আল-জামি` আল-কামিল
2248 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أقيموا الصَفَّ في الصلاة، فإنّ إقامة الصَفِّ من حسن الصلاة".
متفق عليه: أخرجه مسلم في الصلاة (435) عن محمد بن رافع، عن عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن همام بن مُنَبِّه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر أحاديث منها هذا.
وأخرجه البخاري في الأذان (722) عن عبد الله بن محمد، قال: حدثنا عبد الرزاق به. وبدأ الحديث بقوله:"إنما جُعل الإمام ليؤُتم به" وسيأتي هذا الحديث في موضعه، ثم ذكر حديث إقامة الصلاة. وأما مسلم وغيره فجعلوه حديثين.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সালাতের মধ্যে কাতার সোজা করো। কেননা, কাতার সোজা করা সালাতের উত্তমতা (বা সৌন্দর্যের) অংশ।"
2249 - عن النعمان بن بشير قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لتُسَوُّنَّ صفوفَكُم، أو ليخالفنَّ الله بين وجوهكم".
متفق عليه: أخرجه البخاري في الأذان (717)، ومسلم في الصلاة (436) كلاهما من حديث شعبة، قال: أخبرني عمرو بن مرة، قال: سمعتُ سالم بن أبي الجعد، قال: سمعتُ النعمان بن بشير فذكر الحديث. ولفظهما سواء.
وفي رواية عند مسلم: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُسَوِّي صفوفنا حتى كأنما يُسَوِّي بها القِداحَ، حتى رأى أنَّا قد عقلنا عنه، ثم خرج يومّا فقام حتى كاد يُكبِّر، فرأى رجلًا باديًا صدرُه من الصَفِّ فقال:"عباد الله! لتسوُّنَّ صفوفكم، أو ليخالفنَّ الله بين وجوهكم".
ورواه أبو داود (662) من وجه آخر بإسناد حسن وفيه:"أقيموا صفوفكم ثلاثًا،"والله! ليُقِيمُنَّ صفوفكم أو ليخالفنَّ الله بين قلوبكم"، قال: فرأيت الرجل يلزق منكبه بمنكب صاحبه، ركبتَه بركبة صاحبه، وكعبَه بكعبه.
وفي رواية بإسناد صحيح: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُسَوِّي صفوفنا إذا قمنا للصلاة، فإذا سَوَّينا كبَّر.
ونصُّ أبي داود يفسر قوله:"ليخالفنَّ الله بين وجوهكم" وهو بمعنى إيقاع العداوة والبغضاء
واختلاف القلوب، كذا قال النووي.
وقيل: يحمل على الحقيقة وهو: المسخُ والتحويلُ لقوله صلى الله عليه وسلم:"يجعل الله صورته صورة حمار".
والقِداح: بكسر القاف، هي خشب السهام حين تنحت وتبرى، واحدها قِدح - بكسر القاف، ومعناه يبالغ في تَسْوِيتها حتى تصير كأنما يُقَوِّم بها السهام لشدة استوائها واعتدالها.
নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই তোমাদের কাতারগুলো সোজা করবে, অন্যথায় আল্লাহ তোমাদের মুখমণ্ডলের মধ্যে মতবিরোধ সৃষ্টি করে দেবেন।"
মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাতারগুলো এমনভাবে সোজা করতেন যেন তিনি এর দ্বারা (তীর তৈরির) কাষ্ঠখণ্ডগুলো সোজা করছেন। অবশেষে যখন তিনি দেখলেন যে আমরা তাঁর কথা বুঝতে পেরেছি, তখন একদিন তিনি (নামাযের জন্য) বের হলেন এবং দাঁড়ালেন। যখন তিনি তাকবীর দেওয়ার কাছাকাছি হলেন, তখন তিনি কাতারের মধ্যে এক ব্যক্তির বুক বেরিয়ে থাকতে দেখলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহর বান্দাগণ! তোমরা অবশ্যই তোমাদের কাতারগুলো সোজা করো, অন্যথায় আল্লাহ তোমাদের মুখমণ্ডলের মধ্যে মতবিরোধ সৃষ্টি করে দেবেন।"
আবূ দাঊদের অন্য এক বর্ণনায় (যা হাসান সনদে বর্ণিত) আছে, [নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:] "তোমরা তোমাদের কাতার সোজা করো"— তিনি তিনবার বললেন— "আল্লাহর কসম! তোমরা অবশ্যই তোমাদের কাতার সোজা করবে, নতুবা আল্লাহ তোমাদের অন্তরগুলোর মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি করে দেবেন।" [নু'মান ইবনে বশীর বলেন] আমি তখন দেখলাম, লোকেরা তাদের কাঁধকে তাদের সঙ্গীর কাঁধের সাথে, তাদের হাঁটু তাদের সঙ্গীর হাঁটুর সাথে এবং তাদের গোড়ালি তাদের সঙ্গীর গোড়ালির সাথে মিলিয়ে দিচ্ছে।
অন্য এক সহীহ সনদের বর্ণনায় রয়েছে: যখন আমরা নামাযের জন্য দাঁড়াতাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাতার সোজা করতেন। যখন আমরা সোজা হয়ে যেতাম, তখন তিনি তাকবীর দিতেন।
2250 - عن أبي مسعود قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يمسحُ مناكِبَنا في الصلاة ويقول:"استَوُوا ولا تختلِفُوا، فتختلفَ قلوبُكم، ليَلِينِي مِنكم أولْو الأحْلام والنُّهَى، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم".
قال أبو مسعود: فأنتُم اليومَ أشدُ اختلافًا.
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (432) من طريق الأعمش، عن عُمارة بن عمير التيمي، عن أبي معمر، عن أبي مسعود فذكر الحديث.
وقوله:"أولو الأحلام" أي العقلاء، وقيل: البالغون.
وقوله:"النُّهى" بضم النون - العقول - وعطف أحدهما على الآخر للتأكيد.
قال الخطابي:"إنَّما أمر النبي صلى الله عليه وسلم أن يلي الإمام ذووا الأحلام والنُّهى ليعقلوا عنه صلاته، ولكي يخلفوه في الإمامة إن حدث به حدث في صلاته، وليرجع إلى قولهم إن أصابه سهو، أو عرض في صلاته عارض في نحو ذلك من الأمور""المعالم" (1/ 334).
আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের সময় আমাদের কাঁধ স্পর্শ করতেন (বা সারিবদ্ধ করে দিতেন) এবং বলতেন: "তোমরা সোজা হও এবং পরস্পর মতভেদ করো না, অন্যথায় তোমাদের অন্তরসমূহ ভিন্ন হয়ে যাবে। আমার কাছে যেন তোমাদের মধ্যে প্রাপ্তবয়স্ক ও বুদ্ধিমান ব্যক্তিরা দাঁড়ায়, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী।" আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তোমরা আজ আরো বেশি মতভেদপূর্ণ।
2251 - عن جابر بن سمرة قال: خرج علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:"ما لي أراكم رافعي أيديكم كأنَّها أذنابُ خيلٍ شُمُسٍ؟ اسكنُوا في الصلاة". قال: ثم خرج علينا فرآنا حِلَقًا فقال:"ما لي أراكم عِزين؟" قال: ثم خرج علينا فقال:"ألا تصُفُّون كما تَصُفُّ الملائكة عند ربها؟" فقلنا: يا رسول الله! وكيف تصفُّ الملائكة عند ربِّها؟ قال:"يُتِمُّون الصَّفوفَ الأُولَ، ويتراصُّون في الصفّ".
رواه مسلم في الصلاة (430) من حديث الأعمش، عن المسيب بن رافع، عن تميم بن طرفة، عن جابر بن سمرة، فذكر مثله.
ورواه أصحاب السنن من هذا الوجه الجزء الأخير من الحديث.
وقوله:"شُمس" جمع شموس. مثل رسول ورسل، وهي التي لا تستقر، بل تضرب وتتحرك بأذنابها وأرجلها.
وقوله:"حِلقًا" بكسر الحاء وفتحها لغتان، جمع حلْقة بإسكان اللام.
وقوله:"ما لي أراكم عزين أي متفرقين جماعة جماعة، وواحدها عِزَة.
وفيه النهي عن التفرق، والأمرُ بالاجتماع.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে বের হয়ে এলেন এবং বললেন: "কী হলো তোমাদের, তোমাদের হাতগুলো এমনভাবে উপরে উঠানো দেখছি যেন সেগুলো দুষ্ট (উচ্ছৃঙ্খল) ঘোড়ার লেজ? সালাতে শান্ত থাকো।" তিনি বলেন: অতঃপর তিনি আমাদের কাছে বের হয়ে এলেন এবং আমাদের দেখলেন যে আমরা গোল হয়ে বসে আছি। তখন তিনি বললেন: "কী হলো তোমাদের, আমি তোমাদের বিচ্ছিন্ন দলে দলে বিভক্ত দেখছি কেন?" তিনি বলেন: অতঃপর তিনি আমাদের কাছে বের হয়ে এলেন এবং বললেন: "তোমরা কি এমনভাবে কাতারবদ্ধ হবে না, যেভাবে ফেরেশতাগণ তাদের রবের সামনে কাতারবদ্ধ হয়?" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! ফেরেশতারা তাদের রবের সামনে কীভাবে কাতারবদ্ধ হয়? তিনি বললেন: "তারা প্রথম কাতারগুলো পূর্ণ করে এবং কাতারে পরস্পর মিলেমিশে (ঘন হয়ে) দাঁড়ায়।"
2252 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أقيموا الصفوفَ، وحاذوا بين المناكب، وسُدُّوا الخلل، ولِينُوا بأيدي إخوانكم، ولا تَذَرُوا فُرُجات للشّيطان، ومن وصل صفًّا وصله الله، ومن قطع صفًّا قطعه الله".
صحيح: رواه أبو داود (666) حدثنا عيسى بن إبراهيم الغافقي، حدّثنا ابن وهب، ح وحدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، وحديث ابن وهب أتم، عن معاوية بن صالح، عن أبي الزاهرية، عن كثير بن مرة، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله. وهذا إسناد صحيح موصول.
قال قتيبة: عن أبي الزاهرية، عن أبي شجرة، ولم يذكر ابن عمر.
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أقيموا الصفوف، وحاذوا بين المناكب، وسُدوا الخلَل، ولِينُوا بأيدي إخوانكم".
ولم يقل عيسى:"بأيدي إخوانكم". قال أبو داود: أبو شجرة: كثير بن مرة.
قلت: وهذا إسناد مرسل غير موصول، إلا أنه لا يُعُلّل الإسناد الأول، لما عرف من علوم الحديث بأن زيادة الثقة مقبولة.
قال أبو داود: ومعنى"لِينُوا بأيدي إخوانكم" إذا جاء رجل إلى الصَفِّ، فذهب يدخل فيه، فينبغي أن يُلِينَ له كلُّ رجل منكبَيْه حتى يدخل في الصف. انتهى.
ورواه النسائي (819) عن عيسى بن إبراهيم بن مثْرود قال: عبد الله بن وهب، عن معاوية به مختصرا"من وصل صَفًا وصله الله، ومن قطع صَفًا قطعه الله عز وجل". وإسناده صحيح.
وأبو الزاهرية هو: حُدير بن كريب الحمصي، وثَّقه ابن معين والنسائي والعجلي، وقال أبو حاتم: لا بأس به، فحقُّه أن يكون ثقة، وهو من رجال مسلم، إلا أن الحافظ جعله في مرتبة"صدوق".
وصححه أيضًا ابن خزيمة فأخرجه في صحيحه (1549) عن عيسى بن إبراهيم الغافقي به مختصرًا مثل النسائي، والحاكم (1/ 213) من طرق أخرى عن ابن وهب وقال:"صحيح على شرط مسلم".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কাতার সোজা করো, এবং কাঁধসমূহ বরাবর করো, আর মধ্যবর্তী শূন্যস্থান বন্ধ করো, তোমাদের ভাইদের হাতের জন্য নরম হও, এবং শয়তানের জন্য কোনো ফাঁকা জায়গা রেখো না। আর যে ব্যক্তি কাতার মিলায়, আল্লাহ তাকে মিলাবেন, এবং যে ব্যক্তি কাতার বিচ্ছিন্ন করে, আল্লাহ তাকে বিচ্ছিন্ন করবেন।"
2253 - عن عائشة قالت: قال رسول الله:"إن الله عز وجل وملائكتَه عليهم السلام يُصَلُّون على الذين يَصِلُون الصفوف".
