হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1768)


1768 - عن كُهيل بن حرملة، عن أبي هريرة أنه أقبل حتى نزل دمشق، فنزل على أبي كلثوم الدوسي، فتذاكروا الصلاة الوسطى فقال:"اختلفنا كما اختلفتم، ونحن بفناء بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وفينا الرجلُ الصالح: أبو هاشم بن عتبة، فقام فدخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان جريئًا عليه، ثم خرج إلينا فأعلمنا أنها صلاةُ العصر".

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (391) عن أحمد بن منصور، ثنا هشام بن عمار، ثنا صدقة - يعني ابن خالد، ثنا خالد بن دهقان، حدثني خالد سبلان، عن كهيل بن حرملة فذكر مثله.

قال البزار:"لا نعلم روى أبو هاشم بن عُتبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا هذا، وحديثًا آخر". انتهى.

وعزاه الهيثمي في"المجمع" (1/ 309) إلى الطبراني في الكبير أيضًا وقال:"رجاله موثقون".

وأخرجه الحاكم (3/ 638) من طريق خالد بن دهقان به مثله. ولم يقل فيه شيئًا. وإسناده حسن لأجل خالد بن دهقان فإنه وثَّقه ابن معين والدارمي.

وأما خالد سبلان فهو: خالد بن عبد الله بن الفرج أبو هاشم مولى بني عبس، ويعرف بخالد سبلان، ولقب بذلك لعظم لحيته، كذا ذكر محقق كتاب الثقات لابن حبان في الحاشية نقلًا من
تاريخ ابن عساكر. راجع:"تهذيب تاريخ ابن عساكر" (5/ 67).

وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 255).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এলেন এবং দামেস্কে অবতরণ করলেন। অতঃপর তিনি আবূ কুলসূম আদ-দাওসীর কাছে অবস্থান করলেন। তারা (সেখানে) সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) নিয়ে আলোচনা করলেন। তিনি (আবু হুরায়রা) বললেন: "আমরাও ঠিক তোমাদের মতো মতভেদ করেছিলাম, যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরের আঙিনায় ছিলাম, আর আমাদের মাঝে নেককার ব্যক্তি আবূ হাশি ইবনে উতবা উপস্থিত ছিলেন। তিনি উঠে দাঁড়িয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন, আর তিনি তাঁর (রাসূলুল্লাহর) সাথে বেশ সাহসী ছিলেন। অতঃপর তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে এসে জানালেন যে, সেটি হলো আসরের সালাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (1769)


1769 - عن أبي يونس مولى عائشة أنه قال: أمرتْني عائشة أن أكتُبَ لها مُصْحفًا وقالت: إذا بلغْتَ هذه الآية فَآذِنِّي: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ} (سورة البقرة: 238)، فلما بلغتُها آذَنتُها، فأمْلَتْ عَليَّ: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ}.

قالت عائشة: سَمعتُها من رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (629) عن يحيى بن يحيى التميمي قال: قرأت على مالك، عن زيد بن أسلم، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي يونس فذكره.

وفي قولها دليل على أن الوُسْطى - أي الفُضْلى - غير العصر، لأن العطف يقتضي المغايرة، وأجيب بوجوه منها: إنها قراءة شاذة، لم تثبت بالتواتر، ويمكن حمل العطف على التفسير ليتفق مع حديث عَليٍّ، أو أن تجعل الواو فيه زائدة، ويؤيده ما رواه أبو عبيد بإسناد صحيح عن أبي بن كعب أنه كان يقرؤها"والصلاة الوُسْطى صلاة العصر".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন যে, তাঁর আযাদকৃত গোলাম আবূ ইউনুসকে তিনি একটি মুসহাফ (কুরআন) লেখার জন্য নির্দেশ দেন। তিনি (আয়িশা) বলেন: “যখন তুমি এই আয়াতটিতে পৌঁছাবে, তখন আমাকে অবহিত করবে: {তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতটির প্রতি যত্নবান হও, আর আল্লাহর জন্য একান্ত অনুগত হয়ে দাঁড়াও} (সূরাহ আল-বাকারাহ: ২৩৮)।” আবূ ইউনুস বলেন, যখন আমি আয়াতটিতে পৌঁছালাম, তখন তাঁকে জানালাম। অতঃপর তিনি আমাকে এই আয়াতটি পাঠ করিয়ে দিলেন: {তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতটির প্রতি যত্নবান হও, আর আল্লাহর জন্য একান্ত অনুগত হয়ে দাঁড়াও}। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি এইটি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1770)


1770 - عن زيد بن ثابت قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الظُّهْر بالهاجِرة ولم يكنْ يُصَلِّي صلاةً أشَدَّ على أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم منها، فنزلت: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى} وقال: إن قبلها صلاتين، وبعدها صلاتين.

صحيح: أخرجه أبو داود (411) قال: حدثنا محمد بن المثنى، حدثني محمد بن جعفر، حدثنا شعبهُ، حدثني عمرو بن أبي حكيم، قال: سمعتُ الزِبرقان يُحدِّثُ عن عروة بن الزبير، عن زيد بن ثابت فذكره.

إسناده صحيح، ورجاله ثقات، عمرو بن أبي حكيم هو: الواسطي أبو سعيد يعرف بابن الكردي، والزبرقان هو: ابن عمرو بن أمية الضمري.

وقوله:"ولم يكن يُصَلِّي صلاة أشد …" ولذا شكوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم حر الرمضاء، وكانوا يصلون على ثيابهم، فنزلت: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ} أي: الفُضْلي، إذا الأوسط هو الأفضل.

وقوله:"وقال: إن قبلها صلاتين وبعدها صلاتين" قيل: القائل هو زيد بن ثابت، قبلها صلاتين - نهارية وليلية، وبعدها صلاتين، نهارية وليلية - فالوُسطى هي الواقعة بين وسط النهار وهي الظهر.

هكذا فهم زيد بن ثابت، أن الوُسطى هي الظُّهر وكان يجيب إذا سئل عن الصلاة الوسطى بأنها
الظهر، رواه ابن أبي شيبة، انظر:"إتحاف الخيرة" (1180)، ولكن هذا الفهم يعارض ما ثبت بالنص بأن الوُسْطى في العَصْرُ.

