হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2268)


2268 - عن أبي سعيد الخدري أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة الجماعة تفضلُ صلاةَ الفَذِّ بخمس وعشرين درجة".

صحيح: رواه البخاري في الأذان (646) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا الليث، حدثني ابن الهاد، عن عبد الله بن خَبَّاب، عن أبي سعيد فذكره.

وزاد أبو داود (560)، في روايته فقال فيه:"فإن صلَّاها في فَلاةٍ، فأتم ركوعها وسجودَها بلغت خمسين صلاة" رواه من حديث هلال بن ميمون الجُهني، عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدري فذكره. وهلال بن ميمون مختلف فيه غير أنه"صدوق" كما قال الحافظ في التقريب إلا أنه أتى بزيادة منكرة وهي قوله:"خمسين صلاة" فإنه لم يوافقه عليه أحد.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "জামাআতের সালাত (নামায) একাকী সালাত অপেক্ষা পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদা রাখে।"

হাদীসটি সহীহ। এটি বুখারী (৬৪৬) আব্দুল্লাহ ইবনু ইউসুফ, লায়স, ইবনু আল-হাদ, আব্দুল্লাহ ইবনু খাব্বাব এর মাধ্যমে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আবূ দাউদ (৫৬০) তার বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করেছেন: "আর যদি কেউ কোনো উন্মুক্ত প্রান্তরে তা (সালাত) আদায় করে এবং এর রুকু ও সিজদা পুরোপুরি আদায় করে, তবে তা পঞ্চাশ সালাতের সমান মর্যাদা লাভ করে।" তিনি এই বর্ণনাটি হিলাল ইবনু মাইমুন আল-জুহানী, আতা ইবনু ইয়াযীদ, আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। হিলাল ইবনু মাইমুন সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে, তবে আল-হাফিয (ইবনু হাজার) তাকে 'সাদুক' (সত্যবাদী) বলেছেন। কিন্তু তিনি একটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য) অতিরিক্ত অংশ বর্ণনা করেছেন, যা হলো— "পঞ্চাশ সালাতের সমান।" কারণ এই বিষয়ে তার সাথে অন্য কেউ একমত হননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2269)


2269 - عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تفضل صلاة الجماعة على صلاة الفذِّ، أو صلاة الرجل وحده خمسًا وعشرين صلاة".

حسن: رواه البزار - الكشف (459) عن عبد الملك بن محمد الرقاشي، ثنا حجاج بن المنهال، ثنا حماد بن سلمة، عن عاصم، عن أنس فذكره.

قال البزار: لا نعلم رواه عن عاصم عن أنس إلا حماد بن سلمة وقال: وحدثنا عبد السلام بن شُعيب بن الحبحاب، عن أبيه، عن أنس فذكر نحوه.

قلت: ورواه أيضًا الطبراني في الأوسط (2199) عن أحمد، قال: حدثنا وهب بن يحيى بن زِمام العلَّاف، قال: حدثنا عبد السلام بن شعيب بن الحَبْحاب به مثله.

قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعيب إلا ابنه عبد السلام.

قلت: ليس كما قال، فللحديث إسناد آخر كما رأيت.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 38):"رجال البزار رجال ثقات".

قلت: وهو كما قال، إلا عبد السلام بن شُعيب فإنه"صدوق" كما في التقريب.

وأحمد شيخ الطبراني هو: ابن يحيى بن زهير التستري ثقة زاهد، له ترجمة في تذكرة الحفاظ، توفي سنة (310 هـ).
قلت: وأما ما جاء في فضل الجماعة على الفذ بخمس وعشرين، وفي حديث آخر بسبع وعشرين فلا تضاد فيهما لاحتمال أن يكون الله جعل أولًا خمسًا وعشرين درجة، ثم زاد جزءين آخرين فجعل سبعًا وعشرين، والله ذو الفضل العظيم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জামা'আতের সালাত একাকী ব্যক্তির সালাতের চেয়ে—অথবা কোনো ব্যক্তির একা সালাতের চেয়ে—পঁচিশ সালাতের সমান শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2270)


2270 - عن أبيّ بن كعب قال: صلى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومًا الصبح فقال:"أشاهد فلان"؟ قالوا: لا، قال:"أشاهد فلان؟" قالوا: لا، قال:"إن هاتين الصلاتين أثقلُ الصلوات على المنافقين، ولو تعلمون ما فيهما لأتيتموها ولو حبوًا على الركب، وإن الصف الأول على مثل صف الملائكة، ولو علمتُم ما فضيلته لابتدرتموه، وإن صلاة الرجل مع الرجل أزكى من صلاته وحده، وصلاته مع الرجلين أزكى من صلاته مع الرجل، وما كثُر فهو أحبُّ إلى الله تعالى".

حسن: رواه أبو داود (554) عن حفص بن عمر، والنسائي (844) عن خالد بن الحارث، كلاهما عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبي بن كعب، هكذا في سند أبي داود، وفي سند النسائي: عن شعبة، عن أبي إسحاق أنه أخبرهم عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيه - قال شعبة: وقال أبو إسحاق: وقد سمعته منه، ومن أبيه - قال: سمعت أبي بن كعب فذكره.

وعبد الله بن أبي بصير العبدي وثَّقه العجلي وابن حبان.

وأما أبوه، وهو أبو بصير فلم يُوثقه غير ابن حبان، ولذا جعله الحافظ في درجة"مقبول" أي: إذا توبع، على أن الإسناد ثابت بدون واسطته، فقد رواه أيضًا أحمد (21265) وابن حبان (2056) والحاكم في المستدرك (1/ 247) كلهم من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيّ بن كعب به مثله.

قال الحاكم:"وقد حكم أئمة الحديث: يحيى بن معين وعلي بن المديني ومحمد بن يحيى الذهلي وغيرهم لهذا الحديث بالصحة".

وأبو إسحاق مدلس، ولكنَّه صرح بالتحديث كما أن شعبة روى عنه وهو القائل: كفيتكم تدليس ثلاثة، منهم أبو إسحاق، كما أنَّه صرح بالسماع عند أحمد وابن خزيمة (1476 - 1477).

ورواه ابن ماجة (790) مختصرًا عن محمد بن معمر، قال: حدثنا أبو بكر الحنفي، قال: حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيه، عن أبيّ بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الرجل في جماعة تزيد على صلاة الرّجل وحده أربعًا وعشرين، أو خمسًا وعشرين درجة".

وفي الباب حديث قُباث بن أَشْيم الليثي: رواه إسحاق بن راهويه، ثنا عيسى بن يونس، عن ثور بن يزيد، عن يونس بن سيف، عن عبد الرحمن بن زياد، عن قباث بن أَشْيم الليثي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: الصلاة الرجلين يؤمُّ أحدُهما صاحبَه أزكى عند الله من صلاة أربعة تترى، وصلاة أربعة
يؤمُّهم أحدُهم أزكى عند الله من صلاة ثمانية تترى، وصلاة ثمانية يؤمُّ أحدُهم أزكى عند الله من صلاة مائة تترى".

