আল-জামি` আল-কামিল
1981 - عن معاذ بن عبد الله الجهني، أن رجلًا من جهينة أخبره أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الصبح: {إِذَا زُلْزِلَتِ الْأَرْضُ} في الركعتين كلتيهما، فلا أدري أنَسِي رسول الله صلى الله عليه وسلم أم قرأ ذلك عمدًا.
حسن: رواه أبو داود (816) عن أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، أخبرني عمرو، عن ابن أبي هلال، عن معاذ بن عبد الله الجهني فذكر مثله.
وإسناده حسن للكلام في ابن أبي هلال وهو: سعيد بن أبي هلال الليثي مولاهم، أبو العلاء المصري، وقيل: مدني، وشيخه معاذ بن عبد الله الجهني غير أنهما"صدوقان" وقال النووي في الخلاصة" (1226):"رواه أبو داود بإسناد صحيح".
وقول الصحابي:"فلا أدري، أنسي رسول الله صلى الله عليه وسلم أم قرأ ذلك عمدًا".
الأصل أن فعل النبي صلى الله عليه وسلم يعدّ مشروعًا، وتردد الصحابي بين النسيان والعمد يحكم للعمد إلا إذا قام الدّليل على خلاف ذلك، ولم أقف على المنع من تكرار سورة واحدة في الركعتين. ولذا بوب أبو داود وغيره بقوله: باب الرجل يعيد سورة واحدة في الركعتين.
মু'আয ইবনে আবদুল্লাহ আল-জুহানী থেকে বর্ণিত, জুহায়নার এক ব্যক্তি তাকে জানিয়েছেন যে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের সালাতে উভয় রাকাতে {إِذَا زُلْزِلَتِ الْأَرْضُ} (সূরা যিলযাল) পড়তে শুনেছিলেন। তবে (তিনি বললেন) আমি জানি না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভুলে গিয়েছিলেন নাকি তিনি ইচ্ছাকৃতভাবে এটি পড়েছিলেন।
1982 - عن ابن مسعود قال: جاء رجل إليه فقال: قرأت المفصل الليلة في ركعة. فقال: هذًّا كَهَذِّ الشعر، لقد عرفتُ النظائر التي كان النبي صلى الله عليه وسلم يقرن بينهن، فذكر عشرين سورة من المفصل، سورتين في كل ركعة.
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (775) ومسلم في صلاة المسافرين (722/ 279) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة قال: سمعت أبا وائل قال: جاء رجل إليّ عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.
وسمى مسلم هذا الرجل في رواية أبي بكر بن أبي شيبة، عن وكيع، عن الأعمش، عن أبي وائل"نَهيك بن سِنَان، وقال فيه عبد الله:"هذًّا كَهَذِّ الشعر؟ إن أقواما يقرؤون القرآن، لا يجاوز تراقيهم، ولكن إذا وقع في القلب فرَسَخ فيه نَفَع. إن أفضل الصلاة الركوع والسجود، إني لأعلم النظائرَ التي كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرُن بينهن. سورتين في كل ركعة"، وفي رواية أبي معاوية، عن الأعمش"عشرون سورة من المفصل في تأليف عبد الله".
وذكر تفصيله ابن خزيمة (538) في رواية أبي خالد، عن الأعمش: وهي عشرون سورة من تأليف عبد الله. أوَّلُهن {الرَّحْمَنُ} وآخرتهن {الدخان} {الرَّحْمَنُ {وَالنَّجْمِ} في ركعة و {وَالذَّارِيَاتِ} {وَالطُّورِ} في ركعة هذه النظائر، و {اقْتَرَبَتِ} و {الْحَاقَّةُ} في ركعة {الْوَاقِعَةُ} {ن} في ركعة {وَالنَّازِعَاتِ} {سَأَلَ سَائِلٌ} في ركعة و {الْمُدَّثِّرُ} و {الْمُزَّمِّلُ} في ركعة و {وَيْلٌ لِلْمُطَفِّفِينَ} و {عَبَسَ} في ركعة و {وَلَا أُقْسِمُ} و {هَلْ أَتَى} في ركعة {وَالْمُرْسَلَاتِ} {عَمَّ يَتَسَاءَلُونَ} في ركعة {إِذَا الشَّمْسُ كُوِّرَتْ} و {الدُخَّانْ} في ركعة.
وهكذا رواه أيضًا أبو داود (1396) عن عبَّاد بن موسى، ثنا إسماعيل بن جعفر، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن علقمة والأسود قالا: أتى ابن مسعود رجل فقال: إني أقرأ المفصل في الركعة، فقال: أهذًّا كَهَذِّ الشِّعر، ونَثْرًا كنثر الدقل؟ لكن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ النظائرَ، السورتين في الركعة، ثم ذكر التفصيل كما مضى
قال أبو داود:"هذا تأليف ابن مسعود".
والمفصل من (ق) إلى آخر القرآن على الصحيح كما قال الحافظ.
وقوله:"النظائر" أي السور المتماثلة في المعاني؛ كالموعظة، أو الحكم، أو القصص.
وقوله:"هذًّا" - بفتح الهاء وتشديد الذال المعجمة - أي سردًا وإفراطًا في السرعة، وهو منصوب على المصدر، وهو استفهام إنكار بحذف أداة الاستفهام. قال ذلك لأن تلك الصفة كانت عادتهم في إنشاد الشعر. كذا في الفتح.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বলল: আমি গত রাতে (সালাতে) এক রাকাতে মুফাচ্ছাল (সূরাগুলো) পড়েছি। তিনি (ইবনে মাসউদ) বললেন: এ কেমন দ্রুত পাঠ, যেন কবিতার মতো দ্রুত আবৃত্তি! আমি অবশ্যই সেই অনুরূপ সূরাগুলো (আন-নাযায়ির) জানি যা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একত্রে মিলাতেন। অতঃপর তিনি মুফাচ্ছাল-এর বিশটি সূরার উল্লেখ করলেন, যার প্রতি দু’টি করে সূরা তিনি প্রতি রাকাতে পড়তেন।
(মুসলিমে অপর এক বর্ণনায় আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন): "এ কেমন দ্রুত আবৃত্তি, যেন কবিতার মতো? নিশ্চয়ই কিছু লোক কুরআন পড়ে, যা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করে না, কিন্তু যখন তা অন্তরে প্রবেশ করে এবং গেঁথে যায়, তখন তা উপকারে আসে। নিঃসন্দেহে সালাতের মধ্যে সর্বোত্তম হলো রুকু ও সিজদা। আমি অবশ্যই সেই অনুরূপ সূরাগুলো জানি যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একত্রে মিলাতেন: প্রতি রাকাতে দু’টি করে সূরা।"
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিন্যাস অনুযায়ী মুফাচ্ছাল-এর সেই বিশটি সূরার প্রথমটি হলো {আর-রাহমান} এবং শেষটি হলো {আদ-দুখান}। সেই অনুরূপ সূরাগুলোর (নাযায়ির) বিন্যাস ছিল:
১. {আর-রাহমান} ও {আন-নাজম} এক রাকাতে।
২. {আয-যারিয়াত} ও {আত-তূর} এক রাকাতে।
৩. {ইক্বতারাবাত} (আল-ক্বামার) ও {আল-হাক্কাহ} এক রাকাতে।
৪. {আল-ওয়াক্বিআহ} ও {নূন} (আল-ক্বালাম) এক রাকাতে।
৫. {আন-নাযিআত} ও {সাআলা সাইয়িল} (আল-মা'আরিজ) এক রাকাতে।
৬. {আল-মুদ্দাচ্ছির} ও {আল-মুযযাম্মিল} এক রাকাতে।
৭. {ওয়াইলুল লিল মুত্বাফফিফীন} ও {আবাসা} এক রাকাতে।
৮. {ওয়া লা উক্বসিমু} (আল-ক্বিয়ামাহ) ও {হাল আতা} (আল-ইনসান) এক রাকাতে।
৯. {আল-মুরসালাত} ও {আম্মা ইয়াতাসায়ালূন} (আন-নাবা) এক রাকাতে।
১০. {ইযাশ শামসু কুব্বিরাত} ও {আদ-দুখান} এক রাকাতে।
1983 - عن عائشة - قال عبد الله بن شقيق: سألت عائشة: هل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم -
يجمع بين السُّور في ركعة؟ قالت: المفَصَّل.
