আল-জামি` আল-কামিল
1848 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قال المؤذن: الله أكبر الله أكبر، فقال أحدكم: الله أكبر الله أكبر، ثم قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، ثم قال: أشهد أن محمدًا رسول الله، قال: أشهد أن محمدًا رسول الله، ثم قال: حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله، ثم قال: حيَّ على الفلاح، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، ثم قال: الله أكبر الله أكبر، قال: الله أكبر الله أكبر، ثم قال: لا إله إِلَّا الله. قال: لا إله إِلَّا الله من قَلْبه دخل الجنّة".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (385) حَدَّثَنَا إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو جعفر محمد بن جَهْضَم الثقفيّ، حَدَّثَنَا إسماعيل بن جعفر، عن عُمارة بن غَزية، عن خُبيب بن عبد الرحمن بن إساف، عن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب، عن أبيه، عن جده فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুয়াজ্জিন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন তোমাদের কেউ যদি 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আশহাদু আল লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন সেও 'আশহাদু আল লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ' বলে, তখন সেও 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ' বলে, তখন সে 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' বলে, তখন সে 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন সেও 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন যে ব্যক্তি অন্তর থেকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
1849 - عن سعد بن أبي وقَّاص عن رسول الله لا أنه قال:"من قال حين يسمع المؤذنَ: أشهد أن لا إله إِلَّا الله وحده لا شريك له، وأن محمدًا عبدُه ورسولُه، رضيتُ بالله ربًا، وبمحمدٍ رسولًا، وبالإسلام دينًا غفر له ذنبه".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (386) من طريق اللّيث، عن الحُكيم بن عبد الله، عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص، عن سعد بن أبي وقَّاص، فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মুয়াযযিনের আযান শুনে বলে: 'আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো অংশীদার নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল। আমি আল্লাহকে রব হিসাবে, মুহাম্মাদকে রাসূল হিসাবে এবং ইসলামকে দ্বীন হিসাবে সন্তুষ্ট চিত্তে গ্রহণ করে নিয়েছি,' তার গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"
1850 - عن علقمة بن وقَّاص قال: كُنَّا عند معاوية، فقال المؤذن: الله أكبر، الله أكبر، فقال معاوية: الله أكبر الله أكبر، فقال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال: حيَّ على الصّلاة، فقال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فقال: حيَّ على الفلاح، فقال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فقال: الله أكبر الله أكبر، فقال: الله أكبر الله أكبر، فقال: لا إله إِلَّا الله، قال: لا إله إِلَّا الله. قال: هكذا كان رسول
الله صلى الله عليه وسلم يقول - أو نبيُّكم - إذا أذَّن المُؤذن.
حسن: رواه الإمام أحمد (16896) قال: حَدَّثَنَا يحيي (ابن سعيد) عن محمد بن عمرو قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن جديّ، قال: فذكر الحديث.
ومحمد بن عمرو هو: ابن علقمة الليثي صدوق، وأبوه عمرو بن علقمة بن وقَّاص الليثي المدني"مقبول" ذكره ابن حبان في الثّقات (5/ 174) هكذا رواه الإمام أحمد بالتفصيل.
ورواه النسائيّ (677) عن مجاهد بن موسى وإبراهيم بن الحسن المقْسَمِيّ قالا: حَدَّثَنَا حجَّاج، قال ابن جريج: أخبرني عمرو بن يحيى، أن عيسى بن عمر أخبره، عن عبد الله بن علقمة بن وقَّاص، عن علقمة بن وقَّاص قال: إنِّي عند معاوية إذ أذَّن مؤذِّنه فقال معاوية كما قال المؤذِّن حتَّى إذا قال: حيَّ على الصّلاة: قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فلمّا قال: حيَّ على الفلاح، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، وقال بعد ذلك مثل ما قال المؤذِّن ثم قال: سمعتُ رسول الله يقول مثل ذلك. انتهى.
ورواه أبو داود الطيالسي (1052) قال: حَدَّثَنَا هشام (الدستوائي)، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن إبراهيم التيميّ، عن عيسى بن طلحة، قال: كُنَّا عند معاوية فنادي المنادي بالصلاة، فقال: مِثل ما قال، ثم قال: هكذا سمعت نبيُّكم صلى الله عليه وسلم.
وأخرجه البخاريّ في الأذان (612) عن مُعاذ بن فَضالة، قال: حَدَّثَنَا هشام به وفيه: فقال: مثله إلى قوله:"وأشهد أن محمدًا رسول الله" ولم يذكر فيه الحوقلة، ثم رواه عن إسحاق بن راهويه قال: ثنا وهب بن جرير قال: حَدَّثَنَا هشام، عن يحيي نحوه - يعني لم يذكر فيه الحوقلة.
ثم قال البخاريّ: قال يحيي: وحدثني بعض إخواننا أنه قال: لما قال حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، وقال: هكذا سمعت نبيَّكم صلى الله عليه وسلم يقول.
فقول البخاريّ: قال يحيي (هو ابن أبي كثير) الظاهر أنه عطف على إسناد إسحاق بن راهويه السابق.
وهذا إسناد صحيح غير أن فيه رجلًا مبهمًا في قول يحيى بن أبي كثير: وحدثني بعض إخواننا، هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد (16828) عن إسماعيل بن إبراهيم المعروف بابن عُلية) قال: أخبرنا هشام الدستوائي بإسناده إلى أن قال يحيى: فحدثنا رجل: أنه لما قال: حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله.
ولكن رواه ابن خزيمة (414) من طريق ابن علية به، وجعل:"ولا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله" موصولًا، ولم يذكر قول يحيى بن أبي كثير: حَدَّثَنِي رجل. فالظاهر أَنَّ فيه سقطًا من الناسخ.
وقد تحير الحافظ ابن حجر العسقلاني في تعيين هذا الرّجل الساقط في الإسناد فلم يجزم بشيء.
فإذا جعلنا هذا الرّجل المبهم يقوي ما ذكره عمرو بن علقمة الليثي فيكون ذكر الحوقلة في حديث معاوية حسنًا لغيره مع الاحتمال أن يكون هذا المبهم هو عمرو بن علقمة نفسه، كما قال الحافظ، أو أخوه عبد الله بن علقمة، ومثله لا بأس به في الاستشهاد.
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলকামা ইবনে ওয়াক্কাস বলেন: আমরা মু'আবিয়ার নিকট ছিলাম। মুআযযিন যখন বললো: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার', তখন মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার।' মুআযযিন যখন বললো: 'আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'হাইয়া আলাস-সালাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'হাইয়া আলাল-ফালাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার', তখন তিনি বললেন: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার।' মুআযযিন যখন বললো: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।' এরপর তিনি (মু'আবিয়া) বললেন: যখন মুআযযিন আযান দিতো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)—অথবা বললেন তোমাদের নবী—এভাবেই বলতেন।
1851 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا سمع المؤذِّن يتشهد قال:"وأنا وأنا".
حسن: رواه أبو داود (526) قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن مهديّ، ثنا عليّ بن مسهر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.