حسن: أخرجه أحمد (24381) قال: حدثنا عبد الله بن الوليد، حدثنا سفيان، عن أسامة، عن عبد الله بن عروة، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن لأجل أسامة وهو: ابن زيد الليثي، مولاهم مختلف فيه، قال النسائي: ليس بالقوي، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه، ووثَّقه العجلي، وقال ابن حبان: يخطئ وهو مستقيم الأمر، صحيح الكتاب.
قلت: ومثله يحسن حديثه ولعل من أوهامه أنه جعل مرة شيخه عبد الله بن عروة كما هنا، وأخرى عثمان بن عروة كما عند ابن خزيمة (1550) وعبد بن حميد (1513)، والحاكم (1/ 214) وقال: صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه، إلا أن كلا الإسنادين صحيحان.
ولعلّ من أوهامه أيضًا ما رواه أبو داود (676)، وابن ماجه (1005) كلاهما من حديث أسامة، عن عثمان بن عروة به ولفظه:"إن الله وملائكته يصلون على ميامن الصفوف، فإن المحفوظ بهذا الإسناد كما تقدم.
وأما الذي رواه ابن ماجه (995) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، قال: حدثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله وملائكته يصلون على
الذين يصلون الصفوفَ، ومن سدَّ فُرْجَةً رفعه الله بها درجةً" فإسناده ضعيف لأجل إسماعيل بن عياش الحمصي، فإن روايته عن غير أهل بلده ضعيفة كما هو معروف، وهشام بن عروة من أهل الحجاز.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই মহান আল্লাহ এবং তাঁর ফেরেশতাগণ তাদের প্রতি রহমত ও কল্যাণ বর্ষণ করেন, যারা (সালাতের) কাতারসমূহকে মিলিত করে (বা সঠিকভাবে পূর্ণ করে)।"
2254 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله:"إن مِن تَمام الصلاة إقامةَ الصَفِّ".
حسن: رواه أحمد (14454) عن عبد الرزاق - وهو في المصنف (2/ 44) عن معمر، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله فذكره.
ومن هذا الطريق أخرجه أيضًا أبو يعلى (2168)، والطبراني في الكبير (1744)، وفي الأوسط (3009) انظر"مجمع البحرين" (760) وإسناده حسن لأجل عبد الله بن محمد بن عقيل، وقد مضت ترجمتُه.
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 89):"رواه أحمد وأبو يعلى والطبراني في الكبير والأوسط، وفيه عبد الله بن محمد بن عقيل وقد اختلف في الاحتجاج به".
قلت: وهو كذلك، وقد فصلت القول فيه في الطهارة، وبينت أنه حسن الحديث.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সালাত পরিপূর্ণ হওয়ার অন্যতম শর্ত হলো কাতার সোজা করা।"
2255 - عن بلال قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُسَوِّي مناكبَنا في الصلاة.
حسن: رواه الطبراني في"الصغير" (988) عن محمد بن علي بن خلف الدمشقي، ثنا أحمد بن أبي الحواري، ثنا عبد الله بن نمير، عن الأعمش، عن عمران بن مسلم، عن سويد بن غفلة، عن بلال فذكر الحديث."مجمع البحرين" (2/ برقم 754).
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد" (2/ 90) إسناده متصل ورجاله موثقون".
قلت: شيخ الطبراني لعله هو: محمد بن علي بن خلف أبو عبد الله العطّار، الكوفي، يقول فيه محمد بن منصور:"كان ثقة مأمونا حسن العقل"، تاريخ بغداد (3/ 57).
وبقية رجاله موثقون، غير أن عبد الرزاق رواه في مصنفه (2/ 47) عن الثوري، عن الأعمش، عن عمارة بن عمران، عن سويد بن غفلة قال: كان بلال يضرب أقدامنا في الصلاة، ويُسَوِّي مناكبنا، ولم يرفعه، ولكن لا يضر هذا من رفعه، لمَّا فيه من زيادة علم.
ثم إن عمارة بن عمران شك فيه المحقق أن يكون الصواب: عمران بن مسلم لأنه لم يجد من مشايخ الأعمش من اسمه: عمارة بن عمران.
বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতে (নামাজে) আমাদের কাঁধগুলো সোজা করে দিতেন।
2256 - عن عبد الحميد بن محمود قال: صلَّيتُ مع أنس بن مالك يوم الجمعة فدفعنا إلى السواري، فتقدمنا وتأخرنا، فقال أنس: كنَّا نتقي هذا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (673) واللفظ له، والترمذي (229)، والنسائي (821) كلهم من طريق سفيان، عن يحيى بن هانئ، عن عبد الحميد بن محمود فذكر الحديث، ولفظهما: كنَّا مع أنس فصلينا مع أمير من الأمراء، فدفعوا حتى قمنا وصلينا بين الساريتين، فجلس أنس يتأخر وقال:
فذكر كما ذكره أبو داود.
قال الترمذيّ:"حديث أنس حديث حسن"، وفي رواية:"صحيح" وقد كره قوم من أهل العلم أن يُصَفَّ بين السواري، وبه يقول أحمد وإسحاق، ورخَّص قوم من أهل العلم في ذلك". انتهى.
قلت: إسناده حسن، فإن عبد الحميد بن محمود المِغْوَلي من المقلين قال فيه أبو حاتم: شيخ، ووثَّقه النسائي، وبقية رجاله ثقات.
وقد صححه ابن خزيمة (1568)، وابن حبان (2218)، والحاكم (1/ 210)، والحافظ في الفتح (1/ 578).
وقيل: إن الحكمة في ذلك انقطاع الصف وذلك بالنسبة للجماعة، وأمن المنفرد فلا يكره أن يصلي بين السواري وبوَّب البخاري بقوله: الصلاة بين السواري، في غير جماعة، وأخرج فيه حديث ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل الكعبة، وصلَّى بين العمودين المقدمين. (رقم الحديث في الفتح 504).
