আল-জামি` আল-কামিল
2281 - عن جابر بن يزيد بن الأسود الخزاعيّ، عن أبيه، قال: شهدت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حجته، فصليت معه صلاة الصبح في مسجد الخيف، قال: فلمّا قضى صلاته وانحرف إذا هو برجلين في أخرى القوم لم يصليا معه، فقال:"عليَّ بهما" فجيء بهما ترعد فرائصهما فقال:"ما منعكما أن تصليا معنا؟" فقالا: يا رسول الله! إنا كنا قد صلينا في رحالنا. قال:"فلا تفعلا، إذا صليتما في رحالكما، ثمّ أتيتما مسجد جماعة، فصليا معهم؛ فإنها لكما نافلة".
صحيح: رواه أبو داود (575)، والتِّرمذيّ (219)، والنسائي (858) كلّهم من طرق عن يعلى بن عطاء، عن جابر بن يزيد به مثله.
قال الترمذيّ: حسن صحيح، وأقره النوويّ في"الخلاصة" (2306).
وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1279)، وابن حبان (1565، 2395) فروياه عن طريق يعلى بن عطاء، ونقل الحافظ في التلخيص (2/ 29) تصحيحه عن ابن السكن ثمّ قال: قال الشافعي في القديم: إسناده مجهول.
قال البيهقيّ: لأن يزيد بن الأسود ليس له راو غير ابنه، وهو جابر، ولا لابنه راو غير يعلى.
إِلَّا أن الحافظ استبعد هذا الطعن فقال: يعلى بن عطاء من رجال مسلم، وجابر وثَّقه النسائيّ وغيره، وقد وجدنا جابر بن يزيد راويا غير يعلى، أخرجه ابن مندة في"المعرفة" من طريق بقية، عن إبراهيم بن ذي حماية، عن عبد الملك بن عمير، عن جابر. انتهى.
قلت: بقية هو ابن الوليد، المعروف بالتدليس، إِلَّا أنه صرَّح بالسماع في رواية الدَّارقطنيّ (1/ 412) عن إبراهيم. ثمّ تواتر هذا الحديث عن يعلى بن عطاء.
قال الحاكم: روى عنه شعبة، وهشام بن حسان، وغيلان بن جامع، وأبو خالد الدَّالانيّ، وأبو عوانة، وعبد الملك بن عمير، ومبارك بن فضالة، وشريك بن عبد الله، وغيرهم، واحتج مسلم بيعلى بن عطاء. انتهى.
ويبدو من هذا أن عبد الملك بن عُمير روي مرة عن جابر مباشرة، ومرة عن يعلى بن عطاء، عن جابر، وعبد الملك هذا رُمي بالاختلاط لكبر سنِّهِ، لأنه عاش مائة وثلاث سنين، وأخرج له الشيخان من رواية القدماء عنه في الاحتجاج، ومن رواية بعض المتأخرين عنه في المتابعات.
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (2/ 90).
ইয়াযিদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর হজ্জে উপস্থিত ছিলাম। আমি তাঁর সাথে মসজিদে খাইফে ফজরের সালাত আদায় করলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত শেষ করলেন এবং ফিরলেন, তখন তিনি দেখলেন যে, দুজন লোক জামা‘আতের একদম পিছনে বসে আছে, তারা তাঁর সাথে সালাত পড়েনি। তিনি বললেন: “তাদেরকে আমার কাছে নিয়ে আসো।” তখন তাদেরকে আনা হলো, তাদের কাঁধের জোড়াগুলো ভয়ে কাঁপছিল। তিনি বললেন: “তোমরা কেন আমাদের সাথে সালাত আদায় করোনি?” তারা বলল: হে আল্লাহর রসূল! আমরা আমাদের আস্তানায় (বাসস্থানে) সালাত আদায় করে ফেলেছি। তিনি বললেন: “তোমরা এমন করো না। যখন তোমরা তোমাদের আস্তানায় সালাত আদায় করে নেবে, অতঃপর কোনো জামা‘আতের মসজিদে আসবে, তখন তাদের সাথেও সালাত আদায় করবে। কারণ এটি তোমাদের জন্য নফল (অতিরিক্ত) হবে।”
2282 - عن بُسْر بن مِجْجَنٍ، عن أبيه أنه كان في مجلس مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأُذِّن بالصلاة، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فصَلَّى. ثمّ رجع، ومِحْجَن في مجلسه لم يُصَلِّ معه. فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"ما منعك أن تُصَلِّي مع الناس؟ ألستَ برجل مسلم؟" فقال: بلى يا رسول الله! ولكني قد صَلَّيْتُ في أهلي، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا جئتَ فصَلِّ مع الناس، وإن كنت قد صَلَّيْت".
صحيح: رواه مالك في صلاة الجماعة (8) عن زيد بن أسلم، عن رجل من بني الدِيل يقال له: بُسْر بن محجَن فذكره.