رواه الطبراني في الكبير (19/ 36) عن موسى بن هارون، عن إسحاق بن راهويه به.

ورواه أيضًا البخاري في"التاريخ الكبير" (4/ 192 - 193) والبزار"كشف الأستار" (461)، والحاكم (3/ 625)، والبيهقي (3/ 61) كلهم من طرق عن يونس بن سيف به مثله.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2142): رواه البزار والطبراني في الكبير، ورجال الطبراني موثقون.

قلت: فيه عبد الرحمن بن زياد"مقبول" وحيث لم أجد من تابعه فهو"ليَّن الحديث" ولكن اصطلح الهيثمي أن يقول في مثله: رجاله موثقون، اعتمادا على توثيق ابن حبان.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। এরপর জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কি উপস্থিত আছে?" তারা বলল: "না।" তিনি বললেন: "অমুক কি উপস্থিত আছে?" তারা বলল: "না।" তিনি বললেন: "নিশ্চয় এই দুটি সালাত (ফজর ও ইশা) মুনাফিকদের জন্য সবচেয়ে কঠিন সালাত। যদি তোমরা জানতে যে এই দুটিতে কী (ফজিলত) রয়েছে, তবে তোমরা হাঁটুতে ভর দিয়ে হামাগুড়ি দিয়ে হলেও এতে উপস্থিত হতে। আর নিশ্চয় প্রথম কাতার ফেরেশতাদের কাতারের মতো। যদি তোমরা জানতে যে এর কী মর্যাদা, তবে তোমরা এর জন্য প্রতিযোগিতা করতে। আর একাকী সালাত আদায়ের চেয়ে আরেকজনের সাথে কোনো ব্যক্তির সালাত অধিক পবিত্র (বা উত্তম)। আর একাকী একজনের সাথে সালাত আদায়ের চেয়ে দু'জনের সাথে সালাত আদায় করা অধিক পবিত্র। আর যেখানে (জমায়েত) বা জামাআত যত বেশি হয়, তা আল্লাহর কাছে তত বেশি প্রিয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2271)


2271 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فضلُ صلاة الرجل في الجمع على صلاته - يعني وحده - خمسًا وعشرين صلاة".

صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (455) حدثنا محمد بن المثنى وعمرو بن علي قالا: ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن قتادة، عن عُقبة بن وسَّاج، عن أبي الأحوص، عن عبد الله فذكره.

ورواه الطبراني في الكبير (10100) من طريق الإمام أحمد، عن محمد بن جعفر به مثله. وهو في المسند (4158) ولكن سقط في الإسناد"قتادة" بين شعبة وعقبة بن وسَّاج، فصار شعبة يروي عن عقبة بن وساج، وهو شيء مستبعد فإن شعبة وُلد في السنة التي مات فيها عقبة بن وسَّاج، وهي سنة اثنتين وثمانين، قال الحافظ في التقريب:"عقبة بن وسَّاج قتل بعد الثمانين".

وصحّحه ابن خزيمة (1470) فرواه من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، عن قتادة، عن عقبة بن وسَّاج به مثله.

وتابع شعبةَ همامُ، قال: أخبرنا قتادة، عن مُوَرِّق، عن أبي الأحوص الجُشمي، عن ابن مسعود:"أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُفَضِّل صلاةَ الجميع على صلاةِ الرجل وحده بخمس وعشرين صلاةً، كلها مثل صلاته".

رواه الإمام أحمد (4159) عن بهز (هو ابن أسد العمي) عن همام (وهو ابن يحيى العوذي) به مثله. ورواه الطبراني في الكبير (10099)، والأوسط (2618) من طريق همام به مثله.

قال ابن أبي حاتم في العلل (1/ 122): سألت أبي عن حديث رواه شعبة، عن قتادة، عن عُقبة بن وسَّاج، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تفضلُ صلاةُ الجميع على صلاة الرجل وحده" ورواه همام وسعيد بن بشير، عن قتادة، عن مورِّق العجلي، عن أبي الأحوص، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه أبان، عن قتادة، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

قلت لأبي: أيهما الأصح؟ قال: حديث شعبة لأنه أحفظ". انتهى.
وفي الباب عن عبد الله بن زيد وصُهيب وزيد بن ثابت ومعاذ بن جبل وابن عباس وابن عمر وأبي هريرة وأبي الدرداء وجابر وأبي سعيد الخدري. وغيرهم، وفي جميعها مقال.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: একাকী ব্যক্তির সালাতের চেয়ে জামাআতে (সকলের সাথে) সালাত আদায়ের ফযীলত পঁচিশ সালাতের সমান।









আল-জামি` আল-কামিল (2272)


2272 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده! لقد هممتُ أن آمر بحطَبٍ فيُحطَبَ، ثم آمر بالصلاة فيؤذَّن لها، ثم آمرَ رجلًا فيؤُمَّ الناس، ثم أخالفَ إلى رجال، فأحرِّق عليهم بيوتهم، والذي نفسي بيده! لو يعلم أحدكم أنه يجد عظْمًا سَمِينًا، أو مِرماتين حسنتين لشهد العشاء".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (3) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الأذان (644) عن عبد الله بن يوسف قال: أخبرنا مالك به.

ورواه مسلم في المساجد (651) عن عمرو الناقد، حدثنا سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد به وزاد في أول الحديث:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقد ناسًا في بعض الصلوات"، فقال: فذكر الحديث.
ولم يذكر: المرماتين.

والمرماة: ما بين ظِلْفَي الشاة. قال أبو عبيد: لا أدري ما وجهُه، إِلَّا أنه هكذا يُفسر. وقال ابن الأعرابي: المِرماة: السهم الذي يُرمي به"شرح السنة" (3/ 345).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "শপথ তাঁর, যাঁর হাতে আমার জীবন! আমি সংকল্প করেছিলাম যে আমি জ্বালানি কাঠ প্রস্তুত করার নির্দেশ দেব, ফলে তা প্রস্তুত করা হবে, এরপর আমি সালাতের জন্য নির্দেশ দেব, ফলে তার জন্য আযান দেওয়া হবে, তারপর আমি এক ব্যক্তিকে নির্দেশ দেব, সে যেন লোকদের ইমামতি করে, এরপর আমি সেই সব লোকদের কাছে যাব এবং তাদের উপর তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দেব। শপথ তাঁর, যাঁর হাতে আমার জীবন! তোমাদের কেউ যদি জানত যে সে মোটা (মাংসযুক্ত) একটি হাড় পাবে, অথবা ভালো দু'টি মাংসল অংশ পাবে, তবে অবশ্যই সে এশার সালাতে উপস্থিত হত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2273)


2273 - عن أم الدّرداء تقول: دخل عليّ أبو الدّرداء وهو مُغَضَبٌ، فقلتُ: ما أغضبَك؟ فقال: والله! ما أعرف من أمة محمد صلى الله عليه وسلم شيئًا إِلَّا أنهم يُصَلُّون جميعًا.