صحيح: أخرجه أحمد (25687)، وإسحاق بن راهوية (1301)، كلاهما عن وكيع، نا كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن شقيق قال: فذكر الحديث.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح، وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (539) فأخرجه من طريق سلم بن جنادة، عن وكيع به مثله.
إنما اختلف على كهمس بن الحسن، روى عنه وكيع كما سبق، وروى يزيد بن هارون عنه وزاد فيه سؤالًا عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم قاعدًا فقالت عائشة: كان يُصلي قاعدًا حين حَطَمَه الناس. رواه أبو داود (956) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا يزيد بن هارون به مثله.
ورواه عثمان بن عمر، عن كهمس وزاد فيه أمرًا ثالثًا وهو: صلاةُ الضُّحى فقالت عائشة: كان يصلي صلاة الضحى إذا جاء من مغيبه.
رواه ابن خزيمة (539) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقي، عن عثمان بن عمر، عن كهمس به فذكر الحديث.
ورواه خالد بن الحارث، عن كهمس وفيه ذكر صلاة الضحى، والسؤال عن صوم شهر كله، فقالت:"ما علمت صام شهرًا كله إلا رمضان، ولا أفطر حتى يصوم منه حتى مضى لسبيله" ولم يذكر فيه قراءة السور في ركعة، ولا أداء الصلاة جالسًا.
رواه النسائي (2184) عن إسماعيل بن مسعود قال: أنبأنا خالد - وهو ابن الحارث فذكر الحديث.
رواه عبيد الله بن معاذ، عن أبيه، عن كهمس، واكتفى فيه بذكر صلاة الضحى فقط. رواه مسلم (717) من هذا الوجه.
ورواه أحمد (25385) عن محمد بن جعفر ويزيد بن هارون وأبي عبد الرحمن المقرئ وإسحاق بن راهوية (1300) عن النضر بن شميل كلهم عن كهمس، وجمعوا فيه أربعة أشياء كلها وهي: صلاة الضحي، وأداء الصلاة جالسًا، وقرن السور، وصوم رمضان. وهذه الأسانيد كلها صحيحة، والأمر يعودُ إلى الاختصار والتفصيل وهو شيء معروف في رواية الحديث، والحمدلله رب العالمين.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবদুল্লাহ ইবনু শাকীক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এক রাকা‘আতে একাধিক সূরা একসাথে পাঠ করতেন? তিনি বললেন: (হ্যাঁ), মুফাস্সাল (সূরাসমূহ)।
1984 - عن أبي العالية قال: حدثني من سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"أَعطوا كل سورة حظَّها من الركوع والسجود".
صحيح: رواه الإمام أحمد (20590) عن أبي معاوية وعبدة، قالا: حدثنا عاصم، عن أبي العالية فذكر الحديث. ورواه أيضًا ابن أبي شيبة (1/ 369) عن عبدة وحده مثله.
وإسناده صحيح، ولا يضر عدم تسمية الصحابي. وأورده الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2674)
وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وأبو معاوية هو: محمد بن خازم الضرير الكوفي، عمي وهو صغير، من رجال الجماعة.
وعاصم هو: ابن سليمان الأحول أبو عبد الرحمن البصري من رجال الجماعة.
وأبو العالية هو: رُفيع بن مهران من رجال الجماعة.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (20651) عن يحيى بن سعيد الأموي، عن عاصم - قال: حدثنا أبو العالية قال: أخبرني من سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لكل سورة حظُّها من الركوع والسجود".
قال: ثم لقيتُه بعدُ فقلت له: إن ابن عمر كان يقرأ في الركعة بالسور، فتعرف من حدثَك هذا الحديث؟ قال: إني لأعرفه، وأعرف منذ كم حدَّثنيه، حدثني منذ خمسين سنة. انتهى.
ورواه البيهقي (3/ 10) عن شيخه أبي عبد الله الحاكم من طريق مروان بن معاوية، أنبأنا عاصم الأحول، عن ابن سيرين قال: كان ابن عمر يقرأ عشر سور في كل ركعة. قال عاصم: فذكرت ذلك لأبي العالية فقال: وأنا كنتُ أقرأ عشرين سورة في كل ركعة، ولكن حدثني من سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لكل سورة حظُّها من الركوع والسجود".
قال البيهقي: وتابعه عبد الواحد بن زياد، عن عاصم في حديث أبي العالية.
ثم رواه من طريق عبد الواحد، ثنا عاصم الأحول به مثله.
ولا منافاة بين هذا الحديث والأحاديث التي سبق ذكرها في الجمع بين السورتين أو أكثر في ركعة واحدة لبيان الجواز في الصورتين، ومن أكثر الركوع والسجود فهو أولى، لما جاء في الصحيح:"إن أقرب ما يكون العبد من ربه وهو ساجد".
আবূ আল-আলিয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন, তিনি আমাকে বলেছেন: "তোমরা প্রত্যেকটি সূরার রুকূ এবং সিজদার প্রাপ্য অংশ দাও।"
অন্য এক বর্ণনায় (ইমাম আহমদ ২০৬৫১) আবূ আল-আলিয়াহ থেকে এসেছে, তিনি বলেন: যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন, তিনি আমাকে জানিয়েছেন: "প্রত্যেকটি সূরার জন্য রুকূ এবং সিজদার প্রাপ্য অংশ রয়েছে।" তিনি [আবূ আল-আলিয়াহ] বলেন: এরপর আমি তাঁর [যিনি হাদীসটি বর্ণনা করেছেন] সাথে সাক্ষাৎ করে বললাম: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো এক রাকাআতে কয়েকটি সূরা পড়তেন। আপনি কি সেই ব্যক্তিকে চেনেন যিনি আপনাকে এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি তাঁকে চিনি এবং কত বছর আগে তিনি আমাকে হাদীসটি শুনিয়েছেন, তাও জানি—তিনি পঞ্চাশ বছর আগে আমাকে হাদীসটি শুনিয়েছিলেন।
1985 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني لا أستطيع أن آخذ من القرآن شيئًا، فعلِّمني ما يجزئني منه، قال:"قل سبحان الله! والحمد لله ولا إله إلا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلا بالله العلي العظيم". قال يا رسول الله! هذا الله عز وجل فما لي؟ قال:"قل: اللهم ارحمني وارزقني وعافني واهدني".
