنية الإقامة حديث عبد الرحمن بن أبي ليلى، وهو إن صَحّ فكل أذان روي ثنائية فهو بعد رؤيا عبد الله بن زيد، فيكون أولى مما روي في رؤياه مع الاختلاف في كيفية رؤياه في الإقامة. فالمدنيون يروونها مفردة، والكوفيون يروونها مَثنى مَثنى، وإسناد المدنيين موصول، وإسناد الكوفيين مرسل، ومع موصول المدنين مرسل سعيد بن المسيب، وهو أصح التابعين إرسالًا، ثم ما روينا من الأمر بالإفراد بعده، وفعل أهل الحرمين". انتهى. السنن الكبري (1/ 421).

وأما ما رواه ابن أبي شيبة (2131) عن وكيع، حدثنا الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى قال: حدثنا أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أن عبد الله بن زيد الأنصاري جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! رأيت في المنام كأن رجلا قام، وعليه بردان أخضران على جذْمة حائط، فأذّن مَثني، وأقام مَثنى، وقعد قعدة، قال: فسمع ذلك بلال، فقام فأذّن مثنى، وأقام مثنى، وقعد قعدة.

فهو مع قوة إسناده شاذ لما ثبت من خلافه في إفراد الإقامة.




আব্দুল্লাহ ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আমরা সকালে উঠলাম, তখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং আমি তাঁকে আমার দেখা স্বপ্ন সম্পর্কে অবহিত করলাম। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই স্বপ্ন সত্য। তুমি বিলালের সাথে দাঁড়াও। কেননা তার কণ্ঠস্বর তোমার চেয়ে বেশি জোরালো (বা দীর্ঘ)। তোমাকে যা বলা হয়েছে, তা তাকে শুনিয়ে দাও, সে এর মাধ্যমে আযান দেবে।"

তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু যায়দ) বললেন: আমি তাই করলাম। যখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাতের জন্য বিলালের আযান শুনতে পেলেন, তখন তিনি তাঁর চাদর টেনে টেনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে আসছিলেন এবং বলছিলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যিনি আপনাকে সত্যসহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমিও সেই একই স্বপ্ন দেখেছি যা সে (আব্দুল্লাহ ইবনু যায়দ) বলেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সকল প্রশংসা আল্লাহরই জন্য।"

[আযানের শব্দাবলী হলো]: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার (আল্লাহ সর্বশ্রেষ্ঠ, আল্লাহ সর্বশ্রেষ্ঠ)। আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ (আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল)। আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ। হাইয়্যা আলাস সালাহ (সালাতের জন্য এসো)। হাইয়্যা আলাস সালাহ। হাইয়্যা আলাল ফালাহ (কল্যাণের জন্য এসো)। হাইয়্যা আলাল ফালাহ। আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)।"

তিনি বললেন: যখন তুমি ইকামাত দিবে, তখন বলবে: "আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ। হাইয়্যা আলাস সালাহ। হাইয়্যা আলাল ফালাহ। ক্বাদ ক্বামাতিস সালাহ (সালাত শুরু হয়ে গেছে)। ক্বাদ ক্বামাতিস সালাহ। আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।"