ورواه النسائيّ (857) عن قُتَيبة، عن مالك به. وصحّحه الحاكم (1/ 244) بعد أن أخرجه من طريق مالك، وحسَّنه البغوي في شرح السنة (3/ 430).
وبُسر: بضم الموحدة، وسكون المهملة. كذا قال مالك في روايته عن زيد بن أسلم. وقال الثوري عن زيد بن أسلم: بِشر - بكسر الموحدة والشين المعجمة. والصواب ما قاله مالك. نص على ذلك أبو نعيم وابن عبد البر وابن حبان، وهكذا رواه الإمام أحمد في مسنده (16393 - 16395)، وهو تابعي مشهور، جزم بذلك البخاريّ وغيره.
মিহজান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে এক মজলিসে ছিলেন। এমতাবস্থায় সালাতের আযান দেওয়া হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন, আর মিহজান তখনও তার স্থানে বসে ছিলেন এবং তাঁর সাথে সালাত আদায় করেননি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার সালাতে শামিল না হওয়ার কারণ কী? তুমি কি একজন মুসলিম নও?" তিনি বললেন: "অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল! কিন্তু আমি ইতিপূর্বে আমার পরিবারের সাথে সালাত আদায় করে এসেছি।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে বললেন: "যখন তুমি (এরূপ স্থানে) আসবে, তখন মানুষের সাথে সালাত আদায় করো, যদিও তুমি ইতিপূর্বে সালাত আদায় করে এসেছো।"
2283 - عن سليمان بن يسار - يعني مولى ميمونة - قال: أتيتُ ابن عمر على البلاط وهم يصلون، فقلت: ألا تُصَلِّي معهم؟ قال: قد صلَّيْتُ، إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم
يقول:"لا تُصَلُّوا صلاةً في يوم مرتين".
حسن: رواه أبو داود (579)، والنسائي (860) كلاهما من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شُعيب، عن سليمان بن يسار فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل عمرو بن شعيب.
وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (1641)، وابن حبان (2396) من طريق حسين - وهو ابن ذكوان المعلم به، وقد صرَّح عمرو بن شعيب سماع هذا الحديث من سليمان بن يسار، رواه الإمام أحمد (4689) عن يحيى بن سعيد، عن حسين المعلم به.
قال ابن حبان: عمرو بن شعيب في نفسه ثقة يحتج بخبره إذا روى عن غير أبيه، فأما روايته عن أبيه، عن جده فلا تخلو من انقطاع وإرسال فيه، فلذلك لم نحتجَّ بشيء منه. انتهى.
وفيما قال في روايته عن أبيه، عن جده نظر، قال البخاريّ رحمه الله تعالى: رأيت أحمد بن حنبل وعلي بن المديني وإسحاق بن راهويه وأبا عبيد وعامة أصحابنا يحتجون بحديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. ما تركه أحد من المسلمين. قال البخاريّ: فمن الناس بعدهم؟" انتهى.
وأمّا معنى الحديث فقال ابن عبد البر في"الاستذكار" (5/ 357 - 358):"اتفق أحمد بن حنبل وإسحاق بن راهويه على أن معنى قول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تصلوا صلاة في يوم مرتين" أن ذلك أن يصلي الرّجلُ صلاة مكتوبةً عليه، ثمّ يقوم بعد الفراغ منها فيعيدها على جهة الفرض أيضًا. وأمّا من صلَّى الثانية مع الجماعة على أنها له نافلة اقتداء برسول الله صلى الله عليه وسلم في أمره بذلك، وقوله صلى الله عليه وسلم للذين أمرهم بإعادة الصّلاة في جماعة:"إنها لكم نافلة" فليس ذلك ممن أعاد الصّلاة في يوم مرتين، لأن الأوّلى فريضة، والثانية نافلة".
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (2/ 96).
আবদুল্লাহ ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুলাইমান ইবনু ইয়াসার— যিনি মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্তদাস ছিলেন— তিনি বলেন: আমি ইবনু ওমরের কাছে 'আল-বালাত' নামক স্থানে গেলাম, যখন লোকেরা সালাত আদায় করছিল। আমি বললাম: আপনি কি তাদের সাথে সালাত আদায় করবেন না? তিনি বললেন: আমি সালাত আদায় করে নিয়েছি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একদিনে তোমরা একই সালাত দুইবার আদায় করো না।"
2284 - عن عثمان بن عفّان قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من توضَّأ للصَّلاة فأسبغ الوضوء، ثمّ مشى إلى الصّلاة المكتوبة، فصلاها مع الناس، أو مع الجماعة، أو في المسجد غفر الله له ذنوبه".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (232: 13) من طرق عن عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، أنَّ الحكم بن عبد الله القرشي حدَّثه، أنَّ نافع بن جبير وعبد الله بن أبي سلمة حدَّثاه أنَّ معاذ بن عبد الرحمن حدثهما عن حمران مولى عثمان بن عفّان، عن عثمان، فذكره.