وإسناده حسن، ورجاله ثقات غير إبراهيم بن مهدي المصيصي البغدادي فإنه"مقبول" كما قال الحافظ، والحق أنه صدوق، فإنه ممن وثَّقه أبو حاتم مع ابن حبان، ثم رواه ابن حبان (1683) والحاكم (1/ 204) من وجه آخر من طريق هشام بن عروة به مثله، وفيه متابعة قوية لإبراهيم بن مهدي.
ورواه الإمام أحمد (24933) عن عفّان قال: حَدَّثَنَا عبد الواحد بن زياد، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن ميمون بن مهران، قال: أخبرني أبي قال: قالت عائشة: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سمع المنادي قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله وأشهد أن محمدًا رسولُ الله".
ورجاله ثقات غير أن ميمون بن مهران قد اختلف في سماعه من عائشة والصواب أنه سمع منها لأنه ولد سنة سبع عشرة، وتوفي سنة ست عشرة ومائة ولم يذكر العلائي في جامع التحصيل أنه لم يدرك عائشة، ونص في التهذيب أنه رُوي عن أبي هريرة وعائشة وابن عباس وابن عمر وابن الزُّبير وصفية بنت شيبة وأم الدّرداء من الصّحابة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মুয়ায্যিনকে শাহাদাত (তাশাহহুদ) পাঠ করতে শুনতেন, তখন তিনি বলতেন: "আর আমিও (সাক্ষ্য দিচ্ছি), আর আমিও (সাক্ষ্য দিচ্ছি)।"
1852 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: سمعتُ معاوية بن أبي سفيان وهو جالس على المنبر أذَّن المؤذِّن قال: الله أكبر الله أكبر، قال معاوية: الله أكبر الله أكبر، قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال معاوية: وأنا، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال معاوية: وأنا، فلمّا قضى التأذين قال:"يا أيها الناس، إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على هذا المجلس - حين أذَّن المؤذِّن - يقول ما سمعتم مني من مقالتي".
صحيح: رواه البخاريّ في الجمعة (914) قال: حَدَّثَنَا ابن مقاتل: قال: أخبرنا عبد الله (وهو: ابن المبارك) قال: أخبرنا أبو بكر بن عثمان بن سهل بن حُنيف، عن أبي أمامة بن سهل بن حُنَيف فذكر الحديث.
وبوّب عليه البخاريّ بقوله: يُجيب الإمام على المنبر إذا سمع النداء. قال الحافظ: وفي هذا الحديث من الفوائد: تعلم العلم وتعليمه من الامام وهو على المنبر، وأن الخطيب يجيب المؤذِّن وهو على المنبر، وأن قول المجيب"وأنا كذلك" ونحوه يكفي في إجابة المؤذِّن.
মুয়াবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ উমামাহ ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ বলেন, আমি মুয়াবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ানকে মিম্বরে বসা অবস্থায় শুনতে পেলাম, যখন মুআযযিন আযান দিচ্ছিলেন। মুআযযিন যখন বললেন: আল্লাহু আকবার আল্লাহু আকবার, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহু আকবার আল্লাহু আকবার। মুআযযিন যখন বললেন: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও। মুআযযিন যখন বললেন: আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও। অতঃপর যখন আযান সমাপ্ত হলো, তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি এই মিম্বরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুআযযিন যখন আযান দিচ্ছিলেন, তখন আমি আমার পক্ষ থেকে যে কথাগুলো বললাম, হুবহু সেগুলোই বলতে শুনেছি।"
1853 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الدعاء لا يُرد بين الأذان والإقامة فادعوا".
حسن: رواه أبو داود (521) والتِّرمذيّ (212) والنسائي في"عمل اليوم والليلة" (68 - 70)
كلّهم من طرق عن زيد العَمّي، عن أبي إياس، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.
قال الترمذيّ: حسن وفي نسخة: حسن صحيح. والأوّل قريب من الصواب؛ لأن في إسناده زيد العَمِّي زيد بن الحواريّ، أبو الحواري البصريّ، اختلف في سبب نسبته هذه، فقيل: هو منسوب إلى"بني العم" وهو بطن من بني تميم، وقال عليّ بن مصعب: سمي العَمِّي لأنه كان كلما سئل عن شيء قال: حتَّى أسأل عَمِّي، وهو ضعيف فقد ضعَّفه أبو حاتم والنسائي وابن سعد وابن المدينيّ، وقال ابن حبان: يروي عن أنس أحاديث موضوعة لا أصول لها.
فمثله لا يحسن حديثه فضلًا من تصحيحه.
ولكن للحديث طرق أخرى ولذا أدخلته في الجامع، ومن هذه الطرق ما رواه الإمام أحمد في مسنده (12584) قال: حَدَّثَنَا أسود وحسين بن محمد قالا: حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن بُريد بن أبي مريم، عن أنس فذكر الحديث ورواه أيضًا أبو يعلى (3679) من طريق إسرائيل به، وأشار إليه الترمذيّ بقوله:"وقد رواه أبو إسحاق الهمدانيّ، عن بُريد بن أبي مريم، عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثل هذا".
ورجاله ثقات غير أبي إسحاق وهو عمرو بن عبد الله السبيعي المشهور بكنيته وهو تابعي ثقة إِلَّا أنه كان يدلس وهو من المرتبة الثالثة عند الحافظ ابن حجر الذين لم يحتج الأئمة من أحاديثهم إِلَّا بما صرحوا فيه بالسماع، ولكن تابعه ابنه يونس فرواه الإمام أحمد (13357) عن إسماعيل بن عمر قال: حَدَّثَنَا يونس - وهو بن أبي إسحاق - قال: حَدَّثَنَا بُريد بن أبي مريم عن أنس فذكر الحديث.
ويونس بن أبي إسحاق صدوق ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (426، 427) وقال: يريد الدعوة المجابة.
وأسود هو: ابن عامر الملقب بشاذان، ثقة من رجال الجماعة وحسين بن محمد هو: ابن بهرام المروَّذي - بتشديد الواو وبذال معجمة - ثقة من رجال الجماعة.
هذه من أجود الأسانيد التي رُوي عنها هذا الدعاء. لا أعلم حديثًا صحيحًا غير حديث أنس في هذا الباب.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আযান ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ে করা দোয়া ফিরিয়ে দেওয়া হয় না (অর্থাৎ কবুল হয়), সুতরাং তোমরা দোয়া করো।"
1854 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قال حين يسمعُ النداءَ: اللَّهُمَّ ربَّ هذه الدعوة التامة والصلاة القائمة، آتِ محمدًا الوسيلة والفضيلة، وابعثه مقامًا محمودًا الذي وعدته، حلَّتْ له شفاعتي يوم القيامة".
صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (614) وفي التفسير (4719) في قوله تعالى: {عَسَى أَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا} [الإسراء: 79] عن عليّ بن عَيَّاش قال: حَدَّثَنَا شعيب بن أبي حمزة، عن
محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আযান শুনে এই দু'আটি পড়ে: 'হে আল্লাহ! এই পরিপূর্ণ আহ্বান এবং প্রতিষ্ঠিত সালাতের রব্ব! আপনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল-ওয়াসীলা (জান্নাতের এক বিশেষ স্থান) ও আল-ফযীলা (শ্রেষ্ঠত্ব) দান করুন এবং তাঁকে সেই 'মাকামে মাহমুদ' (প্রশংসিত স্থান)-এ প্রতিষ্ঠিত করুন, যার প্রতিশ্রুতি আপনি তাঁকে দিয়েছেন।' — কিয়ামতের দিন তার জন্য আমার শাফাআত (সুপারিশ) ওয়াজিব হয়ে যাবে।"
1855 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم" … ثم سلوا الله لي الوسيلة فإنها منزلة في الجنّة لا تنبغي لعبد من عباد الله، وأرجو أن أكون أنا هو، فمن سأل لي الوسيلة حلَّتْ له شفاعتي".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) من طريق كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "…এরপর তোমরা আল্লাহর কাছে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করো। কারণ এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে একজনের জন্য ছাড়া আর কারো জন্য শোভনীয় নয়। আর আমি আশা করি যে আমিই হব সেই ব্যক্তি। সুতরাং, যে ব্যক্তি আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার সুপারিশ (শাফা‘আত) আবশ্যক হয়ে যাবে।"
1856 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سلوا الله لي الوسيلة، فإنه لا يسألها عبد في الدُّنيا إِلَّا كنت له شهيدًا أو شفيعًا يوم القيامة".
حسن: أخرجه الطبرانيّ في الأوسط - مجمع البحرين (639) قال: حَدَّثَنَا أحمد - يعني ابن عليّ الأبار، ثنا الوليد بن عبد الملك الحرانيّ، ثنا موسى بن أعين، عن ابن أبي ذئب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يروه عن ابن أبي ذئب إِلَّا موسى.
وقال الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (1/ 333) فيه الوليد بن عبد الملك الحرانيّ، وقد ذكره ابن حبان في الثّقات (9/ 227) وقال:"مستقيم الحديث إذا روى عن الثّقات"، قال الهيثميّ:"وهذا من روايته عن موسى بن أعين وهو ثقة" انتهى.
قلت: موسى بن أعين الراوي عنه من رجال الشّيخين، وثَّقه أبو زرعة وأبو حاتم والدارقطني وغيرهم، والاسناد حسن لأجل الوليد بن عبد الملك نفسه فإنه لم يبلغ درجة الثقة.
قال عبد الرحمن بن أبي حاتم: سألت أبي عنه فقال:"صدوق"."الجرح والتعديل" (9/ 10).
ولحديث ابن عباس هذا أسانيد أخرى، من أجودها ما رواه عبد بن حميد في"المنتخب" (ص 585) (687) عن عبيد الله بن موسى، عن موسى بن عبيد، عن محمد بن عمرو بن عطاء عنه مثله. وموسى بن عبيدة - وهو ابن نشيط الربذيّ، ضعيف.
ورواه أيضًا ابن أبي شيبة، وأحمد بن منيع من طريق موسى بن عبيدة"المطالب العالية" (1/ 136) رقم (255).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে আমার জন্য 'আল-ওয়াসিলাহ' প্রার্থনা করো। কারণ যে বান্দাই দুনিয়াতে আমার জন্য এটি (আল-ওয়াসিলাহ) প্রার্থনা করবে, কিয়ামতের দিন আমি তার জন্য সাক্ষী অথবা সুপারিশকারী হব।"
1857 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله! إنَّ المؤذنين يَفْضُلوننا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قل كما يقولون، فإذا انتهيت فسلْ تُعطه".
حسن: رواه أبو داود (524) واللّفظ له، وأحمد (6601) والبيهقي (1/ 410) كلّهم من طريق حُييّ، عن أبي عبد الرحمن - يعني الحُبلِّي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وحُييّ هو: ابن عبد الله بن شريح المعافري المصريّ، مختلف فيه؛ فقال البخاريّ: فيه نظر.
وقال أحمد: أحاديثه مناكير. وقال النسائيُّ ليس بالقويِّ.
ولكن قال ابن معين: ليس به بأس. وقال ابن عديّ: أرجو أنه لا بأس به إذا روى عنه ثقة.
قلت: وهنا روى عنه ابن وهب وهو ثقة، وحسَّنه أيضًا الحافظ في"نتائج الأفكار" (1/ 378).
وأمّا ما رواه مالك في الصّلاة (7) عن أبي حازم بن دينار، عن سهل بن سعد الساعدي أنَّه قال:"ساعتان يفتح لهما أبواب السماء، وقلَّ داعٍ تُردُّ عليه دعوته: حين يحضرُ النداء للصلاة، والصفُّ في سبيل الله". فهو موقوف.
قال ابن عبد البرِّ في التمهيد (21/ 138):"هكذا هو موقوف على سهل بن سعد في الموطأ عند جماعة الرواة، ومثله لا يقال من جهة الرأي. وقد رواه أيوب بن سويد ومحمد بن خالد وإسماعيل بن عمر عن مالك مرفوعًا". ثمَّ أسند عن هؤلاء.
وخالف موسى بن يعقوب مالكًا فرواه عن أبي حازم، عن سهل بن سعد مرفوعًا. رواه أبو داود (2540) وابن خزيمة (419) والحاكم (1/ 198) والبيهقي (1/ 410) كلّهم من هذا الوجه. ولفظه:"ثنتان لا تُردَّان، أو قلَّما تُردان: الدعاء عند النداء، وعند البأس حين يلحم بعضهم بعضًا".
قال الحاكم:"هذا حديث ينفرد به موسى بن يعقوب، وقد رُوي عن مالك، عن أبي حازم، وموسى بن يعقوب ممن يوجد عنه التفرد".
وقال البيهقيّ: رفعه الزمعي - موسى بن يعقوب، ووقَّفه مالك بن أنس الإمام". انتهى.
قلت: الظاهر أنَّ موسى بن يعقوب أخطأ في رفع هذا الحديث؛ لأنَّه وُصِف بسوء الحفظ.
وقال ابن المديني: ضعيف الحديث منكر الحديث. وضعَّفه النسائيُّ وغيره.
وأشار الحافظ إلى أنَّه مختلف فيه ولكنَّه قال:"حديث حسن صحيح"."نتائج الأفكار" (1/ 379 - 380) فلعلَّه لأجل الشواهد.
فالخُلاصة: أنَّه يُحسَّن حديثه إذا لم يُخالف، وقد خالف هنا إمامًا من الأئمة وهو مالك بن أنس.
وورد في سؤال الوسيلة عند سماع الأذان من حديث أبي الدّرداء وابن مسعود مرفوعًا وفي إسنادهما ضعف، قاله ابن رجب في"فتحه" (3/ 464).
قلت: وفيه أيضًا عن أبي سعيد الخدريّ، وأنس بن مالك، وأبي هريرة، أخرج بعضها الطبرانيّ في"كتاب الدعاء" وهي كلُّها ضعيفة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! নিশ্চয়ই মুয়াজ্জিনগণ আমাদের চেয়ে শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করছে।’ তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “তারা যা বলে, তোমরাও তা-ই বলো। যখন তোমরা শেষ করবে, তখন (আল্লাহর কাছে) প্রার্থনা করো, তোমাদেরকে তা দেওয়া হবে।”
1858 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قال المؤذِّن: الله أكبر، الله أكبر. قال أحدكم: الله أكبر، الله أكبر. إلى أن قال: حيَّ على الصّلاة. قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله. ثم قال: حيَّ على الفلاح. قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا
بالله. ثمّ قال: الله أكبر، الله أكبر. قال: الله أكبر الله أكبر. ثمّ قال: لا إله إِلَّا الله، قال: لا إله إِلَّا الله من قلبه دخل الجنّة".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (385) من طريق حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب، عن أبيه، عن جدِّه عمر بن الخطّاب فذكر الحديث بطوله.
