আল-জামি` আল-কামিল
1828 - عن مالك بن الحويرث قال: أتيتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم في نفر من قوميّ، فأقمنا عنده عشرين ليلة، وكان رحيمًا رفيقًا، فلمّا رأى شوقنا إلى أهالينا قال:"ارجعوا فكونوا فيهم وعَلِّموهم وصلوا، فإذا حضرتِ الصّلاةُ فليُؤذِّنْ لكم أحدكم، وليؤمَّكم أكبركم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (628)، ومسلم في المساجد (174) كلاهما من طريق أيوب، عن أبي قلابة، عن مالك بن الحويرث فذكر الحديث واللّفظ للبخاريّ، وفي لفظ آخر قال:"وصَلُّوا كما رأيتُموني أُصَلِّي، فإذا حضرت الصّلاة فليؤذن لكم أحدكم وليؤمكم أكبركم" البخاريّ (631).
ورويا من طريق خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن مالك بن الحويرث قال: أتى رجلان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يريدان السفر فقال النَّبِيّ: إذا أنتما خرجتما فأذِّنا، ثم أقيما، ثم ليؤمكما أكبركما" كذا في صحيح البخاريّ.
وفي صحيح مسلم: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنا وصاحب ليّ، فلمّا أردنا الإقفال من عنده قال لنا: فذكر الحديث نحوه.
وبقية الأحاديث انظرها في باب استحباب الأذان لمن يصلي وحده.
মালিক ইবনুল হুয়াইরিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার গোত্রের কয়েকজন লোকের সাথে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম। অতঃপর আমরা তাঁর কাছে বিশ রাত অবস্থান করলাম। তিনি ছিলেন দয়ালু ও কোমলমতি। যখন তিনি আমাদের পরিবারের প্রতি আমাদের আগ্রহ (শওক) দেখতে পেলেন, তখন তিনি বললেন: “তোমরা ফিরে যাও এবং তাদের মধ্যে অবস্থান করো, তাদের শিক্ষা দাও এবং সালাত (নামাজ) আদায় করো। যখন সালাতের সময় উপস্থিত হয়, তখন তোমাদের মধ্যে একজন যেন আযান দেয় এবং তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে প্রবীণ (বয়স্ক), সে যেন ইমামতি করে।”
1829 - عن أبي قتادة قال: سِرنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ليلة، فقال بعض القوم: لو عرَّست بنا يا رسول الله! قال: أخاف أن تناموا عن الصّلاة، قال بلال: أنا أوقظكم،
فاضطجعوا، وأسند بلال ظهره إلى راحلته، فغلبته عيناه فتام. فاستيقظ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقد طلع حاجبُ الشّمسِ، فقال:"يا بلال أين ما قلت؟" قال: ما ألقيتْ عليَّ نومةٌ مثلها قط. قال:"إن الله قبض أرواحكم حين شاء، وردها عليكم حين شاء، يا بلال قم فأذِّن بالناس بالصلاة" فتوضأ، فلمّا ارتفعتِ الشّمسُ وابياضَّتْ قام فصلَّى.
متفق عليه: راوه البخاريّ في المواقيت (595) وبوَّب عليه بقوله: الأذان بعد ذهاب الوقت، واللّفظ له، ومسلم في المساجد (681) مفصلًا وفيه: ثم أذَّن بلال بالصلاة، فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين، ثم صلى الغداةَ فصنع كما يصنع كل يوم، كلاهما من أوجه عن أبي قتادة.
فقوله:"صنع كما يصنع كلَّ يوم" قد يُفهم منه الإقامة إذ لم تذكر في الحديث.
وفي حديث عمران بن حصين الذي سيأتي تصريح لذكر الإقامة، فإنه كان مع الركب في تلك الليلة كما يدل عليه حديث مسلم وفيه: قال: فقال عبد الله بن رباح: إني لأحدِّث هذا الحديث في مسجد الجامع، إذ قال عمران بن حصين: انظر أيها الفتي كيف تحدث، فإني أحد الركب تلك الليلة؟ قال قلت: فأنت أعلم بالحديث، فقال: ممن أنت؟ قلت: من الأنصار، قال: حدِّث فأنتم أعلم بحديثكم، قال: فحدثتُ القومَ؛ فقال عمران: لقد شهِدتُ تلك الليلة، وما شعرتُ أن أحدًا حفِظه كما حفِظتَه. انتهى.
قوله: حفظتُه - بضم التاء وفتحها وكلاهما حسن.
ومن لم ير الأذان للفائت حمل الأذان على الإقامة فهو بعيد، لأنه بعد الأذان توضأ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فلمّا ارتفعت الشّمس وابياضتْ قام فصلى، ولم يعهد أنه توضأ في يوم من الأيام بعد الإقامة.
আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে পথ চলছিলাম। তখন কওমের (দলের) কিছু লোক বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি যদি আমাদের সাথে বিশ্রাম (রাত কাটানো) করতেন! তিনি বললেন: আমি ভয় পাচ্ছি যে তোমরা (ফজরের) সালাত থেকে ঘুমিয়ে থাকবে। বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আপনাদেরকে জাগিয়ে দেব। অতঃপর তারা শুয়ে পড়লেন এবং বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিঠ তাঁর সওয়ারীর উপর ঠেকিয়ে রাখলেন। কিন্তু তাঁর চোখেও ঘুম প্রবল হলো এবং তিনিও ঘুমিয়ে পড়লেন। অতঃপর সূর্য কিছুটা উপরে উঠে এলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘুম ভাঙল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হে বিলাল, তুমি যা বলেছিলে, তা কোথায়? তিনি (বিলাল) বললেন: আমার উপর এমন ঘুম কখনো চেপে বসেনি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ যখন চাইলেন তোমাদের রূহগুলিকে তিনি কব্জা করে নিলেন এবং যখন চাইলেন তা তোমাদের কাছে ফিরিয়ে দিলেন। হে বিলাল! তুমি দাঁড়াও এবং লোকদেরকে সালাতের জন্য আযান দাও। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উযু করলেন। সূর্য যখন আরো উপরে উঠলো এবং সাদা (উজ্জ্বল) হয়ে গেল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী ‘আল-মাওয়াকীত’ গ্রন্থে (৫৯৫) বর্ণনা করেছেন এবং এর উপর এই শিরোনাম দিয়েছেন: সময় চলে যাওয়ার পর আযান দেওয়া, আর এই শব্দগুলো তাঁরই। ইমাম মুসলিম ‘আল-মাসাজিদ’ গ্রন্থে (৬৮১) বিস্তারিতভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে আছে: অতঃপর বিলাল সালাতের জন্য আযান দিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর ফজরের সালাত আদায় করলেন এবং প্রতিদিন যেমন করেন তেমনই করলেন। উভয় বর্ণনাই আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে এসেছে।
তাঁর বাণী: “প্রতিদিন যেমন করেন তেমনই করলেন”—এ থেকে ইকামাহ-কে বুঝা যেতে পারে, যেহেতু হাদীসে তার উল্লেখ করা হয়নি।
আর ইমরান ইবন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে, যা শীঘ্রই আসবে, তাতে ইকামাহ-এর সুস্পষ্ট উল্লেখ রয়েছে। কেননা তিনি সেই রাতে এই কাফেলার সাথে ছিলেন, যেমনটি ইমাম মুসলিমের হাদীস দ্বারা প্রমাণিত। তাতে আছে: আব্দুল্লাহ ইবন রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি জামে মসজিদে এই হাদীসটি বর্ণনা করছিলাম, তখন ইমরান ইবন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে যুবক, তুমি কেমন করে বর্ণনা করছো তা লক্ষ করো। কেননা আমি সেই রাতের কাফেলার একজন ছিলাম। আমি (আব্দুল্লাহ ইবন রাবাহ) বললাম: তবে আপনি হাদীসটি সম্পর্কে বেশি অবগত। তিনি (ইমরান) বললেন: তুমি কাদের অন্তর্ভুক্ত? আমি বললাম: আনসারদের অন্তর্ভুক্ত। তিনি বললেন: তবে বর্ণনা করো, কেননা তোমরা তোমাদের হাদীস সম্পর্কে বেশি অবগত। তিনি (আব্দুল্লাহ ইবন রাবাহ) বললেন: আমি লোকদেরকে বর্ণনা করলাম। তখন ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি সেই রাতের সাক্ষী, আর আমার জানা ছিল না যে, তুমি যেভাবে এটি মুখস্থ করেছো, অন্য কেউও এভাবে মুখস্থ করেছে। সমাপ্ত।
তাঁর বাণী: حَفِظتُهُ - এতে ‘তা’ এর উপর পেশ ও জবর (উভয়ই) হতে পারে এবং উভয়টিই উত্তম।
আর যারা কাজা হওয়া সালাতের জন্য আযান দেওয়া উচিত মনে করেন না, তারা আযানকে ইকামাহ হিসেবে ধরে নেন, তবে এটি দূরবর্তী (দুর্বল) মত। কারণ আযানের পর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উযু করলেন, অতঃপর সূর্য যখন উপরে উঠলো ও উজ্জ্বল হলো, তখন তিনি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন। আর ইকামাহ-এর পর কোনো দিনই তিনি উযু করেছেন বলে জানা যায় না।
1830 - عن أبي هريرة في هذا الخبر - يعني قصة التعريس - قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تحولوا عن مكانكم الذي أصابتكم فيه الغفلةُ" قال: فأمر بلالًا فأذَّن وأقام وصلَّى.
صحيح: رواه أبو داود (436) عن موسى بن إسماعيل: ثنا أبان: ثنا معمر عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
قال أبو داود: رواه مالك وسفيان بن عيينة والأوزاعي وعبد الرزّاق، عن معمر وابن إسحاق لم يذكر أحد منهم الأذان في حديث الزهري هذا، ولم يسنده منهم أحد إِلَّا الأوزاعي وأبان العطّار، عن معمر، انتهى.
قلت: ورواه أيضًا مسلم في المساجد (680) من وجه آخر عن يونس، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة ولم يذكر فيه الأذان وإنما قال فيه: ثم توضأ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأمر بلالًا فأقام الصّلاة فصلَّى بهم الصبح، فلمّا قضى الصّلاة قال:"من نسى الصّلاة فليصلها إذا ذكرها فإن الله قال: {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي} [سورة طه: 14].
قال يونس: وكان ابن شهاب يقرؤها: (للذِّكْرَي).
ورواه أيضًا مسلم عن يحيى بن سعيد قال: حَدَّثَنَا يزيد بن كيسان، حَدَّثَنَا أبو حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث وفيه: ثم دعا بالماء فتوضأ، ثم سجد سجدتين، ثم أقيمت الصّلاة فصلَّى الغداة.
فتبين من هذا أن ذكر الأذان في رواية أبان، عن معمر زيادة.
وأبان هو ابن يزيد العطّار أبو يزيد البصري ثقة، وثَّقه ابن معين وابن المديني والعجلي وغيرهم، وهو من رجال الشّيخين، فيجب قبول زيادثه. وإليه ذهب الإمام أحمد بأنه يؤذَّن للفائت ويقام له كما قال الخطّابي.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এই বর্ণনায়—অর্থাৎ রাত্রি যাপনের (তা'রিসের) ঘটনায়—তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের সেই স্থান থেকে সরে যাও যেখানে তোমাদেরকে অমনোযোগ আচ্ছন্ন করেছে।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিলালকে নির্দেশ দিলেন। অতঃপর বিলাল আযান দিলেন, ইকামত দিলেন এবং তিনি সালাত আদায় করলেন।
1831 - عن أبي سعيد قال: شَغَلَنا المشركون يوم الخندق عن صلاة الظهر حتَّى غربتِ الشمسُ، وذلك قبل أن ينزل في القتال ما نزل، فأنزل الله عز وجل: {وَكَفَى اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ الْقِتَالَ} [سورة الأحزاب: ] فأمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بلالًا فأقام لصلاة الظهر فصلاها كما كان يُصليها لوقتها، ثم أقام للعصر فصلاها كما كان يُصَلِّيها لوقتها، ثم أذَّن للمغرب فصلَّاها كما كان يُصَلِّيها في وقتها.