وانفرد مسلم بهذا اللّفظ، وقد مضى حديث عثمان في الطهارة.
উসমান ইবনে আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি সালাতের জন্য উত্তমরূপে ওযু করে, এরপর ফরয সালাতের দিকে হেঁটে যায়, অতঃপর সে মানুষের সাথে, অথবা জামা‘আতের সাথে, অথবা মসজিদে তা আদায় করে, আল্লাহ তা‘আলা তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেন।"
2285 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: جاء رجل وقد صَلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:
"أيكم يتجر على هذا؟" فقام رجل فصلى معه.
وفي رواية:"ألا من يتصدق على هذا فيصلي معه".
وفي رواية: فتصدق عليه أبو بكر فصلى معه.
حسن: رواه أبو داود (574)، والتِّرمذيّ (220) واللّفظ له، كلاهما من طريق سليمان الأسود الناجي البصريّ، عن أبي المتوكل، عن أبي سعيد فذكر مثله.
قال الترمذيّ: حديث حسن وهو قول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم من التابعين قالوا: لا بأس أن يصلي القوم جماعة في مسجد قد صلَّى فيه جماعةٌ، وبه يقول أحمد وإسحاق، وقال آخرون من أهل العلم: يصلون فرادى. وبه يقول سفيان وابن المبارك ومالك والشافعيّ، يختارون الصّلاة فرادى، وسليمان الناجي بصريّ، ويقال: سليمان بن الأسود، وأبو المتوكل اسمه"عليّ بن داود" انتهى قول الترمذيّ.
والحديث حسن كما قال الترمذيّ، فإن سليمان بن الأسود الناجي"صدوق" وثَّقه ابن معين وابن حبان. وأبو المتوكل المشهور بكنيته أيضًا الناجي واسمه: عليّ بن داود ويقال: ابن دُؤاد - بضم الدال، تابعي ثقة.
والحديث أخرجه ابن خزيمة (1632)، وابن حبان (11019)، والحاكم (1/ 209) وقال: صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه. وسليمان الأسود هذا هو: سليمان بن سُحيم قد احتج مسلم به وبأبي المتوكل. وهذا الحديث أصل في إقامة الجماعة في المساجد مرتين. انتهى.
وسليمان، ليس هو ابن سُحيم أبو أيوب المدني الذي روى له مسلم، وإنما هو سليمان الأسود الناجي من رجال أبي داود والتِّرمذيّ.
وأورده الحافظ الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2185) وعزاه إلى أحمد وهذا لفظه: عن أبي سعيد الخدريّ قال: صلى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بأصحابه الظهر. قال: فدخل رجل من أصحابه فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما حسبك يا فلان عن الصّلاة؟" قال: فذكر شيئًا اعتل به، قال: فقام يُصَلِّي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا رجل يتصدق على هذا فيصلي معه" فقام رجل فصلى معه.
قال الهيثميّ: رواه أحمد، وروى أبو داود والتِّرمذيّ بعضه، ورجاله رجال الصَّحيح. انتهى.
قلت: رواه الإمام أحمد (11808) عن عليّ بن عاصم، أخبرنا سليمان الناجي به بهذا اللّفظ كما رواه أيضًا عن محمد بن أبي عديّ، عن سعيد - يعني ابن أبي عروبة (11019) وعن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا سعيد (11408) وعن عفّان، حَدَّثَنَا وهيب (11613) كل هؤلاء - أعني عليّ بن عاصم وسعيد بن أبي عروبة ووهيب وهو ابن خالد الباهلي. رووه عن سليمان الأسود، وقد سبق أن بينا أنه ليس من رجال مسلم. كما فيه أيضًا عليّ بن عاصم لم يرو عنه شيخان شيئًا. وفي حديثه من الزيادة وهي قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما حبسك يا فلان عن الصّلاة"؟ فقال: … فإنه لم يتابع عليها.
وعلي بن عاصم الواسطي التميمي مولاهم قال فيه عليّ بن المديني: كان كثير الغلط، وقال العقيلي: نعرفه بالكذب، وقال البخاريّ: ليس بالقويّ، ووثَّقه العجلي.
وأمّا الرّجل الذي صلى معه فهو أبو بكر الصديق كما رواه ابن أبي شيبة (2/ 277) مرسلًا عن الحسن.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি এলো যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করে ফেলেছিলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের মধ্যে কে আছে যে এর সাথে ব্যবসায় অংশ নেবে?" তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে তার সাথে সালাত আদায় করল।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "কেউ কি নেই যে এর উপর সদকা করবে এবং তার সাথে সালাত আদায় করবে?"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তখন আবু বকর তার উপর সদকা করলেন এবং তার সাথে সালাত আদায় করলেন।
2286 - عن أنس أن رجلًا جاء، وقد صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام يُصَلِّي وحده، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يتجر على هذا فليصل معه".