وقوله:"الحول" معناه: الحركة. أي لا حركة لي ولا استطاعة إِلَّا بمشيئة الله.
ويُقال في التعبير عن قولهم: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله" الحوقلة. الحاء والواو من الحول. والقاف من القوة. واللام من اسم الله تعالى. هو مثل البسملة في بسم الله. والحمدلة في الحمد لله.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুয়াজ্জিন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন তোমাদের কেউ 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলবে। ... যতক্ষণ না সে 'হাইয়্যা আলাস সালাহ' বলে, তখন সে বলবে: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'। অতঃপর যখন সে 'হাইয়্যা আলাল ফালাহ' বলে, তখন সে বলবে: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'। এরপর যখন সে 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন সে বলবে: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার'। এরপর যখন সে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন যে ব্যক্তি অন্তর থেকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
1859 - عن عيسى بن طلحة قال: دخلنا على معاوية، فنادي المنادي بالصلاة فقال: الله أكبر الله أكبر. فقال معاوية: الله أكبر الله أكبر. ثمّ قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله. فقال معاوية: وأنا أشهد. ثمّ قال: أشهد أن محمدًا رسول الله. فقال معاوية: وأنا أشهد. ثمّ قال: حيَّ على الصّلاة. فقال معاوية: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله. ثمّ قال: حيَّ على الفلاح. فقال معاوية: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله. ثمّ قال: هكذا سمعت نبيكم صلى الله عليه وسلم يقول.
حسن: رواه ابن خزيمة (414) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقيّ، ثنا ابن علية (وهو إسماعيل بن إبراهيم) عن هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن إبراهيم، عن عيسى بن طلحة فذكر مثله. هكذا رواه ابن خزيمة ذكر الحوقلة متصلًا.
وأورده البخاريّ في الأذان (613) قائلًا: وقال يحبي: وحدثني بعض إخواننا أنَّه قال: لما قال: حيَّ على الصّلاة قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله. وقال: هكذا سمعنا نبيَّكم صلى الله عليه وسلم يقول.
فأبهم البخاريّ الذين حدث عنهم يحيى بن أبي كثير. فلم يثبت عنده من هم الذين حدثوا به ولنا ذكر"الحوقلة" مقطوعًا .. ولم يصل شراح البخاريّ إلى تعيين المبهمين، إنّما قال كلٌّ بما أدّى إليه اجتهاده.
وهذا الحديث بتمامه أخرجه الإمام أحمد (16828) عن إسماعيل بن إبراهيم (وهو ابن علية) وأبي عامر العقَدي قالا: حَدَّثَنَا هشام به مثله، إِلَّا"الحوقلة" فإنَّه ذكره أيضًا مقطوعًا.
ولحديث معاوية طريق آخر رواه البخاريّ (904) كما سبق في باب إجابة الامام على المنبر إذا سمع النداء، وليس فيه ذكر الحوقلة.
فلا أدري كيف ساق ابن خزيمة متن الحديث بتمامه مع ذكر الحوقلة بهذا الإسناد، ولكن يقوي عمله هذا بما رواه الإمام أحمد (16381) والنسائي في المجتبي (677) وفي"عمل اليوم والليلة" (353) والبغوي في شرحه (422) كلُّهم من طريق ابن جريج، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن يحيى المازنيّ،
أنَّ عيسى بن عمر أخبره، عن عبد الله بن علقمة بن وقَّاص، أنَّ علقمة بن وقَّاص قال: إنِّي لعند معاوية إذ أذَّن مؤذِّنه فقال: كما قال المؤذِّن حتَّى إذا قال: حيَّ على الصّلاة. قال معاوية:"لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله" وقال بعد ذلك ما قال المؤذن ثمّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ذلك.
وفيه عيسى بن عمر ويقال: ابن عُمير حجازي. قال الدَّارقطنيّ: مدني معروف يُعتبر به، ولكن قال الذّهبيُّ: لا يعرف. واعتمده الحافظ في"التقريب، فقال: مقبول". وشيخه عبد الله بن علقمة بن وقَّاص الليثي أيضًا"مقبول" أي حيث يُتابع، وقد توبع؛ تابعه أخوه عمرو بن علقمة بن وقَّاص. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (16896) وابن خزيمة (416) وعنه ابن حبّان (1687) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد القطان، قال: حَدَّثَنَا محمد بن عمرو قال: حَدَّثَنِي أبي عن جدِّي. أي عن عمرو بن علقمة، عن علقمة بن وقَّاص فذكر الحديث بتمامه. وعمرو بن علقمة بن وقَّاص أيضًا"مقبول" يعني عند المتابعة.
وهذه المتابعات مع الشاهد من حديث عمر بن الخطّاب يقوي حديث معاوية بن أبي سفيان، وقد أشار إليه الحافظ أيضًا.
ولحديث معاوية أسانيد أُخرى غير أنَّ ما ذكرته هي أصحُّها. انظر مزيدًا من التخريج في باب ما يقول إذا سمع النداء.
মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ঈসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। এমন সময় সালাতের মুয়াজ্জিন আযান দিল। মুয়াজ্জিন বলল: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: হাইয়া আলাস সালাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: হাইয়া আলাল ফালাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ। এরপর তিনি (মু'আবিয়াহ) বললেন: আমি তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবে বলতে শুনেছি।
1860 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنَّه سمع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم المؤذن فقولوا مثل ما يقول، ثمّ صلّوا عليَّ؛ فإنَّه من صلَّى عليّ صلاةً صلى الله عليه بها عشرًا، ثمّ سلوا الله لي الوسيلة، فإنَّها منزلة في الجنَّة لا تنبغي إِلَّا لعبد من عباد الله. وأرجو أن أكون أنا هو. فمن سأل لي الوسيلة حلَّت له الشفاعةُ".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) عن محمد بن سلمة المراديّ، حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، عن حيوة وسعيد بن أبي أيوب وغيرهما، عن كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.
أمامة، أو عن بعض أصحاب النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فذكر مثله.
سكت عليه أبو داود، وقال المنذري في مختصر أبي داود:"في إسناده رجل مجهول. وشهر بن حوشب تكلَّم فيه غير واحد، ووثقه الإمام أحمد ويحيى" اهـ.
قلت: وفيه علة ثالثة، وهي محمد بن ثابت العبديّ، مختلف فيه فتكلَّم فيه ابن معين وأبو حاتم والبخاري وابن عدي. ووثقه العجلي وهو لم يتابع على توثيقه، ولذا قال النوويّ في"المجموع" (3/ 122):"هو حديث ضعيف، لأنَّ الرّجل مجهول، ومحمد بن ثابت ضعيف بالاتفاق، وشهر مختلف في عدالته".