فلما قام قال هكذا بيده، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"أما هذا فقد ملأ يده من الخير".
حسن: رواه أبو داود (832)، والنسائي (924) كلاهما من طريق إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، عن عبد الله بن أبي أوفى فذكر الحديث.
وإبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي فيه مقال، قال أحمد: ضعيف، وقال النسائي: ليس بذاك القوي، ولكن قال ابن عدي:"لم أجد له حديثًا منكر المتن، وهو إلى الصدق أقرب منه إلى غير".
قلت: وهو من رجال البخاري، وصحَّحه ابن خزيمة (544)، والحاكم (1/ 241) وقال:"على
شرط البخاري" ولكن قال الحافظ في الهدي":"ليس له في الصحيح غير حديثين إلا أنه لم ينفرد".
فهو ممن قبله البخاري في المتابعات، والحديث المذكور رواه أيضًا الطبراني وابن حبان في صحيحه.
وتابعه فيه طلحة بن مصرف، فرواه عن عبد الله بن أبي أوفى، قال الحافظ:"ولكن في إسناده الفضل بن موفق ضعَّفه أبو حاتم" التلخيص (1/ 236).
قلت: في الجرح والتعديل (7/ 68)، قال أبو حاتم: مكان شيخًا صالحًا ضعيف الحديث" فإذا ضُم الطريق بعضه إلى بعض يصل إلى درجة الحسن.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: "আমি কুরআন থেকে কিছুই মুখস্থ করতে সক্ষম নই। সুতরাং আমাকে এমন কিছু শিখিয়ে দিন যা আমার জন্য যথেষ্ট হবে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বলো: 'সুবহানাল্লাহ, ওয়াল হামদুলিল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, ওয়াল্লাহু আকবার, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহিল আলিয়্যিল আযীম'।" লোকটি বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! এটি তো আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল-এর জন্য হলো, কিন্তু আমার জন্য কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বলো: 'আল্ল-হুম্মার হামনী, ওয়ার যুকনী, ওয়া 'আফিনী, ওয়াহদিনী'।" যখন লোকটি উঠে দাঁড়াল, সে তার হাত দিয়ে এভাবে ইশারা করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই লোকটি তো তার দুই হাত কল্যাণ দ্বারা পূর্ণ করে নিল।"
1986 - عن عثمان بن أبي العاص أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إن الشيطان قد حال بيني وبين صلاتي وقراءتي. يلبسُها عليَّ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذاك شيطان يقال له خِنْزَبٌ، فإذا أحسسته فتعوذ بالله منه. واتفل على يسارك ثلاثًا". قال: ففعلت ذلك فأذْهَبَه الله عني.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2203) عن يحيى بن خلف الباهلي، ثنا عبد الأعلى، عن سعيد الجريري، عن أبي العلاء (يزيد بن عبد الله بن الشخير)، أن عثمان بن أبي العاص أتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه سالم بن نوح، عن الجريري ولم يذكر ثلاثًا، وزيادة الثقة مقبولة، وقد تابع أبو أسامة عبد الأعلى على ذكر الثلاثة، ورواه أيضًا سفيان عن سعيد الجريري، ثنا يزيد بن عبد الله بن الشخير وهو: أبو العلاء، عن عثمان بن أبي العاص فذكر مثل حديثهم. ووهم الحاكم فاستدركهـ (4/ 219) من طريق الجُريري عن أبي العلاء بن الشخير عنه وقال: صحيح الإسناد ولم يخرجاه.
উসমান ইবনে আবুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রসূল! শয়তান আমার নামায ও কিরাআতের মধ্যে অন্তরায় সৃষ্টি করেছে এবং সে আমার জন্য তা গোলমাল করে দেয়।" রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে হলো এক শয়তান, যাকে 'খিনযাব' বলা হয়। যখন তুমি তার উপস্থিতি অনুভব করবে, তখন আল্লাহ্র কাছে তার থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করবে এবং বাম দিকে তিনবার হালকা থুথু নিক্ষেপ করবে।" তিনি (উসমান) বললেন: "আমি তাই করলাম। ফলে আল্লাহ্ তা'আলা তাকে আমার কাছ থেকে দূর করে দিলেন।"
1987 - عن حذيفة قال: صليت مع النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فافتتح البقرة فقلت: يركع عند المائة ثم مضى. فقلت: يصلي بها في ركعة فمضى. فقلت: يركع بها، ثم افتتح النساء فقرأها، ثم افتتح آل عمران فقرأها، يقرأ مترسلا إذا مرَّ بآية فيها تسبيح سبَّح، وإذا مرَّ بسؤال سأل، وإذا مرَّ بتعوذ تعوذ … الحديث.
صحيح: رواه مسلم (772) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا عبد الله بن نمير، وأبو معاوية، عن الأعمش، عن سعد بن عبيدة، عن المستورد بن الأحنف، عن صلة بن زفر، عن حذيفة، فذكره.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি সূরা আল-বাকারা শুরু করলেন। আমি (মনে মনে) বললাম: তিনি একশো আয়াত পূর্ণ হলে রুকুতে যাবেন। কিন্তু তিনি (পড়া) চালিয়ে গেলেন। আমি (আবার) বললাম: তিনি এই সূরা দিয়েই এক রাকাআতে সালাত পূর্ণ করবেন। কিন্তু তিনি (পড়া) চালিয়ে গেলেন। আমি (আবার) বললাম: তিনি এই সূরা শেষ করে রুকুতে যাবেন। তারপর তিনি সূরা আন-নিসা শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। এরপর তিনি সূরা আলে ইমরান শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। তিনি ধীরে ধীরে স্পষ্ট করে পড়ছিলেন। যখনই তিনি এমন কোনো আয়াত অতিক্রম করতেন যাতে তাসবিহ (আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা) রয়েছে, তিনি তাসবিহ পাঠ করতেন। যখনই তিনি কোনো প্রার্থনার (সাওয়াল) আয়াত অতিক্রম করতেন, তিনি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করতেন। আর যখনই তিনি কোনো আশ্রয় চাওয়ার (তা‘আউয) আয়াত অতিক্রম করতেন, তিনি আশ্রয় চাইতেন...।
1988 - عن عوف بن مالك الأشجعي، قال: قمتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة، فقام فقرأ سورة البقرة، لا يمر بآية رحمة إلا وقف فسأل، ولا يمر بآية عذاب إلا وقف فتعوّذ.
حسن: رواه أبو داود (783)، والنسائي (1132)، وأحمد (23980) كلهم من حديث معاوية بن صالح، عن عمرو بن قيس، عن عاصم بن حميد، عن عوف بن مالك الأشجعي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن حميد فإنه حسن الحديث.