حسن: رواه الدَّارقطنيّ (1/ 276) عن يحيى بن محمد بن صاعد، ثنا عمر بن محمد بن الحسن الأسديّ، ثنا أبيّ، نا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس فذكره.
ورواه الطبرانيّ في الأوسط (7282) من طريق عمر بن محمد بن الحسن به مثله.
وأبدى الحافظ الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2184) احتمالًا إن كان محمد بن الحسن هو ابن زبالة فهو ضعيف.
قلت: يزيل هذا الإشكال لما في رواية الدَّارقطنيّ بأنه الأسدي وهو وأبوه صدوقان. ولذا قال الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 58): سنده قوي.
قلت: وهو شاهد قوي لحديث أبي سعيد.
وقد ثبت عن أنس أنه أعاد صلاة الجماعة في المسجد، عن الجعد أبي عثمان اليشكري قال: صلينا الغداة في مسجد بني رفاعة. وجلسنا فجاء أنس بن مالك في نحو من عشرين من فتيانه فقال: أصليم؟ قلنا: نعم، فأمر بعض فتيانه فأذَّن، وأقام، ثمّ تقدّم فصلَّى بهم.
رواه أبو يعلى (4338 بتحقيق الأثري) عن أبي الربيع الزهرانيّ، حَدَّثَنَا حمّاد، عن الجعد أبي عثمان فذكره، ورواه البيهقيّ (3/ 70) من طريق الحميديّ، ثنا أبو عبد الصمد العميّ، ثنا الجعد به واللّفظ له، وإسناده صحيح، وعلَّقه البخاريّ. انظر"الفتح" (2/ 131).
وفي الباب أحاديث أخرى وهي لا تخلو من مقال.
منها: حديث أبي أمامة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يصلي فقال: ألا رجلٌ يتصدق على هذا، يُصلي معه" فقام رجل، فصلى معه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذان جماعة" رواه أحمد (22189) وأبو يعلى"إتحاف الخيرة" (1746)، والطَّبرانيّ في الكبير (7857) كلّهم من طريق ابن المبارك، حَدَّثَنَا يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن زَحْر، عن عليّ بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.
وعبيد الله بن زَحْر - بفتح الزاي وسكون المهملة، الضمري مولاهم الإفريقيّ، قال عثمان الدَّارميّ: كل حديثه عندي ضعيف.
وقال ابن عدي: يقع في أحاديثه ما لا يتابع عليه، وقال ابن حبان: يَروي الموضوعات عن الأثبات. وضعَّفه الدَّارقطنيّ. ولكن نقل الترمذيّ عن البخاريّ في العلل أنه وثَّقه. وقال النسائيّ: ليس به بأس.
وقال الذّهبيّ في المغني (3922): المختلف فيه، وهو إلى الضعف أقرب، ضعَّفه أحمد بن حنبل، وقال النسائيّ: لا بأس به" انتهى.
وفيه أيضًا شيخه عليّ بن يزيد وهو: ابن أبي زياد الألهاني صاحب القاسم بن عبد الرحمن قال فيه الدَّارقطنيّ: متروك، وقال أبو أحمد الحاكم: ذاهب الحديث. وقال النسائيّ: ليس بثقة، وأطلق عليه الحافظ كلمة:"ضعيف".
ولذا قال البوصيري في الاتحاف:"هذا إسناد ضعيف، قال ابن معين: عليّ بن يزيد الألهاني عن القاسم، وعنه عبيد الله هي ضعفاء كلها".
ومنها حديث عصمة بن مالك قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قد صلَّى الظهر، وقعد في المسجد، إذ دخل رجل يُصَلِّي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا رجل يقوم فيتصدق على هذا فيُصَلِّي معه؟" رواه الدَّارقطنيّ (1/ 277) من طريق الفضل بن المختار، عن عبيد الله بن موهب، عن عصمة بن مالك فذكره.
قال الزيلعي في"نصب الراية" (3/ 58):"وهو ضعيف بالفضل بن المختار، قال ابن عدي: الفضل بن المختار أحاديثه منكرة، وقال أبو حاتم الرازي: هو مجهول، وأحاديثه منكرة يحدث بالأباطيل، قاله ابن الجوزي في التحقيق". انتهى.
ومنها حديث سلمان أن رجلًا دخل المسجد، والنبي صلى الله عليه وسلم قد صَلَّى. فقال:"ألا رجل يتصدق على هذا فيُصَلِّي معه" رواه الطبرانيّ في الكبير، وفيه محمد بن عبد الملك أبو جابر قال أبو حاتم: أدركه وليس بالقوي في الحديث. ورواه البزّار وفيه الحسن بن الحسن الأشقر وهو ضعيف جدًّا، وقد وثَّقه ابن حبان. انتهى. انظر"مجمع" الزوائد" (2182).