صحيح: رواه النسائيّ (661) عن عمرو بن عليّ، قال: حَدَّثَنَا يحيى (يعني ابن سعيد القطان) قال: حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، قال: حَدَّثَنَا سعيد بن أبي سعيد، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه فذكر الحديث.
وإسناده صحيح ورجاله ثقات، والذي رواه الشافعي في الأم (1/ 86) عن ابن أبي فديك، عن ابن أبي ذئب به، فيه ذكر لأربع صلوات وهي بزيادة صلاة العشاء، وفيه تفصيل لقوله: قبل أن ينزل في القتال - وهي صلاة الخوف {فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا} [سورة البقرة: 239].
قال الشافعي:"وبهذا كله نأخذ، وفيه دلالة على أن كل من جمع بين صلاتين في وقت الأوّلى منهما أقام لكل واحدة منهما، وأذَّن للأولى، وفي الآخرة يقيم بلا أذان".
وهذا الحديث رواه كل من الإمام أحمد (7189) وابن خزيمة (996) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد القطان، ولكن لم يذكر أحد منهم الأذان في أول الصّلاة، إِلَّا أن يفهم من قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه دعا بلالًا فأمره (أي أن يؤذن) فأقام الظهر - أي بعد الأذان ويبدو أن هذا الذي فهمه النسائيّ فبوَّب بقوله: الأذان للفائت، والبغوي فبوَّب في"شرح السنة" (3/ 302) الأذان للفائة والإقامة لها.
ولكن قال البيهقيّ (1/ 402 - 403) رواه الشافعي في القديم عن غير واحد عن ابن أبي ذئب لم يُسَمَّ أحدًا منهم وقال في الحديث: فأمر بلالًا فأذَّن وأقام فصلى الظهر، ثم أمره فأقام فصلى العصر، ثم أمره فأقام فصلى المغرب، ثم أمره فأقام فصلى العشاء.
ثم قال البيهقيّ:"هكذا رواه أبو عبيدة بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه في هذه القصة في إحدى الروايتين عنه، إِلَّا أن أبا عبيدة لم يدرك أباه وهو مرسل جيد".
قلت: وهو كما قال فإن حديث عبد الله بن مسعود فيه انقطاع، رواه الترمذيّ (1/ 337)،
والنسائي (2/ 18)، وأحمد (3555) كلّهم من طريق أبي الزُّبير، عن نافع بن جبير بن مطعم، عن أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه قال: إن المشركين شغلوا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أربع صلوات يوم الخندق حتَّى ذهب من الليل ما شاء الله، فأمر بلالًا فأذَّن، ثم أقام فصلَّى الظهر، ثم أقام فصلى العصر، ثم أقام فصلى المغرب، ثم أقام فصلى العشاء.
قال الترمذيّ: حديث عبد الله ليس بإسناده بأس، إِلَّا أن أبا عبيدة لم يسمع من عبد الله. انتهى.
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 396).
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খন্দকের যুদ্ধের দিন মুশরিকরা আমাদেরকে যুহরের সালাত থেকে এমনভাবে ব্যস্ত রেখেছিল যে, সূর্য ডুবে গেল। আর এটা এমন সময়ের ঘটনা যখন যুদ্ধ-সংক্রান্ত (সালাতের) কোনো বিধান অবতীর্ণ হয়নি। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা নাযিল করলেন: {وَكَفَى اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ الْقِتَالَ} (আল্লাহ মুমিনদেরকে যুদ্ধের কষ্ট থেকে মুক্তি দিলেন)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন। তিনি যুহরের সালাতের জন্য ইকামাত দিলেন এবং তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ঠিক সেভাবেই আদায় করলেন, যেভাবে তার নির্ধারিত সময়ে আদায় করতেন। এরপর তিনি আসরের সালাতের জন্য ইকামাত দিলেন এবং তিনি তা ঠিক সেভাবেই আদায় করলেন, যেভাবে তার নির্ধারিত সময়ে আদায় করতেন। এরপর তিনি মাগরিবের জন্য আযান দিলেন এবং তিনি তা ঠিক সেভাবেই আদায় করলেন, যেভাবে তার নির্ধারিত সময়ে আদায় করতেন।
1832 - عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في مسير له فناموا من صلاة الفجر، فاستيقظوا بحرِّ الشّمس، فارتفعوا قليلًا حتَّى استقلت الشّمسُ، ثم أمر مؤذِّنًا فأذَّن، فصلَّى ركعتين قبل الفجر، ثم أقام، ثم صلَّى الفجْرَ.
صحيح: رواه أبو داود (443) قال: حَدَّثَنَا وهب بن بقية، عن خالد، عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكر الحديث.
إسناده صحيح، ورجاله ثقات، وخالد هو: ابن عبد الله الطحان.
قال الحاكم في المستدرك (1/ 274) بعد أن روى الحديث من طريق إسحاق بن شاهين، عن خالد بن عبد الله به وهذا حديث صحيح على ما قدمنا ذكره من صحة سماع الحسن عن عمران بن حصين، ولم يخرجاه".
قلت: وفيه الحسن وهو مدلِّس وقد عنعن مع اختلاف في سماعه من عمران بن حصين، والصحيح أنه سمع منه، وقد جاء هذا الحديث من وجه آخر رواه ابن خزيمة (2/ 99) عن عوف، عن أبي رجاء، قال: حَدَّثَنَا عمران بن حصين، وفيه:"نادي بالصلاة فصلَّى بالناس". وأصله في الصحيحين، وقد سبق ذكره في التيمم.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো এক সফরে ছিলেন। তারা (যাত্রাপথে) ফজরের সালাতের সময় ঘুমিয়ে থাকলেন। অতঃপর তারা সূর্যের তাপে জেগে উঠলেন। তারা সামান্য উপরে উঠে গেলেন, যতক্ষণ না সূর্য ভালোভাবে প্রকাশ পেল। এরপর তিনি একজন মুয়াজ্জিনকে নির্দেশ দিলে সে আযান দিল। অতঃপর তিনি ফজরের সালাতের পূর্বের দুই রাকাত (সুন্নত) আদায় করলেন। এরপর ইক্বামত দেওয়া হলো, অতঃপর তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন।
1833 - عن عمرو بن أمية الضمري قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، فنام عن الصبح حتَّى طلعت الشمسُ، فاستيقظ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:"تنحَّوا عن هذا المكان" قال: ثم أمر بلالًا فأذَّن، ثم توضؤا وصلَّوا ركعتي الفجر، ثم أمر بلالًا فأقام الصّلاةَ، فصلى بهم صلاة الصبح.