وضعف هذا الحديث الحافظ ابن حجر أيضًا في"التلخيص"، والبيهقي أشار إلى ضعَّفه بعد أن رواه من طريق أبي داود قائلًا: وهذا إن صحَّ، شاهد لما استحسنه الشافعي رحمه الله من قولهم: اللَّهُمَّ أقمها وأدمها، واجعلنا من صالح أهلها عملًا""السنن الكبرى" (1/ 411).
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমরা মুয়াজ্জিনকে আযান দিতে শোনো, তখন সে যা বলে তোমরাও তাই বলো। এরপর আমার উপর সালাত (দরূদ) পড়ো। কারণ, যে আমার উপর একবার সালাত (দরূদ) পাঠ করে, আল্লাহ তাকে এর বিনিময়ে দশবার সালাত (রহমত) দান করেন। এরপর আল্লাহর কাছে আমার জন্য 'আল-ওয়াসীলা' কামনা করো। নিশ্চয়ই এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান, যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে শুধু একজনকে দেওয়া হবে। আমি আশা করি, আমিই হব সেই ব্যক্তি। সুতরাং যে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার শাফা‘আত (সুপারিশ) ওয়াজিব হয়ে যাবে।"
1861 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الإمام ضامنٌ والمؤذن مُؤْتَمن، اللَّهُمَّ أَرْشِد الأئمة واغفر للمؤذنين".
صحيح: رواه الترمذيّ (207) قال: حَدَّثَنَا هناد، حَدَّثَنَا أبو الأحوص وأبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد اختلف على الأعمش. فرواه سفيان الثوري عند الإمام أحمد (9942) وزائدة عند أبي داود الطيالسي (2526) وشريك عند الإمام أحمد (9478/ 1) كل هؤلاء وغيرهم مثل حديث أبي الأحوص وأبي معاوية عن الأعمش متصلا.
ورواه محمد بن فضيل عن الأعمش، عن رجل، عن أبي صالح، عنه وحديثه عند أبي داود (517) عن الإمام أحمد وهو في مسنده (7169) فأدخل بين الأعمش وأبي صالح رجلًا غير مسمى.
فاختلف أهل العلم في سماع الأعمش هذا الحديث من أبي صالح: فقال ابن معين: لم يسمع الأعمش هذا الحديث من أبي صالح.
والتحقيق في ذلك أن الأعمش سمع هذا الحديث أولًا عن رجل، عن أبي صالح، ثمّ تيسر له السماع من أبي صالح مباشرة، وعليه أكثر أصحابه منهم: معمر والثوري وأبو الأحوص وأبو معاوية وحفص بن غياث وجرير بن عبد الحميد وغيرهم، وقد صرَّح الأعمش في بعض رواياته أنه سمع من أبي صالح.
ثمّ اختلف أيضًا على أبي صالح، فقيل عنه، عن أبي هريرة رواه عنه ابنه سهيل، عن أبيه أبي صالح انظر ابن خزيمة (3/ 16) ولكن قال الإمام أحمد: هذا الحديث لم يسمعه سهيل من أبيه،
وإنما سمعه من الأعمش كذا نقله البيهقيّ (1/ 430) ولكن سهيل ثقة، ولم يعرف بالتدليس، وقد روي كثيرًا عن أبيه، فعنعنته محمولة على السماع.
وكذلك رواه أبو إسحاق السبيعيّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة.
رواه الإمام أحمد (8909 و 1066) عن موسى بن داود، ثنا زهير، عن أبي إسحاق به، وصحَّحه ابن خزيمة (3/ 16) فرواه من طريقه.
وخالفه نافع بن سليمان فرواه عن محمد بن أبي صالح، عن أبيه، عن عائشة، رواه الإمام أحمد (24363) عن أبي عبد الرحمن، ثنا حيوة بن شريح، قال: حَدَّثَنِي نافع بن سليمان به مثله.
وقد أنكر بعض أهل العلم أن يكون لأبي صالح ولد اسمه محمد ولذا اختلفت أقوال أهل العلم في هذه الروايات فنقل الترمذيّ عن أبي زرعة قوله: حديث أبي صالح عن أبي هريرة أصح من حديث أبي صالح عن عائشة، ونقل عن البخاريّ أنه قال: حديث أبي صالح، عن عائشة أصح، وذكر عن عليّ بن المديني أنه لم يثبتْ حديث أبي صالح، عن أبي هريرة، ولا حديث أبي صالح عن عائشة. انتهى.
ونقل الحافظ في التلخيص (1/ 207) عن ابن حبان: أنه صحَّح طريقين فقال: قد سمع أبو صالح هذين الخبرين من عائشة وأبي هريرة جميعًا.
قلت: هذا الذي يدل عليه الصناعة الحديثية إن ثبت وجود محمد بن أبي صالح، وإلَّا فحديث أبي صالح عن أبي هريرة أصح، وبه قال أكثر أهل العلم منهم أبو زرعة والعقيلي والدارقطني وغيرهم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইমাম হলেন দায়িত্বশীল (জামিনদার) এবং মুআযযিন হলেন আমানতদার (বিশ্বস্ত)। হে আল্লাহ! আপনি ইমামগণকে সঠিক পথে পরিচালিত করুন এবং মুআযযিনদেরকে ক্ষমা করুন।"
1862 - عن ابن عمر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الإمام ضامنٌ، والمؤذِّن موتَمن. اللَّهُمَّ ارشد الأئمَّة واغفر للمؤذِّنين".
صحيح: رواه أبو العباس السراج في"مسنده" (72) عن محمد بن عقيل، حَدَّثَنَا حفص.
وحدثنا أحمد بن حفص بن عبد الله، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، قال: حَدَّثَنِي إبراهيم بن طهمان، حَدَّثَنَا سليمان الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، ونقل الحافظ في"التلخيص" (1/ 207) تصحيحه من الضياء في"المختارة" بعد عزوه إلى أبي العباس السراج، ولكن رواه البيهقيّ (1/ 431) من طريق حفص بن عبد الله، عن إبراهيم بن طهمان. وأعلَّه بما رواه عمار بن رُزَيق، عن الأعمش، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يُغفر للمؤذِّن مدى صوته، ويشهد له كل رطبٍ ويابس سمع صوته". هذا القدر مرفوعًا دون الحديث الآخر. انتهى.
قلت: حديث عمار بن رُزَيق سبق تخريجه في باب رفع الصوت بالنداء، وفضل الأذان. وردَّ ابن التركماني على البيهقيّ قائلًا:"إنَّ كان البيهقيّ قصد بذلك زيادة غيره لا سيما مع انفصال أحد المتنين عن الآخر في المعنى، فهما حديثان مستقلان، فبعض الرواة روى أحدهما، وبعضهم شارك
في ذلك وانفرد بالحديث الآخر".
قلت: ما قاله ابن التركماني كلام وجيه حسب الصناعة الحديثية.
وقوله:"الإمام ضامن" قال أهل اللغة: الضامن في كلام العرب معناه الراعيّ، والضمان معناه: الرعاية.
