আল-জামি` আল-কামিল
2121 - عن عائشة قالت: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول في بعض صلاته:"اللَّهم حاسبني
حسابًا يسيرًا" فلما انصرف قلت: يا نبي الله! ما الحساب اليسير؟ قال:"أن يَنظُرَ في كتابه، فيتجاوَزَ عنه، إنه من نُوقش الحساب يومئذ يا عائشةُ! هلك. وكلُّ ما يصيبُ المؤمنَ يكفِّرُ الله عز وجل عنه حتى الشوكة تشوكُه".
حسن: رواه الإمام أحمد (24215) قال: حدثنا إسماعيل، حدثنا محمد بن إسحاق، قال: حدثني عبد الواحد بن حمزة بن عبد الله بن الزبير، عن عبَّاد بن عبد الله بن الزبير، عن عائشة … فذكرت الحديث. ورجاله ثقات ومحمد بن إسحاق مدلس ولكنه صرح بالتحديث، وصحَّحه ابن خزيمة (849) بعد أن رواه من طريق إسماعيل وهو ابن علية، والحاكم (1/ 57، 255) بعد أن رواه من طريق الإمام أحمد وقال: صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتفقا على حديث ابن أبي مليكة، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من نُوقش الحساب عذب" والطبراني في الأوسط (3662) من طريق محمد بن مسْلَمة، عن محمد بن إسحاق، عن يحيى بن عروة بن الزبير عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث دون قوله: في بعض صلاته.
قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن يحيى بن عروة إلا محمد بن إسحاق، تفرد به محمد بن مسلمة.
قلت: وليس الأمر كما قال فقد روي عن محمد بن إسحاق - إسماعيلُ ابن علية، أيضًا كما أن يحيى بن عروة لم ينفرد به فقد تابعه عبد الواحد بن حمزة كما أن محمد بن إسحاق لم ينفرد به، فقد تابعه عبد الواحد بن زياد. رواه الإمام أحمد (25515) عن يونس بن محمد، عنه قال: حدثنا عبد الواحد بن حمزة بن عبد الله بن الزبير، قال: سمعتُ عبَّاد بن الزبير، يقول سمعت أم المؤمنين عائشة تقول: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحساب اليسير، فقلت يا رسول الله! ما الحساب اليسير؟ فقال:"الرجل تُعْرضُ عليه ذنوبُه، ثم يتجاوزُ له عنها، إنه من نُوقش الحساب هلك، ولا يصيبُ عبدًا شوكةٌ فما فوقها إلا قاصَّ الله عز وجل بها من خطاياه".
وعبد الواحد بن زياد ثقة من رجال الجماعة، وسياقه وإن كان يختلف إلا أن أصل الحديث واحد.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর কোনো এক সালাতে বলতে শুনেছি: "হে আল্লাহ! আমার হিসাব সহজে গ্রহণ করুন (হিসাবে ইয়াসিরা)।" যখন তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! সহজ হিসাব কী? তিনি বললেন: "তা হলো, (বান্দার) আমলনামা দেখা হবে, অতঃপর তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হবে। হে আয়েশা! সে দিন যার হিসাব নিয়ে চুলচেরা বিশ্লেষণ করা হবে, সে ধ্বংস হয়ে যাবে। আর মুমিনের ওপর যা কিছুই আপতিত হয়, আল্লাহ তা'আলা এর মাধ্যমে তার গুনাহ মোচন করে দেন, এমনকি যে কাঁটা তাকে বিদ্ধ করে (সেটির বিনিময়েও)।"
2122 - عن أبي هريرة قال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يدعو: اللهم إني أعوذ بك من عذاب القبر، ومن عذاب النار، ومن فتنة المحيا والممات، ومن فتنة المسيح الدجال".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1377)، ومسلم في المساجد (588/ 131) كلاهما من حديث هشام، عن يحيى، عن أبي سلمة، أنه سمع أبا هريرة … فذكر الحديث.
وزاد مسلم:"إذا تشهَّد أحدكم فليستعِذْ بالله من أربع: يقول: اللهم إني أعوذ بك من عذاب جهنم، ومن عذاب القبر، ومن فتنة المحيا والممات، ومن شر فتنة المسيح الدجال".
وفي رواية: إذا فرغ أحدكم من التشهد الآخر فليتعوَّذْ بالله من أربع - فذكر مثله.
وفي رواية:"عُوذوا بالله من عذاب الله، عُوذوا بالله من عذاب القبر، عُوذوا بالله من فتنة المسيح الدجال، عوذوا بالله من فتنة المحيا والممات".
هذه الروايات كلها في صحيح مسلم من أوجه عن أبي هريرة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’আ করতেন: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে কবরের শাস্তি থেকে, জাহান্নামের শাস্তি থেকে, জীবন ও মরণের ফিতনা থেকে এবং মাসীহ দাজ্জালের ফিতনা থেকে আশ্রয় চাই।"
ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) আরো বৃদ্ধি করেছেন: তোমাদের কেউ যখন তাশাহহুদ পাঠ করে, সে যেন চারটি বিষয় থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চায়। সে বলবে: হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে জাহান্নামের শাস্তি থেকে, কবরের শাস্তি থেকে, জীবন ও মরণের ফিতনা থেকে এবং মাসীহ দাজ্জালের ফিতনার অনিষ্টতা থেকে আশ্রয় চাই।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তোমাদের কেউ যখন শেষ তাশাহহুদ শেষ করে, সে যেন চারটি বিষয় থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চায়। - এরপর অনুরূপ উল্লেখ করা হয়েছে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তোমরা আল্লাহর আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও। কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও। মাসীহ দাজ্জালের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও। জীবন ও মরণের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।
2123 - عن أبي هريرة قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل:"ما تقول في الصلاة؟" قال: أتشهَّدُ ثم أسألُ الله الجنةَ، وأعوذ به من النار. أما والله! ما أُحْسِنُ دَندنتك ولا دندنة معاذ. فقال صلى الله عليه وسلم:"حولها نُدَنْدِنُ".
صحيح: رواه ابن ماجه (910، 3847) عن يوسف بن موسى القطَّان، قال: حدثنا جرير (ابن عبد الحميد) عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده صحيح، صحَّحه أيضًا ابن خزيمة (725) فرواه عن يوسف بن موسى به مثله، وابن حبان (868) فرواه من طريق جرير بن عبد الحميد به مثله.
وأما أبو داود (792) فرواه عن عثمان بن أبي شيبة، ثنا حسين بن علي، عن زائدة، عن سليمان، عن أبي صالح، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله. ورجاله ثقات.
وقوله: ما أحسن دندنتك - أي مسألتك الخفية. والدندنة: أن يتكلم الرجل بكلام نسمع نغمتُه، ولا يفهم، وهو أرفع من الهينمة قليلًا، والضمير في"حولها" للجنة أي حول تحصيلها، أو للنار - أي حول التعوذ من النار، كذا في"النهاية" (2/ 137).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি সালাতে (নামাজে) কী দু'আ করো?" সে বলল, আমি তাশাহহুদ পড়ি, এরপর আল্লাহর কাছে জান্নাত প্রার্থনা করি এবং জাহান্নামের আগুন থেকে তাঁর কাছে আশ্রয় চাই। আল্লাহর কসম! আমি আপনার ফিসফিসানি (গোপন প্রার্থনা) এবং মুআযের ফিসফিসানি ভালো বুঝি না (বা সেভাবে দীর্ঘ দু'আ করতে পারি না)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "আমরাও তো তার (জান্নাত ও জাহান্নাম থেকে মুক্তি লাভের) আশেপাশেই ঘুরি।"
2124 - عن ابن عباس قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُعلمهم هذا الدعاء كما يعلمهم السورةَ من القرآن، يقول:"قولوا: اللَّهم إنا نعوذ بك من عذاب جهنَّم، وأعوذ بك من عذاب القبر، وأعوذ بك من فتنة المسيح الدجال، وأعوذ بك من فتنة المحيا والممات".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (590) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك بن أنس، عن أبي الزبير، عن طاوس، عن ابن عباس … فذكره.
