হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2261)


2261 - عن أم ورَقة بنت نوفل أن النبي صلى الله عليه وسلم لما غزا بدرًا، قالت: يا رسول الله! ائذن لي في الغزو معك، أمَرِّضُ مرضاكم، لعل الله أن يرزقني شهادةً، قال:"قرِّي في بيتك، فإن الله تعالى يرزقك الشهادة".

قال: فكانت تسمى الشهيدة. قال: وكانت قد قرأتِ القرآن، فاستأذنت النبي صلى الله عليه وسلم أن تتخذ في دارها مؤذِّنًا. فأذن لها، قال: وكانت قد دبَّرتْ غلامًا لها وجارية، فقاما إليها بالليل فغَمَّاها بقطيفةٍ لها حتى ماتتْ وذهبا. فأصبح عمر فقام في الناس، فقال: من كان عنده من هذين علم، أو من رآهما فليجيء بهما، فأمر بهما فصُلِبا. فكانا أول مصلوب بالمدينة.

وفي رواية: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزورها في بيتها، وجعل لها مؤذِّنًا يؤذِّنُ لها، وأمرها أن تؤم أهلَ دارها. قال عبد الرحمن: فأنا رأيتُ مؤذنها شيخًا كبيرًا.
حسن: رواه أبو داود (591) وأحمد (27283) والدارقطني (1/ 403) كلهم من حديث الوليد بن عبد الله بن جُميع، قال: حدَّثَتْني جدتي وعبد الرحمن بن خلاد الأنصاري، عن أم ورقة بنت نوفل فذكرت الحديث. كذا ذكره أبو داود عبدَ الرحمن بن خلاد مقرونا، والرواية الثانية رواها عن الحسن بن حماد الحضرمي، حدثنا محمد بن فُضيل، عن الوليد بن جميع، عن عبد الرحمن بن خلاد وحده، عنها.

الوليد بن جميع وثَّقه ابن معين والعجلي، وقال أحمد وأبو زرعة: ليس به بأس، وهو من رجال مسلم.

وجدة الوليد اسمها: ليلى بنت مالك لا تُعرف، وعبد الرحمن بن خلاد مجهول، إلا أن أحدهما يُقوِّي الآخر، قال النووي في الخلاصة (2346): رواه أبو داود ولم يضعفه.

ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1676)، والحاكم (1/ 203) كلاهما من طريق الوليد بن جميع به، وسميا جدة الوليد بأنها: ليلى بنت مالك. قال الحاكم: قد احتج مسلم بالوليد بن جُميع وهذه سنة غريبة لا أعرف في الباب حديثًا مسندًا غير هذا، وقد رُوينا عن أم المؤمنين عائشة أنها كانت تؤذِّن، وتُقيم، وتؤم النساءَ" انتهى.

وحديث إمامة عائشة أخرجه عبد الرزاق (3/ 141)، والدارقطني (1/ 404)، والبيهقي (3/ 131) كلهم من طريق سفيان الثوي. قال: حدثني ميسرة بن حبيب، عن رائطة الحنفية قالت: أَمَّتنا عائشةُ، فقامت بينهن في الصلاة المكتوبة، وعن حُجيرة قالت:"أمَّتنا أم سلمةَ في صلاة العصر فقامت بيننا".

قال النووي في"الخلاصة" (2357، 2358): رواهما الدارقطني والبيهقي بإسنادين صحيحين. ورواه الحاكم (1/ 203 - 204) من وجه آخر عن ليث، عن عطاء، عن عائشة.

قلت: فيه ليث وهو: ابن أبي سُليم ضعيف. إلا أنه توبع.

وفي الموضوع آثار أخرى ذكرها الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 31 - 32). انظر للمزيد: المنة الكبرى" (2/ 107 - 110).

وقد استحب الإمام أحمد أن تصلي المرأة بالنساء جماعة، وهو مذهب عائشة وأم سلمة والشافعي وإسحاق وغيرهم. المغني




উম্মে ওয়ারাকাহ বিনতে নাওফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদর যুদ্ধে গমন করলেন, তখন তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে আপনার সাথে যুদ্ধে যাওয়ার অনুমতি দিন। আমি আপনাদের অসুস্থদের সেবা করব, সম্ভবত আল্লাহ আমাকে শাহাদাত নসিব করবেন।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার বাড়িতেই থাকো, কেননা আল্লাহ তাআলা তোমাকে শাহাদাত দান করবেন।"

বর্ণনাকারী বলেন: এরপর থেকে তাকে 'শাহীদা' (শহীদ) নামে ডাকা হতো। বর্ণনাকারী আরও বলেন: তিনি কুরআন পাঠ করতেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইলেন যে তিনি যেন তার বাড়িতে একজন মুআযযিন নিযুক্ত করেন। অতঃপর তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন: তার একজন পুরুষ ও একজন নারী দাস ছিল যাদেরকে তিনি মুক্তি দেওয়ার সিদ্ধান্ত নিয়েছিলেন (মুদাব্বারাহ)। এক রাতে তারা তার কাছে এসে তাকে তার নিজের একটি কম্বল দিয়ে শ্বাসরোধ করে হত্যা করে পালিয়ে যায়।

সকালে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে মানুষের মাঝে দাঁড়ালেন এবং বললেন: এই দুই ব্যক্তি সম্পর্কে যার কাছে কোনো তথ্য আছে, অথবা যে তাদের দেখেছে, সে যেন তাদের ধরে নিয়ে আসে। অতঃপর তিনি তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের শূলে চড়ানো হলো। তারাই ছিল মদীনায় শূলে চড়ানো প্রথম ব্যক্তি।

অন্য বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার বাড়িতে তাকে দেখতে যেতেন এবং তার জন্য একজন মুআযযিন নিযুক্ত করেছিলেন, যে তার জন্য আযান দিতো। তিনি তাকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যেন তিনি তার বাড়ির লোকদের (নামাযে) ইমামতি করেন। আব্দুর রহমান বলেন: আমি তার সেই মুআযযিনকে বৃদ্ধ অবস্থায় দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (2262)


2262 - عن سهل بن سعد قال: كان رجال يُصلُّون مع النبي صلى الله عليه وسلم عاقِدي أزُرِهم على أعناقهم كهيئة الصبيان، وقال للنساء:"لا ترفعن رؤوسكنَّ حتى يستوي الرجالُ جلوسًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (362) عن مسدد قال: حدثنا يحيي (وهو ابن سعيد) عن سفيان قال: حدثني أبو حازم، عن سهل فذكره.
وفي رواية محمد بن كثير عن سفيان (714): فقيل للنساء"لا تَرفعنَّ رؤوسكُنَّ".