وفي رواية: جعل عمودًا عن يساره، وعمودًا عن يمينه، وفي رواية: عمودين عن يمينه، وثلاثة أعمدة وراءه. وكان البيت يومئذ على ستة أعمدة، ثم صلَّى (رقم الحديث في الفتح 505).
وأما ما رواه ابن ماجه (1002) عن زيد بن أخْزم أبي طالب، قال: حدثنا أبو داود وأبو قتيبة، قالا: حدثنا هارون بن مسلم، عن قتادة، عن معاوية بن قُرَّة، عن أبيه، (قُرة بن إياس) قال:"كُنَّا نُنْهى أن نَصُفَّ بين السواري على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ونُطْردَ عنها طَرْدًا. فهو ضعيف، فإن هارون بن مسلم أبو مسلم البصري قال فيه أبو حاتم والذهبي: مجهول، وجعله الحافظ في درجة"مستور" والحديث في مسند أبي داود (1169).
وأما ابن حبان فذكر هارون بن مسلم في الثقات (7/ 581) على قاعدته.
وأخرج الحديث شيخه ابن خزيمة (1567) وعنه هو نفسه في صحيحه (2219) من هذا الوجه. وأما أبو قتيبة فهو سَلْم بن قتيبة الشَعيري الخراساني، نزيل البصرة"صدوق" من رجال البخاري كما في التقريب.
قال البزار:"لا نعلم روي هذا الحديث عن قتادة إلا هارون" ذكره الحافظ في ترجمته في التهذيب. قال البيهقي رحمه الله تعالى (3/ 104): لأن الإسطوانة تحول بينهم وبين وصل الصف، فإن كان منفردا ولم يجازوا ما بين السارتين لم يكره إن شاء الله تعالى لما رُوينا في الحديث الثابت عن ابن عمر قال: سألت بلالًا أين صلى رسول الله - يعني في الكعبة -. فقال: بين العمودين المقدمين".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল হামিদ ইবনু মাহমুদ বলেন: আমি জুমু'আর দিনে আনাস ইবনু মালিকের সাথে সালাত আদায় করলাম। আমরা খুঁটিগুলোর দিকে গেলাম। আমরা সামনে এগোলাম এবং পেছনে সরলাম। তখন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা এমনটি করা থেকে বিরত থাকতাম।
2257 - عن وابصة بن معبد:"أن رجلًا صَلَّى خلفَ الصَفِّ وحده، فأمره النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يُعيد الصلاةَ".
حسن: رواه أبو داود (682)، والترمذي (231) كلاهما من طريق شُعبة، عن عمرو بن مرة، عن هلال بن يساف، عن عمرو بن راشد، عن وابصة بن معبد فذكر الحديث.
اختلف علي وابصة. فقال بعضهم: حديث عمرو بن مرة، عن هلال بن يساف، عن عمرو بن راشد، عن وابصة أصح.
وقال بعضهم: حديث حصين، عن هلال بن يَساف، عن زياد بن أبي الجعد، عن وابصة بن معبد أصَحُّ.
قال الترمذي بعد أن نقل هذا الخلاف: وهذا عندي أصحُّ من حديث عمرو بن مرة، لأنه قد رُوي من غير حديث هلال بن يَساف، عن زياد بن أبي الجعد، عن وابصة. انتهى.
وحديث زياد بن أبي الجعد رواه الترمذي (230)، وابن ماجه (1004) كلاهما من طريق حصين، عن هلال بن يَساف قال: أخذ زياد بن أبي الجَعد بيدي، ونحن بالرقَّةِ، فقام بي على شيخ يقال له: وابصة بن معبد من بني أسد، فقال زياد: حدثني هذا الشيخُ:"أن رجلًا صَلَّى خلف الصفِّ وحده - والشيخ يسمعُ - فأمره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُعيد الصلاة".
وقال البيهقي (3/ 104) بعد أن روى عن عمرو بن مرة:"وخالفه حصين بن عبد الرحمن فرواه عن هلال بن يساف .. فروى من طريقه عن زياد بن أبي الجعد كما سبق.
قلت: وهذا إسناد حسن فإن زياد بن أبي الجعد الكوفي روى عن عمرو بن الحارث ووابصة، وعنه أخوه عبيد وهلال وثقه ابن حبان، وحسَّن حديثه الترمذي فهو توثيق له، على أنه قد توبع كما في الإسناد السابق، وإن كان فيه عمرو بن راشد الأشجعي مجهول، وجعله الحافظ في درجة مقبول" وصحّحه ابن حبان وأخرجه في صحيحه (2200).
زياد بن أبي الجعد في درجة"مقبول" لأنه توبع، إذ أن هلال بن يساف كان حاضرًا في المجلس عند ما قرأ زياد بن أبي الجعد الحديث على وابصة، وكان وابصة قد أقَرَّ ما قرئ عليه، فيكون هلال بن يساف ممن سمع الحديث قراءة على الشيخ مباشرة ولذا قال الترمذي:"هذا أصح عندي من حديث عمرو بن مرة".
وقال ابن حبان:"سمع هذا الخبر هلال بن يَساف، عن عمرو بن راشد، عن وابصة بن معبد، وسمعه من زياد بن أبي الجعد، عن وابصة، والطريقان جميعًا محفوظان" (5/ 578).
ولا يصح ما روي عن مقاتل بن حيان قال: قال النبي: إن جاء رجل فلم يجد أحدًا فليختلجْ إليه رجلًا من الصف فليقُم معه، فما أعظم أجرَ المختلَجِ" لأنه مرسل. رواه أبو داود في"المراسيل" (83) عن الحسن بن علي، ثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الحجَّاج بن حسان، عن مقاتل بن حبَّان فذكر مثله. ورواه البيهقي (3/ 105) عن أبي داود.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن الشعبي عن وابصة بزيادة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا صلَّى خلف
الصفوف وحده فقال:"أيها المصلي وحده ألا وصلت إلى الصف، أو جررتَ إليك رجلًا فقام معك، أعد الصلاة، فهو ضعيف، رواه البيهقي (3/ 105) وقال: تفرد به السري بن إسماعيل وهو ضعيف".