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (650) عن عمر بن حفص، قال: حَدَّثَنَا أبيّ، قال: حَدَّثَنَا الأعمش، قال: سمعتُ سالمًا قال: سمعتُ أم الدّرداء، فذكرت مثله.

وسالم هو: ابن أبي الجعد. وأم الدّرداء: هي الصغرى التابعية، لا الكبرى الصّحابية، لأن الكبرى ماتت في حياة أبي الدّرداء، وعاشت الصغرى بعده زمانًا طويلًا.

وقد جزم أبو حاتم بأن سالم بن أبي الجعد لم يدرك أبا الدّرداء، فعلى هذا لم يدرك أمّ الدّرداء الكبرى. واسم الصغرى: هُجيمة، واسم الكبرى: خيرة.




উম্মু দারদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত অবস্থায় আমার নিকট প্রবেশ করলেন। আমি বললাম: আপনাকে কিসে রাগান্বিত করেছে? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের মধ্যে কোনো কিছুকেই চিনতে পারছি না, কেবল এই জিনিসটি ছাড়া যে তারা একসাথে (জামায়াতে) সালাত আদায় করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2274)


2274 - عن عبد الله بن مسعود أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لقوم يتخلفون عن الجمعة:"لقد هممتُ أن آمر رجلًا يُصلي بالناس، ثمّ أحرِّق على رجال يتخلَّفُون عن الجمعة بيوتهم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (652) من طريق أبي إسحاق، عن أبي الأحوض، سمعه منه، عن عبد الله بن مسعود فذكر مثله.

قال البيهقيّ (3/ 56):"والذي يدل عليه سائر الروايات أنه عبَّر بالجمعة عن الجماعة".




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেই লোকদের সম্পর্কে বললেন যারা জুমু‘আর সালাত থেকে পিছনে থাকত: "আমি সংকল্প করেছি যে, আমি একজনকে নির্দেশ দেব মানুষের সাথে সালাত আদায় করাতে, অতঃপর আমি সেই লোকদের বাড়িঘর জ্বালিয়ে দেব যারা জুমু‘আর সালাত থেকে পিছনে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2275)


2275 - عن عبد الله بن مسعود أنه قال: من سَرَّه أن يلقى الله غدًا مسلمًا فليحافظ على هؤلاء الصلوات حيث يُنَادَي بهن، فإن الله شرع لنبيكم سُنن الهُدى، وإنَّهن من سُنن الهُدى، ولو أنكم صلَّيتُم في بيوتكم كما يُصلِّي هذا المتخلف في بيته لتركتُم سنة نبيكم. ولو تركتُم سنة نبيكم لضللتُم. وما من رجل يتطهر فيُحسن الطُّهور، ثمّ يعمدُ إلى مسجد من هذه المساجد إِلَّا كتب الله له بكل خطوةً يخطوها حسنةً، ويرفعه بها درجةً، ويحطُّ عنه بها سيئةً. ولقد رأيتُنا وما يتخلف عنها إِلَّا منافق معلومُ النفاق، ولقد كان الرّجل يُؤتى به يهادى بين الرجلين حتَّى يُقامَ في الصفِّ.

صحيح: أخرجه مسلم في المساجد (654) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا الفضل بن دُكين، عن أبي العُميس، عن عليّ بن الأقمر، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن عبد الملك بن عمير، عن أبي الأحوص عنه قال:"لقد رأيتُنا وما يتخلف عن الصّلاة إِلَّا منافق، قد علم نفاقه. أو مريض. إن كان المريض ليمشي بين رجلين حتى يأتي الصّلاة، وقال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم علَّمَنا سننَ الهدى. وإن من سنن الهديّ، الصّلاةُ
المسجد الذي يؤذَّنُ فيه". انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি আগামীকাল (কিয়ামতের দিন) আল্লাহর সাথে মুসলিম হিসেবে সাক্ষাৎ করতে পছন্দ করে, সে যেন অবশ্যই এই সালাতগুলো যেখানে সেগুলোর জন্য ডাকা হয় (অর্থাৎ মসজিদে), সেখানে তা নিয়মিত আদায় করে। কারণ আল্লাহ তোমাদের নবীর জন্য হিদায়াতের পথ (সুনানুল হুদা) প্রণয়ন করেছেন, আর এ সালাতগুলো সেই হিদায়াতের পথসমূহের অন্তর্ভুক্ত। তোমরা যদি তোমাদের ঘরে এমনভাবে সালাত আদায় করো, যেভাবে এই অনুপস্থিত ব্যক্তিটি তার ঘরে সালাত আদায় করে, তাহলে তোমরা তোমাদের নবীর সুন্নাত পরিত্যাগ করলে। আর যদি তোমরা তোমাদের নবীর সুন্নাত পরিত্যাগ করো, তবে তোমরা পথভ্রষ্ট হয়ে যাবে। কোনো ব্যক্তি যখন ভালোভাবে পবিত্রতা অর্জন করে, অতঃপর এই মসজিদগুলোর মধ্যে কোনো একটি মসজিদের দিকে অগ্রসর হয়, তখন তার প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে আল্লাহ তার জন্য একটি নেকি লিপিবদ্ধ করেন, এর দ্বারা তার একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করেন এবং এর দ্বারা তার একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেন। আমি দেখেছি, সুস্পষ্ট মুনাফিক ছাড়া আর কেউ (জামাত থেকে) অনুপস্থিত থাকত না। এমনও দেখা যেত যে, অসুস্থ একজন লোককে দুইজন লোকের কাঁধের উপর ভর দিয়ে নিয়ে আসা হতো, যতক্ষণ না তাকে কাতারে দাঁড় করানো হতো।

(অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে হিদায়াতের পথসমূহ শিক্ষা দিয়েছেন। আর সেই হিদায়াতের পথসমূহের মধ্যে অন্যতম হলো— যে মসজিদে আযান দেওয়া হয়, সেখানে সালাত আদায় করা।)









আল-জামি` আল-কামিল (2276)


2276 - عن أبي الدّرداء قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من ثلاثة في قرية ولا بدو لا تقامُ فيهم الصّلاةُ إِلَّا قد استحوذ عليهم الشّيطان، فعليك بالجماعة، فإنما يأكل الذئبُ القاصيةَ".

حسن: رواه أبو داود (547)، والنسائي (848) كلاهما من طريق زائدة بن قدامة قال: حَدَّثَنَا السائب بن حبيش الكلاعيّ، عن معدان بن أبي طلحة اليعمري قال: قال لي أبو الدّرداء: أين مسكنك؟ قلت: في قرية دُوين حمص، فقال أبو الدّرداء: فذكر الحديث.

قال زائدة: قال السائب: يعني بالجماعة، الصّلاة في الجماعة، وأخرجه ابن خزيمة (1486)، والحاكم (1/ 246) كلاهما من طريق زائدة.