ورواه مسلم في الصلاة (441) من طريق وكيع، عن سفيان: وفيه: فقال قائل:"يا معشر النساء! لا ترفعن رؤوسَكُنَّ. فقيل: القائل هو النبي صلى الله عليه وسلم، وقيل: القائل هو: بلال مبلغ عن النبي صلى الله عليه وسلم.

ورواه ابن خزيمة (1695)، وابن حبان (2216) من طريق بشر بن المفضل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن أبي حازم عنه قال: كن النساء يُؤمرن في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة أن لا يرفعنَّ رؤوسهُنَّ حتى يأخذ الرِّجالُ مقاعدهم من الأرض من ضيق الثياب.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, কিছু পুরুষ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করত এমতাবস্থায় যে, তারা (পোশাকের স্বল্পতার কারণে) শিশুদের মতো নিজেদের তহবন্দগুলো ঘাড়ের উপর বেঁধে রাখত। আর তিনি মহিলাদের বললেন: "তোমরা তোমাদের মাথা তুলবে না যতক্ষণ না পুরুষেরা স্থির হয়ে বসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2263)


2263 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من كان منكنَّ يؤمِنَّ بالله واليوم الآخر فلا ترفع رأسَها حتى يرفعَ الرجالُ رؤوسَهم".

صحيح: رواه أبو داود (851) حدثنا محمد بن المتوكل العسقلاني، حدثنا عبد الرزاق، أنبانا معمر، عن عبد الله بن مسلم أخي الزهري، عن مولى لأسماء بنت أبي بكر، عنها فذكرت الحديث.

هكذا قال أبو داود: مولى لأسماء، ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (2/ 241).

ولكن في مصنف عبد الرزاق (5109) ومن طريقه الإمام أحمد في مسنده (26947)"مولاة" لأسماء، ثم روى الإمام أحمد (26949) عن عبد الأعلى، عن معمر به وفيه: مولى لأسماء. وكذلك قال أيضًا في روايته (26950) عن عفان، عن وُهيب، عن النعمان بن راشد، عن أخي الزهري.

وقد عَيَّن الطبرانيُّ أن يكون هذا المولى هو: عبد الله بن كيسان، فأخرج هذه الأحاديث في مسند عبد الله مولى أسماء، عن أسماء.

انظر:"المعجم الكبير" (24/ 97 - 98).

فإن صحَّ أن يكون هذا غير مسمى هو: عبد الله بن كيسان فيكون الإسناد صحيحًا، لأن عبد الله بن كيسان من كبار التابعين، روى عنه الجماعة.




আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের মধ্যে যে কেউ আল্লাহ ও পরকালের প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন ততক্ষণ তার মাথা না তোলে, যতক্ষণ না পুরুষেরা তাদের মাথা তুলে ফেলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2264)


2264 - عن * *




২২৬৪ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (2265)


2265 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الجماعة تفضُل صلاة الفذِّ بسبع وعشرين درجة".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (1) عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله.

ورواه البخاري في الأذان (645) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (650) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به.

ورواه الضحاك، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"بضعًا وعشرين".

قال الترمذي (215) هكذا روي نافع عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تفضلُ صلاة الجماعة على صلاة الرجل وحده بسبع وعشرين درجة" وعامة من روي عن النبي صلى الله عليه وسلم إنما قالوا:"خمس وعشرين" إلا ابن عمر فإنه قال:"بسبع وعشرين". وقال أيضًا:"حديث ابن عمر حسن صحيح".

قلت: رواه الضحاك عن نافع، عن ابن عمر عند مسلم فقال:"بضْعًا وعشرين" وهي تشمل الرواتين: سبعًا وعشرين"، و"خمسًا وعشرين"، فتكون رواية"بضعا وعشرين" هي الأصل و"سبعًا وعشرين" و"خمسا وعشرين" تفصيل الإجمال، فمرة قال بهذا، ومرة بهذا وإن كانت رواية"خمسًا وعشرين" تترجح على رواية"سبعًا وعشرين" لكثرتها.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জামাআতের সালাত একাকী সালাতের চেয়ে সাতাশ ডিগ্রি (স্তর) বেশি মর্যাদা লাভ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2266)


2266 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الجماعة أفضلُ من صلاة أحدكم وحده بخمس وعشرين جزءًا".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (2) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره. ورواه مسلم في المساجد (649/ 275) عن يحيى بن يحيى، عن مالك به مثله.

ورواه البخاري في الأذان (648)، ومسلم من طريق الزهري قال: أخبرني سعيد بن المسيب، وقرنه البخاري لأبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تفضل صلاةُ الجميع صلاةَ أحدكم وحده بخمس وعشرين جزءًا، وتجتمع ملائكةُ الليل، وملائكةُ النهار في صلاة الفجر" ثم يقول أبو هريرة: فاقرأوا إن شتم: {إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا} [الإسراء: 78].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "জামাতে সালাত আদায় করা তোমাদের একাকী সালাত আদায়ের চেয়ে পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদাপূর্ণ।"

তিনি (আবূ হুরায়রা) আরো বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "সকলের সালাত তোমাদের একাকী সালাতের চেয়ে পঁচিশ ভাগ বেশি মর্যাদাপূর্ণ। আর রাতের ফিরিশতা ও দিনের ফিরিশতারা ফযরের সালাতে একত্রিত হন।" এরপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তোমরা চাইলে (এর প্রমাণে) এ আয়াতটি পাঠ করতে পারো: "নিশ্চয়ই ফযরের কুরআন (সালাত) প্রত্যক্ষ করা হয়।" (সূরা ইসরা: ৭৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (2267)