ومن جعل فاعل (قال) النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقد أبعد.




যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিপ্রহরের তীব্র গরমে যোহরের সালাত আদায় করতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের জন্য এই সালাতের (যোহরের) চেয়ে কঠিনতর অন্য কোনো সালাত ছিল না। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: "তোমরা সালাতসমূহের প্রতি যত্নবান হও এবং বিশেষ করে মধ্যবর্তী সালাতের (আস-সালাতুল উসতা) প্রতি।" তিনি বললেন: এর পূর্বে দু'টি সালাত এবং এর পরে দু'টি সালাত রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1771)


1771 - عن سَلَمَة بن الأَكْوَعِ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي المغربَ إذا غربَتِ الشمْسُ، وتوارتْ بالحجاب.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (561)، ومسلم في المساجد (636) كلاهما من طريق يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع فذكر الحديث، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري:"كنا نُصَلِّي مع النبي صلى الله عليه وسلم المغربَ إذا توارتْ بالحجاب" ولم يذكر"إذا غربت الشمس" اختصارًا لأن قوله:"توارتْ بالحجاب" يدل على غروبها.




সালামাহ ইবনুল আক্‌ওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য ডুবে যেত এবং পর্দা দ্বারা আড়াল হয়ে যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1772)


1772 - عن رافع بن خِدِيج يقول: كنا نُصَلِّي المغْربَ مع النبي صلى الله عليه وسلم فَيَنْصَرِفُ أحدُنا، وإنَّه ليُبْصِرُ مواقَع نبْلهِ.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (559)، ومسلم في المساجد (637) كلاهما عن محمد بن مهران، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا الأوزاعي، حدثني أبو النَّجَاشِيّ هو: عطاء بن صهيب مولى رافع بن خَدِيجٍ قال: سمعت رافعَ بن خَديجٍ فذكر الحديث. ولفظهما سواء وشيخهما واحد.

وقوله:"ليُبصر مواقعِ نبله": معناه أنه يُبكر بها في أول وقتها بمجرد غروب الشمس حتى ننصرفَ ويَرمي أحدُنا النَّبْلَ عن قوسِه، ويُبْصر موقعَه لبقاء الضوء، وفي هذين الحديثين أن المغرب تُعجل عقب غروب الشمس، وهذا مجمع عليه، وأما الأحاديث في تأخير المغرب إلى قريب سقوط الشفق فكانت ليان جواز التأخير، فإنها كانت جواب سائل عن الوقت. أفاده النووي.




রাফি' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করতাম, অতঃপর আমাদের কেউ কেউ (সালাত শেষে) ফিরে যেত, এমতাবস্থায়ও সে তার তীর পতনের স্থান দেখতে পেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1773)


1773 - عن مَرْثَد بن عبد الله قال: لمَّا قدم علينا أبو أيوب غازيًا، وعُقْبة بن عامرٍ يومئذ على مصر، فَأَخَّرَ المغْربَ، فقام إليه أبو أيوب فقال له: ما هذه الصلاة يا عقبة؟ ! فقال: شُغِلْنَا، قال: أما سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تزال أمَّتي بخيرٍ، أو قال: على الفِطْرةِ ما لم يؤخروا المغربَ إلى أن تشتبكَ النجوم".

حسن: رواه أبو داود (418) عن عبد الله بن عمر، حدثنا يزيد بن زريع، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثني يزيد بن أبي حبيب، عن مَرْثَد بن عبد الله فذكره.

وإسناده حسن ورجاله ثقات غير محمد بن إسحاق فإنه مدلس، إلا أنه صرح بالتحديث وهو صدوق.

وصحَّح الحاكم في المستدرك (1/ 190) هذا الإسناد وقال: على شرط مسلم.

ولكن سئل أبو زرعة عن هذا الحديث الذي رواه محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي
حبيب … فقال: ورواه حيوة وابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أسلم أبي عمران التجيبي، عن أبي أيوب عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"بادروا بصلاة المغرب قبل طلوع النجوم" قال أبو زرعة: حديث حيوة أصح. انتهى. انظر:"العلل لابن أبي حاتم" (1/ 177)، وابن لهيعة فيه ضعف ولكنه توبع، . ولا يمنع من كون حديث حيوة أصح أن لا يكون حديث محمد بن إسحاق حسنًا، أو هما حديثان، ومعناه واحد، وهو التعجيل في صلاة المغرب.

وقوله: تشتبك بالنجوم - أي: تظهر وتختلط.




মারসাদ ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিহাদের উদ্দেশ্যে আমাদের কাছে এলেন, তখন উকবাহ ইবনে আমির মিশরের (শাসক) ছিলেন। তিনি (উকবাহ) মাগরিবের সালাত বিলম্বিত করলেন। তখন আবু আইয়ুব তাঁর কাছে দাঁড়িয়ে বললেন: হে উকবাহ, এ কেমন সালাত?! উকবাহ বললেন: আমরা কাজে ব্যস্ত ছিলাম। আবু আইয়ুব বললেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শোনেননি: "আমার উম্মত কল্যাণের মধ্যে থাকবে—অথবা তিনি বলেন: ফিতরাতের (স্বাভাবিক পদ্ধতির) উপর থাকবে—যতক্ষণ না তারা মাগরিবের সালাতকে এত বিলম্বিত করে যে নক্ষত্ররাজি ঘনসন্নিবিষ্ট বা একত্রে মিশে যায় (অর্থাৎ অন্ধকার গাঢ় হয়)?"









আল-জামি` আল-কামিল (1774)


1774 - عن رجل من أسلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: إنهم كانوا يصلون مع النبي صلى الله عليه وسلم المغرب، ثم يرجعون إلى أهاليهم إلى أقصى المدينة، يرمون ويُبصرون مواقعَ سهامِهم.

حسن: رواه النسائي (520) قال: حدثنا محمد بن بشَّار، قال: حدثنا محمد، قال: حدثنا شعبة، عن أبي بشر، قال: سمعت حسان بن بلال، عن رجل من أسلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

وإسناده حسن، فإن حسان بن بلال صدوق، وثقه ابن المديني وغيره.