حسن: رواه أبو داود (444) قال: حَدَّثَنَا عباس العنبري؛ ح: وحدثنا أحمد بن صالح - وهذا لفظ عباس - أن عبد الله بن يزيد حدَّثهم عن حَيْوة بن شريح، عن عَيَّاش بن عباس - يعني القتباني - أن كليب بن صُبح حدَّثهم أن الزِّبرقان حدَّثه عن عمه عمرو بن أمية الضمري فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل كليب بن صُبح الأصبحي المصري فإنه"صدوق" كما في التقريب وحسنه أيضًا المنذري في مختصره.
والزِّبرقان هو: ابن عبد الله الضمريّ، روى عن عم أبيه عمرو بن أمية الضمريّ، وعن عمه جعفر بن عمرو بن أمية.
قال أحمد بن صالح: الصواب فيه الزِّبرقان بن عبد الله بن عمرو بن أمية، عن عمه جعفر بن عمرو، عن عمرو بن أمية. ثم أفرد الحافظ ابن حجر ترجمة الزِّبرقان بن عمرو بن أمية الضمري وقال: لم يفرق البخاريّ فمن بعده بينهما إِلَّا ابن حبان ذكر هذا في ترجمة مفردة عن الذي يرُوي عنه كليب بن صُبح، ثم انتقده قائلًا: لا حجة في تفرقته إذ لم ينص على أنهما اثنان.
قلت: وفي كل الأحوال لا يكون عمرو بن أمية عم الزِّبرقان، فلابد من إضافة"عن" ليصبح الزِّبرقان حدَّثه عن عمه، عن عمرو بن أمية الضمري ليستقيم الإسناد.
আমর ইবনে উমাইয়্যা আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে ছিলাম। তিনি ফজরের সালাতের জন্য ঘুমে রইলেন, এমনকি সূর্য উঠে গেল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাগ্রত হলেন এবং বললেন: "তোমরা এই স্থান থেকে সরে যাও।" তিনি (আমর ইবনে উমাইয়্যা) বলেন: এরপর তিনি বিলালকে আদেশ করলেন, ফলে তিনি আযান দিলেন। অতঃপর তাঁরা উযু করলেন এবং ফজরের দুই রাকাত (সুন্নাত) সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি বিলালকে ইক্বামাত দেওয়ার আদেশ করলেন, ফলে তিনি তাঁদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন।
1834 - عن عبد الله بن مسعود قال: أقبلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم زمن الحديبية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يكلؤنا؟" فقال بلال: أنا، فناموا حتَّى طلعتِ الشّمس، فاستيقظ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"افعلوا كما كنتم تفعلون" قال: ففعلنا، قال: فكذلك فافعلوا لمن نام أو نسي".
صحيح: رواه أبو داود (447) عن محمد بن المثنى: حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، ثنا: شعبة، عن جامع بن شداد، سمعت عبد الرحمن بن أبي علقمة، سمعتُ عبد الله بن مسعود فذكر الحديث، ورجاله ثقات، وإسناده صحيح.
وعبد الرحمن بن أبي علقمة يقال له أيضًا: عبد الرحمن بن علقمة وهو من التابعين، وقيل: كان له صحبة.
وقوله:"افعلوا كما كنتم تفعلون" أي: كما كنتم تفعلون في الوقت من وضوء وأذان وإقامة وصلاة.
وقد جاء تفصيل ذلك في حديث رواه ابن حبان في صحيحه (1580) من حديث القاسم بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود قال: سرنا ذات ليلة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلنا: يا رسول الله! لو أمسينا الأرض فَنُمْنَا، رعَتْ ركائبُنا، قال: فمن يحرسنا؟" قلت: أنا، قال: فغلبتني عينيّ، فلم توقظني إِلَّا وقد طلعتِ الشّمسُ، ولم يستيقظ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا بكلامنا، قال: فأمر بلالًا فأذَّن، ثم أقام فصلى بنا، انتهى. انظر"نصب الراية" (1/ 282).
وفي الباب أحاديث أخرى إِلَّا أنها لم تصح، منها: حديث بلال عند البزّار وفيه انقطاع، وحديث ذي مخبر الحبشي عند أبي داود، وفيه يزيد بن صالح أو صُليح"مقبول"، وحديث ابن عباس عند أبي يعلى والبزّار، والصواب أنه رواه مسروق مرسلًا كما عند ابن أبي شيبة (2/ 82).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা হুদায়বিয়ার সময়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে আমাদের জন্য প্রহরার ব্যবস্থা করবে/কে আমাদের পাহারা দেবে?" তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। অতঃপর তারা ঘুমিয়ে পড়লেন, এমনকি সূর্য উদিত হয়ে গেল। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাগ্রত হলেন এবং বললেন: "তোমরা তাই করো, যা তোমরা (সময়মতো) সাধারণত করতে।" তিনি বলেন: অতঃপর আমরা তা-ই করলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ঘুমিয়ে যায় অথবা ভুলে যায়, সে যেন সেভাবে (নামাজ আদায়) করে।"
1835 - عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُغير إذا طلع الفجرُ، وكان يستمع الأذان، فإن سمع أذانًا أمسك وإلَّا أغار، فسمع رجلًا يقول: الله أكبر الله أكبر، فقال رسول الله
الله صلى الله عليه وسلم"على الفطرة" ثم قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خرجت من النّار" فنظروا فإذا هو راعي مِعزًى.
متفق عليه: رواه مسلم في الصّلاة (382) من طريق حمّاد بن سلمة، ثنا ثابت، عن أنس بن مالك فذكر الحديث، ورواه البخاريّ في الجهاد (2943) من وجه آخر عن أنس بن مالك مختصرًا.