2267 - عن أبي هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الرجل في الجماعة تُضَعَّف على صلاته في بيته، وفي سوقه خمسًا وعشرين ضعفًا، وذلك أنه إذا توضأ فأحسنَ
الوضوء، ثم خرج إلى المسجد، لا يُخرجه إلا الصلاةُ، لم يخطُ خُطوةّ إلا رُفِعتْ له بها درجةٌ، وحُطَّ عنه بها خطيئةٌ، فإذا صلَّى لم تزلِ الملائكهُ تُصَلِّي عليه ما دام في مُصلَّاه. اللَّهم صَلِّ عليه، اللَّهم ارحمه، ولا يزال أحدكم في صلاةٍ ما انتظر الصَّلاة".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (647) واللفظ له، ومسلم في المساجد (149) كلاهما عن الأعمش، قال: سمعتُ أبا صالح يقول: سمعتُ أبا هريرة فذكر الحديث، وزاد مسلم:"ما لم يؤذِ فيه. ما لم يُحدثْ فيه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো ব্যক্তির জামায়াতে সালাত আদায় করা তার ঘরে বা বাজারে আদায় করা সালাতের তুলনায় পঁচিশ গুণ বৃদ্ধি করা হয়। আর তা এই কারণে যে, যখন সে সুন্দরভাবে ওযু করে, এরপর মসজিদের উদ্দেশ্যে বের হয়, সালাত ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্যে সে বের হয় না, তখন প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে তার জন্য একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করা হয় এবং একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর যখন সে সালাত আদায় করে, তখন যতক্ষণ সে তার সালাতের স্থানে থাকে, ফেরেশতারা তার জন্য দু‘আ করতে থাকেন— ‘হে আল্লাহ! আপনি তার প্রতি রহমত বর্ষণ করুন। হে আল্লাহ! আপনি তাকে ক্ষমা করুন।’ আর তোমাদের কেউ ততক্ষণ সালাতের মধ্যেই থাকে, যতক্ষণ সে সালাতের অপেক্ষায় থাকে— যতক্ষণ না সে তাতে (কাউকে) কষ্ট দেয় অথবা অপবিত্র হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2268)


2268 - عن أبي سعيد الخدري أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة الجماعة تفضلُ صلاةَ الفَذِّ بخمس وعشرين درجة".

صحيح: رواه البخاري في الأذان (646) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا الليث، حدثني ابن الهاد، عن عبد الله بن خَبَّاب، عن أبي سعيد فذكره.

وزاد أبو داود (560)، في روايته فقال فيه:"فإن صلَّاها في فَلاةٍ، فأتم ركوعها وسجودَها بلغت خمسين صلاة" رواه من حديث هلال بن ميمون الجُهني، عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدري فذكره. وهلال بن ميمون مختلف فيه غير أنه"صدوق" كما قال الحافظ في التقريب إلا أنه أتى بزيادة منكرة وهي قوله:"خمسين صلاة" فإنه لم يوافقه عليه أحد.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "জামাআতের সালাত (নামায) একাকী সালাত অপেক্ষা পঁচিশ গুণ বেশি মর্যাদা রাখে।"

হাদীসটি সহীহ। এটি বুখারী (৬৪৬) আব্দুল্লাহ ইবনু ইউসুফ, লায়স, ইবনু আল-হাদ, আব্দুল্লাহ ইবনু খাব্বাব এর মাধ্যমে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আবূ দাউদ (৫৬০) তার বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করেছেন: "আর যদি কেউ কোনো উন্মুক্ত প্রান্তরে তা (সালাত) আদায় করে এবং এর রুকু ও সিজদা পুরোপুরি আদায় করে, তবে তা পঞ্চাশ সালাতের সমান মর্যাদা লাভ করে।" তিনি এই বর্ণনাটি হিলাল ইবনু মাইমুন আল-জুহানী, আতা ইবনু ইয়াযীদ, আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। হিলাল ইবনু মাইমুন সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে, তবে আল-হাফিয (ইবনু হাজার) তাকে 'সাদুক' (সত্যবাদী) বলেছেন। কিন্তু তিনি একটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য) অতিরিক্ত অংশ বর্ণনা করেছেন, যা হলো— "পঞ্চাশ সালাতের সমান।" কারণ এই বিষয়ে তার সাথে অন্য কেউ একমত হননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2269)


2269 - عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تفضل صلاة الجماعة على صلاة الفذِّ، أو صلاة الرجل وحده خمسًا وعشرين صلاة".

حسن: رواه البزار - الكشف (459) عن عبد الملك بن محمد الرقاشي، ثنا حجاج بن المنهال، ثنا حماد بن سلمة، عن عاصم، عن أنس فذكره.

قال البزار: لا نعلم رواه عن عاصم عن أنس إلا حماد بن سلمة وقال: وحدثنا عبد السلام بن شُعيب بن الحبحاب، عن أبيه، عن أنس فذكر نحوه.

قلت: ورواه أيضًا الطبراني في الأوسط (2199) عن أحمد، قال: حدثنا وهب بن يحيى بن زِمام العلَّاف، قال: حدثنا عبد السلام بن شعيب بن الحَبْحاب به مثله.

قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعيب إلا ابنه عبد السلام.

قلت: ليس كما قال، فللحديث إسناد آخر كما رأيت.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 38):"رجال البزار رجال ثقات".

قلت: وهو كما قال، إلا عبد السلام بن شُعيب فإنه"صدوق" كما في التقريب.