قال مسلم: بلغني أن طَاوسًا قال لابنه: أدعوتَ بها في صلاتك؟ فقال: لا، قال: أعد صلاتك. لأن طَاوسًا رواه عن ثلاثة، أو أربعة. أو كما قال.
قال النووي: ظاهر كلام طاوس أنه حمل الأمر به على الوجوب، فأوجب إعادة الصلاة لفواته. وجمهور العلماء على أنه مستحب ليس بواجب، ولعل طاوُسًا أراد تأديب ابنه، وتأكيد هذا الدعاء عنده، لا أنه يعتقد وجوبه" انتهى.
وممن ذهب إلى عدم وجوبه الإمام البخاري فإنه بوَّب بقوله:"باب ما يتخير من الدعاء بعد التشهد وليس بواجب" واستدل لذلك بحديث عبد الله بن مسعود:"ثم يتخيَّرُ من الدعاء أعجَبَه إليه فيدعو" فإنه بصرف صيغة الأمر في قوله:"فليستعذ بالله من أربع" من الوجوب إلى الندب، وبه قال جمهور العلماء.
وكذلك الصّلاة على النبي صلى الله عليه وسلم بعد التشهد، إلا أن الشافعي قال بوجوبه بعد التشهد.
وأما الأدعية فإن الجمهور أجازوا من الأدعية في الصلاة بما يختار المُصلى من أمر الدنيا والآخرة لما ذكر في تشهد ابن مسعود"ثم يتخير من المسألة ما شاء" وفي رواية:"ثم يتخيَّر بعد من المسألة ما شاء".
وقيد أبو حنيفة ومن وافقه بأنه لا يدعو في الصلاة إلا بما يوجد في القرآن، أو ثبت في الحديث، ولكن ظاهر حديث ابن مسعود يؤيد لما ذهب إليه الجمهور، وقد روى أبو بكر بن أبي شيبة (1/ 296) من طريق عمير بن سعيد قال: كان عبد الله (بن مسعود) يعلمنا التشهد في الصلاة، ثم يقول: إذا فرع أحدكم من التشهد في الصلاة فليقل: اللَّهم إني أسألك من الخير كله ما علمتُ منه، وما لم أعلم. وأعوذ بك من الشر كله ما عملتُ منه وما لم أعلم، اللهم إني أسألك من خير ما سألك منه عبادك الصالحون، وأعوذ بك من شر ما عاذ منه عبادك الصالحون، ربنا آتنا في الدنيا حسنةً، وفي الآخرة حسنةً، وقنا عذاب النار، ربنا إننا آمنا فاغفر لنا ذنوبنا، وكفِّر عنَّا سيئاتنا وتوفنا مع الأبرار، وآتنا ما وعدتنا على رسلك ولا تخزنا يوم القيامة إنك لا تخلف الميعاد.
فهذا الدعاء ليس مما ورد كله في القرآن ولا في السنة إلا أن عبد الله بن مسعود كان يعلم أصحابه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদেরকে এই দু‘আটি এমনভাবে শিক্ষা দিতেন, যেমনভাবে কুরআনের কোনো সূরা শিক্ষা দিতেন। তিনি বলতেন:
"তোমরা বলো: হে আল্লাহ! আমরা আপনার নিকট জাহান্নামের শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই। আর আমরা আপনার নিকট কবরের শাস্তি থেকেও আশ্রয় চাই। আর আমরা আপনার নিকট মাসীহ দাজ্জালের ফিতনা থেকেও আশ্রয় চাই। আর আমরা আপনার নিকট জীবন ও মরণের ফিতনা থেকেও আশ্রয় চাই।"
2125 - عن أبي بكر الصديق أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: عَلِّمنِي دعاءً أدعو به في صلاتي، قال:"قل: اللهم إني ظلمتُ نفسي ظلمًا كثيرًا، ولا يغفر الذنوبَ إلا أنت، فاغفر لي مغفرةً من عندِك، وارحمني إنك أنت الغفور الرحيم".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (834)، ومسلم في الذكر والدعاء (2705) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن أبي بكر الصديق فذكر مثله.
ورواهما أيضًا - البخاري في التوحيد (7388)، ومسلم في الذكر من طريق عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو، وزاد مسلم مع عمرو بن الحارث رجلًا مبهما كلاهما - عن يزيد بن أبي حبيب به مثله.
وهذا الرجل المبهم هو: ابن لهيعة كما بيَّن ذلك ابن خزيمة في روايته. ذكره الحافظ في الفتح (2/ 320).
আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমাকে এমন একটি দু‘আ শিখিয়ে দিন, যা আমি আমার সালাতের মধ্যে পাঠ করব। তিনি বললেন: "তুমি বল: হে আল্লাহ! আমি আমার নিজের উপর অনেক বেশি অত্যাচার (যুলম) করেছি। আর আপনি ছাড়া কেউই গুনাহ ক্ষমা করতে পারে না। সুতরাং আপনার পক্ষ থেকে আমাকে ক্ষমা করুন। আর আমার প্রতি দয়া করুন। নিশ্চয়ই আপনি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।"
2126 - عن علي بن أبي طالب يقول النبي صلى الله عليه وسلم بين التشهد والتسليم:"اللهم اغفر لي ما قدمتُ، وما أخَّرتُ، وما أسررتُ وما أعلنتُ، وما أسرفتُ، وما أنت أعلم به مني، أنت المقدِّم، وأنت المؤخر، لا إله إلا أنت" الحديث.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (771) من طريق يوسف الماجشون، عن أبيه، عن عبد الرحمن الأعرج، عن عبد الله بن أبي رافع، عن علي.
انظر الحديث بطوله في باب الاستفتاح.
ولكن رواه أبو داود (761) من طريق عبد الله بن الفضل بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطلب،
عن عبد الرحمن الأعرج به: يقول عند انصرافه من الصلاة.
فإن صحَّ هذا فيحمل على أنه مرة كان يقول به في الصلاة، وأخرى عند انصرافه منها.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাশাহুদ ও সালামের মধ্যবর্তী সময়ে বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনি আমার পূর্বের ও পরের সব গুনাহ ক্ষমা করে দিন, যা আমি গোপনে করেছি এবং যা প্রকাশ্যে করেছি, আর যা আমি সীমালঙ্ঘন করেছি, এবং যা আপনি আমার চেয়েও বেশি জানেন। আপনিই অগ্রবর্তীকারী এবং আপনিই বিলম্বকারী। আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই।"
2127 - عن محْجَن بن الأدْرَعِ قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم المسجد، فإذا هو برجل قد قضى صلاته وهو يتشهد وهو يقول: اللَّهم! إني أسألك يا الله الأحد الصمد، الذي لم يلد ولم يولد ولم يكن له كفوًا أحد، أن تغفر لي ذنوبي، إنك أنت الغفور الرحيم، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد غفر له، قد غفر له" ثلاثًا.
صحيح: رواه أبو داود (985)، والنسائي (1301) كلاهما من طريق عبد الوارث، حدثنا الحسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة، عن حنظلة بن علي، أن محجن بن الأدْرع حدثه فذكر مثله.