قال الحاكم: صحيح الإسناد. وقال النوويّ في"الخلاصة" (2261): رواه أبو داود والنسائي بإسناد صحيح.

قلت: رجاله ثقات غير السائب بن حبيش الكلاعي الحمصي فهو"حسن الحديث"، وثَّقه العجلي وابن حبان، وقال الدَّارقطنيّ: صالح الحديث.

وقد سبق التخريج بالتفصيل في باب تأكيد الأذان.

أخذ الإمام أحمد بهذه الأحاديث فقال بوجوب صلاة الجماعة إِلَّا أنه نص على أن الجماعة ليست شرطا لصحة الصّلاة، وذهب أبو حنيفة ومالك والشافعي إلى فضيلة صلاة الجماعة على صلاة الفذ.




আবুদ্দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “কোন গ্রাম বা মরুভূমিতে যদি তিনজন লোক থাকে এবং সেখানে সালাত প্রতিষ্ঠা না করা হয়, তবে শয়তান তাদের উপর প্রভাব বিস্তার করে নেয়। সুতরাং তোমরা জামাআতকে আঁকড়ে ধরো, কারণ, নেকড়ে কেবল দলছুট বা একা ছাগলকেই খায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (2277)


2277 - عن أبي هريرة قال: أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رجل أعمى فقال: يا رسول الله! إنه ليس لي قائد يقودُني إلى المسجد. فسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يرخص له فيُصلِّي في بيته. فرخَّص له. فلمّا ولَّى دعاه فقال:"هل تسمع النداء بالصلاة؟" فقال: نعم. قال:"فَأَجِبْ".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (653) من طريق مروان القراريّ، عن عبيد الله بن الأصمِّ، قال: حَدَّثَنَا يزيد بن الأصَمِّ، عن أبي هريرة فذكره.

وهذا الأعمى هو: ابن أم مكتوم كما جاء في الرواية الآتية.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক অন্ধ ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার এমন কোনো পথপ্রদর্শক (বা সাহায্যকারী) নেই, যে আমাকে মসজিদে নিয়ে যেতে পারে। সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আবেদন করল যে তিনি যেন তাকে বাড়িতে সালাত আদায় করার অনুমতি দেন। অতঃপর তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। যখন সে পিছু ফিরে চলে যাচ্ছিল, তখন তিনি তাকে ডেকে বললেন: "তুমি কি সালাতের জন্য আযান শুনতে পাও?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি তাতে সাড়া দাও (অর্থাৎ জামাতে উপস্থিত হও)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2278)


2278 - عن ابن أم مكتوم أنه سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني رجل ضرير البصر، شاسع الدار، ولي قائد لا يلائمني. فهل لي رخصةٌ أن أصلِّيَ في بيتي؟ . قال:"هل تسمع النداء؟" قال: نعم، قال:"لا أجد لك رخصة".

حسن: رواه أبو داود (552)، وابن ماجة (792) كلاهما من طريق عاصم بن بهدلة، عن أبي
رَزين، عن ابن أم مكتوم فذكره.

وإسناده حسن، وأبو رَزين هو: مسعود بن مالك الأسدي ثقة فاضل من رجال مسلم.

وعاصم بن بهدلة"صدوق له أوهام حجة في القراءة"، وحديثه في الصحيحين مقرون.

وهذا الحديث أخرجه أيضًا ابن خزيمة (1480)، والحاكم (1/ 247) من طريق عاصم به.

ورواه أيضًا أبو داود (553)، والنسائي (852) من طريق سفيان، عن عبد الرحمن بن عابس، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن ابن أم مكتوم قال: يا رسول الله! إن المدينة كثيرةُ الهوام والسِّباع، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أتسمع حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح؟ قال: نعم، قال:"فحيَّ هلا" ولم يرخص له.

قال أبو داود: وكذا رواه القاسم الجرميّ، عن سفيان. وليس في حديثه"حيَّ هلا". وإسناده صحيح.

وصحَّحه ابن خزيمة (1478) بعد أن رواه من طريق سفيان به مثله. ورواه أيضًا الحاكم (1/ 246 - 247) من طريق سفيان إِلَّا أنه أسقط"عبد الرحمن بن أبي ليلى" وقال: صحيح الإسناد إن كان ابن عابس سمع من ابن أم مكتوم.

قلت: لم أجد من نص على أن عبد الرحمن بن عابس سمع من ابن أم مكتوم.

ورواه أيضًا هو واللّفظ له، والإمام أحمد (15491) وابن خزيمة (1479) من طرق عن حصين بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن شداد، عن ابن أم مكتوم قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم استقل الناس في صلاة العشاء فقال:"لقد هممتُ أن آتي هؤلاء الذين يتخلفون عن هذه الصّلاة، فأحرق عليهم بيوتهم" فقام ابن أم مكتوم فقال: يا رسول الله! لقد علمت ما بي، وليس لي قائد، قال:"أتسمع الإقامة؟" قال: نعم، قال:"فاحضرها"، قال: يا رسول الله! إن بيني وبينها نخلًا وشجرًا. وليس لي قائد. قال:"أتسمع الإقامة؟ قال: نعم، قال:"فاحضرها" ولم يرخص له.

قال الحاكم: إسناده صحيح.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"من سمع النداء فلم يأته، فلا صلاة له إِلَّا من عذر".

فالصحيح أنه ضعيف أو موقوف.

رواه أبو داود (551)، وابن ماجة (793)، وابن حبان (2064)، والحاكم (1/ 245)، والبيهقي (3/ 57) كلّهم من طريق عدي بن ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وعن عدي بن ثابت طريقان:

الأوّلى: ما رواه أبو جناب، عن مغراء العبدي عنه. وأبو جناب هو يحيى بن أبي حية الكلبي ضعيف.

ومغراء العبدي تكلّم فيه الذّهبيّ وغيره.

والرّواية الثانية: ما رواه هشيم بن بشر، عن شعبة، عن عدي بن ثابت بإسناده.

وأكثر أصحاب شعبة أوقفوه على ابن عباس.
قال البخاريّ في"التاريخ الكبير" (1/ 233):"رفع بعضهم لا يصح".

وقد صحَّح وقفه الإمام أحمد والبيهقي وغيرهما.

انظر للمزيد:"المنة الكبري" (2/ 20 - 21) وذكرت فيه أيضًا حديث جابر بن عبد الله:"لا صلاة لجار المسجد إِلَّا في المسجد" وهو ضعيف أيضًا.

وفي الباب عن أبي موسى، وعلي بن أبي طالب وغيرهما، وكلها ضعيفة.