وأبو بشر هو: جعفر بن إياس أبو بشر بن أبي وحشية، ثقة، وضعَّفه شعبة في حبيب بن سالم وفي مجاهد. انتهى. إلا أن شعبة خولف في هذا الإسناد فقد رواه هُشَيم، عن أبي بشر، عن علي بن بلال، عن ناس من الأنصار فالوا: كنا نُصَلِّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم المغرب، ثم ننصرف فنترامي حتى نأتي ديارنا، فما يخفى علينا مواقع سهامنا.

رواه أحمد (16415) وكذلك روَى عن عفان (وهو ابن مسلم) قال: حدثنا أبو عوانة، قال: حدثنا أبو بشر، عن علي بن بلال الليثي، قال: صليت مع نفر من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فحدَّثوني أنَّهم كانوا يُصَلُّون المغرب مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ينطلقون يترامون، لا يخفى عليهم مواقعُ سهامِهم حتى يأتونَ ديارهم في أقْصى المدينة.

فخالف هشيم وعفان فرويا عن أبي بشر، عن علي بن بلال، ورواه شعبة كما سبق عن أبي بشر، قال سمعت حسان بن بلال فجعل بعض أهل العلم بأنهما واحد، ومن فرق بينهما قال: علي بن بلال أشبه وإليه ذهب البخاري فإنه ذكر الحديث في ترجمة علي بن بلال"التاريخ الكبير" (6/ 263) من طريق أبي عوانة، ثم ذكره من طريق شعبة عن أبي بشر قال سمعتُ: حسان بن بلال ثم قال:"والأول أشبه".

وعلي بن بلال لم يكن مرضيًا، فيكون الإسناد ضعيفًا. فإما أن نجعلهما واحدًا، أو نقول لعل أبا بشر روي عن الاثنين فإنه صرح بأنه سمع من حسان بن بلال وهو صدوق كما مضى.

ولذا حَسَّن إسنادَه الهيثميُّ بعد أن عزاه الحديث للإمام أحمد، عن علي بن بلال"مجمع الزوائد" (1/ 310)، ولأجل الخلاف في حسان بن بلال، وعلي بن بلال أورده في الزوائد والا فلم يكن الحديث من شرطه.




আসলাম গোত্রের জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তারা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করতেন। এরপর তারা মদীনার দূরবর্তী প্রান্তে অবস্থিত নিজেদের পরিবারের কাছে ফিরে যেতেন, (তখনও) তারা তীর নিক্ষেপ করতেন এবং তাদের তীরের লক্ষ্যস্থল স্পষ্টভাবে দেখতে পেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1775)


1775 - عن جابر بن عبد الله قال: كُنَّا نُصَلِّي مع النبي صلى الله عليه وسلم المغربَ ثم نرجعُ إلى منازِلنا، وهي مِيلٌ وأنا أُبْصر مواقع النَبْلِ".

حسن: رواه الإمام أحمد (14971) وأبو يعلى"المقصد العلي" (192) والبزار"كشف الأستار" (374) كلهم من طرق عن سفيان، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، قال: سمعت جابر بن عبد الله فذكر الحديث.

وإسناده حسن؛ فإن عبد الله بن محمد بن عقيل مختلف فيه غير أنه يحسن حديثه، وقد مضت ترجمته بالتفصيل في كتاب الحيض.

والإمام أحمد رواه عن عبد الرزاق، - وهو في المصنف (2091) عن سفيان به مثله، ورواه أيضًا عن وكيع، عن سفيان به قال:"الظهر كاسمها، والعصرُ بيضاءُ حية، والمغربُ كاسمها، وكُنَّا نُصَلِّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم المغربَ، ثم نأتي منازِلَنا وهي على قدْر مبلٍ، فنرى مواقعَ النَبْلِ، وكان يُعجِّلُ العشاءَ ويؤخِّر، والفجرُ كاسمها وكان يُغَلِّسُ بها".

وقوله:"الظهر كاسمها" أي: يؤخذ وقتها من اسمها الدال على الظهيرة، هو بمعني شدة الحر.

"والعصر بيضاء" أي: ذات بياض.

"والمغرب" أي: تصلي صلاة المغرب عند غروب الشمس.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করতাম, তারপর আমরা আমাদের বাড়িঘরে ফিরে আসতাম, যা ছিল এক মাইল দূরে, আর আমি [তখনও] তীর কোথায় পড়েছিল তা দেখতে পেতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1776)


1776 - عن زيد بن خالد الجهني، قال: كنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم المغرب، وننصرف إلى السوق، ولو رمي أحدنا بالنبل - قال عثمان: رمي بنبلٍ - لأبصر مواقعها.

حسن: رواه الإمام أحمد (17029، 17052) والطبراني في الكبير (5/ 292) وعبد بن حميد (281) وابن أبي شيبة (1/ 329) كلهم من طريق ابن أبي ذئب، عن مصالح مولى التوأمة، عن زيد بن خالد، فذكر مثله.

إسناده حسن لأجل صالح مولى التوأمة؛ فإنّه صدوق وقد اختلط، ولكن روي ابن أبي ذئب عنه قبل اختلاطه.

قال ابن عدي: لا بأس به إذا روى عنه القدماء مثل ابن أبي ذئب، وابن جريج، وزياد بن سعد.

وقال الهيثمي في"المجمع" (1/ 310):"رواه أحمد والطبراني في الكبير، وفيه صالح مولى التوأمة وقد اختلط في آخر عمره.

قال ابن معين: سمع منه ابن أبي ذئب قبل الاختلاط. وهذا من رواية ابن أبي ذئب عنه" انتهى.

وتابعه سفيان عن صالح مولى التوأمة به فذكر مثله.

رواه الإمام أحمد (17041) وعنه الطبراني في الكبير (5/ 292) وسفيان ممن سمع منه بعد الاختلاط.

ومتابعه سفيان تؤكّد أنّه لم يهم في هذا الحديث حتَّى بعد الاختلاط.
وله شاهد من حديث أبي طريف قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين حاصر الطائف، وكان يُصلي بنا صلاة البصر حتَّى لو أنّ رجلًا رمي لرأي موقع نبله.

رواه الإمام أحمد (15437) وعنه الطبراني في الكبير (22/ 315) عن طريق أزهر بن القاسم الراسبي، حدّثنا زكريا بن إسحاق، عن الوليد بن عبد الله بن شُميلة، عن أبي طريف فذكر مثله.

