হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1961)


1961 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر والعصر: {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}.

صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (482) عن محمد بن معمر، ثنا روح بن عبادة، ثنا حماد بن سلمة، عن ثابت وقتادة وحُميد، عن أنس فذكر الحديث.

ورجاله تقات وإسناده صحيح، قال الهيثمي (2687)،"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح، ورواه الطبراني في الأوسط".

ورواه ابن خزيمة (512)، وابن حبان (1824) كلاهما من حديث محمد بن معمر بن ربعي القيسي، قال: حدثنا روح بن عبادة بإسناده مثله.

وفيه:"أنهم كانوا يسمعون منه النغمة في الظهر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} ....".

وأخرجه النسائي (973) من وجه آخر عن أنس نحوه.

وقال البوصيري في"الإتحاف" (1850) بعد أن رواه عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: ثنا سعيد بن سليمان، ثنا عبادة بن سفيان بن حسين، أنبأنا أبو عبيدة، عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى}. قال: رواه البزار بإسناد صحيح: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر والعصر {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}. انتهى.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যুহরের ও আসরের সালাতে (নামাজে) {সুবহানাল্লাযী সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ’লা} এবং {হাল আতা-কা হাদীসুল গা-শিয়াহ্} তিলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1962)


1962 - عن زيد بن أسلم، قال: دخلنا على أنس بن مالك فقال: صليتُم؟ قلنا: نعم. قال: يا جارية! هلُمّي لي وَضُوءًا ما صليتُ وراء إمام أشبه صلاةً برسول الله صلى الله عليه وسلم من إمامكم هذا.

قال زيد: وكان عمر بن عبد العزيز يُتم الركوع والسجود ويخفّف القيام والقعود.

حسن: رواه النسائي (981) عن قتيبة، قال: حدّثنا العطَّاف بن خالد، عن زيد بن أسلم، قال (فذكره). وإسناده حسن من أجل الكلام في العطّاف بن خالد المخزوميّ إلا أنه حسن الحديث إذا
لم يخالف.

وله إسناد آخر وهو ما رواه أحمد (13672) عن إبراهيم بن خالد، قال: أخبرني أمية بن شبل، عن عثمان بن يَزْدريه، قال: خرجتُ إلى المدينة مع عمر بن يزيد، وعمر بن عبد العزيز عامل عليها قبل أن يُستخلف. قال: فسمعتُ أنس بن مالك - وكان به وضع شديد، قال: وكان عمر يصلي بنا فقال أنس: ما رأيتُ أحدًا أشبه صلاة بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم من هذا الفتى، كان يخفف في تمام. وإسناده حسن.

وهذا يقوي ما رواه أبو داود (888)، والنسائي (1135)، والإمام أحمد (12661) كلهم من حديث عبد الله بن إبراهيم بن عمر بن كيسان، حدثني أبي، عن وهب بن مانوس، قال: سمعت سعيد بن جبير يقول: سمعت أنس بن مالك يقول: ما صليتُ وراء أحد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم أشبه صلاة برسول الله صلى الله عليه وسلم من هذا الفتى - بعني عمر بن عبد العزيز - قال: فحزرنا في ركوعه عشر تسبيحات، وفي سجوده عشر تسبيحات.

ووهب بن مانوس ذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 557) ولم أجد من وثقه غيره؛ ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مستور".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ ইবনে আসলাম (রহ.) বলেন, আমরা আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, তোমরা কি সালাত আদায় করেছো? আমরা বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে দাসী! আমার জন্য ওযূর পানি নিয়ে এসো। আমি তোমাদের এই ইমামের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের সাথে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ সালাত আদায়কারী আর কারো পেছনে সালাত আদায় করিনি।

যায়দ (রহ.) বলেন, উমার ইবনে আব্দুল আযীয (রহ.) রুকু ও সিজদাহ পরিপূর্ণ করতেন, কিন্তু ক্বিয়াম (দাঁড়ানো) ও ক্বুউদ (বসা) হালকা করতেন।

আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আমি এই যুবকের (অর্থাৎ উমার ইবনে আব্দুল আযীযের) সালাতের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের সাথে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ সালাত আর কারো পেছনে পড়িনি। বর্ণনাকারী বলেন: আমরা হিসাব করে দেখতাম যে, তিনি তাঁর রুকুতে দশটি তাসবীহ এবং তাঁর সিজদাহয় দশটি তাসবীহ পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1963)


1963 - عن عبد الله بن بريدة الأسلمي، عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر بـ {إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ} ونحوها.

حسن: رواه ابن خزيمة (511) عن محمد بن حرب الواسطي، ثنا زيد بن الحباب، عن الحسن بن واقد قاضي مرو، قال: أخبرني عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكر الحديث. وإسناده حسن لأجل الحسين بن واقد فإنه"صدوق" لأن أكثر النقاد قالوا: إنه لا بأس به، وهو من رجال مسلم، وأما الحافظ فجعله في مرتبة"ثقة له أوهام" وهو أحق أن يقال فيه:"صدوق" وسيأتي حديث آخر عن بريدة الأسلمي بهذا الإسناد في باب القراءة في صلاة العشاء، وفي الإسناد أيضًا زيد بن الحباب وهو ممن يحسن حديثه.




বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যোহরের সালাতে সূরা {ইযাস সামাউ ইনশাক্কাত} এবং অনুরূপ সূরাগুলো পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1964)


1964 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: كانت تعرف قراءة النبي صلى الله عليه وسلم في الظهر بتحريك لحيته.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23153) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن أبي الزعراء، عن أبي الأحوص، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.

ورواه ايضًا ابن أبي شيبة (1/ 362) عن وكيع، عن سفيان به مثله.

وأورده البوصيري في"إتحاف المهرة" (1851) من ابن أبي شيبة وأحمد وقال:"هذا إسناد رجاله ثقات، وأبو الزعراء هو: عمرو بن عمرو". انتهى.