وقال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2/ 96) بعد أن عزاه لأبي يعلى: وفيه السري بن إسماعيل ضعيف".
وقال الحافظ في التقريب:"متروك" وهو الصواب، فقد قال فيه أحمد: ترك الناس حديثه، قال أبو حاتم: ذاهب، وقال أبو داود: ضعيف متروك الحديث، وقال النسائي، متروك الحديث.
ورويت هذه الزيادة بأسانيد أخرى ولكن كلها واهية.
وقد رُوي مثل هذا عن ابن عباس وأبي هريرة وكلّها ضعيفة لا يثبت منها شيء، انظر"مجمع الزوائد" (2/ 96).
ওয়াবিসা ইবনু মা'বাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ব্যক্তি একাকী কাতার (সাফ)-এর পিছনে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে সালাত পুনরায় আদায় করতে নির্দেশ দিলেন।
2258 - عن علي بن شيبان، وكان من الوفد قال: خرجنا حتى قدمنا على النبي صلى الله عليه وسلم فبايعناه، وصلَّينا خلْفَه، ثم صلَّينا وراءَه صلاة أخرى، فقضى الصلاة. فرأى رجلًا فردًا يْصَلِّي خلْف الصّف قال: فوقف عليه نبي الله صلى الله عليه وسلم حين انصرف فقال:"استقبل صلاتَك، ولا صلاةَ للذي خلف الصفِّ".
صحيح: رواه ابن ماجه (1003) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا ملازم بن عمرو، عن عبد الله بن بدر، قال: حدثني عبد الرحمن بن علي بن شيبان، عن أبيه علي بن شيبان فذكره، وهو في مصنف ابن أبي شيبة (2/ 193).
قال البوصيري:"إسناده صحيح ورجاله ثقات".
وصحّحه ابن خزيمة (1569)، وابن حبان (2202) فروياه من طريق ملازم بن عمرو به مثله.
ورواه الإمام أحمد (16297) عن عبد الصمد وسُريج، قالا: حدثنا ملازم بن عمرو به إلا أنه جمع بين الحديثين. حديث الباب، وحديث آخر وهو: أن النبي صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يُصلِّي ولا يُقيم صُلْبَه في الركوع والسجود فقال:"يا معشر المسلمين! إنه لا صلاة لمن لا يُقيم صُلْبَه في الركوع والسجود" وهذا الأخير ذُكر في باب الاعتدال في الركوع والسجود.
وعلي بن شيبان في سفره صلَّى عدة صلوات خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فمرة روى القصة الأولى، ومرة روى القصة الثانية، ولعله مرة أخرى جمع بين القصتين.
وهذا الإسناد صحّحه ابن خزيمة (593) فروى من طريق ملازم بن عمرو القصة الثانية فقط.
আলী ইবনে শায়বান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি প্রতিনিধি দলের সদস্য ছিলেন, তিনি বলেন: আমরা (মদীনার উদ্দেশ্যে) বের হলাম এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে পৌঁছলাম। অতঃপর আমরা তাঁর হাতে বায়'আত করলাম এবং তাঁর পেছনে সালাত আদায় করলাম। এরপর তাঁর পেছনে আমরা আরেকটি সালাত আদায় করলাম। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি দেখলেন, একজন লোক একাকী কাতারের পিছনে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছে। বর্ণনাকারী বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফিরে আসলেন, তখন তিনি লোকটির কাছে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "তুমি তোমার সালাত পুনরায় আদায় করো। আর কাতারের পিছনে (একাকী) সালাত আদায়কারীর কোনো সালাত নেই।"
2259 - عن أبي بكرة، أنه انتهى إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو راكع فركع قبل أن يَصِل إلى الصَّفِّ، فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"زادك الله حِرصًا، ولا تَعُدْ".
صحيح: رواه البخاري في الأذان (783) عن موسى بن إسماعيل، قال: حدثنا همام، عن
الأعلم - وهو زياد - عن الحسن، عن أبي بكرة فذكره.
وروى أبو داود (684) عن موسى بن إسماعيل، ثنا حماد، أخبرنا زياد الأعلم به ولفظه: أن أبا بكرة جاء ورسول الله صلى الله عليه وسلم راكع، فركع دون الصف، ثم مشى إلى الصف. فلما قضى النبي صلاته قال: أيكم الذي ركع دون الصف، ثم مشى إلى الصف"؟ فقال أبو بكرة: أنا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم مثله.
وقد ثبت قبل هذا من فعل زيد بن ثابت أنه وجد الناس ركوعًا فركع، ثم دَبَّ حتى وصل الصفَّ رواه مالك في الموطأ، والبيهقي (2/ 90) وإسناده صحيح.
وروى البيهقي في سننه (2/ 90 - 91) من طريق زيد بن وهب قال: خرجت مع عبد الله بن مسعود من داره إلى المسجد، فلما توسطنا المسجد ركع الإمام، فكبَّر عبد الله وركع، وركعتُ معه، ثم مشينا راكعين حتى انتهينا إلى الصف حين رفع القوم رؤوسهم، فلما قضى الإمام الصلاة، قمتُ وأنا أرى أني لم أدرك، فأخذ عبد الله بيدي، وأجلسني ثم قال: إنك قد أدركت" وإسناده صحيح.
وفي الحديث دليل للجمهور القائلين بأن مدرك الركوع مدرك للركعة، لأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يأمر أبا بكرة بالإعادة، ولأنه لولا تُحسب هذه الركعة لما تحمل هذه المشقة.
وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إذا جئتُم إلى الصّلاة ونحن سجود فاسجدوا، ولا تعدّوها شيئًا، ومن أدرك الركعة فقد أدرك الصلاة".
رواه أبو داود (893) عن محمد بن يحيى بن فارس، أن سعيد بن الحكم حدثهم، أخبرنا نافع بن يزيد، حدثني يحيى بن أبي سليمان، عن زيد بن أبي العتَّاب وابن المقبري، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ورواه ابن خزيمة (1622) والحاكم (1/ 273، 274) وعنه البيهقي (2/ 89) من طريق يحيى بن أبي سليمان به مثله قال ابن خزيمة:"في القلب من هذا الإسناد، فإني كنت لا أعرف يحيى بن أبي سليمان بعدالة ولا جرح".