وإسناده صحيح ورجاله ثقات، وقد صحَّحه ابن خزيمة (724)، والحاكم (1/ 267) فروياه من طريق عبد الوارث به مثله، قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
মহাজন ইবনুল আদরা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তিনি দেখতে পেলেন এক ব্যক্তি তার সালাত শেষ করেছে এবং তাশাহ্হুদের সময় এই দু'আটি পড়ছে: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই, হে আল্লাহ! তুমি একক, অমুখাপেক্ষী। যিনি কাউকে জন্ম দেননি এবং যাঁকে জন্ম দেওয়া হয়নি, আর যাঁর সমকক্ষ কেউ নেই। তুমি আমার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দাও। নিশ্চয়ই তুমিই ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে, তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে," – তিনবার।
2128 - عن بريدة بن الحُصيب الأسلمي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع رجلًا يقول: اللَّهم إنِّي أسألك أَني أشهد أنك أنت الله لا إله إلا أنت الأحد الصمد الذي لم يلد، ولم يولد، ولم يكن له كفوًا أحد. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد سألت الله بالاسم الذي إذا سُئل به أعطى، وإذا دُعي به أجاب".
صحيح: رواه أبو داود (1493، 1494) من وجهين: من طريق يحيى، عن مالك بن مغول، ومن طريق زيد بن حُباب قال: حدثنا مالك بن مغول، وابن ماجه (3857) من طريق وكيع، عن مالك بن مغول، والترمذي (3475) من طريق زيد بن حُباب، عن زهير بن معاوية، عن مالك بن مِغول، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه … فذكر الحديث.
قال الترمذي: قال زيد: فذكرتُه لزهير بن معاوية بعد ذلك بسِينن فقال: حدثني أبو إسحاق، عن مالك بن مِغول، قال زيد: ثم ذكرتُه لسفيان الثوري فحدثني عن مالك. قال الترمذي: حسن غريب. وروى شريك هذا الحديث عن أبي إسحاق، عن بريدة، عن أبيه، وإنما أخذه أبو إسحاق الهمداني عن مالك بن مغول، وإنما دلَّسه، وروى شريك هذا الحديث عن أبي إسحاق، انتهى كلام الترمذي.
ويظهر من كلام الترمذي أن أبا إسحاق مدلس قد دلَّس فيه، والرّاوي عنه شريك وهو سيء الحفظ، ولكن لا يضر تدليسه فقد رواه أيضًا سفيان الثوري ووكيع عن مالك بن مِغْول كما أن زيد بن حُباب أيضًا ممن سمعه من مالك بن مِغول بعد أن سمعه من سفيان الثوري أوَّلًا.
ولذا صحَّحه كثير من أهل العلم.
منهم ابن حبان (891)، والحاكم (1/ 504) بعد أن روياه من طريق مالك بن مغول قال الحاكم:
صحيح على شرط الشيخين، وقال: وله شاهد صحيح على شرط مسلم قال: أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصغار، ثنا أبو بكر بن أبي الدنيا، ثنا الحسن بن الصباح، ثنا الأسود بن عامر، أنبأ شريك، عن أبي إسحاق، عن ابن بريدة، عن أبيه.
وقال المنذري في"مختصر أبي داود" (2/ 145): وقال شيخنا الحافظ أبو الحسن المقدسي: وهو إسناد لا مطعن فيه، ولا أعلم أنه روي في هذا الباب حديث أجود إسنادا منه، وهو يدل على بطلان مذهب من ذهب إلى نفي القول بأن الله اسمًا هو الاسم الأعظم" انتهى.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন যে সে বলছে: "হে আল্লাহ, আমি আপনার কাছে চাই। কেননা আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনিই আল্লাহ, আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই। আপনি একক, আপনি মুখাপেক্ষীহীন (অনন্য), যিনি জন্ম দেননি এবং যাঁকে জন্ম দেওয়া হয়নি এবং যাঁর সমকক্ষ কেউ নেই।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আল্লাহকে এমন নামে ডেকেছ, যার মাধ্যমে চাওয়া হলে তিনি দান করেন এবং যার মাধ্যমে দু‘আ করা হলে তিনি কবুল করেন (বা উত্তর দেন)।"
2129 - عن أنس بن مالك قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا ورجل يُصلِّي، ثم دعا: اللهم إني أسألك بأن لك الحَمْد، لا إله إلا أنت المنان، بديعُ السماوات والأرض، يا ذا الجلال والإكرام، يا حي يا قيوم! فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد دعا الله باسمه العظيم الذي إذا دُعِي به أجاب، وإذا سُئل به أَعْطَى".
حسن: رواه أبو داود (1495)، والنسائي (1300) كلاهما من طريق خلف بن خليفة، عن حفص بن أخي أنس، عن أنس بن مالك فذكر مثله.
وصحَّحه ابن حبان (893)، والحاكم (1/ 503، 504) فروياه من طريق خلف بن خليفة به وجاء فيهما: فلما ركع وسجد وتشهَّد، دعا فقال في دعائه فذكرا مثله. قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
قلت: حفص ابن أخي أنس بن مالك أبو عمر المدني، قيل: هو ابن عبد الله، أو ابن عبيد الله بن أبي طلحة، وقيل ابن عمر بن عبد الله، أو عبيد الله بن أبي طلحة، وقيل: ابن محمد بن عبد الله ليس من رجال مسلم، إلا أنه ثقة، وثَّقه الدارقطني، وذكره ابن حبان في الثقات وقال: حفص بن عبد الله بن أبي طلحة أخو إسحاق ابن أخي أنس لأمه. وكذا ذكره أيضًا في صحيحه.
وخلف بن خليفة، وإن كان من رجال مسلم إلا أنه قد اختلط، ولكنه توبع فقد رواه ابن ماجه (3858)، والإمام أحمد (12205) عن وكيع، حدثني أبو خزيمة، عن أنس بن سيرين، عن أنس بن مالك فذكر مثله وفيه:"لقد سألت الله باسم الله الأعظم …" كذا في مسند الإمام أحمد.
وأبو خزيمة هو: العبدي البصري، اسمه نصر بن مرداس"صالح صدوق"، ورواه الترمذي (3544) من وجه آخر عن عاصم الأحول وثابت، عن أنس نحوه، قال الترمذي: هذا حديث غريب من حديث ثابت عن أنس، وقد روي من غير هذا الوجه عن أنس" انتهى. وفيه سعيد بن زربي ضعيف.
ثم قال الحاكم: وقد روي من وجه آخر عن أنس بن مالك، قال: حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، ثنا الربيع بن سليمان، ثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عياض بن عبد الله الفهري، عن إبراهيم بن عبيد، عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع رجلا يقول: اللَّهم إني أسألك بأن لك
الحمدَ لا إله إلا أنت، أنت المنان، بديع السموات والأرض، ذو الجلال والإكرام، أسألك الجنة، وأعوذ بك من النار. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد كاد يدعو الله باسمه الذي إذا دعي به أجاب، وإذا سئل به أعطى".
ورواه الإمام أحمد (13798) عن إسحاق بن إبراهيم الرازي، حدثنا سلمة بن الفضْل، قال: حدثني محمد بن إسحاق، عن عبد العزيز بن مسلم، عن إبراهيم بن عبيد بن رفاعة، عن أنس بن مالك قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بأبي عيَّاش زيد بن صامت الزُّرقي وهو يُصَلِّي وهو يقول فذكر مثله غير أنه لم يذكر فيه:"أسألك الجنة وأعوذ بك من النار". فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد دعا الله باسمه الأعظم إذا دُعي به أجاب، وإذا سئل به أعطى".
ومحمد بن إسحاق مدلس ولكنه توبع، وعبد العزيز بن مسلم هو المدني، مولى آل رفاعة لم يُوثقه إلا ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" وبمجموع هذه الطرق يصل الحديث إلى درجة الحسن.