وبهذا قال جماعة من الصّحابة منهم ابن مسعود، وجماعة من التابعين وغيرهم، وهو مذهب الإمام أحمد بأنه لا يكره إعادة الجماعة في المسجد إذا صلى إمام الحي وحضر جماعة أخرى، وأمّا في مساجد الأسواق والممرات فلا خلاف في إعادة الجماعة فيها.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আগমন করল যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করে ফেলেছিলেন। অতঃপর সে একাকী সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়াল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কে এই ব্যক্তির প্রতি অনুগ্রহ করবে যে তার সাথে সালাত আদায় করবে?"
2287 - عن أبي هريرة قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: ليس صلاة أثقلَ على المنافقين من الفجر والعشاء، ولو يعلمون ما فيهما لأتوهما ولو حَبْوًا، لقد هممتُ أن آمر المؤذِّن فيقيمَ، ثمّ آمر رجلًا يؤمَّ الناس، ثمّ آخد شًعلًا من نار فأُحَرِّق على من لا يخرجُ إلى الصّلاة بعدُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (657)، ومسلم في المساجد (651/ 252) كلاهما من طريق الأعمش، قال: حَدَّثَنِي أبو صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، واللّفظ للبخاريّ، وفي لفظ مسلم، ثمّ أنطلق مَعِي برجال معهم حُزَم من حَطَبٍ إلى قوم لا يشهدون الصّلاة، فأحرق
عليهم بيوتهم بالنار".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মুনাফিকদের উপর ফজর ও ইশার সালাতের চেয়ে অধিক ভারী কোনো সালাত নেই। তারা যদি জানত এই দুই সালাতে কী (পুণ্য) আছে, তবে হামাগুড়ি দিয়ে হলেও তারা তাতে আসত। আমি সংকল্প করেছিলাম যে, মুয়াজ্জিনকে ইকামত দিতে বলব, এরপর অন্য এক ব্যক্তিকে লোকদের ইমামতি করতে নির্দেশ দেব, অতঃপর যারা এখনো সালাতে বের হয়নি, তাদের উপর আগুনের মশাল নিয়ে তাদের ঘরগুলো জ্বালিয়ে দেব।
2288 - عن عبد الرحمن بن أبي عمرةَ قال: دخل عثمان بن عفَّان المسجد بعد صلاة المغرب، فقعد وحده، فقعدتُ إليه، فقال: يا ابن أخي! سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلَّى العشاء في جماعة فكأنما قام نصفَ الليل. ومن صلَّى الصبحَ في جماعة فكأنما صلى كلَّه".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (656) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا المغيرة بن سلمة المخزوميّ، حَدَّثَنَا عبد الواحد (وهو ابن زياد) حَدَّثَنَا عثمان بن حكيم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن أبي عمرة فذكره، وفي رواية أبي داود (555)، والتِّرمذيّ (221) من طريق عثمان بن حكيم به بلفظ:"من شهد العشاءَ في جماعة كان له قيامُ نصفِ ليلةٍ، ومن صَلَّى العِشاءَ والفجرَ في جماعة كان له كقيام ليلةٍ، قال الترمذيّ: حسن صحيح.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (আব্দুর রহমান ইবনে আবি উমরাহ বলেন) তিনি মাগরিবের সালাতের পর মসজিদে প্রবেশ করে একাকী বসলেন। আমি তাঁর কাছে বসলে তিনি বললেন, হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জামা‘আতের সাথে ইশার সালাত আদায় করল, সে যেন অর্ধ রাত দাঁড়িয়ে (ইবাদতে) রইল। আর যে ব্যক্তি জামা‘আতের সাথে ফজরের সালাত আদায় করল, সে যেন পূর্ণ রাত দাঁড়িয়ে (ইবাদতে) রইল।"
2289 - عن جندب بن عبد الله يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى الصُبح فهو في ذمة الله، فلا يَطلبَنَّكم الله من ذِمَّته بشيء فيدركَه فيكبَّه في نار جهنّم".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (157) عن نصر بن عليّ الجهضميّ، حَدَّثَنَا بشر (يعني ابن مفضَّل) عن خالد، عن أنس بن سيرين قال: سمعتُ جندبَ بن عبد الله يقول فذكره. ورواه أيضًا عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، عن داود بن أبي هند، عن الحسن، عن جندب بن سفيان، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بهذا ولم يذكر:"فيكبه في نار جهنّم".
ومن هذا الوجه رواه الترمذيّ (222) فقال: حَدَّثَنَا محمد بن بشار، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون به مثله، وقال:"حسن صحيح".
ولا يضر رواية أبي داود الطيالسي (980) عن شعبة، عن أنس بن سيرين موقوفًا فإنه قال: وروى هذا الحديثَ بشرُ بن المفضَّل، عن خالد الحذاء، عن أنس بن سيرين، عن جندب، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. فلعل أنس بن سيرين روي على وجهين. ويكون المرفوع هو الوجه الأخير، وهو الذي اختاره مسلم فرواه من حديث بشر بن المفضَّل.
وجندب هو: ابن عبد الله بن سفيان البجليّ، وربما نسب إلى جده.