والوليد بن عبد الله بن شُميلة من رجال"التعجيل" ذكره البخاري وابن أبي حاتم، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا. وذكره ابن حبّان في"الثقات" فهو"مقبول" إذا توبع، ولكنّه لم يُتابع.

وأما قوله:"صلاة البصر" فقال البيهقي (1/ 447) أراد بها صلاة المغرب، وإنّما سُمِّيت صلاة البصر لأنّها تُؤدَّى قبل ظلمة الليل.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (1/ 310) وقال:"رواه أحمد وفيه الوليد بن عبد الله بن شُميلة لم أجد من ذكره".

ثم قال: الوليد هذا هو الوليد بن عبد الله بن سميرة كما رواه الطبراني، وكذا ذكره ابن حبان في الثقات، وذكر روايته عن أبي طريف، وأنّه اختلف في اسم جدّه".




যায়দ ইবন খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করতাম, আর (সালাত শেষে) বাজার অভিমুখে চলে যেতাম। (তখনও এতটুকু আলো বাকি থাকত যে) যদি আমাদের কেউ তীর নিক্ষেপ করত — উসমান (রাবী) বলেন: একটি তীর নিক্ষেপ করা হলেও — তবে সে সেটির পড়ার স্থানগুলো দেখতে পেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1777)


1777 - عن ابن كعب بن مالك، عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلي المغربَ، فيصلي معه رجال من بني سلمةَ، ثم ينصرفون إلى بني سلمة، وهم يُبصرون مواقع النَبْلِ.

حسن: رواه الطبراني في الكبير (19/ 62) وفي الأوسط"مجمع البحرين" (564) عن محمد بن أحمد بن البراء، ثنا المعافي بن سليمان، ثنا موسى بن أعين، عن إسحاق بن راشد، عن الزهري، أخبرني ابن كعب بن مالك، عن أبيه فذكر الحديث.

قال في الأوسط:"لم يروه عن إسحاق إلا موسى".

قلت: رجاله ثقات إلا إسحاق بن راشد وهو وإن كان من رجال البخاري إلا أنه لم يكن ذلك القوي في الزهري.

قال ابن معين في رواية ابن الجنيد: ليس في الزهري بذاك، وقال ابن خزيمة: لا يحتج بحديثه، وقال أبو حاتم: شيخ، وقال النسائي: ليس به بأس، وقال الفسوي: صالح الحديث.

والخلاصة: أنَّه يُحسَّن حديثه، قال الهيثمي"المجمع" (1/ 311):"رجاله ثقات".

قلت: وهو كما قال إلا المعافي بن سليمان فهو صدوق.

وأما ابن كعب بن مالك فهو إما عبد الله، أو عبد الرحمن، وكلاهما ثقان.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাগরিবের সালাত আদায় করতেন। তখন বনু সালামা গোত্রের লোকেরা তাঁর সাথে সালাত আদায় করতো। অতঃপর তারা বনু সালামার দিকে ফিরে যেত, আর (তখনও) তারা তীরের আঘাতের স্থান দেখতে পেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1778)


1778 - عن عائشة قالت: أعْتَمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليلة من الليالي بصلاة العِشَاء، وهي التي تُدعَى العتمةُ فلم يخرجْ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى قال عمر بن الخطاب: نام النساءُ
والصِّبيانُ، فخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال لأهْلِ المسجد حين خرج عَليهم:"ما ينتظرها أحدٌ من أهل الأرض غيرُكم، وذلك قبل أن يَفْشوَ الإسلامُ في النَّاس.

وفي رواية قالت: أعْتمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ حتى ذهب عامة اللَّيلِ، وحتى نام أهْلُ المسجد، ثم خرج فصَلَّى فقال:"إنه لوَقْتُها، لولا أن أشقَّ على أمتي".

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (569)، ومسلم في المساجد (638) كلاهما من حديث ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة واللفظ لمسلم، وقال: وزاد حرملة في روايته: قال ابن شهاب: وذُكِر لي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"وما كان لكم أن تَنْزُرُوا رسول الله صلى الله عليه وسلم على الصلاة" وذلك حين صاحَ عمرُ بن الخطاب.

وقوله: تَنْزُروا - بالتاء، ثم النون الساكنة، ثم الزاء المضمومة، ثم الراء - أي: تُلِحُّوا عليه، ورُوي بضم أوّلِه، بعدها موحدة، ثم راء مكسورة، ثم زاي - أي: تخرجوا.

وفي لفظ البخاري:"ولا يُصلي يومئذ إلا بالمدينة، وكانوا يُصلُّون فيما بين أن يَغِيبَ الشَّفقُ إلى ثلث اللَّيل الأوَّلِ".

والرواية الثانية عند مسلم أيضًا من وجه آخر عن ابن جريج قال: أخبرني المغيرة بن حكيم، عن أم كلثوم بنت أبي بكر أنها أخبرته عن عائشة قالت فذكرت الحديث.

وفي حديث عبد الرزاق، عن ابن جريج:"لولا أن يَشُقَّ على أمتي".

قلت: والذي في المصنف (2114):"لولا أن أشُقَّ على أمتي" موافقًا لرواية الآخرين، فالله أعلم هل حصل الخطأ من الطابع أو من غيره.

وقوله:"ذهب عامة الليل" - معناه كثير منه، وليس المراد أكثره، ولا بد من هذا التأويل لقوله صلى الله عليه وسلم:"إنه لوقتها" ولا يجوز أن يكون المراد بهذا القول ما بعد نصف الليل، لأنه لم يقل أحد من العلماء أن تأخيرها إلى ما بعد نصف اللَّيل أفضل. أفاده النووي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো এক রাতে ইশার সালাত আদায় করতে বিলম্ব করলেন। এই সালাতকেই আ'তামাহ বলা হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন না, যতক্ষণ না উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: মহিলা ও শিশুরা ঘুমিয়ে পড়েছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং যখন তিনি মসজিদের মুসল্লিদের কাছে এলেন, তখন বললেন: "পৃথিবীর আর কেউ তোমাদের ছাড়া এই সালাতের জন্য অপেক্ষা করছে না।" আর এটা ছিল যখন ইসলাম মানুষের মাঝে ব্যাপক প্রচার লাভ করেনি তার পূর্বের ঘটনা।