আওফ ইবনে মালিক আল-আশজা‘ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (নামাযে) দাঁড়ালাম, তিনি দাঁড়ালেন এবং সূরাহ আল-বাক্বারাহ পড়লেন। তিনি যখনই কোনো রহমতের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং (আল্লাহর কাছে) প্রার্থনা করতেন, আর যখনই কোনো আযাবের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং (আল্লাহর কাছে) আশ্রয় চাইতেন।
1989 - عن موسى بن أبي عائشة، قال: كان رجل يصلي فوق بيته، وكان إذا قرأ: {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} [القيامة: 40] قال: سبحانك، فبلى. فسألوه عن ذلك، فقال: سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (884) عن محمد بن المثنى، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن موسى بن أبي عائشة، فذكره. ومن طريقه رواه البيهقي (2/ 310).
وإسناده صحيح، ولا يضر عدم معرفة اسم الصحابي.
قال ابن كثير:"تفرد به أبو داود، ولم يسم هذا الصحابي ولا يضر ذلك".
وقد أعلّه البعض بأن موسى بن أبي عائشة ثقة لم يلق أحدا من الصحابة، ولكن في الإسناد ما يدل على أنه سمع من هذا الرجل الذي يصلي فوق بيته، وهو صحابي.
ويقويه مرسل قتادة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأها قال:"سبحانك فبلى" رواه ابن جرير الطبري وغيره بإسناد صحيح إلى قتادة.
মূসা ইবনু আবী আইশা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি তাঁর বাড়ির ছাদে সালাত আদায় করতেন। আর যখন তিনি এই আয়াতটি পড়তেন: {আল্লাহ কি মৃতদেরকে জীবিত করতে সক্ষম নন?} (সূরা আল-কিয়ামাহ: ৪০), তখন তিনি বলতেন: "সুবহানাকা ফাবালা" (আপনি পবিত্র, হ্যাঁ নিশ্চয়ই)। লোকেরা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: আমি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।
1990 - عن ابن عباس، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} [الأعلى: 1] قال:"سبحان ربي الأعلى".
صحيح: رواه أبو داود (883) عن زهير بن حرب، حدثنا وكيع، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ورواه الإمام أحمد (2066)، والحاكم (1/ 263) كلاهما من حديث وكيع. وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: ولكن أعلّه أبو داود فقال:"خولف وكيع في هذا الحديث. رواه أبو وكيع وشعبة عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس موقوفًا".
قلت: أبو وكيع هو الجراح بن مليح بن عدي. قال في القريب:"صدوق يهم" ولكن متابعة شعبة له تقويه، كما أن شعبة ممن سمع من أبي إسحاق قبل اختلاطه، فالموقوف هو الأشبه، وله حكم الرفع، فلعلّ أبا إسحاق وهو السبيعي روي من وجهين.
ورواه الحاكم (2/ 521) من وجه آخر عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر أنه كان إذا قرأ: {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} قال:"سبحان ربي الأعلى الذي خلق فسوّى. قال: وهي قراءة أبي بن كعب".
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وفي الباب ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قرأ منكم: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ} فانتهى إلى آخرها {أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِينَ} فليقل: بلى، وأنا على ذلك من الشاهدين. ومن قرأ: {لَا أُقْسِمُ بِيَوْمِ الْقِيَامَةِ} فانتهى إلى {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} فليقل: بلى. ومن قرأ: {وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا} فبلغ {فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ} فليقل: آمنا بالله".
قال إسماعيل: ذهبتُ أعيد على الرجل الأعرابي وأنظر لعله؟ ! فقال: يا ابن أخي، أتظن أني لم أحفظه؟ لقد حججتُ ستين حجّة ما منها حجة إلا وأنا أعرف البعير الذي حججت عليه.
رواه أبو داود (887) - واللفظ له -، وأحمد (7391)، والترمذي (3347) مختصرًا كلّهم من حديث سفيان، قال: حدثني إسماعيل بن أمية، قال: سمعت أعرابيا يقول: سمعت أبا هريرة يقول (فذكره).
قال الترمذي:"إنما يروى بهذا الإسناد عن الأعرابي ولا يسمي".
قلت: علة هذا الحديث جهالة الأعرابي الذي لم يسم.
وإن قال ابن كثير في"تفسيره": وقد رواه شعبة، عن إسماعيل بن أمية، قال: قلت له من حدّثك؟ قال: رجل صدق عن أبي هريرة، فهو على كل حال مجهول.
ورواه الحاكم (2/ 510) من وجه آخر عن إسماعيل بن أمية، عن أبي اليسع، عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأ: {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} قال: بلى. وإذا قرأ: {أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِينَ} قال: بلى.
وقال: صحيح الإسناد.
وأبو اليسع قال فيه الذهبي في"الميزان":"مجهول". ولعله هو الأعرابي نفسه كما في الإسناد الأول.
ويستفاد من هذا الباب أنه يستحب للإمام والمأموم السؤال عند المرور بآية فيها ذكر الرحمة والجنة، والتعوذ عند المرور بآية فيها ذكر العذاب والنار، والتسبيح عند قراءة آية فيها التنزيه والتسبيح، وهو قول الشافعية كما نقله النووي في"شرح مسلم".
وقيده بعض أهل العلم بصلاة النافلة وهم الحنابلة، وقالوا: ولا يستحب ذلك في الفريضة؛ لأنه لم ينقل عن النبي صلى الله عليه وسلم في فريضة مع كثرة من وصف قراءته فيها. انظر: المغني (1/ 632).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন {সَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} (তোমার মহান রবের নামের পবিত্রতা ঘোষণা করো) তেলাওয়াত করতেন, তখন তিনি বলতেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আ'লা।"
1991 - عن أبي يعفور قال: سمعتُ مصعب بن سعد يقول: صليت إلى جنب أبي، فطبَّقتُ بين كفيَّ، ثم وضعتُهما بين فخذِيَّ، فنهاني أبي وقال:"كنَّا نفعله فنُهينا عنه، وأمرنا أن نضع أيدينا على الركب".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (790)، ومسلم في المساجد (535) كلاهما من طريق أبي يعفور به مثله، واللفظ للبخاري.
وفي لفظ مسلم:"وجعلت يديَّ بين ركبتيَّ فقال لي أبي: اضرب بكفيك على ركبتيك، قال: ثم فعلت ذلك مرة أخرى، فضرب يديَّ وقال: إنا نُهِينا عن هذا، وأُمرنا أن نضربَ بالأكفِّ على الركب.
وفي رواية عنده من طريق الزبير بن عدي، عن مصعب بن سعد بن أبي وقاص قال:"صليت إلى جنب أبي، فلما ركعتُ شَبّكْتُ أصابعي، وجعلتُهما بين ركبتيَّ، فضرب يديَّ، فلما صلى قال: قد كنَّا نفعلُ هذا، ثم أُمرنا أن نرفع إلى الركب".
قال الترمذي (2/ 44): والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم والتابعين، ومن بعدهم، لا اختلاف بينهم في ذلك إلا ما روي عن ابن مسعود وبعض أصحابه، أنهم كانوا يُطبقون، والتطبيق منسوخ عند أهل العلم". وسيأتي حديث عبد الله بن مسعود.