জুনদুব ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি ফজরের সালাত আদায় করল, সে আল্লাহর জিম্মায় (নিরাপত্তায়) রইল। সুতরাং আল্লাহ যেন তোমাদেরকে তাঁর জিম্মা সংক্রান্ত কোনো বিষয়ে তলব না করেন, যার ফলে তিনি তাকে পাকড়াও করে জাহান্নামের আগুনে উপুড় করে নিক্ষেপ করেন।”
2290 - عن سمرة بن جندب عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: من صلى صلاة الغداة فهو في ذمة الله، فلا تخفروا الله في ذمته.
صحيح: رواه ابن ماجة (3946)، وأحمد (20113) واللّفظ له، كلاهما من حديث روح بن عبادة، حَدَّثَنَا أشعث (هو ابن عبد الملك الحمرانيّ، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا المنذري في الترغيب (613).
والطريقان محفوظان فإن الحسن البصري ممع جندب بن عبد الله بن سفيان كما سمع من سمرة بن جندب، وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صلي الصبح فهو في ذمة الله، فلا يتبعنكم الله بشيء من ذمته".
رواه الترمذيّ (2164) عن بندار، حَدَّثَنَا معدي بن سليمان، حَدَّثَنَا ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
وبهذا الإسناد رواه أيضًا ابن ماجة كما ذكره المزي في تحفة الأشراف (10/ 250)، ولم أجده في النسخ المطبوعة.
وإسناده ضعيف من أجل معدي بن سليمان وهو ضعيف، ضعَّفه أبو زرعة، والنسائيّ، وقال ابن حبان:"يروي المقلوبات عن الثّقات، والملزقات عن الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد.
وأمّا الترمذيّ فقال: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".
وفي معناه أيضًا ما رُوي عن أبي بكر الصديق قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى الصبح فهو في ذمة الله. فلا تخفروا الله في عهده فمن قتله طلبه الله حتَّى يكبه في النّار على وجهه".
رواه ابن ماجة (3945) عن عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصيّ، حَدَّثَنَا أحمد بن خالد الوهبيّ، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الواحد بن أبي عون، عن سعد بن إبراهيم، عن حابس اليمانيّ، عن أبي بكر الصديق فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل الانقطاع؛ فإن سعد بن إبراهيم لم يدرك حابس بن سعد.
وأمّا حابس اليماني وهو حابس بن سعد، ويقال: ابن ربيعة بن منذر بن سعد الطائيّ، فهو مختلف في صحبته، فذكره ابن سعد في تسمية من نزل الشام من الصّحابة. وقال البخاريّ:"أدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم".
وهذا الذي رجَّحه ابن حجر في"التهذيب" بعد ذكر أقوال أهل العلم الأخرى في إثبات صحبته.
وأمّا قول الدَّارقطنيّ:"إنه مجهول متروك" فيبدو أنه لم يقف على قول ابن سعد والبخاري وغيرهما ممن سبقوه.
والخلاصة فيه: أن هذا الحديث صحيح من حديث جندب بن عبد الله، وسمرة بن جندب، وأمّا حديث أبي بكر الصديق فلا، من أجل الانقطاع.
وفي معناه روي أيضًا عن عبد الله بن عمر، وأنس بن مالك، وطارق بن أشيم، وفي أسانيدها مقال.
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি ফজরের সালাত আদায় করে, সে আল্লাহর জিম্মায় (নিরাপত্তায়) থাকে। সুতরাং তোমরা আল্লাহর জিম্মা ভঙ্গ করো না।
2291 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يتعاقبون فيكم ملائكة بالليل وملائكة بالنهار. ويجتمعون في صلاة العصر، وصلاة الفجر. ثمّ يَعْرُج الذين باتوا فيكم. فيسألُهم وهو أعلم بهم: كيف تركتم عبادي؟ فيقولون: تركناهم وهم يصلون، وأتيناهم وهم يُصلون".
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصّلاة (82) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر مثله.
ورواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (555) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (632) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে একদল ফেরেশতা রাতে এবং আরেক দল দিনে পালাক্রমে আগমন করে। তারা আসরের সালাত ও ফজরের সালাতের সময় একত্র হয়। অতঃপর যারা তোমাদের মাঝে রাত কাটিয়েছে, তারা উপরে আরোহণ করে। তখন আল্লাহ্ তাদেরকে জিজ্ঞেস করেন—যদিও তিনি তাদের সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত—তোমরা আমার বান্দাদেরকে কোন অবস্থায় ছেড়ে এসেছো? তারা উত্তর দেয়: আমরা যখন তাদের ছেড়ে এসেছি, তখনও তারা সালাত আদায় করছিল এবং যখন তাদের কাছে গিয়েছিলাম, তখনও তারা সালাত আদায় করছিল।"
2292 - عن جرير بن عبد الله يقول: كنا جلوسًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ نظر إلى القمر ليلة البدْر، فقال:"أما إنكم سترون ربّكم كما ترون هذا القمر. لا تُضامُّون في رؤيته. فإن استطعتم أن لا تُغلبوا على صلاة قبل طلوع الشّمس وقبل غروبها" يعني العصر والفجر. ثمّ قرأ جرير: {وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا} [طه: 130].