وقوله:"على الفطرة" أي: على الإسلام.
وقوله:"خرجت من النّار" أي: بالتوحيد.
وقوله:"فإذا هو راعي معزى" قال النوويّ:"احتج به بأن الأذان مشروع للمفرد، وهذا هو الصَّحيح في مذهبنا ومذهب غيرنا .. انتهى.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফজর উদিত হতো, তখন (শত্রুদের উপর) হামলা করতেন। তিনি আযান শুনতেন। যদি আযান শুনতে পেতেন, তবে (হামলা করা থেকে) বিরত থাকতেন, অন্যথায় আক্রমণ করতেন। অতঃপর তিনি এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সে স্বভাবজাত ধর্মের উপর আছে।" এরপর লোকটি বলল: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সে জাহান্নাম থেকে মুক্তি পেল।" এরপর সাহাবীরা তাকালেন এবং দেখলেন লোকটি ছিল ছাগলের রাখাল।
1836 - عن عقبة بن عامر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يعجبُ ربّكم من راعي غنم في رأس شظيةٍ بجبل يؤذِّن بالصلاة ويُصَلِّي، فيقول الله عز وجل: انظروا إلى عبدي هذا يؤذِّن ويقيمُ الصّلاة، يخاف مني، قد غفرت لعبدي، وأدخلته الجنّة".
صحيح: رواه أبو داود (1203)، والنسائي (161) كلاهما من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، أن أبا عُشَّانة المعافري حدَّثه، عن عقبة بن عامر فذكر الحديث. ومن هذا الطَّريق رواه أيضًا الإمام أحمد (17443).
وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن حبان فأخرجه في صحيحه (1660)، من هذا الوجه.
وأبو عُشَّانة - بضم المهملة وتشديد المعجمة اسمه: حي بن يؤمن، مشهور بكنيته ثقة، وثَّقه أحمد وأبو داود وغيرهما.
وقوله: الشظية: قطعة مرتفعة في رأس الجبل، وقيل: هي الصخرة العظيمة الخارجة من الجبل كأنّها أنف الجبل.
উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের প্রতিপালক সেই মেষপালকের ব্যাপারে বিস্মিত/সন্তুষ্ট হন, যে পাহাড়ের উঁচু পাথরের চূড়ায় (শযিয়াহ) সালাতের জন্য আযান দেয় এবং সালাত আদায় করে। তখন আল্লাহ তাআলা বলেন: তোমরা আমার এই বান্দার দিকে লক্ষ্য করো, সে আযান দেয় ও সালাত প্রতিষ্ঠা করে, সে আমাকে ভয় করে। আমি আমার এই বান্দাকে ক্ষমা করে দিলাম এবং তাকে জান্নাতে প্রবেশ করালাম।"
1837 - عن عبد الله بن مسعود قال: بينما نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره سمعنا مناديًا يُنادي: الله أكبر الله أكبر فقال نبي الله صلى الله عليه وسلم:"على الفطرة" فقال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال نبي الله صلى الله عليه وسلم:"خرج من النّار" فابتدرناه، فإذا هو صاحب ماشية أدركتْه الصّلاة فنادى بها.
صحيح: رواه أحمد (3861) قال: حَدَّثَنَا محمد بن بِشْر، حَدَّثَنَا سعيد (وهو ابن أبي عروبة) حَدَّثَنَا قتادة.
وحدثنا عبد الوهّاب (وهو ابن عطاء الخفاف) عن ابن أبي عروبة، عن قتادة، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.
ورجاله ثقات غير أن سعيد بن أبي عروبة اختلط، وكان سماع عبد الوهّاب ومحمد بن بشر قبل الاختلاط.
ورواه أيضًا أبو يعلى (5400) والطَّبرانيّ في الكبير (10062) كلاهما من طريق سعيد بن أبي عروبة به مثله.
قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 334): رواه أحمد وأبو يعلى والطَّبرانيّ في الكبير، ورجال أحمد رجال الصَّحيح.
وفي الباب عن أبي جحيفة وأبي سعيد الخدريّ ومعاذ بن جبل وصفوان بن عسَّال وابن عمر كلها ضعيفة.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে ছিলাম। তখন আমরা একজন আহ্বানকারীকে আহ্বান করতে শুনলাম: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। তখন আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে ফিতরাত (স্বভাবজাত ধর্ম)-এর উপর রয়েছে।" অতঃপর সে বলল: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। তখন আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে জাহান্নাম থেকে মুক্তি পেল।" এরপর আমরা তার দিকে দ্রুত অগ্রসর হলাম। তখন দেখা গেল, সে একজন মেষপালক, যাকে সালাতের সময় পেয়ে যাওয়ায় সে এভাবে আযান দিয়েছে।
1838 - عن ابن عمر قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن بلالًا يؤذِّن بليلٍ فكلوا واشربوا حتَّى ينادِيَ ابنُ أم مكتوم" ثم قال: وكان رجلًا أعمى لا ينادي حتَّى يقال له: أصبحتَ أصبحتَ.
متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (15) عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله مرسلًا.
ولكن رواه القعنبي فقال عن أبيه، ومن طريقه رواه البخاريّ في الأذان (617) عنه عن مالك به مثله.
ورواه مسلم في الصيام (1092) من أوجه عن ابن شهاب وغيره.
وسبق تخريجه في باب ما جاء في الأذان قبل الفجر.
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই বিলাল রাতে (ফজরের আগে) আযান দেয়। সুতরাং তোমরা খাও এবং পান কর যতক্ষণ না ইবনু উম্মে মাকতূম আযান দেয়।" এরপর তিনি (ইবনু উমার রাঃ) বললেন: আর তিনি (ইবনু উম্মে মাকতূম) ছিলেন একজন অন্ধ ব্যক্তি। তাঁকে 'সকাল হয়ে গেছে, সকাল হয়ে গেছে' বলার আগে তিনি আযান দিতেন না। (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
1839 - عن عائشة قالت: كان ابن أم مكتوم يؤذِّن لرسول الله صلى الله عليه وسلم وهو أعمى.