অন্য এক বর্ণনায় তিনি (আয়িশা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে ইশার সালাত আদায় করতে এমন বিলম্ব করলেন যে রাতের অনেকটা অংশ অতিবাহিত হয়ে গেল এবং মসজিদের লোকেরা ঘুমিয়ে পড়ল। এরপর তিনি বের হয়ে সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: "এটিই হলো ইশার প্রকৃত সময়, যদি না আমার উম্মতের উপর তা কঠিন মনে হতো।"

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটিকে সালাতের সময় অধ্যায়ে (৫৬৯) এবং ইমাম মুসলিম এটিকে মসজিদ অধ্যায়ে (৬৩৮) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই ইবনু শিহাব, তিনি উরওয়া, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং শব্দগুলো মুসলিমের। ইমাম মুসলিম বলেন: হারমালা তাঁর বর্ণনায় আরও যোগ করেছেন: ইবনু শিহাব বলেন, আমার কাছে উল্লেখ করা হয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সালাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি চাপ সৃষ্টি করা তোমাদের জন্য উচিত ছিল না।" আর এটা হয়েছিল যখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উচ্চস্বরে আওয়াজ করেছিলেন।

এবং তাঁর উক্তি: تَنْزُرُوا (তানযুরু) - যা তা, তারপর নূন সাকিন, তারপর যা-এর উপর পেশ, তারপর রা দিয়ে গঠিত - এর অর্থ হলো: তোমরা তাঁর ওপর জোর খাটাও/তাড়াহুড়া করো (تُلِحُّوا عَلَيْهِ)। এর শুরুর অক্ষরের উপর পেশ দিয়েও বর্ণনা করা হয়েছে, এরপর বা, এরপর রা-এর নিচে যের, এরপর যা (تُنْزِرُوا) - যার অর্থ হলো: তোমরা বেরিয়ে আসো।

আর বুখারীর শব্দে আছে: "সেদিন মদীনা ব্যতীত আর কোথাও সালাত আদায় করা হত না। আর তারা সালাত আদায় করত শাফাক (দিনের আলো বিলীন) হওয়ার পর থেকে রাতের প্রথম এক-তৃতীয়াংশের মধ্যে।"

ইমাম মুসলিমের নিকট দ্বিতীয় বর্ণনাটি অন্য একটি সূত্রেও রয়েছে, যা ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: মুগীরা ইবনু হাকীম আমার কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি উম্মু কুলসুম বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।

আব্দুর রাযযাকের হাদীসে ইবনু জুরাইজ সূত্রে আছে: "যদি না তা আমার উম্মতের উপর কঠিন হতো।" আমি (গ্রন্থকার) বলি: যা মুসান্নাফ (২১৪৪)-এ রয়েছে তা হলো: "যদি না আমি আমার উম্মতের উপর কঠিন করে তুলি," যা অন্যান্য বর্ণনার সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ। আল্লাহই ভালো জানেন, এটি কি মুদ্রকের ভুল নাকি অন্য কারো।

আর তাঁর উক্তি: "রাতের অনেকটা অংশ অতিবাহিত হয়ে গেল" (ذهب عامة الليل) - এর অর্থ হলো রাতের এক বড় অংশ, এর দ্বারা রাতের বেশিরভাগ অংশ বোঝানো হয়নি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী "এটিই হলো ইশার প্রকৃত সময়" এই তাফসীরের (ব্যাখ্যার) প্রয়োজন রয়েছে। আর এই কথা দ্বারা অর্ধ রাতের পরের সময়কে বোঝানো জায়েয নয়, কারণ কোনো আলেমই বলেননি যে ইশার সালাতকে অর্ধ রাতের পরে বিলম্বিত করা উত্তম। এ তথ্যটি ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1779)


1779 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم شُغل عنها (أي عن العِشاء) فأَخَّرها حتى رَقَدْنا في المسجد، ثم استيقظنا، ثم رقَدْنا، ثم استيقظنا، ثم خرج علينا النبي صلى الله عليه وسلم ثم قال:"ليس أحد من أهل الأرض ينتظرُ الصلاةَ غيرُكم".

وفي رواية قال ابن عمر: مكثنا ذاتَ ليلةٍ ننتظرُ رسول الله صلى الله عليه وسلم لصلاة العِشاءِ الآخِرة، فخرج إلينا حين ذهب ثُلُثُ اللَّيلِ أو بعده، فلا نُدْرِيِ أشيء شَغَلَه في أهْلِه أو غير ذلك، فقال حين خرج:"إنكم لتنتظرون صلاةً ما ينتظرها أهْلُ دين غيرُكم، ولولا أن يَثْقُلَ على أمَّتِي لصلَّيْتُ بهم هذه الساعة" ثم أمر المؤذِّنَ فأقام الصلاةَ وصَلَّى.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (570)، ومسلم في المساجد (639) كلاهما من عبد
الرزاق، قال: أخبرني ابن جريج، قال: أخبرني نافع، قال: حدثنا عبد الله بن عمر فذكر الحديث، وهو في المصنف (2115).

والرواية الثانية أخرجها مسلم من وجه آخر عن الحكم، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث.

ومضى هذا الحديث في الوضوء، باب إن النوم ليس حدثًا، بل مظنة للحدث.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়লেন এবং তা বিলম্বিত করলেন। এমনকি আমরা মসজিদে ঘুমিয়ে পড়লাম, অতঃপর জেগে উঠলাম; আবার ঘুমিয়ে পড়লাম, অতঃপর জেগে উঠলাম। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন এবং বললেন: "তোমরা ছাড়া পৃথিবীর আর কোনো মানুষ এই সালাতের জন্য অপেক্ষা করছে না।"

অপর এক বর্ণনায় ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এক রাতে আমরা শেষ ইশার সালাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অপেক্ষায় ছিলাম। তিনি আমাদের কাছে এলেন যখন রাতের এক-তৃতীয়াংশ পার হয়ে গেছে অথবা তারও পরে। আমরা জানি না যে, পরিবারের কোনো কাজ নাকি অন্য কিছু তাঁকে ব্যস্ত রেখেছিল। যখন তিনি বাইরে এলেন, তখন বললেন: "নিশ্চয় তোমরা এমন এক সালাতের জন্য অপেক্ষা করছ, তোমাদের ছাড়া অন্য কোনো ধর্মের লোকেরা যার অপেক্ষা করে না। আমার উম্মতের ওপর যদি কঠিন না হতো, তবে আমি তাদের নিয়ে এই সময়ে সালাত আদায় করতাম।" অতঃপর তিনি মুয়াযযিনকে নির্দেশ দিলেন, তখন সালাতের ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1780)


1780 - عن أنس بن مالك قال: أخَّرَ النبي صلى الله عليه وسلم صلاة العشاء إلى نصف الليل، ثم صَلَّى ثم قال:"قد صلَّى الناسُ ونامُوا، أَما إنَّكم في صلاةٍ ما انتظرتموها".