وأحمد شيخ الطبراني هو: ابن يحيى بن زهير التستري ثقة زاهد، له ترجمة في تذكرة الحفاظ، توفي سنة (310 هـ).
قلت: وأما ما جاء في فضل الجماعة على الفذ بخمس وعشرين، وفي حديث آخر بسبع وعشرين فلا تضاد فيهما لاحتمال أن يكون الله جعل أولًا خمسًا وعشرين درجة، ثم زاد جزءين آخرين فجعل سبعًا وعشرين، والله ذو الفضل العظيم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জামা'আতের সালাত একাকী ব্যক্তির সালাতের চেয়ে—অথবা কোনো ব্যক্তির একা সালাতের চেয়ে—পঁচিশ সালাতের সমান শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2270)


2270 - عن أبيّ بن كعب قال: صلى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومًا الصبح فقال:"أشاهد فلان"؟ قالوا: لا، قال:"أشاهد فلان؟" قالوا: لا، قال:"إن هاتين الصلاتين أثقلُ الصلوات على المنافقين، ولو تعلمون ما فيهما لأتيتموها ولو حبوًا على الركب، وإن الصف الأول على مثل صف الملائكة، ولو علمتُم ما فضيلته لابتدرتموه، وإن صلاة الرجل مع الرجل أزكى من صلاته وحده، وصلاته مع الرجلين أزكى من صلاته مع الرجل، وما كثُر فهو أحبُّ إلى الله تعالى".

حسن: رواه أبو داود (554) عن حفص بن عمر، والنسائي (844) عن خالد بن الحارث، كلاهما عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبي بن كعب، هكذا في سند أبي داود، وفي سند النسائي: عن شعبة، عن أبي إسحاق أنه أخبرهم عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيه - قال شعبة: وقال أبو إسحاق: وقد سمعته منه، ومن أبيه - قال: سمعت أبي بن كعب فذكره.

وعبد الله بن أبي بصير العبدي وثَّقه العجلي وابن حبان.

وأما أبوه، وهو أبو بصير فلم يُوثقه غير ابن حبان، ولذا جعله الحافظ في درجة"مقبول" أي: إذا توبع، على أن الإسناد ثابت بدون واسطته، فقد رواه أيضًا أحمد (21265) وابن حبان (2056) والحاكم في المستدرك (1/ 247) كلهم من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيّ بن كعب به مثله.

قال الحاكم:"وقد حكم أئمة الحديث: يحيى بن معين وعلي بن المديني ومحمد بن يحيى الذهلي وغيرهم لهذا الحديث بالصحة".

وأبو إسحاق مدلس، ولكنَّه صرح بالتحديث كما أن شعبة روى عنه وهو القائل: كفيتكم تدليس ثلاثة، منهم أبو إسحاق، كما أنَّه صرح بالسماع عند أحمد وابن خزيمة (1476 - 1477).

ورواه ابن ماجة (790) مختصرًا عن محمد بن معمر، قال: حدثنا أبو بكر الحنفي، قال: حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن عبد الله بن أبي بصير، عن أبيه، عن أبيّ بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الرجل في جماعة تزيد على صلاة الرّجل وحده أربعًا وعشرين، أو خمسًا وعشرين درجة".

وفي الباب حديث قُباث بن أَشْيم الليثي: رواه إسحاق بن راهويه، ثنا عيسى بن يونس، عن ثور بن يزيد، عن يونس بن سيف، عن عبد الرحمن بن زياد، عن قباث بن أَشْيم الليثي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: الصلاة الرجلين يؤمُّ أحدُهما صاحبَه أزكى عند الله من صلاة أربعة تترى، وصلاة أربعة
يؤمُّهم أحدُهم أزكى عند الله من صلاة ثمانية تترى، وصلاة ثمانية يؤمُّ أحدُهم أزكى عند الله من صلاة مائة تترى".

رواه الطبراني في الكبير (19/ 36) عن موسى بن هارون، عن إسحاق بن راهويه به.

ورواه أيضًا البخاري في"التاريخ الكبير" (4/ 192 - 193) والبزار"كشف الأستار" (461)، والحاكم (3/ 625)، والبيهقي (3/ 61) كلهم من طرق عن يونس بن سيف به مثله.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2142): رواه البزار والطبراني في الكبير، ورجال الطبراني موثقون.

قلت: فيه عبد الرحمن بن زياد"مقبول" وحيث لم أجد من تابعه فهو"ليَّن الحديث" ولكن اصطلح الهيثمي أن يقول في مثله: رجاله موثقون، اعتمادا على توثيق ابن حبان.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। এরপর জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কি উপস্থিত আছে?" তারা বলল: "না।" তিনি বললেন: "অমুক কি উপস্থিত আছে?" তারা বলল: "না।" তিনি বললেন: "নিশ্চয় এই দুটি সালাত (ফজর ও ইশা) মুনাফিকদের জন্য সবচেয়ে কঠিন সালাত। যদি তোমরা জানতে যে এই দুটিতে কী (ফজিলত) রয়েছে, তবে তোমরা হাঁটুতে ভর দিয়ে হামাগুড়ি দিয়ে হলেও এতে উপস্থিত হতে। আর নিশ্চয় প্রথম কাতার ফেরেশতাদের কাতারের মতো। যদি তোমরা জানতে যে এর কী মর্যাদা, তবে তোমরা এর জন্য প্রতিযোগিতা করতে। আর একাকী সালাত আদায়ের চেয়ে আরেকজনের সাথে কোনো ব্যক্তির সালাত অধিক পবিত্র (বা উত্তম)। আর একাকী একজনের সাথে সালাত আদায়ের চেয়ে দু'জনের সাথে সালাত আদায় করা অধিক পবিত্র। আর যেখানে (জমায়েত) বা জামাআত যত বেশি হয়, তা আল্লাহর কাছে তত বেশি প্রিয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2271)


2271 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فضلُ صلاة الرجل في الجمع على صلاته - يعني وحده - خمسًا وعشرين صلاة".

صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (455) حدثنا محمد بن المثنى وعمرو بن علي قالا: ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن قتادة، عن عُقبة بن وسَّاج، عن أبي الأحوص، عن عبد الله فذكره.

ورواه الطبراني في الكبير (10100) من طريق الإمام أحمد، عن محمد بن جعفر به مثله. وهو في المسند (4158) ولكن سقط في الإسناد"قتادة" بين شعبة وعقبة بن وسَّاج، فصار شعبة يروي عن عقبة بن وساج، وهو شيء مستبعد فإن شعبة وُلد في السنة التي مات فيها عقبة بن وسَّاج، وهي سنة اثنتين وثمانين، قال الحافظ في التقريب:"عقبة بن وسَّاج قتل بعد الثمانين".