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (381) من طريق هشام، عن أبيه، عن عائشة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু উম্মে মাকতূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আযান দিতেন, অথচ তিনি ছিলেন অন্ধ।
1840 - عن أبي الشعثاء قال: كنَّا قعودًا في المسجد مع أبي هريرة، فأذَّن المؤذِّن، فقام رجل من المسجد يمشيّ، فأتبعه أبو هريرة بصره حتَّى خرج من المسجد فقال أبو هريرة: أما هذا فقد عصى أبا القاسم صلى الله عليه وسلم.
وفي رواية: رأى رجلًا يجتاز المسجد خارجًا بعد الأذان، فقال: أما هذا فقد عصى أبا القاسم صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (655) من طريق إبراهيم بن المهاجر، عن أبي الشعثاء به مثله وزاد أبو داود (536) من هذا الوجه بأن ذلك في صلاة العصر.
والرّواية الثانية رواها أيضًا مسلم ولكن من طريق أشعث بن أبي الشعثاء، عن أبيه، وفيه متابعة لإبراهيم بن مهاجر البجلي وهو مختلف فيه.
وقوله:"فقد عصى أبا القاسم" - له حكم الرفع - وقد رواه الإمام أحمد (10933) من طريق
المسعودي وشريك كلاهما عن أشعث به نحوه، وزاد شريك في آخره:"أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا كنُتم في المسجد فنُودي بالصلاة فلا يخرجْ أحدكم حتَّى يُصَلِّي"، وشريك سيء الحفظ، والمسعودي وإن كان قد اختلط إِلَّا أنه توبع في رواية مسلم.
ورواه الطبرانيّ في الأوسط (3854) من وجه آخر عن أبي مصعب، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، حَدَّثَنِي أبيّ، وصفوان بن سليم، عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة ولفظه:"لا يسمع النداء في مسجدي هذا، ثم يخرج منه إِلَّا لحاجة، ثم لا يرجع إليه إِلَّا منافق".
قال الطبرانيّ: تفرّد به أبو مصعب، ولم يروه موصولًا عن أبي هريرة غير صفوان وأبي حازم. انتهى.
قلت: ولا يضر تفرّد أبي مصعب فإنه ثقة، وهو: أحمد بن أبي بكر بن الحارث بن زرارة بن مصعب بن عبد الرحمن بن عوف الزهري المدنيّ، رُوي عن مالك الموطأ، قال ابن حزم: في موطنه زيادة على مائة حديث، وقدَّمه الدَّارقطنيّ في الموطأ على يحيى بن بكير. انتهى. روي له الجماعة، عابه أبو خيثمة للفتوى بالرأي.
وصفوان بن سُليم وأبو حازم"وهو سلمة بن دينار" كلاهما ثقتان، وصحَّحه أيضًا الهيثميّ فقال:"رجاله رجال الصَّحيح""مجمع الزوائد" (2/ 5).
وأمّا قوله:"لا يسمع النداء في مسجدي هذا" لا يخصص العموم الوارد في حديث مسلم، وإنما هو عام لجميع المساجد، ويدخل فيه مسجد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لأهميته وخصوصيته دخولًا أوليًّا، فلعل أبا هريرة روى الحديث عامًا، ولما رأى أحدًا قد خرج من مسجد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد الأذان استشهد به لدخوله في العموم ولخصوصيته.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুশ শা'সা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মসজিদে বসা ছিলাম। অতঃপর মুয়াযযিন আযান দিলেন। তখন এক ব্যক্তি হেঁটে হেঁটে মসজিদ থেকে বের হয়ে চলে গেলেন। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দৃষ্টি দ্বারা তাকে অনুসরণ করলেন যতক্ষণ না সে মসজিদ থেকে বেরিয়ে গেল। অতঃপর আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই লোকটি অবশ্যই আবুল কাসেম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবাধ্যতা করেছে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি (আবু হুরায়রা) একজন ব্যক্তিকে আযানের পরে মসজিদ পেরিয়ে বাইরে যেতে দেখলেন। তখন তিনি বললেন: এই ব্যক্তি অবশ্যই আবুল কাসেম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবাধ্যতা করেছে।
1841 - عن ابن عمر قال: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذنان: بلال وابن أم مكتوم الأعمى.
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (380) عن ابن نمير، قال: حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر مثله.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুইজন মুয়াজ্জিন ছিলেন: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু উম্মে মাকতূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন অন্ধ।
1842 - عن عائشة: كان الرسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذنان، بلال وابن أم مكتوم.
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (380) عن ابن نمير، ثنا أبيّ، ثنا عبيد الله، ثنا القاسم، عن عائشة، فذكرته. ولم يذكر مسلمُ لفظه وإنما حال على حديث ابن عمر.
ورواه ابن أبي شيبة عنها فقالت: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثة مؤذنين، بلال، وأبو محذورة، وابن أم مكتوم. (السنن الكبرى للبيهقي: 1/ 429، رقم: 2098).
رواه عن يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة.
وعنه رواه ابن خزيمة وقال: والخبران صحيحان، فمن قال: كان له مؤذنان أراد اللذين كانا يؤذنان
بالمدينة، ومن قال: له ثلاثة أراد أبا محذورة الذي كان يؤذِّن بمكة، انظر:"إتحاف المهرة" (2/ 126).
وقلت: وكذلك سعد بن عائذ، أو ابن عبد الرحمن مولى الأنصاري المعروف بسعد القرظ كان مؤذن رسول الله صلى الله عليه وسلم بقباء كما أخرجه الحاكم (3/ 608) من طريق بقية، ثنا الزبيديّ، عن الزّهريّ، عن حفص بن عمر بن سعد القرظ أن أباه وعمومته أخبروه أن سعد القرظ كان مؤذِّنًا لأهل قباء، فانتقله عمر بن الخطّاب فاتخذه مؤذنًا لمسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم. سكت عليه الحاكم والذّهبيّ، وفي الإسناد حفص بن عمر بن سعد جعله الحافظ في مرتبة"مقبول".
وذلك بعد أن مات رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وترك بلالٌ الأذان، وانتقل إلى الشام.