وبقية أحاديث هذا الباب ستأتي في كتاب الدّعوات.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বসে ছিলাম, আর এক ব্যক্তি সালাত আদায় করছিল। অতঃপর সে দু'আ করল: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই, কারণ সকল প্রশংসা শুধু তোমারই জন্য। তুমি ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই, তুমি বড় দাতা (আল-মান্নান), আসমানসমূহ ও জমিনের স্রষ্টা (আল-বাদীউ), হে মহিমা ও সম্মানের অধিকারী (যাল-জালালি ওয়াল-ইকরাম)! হে চিরঞ্জীব, চিরস্থায়ী সত্তা (আল-হাইয়্যু, আল-কাইয়্যুম)!" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সে আল্লাহকে তাঁর সেই মহান (আযম) নামে ডেকেছে, যে নামে ডাকলে তিনি সাড়া দেন এবং সে নামে তাঁর কাছে চাইলে তিনি দান করেন।"
2130 - عن أنس بن مالك قال: جاءت أم سُلَيم إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! عَلِّمني كلماتٍ أدعو بهنَّ في صلاتي. قال:"سَبِّحي الله عشرًا، واحمديه عشرًا، ثم سَليه حاجتَكِ يَقُلْ: نعم نعم".
حسن: رواه النسائي (1299)، والترمذي (481) كلاهما من طريق عكرمة بن عمار، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس فذكر مثله.
وإسناده حسن فإنَّ عكرمة بن عمار وإن كان من رجال مسلم إلا أنه"صدوق يغلط".
وصحَّحه ابن خزيمة (850)، وابن حبان (2011)، والحاكم (1/ 255، 317) بعد ما رووا عن عكرمة بن عمار. قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
ولكن أعله أبو حاتم بالإرسال فقال: رواه الأوزاعي، عن إسحاق بن أبي طلحة، عن أم سُليم، وهو مرسل، وهو أشبه من حديث عكرمة بن عمار. نقله الحافظ في"النكت الظراف" (1/ 85) عن ابن أبي حاتم، عن أبيه. انتهى.
فمن أخذ بقول أبي حاتم ضعَّف هذا الحديث، لأن الإرسال نوع من أنواع الحديث الضعيف، ومن لم يأخذ به نظر إلى ظاهر الإسناد فإنه متصل، فلعل إسحاق بن أبي طلحة أرسل أولًا، ثم أسنده بذكر أنس ولا يصح العكس.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে কিছু বাক্য শিখিয়ে দিন, যা দিয়ে আমি আমার সালাতে (নামাজে) দু'আ করতে পারি। তিনি বললেন: "আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করো দশবার, তাঁর প্রশংসা করো দশবার। এরপর তাঁর নিকট তোমার প্রয়োজন চাও, তিনি বলবেন: হ্যাঁ, হ্যাঁ।"
2131 - عن عمار بن ياسر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في صلاته:"اللَّهم بعلمك الغَيبَ، وقدرتك على الخَلْقِ أحْيِنِي ما علِمتَ الحياةَ خيرًا لي، وتوفَّني إذا علِمتَ الوفاة خيرًا لي، اللَّهم أسألك خشيتَك - يعني في الغيب والشّهادة، وأسألك
كلمةَ الحقِّ في الرِّضا والغَضَب، وأسألك القَصْدَ في الفَقْر والغِنى، وأسألك نعيمًا لا ينفد، وأسألك قُرَّةَ عينٍ لا تنقطع، وأسألك الرضا بعد القضاء، وأسألك برد العيش بعد الموت، وأسألك لذَّةَ النظر إلى وجهِك، والشوقَ إلى لقائِك في غير ضَرَّاء مُضِرَّةٍ، ولا فِتنة مُضِلَّةٍ، اللَّهم زَيِّنَا بزينةِ الإيمان، واجْعَلنا هُداةً مُهتَدين".
صحيح: رواه النسائي (1305) من طريق حماد بن زيد، حدثنا عطاء بن السائب بن مالك، عن أبيه قال: صلى بنا عمار بن ياسر صلاة، فأوجز فيها، فقال له بعض القوم، لقد خفَّفتَ - أو أوجزتَ الصلاة. قال: ما عَلَيَّ ذلك، فقد دعوتُ فيها دعوات سمعتُهن من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما قام، تبعه رجل من القوم، هو أبي (أي أبو عطاء) غير أنه كنى عن نفسه فسأله عن الدعاء، ثم جاء فأخبر به القوم، فذكر الدعاء.
وإسناده صحيح، عطاء بن السائب ثقة، وثّقه الأئمة غير أنه اختلط، لكن رواية حماد بن زيد عنه كانت قبل الاختلاط.
ومن طريق حماد بن زيد رواه أيضًا ابن حبان (1971)، والحاكم (1/ 524) وقال الحاكم: صحيح الإسناد، وتابعه حماد بن سلمة، ومن طريقه رواه البيهقي في"الأسماء والصفات" (244)، وفُضيل بن غزوان، ومن طريقه رواه أبو يعلى (1621 تحقيق الأثري) ثلاثتهم عن عطاء بن السائب به مثله. إلا أن سماع فُضيل من عطاء كان بعد اختلاطه، ولكن متابعة حمادين له تؤكد أنه لم يختلط في هذا الحديث.
ولذا استدل بهذا الحديث كثير من المحدثين على رؤية المؤمنين الرب عز وجل يوم القيامة منهم: الإمام ابن خزيمة في كتابه"التوحيد" (ص 12) وابن منده في"الرد على الجهمية" (86) واللالكائي في"أصول اعتقاد أهل السنة" (844)، والبيهقي في"الأسماء والصفات" (244).
وللحديث طريق آخر رواه النسائي (1306)، والطبراني في الدعاء (625)، والبزار في مسنده (1392)، والإمام أحمد في مسنده (18325) كلهم من طريق شريك، عن أبي هاشم، عن أبي مجلز قال: صلى بنا عمار صلاة، فأوجز فيها، فأنكروا ذلك فقال: ألم أتِمَّ الركوعَ والسجودَ؟ قالوا: بلى، قال: أما إني قد دعوتُ فيهما بدعاء، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو به فذكر الدعاء.
وفيه شريك بن عبد الله النخعي تُكلم في حفظه، إلا أنه لم يُخطئ في رواية هذا الحديث لمتابعات له في الجملة.
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর সালাতে (নামাযে) বলতে শুনেছি: “হে আল্লাহ! আপনার অদৃশ্য জ্ঞানের মাধ্যমে এবং সৃষ্টির ওপর আপনার পূর্ণ ক্ষমতার উসিলায়, আমাকে ততক্ষণ জীবিত রাখুন যতক্ষণ আপনি জীবনকে আমার জন্য কল্যাণকর মনে করেন। আর আমাকে মৃত্যু দিন যখন আপনি মৃত্যুকে আমার জন্য কল্যাণকর মনে করেন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে আপনার ভয় (আল্লাহভীতি) চাই—অর্থাৎ গোপনে ও প্রকাশ্যে। আমি আপনার কাছে সন্তুষ্টি ও ক্রোধ উভয় অবস্থায়ই সত্য (হক) কথা বলার সামর্থ্য চাই। আমি আপনার কাছে দরিদ্রতা ও প্রাচুর্য উভয় অবস্থায়ই মধ্যমপন্থা (পরিমিতিবোধ) চাই। আমি আপনার কাছে এমন নিয়ামত চাই যা কখনো শেষ হবে না। আমি আপনার কাছে এমন চক্ষু শীতলকারী (শান্তি) চাই যা কখনও বিচ্ছিন্ন হবে না। আমি আপনার কাছে তাকদীরের (ফয়সালার) পর সন্তুষ্টি চাই। আমি আপনার কাছে মৃত্যুর পর শীতল জীবন চাই। আমি আপনার দীদার (আপনার চেহারা মোবারক দর্শনের) স্বাদ চাই, এবং এমন অবস্থায় আপনার সাথে সাক্ষাতের আকাঙ্ক্ষা (শওক) চাই যেখানে কোনো ক্ষতিকর কষ্ট বা পথভ্রষ্টকারী ফিতনা থাকবে না। হে আল্লাহ! আমাদেরকে ঈমানের অলংকার দ্বারা সুসজ্জিত করুন এবং আমাদেরকে হেদায়াতপ্রাপ্ত পথপ্রদর্শক (হিদায়াতকারী) হিসেবে তৈরি করুন।”
2132 - عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن جده، قال: دخلتُ على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يُصَلِّي، وقد وضع يَده اليُسرى على فخذه اليُسرى، ووضع يده اليُمنى على فخذه اليُمنى، وقبض أصابعه، وبسط السبَّابة وهو يقول:"يا مُقَلِّبَ القلوب! ثبِّتْ قَلْبي على دينك".