قلت: وهو كما قال، فإن عمرو بن عمرو بن مالك أبو الزعراء وإن لم يخرج عنه الشيخان إلا
أنه ثقة، فقد وثَّقه ابن معين، وقال أحمد: شيخ ثقة، ووثَّقه العجلي والنسائي في الكنى، وقال ابن عبد البر: أجمعوا على أنه ثقة. ولكن قال فيه أبو حاتم: صدوق.




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যোহরের সালাতে কিরাআত (তিলাওয়াত) তাঁর দাড়ি মোবারকের নড়াচড়া দেখে বোঝা যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (1965)


1965 - عن ابن عباس قال: إن أم الفضل بنت الحارث سمعتْه وهو يقرأ: {وَالْمُرْسَلَاتِ} فقالت: يا بنيَّ! لقد ذكرتني بقراءتك هذه السورة، إنها لآخر ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ بها في المغرب.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (24) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن

مسعود، عن عبد الله بن عباس فذكره.

وعن مالك رواه البخاري في الأذان (763) ومسلم في الصلاة (462).

ورواه البخاري في المغازي (4429) ومسلم كلاهما من طرق عن الزهري من غير حديث مالك، وفيه:"ثم ما صلي لنا بعدها حتى قبضه الله".

أي أنها آخر صلوات صلَّاها رسول صلى الله عليه وسلم وهي المغرب، وسيأتي في حديث عائشة في باب:"من أحق الناس بالإمامة" أن آخر صلاة صلاها رسول الله صلى الله عليه وسلم هي صلاة الظهر - ويمكن الجمع بين الحديثين الصحيحين بأن الظهر صلاها مع أبي بكر في المسجد، وصلاة المغرب صلاها مع أهله في بيته، فأم الفضل تحكي ما صلَّاها في بيته، وعائشة تحكي ما صلاها في المسجد.

وأما ما روي عن أنس بن مالك، عن أم الفضل بنت الحارث قالت:"صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيته المغرب، فقرأ المرسلات، ما صلى بعد صلاة حتى قُبض صلى الله عليه وسلم". فالصحيح هو من حديث ابن عباس كما ذكر.

وأما هذا فرواه موسى بن داود، قال: حدثنا عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن حميد، عن أنس، فذكره.

ومن طريقه رواه النسائي (985)، وأحمد (26871)، والطحاوي في شرحه (1228) ونبّه على هذا الخطأ أبو حاتم وأبو زرعة في"العلل" لابن أبي حاتم (1/ 84 - 85) بأن موسى بن داود - وهو الضبي - أدخل حديثا في حديث. فقراءة النبيّ صلى الله عليه وسلم في المغرب سورة المرسلات من حديث ابن عباس عن أم الفضل، وصلاة النبي صلى الله عليه وسلم متوشحًا في ثوب هو حديث أنس، فتبّه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (ইবনে আব্বাসকে) শুনতে পেলেন যখন তিনি 'ওয়াল মুরসালাত' (সূরা আল-মুরসালাত) তিলাওয়াত করছিলেন। তখন তিনি বললেন, "হে আমার পুত্র! তোমার এই সূরা তিলাওয়াত আমাকে স্মরণ করিয়ে দিল, এটিই শেষ সূরা যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মাগরিবের সালাতে তিলাওয়াত করতে শুনেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1966)


1966 - عن جبير بن مطعم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ بالطور في المغرب.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (23) عن ابن شهاب، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه فذكره. ومن طريق مالك رواه البخاري في الأذان (765)، ومسلم في الصلاة (413).




জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মাগরিবের সালাতে সূরাহ আত-তূর পাঠ করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1967)


1967 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في المغرب بقصار المفصّل.
حسن: رواه الطحاوي في شرح المعاني (1243) من حديث أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا زيد بن الحباب، قال: ثنا الضحاك بن عثمان، قال: حدثني بكير بن الأشج، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده حسن.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাতে ক্বিসারুল মুফাস্সালের (ছোট ছোট) সূরাগুলো তিলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1968)


1968 - عن مروان بن الحكم قال: قال لي زيد بن ثابت: مالك تقرأ في المغرب بقصار، وقد سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ بطولى الطوليين.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (764) عن أبي عاصم، عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عروة بن الزبير، عن مروان فذكر الحديث.

ورواه أبو داود (812) من طريق عبد الرزاق، عن ابن جريج به وفيه: قال: قلت: ما طولى الطولين؟ قال: الأعراف، والأخرى: الأنعام

قال: وسألت أنا ابن أبي مليكة فقال لي من قبل نفسه: المائدة والأعراف.

وفي النسائي (991) عن محمد بن عبد الأعلى، ثنا خالد، ثنا ابن جريج به وفيه: قلت: يا أبا عبد الله! ما أطول الطوليين؟ قال: الأعراف.

ورواه أيضًا (989) من وجه آخر عن أبي الأسود أنه سمع عروة بن الزبير يحدث عن زيد بن ثابت أنه قال لمروان: يا أبا عبد الملك! أتقرأ في المغرب بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} و {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} قال: نعم قال: فمحلوفة، لقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ فيها بأطول الطوليين {المص}.

قوله:"طولى الطوليين" طولى تأنيث أطول، والطوليين تثنية طولى، وفي بعض الروايات: بأطول الطولين - بالتذكير إلا أنه لم يقع تفسيرهما في صحيح البخاري لعله لوجود الخلاف في تفسيرهما وقائلهما.

والمفصل على ثلاثة أقسام: طوال المفصل من سورة الحجرات إلى سورة البروج، والأوسط: من سورة البروج إلى سورة لم يكن، والقصار: من سورة لم يكن إلى آخر القرآن.