والإمام ضامن معناه: أنه يحفظ الصّلاة، وعدد الركعات على القوم، وقيل معناه: ضامن الدعاء بعمهم به، ولا يختص بذلك دونهم، وليس الضمان الذي يوجب الغرامة من هذا في شيء، وقد تأوله قوم على أنه يتحمل القراءة عنهم في بعض الأحوال، وكذلك يتحمل القيام أيضًا إذا أدركهـ راكعًا. أفاده الخطّابي.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইমাম হলেন জামিন (দায়িত্বশীল), আর মুয়াজ্জিন হলেন বিশ্বস্ত (আমানতদার)। হে আল্লাহ! ইমামগণকে সঠিক পথের দিশা দিন এবং মুয়াজ্জিনগণকে ক্ষমা করে দিন।"
1863 - عن أبي عليّ الهمداني أنه خرج في سفينة فيها عقبة بن عامر الجُهنيّ، فحانت صلاة من الصلوات، فأمرنا أن يؤمَّنا، وقلنا له: إنك أحقُّنا بذلك، أنت صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأبى فقال: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أم الناس فأصاب فالصلاة له ولهم، ومن انتقص من ذلك شيئًا فعليه، ولا عليهم".
حسن: رواه أبو داود (580) وابن ماجة (983) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن حرملة، عن أبي عليّ الهمداني فذكر الحديث.
وإسناده حسن، فإن عبد الرحمن بن حرملة حسن الحديث إذا لم يخطئ، وهو من رجال مسلم، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به، وقال ابن سعد: كان ثقة كثير الحديث.
وأبو عليّ هو: ثمامة بن شُفيّ، وثَّقه النسائيّ وغيره من رجال مسلم، وأخرجه الحاكم (1/ 210) من طريق عبد الرحمن بن حرملة، وصحّحه.
وفي الباب عن سهل بن سعد، وسلامة بنت الحر أخت حرشة، وابن عمر، وواثلة، وأبي محذورة، وأبي أمامة، وكلها معلولة لم يسلم منها إِلَّا ما ذكرت.
আবূ আলী আল-হামদানী থেকে বর্ণিত, তিনি উকবাহ ইবনু আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে একটি নৌকায় বের হলেন। অতঃপর (পাঁচ ওয়াক্তের) কোনো এক সালাতের সময় হলো। তখন তিনি আমাদের ইমামতি করার নির্দেশ দিলেন। আমরা তাঁকে বললাম: আপনি আমাদের মধ্যে এর (ইমামতির) সবচেয়ে বেশি হকদার, কেননা আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী। তখন তিনি অস্বীকার করলেন এবং বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি লোকদের ইমামতি করল এবং সঠিকভাবে তা সম্পাদন করল, তবে তার নিজের জন্যও সালাতের সওয়াব রয়েছে এবং তাদের (মুক্তাদিদের) জন্যও রয়েছে। আর যে ব্যক্তি তাতে (ইমামতিতে) কোনো ত্রুটি করল, তবে তার (পাপ) তার উপরই বর্তাবে, তাদের উপর বর্তাবে না।"
1864 - عن أبي جحيفة قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمكة وهو في قُبَّةٍ حمراء من أدَم، فخرج بلالٌ فأذَّن. فكنتُ أتتبعُ فَمه ههنا وههنا، قال: ثمّ خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وعليه حُلَّةٌ حمراءُ بُرودٌ يمانية قِطري.
وقال موسى: قال: رأيتُ بلالًا خرج إلى الأبطح فأذَّن فلمّا بلغ:"حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح" لوى عُنُقَه يمينًا وشمالًا، ولم يستدر، ثمّ دخل فأخرج العنزة … وساق حديثه.
صحيح: رواه أبو داود (520) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا قيس - يعني ابن الربيع - ح
وحدثنا محمد بن سليمان الأنباريّ، حَدَّثَنَا وكيع، عن سفيان، جميعًا عن عون بن أبي حجيفة، عن أبيه فذكر الحديث.
قلت: الإسناد الأوّل فيه قيس بن الربيع ضعَّفه عليّ بن المديني والنسائي والدارقطني وغيرهم.
ولكن تابعه سفيان إِلَّا في قوله:"ولم يستدر" وقد ثبت ذلك في روايات أخرى.
فقد رواه الترمذيّ (197) والحاكم (1/ 202) من حديث عبد الرزّاق، عن سفيان وفيه:"رأيت بلالًا يُؤذِّن ويدور، ويتبع فاه هاهنا وهاهنا، وإصبعاه في أذنيه" وقال:"حسن صحيح".
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين.
والمراد منه التواء العنق يمينًا وشمالًا كما ذكره النسائيّ (2/ 12) بقوله: ينحرف يمينًا وشمالًا.
وأمّا إدخال الاصبعين في الأذنين فهو صحيح.
قال الترمذيّ:"حديث أبي جحيفة حسن صحيح، وعليه العمل عند أهل العلم، يستحبون أن يُدخل المؤذن إصبعيه في أذنيه في الأذان. وقال بعض أهل العلم: وفي الإقامة أيضًا، يُدخل إصبعيه في أذنيه وهو قول الأوزاعي" انتهى.
قلت: أصل حديث أبي جحيفة في الصحيحين. وسبق ذكره في الطهارة في باب استعمال فضل الوضوء إِلَّا أن البخاريّ لم يسق لفظ الحديث كاملًا كما لم يذكر هو ولا مسلم إدخال الاصبعين في الأذنين.
আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। তিনি চামড়ার তৈরি একটি লাল তাঁবুর মধ্যে ছিলেন। তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং আযান দিলেন। আমি তার মুখ এদিক-ওদিক অনুসরণ করছিলাম (দেখছিলাম)। তিনি (আবু জুহাইফা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, আর তাঁর পরিধানে ছিল ইয়ামানের তৈরী লাল রঙের ডোরাকাটা চাদর (হুল্লা)।
আর মূসা (ইবনে ইসমাঈল) বলেন: তিনি (আবু জুহাইফা) বলেছেন: আমি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি বাতহা নামক স্থানে বের হয়ে আযান দিলেন। যখন তিনি “হাইয়্যা আলাস-সালাহ”, “হাইয়্যা আলাল-ফালাহ” বললেন, তখন তিনি তার ঘাড় ডানে ও বামে বাঁকালেন, কিন্তু শরীর ঘোরালেন না। এরপর তিনি প্রবেশ করলেন এবং (একটি) আনযা (বর্শা বা লাঠি) বের করে আনলেন... এবং তিনি তার হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
সহীহ: আবূ দাউদ (৫২০) মূসা ইবনে ইসমাঈল হতে, তিনি কাইস—অর্থাৎ ইবনু আর-রাবী‘—হতে... (অন্য সনদ: আবূ দাউদ) মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান আল-আম্বারী হতে, তিনি ওয়াকী‘ হতে, তিনি সুফিয়ান হতে, সকলে আওন ইবনে আবী জুহাইফা হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে বর্ণনা করেছেন এবং হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: প্রথম সনদটিতে কাইস ইবনু আর-রাবী’ রয়েছেন, যাঁকে আলী ইবনুল মাদীনী, নাসাঈ, দারাকুতনি এবং অন্যান্যরা দুর্বল বলেছেন। কিন্তু সুফিয়ান তাকে অনুসরণ করেছেন, শুধু তার "তিনি শরীর ঘোরাননি" এই কথাটি ছাড়া। আর এই অংশটি অন্যান্য বর্ণনায় প্রমাণিত হয়েছে।