حسن: رواه الترمذي (3587) عن عقبة بن مُكْرَم، حدثنا سعيد بن سفيان الجحدري، حدثنا عبد الله بن مَعْدان، أخبرني عاصم بن كليب الجرميُّ، عن أبيه، عن جدّه قال … فذكر الحديث.
قال الترمذي: حديث غريب من هذا الوجه.
قلت: لعله حكم عليه بالغرابة لأجل عبد الله بن معدان فإنه لم يُوثِّقه أحد غير ابن حبان، فهو"مقبول" عند الحافظ، إلا أن ابن معين قال فيه:"صالح" وكذلك تابعه صفوان. رواه أبو يعلى الموصلي في مسنده قال: ثنا سيار، ثنا محمد بن حمران، ثنا صفوان، عن عاصم بن كليب به.
وزاد فيه"دخلت المسجد ورسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة، وبقية الحديث مثله.
ولم أستطع تعيين صفوان، إلا أن أحدًا ممن يُسمى بصفوان لم يتهم، فمتابعته لعبد الله بن معدان يجعل الحديث حسنًا لغيره.
তাঁর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। তিনি তাঁর বাম উরুর উপর বাম হাত রেখেছিলেন এবং তাঁর ডান উরুর উপর ডান হাত রেখেছিলেন। তিনি আঙ্গুলগুলো মুষ্টিবদ্ধ করে তর্জনীটি প্রসারিত করেছিলেন আর তিনি বলছিলেন: “ইয়া মুকাল্লিবাল ক্বুলূব! আমার অন্তরকে আপনার দীনের উপর দৃঢ় রাখুন।”
2133 - عن سعد بن أبي وقاص قال: كنتُ أرى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُسَلِّم عن يمينه، وعن يساره، حتى أرى بياضَ خدِّه.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (582) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا أبو عامر العقدي، حدثنا عبد الله بن جعفر، عن إسماعيل بن محمد، عن عامر بن سعد، عن أبيه فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডান দিকে এবং বাম দিকে সালাম ফিরাতে দেখতাম, এমনকি আমি তাঁর গালের শুভ্রতাও দেখতে পেতাম।
2134 - عن جابر بن سَمُرة قال: كنَّا إذا صلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قلنا: السّلام عليكم ورحمة الله، السّلام عليكم ورحمة الله، وأشار بيده إلى الجانبين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عَلام تُومئون بأيديكم كأنها أذنابُ خيل شُمُس، إنما يكفي أحدكم أن يضع يده على فخذه، ثم يُسَلِّم على أخيه من على يمينه وشماله".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (431) من طريق مسعر، حدثني عبيد الله ابن القِبْطية، ، عن جابر بن سمرة فذكر مثله، وفي رواية قال: صلَّيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فكنا إذا سلَّمنا قلنا بأيدينا: السلام عليكم السلام عليكم. فنظر إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"ما شأنكم؟ تُشيرون بأيديكم كأنها أذْناب خَيل شُمُس، إذا سلَّم أحدكم فليلتفِتْ إلى صاجه، ولا يُومِئ بيده" رواه أيضًا مسلم من وجه آخر عن فرات القزَّاز، عن عبيد الله، عن جابر بن سمرة به.
وفي رواية:"ما لي أراكم رافعي أيديكم كأنهما أذناب خيل شُمُس، اسكنوا في الصلاة".
رواه أيضًا مسلم من وجه آخر عن الأعمش، عن المسيب بن رافع، عن تميم بن طَرَفة، عن جابر بن سمرة فذكر مثله.
قوله: خيل شُمُس: جمع شَموس مثل رَسول ورُسُل، وهي التي لا تستقر، بل تضرب وتتحرك بأذنابها وأرجلها.
وقوله: ما لي أراكم رافعي أيديكم - المراد بالرفع المنهي عنه هنا، رفعهم أيديهم عند السلام مشيرين إلى السلام من الجانبين كما صرَّح به في الرواية الأولى.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সালাত আদায় করতাম, তখন (সালাম ফিরানোর সময়) আমরা বলতাম: ‘আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ, আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ’ এবং আমরা আমাদের হাত দিয়ে দুই দিকে ইশারা করতাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা তোমাদের হাত দিয়ে কিসের জন্য ইশারা করছো? যেন তারা উদ্ধত ঘোড়ার লেজ! তোমাদের কারও জন্য এতটুকুই যথেষ্ট যে সে তার হাত তার উরুর উপর রাখবে, অতঃপর তার ডান ও বামের ভাইকে সালাম দেবে।”
সহীহ: এটি মুসলিম সালাত অধ্যায়ে (৪৩১) মাসআর-এর সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু ক্বিবতিয়্যাহ্ থেকে, তিনি জাবির ইবনে সামুরাহ থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
আরেকটি বর্ণনায় তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সালাত আদায় করলাম, আর আমরা যখন সালাম ফিরাতাম তখন আমাদের হাত দিয়ে বলতাম: 'আসসালামু আলাইকুম, আসসালামু আলাইকুম।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দিকে তাকালেন এবং বললেন: “তোমাদের কী হয়েছে? তোমরা তোমাদের হাত দিয়ে ইশারা করছো, যেন তা উদ্ধত ঘোড়ার লেজ! তোমাদের কেউ যখন সালাম ফিরাবে, তখন সে যেন তার সঙ্গীর দিকে তাকায়, আর হাত দিয়ে ইশারা না করে।” এটিও মুসলিম ফুরাত আল-ক্বায্যা-য-এর সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি জাবির ইবনে সামুরাহ থেকে বর্ণনা করেছেন।
আরেকটি বর্ণনায় আছে: “আমি তোমাদের কী দেখছি যে তোমরা তোমাদের হাত উপরে তুলছো, যেন তা উদ্ধত ঘোড়ার লেজ! সালাতের মধ্যে শান্ত থাকো।”
এটিও মুসলিম আল-আ'মাশ-এর সূত্রে, তিনি আল-মুসায়্যিব ইবনু রাফি’ থেকে, তিনি তামীম ইবনু ত্বরাফা থেকে, তিনি জাবির ইবনে সামুরাহ থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
2135 - عن أبي معمر، أن أميرًا كان بمكة يُسَلِّم تسليمتين. فقال عبد الله: أنَّى عَلِقَها؟ .
قال الحكم في حديثه: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعلُه.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (581) عن زهير بن حرب، حدثنا يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن الحكم ومنصور، عن مجاهد، عن أبي معمر فذكر مثله.
ورواه أيضًا عن الإمام أحمد بن حنبل في المسند (4239) فقال: حدثنا يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن الحكم، عن مجاهد، عن أبي معمر، عن عبد الله، قال شعبة: (رفعه مرة) أن أميرًا، أو رجلًا فذكر مثله.
وقوله: أنَّى عَلِقَها - بفتح العين وكسر اللام - أي من أين حصل على هذه السنة وظفر بها. كذا في شرح النووي.
قال البيهقي (2/ 177) بعد أن أخرج هذا الحديث من طريق مسلم:"ولهذا الحديث شواهد عن عبد الله بن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: وهو الآتي.
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু মা'মার থেকে বর্ণিত যে, মক্কার একজন আমীর (নেতা) ছিলেন, যিনি (সালাত শেষে) দু'বার সালাম ফিরাতেন। তখন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'সে এটা কোথা থেকে পেল?'