ويقال له: سعد القُرَظ، لأنه كان يتجر في القرظ، روى البغوي عن القاسم بن الحسن بن محمد بن عمرو بن حفص بن عمرو بن سعد القرظ، عن آبائه أن سعدًا اشتكى إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قلة ذات يده، فأمره النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالتجارة، فخرج إلى السوق فاشترى شيئًا من قرظ فباعه فربح فيه، فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فأمره بلزوم ذلك. ذكره الحافظ في"الإصابة" (2/ 29).
وقال ابن عبد البر في"الاستيعاب":"فلم يزل يؤذن في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أن مات، وتوارث عنه بنوه الأذان فيه إلى زمن مالك وبعده أيضًا".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুজন মুআযযিন ছিলেন, বিলাল এবং ইবনু উম্মে মাকতুম।
1843 - عن عثمان بن أبي العاص قال: يا رسول الله! اجعلني إمام قوميّ، قال:"أنت إمامُهم، واقتد بأضعفهم، واتخذ مؤذِّنًا لا يأخذ على أذانه أجرًا".
صحيح: رواه أبو داود (531)، والنسائي (672) كلاهما من طريق حمّاد بن سلمة، ثنا سعيد الجريريّ، عن أبي العلاء، عن مطرف بن عبد الله، عن عثمان بن أبي العاص فذكر الحديث.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة (423)، والحاكم (1/ 199 - 200) وقال: صحيح على شرط مسلم.
قلت: وهو كما قال، وسعيد الجُريري هو: ابن إياس أبو مسعود البصري ثقة إِلَّا أنه اختلط قبل موته بثلاث سنين، وحماد بن سلمة ممن سمع منه قبل الاختلاط.
ورواه الترمذيّ (209) من وجه آخر قال: حَدَّثَنَا هناد، حَدَّثَنَا أبو زُبيد وهو: عَبْثَرُ بن القاسم، عن أشعث، عن الحسن، عن عثمان بن أبي العاص قال:"إن من آخِر ما عهد إليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن اتخذ مؤذِّنًا لا يأخذ على أذانه أجرًا".
ورواه ابن ماجة (714) من طريق حفص بن غياث، عن أشعث به مثله.
قال الترمذيّ: حديث حسن، وفي نسخة: حسن صحيح، والذي نقل عنه الزيلعي وغيره:"حسن" فقط وهو الصواب فإن أشعث هو: ابن سوَّار الكندي النجار ضعَّفه النسائيّ والدارقطني وغيرهما، وقال بعض
أهل العلم: إنّما هو ابن عبد الملك الحمرانيّ، وهو ثقة فقيه، والصواب هو الأوّل.
فيه أيضًا الحسن البصري وهو مدلِّس وقد عنعن، وإن كان ثبت سماعه من عثمان بن أبي العاص، كما قال البزّار. انظر: نصب الراية (1/ 90).
وبناء على هذا الحديث، ذهب الحنفية إلى أن أخذ الأجرة على التأذين حرام، وكرهه الشافعية، وأكثر أهل العلم على أن الذي يحرم هو إذا كان الأذان مشروطًا بالأجرة، وإن أُعطي بغير مسألة فلا حرج في ذلك، مثل أن يكون الأمر معروفا بين المؤذنين والمؤسّسات الإسلامية.
উসমান ইবনে আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে আমার গোত্রের ইমাম নিযুক্ত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমিই তাদের ইমাম, আর তাদের মধ্যে দুর্বলতমের প্রতি খেয়াল রাখবে, এবং এমন একজন মুয়াজ্জিন রাখবে যে তার আযানের জন্য কোনো পারিশ্রমিক গ্রহণ করবে না।"
1844 - عن عبد الله بن مغفل المزني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"بين كل أذانين صلاة" قالها ثلاثًا: قال في الثالثة:"لمن شاء".
وفي رواية: قال في الرابعة"لمن شاء".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (634)، ومسلم في صلاة المسافرين (838) كلاهما من طريق عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن المغفل فذكر الحديث. والرّواية الثانية عند مسلم.
وقوله:"بين كل أذانين" أي: أذان وإقامة.
قال الخطّابي: أراد بالأذانين - الأذان والإقامة، حمل أحد الاسمين على الآخر، كقولهم: الأسودين: التمر والماء، وإنما الأسود أحدهما: وكقولهم: سيرةُ العمرين، يريدون أبا بكر وعمر، ويحتمل أن يكون الاسم لكل واحد منهما حقيقة، لأن الأذان في اللغة: الإعلام، فالأذان إعلام بحضور الوقت، والإقامة أذان بفعل الصّلاة. انتهى.
وقد جاء استثناء إِلَّا المغرب في بعض الروايات في غير الصحيحين وهي زيادة شاذة مخالفة لما رواه الحفاظ، ذكره الحافظ في الفتح (2/ 108) وعزاه للبزار وهي من رواية حبان بن عبيد الله، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه مثله، وقال: رواية حيان - وهو بفتح المهملة والنحتانية - شاذة؛ لأنه وإن كان صدوقًا عند البزّار وغيره، ولكنه خالف الحفاظ من أصحاب عبد الله بن بريدة في إسناد الحديث ومتنه. ثم قال: وقد نقل ابن الجوزي في الموضوعات عن الفلاس أنه كذَّب حيَّانًا المذكور.
আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রত্যেক দুই আযানের (অর্থাৎ আযান ও ইকামতের) মধ্যবর্তী সময়ে সালাত রয়েছে।” তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন। তৃতীয়বার তিনি বললেন: “যে চায় তার জন্য।”
অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি চতুর্থবার বললেন: “যে চায় তার জন্য।”
1845 - عن أنس بن مالك قال: كان المؤذِّن إذا أذّن قام ناس من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يبتدرون السواري حتَّى يخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهم كذلك يُصَلُّون الركعتين قبل المغرب، ولم يكن بين الأذان والإقامة شيء.