انظر: السنن الكبرى للبيهقي (3/




ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন অন্ধ ব্যক্তি, আমার ঘর অনেক দূরে, আর আমার একজন পথপ্রদর্শক আছে যে আমার জন্য উপযুক্ত নয় (বা আমাকে মানিয়ে নিতে পারে না)। এমতাবস্থায় আমার কি ঘরে সালাত আদায় করার অনুমতি আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি আযান শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি তোমার জন্য কোনো সুযোগ (রুখসাত) দেখছি না।

ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে যে, তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! মদীনা পোকামাকড় ও হিংস্র প্রাণীতে পরিপূর্ণ। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ, হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে দ্রুত আসো (সালাতে)। তিনি তাকে অনুমতি দেননি।

ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অপর একটি বর্ণনায় আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাতে (উপস্থিত) মানুষের সংখ্যা কম দেখে বললেন: আমার মন চাচ্ছে যে যারা এই সালাত থেকে পিছিয়ে থাকে, তাদের কাছে গিয়ে তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দিই। তখন ইবনে উম্মে মাকতুম দাঁড়িয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো আমার অবস্থা জানেন, আমার কোনো পথপ্রদর্শকও নেই। তিনি বললেন: তুমি কি ইকামাত (তাকবীর) শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে সালাতে উপস্থিত হও। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ও মসজিদের মাঝে খেজুর গাছ ও অন্যান্য গাছপালা আছে, আর আমার কোনো পথপ্রদর্শকও নেই। তিনি বললেন: তুমি কি ইকামাত শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে সালাতে উপস্থিত হও। তিনি তাকে অনুমতি দেননি।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে বর্ণিত হয়েছে যে, “যে ব্যক্তি আযান শুনল, অতঃপর কোনো ওজর ছাড়া তাতে (জামাতে) উপস্থিত হলো না, তার সালাত হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (2279)


2279 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مروا أولادكم بالصلاة وهم أبناء سبع سنين، واضربوا عليها وهم أبناء عشر سنين، وفرقوا بينهم في المضاجع".

حسن: رواه أبو داود (495) عن مؤمل بن هشام - يعني اليشكري - حَدَّثَنَا إسماعيل، عن سوار أبي حمزة، قال أبو داود: وهو سوار بن داود أبو حمزة المزني الصيرفيّ، عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

قال أبو داود: وحدثنا زهير بن حرب، حَدَّثَنَا وكيع، حَدَّثَنِي داود بن سوَّار المزنيّ، بإسناده ومعناه، وزاد:"وإذا زوَّج أحدكم خادمَه عبده، أو أجيره فلا ينظر إلى ما دون السرة وفوق الركبة".

قال أبو داود:"وهم وكيع في اسمه، وروى عنه أبو داود الطيالسي هذا الحديث فقال: حَدَّثَنَا أبو حمزة سوار الصيرفي" انتهى.

قلت: وكذا نص على ذلك الإمام أحمد في مسنده (6689) بعد أن روى الحديث عن وكيع قال: حَدَّثَنَا داود بن سوَّار، قال عبد الله بن أحمد: قال أبي: وقال الطُفاوي محمد بن عبد الرحمن في هذا الحديث: سوَّار أبو حمزة، وأخطأ فيه. انتهى.

قلت: قوله: أخطأ فيه أي وكيع، لأن الإمام أحمد قال:"سوَّار أبو حمزة لا بأس به، روى عنه وكيع فقلَّب اسمه". انتهى.

وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 197) من طريق سَوَّار به مثله.

ونقل عن إسحاق بن راهويه قال:"إذا كان الراوي عن عمرو بن شعيب ثقة فهو كأيوب عن نافع، عن ابن عمر".

قلت: وهو كما قال فقد احتج الأَئمة بحديث عمرو بن شعيب عن أبيه جده كالبخاريّ وأحمد وابن المديني وغيرهم، وقال ابن معين: عمرو بن شعيب ثقة.

ولكن خلاصة القول فيه أنه حسن الحديث. وهو رأي النوويّ وغيره من الأئمة.

وأمّا سوَّار بتشديد الواو، وآخره راء وهو ابن داود المزني أبو حمزة الصيرفي البصري هو أيضًا
حسن الحديث، وقد حسَّن النوويّ إسناده في"المجموع" (3/ 10).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের সন্তানদেরকে সালাতের আদেশ দাও যখন তাদের বয়স সাত বছর হবে, এবং তার জন্য (সালাত আদায় না করলে) তাদেরকে প্রহার করো যখন তাদের বয়স দশ বছর হবে, আর তাদেরকে তাদের বিছানায় পৃথক করে দাও।"

[অতিরিক্ত অংশ:] যখন তোমাদের কেউ তার খাদেমকে তার দাস অথবা তার মজুরের সাথে বিবাহ দেয়, তখন সে যেন নাভির নিচের এবং হাঁটুর উপরের অংশের দিকে দৃষ্টি না দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2280)


2280 - عن سبرة الجهني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مروا الصبيَّ بالصلاة إذا بلغ سبع سنين، وإذا بلغ عشر سنين فاضربوه عليها".

حسن: رواه أبو داود (494)، والتِّرمذيّ (407) كلاهما من طريق عبد الملك بن الربيع بن سَبْرَةَ، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح، وَسَبْرَةُ هو: أبن معبد الجهنيّ، ويقال: هو ابن عوسجة".

وقال النوويّ في"المجموع" (3/ 10): حديث سبرة صحيح، رواه أبو داود والتِّرمذيّ وغيرهما بأسانيد صحيحة. قال الترمذيّ:"حسن". انتهى. كذا نقل عن الترمذيّ قوله:"حسن" والنسخة التي لدينا:"حسن صحيح".

قلت: الصَّواب أن الحديث حسن، لأجل عبد الملك بن الربيع بن سَبْرَة فقد وثَّقه العجليّ، وضَعَّفه ابن معين، وقال الذّهبيّ: صدوق إن شاء الله تعالى. ومن طريقه رواه ابن خزيمة في صحيحه (1002)، والحاكم (1/ 258) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

إِلَّا أن مسلمًا لم يحتج به وإنما أخرج له حديثًا واحدًا في المتعة متابعة. والحاكم لا يُفرّق بين الأصول والمتابعة.




সাবরা আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের সন্তানদের সালাতের নির্দেশ দাও যখন তারা সাত বছর বয়সে পৌঁছবে। আর যখন তারা দশ বছর বয়সে পৌঁছবে, তখন সালাতের (জন্য) তাদের প্রহার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2281)


2281 - عن جابر بن يزيد بن الأسود الخزاعيّ، عن أبيه، قال: شهدت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حجته، فصليت معه صلاة الصبح في مسجد الخيف، قال: فلمّا قضى صلاته وانحرف إذا هو برجلين في أخرى القوم لم يصليا معه، فقال:"عليَّ بهما" فجيء بهما ترعد فرائصهما فقال:"ما منعكما أن تصليا معنا؟" فقالا: يا رسول الله! إنا كنا قد صلينا في رحالنا. قال:"فلا تفعلا، إذا صليتما في رحالكما، ثمّ أتيتما مسجد جماعة، فصليا معهم؛ فإنها لكما نافلة".