হাকাম তাঁর হাদীসে বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা করতেন।
2136 - عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُسلم عن يمينه، وعن شماله، حتى يُرى بياض خده"السلام عليكم ورحمة الله، السلام عليكم ورحمة الله".
حسن: رواه أبو داود (996)، والترمذي (295)، والنسائي (1084، 1320)، وابن ماجه (914) كلهم من طرق عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكر مثله، واللفظ لأبي داود. قال الترمذي:"حسن صحيح".
ولكن نقل أبو داود عن شعبة أنه كان ينكر أن يكون حديث أبي إسحاق مرفوعًا.
قلت: وأبو إسحاق هو: السبيعي مدلس ومختلط، ولكن من الرواة من روى عنه قبل الاختلاط منهم سفيان الثوري وقد ساق أبو داود أسانيد كثيرة عن أبي إسحاق، ولذا صحّحه ابن خزيمة (728)، وابن حبان (1990، 1993) بعد أن روياه من طريقه، ونقل الحافظ عن العقيلي: والأسانيد صحاح ثابتة في حديث ابن مسعود في تسليمتين، ولا يصح في تسليمة واحدة شيء. التلخيص (1/ 270).
فلعله لم يدلس في هذا الحديث ولم يختلط فيه لوجود طرق كثيرة، ليس فيها أبو إسحاق.
منها ما رواه عبد الرزاق (3127) عن معمر والثوري، عن حماد، عن أبي الضُّحى، عن مسروق، عن عبد الله بن مسعود قال: ما نسيتُ فيما نسيت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان يُسلم عن يمينه:"السلام عليكم ورحمة الله" حتى نرى بياض خده، وعن يساره:"السلام عليكم ورحمة
الله" حتى نرى بياض خده أيضًا.
ومن طريق عبد الرزاق رواه الطبراني في الكبير (10177)، والإمام أحمد (3887) ولكن تحرف فيه"حماد" إلى"جابر" وإسناده صحيح.
ومنها ما رواه ابن حبان (1994)، والبيهقي (2/ 177) كلاهما من طريق زكريا (وهو ابن أبي زائدة) عن الشعبي، عن مسروق به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান দিকে এবং বাম দিকে এমনভাবে সালাম ফিরাতেন যে, তাঁর গালের শুভ্রতা দেখা যেত। তিনি বলতেন: "আস-সালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ, আস-সালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ।"
2137 - عن وائل بن حجر قال: صلَّيتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم فكان يُسلم عن يمينه:"السلام عليكم ورحمة الله وبركاته" وعن شماله:"السلام عليكم ورحمة الله وبركاته".
حسن: رواه أبو داود (997) قال: حدثنا عبدة بن عبد الله، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا موسى بن قيس الحضرمي، عن سلمة بن كُهيل، عن علقمة بن وائل، عن أبيه فذكر الحديث.
إسناده حسن لأجل موسى بن قيس فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، كما في التقريب، وبقية رجاله ثقات، ولكن علقمة بن وائل اختلف في سماعه من أبيه، فنقل العلائي في"جامع التحصيل" (537) عن ابن معين أنه قال:"لم يسمع من أبيه شيئًا" وأثبت سماعه آخرون، وإنما الذي لم يسمع من أبيه هو عبد الجبار بن وائل، ولذا صحَّح إسناد أبي داود عبد الحق الإشبيلي في"الأحكام الوسطى" (1/ 413)، والزيلعي في"نصب الراية" (1/ 432)، والنووي في المجموع (3/ 479)، والحافظ في"بلوغ المرام" وسكت عليه المنذري في"المختصر".
والتبس الأمر على الحافظ في"التلخيص" (1/ 271) فقال:"حديث وائل بن حجر رواه أبو داود والطبراني من حديث عبد الجبار بن وائل، عن أبيه ولم يسمع منه، كذا قال عبد الجبار، وهو وهم منه فإن أبا داود لم يرو عن عبد الجبار، وإنما رواه عن علقمة، فأصاب في"بلوغ المرام" والذي رواه من طريق عبد الجبار بن وائل هو أبو داود الطيالسي (1115) قال: حدثنا المسعودي، عن عبد الجبار بن وائل قال: حدثني بعض أهل بيتي، عن أبي، أنه صلى مع النبي صلى الله عليه وسلم فسلم عن يمينه وعن يساره.
وفيه رجل مبهم من أهل بيته، وأظن هو أخوه علقمة، لأن عبد الجبار يروي عن أخيه علقمة، عن أبيه، إن ثبت هذا فرجع الحديث إلى علقمة بن وائل.
وللحديث إسناد آخر: رواه أبو داود الطيالسي (1114) وابن أبي شيبة (1/ 298)، وأحمد (18853)، والبيهقي (2/ 26)، والطبراني (22/ 41) كلهم من طريق شعبة، قال: أخبرني عمرو بن مرة، قال: سمعت أبا البختري، يحدث عن عبد الرحمن بن اليحصبي، عن وائل بن حجر أنه صلى مع النبي صلى الله عليه وسلم فكان يُكبر إذا خفض، وإذا رفع، ويرفع يديه عند التكبير، ويسلم عن يمينه وعن يساره. واللفظ لأبي داود الطيالسي.
وعبد الرحمن بن اليحصِبي لم يُوثّقه غير ابن حبان. فهو"مقبول" لأنه توبع.
تنبيه: وقع في الرواية الثانية في صحيح ابن حَبَّان من حديث ابن مسعود، وعند أبي داود من حديث وائل بن حجر زيادة:"وبركاته" وهي من زيادة الثقة فيجب قبولها وكلها سنة فمرة بحذفها، ومرة بذكرها.
ويتعجب الحافظ من قول ابن الصلاح:"إن هذه الزيادة ليست في شيء من كتب الحديث."التلخيص" (1/ 271) إلا أنه عزاء هذه الزيادة أيضًا من حديث ابن مسعود إلى ابن ماجه، والنسخة التي عندنا ليست فيها هذه الزيادة، فلعلها في نسخة كانت عنده.
عن واسع بن حَبَّان أنه سأل عبد الله بن عمر عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: الله أكبر كلما وضعَ، الله أكبر كلما رفع، ثم يقول:"السلام عليكم ورحمة الله عن يمينه"السلام عليكم ورحمة الله" عن يساره.
صحيح: رواه النسائي (1320) قال: أخبرنا الحسن بن محمد الزعفراني، عن حجاّج قال: ابن جريج أنبأنا عمرو بن يحيى، عن محمد بن يحيى بن حبَّان، عن عمِّه واسع بن حَبَّان أنه سأل ابن عمر فذكر مثله.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح وقد صحَّحه ابن خزيمة (576) فرواه أيضًا عن الحسن بن محمد، وحسَّنه ابن عبد البر: التمهيد (16/ 189)، وابن جريج مدلس إلا أنه صرَّح بالتحديث.
وحجاج هو ابن محمد المِصيص من رجال الجماعة.
ولا يعل بما رواه الشافعي في الأم (1/ 122) عن مسلم بن خالد وعبد المجيد، عن ابن جريج، به مثله.
ومسلم بن خالد المعروف بالزنجي وعبد المجيد هو ابن عبد العزيز بن أبي روَّاد متكلم فيهما، إلا أنهما صدوقان يُخطئان. ولذا قال البيهقي في المعرفة (3844) بعد أن روى من طريق الشافعي: وكذلك رواه حجاج بن محمد، عن ابن جريج.
ولكن رواه الدراوردي، عن عمرو بن يحيى المازني، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن عمه واسع - قال مرة: عن ابن عمر، ومرة: عن عبد الله بن زيد أن النبي صلى الله عليه وسلم في كان يُسلم عن يمينه، وعن شماله. رواه الشافعي، ومن طريقه البيهقي في المعرفة (3846).