ولكن لابد من تقيد هذا الإطلاق ليكون المراد به بعض السورة، لأنه لا يمكن قراءة سورة الأعراف، أو الأنعام، أو المائدة بكاملها في صلاة المغرب لقلة وقتها، وكان إنكار زيد على مروان مواظبته على قراءة قصار المفصل ليس لأجل القصر، بل لأجل المواظبة ظنًّا منه أن الطوال لا تقرأ في المغرب، ولو بعضًا منه.

ولكن رواه النسائي (991) من طريق ابن أبي حمزة، ثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أن رسول صلى الله عليه وسلم قرأ في صلاة المغرب سورة الأعراف وفرقها في ركعتين. انتهى. إلا أن الحفاظ حكموا على الإسناد بأن ذكر عائشة فيه شاذ، والمحفوظ أنه من حديث زيد بن ثابت.

فيكون قد قرأ مرة أو مرتين ليان الجواز في تطويل القراءة إذا لم يكن فيها مشقة على
المأمومين. وأما المواظبة فلا لقوله صلى الله عليه وسلم:"إذا صلى أحدكم للناس فليخفف".

ويرى أبو داود أن طولى الطوليين في صلاة المغرب منسوخ بقراءة عروة بنحو ما تقرؤون (والعاديات) ونحوها من السور، لما رأى عروة (راوي الخبر) العملَ بخلافه فحمله على أنه اطلع على ناسخه، فإنه رواه عن موسى بن إسماعيل، ثنا حماد، أخبرنا هشام بن عروة، عن أبيه فذكر مثله.

قال أبو داود: هذا يدل على أن ذاك منسوخ وقال:"وهذا أصح".

ثم روى عن أحمد بن سعيد السرخسي، ثنا وهب بن جرير، حدثنا أبي قال: سمعتُ محمد بن إسحاق يحدث عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أنه قال: ما من المفصَّل سورة صغيرة ولا كبيرة إلى وقد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يؤمُّ الناس بها في الصلاة المكتوبة.

ومحمد بن إسحاق وإن كان مدلًسا، إلا أنه صرح بالتحديث عن عمرو بن شعيب فزالت عنه تهمة التدليس، وهو حسن الحديث إذا صرَّح.




যায়িদ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ান ইবনু হাকাম বলেন, যায়িদ ইবনু ছাবিত আমাকে বললেন: কী ব্যাপার! তুমি মাগরিবে ক্বাসার (ছোট ছোট সূরা) পড়ো কেন, অথচ আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শুনেছি তিনি দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি পড়তেন।

সহীহ: এটি বুখারী (আযান, ৭৬৪) তে আবু আসিম, তিনি ইবনু জুরাইজ, তিনি ইবনু আবি মুলাইকা, তিনি উরওয়াহ ইবনু যুবাইর, তিনি মারওয়ানের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। এটি আবু দাউদ (৮১২) তে আব্দুর রাযযাকের সূত্রে, তিনি ইবনু জুরাইজ এর সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে (আবু দাউদের বর্ণনায়) রয়েছে: তিনি (রাবী) বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি কী? তিনি বললেন: আল-আ'রাফ, এবং অন্যটি: আল-আন'আম। তিনি বলেন: আমি ইবনু আবি মুলাইকাকেও জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি নিজের পক্ষ থেকে আমাকে বললেন: আল-মাইদাহ এবং আল-আ'রাফ। আর নাসাঈ (৯৯১) তে মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল আ'লা থেকে, তিনি খালিদ থেকে, তিনি ইবনু জুরাইজ এর সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে: আমি বললাম, হে আবু আব্দুল্লাহ! দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি কী? তিনি বললেন: আল-আ'রাফ। এটি (নাসাঈ) অন্য একটি সূত্রেও (৯৮৯) বর্ণনা করেছেন, আবু আল-আসওয়াদ থেকে যে তিনি উরওয়াহ ইবনু যুবাইরকে যায়িদ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছেন যে তিনি মারওয়ানকে বলেছিলেন: হে আবু আব্দুল মালিক! আপনি কি মাগরিবে {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} (কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ) এবং {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} (ইন্না আ'ত্বাইনা-কাল কাওছার) পড়েন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মাগরিবে দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি {المص} (আ-লিফ লা-ম মীম স-দ, অর্থাৎ সূরা আল-আ'রাফ) পড়তে দেখেছি।

তাঁর বাণী: "طولى الطوليين" (দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি)-তে ‘তূলা’ (‘দীর্ঘতম’ অর্থবোধক) শব্দটি ‘আত্বওয়াল’-এর স্ত্রীবাচক রূপ। আর ‘আত্ব-ত্বূলাইনি’ শব্দটি 'তূলা'-এর দ্বিবচন। কোনো কোনো বর্ণনায় ‘أطول الطولين’ (আত্বওয়ালুত ত্বওলাইন) - পুংলিঙ্গ ব্যবহার করা হয়েছে, তবে সহীহ বুখারীতে এর কোনো ব্যাখ্যা পাওয়া যায় না। সম্ভবত এর ব্যাখ্যা ও ব্যাখ্যাকারীর বিষয়ে মতপার্থক্যের কারণে এটি অনুপস্থিত। আল-মুফাস্সাল (কুরআনের শেষাংশ) তিন ভাগে বিভক্ত: দীর্ঘ মুফাস্সাল (ত্বাওয়াল আল-মুফাস্সাল): সূরা হুজুরাত থেকে সূরা বুরুজ পর্যন্ত; মধ্যম মুফাস্সাল (আল-আওসাত): সূরা বুরুজ থেকে সূরা লাম ইয়াকুন পর্যন্ত; এবং সংক্ষিপ্ত মুফাস্সাল (আল-ক্বাসার): সূরা লাম ইয়াকুন থেকে কুরআনের শেষ পর্যন্ত।