وصحّحه ابن خزيمة (1470) فرواه من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، عن قتادة، عن عقبة بن وسَّاج به مثله.

وتابع شعبةَ همامُ، قال: أخبرنا قتادة، عن مُوَرِّق، عن أبي الأحوص الجُشمي، عن ابن مسعود:"أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُفَضِّل صلاةَ الجميع على صلاةِ الرجل وحده بخمس وعشرين صلاةً، كلها مثل صلاته".

رواه الإمام أحمد (4159) عن بهز (هو ابن أسد العمي) عن همام (وهو ابن يحيى العوذي) به مثله. ورواه الطبراني في الكبير (10099)، والأوسط (2618) من طريق همام به مثله.

قال ابن أبي حاتم في العلل (1/ 122): سألت أبي عن حديث رواه شعبة، عن قتادة، عن عُقبة بن وسَّاج، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تفضلُ صلاةُ الجميع على صلاة الرجل وحده" ورواه همام وسعيد بن بشير، عن قتادة، عن مورِّق العجلي، عن أبي الأحوص، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه أبان، عن قتادة، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

قلت لأبي: أيهما الأصح؟ قال: حديث شعبة لأنه أحفظ". انتهى.
وفي الباب عن عبد الله بن زيد وصُهيب وزيد بن ثابت ومعاذ بن جبل وابن عباس وابن عمر وأبي هريرة وأبي الدرداء وجابر وأبي سعيد الخدري. وغيرهم، وفي جميعها مقال.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: একাকী ব্যক্তির সালাতের চেয়ে জামাআতে (সকলের সাথে) সালাত আদায়ের ফযীলত পঁচিশ সালাতের সমান।









আল-জামি` আল-কামিল (2272)


2272 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده! لقد هممتُ أن آمر بحطَبٍ فيُحطَبَ، ثم آمر بالصلاة فيؤذَّن لها، ثم آمرَ رجلًا فيؤُمَّ الناس، ثم أخالفَ إلى رجال، فأحرِّق عليهم بيوتهم، والذي نفسي بيده! لو يعلم أحدكم أنه يجد عظْمًا سَمِينًا، أو مِرماتين حسنتين لشهد العشاء".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الجماعة (3) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الأذان (644) عن عبد الله بن يوسف قال: أخبرنا مالك به.

ورواه مسلم في المساجد (651) عن عمرو الناقد، حدثنا سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد به وزاد في أول الحديث:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقد ناسًا في بعض الصلوات"، فقال: فذكر الحديث.
ولم يذكر: المرماتين.

والمرماة: ما بين ظِلْفَي الشاة. قال أبو عبيد: لا أدري ما وجهُه، إِلَّا أنه هكذا يُفسر. وقال ابن الأعرابي: المِرماة: السهم الذي يُرمي به"شرح السنة" (3/ 345).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "শপথ তাঁর, যাঁর হাতে আমার জীবন! আমি সংকল্প করেছিলাম যে আমি জ্বালানি কাঠ প্রস্তুত করার নির্দেশ দেব, ফলে তা প্রস্তুত করা হবে, এরপর আমি সালাতের জন্য নির্দেশ দেব, ফলে তার জন্য আযান দেওয়া হবে, তারপর আমি এক ব্যক্তিকে নির্দেশ দেব, সে যেন লোকদের ইমামতি করে, এরপর আমি সেই সব লোকদের কাছে যাব এবং তাদের উপর তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দেব। শপথ তাঁর, যাঁর হাতে আমার জীবন! তোমাদের কেউ যদি জানত যে সে মোটা (মাংসযুক্ত) একটি হাড় পাবে, অথবা ভালো দু'টি মাংসল অংশ পাবে, তবে অবশ্যই সে এশার সালাতে উপস্থিত হত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2273)


2273 - عن أم الدّرداء تقول: دخل عليّ أبو الدّرداء وهو مُغَضَبٌ، فقلتُ: ما أغضبَك؟ فقال: والله! ما أعرف من أمة محمد صلى الله عليه وسلم شيئًا إِلَّا أنهم يُصَلُّون جميعًا.

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (650) عن عمر بن حفص، قال: حَدَّثَنَا أبيّ، قال: حَدَّثَنَا الأعمش، قال: سمعتُ سالمًا قال: سمعتُ أم الدّرداء، فذكرت مثله.

وسالم هو: ابن أبي الجعد. وأم الدّرداء: هي الصغرى التابعية، لا الكبرى الصّحابية، لأن الكبرى ماتت في حياة أبي الدّرداء، وعاشت الصغرى بعده زمانًا طويلًا.

وقد جزم أبو حاتم بأن سالم بن أبي الجعد لم يدرك أبا الدّرداء، فعلى هذا لم يدرك أمّ الدّرداء الكبرى. واسم الصغرى: هُجيمة، واسم الكبرى: خيرة.




উম্মু দারদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত অবস্থায় আমার নিকট প্রবেশ করলেন। আমি বললাম: আপনাকে কিসে রাগান্বিত করেছে? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের মধ্যে কোনো কিছুকেই চিনতে পারছি না, কেবল এই জিনিসটি ছাড়া যে তারা একসাথে (জামায়াতে) সালাত আদায় করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2274)


2274 - عن عبد الله بن مسعود أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لقوم يتخلفون عن الجمعة:"لقد هممتُ أن آمر رجلًا يُصلي بالناس، ثمّ أحرِّق على رجال يتخلَّفُون عن الجمعة بيوتهم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (652) من طريق أبي إسحاق، عن أبي الأحوض، سمعه منه، عن عبد الله بن مسعود فذكر مثله.

قال البيهقيّ (3/ 56):"والذي يدل عليه سائر الروايات أنه عبَّر بالجمعة عن الجماعة".