আবু ইয়া'ফুর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুসআব ইবনু সা'দকে বলতে শুনেছি: আমি আমার পিতার (সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস) পাশে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলাম। তখন আমি আমার উভয় হাত একত্রিত করে (আঙ্গুলগুলো পরস্পরের সাথে মিলিয়ে) সে দুটোকে আমার উরুর মাঝখানে রাখলাম। আমার পিতা তখন আমাকে নিষেধ করলেন এবং বললেন, "আমরা এটা করতাম, কিন্তু পরে আমাদের এটা করতে নিষেধ করা হয়েছে এবং নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যেন আমরা আমাদের হাত হাঁটুতে রাখি।"
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে: আমি আমার হাত দু'টো আমার হাঁটুর মাঝখানে রাখলাম। তখন আমার পিতা আমাকে বললেন: তুমি তোমার হাতের তালু দিয়ে তোমার হাঁটু ধরে রাখো। তিনি (মুসআব) বলেন, এরপর আমি আরেকবার তা-ই করলাম (হাঁটুর মাঝে রাখলাম)। তখন তিনি আমার হাতে আঘাত করলেন এবং বললেন: আমাদেরকে এটা করতে নিষেধ করা হয়েছে এবং নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যেন আমরা হাতের তালু দিয়ে হাঁটু ধরে রাখি।
তাঁর (মুসলিমের) অন্য একটি বর্ণনায় যুুবাইর ইবনু আদী হতে, তিনি মুসআব ইবনু সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন: আমি আমার পিতার পাশে দাঁড়িয়ে সালাত পড়ছিলাম। যখন আমি রুকূ করলাম, তখন আমি আমার আঙ্গুলগুলো পরস্পরের সাথে মিশিয়ে নিলাম এবং সে দুটোকে আমার হাঁটুর মাঝে রাখলাম। তখন তিনি আমার হাতে আঘাত করলেন। যখন সালাত শেষ হলো, তিনি বললেন: আমরা এই রকম করতাম, অতঃপর আমাদেরকে হাঁটু পর্যন্ত (হাত) উঠানোর জন্য নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
ইমাম তিরমিযী (২/৪৪) বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ ও তাবেয়ীগণসহ পরবর্তী আলেমদেরও এই মতের ওপরই আমল রয়েছে। এ ব্যাপারে তাদের মাঝে কোনো মতপার্থক্য নেই। তবে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর কিছু সাথী থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, তারা ‘তাত্ববীক্ব’ (হাতের তালু একত্রিত করে উরুর মাঝে রাখা) করতেন, তা ভিন্ন কথা। আলেমদের নিকট ‘তাত্ববীক্ব’ মানসূখ (রহিত) হয়ে গেছে। আর আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস পরে আসছে।
1992 - عن الأسود وعلقمة قالا: أتينا عبد الله بن مسعود في داره فقال: أصَلَّى هؤلاء خلْفكم؟ فقلنا: لا، قال: فقوموا فصلُّوا، فلم يأمرنا بأذان ولا إقامة، قال: وذهبنا لنقومَ خلْفه، فأخذ بأيدينا فجعل أحدنا عن يمينه، والآخر عن شماله، قال: فلما ركع وضعنا أيدينا على ركبنا، قال: فضرب أيدينا، وطبَّق بين كفَّيه، ثم أدخلهما بين فخذيه، قال: فلما صلَّى قال: إنه سيكون عليكم أمراء يؤخرون الصلاة عن ميقاتها، ويخنُقونها إلى شَرَقِ الموتى، فإذا رأيتُم قد فعلوا ذلك فصلُّوا الصلاة لميقاتها، واجعلوا صلاتكم معهم سُبْحَةً، وإذا كنتُم ثلاثةً فصلوا جميعًا، وإذا كنتُم أكثر من ذلك فليؤمكم أحدكم، وإذا ركع أحدكم فليُفرش ذراعَيه على فخذيه، ولْيَجْنأ وليطبِّق بين كفيه، فكأَنِّي أنظر إلى اختلاف أصابع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأراهم.
وفي رواية: فكأنِّي أنظر إلى اختلاف أصايع رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو راكع.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (534)، من طرق عن إبراهيم النخعي، عن الأسود وعلقمة به مثله.
ورواه النسائي (1031) من طريق عاصم بن كليب، عن عبد الرحمن بن الأسود عن علقمة، عن عبد الله قال: علَّمنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الصلاة فقام فكبِّر فلما أراد أن يركع طبَّق يديه بين ركبتيه، وركع، فبلغ ذلك سعدًا فقال: صدق أخي قد كنَّا نفعل هذا، ثم أمرنا بهذا - يعني الإمساك بالركب، ثم روي حديث مصعب بن سعد كما مضى.
وفي الحديث دليل على أن سنة التطبيق منسوخة، وأن النسخ لم يلغ ابن مسعود وأصحابه، وهو حديث سعد بن أبي وقاص وغيره، كما أنه لم يبلغه أن الإمام إذا كان معه رجلان وَقَفَا وراءه صفًا.
وقوله:"يخنقونها": بضم النون - معناه يفقون وقتها، ويؤخرون أداءها.
وقوله:"شرق الموتى": قال ابن الأعرابي: فيه معنيان: أحدهما: أن الشمس في ذلك الوقت - وهو آخر النهار - إنما تبقى ساعة، ثم تغيب.
والثاني: أنه من قولهم: شرق المبيت بِرِيقه إذا لم يبق بعده إلا يسيرًا، ثم يموت، أفاده النووي.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল-আসওয়াদ ও আলক্বামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদের) বাড়িতে গেলাম। তিনি বললেন, তোমাদের পেছনের লোকগুলো কি সালাত আদায় করেছে? আমরা বললাম, না। তিনি বললেন, তবে তোমরা দাঁড়াও এবং সালাত আদায় করো। তিনি আমাদের আযান বা ইকামতের নির্দেশ দেননি। তিনি বলেন, আমরা তাঁর পেছনে দাঁড়াতে গেলে তিনি আমাদের হাত ধরে একজনকে তাঁর ডানে এবং অন্যজনকে তাঁর বামে দাঁড় করালেন। তিনি বলেন, যখন তিনি রুকু করলেন, আমরা আমাদের হাতগুলো হাঁটুতে রাখলাম। তিনি আমাদের হাতে আঘাত করলেন এবং তার দু'হাতকে মিলিয়ে (আঙ্গুলসমূহ পরস্পরের সাথে জড়িয়ে) দিলেন, অতঃপর সেগুলো দু'উরুর মাঝে প্রবেশ করালেন।
তিনি বলেন, যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: তোমাদের ওপর এমন শাসকবর্গ আসবে যারা সালাতকে তার নির্ধারিত সময় থেকে বিলম্বিত করবে এবং তা মৃতদের মৃত্যুর কাছাকাছি সময়ের (অর্থাৎ দিনের শেষ ভাগের) দিকে টেনে নিয়ে যাবে। যখন তোমরা দেখবে তারা এরূপ করেছে, তখন তোমরা সালাতকে তার নির্দিষ্ট সময়ে আদায় করো এবং তাদের সাথে তোমাদের সালাতকে নফল হিসেবে গণ্য করো।
আর যখন তোমরা তিনজন হবে, তখন তোমরা সকলে একসাথে সালাত আদায় করবে। আর যদি তোমরা এর চেয়ে বেশি হও, তবে তোমাদের একজন ইমামতি করবে। যখন তোমাদের কেউ রুকু করবে, সে যেন তার দু’হাত তার দু’উরুর উপর বিছিয়ে রাখে, সামনের দিকে ঝুঁকে যায় এবং তার হাতের তালু দু’টিকে মিলিয়ে রাখে (তাতবীক করে)। যেন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আঙ্গুলগুলোর জড়ানো অবস্থা দেখছি এবং তাঁদেরকে (সাহাবীদেরকে) তা দেখাচ্ছি।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: যেন আমি রুকু করা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আঙ্গুলগুলোর জড়ানো অবস্থা দেখছি।
1993 - عن ابن عباس قال: سأل رجل النبي صلى الله عليه وسلم عن شيء من أمر الصلاة؛ فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"خلِّل أصابع يديك ورجليك - يعني إسباغ الوضوءه وكان فيما قال له:"إذا ركعت فضع كفيك على ركبتيك حتى تطْمَئِنَّ، (وقال الهاشمي مرة): حتى تَطْمَئِنَّا - وإذا سَجدتَ فأَمْكِنْ جبَهتَك من الأرضي، حتى تجدَ حَجْم الأرضِ".