তবে এই ব্যাপক প্রয়োগকে সীমাবদ্ধ করা প্রয়োজন যাতে এর দ্বারা সুরার কিছু অংশ উদ্দেশ্য হয়। কারণ মাগরিবের স্বল্প সময়ের কারণে সূরা আল-আ'রাফ, অথবা আল-আন'আম, অথবা আল-মাইদাহ সম্পূর্ণটা সালাতের মধ্যে পড়া সম্ভব নয়। যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে মারওয়ানের প্রতি তার সংক্ষিপ্ত মুফাস্সালের সূরাগুলো নিয়মিত পড়ার বিষয়ে আপত্তি ছিল শুধু সংক্ষিপ্ত হওয়ার কারণে নয়, বরং নিয়মিত পড়ার কারণে, কারণ মারওয়ান হয়তো মনে করেছিলেন যে মাগরিবে লম্বা সূরা পড়া যায় না, এমনকি তার কিছু অংশও নয়।

তবে ইমাম নাসাঈ (৯৯১) ইবনু আবি হামযার সূত্রে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ, তিনি তার পিতা (উরওয়াহ), তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাতে সূরা আল-আ'রাফ পাঠ করেছিলেন এবং এটিকে দুই রাকাআতে ভাগ করেছিলেন। সমাপ্ত। তবে হাফিযগণ এই ইসনাদকে শায (বিচ্ছিন্ন) বলে রায় দিয়েছেন, এবং মাহফুয (সুসংরক্ষিত) হলো যে এটি যায়িদ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস। অতএব, তিনি হয়তো একবার বা দু'বার পড়েছিলেন, যাতে ইমামের জন্য মুক্তাদিদের উপর কষ্ট না হলে ক্বিরাআত দীর্ঘ করার বৈধতা প্রমাণিত হয়। কিন্তু সর্বদা নিয়মিত পড়া যাবে না, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করে, তবে সে যেন তা সংক্ষিপ্ত করে।" ইমাম আবু দাউদ মনে করেন যে, মাগরিবের সালাতে ‘দীর্ঘতম দুটি সুরার মধ্যে দীর্ঘতমটি’ পাঠ করা মনসুখ (রহিত) হয়ে গেছে উরওয়াহ-এর ‘তোমরা যা পড়ো’ (যেমন - ওয়াল-‘আদিয়াত) এবং অনুরূপ সূরা পড়ার কারণে। কারণ বর্ণনাকারী উরওয়াহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর বিপরীত আমল করতে দেখা গেছে। তাই তিনি ধরে নিয়েছেন যে উরওয়াহ নিশ্চয় এর রহিতকারী বিষয়ে অবগত হয়েছিলেন। তিনি এটি মূসা ইবনু ইসমাঈল থেকে, তিনি হাম্মাদ থেকে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ থেকে, তিনি তার পিতা থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আবু দাউদ বলেন: এটি প্রমাণ করে যে ওটা (দীর্ঘ ক্বিরাআত) রহিত হয়েছে। তিনি বলেন: "এটিই অধিক সহীহ।" এরপর তিনি আহমাদ ইবনু সাঈদ আস-সারখাসী থেকে, তিনি ওয়াহব ইবনু জারীর থেকে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেন, তিনি (পিতা) বলেন: আমি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাককে আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি তার দাদা থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি যে, তিনি বলেন: মুফাস্সালের মধ্যে এমন কোনো ছোট বা বড় সূরা নেই যা দ্বারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফরয সালাতে ইমামতি করার সময় ক্বিরাআত করেননি। যদিও মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক মুদাল্লিস (যারা এমনভাবে হাদীস বর্ণনা করে যেন সরাসরি শুনেছেন, কিন্তু শোনেননি), তবে তিনি আমর ইবনু শুআইব থেকে সরাসরি 'حدثنا' (হাদ্দাসানা – আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন) বলে স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন, ফলে তার তাদলীসের (হাদীস গোপন করার) অভিযোগ দূরীভূত হয়েছে এবং তিনি স্পষ্ট উল্লেখ করলে তার হাদীস হাসান (গ্রহণযোগ্য)।









আল-জামি` আল-কামিল (1969)


1969 - عن عبد الله بن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ بهم في المغرب: {الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ} [سورة محمد: 1].

صحيح: أخرجه الطبراني في الكبير (12/ 372) والأوسط (2/ 441) والصغير (1/ 45) من طريق الحسين بن حُريث المروزي، ثنا أبو معاوية محمد بن خازم، ثنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث. وأخرجه ابن حبان في صحيحه (1835) من هذا الوجه.

وقال الهيثمي في مجمع الزوائد" (2703): رواه الطبراني في الثلاثة"رجاله رجال الصحح".

قلت: وهو كذلك، ولكن قال الدارقطني: غريب من حديثه عن نافع لم يسنده غير أبي معاوية. وكذلك رواه يحيى بن معين عن أبي معاوية مرفوعا""أطراف الغرائب" (3/ 467) وأبو معاوية ثقة فلا يضر تفرده، وفي قول الدارقطني رد على الطبراني في قوله: تفرد به الحسين بن حريث عن أبي معاوية.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাতে তাদের জন্য এই আয়াত তিলাওয়াত করতেন: {الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ} (সূরা মুহাম্মাদ: ১)।









আল-জামি` আল-কামিল (1970)


1970 - عن زيد بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الركعتين من المغرب بسورة الأنفال.

حسن: رواه الطبراني في"المعجم الكبير" (5/ 136) قال: حدثنا عبد الرحمن بن سلم الرازي، ثنا سهل بن عثمان، ثنا عقبة بن خالد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن زيد بن ثابت فذكر الحديث.

وأورده الهيثمي في مجمع الزوائد" (2/ 118) (3702) إلا أنه جعل الحديث من مسند أبي أيوب. وقال:"رجاله رجال الصحيح" فلا أدري أكان الوهم من الهيثمي أم من مخطوطة الطبراني؟ . وفي الإسناد عقبة بن خالد بن عقبة السكوني حسن الحديث.




যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের দুই রাকাআতে সূরা আনফাল পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1971)


1971 - عن أبي أيوب أو زيد بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم قرأ في المغرب بالأعراف في الركعتين.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23544)، والطبراني في الكبير (5/ 136) كلاهما عن وكيع، حدثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن أبي أيوب، أو عن زيد بن ثابت فذكر الحديث.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح، قال الهيثمي (2699):"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد رجال الصحيح".

تنبيه: سقط في الطبراني"عروة" من المطبوع. لأن الطبراني رواه من طريق ابن أبي شيبة (1/ 369) وهو ثابت فيه.

وأما ما رُوي عن ابن عمر، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يقرأ في المغرب: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ}، {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (823) عن أحمد بن بُديل، قال: حدثنا حفص بن غياث، قال: حدثنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وأحمد بن بديل وشيخه حفص بن غياث ضعيفان لا يحتج بهما

قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (2/ 248):"ولم أر حديثًا مرفوعًا فيه التنصيص على القراءة فيها شيء من قصار المفصل إلا حديثا في ابن ماجه عن ابن عمر، نصَّ فيه على (الكافرون) و (الإخلاص). ومثله لابن حبان عن جابر بن سمرة. فأما حديث ابن ماجه، فظاهر إسناده الصّحة إلا أنه معلول.

قال الدارقطني:"أخطأ فيه بعض رواته".

وأما حديث جابر بن سمرة ففيه سعيد بن سماك وهو متروك، والمحفوظ أنه قرأ بهما في الركعتين بعد المغرب، انتهى كلامه.

وفي دعوى الحافظ نظر؛ لأنه ثبت أن النبي صلى الله عليه وسلم قرأ في المغرب بقصار المفصل، وإن قرأ غيره فيحمل على أنه قرأ بعضه، وكله جائز وإن كان الفقهاء قد اختلفوا: فكره مالك أن يقرأ في صلاة المغرب بالسور الطوال نحو (الطور) و (المرسلات) وبه قال أبو حنيفة أيضًا.

وقال الشافعي: لا أكره ذلك، بل أستحب أن يقرأ بهذه الصور في صلاة المغرب.




আবু আইয়ুব অথবা যায়দ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাতে দুই রাকাআতে সূরা আল-আ’রাফ তিলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1972)


1972 - عن البراء بن عازب أنه قال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء، فقرأ فيها بـ {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ}.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (27) عن يحيى بن سعيد، عن عدي بن ثابت الأنصاري، عن البراء، فذكره.

وكذلك رواه أحمد (18527) عن ابن نُمير، عن يحيى بن سعيد.

ورواه البخاري في الأذان (767) عن شعبة، ومسلم في الصلاة (464) عن شعبة ويحيى بن سعيد، ومسعر، كلهم عن عدي بن ثابت به مثله.
وقيَّده شعبة بأن ذلك كان في سفر، وزاد مسعر في حديثه: فما سمعتُ أحدًا أحسن صوتًا منه.

ولكن رواه الطيالسي (769) عن شعبة، وأحمد (18528) عن أبي خالد الأحمر، حدثنا يحيى بن سعيد - كلاهما أعني شعبة ويحيى بن سعيد، عن علي بن ثابت بإسناده، فقالا فيه:"المغرب" بدلا من"العشاء".

وأبو خالد الأحمر وإن كان وُصف بأنه"صدوق يخطئ، إلا أن متابعة الطيالسي عن شعبة تقويه.

فالحمل على التعدد بأنه مرة قرأ في المغرب، ومرة قرأ في العشاء أولى من تخطئة الرواة.

وأما ما رواه الطحاوي في شرح المعاني (1242) عن عبد الله بن عمر:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ في المغرب {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ} ففيه جابر الجعفي وهو ضعيف.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ইশার সালাত আদায় করেছিলাম। তিনি তাতে সূরাহ আত-তীন (ওয়াত তীন ওয়ায যায়তূন) পাঠ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1973)


1973 - عن جابر قال: كان معاذ يُصَلِّي مع النبي صلى الله عليه وسلم ثم يأتي فيؤمُّ قومه. فصلَّى ليلةً مع النبي صلى الله عليه وسلم العشاءَ، ثم أتي قومه فأمَّهم، فافتتح بسورة البقرة. فانحرف رجل فسلَّم. ثم صلَّى وحده وانصرف، فقالوا له: أنافقت يا فلان؟ قال: لا والله! ولآتينَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فلأخبرنَّه. فأتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إنا أصحاب نواضح نعمل بالنهار، وإن معاذًا صلي معك العشاء، ثم أتي فافتتح بسورة البقرة.

فأقبل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على معاذ فقال:"أفتَّان أنت؟ اقرأ بكذا. واقرأ بكذا".

متفق عليه: رواه مسلم في الصلاة (465) عن محمد عباد، حدثنا سفيان، عن عمرو، عن جابر فذكره.

قال سفيان: فقلت لعمرو: إن أبا الزبير حدثنا، عن جابر أنه قال: اقْرَأْ {وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا} و {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَاهَا} و {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} فقال عمرو: نحو هذا، رواه عن قتيبة بن سعيد، عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر مثله.

ورواه البخاري في الأذان (705) من طريق شعبة قال: حدثنا محارب بن دِثار قال: سمعت جابر بن عبد الله الأنصاري قال: أقبل رجل بناضحين - وقد جنح الليلُ - فوافق معاذًا يُصلى. فترك نَاضِحَه وأقبل على معاذ فقرأ بسورة البقرة أو النساء. فانطلق الرّجل، وبلغه أن معاذًا نال منه، فأتي النبي صلى الله عليه وسلم فشكا إليه معاذًا فقال النبي صلى الله عليه وسلم: يا معاذًا أفتّان أنت؟ ، أو فاتن (ثلاث مرات). فلولا صلَّيت بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى}، {وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا}، {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَاهَا}، فإنه يصلي وراءك الكبير والضعيف وذو الحاجة".