তিরমিযী (১৯৭) এবং হাকিম (১/২০২) হাদীসটি আব্দুর রাযযাক হতে, তিনি সুফিয়ান হতে বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে: "আমি বিলালকে আযান দিতে দেখলাম, আর তিনি (ডানে-বামে) ঘুরছিলেন, এবং তার মুখমণ্ডল এদিক-ওদিক অনুসরণ করছিলেন, আর তার উভয় আঙ্গুল তার কানে ছিল।" এবং তিনি (তিরমিযী) বলেছেন: "হাসান সহীহ।"
আর হাকিম বলেছেন: এটি শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ। এর উদ্দেশ্য হল ডানে ও বামে ঘাড় বাঁকানো, যেমনটি নাসাঈ (২/১২) উল্লেখ করেছেন তার এই কথা দ্বারা: তিনি ডানে ও বামে বাঁকেন।
আর কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানো সহীহ। তিরমিযী বলেছেন: "আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হাসান সহীহ। আর ইলমপন্থীদের নিকট এর উপর আমল রয়েছে; তারা মুআযযিনের জন্য আযানের সময় কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানোকে মুস্তাহাব মনে করেন। আর কতিপয় ইলমপন্থী বলেছেন: ইকামাতের সময়ও তিনি তার আঙ্গুল কানে প্রবেশ করাবেন। এটি আওযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর অভিমত।" সমাপ্ত।
আমি (আলবানী) বলি: আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের মূল অংশ সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এ রয়েছে। অযু শেষে অবশিষ্ট পানির ব্যবহার সংক্রান্ত পবিত্রতা অধ্যায়ে এর আলোচনা পূর্বে করা হয়েছে। তবে বুখারী হাদীসের সম্পূর্ণ শব্দাবলী উল্লেখ করেননি, যেমন তিনি ও মুসলিম কেউই কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানোর বিষয়টি উল্লেখ করেননি।
1865 - عن جابر بن سمرة قال: كان بلال يؤذِّن إذا دحضتْ، فلا يُقيم حتَّى يخرجَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فإذا خرج أقام الصّلاةَ حين يراه.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (606) عن سلمة بن شبيب، ثنا الحسن بن أعين، ثنا زهير، ثنا سماك بن حرْب، عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
ورواه أبو داود (537) والتِّرمذيّ (202) من طريق إسرائيل، عن سماك بن حرب وفيه:"كان مؤذن رسول الله صلى الله عليه وسلم يؤذن، ثمّ يُمْهِل، فإذا رأى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قد خرج أقام الصّلاة".
ولم يُسم الترمذيّ اسم المؤذِّنِ، وسماه أبو داود بأنه بلال.
قال الترمذيّ: هكذا قال بعض أهل العلم:"إنَّ المؤذِّن أملكُ بالأذان، والإمام أملك بالإقامة".
قلت: قول الترمذيّ هو الصواب، وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:
"المؤذِّن أملك بالأذان، والإمام أملك بالإقامة، اللَّهُمَّ أرشد الأئمة واغفر للمؤذنين" فهو ضعيف، رواه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1327) عن محمد بن إسحاق بن إبراهيم بن فروخ، ثنا عليّ بن أشكاب، ثنا يحيى بن إسحاق، ثنا شريك، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة
فذكر الحديث.
قال ابن عدي: هذا بهذا اللّفظ لا يُروى إِلَّا عن شريك من رواية يحيى بن إسحاق عنه، وإنما رواه الناس عن الأعمش بلفظ آخر وهو قول:"الإمام ضَامِنٌ والمؤذِّن مُؤتمن. اللَّهُمَّ أرشد الأئمة واغفر للمؤذنين". وحديث الأعمش سبق تخريجه.
ورواه البيهقيّ في"الكبرى" (2/ 19) من كلام عليّ بن أبي طالب وقال:"ورُوي عن شريك، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة مرفوعًا وليس بمحفوظ".
وقوله:"فإذا خرج أقام الصّلاة حين يراه" لا يعارض ما ثبت في الصحيحين - البخاريّ في الدعوات (6310) ومسلم في صلاة المسافرين (736):"فإذا طلع الفجرُ صلي رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين خفيفتين، ثمّ اضطلع على شقه الأيمن حتَّى يجيءَ المؤذِّنُ فيؤذِنُه" وفي رواية مسلم:"حتَّى يأتيه المؤذِّن للإقامة" فمعنى هذا أن بلالًا كان يراقب خروجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإذا رآه يشرع في الإقامة قبل أن يراه الناس. وأحيانا إذا تأخر خروجُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يذهب إلى بابه لتفقد أحواله، وليُخبره بأن الوقت قد حان، فإن خرج شرع في الإقامة.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন আযান দিতেন যখন সূর্য ঢলে পড়ত (যোহরের ওয়াক্ত শুরু হতো)। তিনি ইকামত দিতেন না, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হতেন। যখন তিনি বের হতেন, তখন তাঁকে দেখেই সালাতের জন্য ইকামত দিতেন।
সহীহ: এটি মুসলিম সালাতের স্থান অধ্যায়ে (৬০৬) বর্ণনা করেছেন।
এটি আবু দাউদ (৫৩৭) এবং তিরমিযী (২০২) ইসরাঈলের সূত্রে সিমা ইবনু হারব থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে আছে: "রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুআযযিন আযান দিতেন, তারপর অপেক্ষা করতেন। যখন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বের হতে দেখতেন, তখন সালাতের জন্য ইকামত দিতেন।"
তিরমিযী (রঃ) মুআযযিনের নাম উল্লেখ করেননি, কিন্তু আবু দাউদ (রঃ) তাঁর নাম বিলাল বলে উল্লেখ করেছেন।
তিরমিযী (রঃ) বলেছেন: কিছু সংখ্যক আহলে ইলম এই মত পোষণ করেন যে, "আযান দেওয়ার ক্ষেত্রে মুআযযিন অধিক ক্ষমতাবান এবং ইকামত দেওয়ার ক্ষেত্রে ইমাম অধিক ক্ষমতাবান।"
আমি (লেখক) বলি: তিরমিযী (রঃ)-এর কথাই সঠিক। আর আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: "আযান দেওয়ার ক্ষেত্রে মুআযযিন অধিক ক্ষমতাবান এবং ইকামত দেওয়ার ক্ষেত্রে ইমাম অধিক ক্ষমতাবান। হে আল্লাহ, ইমামদের সঠিক পথ দেখাও এবং মুআযযিনদের ক্ষমা করো"—এই বর্ণনাটি দুর্বল।
[... অন্যান্য রাবী ও দুর্বলতার বিস্তারিত আলোচনা]