صحيح: رواه أبو داود (575)، والتِّرمذيّ (219)، والنسائي (858) كلّهم من طرق عن يعلى بن عطاء، عن جابر بن يزيد به مثله.

قال الترمذيّ: حسن صحيح، وأقره النوويّ في"الخلاصة" (2306).

وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1279)، وابن حبان (1565، 2395) فروياه عن طريق يعلى بن عطاء، ونقل الحافظ في التلخيص (2/ 29) تصحيحه عن ابن السكن ثمّ قال: قال الشافعي في القديم: إسناده مجهول.

قال البيهقيّ: لأن يزيد بن الأسود ليس له راو غير ابنه، وهو جابر، ولا لابنه راو غير يعلى.
إِلَّا أن الحافظ استبعد هذا الطعن فقال: يعلى بن عطاء من رجال مسلم، وجابر وثَّقه النسائيّ وغيره، وقد وجدنا جابر بن يزيد راويا غير يعلى، أخرجه ابن مندة في"المعرفة" من طريق بقية، عن إبراهيم بن ذي حماية، عن عبد الملك بن عمير، عن جابر. انتهى.

قلت: بقية هو ابن الوليد، المعروف بالتدليس، إِلَّا أنه صرَّح بالسماع في رواية الدَّارقطنيّ (1/ 412) عن إبراهيم. ثمّ تواتر هذا الحديث عن يعلى بن عطاء.

قال الحاكم: روى عنه شعبة، وهشام بن حسان، وغيلان بن جامع، وأبو خالد الدَّالانيّ، وأبو عوانة، وعبد الملك بن عمير، ومبارك بن فضالة، وشريك بن عبد الله، وغيرهم، واحتج مسلم بيعلى بن عطاء. انتهى.

ويبدو من هذا أن عبد الملك بن عُمير روي مرة عن جابر مباشرة، ومرة عن يعلى بن عطاء، عن جابر، وعبد الملك هذا رُمي بالاختلاط لكبر سنِّهِ، لأنه عاش مائة وثلاث سنين، وأخرج له الشيخان من رواية القدماء عنه في الاحتجاج، ومن رواية بعض المتأخرين عنه في المتابعات.

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (2/ 90).




ইয়াযিদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর হজ্জে উপস্থিত ছিলাম। আমি তাঁর সাথে মসজিদে খাইফে ফজরের সালাত আদায় করলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত শেষ করলেন এবং ফিরলেন, তখন তিনি দেখলেন যে, দুজন লোক জামা‘আতের একদম পিছনে বসে আছে, তারা তাঁর সাথে সালাত পড়েনি। তিনি বললেন: “তাদেরকে আমার কাছে নিয়ে আসো।” তখন তাদেরকে আনা হলো, তাদের কাঁধের জোড়াগুলো ভয়ে কাঁপছিল। তিনি বললেন: “তোমরা কেন আমাদের সাথে সালাত আদায় করোনি?” তারা বলল: হে আল্লাহর রসূল! আমরা আমাদের আস্তানায় (বাসস্থানে) সালাত আদায় করে ফেলেছি। তিনি বললেন: “তোমরা এমন করো না। যখন তোমরা তোমাদের আস্তানায় সালাত আদায় করে নেবে, অতঃপর কোনো জামা‘আতের মসজিদে আসবে, তখন তাদের সাথেও সালাত আদায় করবে। কারণ এটি তোমাদের জন্য নফল (অতিরিক্ত) হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2282)


2282 - عن بُسْر بن مِجْجَنٍ، عن أبيه أنه كان في مجلس مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأُذِّن بالصلاة، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فصَلَّى. ثمّ رجع، ومِحْجَن في مجلسه لم يُصَلِّ معه. فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"ما منعك أن تُصَلِّي مع الناس؟ ألستَ برجل مسلم؟" فقال: بلى يا رسول الله! ولكني قد صَلَّيْتُ في أهلي، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا جئتَ فصَلِّ مع الناس، وإن كنت قد صَلَّيْت".

صحيح: رواه مالك في صلاة الجماعة (8) عن زيد بن أسلم، عن رجل من بني الدِيل يقال له: بُسْر بن محجَن فذكره.

ورواه النسائيّ (857) عن قُتَيبة، عن مالك به. وصحّحه الحاكم (1/ 244) بعد أن أخرجه من طريق مالك، وحسَّنه البغوي في شرح السنة (3/ 430).

وبُسر: بضم الموحدة، وسكون المهملة. كذا قال مالك في روايته عن زيد بن أسلم. وقال الثوري عن زيد بن أسلم: بِشر - بكسر الموحدة والشين المعجمة. والصواب ما قاله مالك. نص على ذلك أبو نعيم وابن عبد البر وابن حبان، وهكذا رواه الإمام أحمد في مسنده (16393 - 16395)، وهو تابعي مشهور، جزم بذلك البخاريّ وغيره.




মিহজান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে এক মজলিসে ছিলেন। এমতাবস্থায় সালাতের আযান দেওয়া হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন, আর মিহজান তখনও তার স্থানে বসে ছিলেন এবং তাঁর সাথে সালাত আদায় করেননি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার সালাতে শামিল না হওয়ার কারণ কী? তুমি কি একজন মুসলিম নও?" তিনি বললেন: "অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল! কিন্তু আমি ইতিপূর্বে আমার পরিবারের সাথে সালাত আদায় করে এসেছি।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে বললেন: "যখন তুমি (এরূপ স্থানে) আসবে, তখন মানুষের সাথে সালাত আদায় করো, যদিও তুমি ইতিপূর্বে সালাত আদায় করে এসেছো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2283)


2283 - عن سليمان بن يسار - يعني مولى ميمونة - قال: أتيتُ ابن عمر على البلاط وهم يصلون، فقلت: ألا تُصَلِّي معهم؟ قال: قد صلَّيْتُ، إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم
يقول:"لا تُصَلُّوا صلاةً في يوم مرتين".

حسن: رواه أبو داود (579)، والنسائي (860) كلاهما من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شُعيب، عن سليمان بن يسار فذكر مثله.

وإسناده حسن لأجل عمرو بن شعيب.

وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (1641)، وابن حبان (2396) من طريق حسين - وهو ابن ذكوان المعلم به، وقد صرَّح عمرو بن شعيب سماع هذا الحديث من سليمان بن يسار، رواه الإمام أحمد (4689) عن يحيى بن سعيد، عن حسين المعلم به.

قال ابن حبان: عمرو بن شعيب في نفسه ثقة يحتج بخبره إذا روى عن غير أبيه، فأما روايته عن أبيه، عن جده فلا تخلو من انقطاع وإرسال فيه، فلذلك لم نحتجَّ بشيء منه. انتهى.

وفيما قال في روايته عن أبيه، عن جده نظر، قال البخاريّ رحمه الله تعالى: رأيت أحمد بن حنبل وعلي بن المديني وإسحاق بن راهويه وأبا عبيد وعامة أصحابنا يحتجون بحديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. ما تركه أحد من المسلمين. قال البخاريّ: فمن الناس بعدهم؟" انتهى.