وقال الحاكم: يحيى بن أبي سليمان من ثقات المصريين، وقال في موضع آخر: مدني سكن مصر. انتهى.
والحاكم معروف بالتساهل في الحكم على الرجال. فإن يحيي هذا تكلم فيه كبار النقاد.
قال البخاري في"جزء القراءة":"يحيى هذا منكر الحديث، لم يتبين سماعه من زيد بن أبي العتَّاب، ولا من سعيد بن أبي سعيد المقبري، ولا تقوم به الحجة". وقال أبو حاتم:"مضطرب الحديث".
وقال البيهقي: تفرد به يحيى بن أبي سليمان المديني، وقد روي بإسناد آخر أضعف من ذلك عن أبي هريرة، وهو ما رواه هو، والدارقطني (2/ 346) من طريق ابن وهب، أخبرني يحيى بن حُميد، عن قرة بن عبد الرحمن، عن ابن شهاب قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فمن أدرك ركعة من الصلاة فقد أدركها قبل أن يُقيم الإمام صُلْبَه".
قال أبو أحمد (ابن عدي الحافظ):"هذه الزيادة"قبل أن يُقيم الإمام صلبه" يقولها يحيى بن
حميد، عن قُرة وهو مصري، وقال: سمعتُ ابن حماد يقول: قال البخاري: يحيى بن حميد عن قرة، عن ابن شهاب سمع منه ابن وهب مصري، لا يتابع في حديثه" انتهى بما في السنن الكبرى.
وفي الميزان: ضعَّفه الدارقطني.
وقرة بن عبد الرحمن أخرج له مسلم في الشواهد، وقال الجوزجاني: سمعت أحمد يقول: منكر الحديث جدًّا". وقال يحيي:"ضعيف الحديث". وقال أبو حاتم:"ليس بقوي".
وروى البيهقي من طريق شعبة، عن عبد العزيز بن رفيع، عن رجل، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا جئتم والإمام راكع فاركعوا، وإن كان ساجدًا فاسجدوا ولا تعتدوا بالسجود إذا لم يكن معه الركوع" وفيه رجل لم يُسمّ وقد يكون صحابيا وقد يكون تابعيا. والله أعلم.
আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছালেন যখন তিনি রুকুতে ছিলেন। অতঃপর তিনি কাতারে পৌঁছানোর আগেই রুকু করলেন। তিনি বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমার আগ্রহ বৃদ্ধি করুন, তবে (ভবিষ্যতে) এমন করো না।"
2260 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي من الليل في حجرته وجدار الحجرة قصيرٌ، فرأى الناس شخص النبي صلى الله عليه وسلم، فقام أناسٌ يصلون بصلاته، فأصبحوا فتحدَّثوا بذلك، فقام ليلة الثانية، فقام معه أناسٌ يصلُّون بصلاته، صنعوا ذلك ليلتين أو ثلاثًا، حتَّى إذا كان بعد ذلك جلس رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم يخرج، فلمَّا أصبح ذكر ذلك الناس، فقال:"إنِّي خشيت أن تكتب عليكم صلاة الليلِ".
صحيح: رواه البخاري في الأذان (729) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কামরায় রাতে সালাত আদায় করতেন এবং কামরার দেয়ালটি ছিল খাটো। ফলে লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আকৃতি দেখতে পেত। তাই কিছু লোক তাঁর সালাতের সাথে সালাত আদায় করতে দাঁড়ালো। সকালে তারা এ বিষয়ে আলোচনা করল। এরপর তিনি দ্বিতীয় রাতে দাঁড়ালেন, তখন তাঁর সাথে কিছু লোক তাঁর সালাতের সাথে সালাত আদায় করতে দাঁড়ালো। তারা দুই বা তিন রাত এভাবে করল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে রইলেন এবং বের হলেন না। যখন সকাল হলো, লোকেরা তাঁর কাছে এ বিষয়ে উল্লেখ করল। তিনি বললেন: "আমি আশঙ্কা করলাম যে রাতের সালাত তোমাদের উপর ফরয করে দেওয়া হতে পারে।"
2261 - عن أم ورَقة بنت نوفل أن النبي صلى الله عليه وسلم لما غزا بدرًا، قالت: يا رسول الله! ائذن لي في الغزو معك، أمَرِّضُ مرضاكم، لعل الله أن يرزقني شهادةً، قال:"قرِّي في بيتك، فإن الله تعالى يرزقك الشهادة".
قال: فكانت تسمى الشهيدة. قال: وكانت قد قرأتِ القرآن، فاستأذنت النبي صلى الله عليه وسلم أن تتخذ في دارها مؤذِّنًا. فأذن لها، قال: وكانت قد دبَّرتْ غلامًا لها وجارية، فقاما إليها بالليل فغَمَّاها بقطيفةٍ لها حتى ماتتْ وذهبا. فأصبح عمر فقام في الناس، فقال: من كان عنده من هذين علم، أو من رآهما فليجيء بهما، فأمر بهما فصُلِبا. فكانا أول مصلوب بالمدينة.
وفي رواية: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزورها في بيتها، وجعل لها مؤذِّنًا يؤذِّنُ لها، وأمرها أن تؤم أهلَ دارها. قال عبد الرحمن: فأنا رأيتُ مؤذنها شيخًا كبيرًا.
حسن: رواه أبو داود (591) وأحمد (27283) والدارقطني (1/ 403) كلهم من حديث الوليد بن عبد الله بن جُميع، قال: حدَّثَتْني جدتي وعبد الرحمن بن خلاد الأنصاري، عن أم ورقة بنت نوفل فذكرت الحديث. كذا ذكره أبو داود عبدَ الرحمن بن خلاد مقرونا، والرواية الثانية رواها عن الحسن بن حماد الحضرمي، حدثنا محمد بن فُضيل، عن الوليد بن جميع، عن عبد الرحمن بن خلاد وحده، عنها.
الوليد بن جميع وثَّقه ابن معين والعجلي، وقال أحمد وأبو زرعة: ليس به بأس، وهو من رجال مسلم.