আর তাঁর এই উক্তি: "যখন তিনি বের হতেন, তখন তাঁকে দেখেই সালাতের জন্য ইকামত দিতেন"—এটি সহীহ্ বুখারী (৬৩১০) এবং মুসলিমের (৭৩৬) বর্ণনার বিরোধী নয়, যেখানে বলা হয়েছে: "যখন ফজর উদয় হতো, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'রাকাআত হালকা সালাত আদায় করতেন, এরপর মুআযযিন এসে তাঁকে জানানোর পূর্ব পর্যন্ত তিনি তাঁর ডান পার্শ্বের উপর কাত হয়ে শুয়ে থাকতেন।" মুসলিমের বর্ণনায় আছে: "ইকামতের জন্য মুআযযিন তাঁর কাছে আসা পর্যন্ত।" এর অর্থ হলো: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বের হওয়া পর্যবেক্ষণ করতেন। যখন তিনি তাঁকে দেখতে পেতেন, মানুষের দেখার আগেই তিনি ইকামত শুরু করে দিতেন। আর কখনও কখনও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বের হতে দেরি হলে তিনি তাঁর দরজায় যেতেন তাঁর অবস্থা জানতে এবং তাঁকে জানাতে যে, সময় হয়ে গেছে। এরপর তিনি বের হলে বিলাল ইকামত শুরু করতেন।
1866 - عن أبي هريرة قال: أقيمت الصّلاة، فقمنا، فعدَّلْنا الصفوف قبل أن يخرج إلينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فأتى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى إذا قام في مصلاه قبل أن يكبر ذكر، فانصرف وقال لنا:"مكانكم" فلم نزَلْ قيامًا ننتظره حتَّى خرج إلينا وقد اغتسل، ينظفُ رأسُه ماء، فكبر فصلى بنا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الغسل (275)، ومسلم في المساجد (605) - واللّفظ له - كلاهما من طريق يونس، عن الزّهريّ، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালাতের ইকামত দেওয়া হলো, অতঃপর আমরা দাঁড়ালাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হয়ে আসার আগেই আমরা কাতারগুলো সোজা করে নিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। যখন তিনি তাঁর সালাতের স্থানে দাঁড়ালেন এবং তাকবীর বলার আগেই তাঁর কিছু স্মরণ হলো, তখন তিনি ফিরে গেলেন এবং আমাদের বললেন: "তোমরা তোমাদের জায়গায় থাকো।" অতঃপর আমরা দাঁড়িয়ে তাঁর জন্য অপেক্ষা করতে লাগলাম, যতক্ষণ না তিনি আমাদের নিকট বেরিয়ে এলেন। তিনি (ইতিমধ্যে) গোসল করে নিয়েছিলেন, তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরছিল। অতঃপর তিনি তাকবীর বললেন এবং আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন।
1867 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أقيمت الصّلاة فلا تقوموا حتَّى تروْني".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (637) ومسلم في المساجد (604) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة - وقرنه مسلم بأبي سلمة - عن أبي قتادة فذكر الحديث.
وفي البخاريّ: عن مسلم بن إبراهيم قال: حَدَّثَنَا هشام، قال: كتب إليَّ يحيى عن عبد الله بن أبي قتادة فذكر الحديث.
والكتابة أحد وجوه التحمل، ثمّ رواه أيضًا (638) عن أبي نعيم، قال: حَدَّثَنَا شيبان، عن يحيى فذكر به مثله وزاد في آخره:"وعليكم بالسكينة"، إِلَّا أن مسلمًا لم يذكر هذه الزيادة في رواية شيبان بعد أن ذكر المتابعات.
قال المصنف رحمه الله تعالى (أي البخاريّ) وتابعه عليّ بن المبارك. وهذه المتابعة وصلها المصنف في كتاب الجمعة (909) فقال: حَدَّثَنَا عمرو بن عليّ، قال: حَدَّثَنِي أبو قُتَيبة، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، لا أعلمه إِلَّا عن أبيه، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تقوموا حتَّى ترونيّ، وعليكم السكينةُ" وتابعهما معاوية بن سلّام كما ذكره أبو داود (539) فقال: ورواه معاوية بن سلّام وعلي بن المبارك عن يحييّ، وقالا فيه:"حتَّى تروني وعليكم السكينة".
وهذه الرواية المعلقة وصلها الإسماعيلي من طريق الوليد بن مسلم، عن معاوية بن سلّام وشيبان جميعًا عن يحيى. انظر:"فتح الباري" (2/ 121).
ومعنى قوله:"وعليكم السكينة" أي لا يزاحم بعضكم بعضًا عند القيام إلى الصّلاة، فيحاول من هو بعيد من الصف الأوّل أن يُسرع من غير مبالاة من المدافعة والمزاحمة فإن ذلك يخالف الوقار.
وبَيَّن ابن رشيد معني آخر وهو قوله:"والنكتة في النهي عن ذلك لئلا يكون مقامهم سببًا لإسراعه في الدخول إلى الصّلاة، فينافي مقصوده من هيئة الوقار". انظر:"فتح الباري".
وحديث جابر بن سمرة وحديث أبي هريرة وحديث أبي قتادة يعارضه حديث بلال أنه كان يؤذِّن إذا دحضت، ولا يقيم حتَّى يخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فإذا خرج أقام الصّلاة حين يراه، ويمكن الجمع بين هذه الأحاديث:
بأن بلالًا كان يراقب خروج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من حيث لا يراه غيره، أو إِلَّا القليل، فعند أول خروجه يُقيمُ، ولا يقوم الناس حتَّى يروه، ثمّ لا يقوم مقامه حتَّى يعدلوا الصفوف.
وقوله في حديث أبي هريرة:"فيأخذ الناس مقامهم قبل أن يأخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم"رواه أبو داود (541) بإسناد صحيح، وفيه الوليد بن مسلم قد صرَّح بالتحديث، فيحمل هذا على أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا كان في المسجد.
أو أنه فعل ذلك مرة أو مرتين لبيان الجواز، وإلَّا فالأصل فيه أن لا تقام الصّلاة إِلَّا إذا خرج الإمام لئلا يطول عليهم القيام، لأنه قد يعرض له عارض فيتأخر بسببه كما قال القاضي عياض وغيره.
وقال النوويّ رحمه الله تعالى: اختلف العلماء من السلف فمن بعدهم مني يقوم الناس للصلاة، ومتى يكبر الإمام؟ فمذهب الشافعي رحمه الله تعالى وطائفة: أنه يستحب أن لا يقوم أحد حتَّى يفرغ المؤذن من الإقامة، ونقل القاضي عياض عن مالك رحمه الله تعالى وعامة العلماء: أنه يستحب أن يقوموا إذا أخذ المؤذن في الإقامة، وكان أنس يقوم إذا قال المؤذن:"قد قامت الصّلاة، وبه قال أحمد رحمه الله تعالى، وقال أبو حنيفة رضي الله عنه والكوفيون: يقومون في الصف إذا قال:"حيَّ على الصّلاة"، فإذا قال:"قد قامتِ الصّلاة" كبَّر الإمام، وقال جمهور العلماء من السلف والخلف: لا يكبر الإمام حتَّى يفرغ المؤذن من الإقامة".
قلت: ويحمل قول الفقهاء على أن الإمام قبل إقامة الصّلاة يُسوِّي الصفوف، ويسدُّ الفرج، ثمّ يأمر المؤذن لإقامة الصّلاة ويكبِّر، قال إبراهيم النخعي: فإذا قال:"قد قامت الصّلاة" كبَّر الإمام. ذكره محمد بن الحسن في كتاب"الآثار" وقال: وبه نأخذ وهو قول أبي حنيفة"، إِلَّا فيكون مخالفًا للسنّة الصّحيحة الصريحة.
আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য ইকামাত দেওয়া হয়, তখন তোমরা আমাকে না দেখা পর্যন্ত দাঁড়াবে না।"