هكذا رواه الشافعي عنه بالشّك، ورواه الإمام أحمد (5402) عن أبي سلمة، والنسائي (1321) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن عبد العزيز الدراوردي - عن ابن عمر بدون شك، ولفظ أحمد: فذكر التكير كلما وضع رأسه، وكلما رفعه، وذكر: السلام عليكم ورحمة الله، عن يمينه"السلام عليكم" عن يساره.
فالذي يظهر أن الدّراوردي كان يرويه من وجهين، أو أنه وقع في وهم لسوء حفظه فيكون الصواب أنه من حديث ابن عمر لصحة رواية ابن جريج من طريقه.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি তাঁর ডান দিকে সালাম ফেরাতেন: "আসসালামু আলাইকুম ওয়া রহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু" এবং তাঁর বাম দিকেও: "আসসালামু আলাইকুম ওয়া রহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু।"
2138 - عن عباس بن سهل بن سعد أنه كان في مجلس، كان فيه أبوه وأبو هريرة وأبو أسيد وأبو حميد الساعدي وأنهم تذاكروا صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكروا أنه سَلَّم عن يمينه وعن شماله.
حسن: رواه ابن حبان (1866) والطبراني في الكبير (6/ 158) كلاهما من حديث أبي همام الوليد بن شجاع بن الوليد السكوني، قال حدثنا أبي، قال: حدثنا أبو خيثمة قال: حدثنا الحسن بن الحِرّ قال: حدثني عيسى بن عبد الله بن مالك، عن محمد بن عمرو بن عطاء أحد بني مالك، عن عباس بن سهل بن سعد الساعدي فذكره.
وجاء في رواية ابن حَبَّان بلفظ: فلما سَلَّم سَلَّم عن يمينه:"سلام عليكم ورحمة الله وسَلَّم عن شماله: السلام عليكم ورحمة الله".
وإسناده حسن فإن أبا الوليد وهو شجاع بن الوليد تكلم في حفظه وسبق تخريج الحديث مفصلًا في باب رفع اليدين.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পুত্র আব্বাস ইবনু সাহল ইবনু সা'দ এমন এক মজলিসে ছিলেন, যেখানে তাঁর পিতা, আবু হুরায়রা, আবু উসাইদ এবং আবু হুমাইদ আস-সা'ঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও উপস্থিত ছিলেন। তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন। তাঁরা উল্লেখ করলেন যে, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান দিকে এবং বাম দিকে সালাম ফিরিয়েছিলেন।
ইবনু হিব্বান-এর এক বর্ণনায় শব্দগুলো এসেছে: যখন তিনি সালাম ফিরাতেন, তখন ডান দিকে বলতেন: "আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ" এবং বাম দিকে বলতেন: "আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহ"।
2139 - عن أبي مالك الأشعري إنه قال لقومه: ألا أصلي بكم صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الصلاة، وسلَّم عن يمينه وعن شماله، ثم قال: هكذا كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه الطحاوي في شرحه (1/ 269) عن ابن أبي داود، قال: ثنا عياش الرقام، قال: ثنا عبد الأعلى، قال: ثنا قرة، قال: ثنا بُديل، عن شهر بن حوشب، عن عبد الرحمن بن غنم، قال: قال أبو مالك الأشعري … فذكره.
وإسناده حسن لأجل شهر بن حوشب، وسبق تخريج الحديث في باب مقام الصبيان في الصف من رواية أبي داود (677) عن عيسى بن شاذان، ثنا عياش الرقام به فذكر صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم مختصرًا ولم يذكر فيه السلام.
وعياش الرقَّام هو: عياش بن الوليد البصري، ثقة من رجال البخاري.
وبُديل: هو ابن ميسرة البصري ثقة من رجال مسلم.
فقه الباب:
أحاديث الباب تدل على وجوب التسليم، فإنه تحليل للصلاة، كما أن التكبير تحريم لها. وبه قال جمهور أهل العلم: مالك والشافعي وأحمد وغيرهم.
وقال أبو حنيفة: لا يتعين السلام للخروج من الصلاة، بل إذا خرج بما ينافي الصلاة من عمل، أو حدث، أو غير ذلك جاز، إلا أن السلام عنده مسنون، وليس بواجب، والصواب ما قاله الجمهور، لأدلة صحيحة قاطعة.
كما أن أحاديث الباب تدل على التسليمتين، وهو ثابت عن جماعة من الصحابة منهم: أبو بكر
وعلي وعمار وابن مسعود وغيرهم، ومن جماعة من التابعين ومن بعدهم، وبه قال الإمام الشافعي، وأحمد، وأبو حنيفة، وأصحاب مالك، بل قال أهل الظاهر: إنهما واجبتان.
وذهب مالك إلى أنه يُسلم تسليمةً واحدة، واستدل المالكية على كفاية التسليمة الواحدة بعمل أهل المدينة، وهو عمل توارثوه كابرًا عن كابر.
قال ابن عبد البر:"والقول عندي في التسليمة الواحدة، وفي التسليمتين أن ذلك كله صحيح بنقل من لا يجوز عليهم السهر، ولا الغلط في مثل ذلك، معمول به عملًا مستفيضًا بالحجاز التسليمة الواحدة. وبالعراق التسليمتان، وهذا مما يصح به الاحتجاج بالعمل لتواتر النقل كافة عن كافة في ذلك. ومثله لا ينسى، ولا مدخل فيه للوهم، لأنه مما يتكرر به العمل في كل يوم مرات، فصحَّ أن ذلك من المباح والسعة والتخيير""التمهيد" (16/ 190).
قلت: وقد تقرر في الأصول بأن عمل أهل المدينة ليس بحجة، ولذا قال الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى:"وهذه طريقة قد خالفهم فيها سائر الفقهاء، والصواب معهم، والسنن الثابتة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم لا تدفع ولا ترد بعمل أهل بلد كائنًا من كان""زاد المعاد" (1/ 261).
وذكر كثير من أهل العلم أن الأحاديث الواردة في التسليمة الواحدة غير ثابتة، ولكن الصواب أن الأحاديث الواردة في التسليمتين أرجح من التسليمة الواحدة، ولذا جعله البيهقي من الاختلاف المباح (2/ 255).
ورأى بعض أهل العلم أن التسليمة الواحدة كانت في صلاة الليل.
وأما الواجب فهو تسليمة واحدة، والثانية مستحبة. قال ابن المنذر: أجمع كل من أحفظ عنه من أهل العلم أن صلاة من اقتصر على تسليمة واحدة جائزة.
وقال بعض الحنابلة: الثانية أيضًا واجبة، ولكن لم يرد نصٌّ عن الإمام أحمد بوجوب التسليمتين، وإنما قال: التسليمتان أصحّ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قال ابن قدامة: وهذا الخلاف في الصّلاة المفروضة، وأما صلاة الجنازة والنافلة وسجود التلاوة فلا خلاف في أنه يخرج منها بتسليمة واحدة.
আবু মালিক আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর গোত্রের লোকদের বললেন: আমি কি তোমাদের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের মতো সালাত আদায় করব না? অতঃপর তিনি সালাত আদায় করলেন এবং তাঁর ডান দিকে ও বাম দিকে সালাম ফেরালেন। এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত এমনই ছিল।
2140 - عن عائشة أنها سُئلتْ عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالليل، فقالت: كان يصلي ثمان ركعات يقرأ فيهن بفاتحة الكتاب، وما شاء من القرآن، فلا يقعدُ في شيء منهن إلا في الثامنة، فإنه يقعدُ فيها، فيتشهد، ثم يقوم ولا يُسلم. فيصلي ركعة واحدة ثم يجلسُ فيتشهد ويدعو، ثم يسلم تسليمة واحدة:"السلام عليكم" يرفع بها صوته حتى يُوقِظنا.