وفي رواية: ثم أقبل علينا بوجهه بعد ما صلَّى فقال:"صلَّى الناسُ ورَقَدُوا، ولم تزالوا في صلاةٍ منذ انتظرتموها" قال (أنس): فكأني أنظُر إلى وَبِيضِ خَاتَمه.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (572) وفي الأذان (661)، من طريقين عن حميد الطويل، عن أنسٍ، وملم في المساجد (640) من وجه آخر عن أنسٍ.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত অর্ধ রাত পর্যন্ত বিলম্বিত করলেন, তারপর সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে। জেনে রেখো, তোমরা যতক্ষণ এর (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করেছ, ততক্ষণ সালাতের মধ্যেই ছিলে।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: সালাত আদায় করার পর তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "লোকেরা সালাত আদায় করে ঘুমিয়ে পড়েছে। তোমরা যতক্ষণ এর জন্য অপেক্ষা করেছ, ততক্ষণ সালাতের মধ্যেই ছিলে।" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি যেন এখনও তাঁর আংটির ঔজ্জ্বল্য দেখতে পাচ্ছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1781)


1781 - عن أبي موسى قال: كنت أنا وأصْحابي الذين قدِموا معي في السَّفِينة نُزولًا في بَقِيع بُطْحان، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة، فكان يتناوبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عند صلاةِ العِشاءِ كلَّ ليلَةٍ نفرٌ منهم، قال أبو موسى: فوافَقْنَا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أنا وأصْحابي، وله بعضُ الشُّغْل في أمره، حتى أَعْتَمَ بالصَّلاةِ حتى أبهارَّ اللَّيلُ، ثم خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فصَلَّى بهم، فلَمَّا قضَى صلاتَه قال لمن حضره:"على رِسْلِكم أُعْلِمكم، وأَبْشِرُوا، أنَّ من نعمة الله عليكم أنه ليس من الناس أحد يُصَلِّي هذه الساعة غيرُكم" أو قال:"ما صَلَّى هذه الساعة أحد غيرُكم" - لا ندري أي الكلمتين قال.

قال أبو موسى: فرجعنا فرحين بما سمعنا من رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (567)، ومسلم في المساجد (641) كلاهما عن أبي أسامة، عن بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكر الحديث.

قوله: بقيع بُطحان - البقيع من الأرض المكان المتسع، قال ابن الأثير: لا يسمى بقيعًا إلا وفيه شجر أو أُصولها، وبُطحان: موضع بعينه واد بالمدينة.

وقوله:"يتناوب" فاعله: نفر، أي يأتيه كل ليلةٍ عدة رجال متناوبين غير مجتمعين.

وقوله:"ابهار الليل": انتصف، وبهرةُ كل شيء وسطه، ويؤيد هذا المعنى لما في بعض الروايات: حتى إذا كان قريبًا من نصف الليل.

والشُّغُل المذكور كان في تجهيز جيش، رواه الطبري من وجه صحيح عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، ذكره الحافظ في"الفتح" (2/ 48).




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং আমার সাথীরা, যারা আমার সাথে নৌকায় করে এসেছিলাম, আমরা বাকী'উ বুত্বহানে অবস্থান করছিলাম, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তখন মদীনায় ছিলেন। তাদের মধ্য থেকে একদল লোক প্রতি রাতে ইশার সালাতের সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পালাক্রমে যেত।

আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর একদিন আমি ও আমার সাথীরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পৌঁছলাম। তাঁর (রাসূলের) কোনো কাজে কিছু ব্যস্ততা ছিল, ফলে তিনি সালাত আদায় করতে দেরি করলেন, এমনকি রাতের অর্ধেক পার হয়ে গেল।

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বেরিয়ে আসলেন এবং তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন সেখানে উপস্থিত লোকদের উদ্দেশ্য করে বললেন: "ধীরে থাকুন! আমি তোমাদেরকে জানাচ্ছি এবং তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো। তোমাদের প্রতি আল্লাহর একটি অনুগ্রহ হলো, এই সময়ে তোমাদের ছাড়া আর কোনো মানুষ সালাত আদায় করেনি।" অথবা তিনি বললেন: "তোমাদের ছাড়া এই সময়ে আর কেউ সালাত আদায় করেনি।" — (বর্ণনাকারী বলেন) আমরা জানি না, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দু'টি বাক্যের মধ্যে কোনটি বলেছিলেন।

আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছ থেকে যা শুনলাম, তাতে আনন্দিত হয়ে ফিরে আসলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1782)


1782 - عن ابن عباس يقول: أَعْتَمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ العِشَاءَ، قال: حتى رَقَد ناسٌ واستَيْقَظُوا، ورقدوا واستيقظوا فقام عمر بن الخطاب فقال: الصلاةَ! فقال عطاء: قال ابن عباس: فخرج نبي الله صلى الله عليه وسلم كأنّي أنظر إليه الآن، يَقْطُر رأسه ماءً واضِعًا يدَه على شقِّ رأسِه قال:"لولا أن يَشُقَّ على أُمتي لأمرتُهم أن يُصَلُّوها كذلك".

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (571)، ومسلم في المساجد (642) كلاهما من حديث عبد الرزاق، قال أخبرني ابن جريج، قال: قلت لعطاء: أيُّ حين أَحَبُّ إليك أن أُصَلِّي العِشَاءَ التي يقولُها الناس العَتَمَةَ إِمَامًا وخِلْوًا؟ قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر الحديث.