قال البخاري:"وتابعه سعيد بن مسروق ومشعر والشيباني" أي كلهم من محارب في أصل الحديث، وشعبة ليس في حاجة إلى المتابعة، ولكن لما اختلفت ألفاظ الحديث دعت الحاجة إلى المتابعة في أصل القصة. كما أن مسلمًا رواه من وجه آخر عن جابر.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করতেন, এরপর এসে তাঁর কওমের ইমামতি করতেন। একদিন রাতে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এশার সালাত আদায় করলেন, এরপর তাঁর কওমের কাছে এসে তাদের ইমামতি করলেন এবং সূরা আল-বাক্বারা দিয়ে সালাত শুরু করলেন।

তখন একজন লোক (সালাত থেকে) সরে গিয়ে সালাম ফিরালেন। এরপর সে একা সালাত আদায় করে চলে গেল। লোকেরা তাকে বলল: হে অমুক, তুমি কি মুনাফিকি করলে? সে বলল: আল্লাহর কসম, না! আমি অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাব এবং তাঁকে খবর দেব।

এরপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা উটের সাহায্যে (কৃষিকাজে) পানি সেচনাকারী লোক, আমরা দিনের বেলা কাজ করি। আর মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আপনার সাথে এশার সালাত আদায় করে এসে সূরা আল-বাক্বারা দিয়ে সালাত শুরু করেছেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে মুখ ফিরালেন এবং বললেন: "তুমি কি ফিতনা সৃষ্টিকারী? তুমি এই সূরা পড়ো, আর এই সূরা পড়ো।"

(অন্য বর্ণনায় আছে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে মু'আয, তুমি কি ফিতনাকারী? (এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন)। তুমি কেন 'সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ'লা' (সূরা আল-আ'লা), 'ওয়াশ-শামসি ওয়া দুহাহা' (সূরা আশ-শামস) এবং 'ওয়াল-লাইলি ইযা ইয়াগশা' (সূরা আল-লাইল) দ্বারা সালাত আদায় করলে না? কারণ, তোমার পেছনে দুর্বল, বৃদ্ধ এবং প্রয়োজনে থাকা ব্যক্তিরা সালাত আদায় করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1974)


1974 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: شكوتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أني أشتكي فقال:"طوفي من وراء الناس وأنت راكبةٌ".

قالت: فطُفتُ راكبةً بعيري، ورسول الله صلى الله عليه وسلم حينئذ يُصَلِّي إلى جانب البيت، وهو يقرأ بـ {وَالطُّورِ}.

متفق عليه: أخرجه مالك في الحج (123) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت الحديث.

ومن طريق مالك أخرجه البخاري في الصلاة (464)، ومسلم في الحج (1276).

ورواه أيضًا البخاري في الحج (1626) من طريق مالك به، ثم عن محمد بن حرب، حدثنا أبو مروان يحيى بن أبي زكريا الغسَّاني، عن هشام، عن عروة، عن أم سلمة رضي الله عنها زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول صلى الله عليه وسلم قال وهو بمكة وأراد الخروج ولم تكن أم سلمة طافت بالبيت وأرادت الخروج، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أقيمت صلاة الصبح فطوفي على بعيرك والناس يصلون" ففعلت ذلك، فلم تصل حتى خرجت. انتهى.

قال الحافظ في التقريب:"يحيى بن أبي زكريا الغسَّاني أبو مروان الواسطي، أصله من الشام، ضعيف، ما له في البخاري سوى موضع واحد متابعة" قلت: لعله يقصد هذا الموضع.

ورواه ابن خزيمة (523) من طريق مالك وابن لهيعة، عن ابن الأسود، عن عروة، عن زينب بنت أم سلمة فذكرت الحديث وفيه: ورسول الله صلى الله عليه وسلم صلى إلى صقع البيت، فسمعتُه يقرأ في العِشاء الآخرة - وهو يصلي بالناس: {وَالطُّورِ (1) وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ} [سورة الطور].

فالذي يظهر أن القصة وقعت مرتين، إحداهما في صلاة العشاء يوم النحر وهي التي ذكرها ابن خزيمة، والأخرى صباح الرحيل وهي التي ذكرها البخاري، فلا منافاة بين القصين، ولكنه جمع بين حديث مالك وحديث أبي مروان فلعل مقصوده هو جواز الطواف على البعير.

وأما أنه لم يذكر في القصة الثانية زينب بنت أم سلمة بين عروة وأم سلمة، فذلك لثبوت سماع عروة عن أم سلمة عنده وهو الصواب كما قال الحافظ، فإن ذلك ممكن فإن عروة أدرك من حياة أم سلمة نيفًا وثلاثين سنة، وهو معها في بلد واحد.

وبهذا يتنفي اعتراض الدارقطني وغيره على البخاري بأن في إسناده انقطاعًا.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (উম্মে সালামাহ) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করলাম যে আমি অসুস্থ। তখন তিনি বললেন: "তুমি মানুষের পিছন দিক দিয়ে আরোহণ অবস্থায় তাওয়াফ করো।" তিনি বললেন: তখন আমি আমার উটের উপর আরোহণ অবস্থায় তাওয়াফ করলাম। আর সেই সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর (ঘরের) পাশে সালাত আদায় করছিলেন, এবং তিনি {وَالطُّورِ} (সূরা আত-তূর) পড়ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1975)


1975 - عن أبي رافع قال: صليت مع أبي هريرة العتمة، فقرأ: {إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ}. فسجد. فقلت: ما هذه؟ قال: سجدت بها خلف أبي القاسم صلى الله عليه وسلم، فلا أزال أسجد بها حتَّى ألقاه.