صحيح: رواه الإمام أحمد (25987) قال: حدثنا بهز بن حكيم، - وقال مرة: أخبرنا - قال: سمعت زرارة بن أوفى يقول: سئلتْ عائشة … فذكر الحديث. ورواه أيضًا أبو داود (1346) من طريق ابن عدي، عن بهز بن حكيم وفيه:"ويُسلم تسليمة واحدة شديدة يكاد يُوقظ أهل البيت من شدّة تسليمه".
وزرارة بن أوفى لم يسمع من عائشة، وإن كان قد سمع من عمران وأبي هريرة وابن عباس، مع أن أعمارهم كانت متقاربة، فإن بينهما سعد بن هشام، كما عند الإمام أحمد (25988) وتابعه قتادة عن زرارة بن أوفى عن سعد بن هشام، عن عائشة كذا رواه النسائي (1719)، وابن حبان (2442) وهذا إسناد صحيح.
وأصل الحديث في صحيح مسلم (746) في سياق طويل عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام عنها قالت فيه: كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي تسع ركعات، لا يجلس فيها إلا في الثامنة، فيذكر الله ويحمده ويدعوه، ثم ينهضُ ولا يُسلم، ثم يقوم فيُصَلِّي التاسعة، ثم يقعدُ فيذكر الله ويحمدُه ويدعوه، ثم يُسلِّم تسليمًا يُسمعنا، ثم يُصلِّي ركعتين بعد ما يُسلِّم وهو قاعد.
فتلك إحدى عشرة ركعة. وسيأتي الحديث بسياقه الطويل في كتاب الوتر.
إن قول مسلم: ثم يُسلم تسليمًا - ليس نصًّا على تسليمة واحدة، لأن المصدر يؤتى به للتأكيد، والذي يدل على العدد هو مصدر المرة - أي تسليمة كما جاء في الروايات الأخرى.
قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 270):"روي ابن حبان في صحيحه، وأبو العباس السراج في مسنده عن عائشة - أخرجاه من طريق زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أوتر بتسع ركعات لم يقعد إلا في الثامنة، فيحمد الله ويذكره، ثم يدعو، ثم ينهض ولا يُسلم، ثم يُصلي التاسعة فيجلس، ويذكر الله ويدعو، ثم يُسلِّم تسليمةً. الحديث.
قال:"إسناده على شرط مسلم، ولم يستدركه الحاكم". مع أنه أخرج حديث زهير بن محمد كما سيأتي، وما صحَّ لا يُعلّه ما لم يصح، وهو ما رواه الترمذي (296)، وابن خزيمة (729)، وابن حبان (1995)، والحاكم (1/ 230 - 231) وعنه البيهقي كلهم من طريق عمرو بن أبي سلمة أبي حفص التنيسي، ثنا زهير بن محمد المكي، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة:"أنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يُسلم في الصلاة تسليمةً واحدةً تلقاء وجهه، يميلُ إلى الشق الأيمن شيئًا قليلا".
ورواه ابن ماجه (919) من طريق عبد الملك بن محمد الصنعاني، عن زهير بن محمد به، مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".
وقال البيهقي: تفرد به زهير بن محمد، وروي من وجه آخر عن عائشة موقوفًا".
وقال الترمذيّ:"لا نعرفه مرفوعًا إلا من هذا الوجه، قال محمد بن إسماعيل: زهير بن محمد أهلُ الشام يَرْوُون عنه مناكيرَ، ورواية أهلِ العراق عنه أشبه وأصح".
قلت: عمرو بن أبي سلمة من أهل الشام، وعبد الملك بن محمد الصنعاني أيضًا من أهل الشام، ونسبته الصنعاني ليس لصنعاء اليمن، وإنما لأهل صنعاء دمشق.
وقد ذُكر هذا الحديث لابن معين فقال:"عمرو بن أبي سلمة، وزهير ضعيفان لا حجة فيهما":
وسئل أبو حاتم عن هذا الحديث الذي رواه عمرو بن أبي سلمة، عن زهير بن محمد فقال:"هذا حديث منكر. وهو عن عائشة موقوف". العلل لابن أبي حاتم (1/ 148).
قلت: خلاصة أقوال أهل العلم في هذا الإسناد أنه ضعيف عند ابن معين والبخاري وأبي حاتم والدارقطني وغيرهم.
وصحيح عند ابن خزيمة وابن حَبَّان والحاكم وابن الملقن وغيرهم، ويقوي ما ذهب إليه هؤلاء ما سبق، وعمل عائشة. وهو ما رواه ابن خزيمة والحاكم وغيرهما عن وهيب بن خالد، عن عبيد الله بن عمر، عن القاسم، عن عائشة، أنها كانت تسلم تسليمة واحدة.
وتابعه يحيى بن سعيد عند ابن خزيمة (732)، وعبد الوهاب بن عبد المجيد عنده وعند البيهقي (2/ 179) كلاهما عن عبيد الله، عن القاسم، قال: رأيت عائشة تسلِّم واحدة. هذا لفظ يحيى.
وزاد عبد الوهاب بن عبد المجيد في حديثه:"ولا تلتفت عن يمينها ولا عن شمالها".
ورواه ابن خزيمة أيضًا من طريق وهيب، عن هشام بن عروة، عن أبيه، أنه كان يسلم واحدة:"السلام عليكم".
فهذا الموقوف عن عائشة ليس بمعارض للمرفوع، بل مقوٍّ له لاختلاف مخارجه، وما كانت عائشة تخالف رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي ترى كل يوم كيف يصلي رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتها.
ولكن إن صحَّ ما قالت فإنه يحمل على صلاة الليل.
وأما في المفروضة والسنن الراتبة فيجب فيها التسليمة الثانية كما قال الإمام أحمد. لأن الذين رووا عن النبي صلى الله عليه وسلم التسليمتين رووا ما شاهدوه في الفرض في المسجد وهم أكثر.
وأما جمهور أهل العلم منهم الأئمة الثلاثة فقالوا: الثانية سنة ويجوز الاقتصار على واحدة.
قال ابن خزيمة (1/ 360):"باب إباحة الاقتصار على تسليمة واحدة من الصلاة. والدّليل على أن تسليمة واحدة تجزئ، وهذا من الاختلاف المباح، فالمصلي مخيّر بين أن يسلِّم تسليمة واحدة، وبين أن يسلم تسليمتين كمذهب الحجازيين". ثم أخرج حديث عائشة من طريق زهير بن محمد المكي عن هشام بن عروة، عن أبيه، عنها.
وقال البيهقي في سننه (2/ 180): وروي عن جماعة من الصحابة أنهم سلموا تسليمة واحدة، وهو من الاختلاف المباح، والاقتصار على الجائز، وبالله التوفيق".
قلت: ومن هؤلاء: أنس بن مالك، وعبد الله بن عمر. رواه عنهما ابن أبي شيبة.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রাতের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বলেন: তিনি আট রাকাত সালাত আদায় করতেন। সেগুলোতে তিনি ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) এবং কুরআন থেকে যা ইচ্ছা তা তিলাওয়াত করতেন। তিনি অষ্টম রাকাত ছাড়া সেগুলোর কোনোটিতে বসতেন না। অষ্টম রাকাতে তিনি বসতেন, তাশাহহুদ পড়তেন, তারপর দাঁড়িয়ে যেতেন এবং সালাম ফেরাতেন না। এরপর তিনি এক রাকাত সালাত আদায় করতেন। অতঃপর বসে তাশাহহুদ পড়তেন ও দু’আ করতেন। এরপর তিনি একটি মাত্র সালাম ফেরাতেন— "আসসালামু আলাইকুম"— উচ্চস্বরে, যেন তাঁর আওয়াজে আমাদের ঘুম ভেঙে যায়।