حسن: رواه الإمام أحمد (2604) حدثنا سليمان بن داود الهاشمي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن صالح مولى التوأمة قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل عبد الرحمن بن أبي الزناد فإنه مختلف فيه، وصالح مولى التوأمة اختلط، ولكن روى عنه موسى بن عقبة قبل الاختلاط، وسبق تخريج هذا الحديث في كتاب الوضوء، باب تخليل الأصابع، فإن الجزء الأول من الحديث رواه الترمذي وابن ماجة بهذا الإسناد.
وقال الحافظ في التلخيص (1/ 44):"وفيه صالح مولى التوأمة وهو ضعيف، لكن حينه البخاري، لأنه من رواية موسى بن عقبة، عن صالح، وسماع موسى منه قبل أن يختلط".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে সালাতের (নামাজের) কোনো একটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি তোমার হাত ও পায়ের আঙুলগুলো খিলাল করো"— (এ দ্বারা উদ্দেশ্য হলো উত্তমরূপে ওযু করা)। তিনি তাকে আরও যা বলেছিলেন তার মধ্যে ছিল: "যখন তুমি রুকু করবে, তখন তোমার হাতের তালু দুটিকে তোমার হাঁটুদ্বয়ের উপর রাখো, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তি লাভ করো (তথা স্থির হও)। আর যখন তুমি সিজদা করবে, তখন তোমার কপালকে ভূমির উপর সুপ্রতিষ্ঠিত করো, যাতে তুমি মাটির দৃঢ়তা (স্পর্শ) অনুভব করতে পারো।"
1994 - عن محمد بن عمرو بن عطاء قال: سمعتُ أبا حميد الساعدي في عشرةٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فيهم: أبو قتادة فقال أبو حُميد: أنا أعلمُكم لِصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم وفيه: ثم يركعُ ويَضَعُ رُكبتيه على ركبتيه معتمدًا، لا يَصُبُّ رأسه ولا يُقْنِعُ، معتدلًا.
صحيح: رواه أبو داود (730)، والترمذي (304)، وابن ماجة (1061) كلهم من طريق عبد الحميد بن جعفر، حدثنا محمد بن عمرو بن عطاء به مثله في حديث طويل وسبق تخريجه في باب رفع اليدين وفيه كلام. ورواه أيضًا النسائي (1040) من طريق عبد الحميد مختصرًا بقوله:
"كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا ركع اعتدل، فلم ينصب رأسه، ولم يُقْنِعه، ووضع يديه على ركبتيه".
وقوله: لا يَصُبُّ رأسه - أي لم يُملْه إلى أسفل، وفي رواية الترمذي:"لم يُصوِّب رأسه" من التصويب، وهو تنكيس الرأس إلى أسفل، ومعناهما واحد.
وقوله: ولم يُقْنِع - أي لم يرفع رأسه حتى يكون أعلى من ظهره، من قولهم: أقنع رأسه - إذا نصبه، ولكن كان بين ذلك.
আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনু ‘আমর ইবনু ‘আত্বা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আবূ কাতাদাহসহ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দশজন সাহাবীর মাঝে আবূ হুমাইদ আস-সাঈদীকে বলতে শুনেছি। আবূ হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাত সম্পর্কে অধিক অবগত। (সালাতের বর্ণনায় তিনি বললেন): এরপর তিনি রুকূ’ করতেন এবং উভয় হাঁটুতে ভর দিয়ে রাখতেন। তিনি তাঁর মাথা নিচের দিকে ঝুঁকিয়ে রাখতেন না এবং উপর দিকে উঠিয়েও রাখতেন না, বরং তা মধ্যম অবস্থায় রাখতেন।
1995 - عن وائل بن حجر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ركع فرَّج أصابعه، وإذا سجد ضَمَّ أصابعه.
حسن: رواه الطبراني (22/ 19) عن موسى بن هارون، ثنا الحارث بن عبد الله، أخبرنا هُشيم، عن عاصم بن كليب، عن علقمة بن وائل، عن أبيه وائل بن حجر فذكر مثله.
قال الهيثمي في المجمع (2807): رواه الطبراني في الكبير، وإسناده حسن.
قلت: وأخرجه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (994) عن موسى بن هارون بن عبد الله البزار، حدثني أبو الحسن الحارث بن عبد الله الهمداني - يعرف بابن الخازن، حدثنا هُشيم به إلا أنه لم يذكر"وإذا سجد ضَمَّ أصابعه".