والحديث في مصنف عبد الرزاق (2112) من هذا الوجه.

ورواه أيضًا عن محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن عطاء، قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر مثله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত এত দেরিতে আদায় করলেন যে, কিছু লোক ঘুমিয়ে গেল এবং জাগলো, আবার ঘুমালো এবং আবার জাগলো। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, 'সালাত!' ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, যেন আমি তাকে এখনই দেখছি, তার মাথা থেকে পানি ঝরছিল এবং তিনি তার হাত তার মাথার একপাশে রেখেছিলেন। তিনি বললেন: "যদি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর না হতো, তবে আমি তাদের এভাবেই (দেরিতে) সালাত আদায়ের নির্দেশ দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1783)


1783 - عن جابر بن سمرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُؤَخِّرُ صلاةَ العشاء الآخِرَةِ.

وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الصلوات نحوًا من صَلاتِكم، وكان يُؤَخِّرُ العَتَمَةَ بعد صلاتكم شيئًا، وكان يُخِفُّ الصلاةَ، وفي رواية: يُخَفِّفُ.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (643) عن أبي الأحوص، عن سماك، عن جابر، والرواية الثانية: عن أبي عوانة، عن سماك به مثله.

ورواه أبو داود الطيالسي في مسنده (810) عن قيس، عن سماك، عن جابر بن سمرة ولفظه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يصلي الظهر نحو صلاتكم، والعَصْرَ نحو صلاتكم، والمغربَ نحو صلاتكم، وكان يُؤَخِّر العِشاءَ شيئًا.




জাবির ইবনু সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত বিলম্ব করতেন।

আরেক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের সালাতের মতোই অন্যান্য সালাত আদায় করতেন, এবং তিনি তোমাদের সালাতের চেয়ে ঈষৎ বিলম্বে 'আতামাহ' (ইশা) সালাত আদায় করতেন। আর তিনি সালাত সংক্ষিপ্ত করতেন। (অন্য বর্ণনায়: তিনি হালকা করতেন।)

আবু দাউদ আত-তায়ালিসির বর্ণনায় (শব্দাবলী সহ) এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের মতো করে যুহরের সালাত আদায় করতেন না, তোমাদের মতো করে আসরের সালাত আদায় করতেন না, এবং তোমাদের মতো করে মাগরিবের সালাতও আদায় করতেন না। আর তিনি ইশার সালাত কিছুটা বিলম্ব করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1784)


1784 - عن زيد بن خالد الجهني قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لولا أن أشُقَّ على أمتي لأمرتهم بالسواك عند كل صلاة، ولأخَّرتُ صلاة العِشاءِ إلى ثُلثِ الليل".

صحيح: رواه الترمذي (23) قال: حدثنا هنَّاد، حدثنا عبدة بن سليمان، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن زيد بن خالد الجهني فذكر الحديث. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: فيه محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ومن طريقه رواه أيضًا أبو داود (47)، والنسائي في الكبري (3/ 291) إلا أنهما لم يذكرا"تأخير صلاة العشاء" وسبق تخريجه في كتاب الطهارة، باب ما جاء في السواك.

وللحديث إسناد آخر رواه الإمام أحمد (17048) قال: حدثنا عبد الصمد، قال: حدثنا حرب - يعني ابن شدَّاد - عن يحيى، حدثنا أبو سلمة، عن زيد بن خالد الجهني فذكر الحديث في السواك
بدون تأخير صلاة العشاء، وهذا إسناد صحيح، ويحيي هو: ابن أبي كثير.




যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যদি আমি আমার উম্মতের উপর কষ্টকর মনে না করতাম, তবে আমি তাদেরকে প্রত্যেক সালাতের (নামাযের) সময় মিসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম, এবং আমি ইশার সালাতকে রাতের এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1785)


1785 - عن النعمان بن بشير قال: أنا أعلم الناس بوقت هذه الصلاة، كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّيها لسقوط القمر الثالثة.

صحيح: أخرجه أبو داود (419)، والترمذي (165)، والنسائي (529) كلهم من طريق أبي عوانة، عن أبي بِشْرٍ، عن بَشِير بن ثابتٍ، عن حبيب بن سالم، عن النعمان بن بشير فذكر مثله.

وإسناده صحيح، إلا أنه اختلف على أبي بِشْرٍ وهو: جعفر بن إياس فرواه أبو عوانة كما تراه وتابعه شعبة فروي عن أبي بِشْرٍ نحو رواية أبي عوانة.

ومن طريق شعبة رواه الإمام أحمد (18396) والدارقطني (1/ 270)، والحاكم (1/ 194) كلهم من طريق يزيد بن هارون عنه، ولفظه في المسند: إني لأعلم الناس - أو من أعلم الناس - بوقت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم العِشَاء، كان يُصَلِّيها مقدارَ ما يَغيبُ القمر ليلةَ ثالثةٍ أو رابعةٍ.

قال الدارقطني: شك شعبة.

قال الترمذي: حديث أبي عوانة أصَحُّ عندنا، لأن يزيد بن هارون روي عن شعبة، عن أبي بِشْرٍ نحو رواية أبي عوانة. انتهى

قال الدارقطني: ورواه هُشيم ورَقَبة وسفيان بن حسين، عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب، عن النعمان وقالوا: ليلة ثالثة، ولم يذكروا بَشيرًا. انتهى.

قلت: من طريق هُشَيم رواه ابن أبي شيبة (1/ 330)، والحاكم (1/ 194)، قال الحاكم: تابعه رَقَبة بن مصقلة، عن أبي بِشْرٍ.

هكذا اتفق رَقَبة وهُشيم على رواية هذا الحديث عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب بن سالم، وهو إسناد صحيح، وخالفهما شُعبة وأبو عوانة فقالا: عن أبي بِشْرٍ عن بَشِير بن ثابت، عن حبيب بن سالم. انتهى.

قلت: أما رواية رَقَبة بن مصقلة فأخرجها النسائي (528) عن جعفر بن إياس وهو: أبو بِشْرٍ بن أبي وَحْشِيَّة. وأبو بِشْرٍ وإن كان ثقةً إلا أن شعبةَ ضَعَّفَه في حبيب بن سَالِم.