متفقٌ عليه: رواه البخاري في الأذان (766)، ومسلم في المساجد (578/ 110)، كلاهما عن
المعتمر بن سليمان التيمي، عن أبيه، عن بكر، عن أبي رافع فذكره. وبكر هو: ابن عبد الله المزني. وأبو رافع هو: نُفَيع الصائغ مشهورٌ بكنيته.




আবূ রাফে’ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে 'আতামাহ (ইশার) সালাত আদায় করলাম। তিনি তখন সূরাহ 'ইযাস সামা-উন্শাক্বাত' তেলাওয়াত করলেন এবং সাজদাহ করলেন। আমি বললাম: এটি কী (সাজদাহ)? তিনি বললেন: আমি আবূল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে এই সূরায় সাজদাহ করেছিলাম, অতএব, আমি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ না করা পর্যন্ত এই সূরায় সাজদাহ করা ছাড়ব না।









আল-জামি` আল-কামিল (1976)


1976 - عن بريدة الأسلمي قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في العشاء الآخرة بالشمس وضحاها، ونحوها من السور.

حسن: رواه الترمذي (309)، والنسائي (999) كلاهما من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه بريدة فذكر مثله، ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (22994).

وإسناده حسن لأجل الحسين بن واقد فإنه"صدوق" لأن أكثر النقاد قالوا: إنه لا بأس به وهو من رجال مسلم، وأما الحافظ فجعله في مرتبة"ثقة له أوهام" وهو أحق أن يقال فيه"صدوق".

وقال الترمذي:"حسن".




বুরাইদাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার শেষ সালাতে (নামাযে) সূরা আশ-শামস ওয়া দুহাহা এবং অনুরূপ সূরাসমূহ তিলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1977)


1977 - عن جابر بن سمرة قال: قال عمر لسعد: لقد شكوك في كلِّ شيءٍ حتَّى في الصلاة. قال: أمّا أنا فأمدّ في الأوليين، وأحذف في الأُخريين. ولا آلو ما اقتديت به من صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: صدقت. ذاك الظنُّ بك، أو ظنِّي بك.

متفقٌ عليه: رواه البخاري في الأذان (770) ومسلم في الصلاة (453/ 159) كلاهما من حديث شعبة، عن أبي عون، قال: سمعت جابر بن سمرة فذكره.

وفي الحديث قصَّة سبق ذكرها في باب القراءة في الصبح والظهر والعصر. وكان ذلك في"صلاة العشاء".




জাবির ইবনু সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: লোকে তোমাকে সব কিছুতেই সন্দেহ করেছে, এমনকি সালাতের (নামাজের) ব্যাপারেও। তিনি (সা'দ) বললেন: আমি প্রথম দু'রাকাতে দীর্ঘ করি এবং শেষের দু'রাকাতে সংক্ষেপ করি। আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের (নামাজের) অনুসরণ করতে কোনো প্রকার ত্রুটি করি না। তিনি (উমার) বললেন: তুমি সত্য বলেছ। তোমার সম্পর্কে এমন ধারণাই আমার ছিল, অথবা তিনি বললেন: আমার ধারণা এমনই ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (1978)


1978 - عن ابن عباس قال: قرأ النبيُّ صلى الله عليه وسلم فيما أُمِر، وسكت فيما أُمِر.

{وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا} [مريم: 14].

{لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} [الأحزاب 21].

صحيح: رواه البخاري في الأذان (774) عن مسدد، قال: حدثنا إسماعيل، قال: حدَّثنا أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسماعيل هو: ابن إبراهيم المعروف بابن عُليَّة.

قوله:"فيما أُمره أن يجهر به أو يُسرَّ.

وقوله:"وسكت" أي أسرَّ.

{وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا} أي: في ترك بيان أحوال الصلاة في القرآن سرًّا وجهرًّا، وغيرها من
تفاصيل الصلاة.

قال الخطّابي: ومعنى قوله تعالى: {وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا} وتمثُّله به في هذا الموضع هو أنّه لو شاء أن ينزل ذكر بيان أفعال الصلاة وأقوالها وهيئاتها حتَّى يكون قرآنًا متلوًّا لفعل، ولم يترك ذلك عن نسيان، لكنَّه وكل الأمر في بيان ذلك إلى رسوله، ثمَّ أمر بالاقتداء به، والانتماء بفعله، وذلك معنى قوله: {لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ} [النحل: 44]" انتهى."أعلام الحديث" (1/ 502)، وانظر أيضًا"الفتح"




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যে বিষয়ে নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল তাতে উচ্চস্বরে ক্বিরাআত করতেন এবং তাঁকে যে বিষয়ে নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল তাতে নীরব থাকতেন (নিম্নস্বরে পড়তেন)।

আর আপনার প্রতিপালক তো ভুলেন না।

অবশ্যই তোমাদের জন্য রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মধ্যে রয়েছে উত্তম আদর্শ।









আল-জামি` আল-কামিল (1979)


1979 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم بعث رجلا على سرية، وكان يقرأ لأصحابه في صلاته فيختم: بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}. فلما رجعوا ذكروا ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"سلوه لأي شيْء يصنعُ ذلك"؟ فسألوه فقال: لأنّها صفة الرحمن، وأنا أحب أن أقرأ بها، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أخبروه أن الله يحبه".