وجدة الوليد اسمها: ليلى بنت مالك لا تُعرف، وعبد الرحمن بن خلاد مجهول، إلا أن أحدهما يُقوِّي الآخر، قال النووي في الخلاصة (2346): رواه أبو داود ولم يضعفه.
ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1676)، والحاكم (1/ 203) كلاهما من طريق الوليد بن جميع به، وسميا جدة الوليد بأنها: ليلى بنت مالك. قال الحاكم: قد احتج مسلم بالوليد بن جُميع وهذه سنة غريبة لا أعرف في الباب حديثًا مسندًا غير هذا، وقد رُوينا عن أم المؤمنين عائشة أنها كانت تؤذِّن، وتُقيم، وتؤم النساءَ" انتهى.
وحديث إمامة عائشة أخرجه عبد الرزاق (3/ 141)، والدارقطني (1/ 404)، والبيهقي (3/ 131) كلهم من طريق سفيان الثوي. قال: حدثني ميسرة بن حبيب، عن رائطة الحنفية قالت: أَمَّتنا عائشةُ، فقامت بينهن في الصلاة المكتوبة، وعن حُجيرة قالت:"أمَّتنا أم سلمةَ في صلاة العصر فقامت بيننا".
قال النووي في"الخلاصة" (2357، 2358): رواهما الدارقطني والبيهقي بإسنادين صحيحين. ورواه الحاكم (1/ 203 - 204) من وجه آخر عن ليث، عن عطاء، عن عائشة.
قلت: فيه ليث وهو: ابن أبي سُليم ضعيف. إلا أنه توبع.
وفي الموضوع آثار أخرى ذكرها الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 31 - 32). انظر للمزيد: المنة الكبرى" (2/ 107 - 110).
وقد استحب الإمام أحمد أن تصلي المرأة بالنساء جماعة، وهو مذهب عائشة وأم سلمة والشافعي وإسحاق وغيرهم. المغني
উম্মে ওয়ারাকাহ বিনতে নাওফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদর যুদ্ধে গমন করলেন, তখন তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে আপনার সাথে যুদ্ধে যাওয়ার অনুমতি দিন। আমি আপনাদের অসুস্থদের সেবা করব, সম্ভবত আল্লাহ আমাকে শাহাদাত নসিব করবেন।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার বাড়িতেই থাকো, কেননা আল্লাহ তাআলা তোমাকে শাহাদাত দান করবেন।"
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর থেকে তাকে 'শাহীদা' (শহীদ) নামে ডাকা হতো। বর্ণনাকারী আরও বলেন: তিনি কুরআন পাঠ করতেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইলেন যে তিনি যেন তার বাড়িতে একজন মুআযযিন নিযুক্ত করেন। অতঃপর তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন: তার একজন পুরুষ ও একজন নারী দাস ছিল যাদেরকে তিনি মুক্তি দেওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছিলেন (মুদাব্বারাহ)। এক রাতে তারা তার কাছে এসে তাকে তার নিজের একটি কম্বল দিয়ে শ্বাসরোধ করে হত্যা করে পালিয়ে যায়।
সকালে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে মানুষের মাঝে দাঁড়ালেন এবং বললেন: এই দুই ব্যক্তি সম্পর্কে যার কাছে কোনো তথ্য আছে, অথবা যে তাদের দেখেছে, সে যেন তাদের ধরে নিয়ে আসে। অতঃপর তিনি তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের শূলে চড়ানো হলো। তারাই ছিল মদীনায় শূলে চড়ানো প্রথম ব্যক্তি।
অন্য বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার বাড়িতে তাকে দেখতে যেতেন এবং তার জন্য একজন মুআযযিন নিযুক্ত করেছিলেন, যে তার জন্য আযান দিতো। তিনি তাকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যেন তিনি তার বাড়ির লোকদের (নামাযে) ইমামতি করেন। আব্দুর রহমান বলেন: আমি তার সেই মুআযযিনকে বৃদ্ধ অবস্থায় দেখেছি।
2262 - عن سهل بن سعد قال: كان رجال يُصلُّون مع النبي صلى الله عليه وسلم عاقِدي أزُرِهم على أعناقهم كهيئة الصبيان، وقال للنساء:"لا ترفعن رؤوسكنَّ حتى يستوي الرجالُ جلوسًا".
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (362) عن مسدد قال: حدثنا يحيي (وهو ابن سعيد) عن سفيان قال: حدثني أبو حازم، عن سهل فذكره.
وفي رواية محمد بن كثير عن سفيان (714): فقيل للنساء"لا تَرفعنَّ رؤوسكُنَّ".
ورواه مسلم في الصلاة (441) من طريق وكيع، عن سفيان: وفيه: فقال قائل:"يا معشر النساء! لا ترفعن رؤوسَكُنَّ. فقيل: القائل هو النبي صلى الله عليه وسلم، وقيل: القائل هو: بلال مبلغ عن النبي صلى الله عليه وسلم.
ورواه ابن خزيمة (1695)، وابن حبان (2216) من طريق بشر بن المفضل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن أبي حازم عنه قال: كن النساء يُؤمرن في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة أن لا يرفعنَّ رؤوسهُنَّ حتى يأخذ الرِّجالُ مقاعدهم من الأرض من ضيق الثياب.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, কিছু পুরুষ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করত এমতাবস্থায় যে, তারা (পোশাকের স্বল্পতার কারণে) শিশুদের মতো নিজেদের তহবন্দগুলো ঘাড়ের উপর বেঁধে রাখত। আর তিনি মহিলাদের বললেন: "তোমরা তোমাদের মাথা তুলবে না যতক্ষণ না পুরুষেরা স্থির হয়ে বসে।"
2263 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من كان منكنَّ يؤمِنَّ بالله واليوم الآخر فلا ترفع رأسَها حتى يرفعَ الرجالُ رؤوسَهم".
صحيح: رواه أبو داود (851) حدثنا محمد بن المتوكل العسقلاني، حدثنا عبد الرزاق، أنبانا معمر، عن عبد الله بن مسلم أخي الزهري، عن مولى لأسماء بنت أبي بكر، عنها فذكرت الحديث.