وأخرجه الحاكم في المستدرك (1/ 224) من طريق عمرو بن عون، عن هُشيم به مثل رواية ابن خزيمة مختصرًا وقال: صحيح على شرط مسلم.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকূ করতেন, তখন তাঁর আঙ্গুলসমূহ ফাঁকা রাখতেন, আর যখন সিজদা করতেন, তখন তাঁর আঙ্গুলসমূহ মিলিয়ে রাখতেন।
1996 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل المسجد، فدخل رجل فصَلَّى، فسلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم فردَّ وقال:"ارجع فصَلِّ فإنك لم تُصلِّ" فرجع يُصلِّي كما صَلَّى، ثم جاء فسَلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ارجع فصَلَّ فإنك لم تُصلِّ" - ثلاثًا. فقال: والذي بعثك بالحق ما أحسن غيره، فعَلِّمْنِي، فقال:"إذا قُمت إلى الصلاة فكبِّر، ثم اقرأ ما تيسر معك من القرآن، ثم اركع حتى تطمئن راكعًا، ثم ارفع حتى تعدِلَ قائمًا، ثم اسجد
حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع حتى تطمئن جالسًا، وافعل ذلك في صلاتك كلها".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (757)، ومسلم في الصلاة (397) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن عبد الله، قال: حدثني سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
هكذا رواه يحيى فقال فيه:"عن أبيه، ورواه غيره عن عبد الله فلم يقولوا فيه:"عن أبيه" وكلاهما صحيح، فإن سعيدًا لم يكن مدلِّسًا، وقد ثبت سماعه من أبي هريرة فصحَّ الإسناد من الطريقين، ولذا أخرج الشيخان من الوجهين.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন এক ব্যক্তি প্রবেশ করে সালাত আদায় করল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিল। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে বললেন, "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" লোকটি ফিরে গিয়ে ঠিক সেভাবেই সালাত আদায় করল যেমন সে প্রথমে করেছিল। এরপর সে আবার এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিল। তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" — এভাবে তিনি তিনবার বললেন। তখন লোকটি বলল, 'যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি এর চেয়ে ভালো করে সালাত আদায় করতে জানি না। সুতরাং আমাকে শিখিয়ে দিন।' তিনি (নবী) বললেন, "যখন তুমি সালাতের জন্য দাঁড়াও, তখন তাকবীর দাও। এরপর কুরআন থেকে যা তোমার জন্য সহজ হয়, তা পাঠ করো। অতঃপর রুকুতে যাও এবং রুকুতে প্রশান্তি (স্থিরতা) লাভ করা পর্যন্ত থাকো। এরপর সোজা হয়ে দাঁড়াও যতক্ষণ না তোমার পিঠ সম্পূর্ণ সোজা হয়। তারপর সিজদা করো এবং সিজদাতে প্রশান্তি লাভ করা পর্যন্ত থাকো। তারপর উঠে বসো যতক্ষণ না স্থিরভাবে বসে যাও। আর তোমার সব সালাতে এরূপ করো।"
1997 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: أترون قِبلَي هاهنا؟ فوالله! ما يخفي علي خشوعُكم، ولا ركوعُكم، إنِّي لأراكم من وراء ظهري".
متفق عليه: رواه مالك في قصر السفر (70) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ومن طريق مالك رواه البخاري في الصلاة (418)، وفي الأذان (741)، ومسلم في الصلاة (424) إلا أنه زاد"ولا سجودُكم".
ولمسلم أيضًا (423) من طريق سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا، ثم انصرف فقال: يا فلان! ألا تُحسنُ صلاتَك؟ ألا ينظر المُصَلِّي إذا صلَّى كيف يُصَلِّي؟ فإنما يُصَلِّي لنفسه، إني والله! لأبْصر من ورائي كما أبصر من بين يدي".
وفي الحديث حث أيضًا على الخشوع، وإتمام الركوع والسجود من أكبر أسباب الخشوع.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা কি আমার ক্বিবলার দিকটা দেখছো? আল্লাহর কসম! তোমাদের খুশু (বিনয়), তোমাদের রুকু আমার কাছে গোপন থাকে না। আমি তোমাদেরকে আমার পিছন থেকেও দেখতে পাই।
(মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে): আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরলেন এবং বললেন: হে অমুক! তুমি কি তোমার সালাতকে উত্তম কর না? যখন কোনো মুসল্লি সালাত আদায় করে, তখন সে কীভাবে সালাত আদায় করছে, সেদিকে কি সে লক্ষ্য করে না? কারণ সে তো কেবল নিজের জন্যই সালাত আদায় করে। আল্লাহর কসম! আমি আমার পিছন থেকে ঠিক সেভাবেই দেখতে পাই, যেভাবে আমি আমার সামনে থেকে দেখি।
1998 - عن رِفاعة بن رافع قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا في المسجد فدخل رجل فصلى ركعتين، ثم جاء فسلم على النبي صلى الله عليه وسلم وقد كان النبي صلى الله عليه وسلم يرمقه في صلاته فرد عليه السلام ثم قال له:"ارجع فصل فإنك لم تصل" فرجع فصلى ثم جاء فسلم على النبي صلى الله عليه وسلم فرد عليه السلام ثم قال:"ارجع فصل فإنك لم تصل" حتى كان عند الثالثة أو الرابعة فقال: والذي أنزل عليك الكتاب! لقد جهدت وحرصت فأرني وعلمني. قال:"إذا أردت أن تصلي فتوضأ فأحسن وضوءك، ثم استقبل القبلة، فكبر، ثم اقرأ، ثم اركع حتى تطمئن راكعًا، ثم ارفع حتى تعتدل قائمًا، ثم اسجد حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع حتى تطمئن قاعدًا، ثم اسجد حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع، فإذا أتممت صلاتك على هذا فقد تمت، وما انتقصتَ من هذا فإنما تنتقصه من صلاتك".
صحيح: رواه النسائي (1314) من طريق داود بن قيس، قال: حدّثني علي بن يحيى بن خلّاد بن رافع بن مالك الأنصاريّ، قال: حدّثني أبي، عن عمّ له بدريّ، قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم،
فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الحاكم (1/ 242، 243).
وهذا إسناد صحيح، وقد اختلف فيه على عَليّ بن يحيى بن خلَّاد، فرواه عنه داود بن قيس هكذا، وقد صحَّح البيهقيّ رواية داود بن قيس ومن وافقه.
قلت: وممن وافقه:
1 - محمد بن عجلان. ومن طريقه رواه النسائيّ (1313)، والإمام أحمد (18997).
2 - ومحمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن عمّه رفاعة بن رافع. ومن طريقه أخرجه أبو داود (860)، وابن خزيمة (597)، والحاكم (1/ 243)، والبيهقي (2/ 133، 134).
3 - وإسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة. ومن طريقه أبو داود (858)، والنسائيّ (1136)، وابن ماجة (460) كلّهم من طريق همّام بن يحيى، حَدَّثَنَا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، قال: حَدَّثَنِي عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن عمّه رفاعة بن رافع، فذكر الحديث.
وخالفهم محمد بن عمرو، فرواه عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد ولم يذكر أباه.
ومن طريقه رواه أحمد (18995)، وأشار البيهقيّ (2/ 373) إلى رواية محمد بن عمرو، عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن رفاعة ولم يذكر فيه:"عن أبيه".
ولكن رواه أبو داود (859) من طريق محمد بن عمرو فقال: عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن رفاعة.
فهل هذا خطأ مطبعيّ، أو اختلاف على محمد بن عمرو، والذي يظهر أنه خطأ مطبعيّ، يدل عليه ما نقله ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 82) عن أبيه قال:"رواه شريك بن عبد الله بن أبي نمر، وداود بن قيس، وابن عجلان، عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، فقالوا: عن أبيه رفاعة. وحماد بن سلمة، ومحمد بن عمرو لا يقولان:"عن أبيه، والصحيح عن أبيه، عن عمّه رفاعة".
قلت: وكذلك اختلف على إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، فأقام همام بن يحيى إسناده كما قال الحاكم (1/ 241) فإنّه حافظ ثقة، وكلّ من أفسد قوله فالقول قول همّام". انتهى.
وخالفه حمّاد بن سلمة، فرواه عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة فلم يذكر في إسناده أباه كما قال أبو حاتم وغيره.
والخلاصة: إنَّ هذا الحديث صحيح ثابت لا اضطراب فيه كما قال بعض أهل العلم، وهو موافق لحديث أبي هريرة.
قال البيهقيّ:"فالقول قول من حفظ، والرّواية التي ذكرناها بسياقها موافقة للحديث الثابت عن أبي هريرة في ذلك وإن كان بعض هؤلاء يزيد في ألفاظها وينقص، وليس في هذا الباب حديث أصح
من حديث أبي هريرة". (2/ 373).