وأما حديث سفيان بن حسين، عن أبي بِشْرٍ، عن حبيب بن سالم عن النعمان فقد أشار إليه الدارقطني كما مضى.

وقد رجح الترمذي وأبو زرعة وغيرهما رواية من أثبت (بشير بن ثابت) بين أبي بِشْرٍ وحبيب بن سالم، بل وقد خطأ أبو بكر بن العربي في"عارضة الأحوذي" (1/ 277) قائلًا:"وخطأ من أخطأ فيه لا يُخرجه عن الصحة".

وقال شعبة: أبو بِشْرٍ لم يسمع من حبيب بن سالم ولذا ضَعَّفه فيه، كما سبق.

وبهذا صَحَّ قول الترمذي بأن حديث أبي عَوانة أصَحُّ عندنا.

والحديث يدل على تعجيل صلاة العِشاء بعد دخول وقتها، والأحاديث الأخرى تدل على
استحباب تأخيرها، والضابط في هذا ما ذكره جابر بن عبد الله بأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي العِشاءَ أحيانًا وأحيانًا، إذا رآهم اجتمعوا عجَّل، وإذا رآهم أبطأوا أخَّر كما مضى في باب التوقيت.




নু'মান ইবন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমিই লোকদের মধ্যে এই সালাতের সময় সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি অবগত। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম চাঁদ তৃতীয় রাতে (অস্তমিত হয়ে গেলে) এই সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1786)


1786 - عن أبي سعيد الخدري قال: صَلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ العَتَمَةِ، فلم يخرجْ حتى مَضَى نحو من شَطر اللَّيلِ فقال:"خذوا مقاعدكم" فأخذنا مقاعدنا، فقال:"إن الناس قد صَلُّوا وأخذوا مَضَاجِعَهم، وإنَّكم لن تَزَالُوا في صلاةٍ ما انتظرتُم الصلاةَ، ولولا ضَعْفُ الضِّعِيفِ، وسُقْمُ السَّقيم لأخَّرتُ هذه الصلاةَ إلى شطر اللَّيلِ".

صحيح: أخرجه أبو داود (422)، والنسائي (538)، وابن ماجة (693) كلهم من طريق داود ابن أبي هند، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد فذكره.

واللفظ لأبي داود. وأبو نَضْرة هو: المنذر بن مالك بن قُطَعة العَبدي.

وقوله:"صلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة العتمةِ" - أي صلاة المغرب كما في النسائي وابن ماجة، لأن العرب كانوا يطلقون على صلاة المغرب العَتَمة، وقد نُهينا عن ذلك.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، صحّحه ابن خزيمة، وأخرجه في صحيحه (345) من طرق عن داود بن أبي هند.

هكذا رواه بِشْرٍ بن المفضل وغيره عن داود بن أبي هند، وخالفهم أبو معاوية الضرير، عن داود ابن أبي هند فقال: عن جابر بن عبد الله، وهو سيأتي فيما بعد.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে 'আতামাহর সালাত আদায় করলাম। তিনি বের হলেন না, যতক্ষণ না রাতের প্রায় অর্ধেকটা অতিবাহিত হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের নিজ নিজ জায়গায় বসো।" তখন আমরা আমাদের নিজ নিজ জায়গায় বসে পড়লাম। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই লোকেরা সালাত আদায় করেছে এবং তাদের বিছানায় শুয়ে পড়েছে। আর তোমরা যতক্ষণ পর্যন্ত সালাতের জন্য অপেক্ষা করতে থাকবে, ততক্ষণ পর্যন্ত তোমরা সালাতের মধ্যেই থাকবে। যদি দুর্বল লোকের দুর্বলতা এবং অসুস্থ লোকের অসুস্থতা না থাকত, তবে আমি এই সালাতকে রাতের অর্ধেক পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1787)


1787 - عن معاذ بن جبل يقول: بَقَينا النبي صلى الله عليه وسلم في صلاة العَتَمَة فأَخَّر حتى ظنَّ الظَّان أنه ليس بخارج، والقائل منا يقول: صَلَّى، فإنا لكذلك، حتى خرج النبي صلى الله عليه وسلم فقالوا له كما قالوا: فقال لهم:"أَعْتِنموا بهذه الصلاة، فإنكم قد فُضِّلْتُم بها على سائر الأمم، ولم تُصَلِّها أمةٌ قبلكم".

صحيح: أخرجه أبو داود (421) قال: حدثنا عمرو بن عثمان الحِمصي، ثنا أبي، ثنا حَريز - يعني ابن عثمان - عن راشد بن سعد، عن عاصم بن حُميد السَّكوني، أنه سمع معاذ بن جبل يقول: فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات غير عاصم بن حُميد السكوني صاحب معاذ فقد شك البزار في سماعه من معاذ، والصواب أنه سمع منه، وهو الحمصي المخضرم من الطبقة العليا من تابعي أهل الشام.

والإعتام - الدخول في العَتَمة، وهي ظلمة الليل.

وقوله: بَقَينا - بفتح الباء والقاف، بوزن رَمينا.

قال الخطابي:"معناه - انتظرنا. يقال: بَقَيتُ الرجل أبقيه إذا انتظرته".




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা 'আতামাহ (ইশার) সালাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অপেক্ষা করছিলাম। অতঃপর তিনি এত দেরি করলেন যে, অনুমানকারী (উপস্থিত ব্যক্তিরা) ধারণা করতে লাগলো, তিনি আর বের হবেন না। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ বলতে শুরু করলো: তিনি (সম্ভবত ভেতরে) সালাত আদায় করে নিয়েছেন। আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন। অতঃপর লোকেরা তাঁর কাছে (তাদের অপেক্ষার) কথাগুলো বললেন। তখন তিনি তাঁদের বললেন: "তোমরা এই সালাতকে (ইশার সালাতকে বিলম্বে আদায়ের সুযোগকে) গুরুত্ব সহকারে গ্রহণ করো। কেননা, এই সালাতের মাধ্যমে তোমাদেরকে অন্যান্য সকল উম্মতের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দান করা হয়েছে। তোমাদের পূর্বে অন্য কোনো জাতি এই সালাত আদায় করেনি।"