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেই লোকদের সম্পর্কে বললেন যারা জুমু‘আর সালাত থেকে পিছনে থাকত: "আমি সংকল্প করেছি যে, আমি একজনকে নির্দেশ দেব মানুষের সাথে সালাত আদায় করাতে, অতঃপর আমি সেই লোকদের বাড়িঘর জ্বালিয়ে দেব যারা জুমু‘আর সালাত থেকে পিছনে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2275)


2275 - عن عبد الله بن مسعود أنه قال: من سَرَّه أن يلقى الله غدًا مسلمًا فليحافظ على هؤلاء الصلوات حيث يُنَادَي بهن، فإن الله شرع لنبيكم سُنن الهُدى، وإنَّهن من سُنن الهُدى، ولو أنكم صلَّيتُم في بيوتكم كما يُصلِّي هذا المتخلف في بيته لتركتُم سنة نبيكم. ولو تركتُم سنة نبيكم لضللتُم. وما من رجل يتطهر فيُحسن الطُّهور، ثمّ يعمدُ إلى مسجد من هذه المساجد إِلَّا كتب الله له بكل خطوةً يخطوها حسنةً، ويرفعه بها درجةً، ويحطُّ عنه بها سيئةً. ولقد رأيتُنا وما يتخلف عنها إِلَّا منافق معلومُ النفاق، ولقد كان الرّجل يُؤتى به يهادى بين الرجلين حتَّى يُقامَ في الصفِّ.

صحيح: أخرجه مسلم في المساجد (654) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا الفضل بن دُكين، عن أبي العُميس، عن عليّ بن الأقمر، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن عبد الملك بن عمير، عن أبي الأحوص عنه قال:"لقد رأيتُنا وما يتخلف عن الصّلاة إِلَّا منافق، قد علم نفاقه. أو مريض. إن كان المريض ليمشي بين رجلين حتى يأتي الصّلاة، وقال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم علَّمَنا سننَ الهدى. وإن من سنن الهديّ، الصّلاةُ
المسجد الذي يؤذَّنُ فيه". انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি আগামীকাল (কিয়ামতের দিন) আল্লাহর সাথে মুসলিম হিসেবে সাক্ষাৎ করতে পছন্দ করে, সে যেন অবশ্যই এই সালাতগুলো যেখানে সেগুলোর জন্য ডাকা হয় (অর্থাৎ মসজিদে), সেখানে তা নিয়মিত আদায় করে। কারণ আল্লাহ তোমাদের নবীর জন্য হিদায়াতের পথ (সুনানুল হুদা) প্রণয়ন করেছেন, আর এ সালাতগুলো সেই হিদায়াতের পথসমূহের অন্তর্ভুক্ত। তোমরা যদি তোমাদের ঘরে এমনভাবে সালাত আদায় করো, যেভাবে এই অনুপস্থিত ব্যক্তিটি তার ঘরে সালাত আদায় করে, তাহলে তোমরা তোমাদের নবীর সুন্নাত পরিত্যাগ করলে। আর যদি তোমরা তোমাদের নবীর সুন্নাত পরিত্যাগ করো, তবে তোমরা পথভ্রষ্ট হয়ে যাবে। কোনো ব্যক্তি যখন ভালোভাবে পবিত্রতা অর্জন করে, অতঃপর এই মসজিদগুলোর মধ্যে কোনো একটি মসজিদের দিকে অগ্রসর হয়, তখন তার প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে আল্লাহ তার জন্য একটি নেকি লিপিবদ্ধ করেন, এর দ্বারা তার একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করেন এবং এর দ্বারা তার একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেন। আমি দেখেছি, সুস্পষ্ট মুনাফিক ছাড়া আর কেউ (জামাত থেকে) অনুপস্থিত থাকত না। এমনও দেখা যেত যে, অসুস্থ একজন লোককে দুইজন লোকের কাঁধের উপর ভর দিয়ে নিয়ে আসা হতো, যতক্ষণ না তাকে কাতারে দাঁড় করানো হতো।

(অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে হিদায়াতের পথসমূহ শিক্ষা দিয়েছেন। আর সেই হিদায়াতের পথসমূহের মধ্যে অন্যতম হলো— যে মসজিদে আযান দেওয়া হয়, সেখানে সালাত আদায় করা।)









আল-জামি` আল-কামিল (2276)


2276 - عن أبي الدّرداء قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من ثلاثة في قرية ولا بدو لا تقامُ فيهم الصّلاةُ إِلَّا قد استحوذ عليهم الشّيطان، فعليك بالجماعة، فإنما يأكل الذئبُ القاصيةَ".

حسن: رواه أبو داود (547)، والنسائي (848) كلاهما من طريق زائدة بن قدامة قال: حَدَّثَنَا السائب بن حبيش الكلاعيّ، عن معدان بن أبي طلحة اليعمري قال: قال لي أبو الدّرداء: أين مسكنك؟ قلت: في قرية دُوين حمص، فقال أبو الدّرداء: فذكر الحديث.

قال زائدة: قال السائب: يعني بالجماعة، الصّلاة في الجماعة، وأخرجه ابن خزيمة (1486)، والحاكم (1/ 246) كلاهما من طريق زائدة.

قال الحاكم: صحيح الإسناد. وقال النوويّ في"الخلاصة" (2261): رواه أبو داود والنسائي بإسناد صحيح.

قلت: رجاله ثقات غير السائب بن حبيش الكلاعي الحمصي فهو"حسن الحديث"، وثَّقه العجلي وابن حبان، وقال الدَّارقطنيّ: صالح الحديث.

وقد سبق التخريج بالتفصيل في باب تأكيد الأذان.

أخذ الإمام أحمد بهذه الأحاديث فقال بوجوب صلاة الجماعة إِلَّا أنه نص على أن الجماعة ليست شرطا لصحة الصّلاة، وذهب أبو حنيفة ومالك والشافعي إلى فضيلة صلاة الجماعة على صلاة الفذ.