متفق عليه: أخرجه البخاري في التوحيد (7375)، ومسلم في صلاة المسافرين (813) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، ثنا عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، أن أبا الرجال محمد بن عبد الرحمن حدثه، عن أمه عمرة بنت عبد الرحمن، وكانت في حَجْر عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم عن عائشة فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে একটি ক্ষুদ্র সেনাদলের (সারিয়্যা) প্রধান করে পাঠালেন। আর তিনি তাঁর সাথীদের নিয়ে যখন সালাত আদায় করতেন, তখন (সূরা) 'কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ' দ্বারা শেষ করতেন। যখন তারা ফিরে আসলেন, তখন তারা বিষয়টি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "তোমরা তাকে জিজ্ঞাসা করো, সে কেন এমন করে?" অতঃপর তারা তাকে জিজ্ঞাসা করল। সে বলল: "কারণ এটি (সূরাটি) হলো আল্লাহর (আর-রহমানের) গুণবাচক বর্ণনা, আর আমি এটি পড়তে পছন্দ করি।" তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা তাকে জানিয়ে দাও যে, আল্লাহ তাকে ভালোবাসেন।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (1980)


1980 - عن أنس بن مالك قال: كان رجل من الأنصار يؤمهم في مسجد قباء. فكان كلما افتتح سورةً يقرأ لهم في الصلاة فقرأ بها، افتتح بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} حتى يفرغ منها، ثم يقرأ بسورة أخرى معها، وكان يصنع ذلك في كل ركعة. فكلمه أصحابه فقالوا: إنك تقرأ بهذه السورة، ثم لا ترى أنها تجزئك حتى تقرأ بسورة أخرى، فإما أن تقرأ بها، وإما أن تدعها وتقرأ بسورة أخرى، قال: ما أنا بتاركها، إن أَحببتم أن أؤمكم بها فعلتُ، وإن كرهُتم تركتكم. وكانوا يرونه أفضلَهم، وكرهوا أن يؤمهم غيره، فلما أتاهم النبي صلى الله عليه وسلم أخبروه الخبر، فقال:"يا فلان! ما يمنعك مما يأمر به أصحابك، وما يحملك أن تقرأ هذه السورة في كل ركعة؟".

فقال: يا رسول الله! إني أحبها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن حُبَّها أدخلك الجنة". صحيح: أخرجه الترمذي (2901) عن محمد بن إسماعيل (البخاري) حدثنا إسماعيل بن أبي أويس، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن عبيد الله بن عمر، عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.

قال الترمذي: حسن غريب صحيح من هذا الوجه من حديث عبيد الله بن عمر، عن ثابت.
وروى مبارك بن فضالة، عن ثابت، عن أنس أن رجلًا قال: يا رسول الله! إني أحب هذه السورة: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} أحد فقال:"إن حبَّك إياها يُدخلك الجنة" قال: حدثنا بذلك أبو داود سليمان بن الأشعث، ثنا أبو الوليد، حدثنا مبارك بن فضالة بهذا. انتهى.

وذكره البخاري في الأذان (774) معلقا عن عبيد الله بن عمر، عن ثابت، عن أنس.

قلت: وهو الذي وصله الترمذي عن البخاري، عن إسماعيل بن أبي أويس كما سبق.

ونقل الحافظ في الفتح أن الدارقطني قال في علله: إن حماد بن سلمة خالف عبيد الله في إسناده.

فرواه عن ثابت، عن حبيب بن سبيعة مرسلًا وقال: وهو أشبه بالصواب. قال الحافظ: وإنما رجحه لأن حماد بن سلمة مقدم في حديث ثابت. لكن عبيد الله بن عمر حافظ حجة، وقد وافقه مبارك في إسناده فيحتمل أن يكون لثابت فيه شيخان. انتهى.

قلت: وهو كما قال: ثم إن من المعروف إن الإسناد إذا اختُلِف في الرفع والإرسال، والرافع ثقة، فزيادثه مقبولة عند جماهير أهل العلم.

وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة فأخرجه في صحيحه (537) من طريق عبد العزيز بن محمد (الدراوردي) به مثله.

وحديث مبارك بن فَضالة أخرجه الترمذي كما سبق، كما أخرجه أيضًا الدارمي (3436) عن يزيد بن هارون، عن مبارك بن فضالة، به مثله.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের মধ্যে এক ব্যক্তি ক্বুবা মসজিদে তাদের ইমামতি করতেন। তিনি যখনই তাদের নিয়ে নামাযে কোনো সূরা শুরু করতেন, তখন তা তেলাওয়াত করার আগে (প্রথমে) 'ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ' দ্বারা শুরু করতেন এবং তা শেষ করতেন। এরপর তার সাথে অন্য একটি সূরা তেলাওয়াত করতেন। তিনি প্রতি রাকাতেই এমনটি করতেন।

তার সাথীরা তাকে এ বিষয়ে বললেন এবং বললেন: আপনি এই সূরাটি তেলাওয়াত করেন, কিন্তু আপনি মনে করেন না যে এটি যথেষ্ট, তাই আপনি অন্য একটি সূরা তেলাওয়াত করেন। হয় আপনি কেবল এই সূরাটিই পড়ুন, অথবা এটি ছেড়ে দিয়ে অন্য সূরা পড়ুন। তিনি বললেন: আমি এটি ছাড়তে পারবো না। যদি আপনারা পছন্দ করেন যে আমি এটি (এভাবে) পড়েই আপনাদের ইমামতি করি, তবে আমি তা করব। আর যদি আপনারা অপছন্দ করেন, তবে আমি আপনাদের ছেড়ে দেব (ইমামতি ছেড়ে দেব)।

তারা তাকে নিজেদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ মনে করতেন এবং তিনি ছাড়া অন্য কেউ তাদের ইমামতি করুক, তা তারা অপছন্দ করতেন। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের কাছে আসলেন, তখন তারা তাকে ঘটনাটি জানালেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে অমুক! তোমার সাথীরা যা করার নির্দেশ দিচ্ছে, তা থেকে তোমাকে কিসে বাধা দিচ্ছে? আর কোন কারণে তুমি প্রত্যেক রাকাতেই এই সূরাটি তেলাওয়াত করছ?"

সে ব্যক্তি বললেন: হে আল্লাহর রসূল! আমি এই সূরাটিকে ভালোবাসি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই এর প্রতি তোমার ভালোবাসা তোমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে।"