وأمّا معنى الحديث فقال ابن عبد البر في"الاستذكار" (5/ 357 - 358):"اتفق أحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه على أن معنى قول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تصلوا صلاة في يوم مرتين" أن ذلك أن يصلي الرّجلُ صلاة مكتوبةً عليه، ثمّ يقوم بعد الفراغ منها فيعيدها على جهة الفرض أيضًا. وأمّا من صلَّى الثانية مع الجماعة على أنها له نافلة اقتداء برسول الله صلى الله عليه وسلم في أمره بذلك، وقوله صلى الله عليه وسلم للذين أمرهم بإعادة الصّلاة في جماعة:"إنها لكم نافلة" فليس ذلك ممن أعاد الصّلاة في يوم مرتين، لأن الأوّلى فريضة، والثانية نافلة".

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (2/ 96).




আবদুল্লাহ ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুলাইমান ইবনু ইয়াসার— যিনি মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্তদাস ছিলেন— তিনি বলেন: আমি ইবনু ওমরের কাছে 'আল-বালাত' নামক স্থানে গেলাম, যখন লোকেরা সালাত আদায় করছিল। আমি বললাম: আপনি কি তাদের সাথে সালাত আদায় করবেন না? তিনি বললেন: আমি সালাত আদায় করে নিয়েছি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একদিনে তোমরা একই সালাত দুইবার আদায় করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2284)


2284 - عن عثمان بن عفّان قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من توضَّأ للصَّلاة فأسبغ الوضوء، ثمّ مشى إلى الصّلاة المكتوبة، فصلاها مع الناس، أو مع الجماعة، أو في المسجد غفر الله له ذنوبه".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (232: 13) من طرق عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، أنَّ الحكم بن عبد الله القرشي حدَّثه، أنَّ نافع بن جبير وعبد الله بن أبي سلمة حدَّثاه أنَّ معاذ بن عبد الرحمن حدثهما عن حمران مولى عثمان بن عفّان، عن عثمان، فذكره.

وانفرد مسلم بهذا اللّفظ، وقد مضى حديث عثمان في الطهارة.




উসমান ইবনে আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি সালাতের জন্য উত্তমরূপে ওযু করে, এরপর ফরয সালাতের দিকে হেঁটে যায়, অতঃপর সে মানুষের সাথে, অথবা জামা‘আতের সাথে, অথবা মসজিদে তা আদায় করে, আল্লাহ তা‘আলা তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2285)


2285 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: جاء رجل وقد صَلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:
"أيكم يتجر على هذا؟" فقام رجل فصلى معه.

وفي رواية:"ألا من يتصدق على هذا فيصلي معه".

وفي رواية: فتصدق عليه أبو بكر فصلى معه.

حسن: رواه أبو داود (574)، والتِّرمذيّ (220) واللّفظ له، كلاهما من طريق سليمان الأسود الناجي البصريّ، عن أبي المتوكل، عن أبي سعيد فذكر مثله.

قال الترمذيّ: حديث حسن وهو قول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم من التابعين قالوا: لا بأس أن يصلي القوم جماعة في مسجد قد صلَّى فيه جماعةٌ، وبه يقول أحمد وإسحاق، وقال آخرون من أهل العلم: يصلون فرادى. وبه يقول سفيان وابن المبارك ومالك والشافعيّ، يختارون الصّلاة فرادى، وسليمان الناجي بصريّ، ويقال: سليمان بن الأسود، وأبو المتوكل اسمه"عليّ بن داود" انتهى قول الترمذيّ.

والحديث حسن كما قال الترمذيّ، فإن سليمان بن الأسود الناجي"صدوق" وثَّقه ابن معين وابن حبان. وأبو المتوكل المشهور بكنيته أيضًا الناجي واسمه: عليّ بن داود ويقال: ابن دُؤاد - بضم الدال، تابعي ثقة.

والحديث أخرجه ابن خزيمة (1632)، وابن حبان (11019)، والحاكم (1/ 209) وقال: صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه. وسليمان الأسود هذا هو: سليمان بن سُحيم قد احتج مسلم به وبأبي المتوكل. وهذا الحديث أصل في إقامة الجماعة في المساجد مرتين. انتهى.

وسليمان، ليس هو ابن سُحيم أبو أيوب المدني الذي روى له مسلم، وإنما هو سليمان الأسود الناجي من رجال أبي داود والتِّرمذيّ.

وأورده الحافظ الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2185) وعزاه إلى أحمد وهذا لفظه: عن أبي سعيد الخدريّ قال: صلى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بأصحابه الظهر. قال: فدخل رجل من أصحابه فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما حسبك يا فلان عن الصّلاة؟" قال: فذكر شيئًا اعتل به، قال: فقام يُصَلِّي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا رجل يتصدق على هذا فيصلي معه" فقام رجل فصلى معه.

قال الهيثميّ: رواه أحمد، وروى أبو داود والتِّرمذيّ بعضه، ورجاله رجال الصَّحيح. انتهى.

قلت: رواه الإمام أحمد (11808) عن عليّ بن عاصم، أخبرنا سليمان الناجي به بهذا اللّفظ كما رواه أيضًا عن محمد بن أبي عديّ، عن سعيد - يعني ابن أبي عروبة (11019) وعن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا سعيد (11408) وعن عفّان، حَدَّثَنَا وهيب (11613) كل هؤلاء - أعني عليّ بن عاصم وسعيد بن أبي عروبة ووهيب وهو ابن خالد الباهلي. رووه عن سليمان الأسود، وقد سبق أن بينا أنه ليس من رجال مسلم. كما فيه أيضًا عليّ بن عاصم لم يرو عنه شيخان شيئًا. وفي حديثه من الزيادة وهي قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما حبسك يا فلان عن الصّلاة"؟ فقال: … فإنه لم يتابع عليها.
وعلي بن عاصم الواسطي التميمي مولاهم قال فيه عليّ بن المديني: كان كثير الغلط، وقال العقيلي: نعرفه بالكذب، وقال البخاريّ: ليس بالقويّ، ووثَّقه العجلي.

وأمّا الرّجل الذي صلى معه فهو أبو بكر الصديق كما رواه ابن أبي شيبة (2/ 277) مرسلًا عن الحسن.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি এলো যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করে ফেলেছিলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের মধ্যে কে আছে যে এর সাথে ব্যবসায় অংশ নেবে?" তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে তার সাথে সালাত আদায় করল।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "কেউ কি নেই যে এর উপর সদকা করবে এবং তার সাথে সালাত আদায় করবে?"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: তখন আবু বকর তার উপর সদকা করলেন এবং তার সাথে সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2286)


2286 - عن أنس أن رجلًا جاء، وقد صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام يُصَلِّي وحده، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يتجر على هذا فليصل معه".