আবুদ্দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “কোন গ্রাম বা মরুভূমিতে যদি তিনজন লোক থাকে এবং সেখানে সালাত প্রতিষ্ঠা না করা হয়, তবে শয়তান তাদের উপর প্রভাব বিস্তার করে নেয়। সুতরাং তোমরা জামাআতকে আঁকড়ে ধরো, কারণ, নেকড়ে কেবল দলছুট বা একা ছাগলকেই খায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (2277)


2277 - عن أبي هريرة قال: أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رجل أعمى فقال: يا رسول الله! إنه ليس لي قائد يقودُني إلى المسجد. فسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يرخص له فيُصلِّي في بيته. فرخَّص له. فلمّا ولَّى دعاه فقال:"هل تسمع النداء بالصلاة؟" فقال: نعم. قال:"فَأَجِبْ".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (653) من طريق مروان القراريّ، عن عبيد الله بن الأصمِّ، قال: حَدَّثَنَا يزيد بن الأصَمِّ، عن أبي هريرة فذكره.

وهذا الأعمى هو: ابن أم مكتوم كما جاء في الرواية الآتية.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক অন্ধ ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার এমন কোনো পথপ্রদর্শক (বা সাহায্যকারী) নেই, যে আমাকে মসজিদে নিয়ে যেতে পারে। সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আবেদন করল যে তিনি যেন তাকে বাড়িতে সালাত আদায় করার অনুমতি দেন। অতঃপর তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। যখন সে পিছু ফিরে চলে যাচ্ছিল, তখন তিনি তাকে ডেকে বললেন: "তুমি কি সালাতের জন্য আযান শুনতে পাও?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি তাতে সাড়া দাও (অর্থাৎ জামাতে উপস্থিত হও)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2278)


2278 - عن ابن أم مكتوم أنه سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني رجل ضرير البصر، شاسع الدار، ولي قائد لا يلائمني. فهل لي رخصةٌ أن أصلِّيَ في بيتي؟ . قال:"هل تسمع النداء؟" قال: نعم، قال:"لا أجد لك رخصة".

حسن: رواه أبو داود (552)، وابن ماجة (792) كلاهما من طريق عاصم بن بهدلة، عن أبي
رَزين، عن ابن أم مكتوم فذكره.

وإسناده حسن، وأبو رَزين هو: مسعود بن مالك الأسدي ثقة فاضل من رجال مسلم.

وعاصم بن بهدلة"صدوق له أوهام حجة في القراءة"، وحديثه في الصحيحين مقرون.

وهذا الحديث أخرجه أيضًا ابن خزيمة (1480)، والحاكم (1/ 247) من طريق عاصم به.

ورواه أيضًا أبو داود (553)، والنسائي (852) من طريق سفيان، عن عبد الرحمن بن عابس، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن ابن أم مكتوم قال: يا رسول الله! إن المدينة كثيرةُ الهوام والسِّباع، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أتسمع حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح؟ قال: نعم، قال:"فحيَّ هلا" ولم يرخص له.

قال أبو داود: وكذا رواه القاسم الجرميّ، عن سفيان. وليس في حديثه"حيَّ هلا". وإسناده صحيح.

وصحَّحه ابن خزيمة (1478) بعد أن رواه من طريق سفيان به مثله. ورواه أيضًا الحاكم (1/ 246 - 247) من طريق سفيان إِلَّا أنه أسقط"عبد الرحمن بن أبي ليلى" وقال: صحيح الإسناد إن كان ابن عابس سمع من ابن أم مكتوم.

قلت: لم أجد من نص على أن عبد الرحمن بن عابس سمع من ابن أم مكتوم.

ورواه أيضًا هو واللّفظ له، والإمام أحمد (15491) وابن خزيمة (1479) من طرق عن حصين بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن شداد، عن ابن أم مكتوم قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم استقل الناس في صلاة العشاء فقال:"لقد هممتُ أن آتي هؤلاء الذين يتخلفون عن هذه الصّلاة، فأحرق عليهم بيوتهم" فقام ابن أم مكتوم فقال: يا رسول الله! لقد علمت ما بي، وليس لي قائد، قال:"أتسمع الإقامة؟" قال: نعم، قال:"فاحضرها"، قال: يا رسول الله! إن بيني وبينها نخلًا وشجرًا. وليس لي قائد. قال:"أتسمع الإقامة؟ قال: نعم، قال:"فاحضرها" ولم يرخص له.

قال الحاكم: إسناده صحيح.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"من سمع النداء فلم يأته، فلا صلاة له إِلَّا من عذر".

فالصحيح أنه ضعيف أو موقوف.

رواه أبو داود (551)، وابن ماجة (793)، وابن حبان (2064)، والحاكم (1/ 245)، والبيهقي (3/ 57) كلّهم من طريق عدي بن ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وعن عدي بن ثابت طريقان:

الأوّلى: ما رواه أبو جناب، عن مغراء العبدي عنه. وأبو جناب هو يحيى بن أبي حية الكلبي ضعيف.

ومغراء العبدي تكلّم فيه الذّهبيّ وغيره.

والرّواية الثانية: ما رواه هشيم بن بشر، عن شعبة، عن عدي بن ثابت بإسناده.

وأكثر أصحاب شعبة أوقفوه على ابن عباس.
قال البخاريّ في"التاريخ الكبير" (1/ 233):"رفع بعضهم لا يصح".

وقد صحَّح وقفه الإمام أحمد والبيهقي وغيرهما.

انظر للمزيد:"المنة الكبري" (2/ 20 - 21) وذكرت فيه أيضًا حديث جابر بن عبد الله:"لا صلاة لجار المسجد إِلَّا في المسجد" وهو ضعيف أيضًا.

وفي الباب عن أبي موسى، وعلي بن أبي طالب وغيرهما، وكلها ضعيفة.