متفق عليه: رواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (554)، ومسلم في المساجد (633) كلاهما من حديث مروان بن معاوية الفزاريّ، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، حَدَّثَنَا قيس بن أبي حازم، قال: سمعت جرير بن عبد الله فذكر مثله.
وقوله:"لا تُضامُّون" - بضم أوله وتشديد الميم - أي لا ينضم بعضكم إلى بعض، ولا يقول: أرنيه. بل كل ينفرد برؤيته.
وقوله:"فإن استطعم" - شرط، وجزاؤه ساقط وتقديره: فافعلوا.
وفي رواية عند مسلم:"أما إنكم ستعرضون على ربّكم فترونه كما ترون هذا القمر" رواه عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عبد الله بن نمير وأبو أسامة ووكيع بهذا الإسناد. وقال: ثمّ قرأ. ولم يقل: جرير. انتهى.
وقوله:"فترونه كما ترون هذا القمر"، أي: ترونه رؤية محققة لا شك فيها ولا مشقة، كما ترون هذا القمر رؤية محققة بلا مشقة. فهو تشبيه للرؤية بالرؤية، لا المرئي بالمرئي. والرؤية مختصة بالمؤمنين، وأمّا الكفار والمنافقون فلا يرونه وعليه جمهور أهل السنة. أفاده النوويّ.
জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসে ছিলাম, যখন তিনি পূর্ণিমা রাতে চাঁদের দিকে তাকালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "সাবধান! নিশ্চয় তোমরা তোমাদের রবকে দেখবে, যেমন তোমরা এই চাঁদকে দেখছ। তাঁকে দেখতে তোমাদের কোনো প্রকার কষ্ট বা ভিড় হবে না। সুতরাং, যদি তোমরা এমন সালাত আদায়ে দুর্বল না হতে পারো যা সূর্যোদয়ের আগে ও সূর্যাস্তের আগে (আদায় করতে হয়)," অর্থাৎ আসর ও ফজর (এর সালাত)। অতঃপর জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিলাওয়াত করলেন: "আর তোমার রবের প্রশংসাসহ তাঁর পবিত্রতা বর্ণনা করো সূর্যোদয়ের পূর্বে এবং সূর্যাস্তের পূর্বে।" (সূরা ত্বাহা: ১৩০)।
2293 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى البَرْدَين دخل الجنّة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المواقيت (574)، ومسلم في المساجد (635) كلاهما عن هُدْبة ابن خالد، حَدَّثَنَا همام بن يحيى، حَدَّثَنِي أبو جمرة الضُّبَعيُّ، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه فذكر مثله.
وهُدبة بن خالد - ويقال له: هَدَّابَ بالتثقيل وفتح أوله أيضًا كما في صحيح مسلم. وأبو جمرة - بالجيم.
وقوله:"البَرْدَين" - يعني العصر والفجر.
قال الخطّابي: سميتا بَردين لأنهما تصليان في بَردي النهار، وهما طرفاه حين يطيب الهواء، وتذهب سورة الحر.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি দুটি শীতল সময়ের (ফজর ও আসর) সালাত আদায় করবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”
2294 - عن عُمارة بن رُؤَيبة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لن يلج النّار أحد صَلَّى قبل طلوع الشّمس، وقبل غروبها" يعني الفجر والعصر. فقال له رجل من أهل البصرة: أنت سمعتَ هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم. قال الرّجل: وأنا أشهد أني سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، سِمِعتْه أُذُناي ووَعَاه قلبي.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (634) من أوجه عن أبي بكر بن عُمارة بن رُؤَيْبَة، عن أبيه فذكره.
উমারা ইবনে রুওয়াইবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো ব্যক্তি জাহান্নামে প্রবেশ করবে না, যে সূর্যোদয়ের পূর্বে এবং সূর্যাস্তের পূর্বে সালাত আদায় করেছে।" (তিনি এ দ্বারা) ফজর ও আসরের সালাতের কথা বুঝিয়েছেন। তখন বসরাবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক তাঁকে বলল: আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে এটি শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে শুনেছি; আমার দুই কান তা শুনেছে এবং আমার অন্তর তা সংরক্ষণ করেছে।
2295 - عن عبد الله بن فَضالة، عن أبيه قال: علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم فكان فيما علَّمني:"وحافظ على الصلوات الخمس" قال: قلت: إن هذه ساعات لي فيها أشغال، فمرني بأمر جامع إذا أنا فعلتُه أجزأ عَنِّي؟ فقال:"حافظ على العصرين" وما كانت مِن لُغَتِنَا؟ فقلت: وما العصران؟ فقال:"صلاة قبل طلوع الشّمس، وصلاة قبل غروبها".