حسن: رواه الدَّارقطنيّ (1/ 276) عن يحيى بن محمد بن صاعد، ثنا عمر بن محمد بن الحسن الأسديّ، ثنا أبيّ، نا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس فذكره.

ورواه الطبرانيّ في الأوسط (7282) من طريق عمر بن محمد بن الحسن به مثله.

وأبدى الحافظ الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2184) احتمالًا إن كان محمد بن الحسن هو ابن زبالة فهو ضعيف.

قلت: يزيل هذا الإشكال لما في رواية الدَّارقطنيّ بأنه الأسدي وهو وأبوه صدوقان. ولذا قال الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 58): سنده قوي.

قلت: وهو شاهد قوي لحديث أبي سعيد.

وقد ثبت عن أنس أنه أعاد صلاة الجماعة في المسجد، عن الجعد أبي عثمان اليشكري قال: صلينا الغداة في مسجد بني رفاعة. وجلسنا فجاء أنس بن مالك في نحو من عشرين من فتيانه فقال: أصليم؟ قلنا: نعم، فأمر بعض فتيانه فأذَّن، وأقام، ثمّ تقدّم فصلَّى بهم.

رواه أبو يعلى (4338 بتحقيق الأثري) عن أبي الربيع الزهرانيّ، حَدَّثَنَا حمّاد، عن الجعد أبي عثمان فذكره، ورواه البيهقيّ (3/ 70) من طريق الحميديّ، ثنا أبو عبد الصمد العميّ، ثنا الجعد به واللّفظ له، وإسناده صحيح، وعلَّقه البخاريّ. انظر"الفتح" (2/ 131).

وفي الباب أحاديث أخرى وهي لا تخلو من مقال.

منها: حديث أبي أمامة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يصلي فقال: ألا رجلٌ يتصدق على هذا، يُصلي معه" فقام رجل، فصلى معه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذان جماعة" رواه أحمد (22189) وأبو يعلى"إتحاف الخيرة" (1746)، والطَّبرانيّ في الكبير (7857) كلّهم من طريق ابن المبارك، حَدَّثَنَا يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن زَحْر، عن عليّ بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.

وعبيد الله بن زَحْر - بفتح الزاي وسكون المهملة، الضمري مولاهم الإفريقيّ، قال عثمان الدَّارميّ: كل حديثه عندي ضعيف.

وقال ابن عدي: يقع في أحاديثه ما لا يتابع عليه، وقال ابن حبان: يَروي الموضوعات عن الأثبات. وضعَّفه الدَّارقطنيّ. ولكن نقل الترمذيّ عن البخاريّ في العلل أنه وثَّقه. وقال النسائيّ: ليس به بأس.
وقال الذّهبيّ في المغني (3922): المختلف فيه، وهو إلى الضعف أقرب، ضعَّفه أحمد بن حنبل، وقال النسائيّ: لا بأس به" انتهى.

وفيه أيضًا شيخه عليّ بن يزيد وهو: ابن أبي زياد الألهاني صاحب القاسم بن عبد الرحمن قال فيه الدَّارقطنيّ: متروك، وقال أبو أحمد الحاكم: ذاهب الحديث. وقال النسائيّ: ليس بثقة، وأطلق عليه الحافظ كلمة:"ضعيف".

ولذا قال البوصيري في الاتحاف:"هذا إسناد ضعيف، قال ابن معين: عليّ بن يزيد الألهاني عن القاسم، وعنه عبيد الله هي ضعفاء كلها".

ومنها حديث عصمة بن مالك قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قد صلَّى الظهر، وقعد في المسجد، إذ دخل رجل يُصَلِّي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا رجل يقوم فيتصدق على هذا فيُصَلِّي معه؟" رواه الدَّارقطنيّ (1/ 277) من طريق الفضل بن المختار، عن عبيد الله بن موهب، عن عصمة بن مالك فذكره.

قال الزيلعي في"نصب الراية" (3/ 58):"وهو ضعيف بالفضل بن المختار، قال ابن عدي: الفضل بن المختار أحاديثه منكرة، وقال أبو حاتم الرازي: هو مجهول، وأحاديثه منكرة يحدث بالأباطيل، قاله ابن الجوزي في التحقيق". انتهى.

ومنها حديث سلمان أن رجلًا دخل المسجد، والنبي صلى الله عليه وسلم قد صَلَّى. فقال:"ألا رجل يتصدق على هذا فيُصَلِّي معه" رواه الطبرانيّ في الكبير، وفيه محمد بن عبد الملك أبو جابر قال أبو حاتم: أدركه وليس بالقوي في الحديث. ورواه البزّار وفيه الحسن بن الحسن الأشقر وهو ضعيف جدًّا، وقد وثَّقه ابن حبان. انتهى. انظر"مجمع" الزوائد" (2182).

وبهذا قال جماعة من الصّحابة منهم ابن مسعود، وجماعة من التابعين وغيرهم، وهو مذهب الإمام أحمد بأنه لا يكره إعادة الجماعة في المسجد إذا صلى إمام الحي وحضر جماعة أخرى، وأمّا في مساجد الأسواق والممرات فلا خلاف في إعادة الجماعة فيها.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আগমন করল যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করে ফেলেছিলেন। অতঃপর সে একাকী সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়াল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কে এই ব্যক্তির প্রতি অনুগ্রহ করবে যে তার সাথে সালাত আদায় করবে?"









আল-জামি` আল-কামিল (2287)


2287 - عن أبي هريرة قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: ليس صلاة أثقلَ على المنافقين من الفجر والعشاء، ولو يعلمون ما فيهما لأتوهما ولو حَبْوًا، لقد هممتُ أن آمر المؤذِّن فيقيمَ، ثمّ آمر رجلًا يؤمَّ الناس، ثمّ آخد شًعلًا من نار فأُحَرِّق على من لا يخرجُ إلى الصّلاة بعدُ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (657)، ومسلم في المساجد (651/ 252) كلاهما من طريق الأعمش، قال: حَدَّثَنِي أبو صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، واللّفظ للبخاريّ، وفي لفظ مسلم، ثمّ أنطلق مَعِي برجال معهم حُزَم من حَطَبٍ إلى قوم لا يشهدون الصّلاة، فأحرق
عليهم بيوتهم بالنار".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মুনাফিকদের উপর ফজর ও ইশার সালাতের চেয়ে অধিক ভারী কোনো সালাত নেই। তারা যদি জানত এই দুই সালাতে কী (পুণ্য) আছে, তবে হামাগুড়ি দিয়ে হলেও তারা তাতে আসত। আমি সংকল্প করেছিলাম যে, মুয়াজ্জিনকে ইকামত দিতে বলব, এরপর অন্য এক ব্যক্তিকে লোকদের ইমামতি করতে নির্দেশ দেব, অতঃপর যারা এখনো সালাতে বের হয়নি, তাদের উপর আগুনের মশাল নিয়ে তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দেব।