انظر: السنن الكبرى للبيهقي (3/




ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন অন্ধ ব্যক্তি, আমার ঘর অনেক দূরে, আর আমার একজন পথপ্রদর্শক আছে যে আমার জন্য উপযুক্ত নয় (বা আমাকে মানিয়ে নিতে পারে না)। এমতাবস্থায় আমার কি ঘরে সালাত আদায় করার অনুমতি আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি আযান শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি তোমার জন্য কোনো সুযোগ (রুখসাত) দেখছি না।

ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে যে, তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! মদীনা পোকামাকড় ও হিংস্র প্রাণীতে পরিপূর্ণ। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ, হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে দ্রুত আসো (সালাতে)। তিনি তাকে অনুমতি দেননি।

ইবনে উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অপর একটি বর্ণনায় আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাতে (উপস্থিত) মানুষের সংখ্যা কম দেখে বললেন: আমার মন চাচ্ছে যে যারা এই সালাত থেকে পিছিয়ে থাকে, তাদের কাছে গিয়ে তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দিই। তখন ইবনে উম্মে মাকতুম দাঁড়িয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো আমার অবস্থা জানেন, আমার কোনো পথপ্রদর্শকও নেই। তিনি বললেন: তুমি কি ইকামাত (তাকবীর) শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে সালাতে উপস্থিত হও। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ও মসজিদের মাঝে খেজুর গাছ ও অন্যান্য গাছপালা আছে, আর আমার কোনো পথপ্রদর্শকও নেই। তিনি বললেন: তুমি কি ইকামাত শুনতে পাও? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে সালাতে উপস্থিত হও। তিনি তাকে অনুমতি দেননি।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে বর্ণিত হয়েছে যে, “যে ব্যক্তি আযান শুনল, অতঃপর কোনো ওজর ছাড়া তাতে (জামাতে) উপস্থিত হলো না, তার সালাত হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (2279)


2279 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مروا أولادكم بالصلاة وهم أبناء سبع سنين، واضربوا عليها وهم أبناء عشر سنين، وفرقوا بينهم في المضاجع".

حسن: رواه أبو داود (495) عن مؤمل بن هشام - يعني اليشكري - حَدَّثَنَا إسماعيل، عن سوار أبي حمزة، قال أبو داود: وهو سوار بن داود أبو حمزة المزني الصيرفيّ، عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

قال أبو داود: وحدثنا زهير بن حرب، حَدَّثَنَا وكيع، حَدَّثَنِي داود بن سوَّار المزنيّ، بإسناده ومعناه، وزاد:"وإذا زوَّج أحدكم خادمَه عبده، أو أجيره فلا ينظر إلى ما دون السرة وفوق الركبة".

قال أبو داود:"وهم وكيع في اسمه، وروى عنه أبو داود الطيالسي هذا الحديث فقال: حَدَّثَنَا أبو حمزة سوار الصيرفي" انتهى.

قلت: وكذا نص على ذلك الإمام أحمد في مسنده (6689) بعد أن روى الحديث عن وكيع قال: حَدَّثَنَا داود بن سوَّار، قال عبد الله بن أحمد: قال أبي: وقال الطُفاوي محمد بن عبد الرحمن في هذا الحديث: سوَّار أبو حمزة، وأخطأ فيه. انتهى.

قلت: قوله: أخطأ فيه أي وكيع، لأن الإمام أحمد قال:"سوَّار أبو حمزة لا بأس به، روى عنه وكيع فقلَّب اسمه". انتهى.

وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 197) من طريق سَوَّار به مثله.

ونقل عن إسحاق بن راهويه قال:"إذا كان الراوي عن عمرو بن شعيب ثقة فهو كأيوب عن نافع، عن ابن عمر".

قلت: وهو كما قال فقد احتج الأَئمة بحديث عمرو بن شعيب عن أبيه جده كالبخاريّ وأحمد وابن المديني وغيرهم، وقال ابن معين: عمرو بن شعيب ثقة.

ولكن خلاصة القول فيه أنه حسن الحديث. وهو رأي النوويّ وغيره من الأئمة.

وأمّا سوَّار بتشديد الواو، وآخره راء وهو ابن داود المزني أبو حمزة الصيرفي البصري هو أيضًا
حسن الحديث، وقد حسَّن النوويّ إسناده في"المجموع" (3/ 10).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের সন্তানদেরকে সালাতের আদেশ দাও যখন তাদের বয়স সাত বছর হবে, এবং তার জন্য (সালাত আদায় না করলে) তাদেরকে প্রহার করো যখন তাদের বয়স দশ বছর হবে, আর তাদেরকে তাদের বিছানায় পৃথক করে দাও।"

[অতিরিক্ত অংশ:] যখন তোমাদের কেউ তার খাদেমকে তার দাস অথবা তার মজুরের সাথে বিবাহ দেয়, তখন সে যেন নাভির নিচের এবং হাঁটুর উপরের অংশের দিকে দৃষ্টি না দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2280)


2280 - عن سبرة الجهني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مروا الصبيَّ بالصلاة إذا بلغ سبع سنين، وإذا بلغ عشر سنين فاضربوه عليها".

حسن: رواه أبو داود (494)، والتِّرمذيّ (407) كلاهما من طريق عبد الملك بن الربيع بن سَبْرَةَ، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح، وَسَبْرَةُ هو: أبن معبد الجهنيّ، ويقال: هو ابن عوسجة".

وقال النوويّ في"المجموع" (3/ 10): حديث سبرة صحيح، رواه أبو داود والتِّرمذيّ وغيرهما بأسانيد صحيحة. قال الترمذيّ:"حسن". انتهى. كذا نقل عن الترمذيّ قوله:"حسن" والنسخة التي لدينا:"حسن صحيح".

قلت: الصَّواب أن الحديث حسن، لأجل عبد الملك بن الربيع بن سَبْرَة فقد وثَّقه العجليّ، وضَعَّفه ابن معين، وقال الذّهبيّ: صدوق إن شاء الله تعالى. ومن طريقه رواه ابن خزيمة في صحيحه (1002)، والحاكم (1/ 258) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

إِلَّا أن مسلمًا لم يحتج به وإنما أخرج له حديثًا واحدًا في المتعة متابعة. والحاكم لا يُفرّق بين الأصول والمتابعة.




সাবরা আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের সন্তানদের সালাতের নির্দেশ দাও যখন তারা সাত বছর বয়সে পৌঁছবে। আর যখন তারা দশ বছর বয়সে পৌঁছবে, তখন সালাতের (জন্য) তাদের প্রহার করো।"