وقال عثمان بن جبلة وأبو داود عن شعبة:"لم يكن بينهما إِلَّا قليل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (625) من طريق شعبة قال: سمعتُ عمرو بن عامر الأنصاريّ، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (837) قال: حَدَّثَنَا شيبان بن فرُّوخ، حَدَّثَنَا عبد الوارث، عن عبد العزيز (وهو ابن صُهيب) عن أنس بن مالك قال: كنا بالمدينة، فإذا أَذَّن المؤذِّن لصلاة المغرب ابتدروا السواريّ، فيركعون ركعتين ركعتين، حتَّى إن الرّجل الغريب ليدخل المسجد فيحسِبُ أن الصّلاة قد صُلِّيَتْ من كثرة من يصليها.
وفي رواية أخرى عنده: عن مختار بن فُلفل قال: سألت أنس بن مالك عن التطوع بعد العصر، فقال: كان عمر يضرب الأيدي على صلاة بعد العصر، وكنَّا نُصلِّي على عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ركعتين بعد غروب الشّمس قبل صلاة المغرب، فقلت له: أكان رسولُ الله صلاهما؟ قال: كان يرانا نصليها، فلم يأمرنا ولم يَنْهنا.
وقوله:"يبتدرون السواري" أي: يتسارعون ويستبقون إليها للاستتار بها عند الصّلاة.
وقوله: لم يكن بين الأذان والإقامة شيء" أي: وقت كثير، يريد أنهم كانوا يُسرعون في الركعتين لقلة ما بين الأذان والإقامة من الوقت.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মুয়াজ্জিন আযান দিতেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে কিছু লোক দাঁড়িয়ে খুঁটিগুলোর দিকে দ্রুত ধাবিত হতেন, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতের জন্য) বের হতেন, তারা সেভাবেই মাগরিবের পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। আযান ও ইকামতের মাঝে কিছু সময় ছাড়া (দীর্ঘ) কোনো ব্যবধান ছিল না।
উসমান ইবনু জাবালাহ এবং আবু দাউদ শু‘বাহ (রহ.) হতে বর্ণনা করে বলেন: আযান ও ইকামতের মাঝে খুব সামান্যই সময় ছিল।
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মদীনায় ছিলাম। যখন মুয়াজ্জিন মাগরিবের সালাতের জন্য আযান দিতেন, তখন লোকেরা খুঁটিগুলোর দিকে দ্রুত ধাবিত হয়ে দুই দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। এমনকি কোনো অপরিচিত লোক মাসজিদে প্রবেশ করলে সে মনে করতো যে, সালাত (ফরয) আদায় হয়ে গেছে, এত বেশি লোক সালাত আদায় করতো।
মুক্তার ইবনু ফুলফুল (রহ.) হতে অপর এক বর্ণনায় বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আসরের পরের নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসরের পর সালাত আদায়ের জন্য লোকেদের হাতে আঘাত করতেন (বা কঠোরতা করতেন)। তবে আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যাস্তের পরে মাগরিবের ফরযের পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করতাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এই সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি আমাদেরকে তা আদায় করতে দেখতেন, কিন্তু তিনি আমাদেরকে এর আদেশও করেননি এবং নিষেধও করেননি।
1846 - عن أبي سعيد الخدريّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا سمعتم النداء فقولوا مِثل ما يقول المؤذن".
متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (2) عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد الليثيّ، عن أبي سعيد، ورواه البخاريّ في الأذان (611)، ومسلم في الصّلاة (383) كلاهما من طريق مالك به.
وما رواه ابن ماجة (718) من طريق عباد بن إسحق، عن ابن شهاب، عن سعيد، عن أبي هريرة مثله فهو معلول، والمحفوظ ما رواه مالك من حديث أبي سعيد، وقد أشار إلى هذا الترمذيّ (208) عقب حديث أبي سعيد قائلًا: وروى عبد الرحمن بن إسحاق، عن الزهري هذا الحديث عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: ورواية مالك أصح. انتهى.
وقال النسائيّ في عمل اليوم والليلة (33) بعد أن روي حديث عبد الرحمن بن إسحاق عن الزهري: خالفه مالك، ثم قال: الصواب حديث مالك، وحديث عبد الرحمن بن إسحاق خطأ، وعبد الرحمن هذا يقال له: عبَّاد بن إسحاق وهو لا بأس به، وعبد الرحمن بن إسحاق يرُوي عنه جماعة من أهل الكوفة وهو ضعيف الحديث. انتهى.
وأعلَّه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجة فقال: هذا إسناد معلول والمحفوظ عن الزهري عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدريّ كما أخرجه الأئمة الستة.
وكذلك من الشاذ أيضًا ما رواه ابن أبي شيبة (1/ 227) من طريق زيد بن حباب، عن مالك به من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم أي أنَّه كان يقول مثل ما يقول المؤذِّن. فخالف زيدُ بن حباب الحفاظَ من أصحاب مالك؛ فإنَّهم لم يذكروا من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم، وزيد ممن وصف بأنه كان يهم
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন তোমরা আযান শুনতে পাও, তখন মুআযযিন যা বলে, তোমরাও তাই বলো।”
1847 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنه سمع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم المؤذن فقولوا مثل ما يقول: ثم صلوا عليَّ، فإنه من صلى عليّ صلاة صلى الله عليه بها عشرَا، ثم سَلُوا الله لي الوسيلةَ، فإنها منزلة في الجنّة لا تنبغي إِلَّا لعبد من عباد الله، وأرجو أن أكون أنا هو، فمن سأل لي الوسيلةَ حلَّتْ له الشفاعة".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) من طريق كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমরা মুআযযিনের আযান শুনবে, তখন সে যা বলে, তোমরাও তাই বলো। এরপর আমার উপর দরূদ পাঠ করো। কেননা যে আমার উপর একবার দরূদ পড়ে, আল্লাহ তার উপর এর বিনিময়ে দশটি রহমত নাযিল করেন। এরপর আল্লাহর কাছে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করো। কেননা এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে মাত্র একজন ছাড়া আর কারো জন্য শোভনীয় নয়। আর আমি আশা করি যে, আমিই হবো সেই বান্দা। সুতরাং যে ব্যক্তি আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার শাফা‘আত (সুপারিশ) আবশ্যক হয়ে যাবে।"