রিফায়াহ ইবনে রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মসজিদে বসে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি প্রবেশ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করল। অতঃপর সে এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সালাম দিল। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সালাত লক্ষ্য করছিলেন। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে তাকে বললেন: "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" লোকটি ফিরে গিয়ে সালাত আদায় করল, অতঃপর এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সালাম দিল। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে বললেন: "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" এভাবে তৃতীয় বা চতুর্থবার হলে লোকটি বলল: যিনি আপনার উপর কিতাব নাযিল করেছেন, তাঁর শপথ! আমি তো যথেষ্ট চেষ্টা ও আগ্রহ নিয়ে আদায় করেছি। সুতরাং আপনি আমাকে দেখান এবং শিখিয়ে দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তুমি সালাত আদায় করতে চাও, তখন ওযু করো এবং উত্তমরূপে ওযু সম্পন্ন করো। এরপর কিবলামুখী হও, তাকবীর দাও, তারপর কুরআন পাঠ করো। অতঃপর রুকুতে যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে রুকুতে স্থির হও। তারপর মাথা তোলো, যতক্ষণ না তুমি সোজা হয়ে দাঁড়াও। এরপর সাজদায় যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে সাজদায় স্থির হও। এরপর মাথা তোলো, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে বসে পড়ো। এরপর পুনরায় সাজদায় যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে সাজদায় স্থির হও। এরপর মাথা তোলো। যখন তুমি তোমার সালাত এভাবে পূর্ণ করবে, তখনই তা পূর্ণ হবে। আর যদি তুমি এর কোনো অংশ বাদ দাও, তাহলে তুমি তোমার সালাত থেকে তা-ই বাদ দিলে।"
1999 - عن أنس بن مالك، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أقيموا الركوعَ والسجودَ، فوالله! إني لأراكم من بَعدي - وربما قال: من بعد ظهري إذا ركعتم وسجدتم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (742)، ومسلم في الصّلاة (452) كلاهما عن محمد بن بشار، ثنا محمد بن جعفر غندر، ثنا شعبة، قال: سمعتُ قتادة، عن أنس فذكر الحديث.
عن حذيفة أنه رأى رجلًا لا يُتم الركوعَ والسجودَ قال:"ما صلَّيتَ، ولو مُتَّ مُتَّ على غير الفطرةِ التي فطر الله محمدًا صلى الله عليه وسلم".
وفي رواية:"مُتَّ على غير سنة محمد صلى الله عليه وسلم".
صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (791، 808) من الوجهين، عن حذيفة.
أدخل البخاريّ هذا الحديث في الجامع على رأي الجمهور بأن الصحابي إذا قال: سنة محمد، أو فطرته كان حديثًا مرفوعًا، وقد خالف فيه قوم قال الحافظ: والراجح الأوّل.
وأمّا ما رواه الإمام أحمد (23258) من طريق الأعمش، والنسائي (1312) من طريق طلحة بن مصرف، كلاهما عن زيد بن وهب، قال: دخل حذيفةُ المسجدَ، فإذا رجل يُصَلِّي مما يلي أبواب كِندة، فجعل لا يُتم الركوعَ ولا السجود، فلمّا انصرف قال له حذيفة: منذ كم هذه صلاتُك؟ قال: منذ أربعين سنة. قال: فقال له حذيفة: ما صليتَ منذ أربعين سنةً، ولو مُتَّ، وهذه صلاتُك لمُتَّ على غير الفطرة التي فطر عليها محمَّد صلى الله عليه وسلم قال: ثمّ أقبلَ عليه يُعَلِّمه فقال: إن الرّجل ليُخِفُّ في صلاته، وإنه ليُتم الركوعَ والسجودَ.
فإسناده وإن كان صحيحًا فلعله يحمل على المبالغة، لأن حذيفة مات سنة ست وثلاثين، فعلي هذا يكون ابتداء صلاة المذكور قبل الهجرة بأربع سنوات أو أكثر، ولعل الصّلاة لم تكن فُرِضتْ بعد. فلعله أطلق وأراد المبالغة. انظر"فتح الباري" (2/ 275).
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রুকূ ও সিজদা সঠিকভাবে সম্পন্ন করো। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদেরকে আমার পেছন থেকেও দেখতে পাই—আর সম্ভবত তিনি বলেছেন: আমার পিঠের পেছন থেকে—যখন তোমরা রুকূ ও সিজদা করো।"
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক ব্যক্তিকে দেখলেন, যে রুকূ ও সিজদা সঠিকভাবে সম্পন্ন করছে না। তিনি বললেন: "তুমি সালাত পড়োনি। আর যদি তুমি মারা যাও, তাহলে তুমি সেই ফিতরাত (প্রকৃতি) ব্যতীত অন্য কিছুর ওপর মারা যাবে যার ওপর আল্লাহ মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সৃষ্টি করেছেন।"
অন্য এক বর্ণনায়: "তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতের বাইরে মৃত্যুবরণ করবে।"
আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনায় (যেইদ ইবনু ওয়াহাব থেকে বর্ণিত), তিনি বলেন: হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন কিন্দাহ ফটকের দিকে এক ব্যক্তি সালাত আদায় করছিল। সে রুকূ ও সিজদা পূর্ণ করছিল না। যখন সে (সালাত শেষে) ফিরল, তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি কতদিন ধরে এভাবে সালাত আদায় করছো? সে বলল: চল্লিশ বছর ধরে। হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি চল্লিশ বছর ধরে সালাত আদায় করোনি! আর যদি তুমি মারা যাও, আর এটিই তোমার সালাত থাকে, তবে তুমি সেই ফিতরাত (প্রকৃতি) ব্যতীত অন্য কিছুর ওপর মারা যাবে যার ওপর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সৃষ্টি করা হয়েছিল। এরপর তিনি তার দিকে ফিরে তাকে শিক্ষা দিতে শুরু করলেন এবং বললেন: নিঃসন্দেহে মানুষ তার সালাতে দ্রুততা করতে পারে, তবে সে যেন রুকূ ও সিজদা পূর্ণ করে।
2000 - عن إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، حَدَّثَنِي أبيّ، عن أبيه، قال: كنت عند عثمان فدعا بطَهورٍ فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ مسلمٍ تحضره صلاة مكتوبة فيُحسن وضوءَها، وخشوعَها، وركوعَها، إِلَّا كانت كفَّارةَ لما قبلها من الذنوب، ما لم يُؤت كبيرةً، وذلك الدَّهر كلّه".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (228)، عن عبد بن حُميد، وحجَّاج بن الشاعر، كلاهما عن أبي الوليد، حَدَّثَنَا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، فذكره.
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি নেই যার সামনে কোনো ফরয নামায উপস্থিত হয় এবং সে তার ওযু, বিনয় (খুশূ) এবং রুকূ সুন্দরভাবে সম্পাদন করে, তবে তা তার পূর্ববর্তী সকল গুনাহের কাফফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে কবীরা গুনাহে লিপ্ত হয়। আর এই বিধান সর্বকালের জন্য প্রযোজ্য।"