هكذا قال أبو داود: مولى لأسماء، ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (2/ 241).
ولكن في مصنف عبد الرزاق (5109) ومن طريقه الإمام أحمد في مسنده (26947)"مولاة" لأسماء، ثم روى الإمام أحمد (26949) عن عبد الأعلى، عن معمر به وفيه: مولى لأسماء. وكذلك قال أيضًا في روايته (26950) عن عفان، عن وُهيب، عن النعمان بن راشد، عن أخي الزهري.
وقد عَيَّن الطبرانيُّ أن يكون هذا المولى هو: عبد الله بن كيسان، فأخرج هذه الأحاديث في مسند عبد الله مولى أسماء، عن أسماء.
انظر:"المعجم الكبير" (24/ 97 - 98).
فإن صحَّ أن يكون هذا غير مسمى هو: عبد الله بن كيسان فيكون الإسناد صحيحًا، لأن عبد الله بن كيسان من كبار التابعين، روى عنه الجماعة.
আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের মধ্যে যে কেউ আল্লাহ ও পরকালের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন ততক্ষণ তার মাথা না তোলে, যতক্ষণ না পুরুষেরা তাদের মাথা তুলে ফেলে।"
2264 - عن * *
২২৬৪ - থেকে * *
2265 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الجماعة تفضُل صلاة الفذِّ بسبع وعشرين درجة".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (1) عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله.
ورواه البخاري في الأذان (645) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (650) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به.
ورواه الضحاك، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"بضعًا وعشرين".
قال الترمذي (215) هكذا روي نافع عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تفضلُ صلاة الجماعة على صلاة الرجل وحده بسبع وعشرين درجة" وعامة من روي عن النبي صلى الله عليه وسلم إنما قالوا:"خمس وعشرين" إلا ابن عمر فإنه قال:"بسبع وعشرين". وقال أيضًا:"حديث ابن عمر حسن صحيح".
قلت: رواه الضحاك عن نافع، عن ابن عمر عند مسلم فقال:"بضْعًا وعشرين" وهي تشمل الرواتين: سبعًا وعشرين"، و"خمسًا وعشرين"، فتكون رواية"بضعا وعشرين" هي الأصل و"سبعًا وعشرين" و"خمسا وعشرين" تفصيل الإجمال، فمرة قال بهذا، ومرة بهذا وإن كانت رواية"خمسًا وعشرين" تترجح على رواية"سبعًا وعشرين" لكثرتها.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জামাআতের সালাত একাকী সালাতের চেয়ে সাতাশ ডিগ্রি (স্তর) বেশি মর্যাদা লাভ করে।"
2266 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الجماعة أفضلُ من صلاة أحدكم وحده بخمس وعشرين جزءًا".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (2) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره. ورواه مسلم في المساجد (649/ 275) عن يحيى بن يحيى، عن مالك به مثله.
ورواه البخاري في الأذان (648)، ومسلم من طريق الزهري قال: أخبرني سعيد بن المسيب، وقرنه البخاري لأبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تفضل صلاةُ الجميع صلاةَ أحدكم وحده بخمس وعشرين جزءًا، وتجتمع ملائكةُ الليل، وملائكةُ النهار في صلاة الفجر" ثم يقول أبو هريرة: فاقرأوا إن شتم: {إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا} [الإسراء: 78].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "জামাতে সালাত আদায় করা তোমাদের একাকী সালাত আদায়ের চেয়ে পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদাপূর্ণ।"
তিনি (আবূ হুরায়রা) আরো বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "সকলের সালাত তোমাদের একাকী সালাতের চেয়ে পঁচিশ ভাগ বেশি মর্যাদাপূর্ণ। আর রাতের ফিরিশতা ও দিনের ফিরিশতারা ফযরের সালাতে একত্রিত হন।" এরপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তোমরা চাইলে (এর প্রমাণে) এ আয়াতটি পাঠ করতে পারো: "নিশ্চয়ই ফযরের কুরআন (সালাত) প্রত্যক্ষ করা হয়।" (সূরা ইসরা: ৭৮)।
2267 - عن أبي هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الرجل في الجماعة تُضَعَّف على صلاته في بيته، وفي سوقه خمسًا وعشرين ضعفًا، وذلك أنه إذا توضأ فأحسنَ
الوضوء، ثم خرج إلى المسجد، لا يُخرجه إلا الصلاةُ، لم يخطُ خُطوةّ إلا رُفِعتْ له بها درجةٌ، وحُطَّ عنه بها خطيئةٌ، فإذا صلَّى لم تزلِ الملائكهُ تُصَلِّي عليه ما دام في مُصلَّاه. اللَّهم صَلِّ عليه، اللَّهم ارحمه، ولا يزال أحدكم في صلاةٍ ما انتظر الصَّلاة".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (647) واللفظ له، ومسلم في المساجد (149) كلاهما عن الأعمش، قال: سمعتُ أبا صالح يقول: سمعتُ أبا هريرة فذكر الحديث، وزاد مسلم:"ما لم يؤذِ فيه. ما لم يُحدثْ فيه".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো ব্যক্তির জামায়াতে সালাত আদায় করা তার ঘরে বা বাজারে আদায় করা সালাতের তুলনায় পঁচিশ গুণ বৃদ্ধি করা হয়। আর তা এই কারণে যে, যখন সে সুন্দরভাবে ওযু করে, এরপর মসজিদের উদ্দেশ্যে বের হয়, সালাত ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্যে সে বের হয় না, তখন প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে তার জন্য একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করা হয় এবং একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর যখন সে সালাত আদায় করে, তখন যতক্ষণ সে তার সালাতের স্থানে থাকে, ফেরেশতারা তার জন্য দু‘আ করতে থাকেন— ‘হে আল্লাহ! আপনি তার প্রতি রহমত বর্ষণ করুন। হে আল্লাহ! আপনি তাকে ক্ষমা করুন।’ আর তোমাদের কেউ ততক্ষণ সালাতের মধ্যেই থাকে, যতক্ষণ সে সালাতের অপেক্ষায় থাকে— যতক্ষণ না সে তাতে (কাউকে) কষ্ট দেয় অথবা অপবিত্র হয়।