صحيح: رواه أبو داود (428) عن عمرو بن عون، أنا خالد، عن داود بن أبي هند، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن عبد الله بن فَضالة فذكره.
إسناده صحيح. وصحّحه ابن حبان (1742)، والحاكم (1/ 199 - 200) فروياه من طريق خالد به مثله. وقال:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه، وعبد الله هو: ابن فضالة بن عبيد، وقد خُرِّج له في الصَّحيح حديثان".
قلت: عبد الله بن فضالة بن عبيد الليثي الزهراني ليس من رجال مسلم، ولكنه ثقة، واختلف في صحبته فالصحيح أنه رآه ولم يسمع منه، فمن روى عنه عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فهو مرسل، ومن أثبت بينهما ذكر أبيه فهو الصواب.
وللحديث أسانيد أخرى، والذي ذكرته أمثلها.
ফাযালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে শিক্ষা দিয়েছিলেন। তিনি আমাকে যা শিক্ষা দিয়েছিলেন তার মধ্যে ছিল: "আর তুমি পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের প্রতি যত্নবান হও।" [বর্ণনাকারী] বললেন, আমি বললাম: এই সময়গুলিতে আমার অনেক কাজ থাকে, তাই আমাকে এমন একটি ব্যাপক নির্দেশ দিন যা আমি পালন করলে আমার জন্য যথেষ্ট হবে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি 'আসরান' (দুই আসর)-এর প্রতি যত্নবান হও।" শব্দটি আমাদের ভাষায় প্রচলিত ছিল না। তাই আমি বললাম: 'আসরান' কী? তিনি বললেন: "সূর্যোদয়ের আগের সালাত এবং সূর্যাস্তের আগের সালাত।"
2296 - عن ابن عمر أنه أذَّن بالصلاة في ليلة ذات بردٍ وريح فقال: ألا صلوا في الرحال، ثمّ قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمر بالمؤذِّن إذا كانت ليلة باردةً ذاتُ مطر يقول:"ألا صلوا في الرحال".
متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (10) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاريّ في الأذان (666)، ومسلم في صلاة المسافرين (697) كلاهما من طريق مالك به مثله.
ولهما: البخاريّ (632)، ومسلم عن عبيد الله بن عمر قال: حَدَّثَنِي نافع قال: أذَّن ابن عمر في ليلة باردة بضجْنان ثمّ قال: صَلُّوا في رحالكم. فأخبرنا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمر مؤذِّنًا يؤذِّن ثمّ يقول على أثره:"ألا صلُّوا في الرِّحال" في الليلة الباردة، أو المطيرة في السَّفر.
قوله: بضَجْنان - بفتح الضاد المعجمة، وبالجيم، بعدها نون على وزن فعلان غير مصروف، قال صاحب الصحاح: هو جبل بناحية مكة. وقال غيره: جبل بين مكة والمدينة.
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঠাণ্ডা ও ঝড়ো রাতে সালাতের জন্য আযান দিলেন এবং (আযানের পর) বললেন: সাবধান! তোমরা নিজ নিজ বাসস্থানে সালাত আদায় করো। অতঃপর তিনি (ইবন উমার) বললেন, যখন ঠাণ্ডা ও বৃষ্টির রাত হতো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুয়াযযিনকে নির্দেশ দিতেন যেন সে বলে: "সাবধান! তোমরা নিজ নিজ বাসস্থানে সালাত আদায় করো।"
2297 - عن عبد الله بن الحارث قال: خطبنا ابن عباس في يومٍ رَدْغٍ فلمّا بلغ المؤذِّن: حيَّ على الصَّلاة فأمره أن ينادي: الصَّلاة في الرِّحال، فنظر القومُ بعضُهم إلى بعض فقال: فعل هذا من هو خير منه، وإنها عَزْمةٌ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (616) ومسلم في صلاة المسافرين (699) كلاهما عن عبد الحميد صاحب الزياديّ، عن عبد الله بن الحارث فذكره، واللّفظ للبخاريّ.
ورواه أيضًا البخاريّ (668) عن عبد الله بن عبد الوهّاب، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد به وفيه: فنظر بعضهم إلى بعض فكأنهم أنكروا. فقال: كأنكم أنكرتم هذا، إن هذا فعله من هو خير مني - يعني النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم - إنها عَزْمَةٌ، وإني كرهتُ أن أُحرجكم.
وعن حمّاد عن عاصم، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس نحوه. غير أنه قال: كرهتُ أن أؤثِّمكم، فتجيئون تدوسون الطين إلى رُكبكم.
ورواه أيضًا (901) عن مسدد، قال: حَدَّثَنَا إسماعيل - وهو ابن علية، قال: أخبرني عبد الحميد صاحب الزيادي به وفيه: وإني كرهت أن أُحرجكم فتمشون في الطين والدحض.
وقوله: يوم رَدْغ - بفتح الراء وسكون الدال المهملة - وهو الماء القليل، وقيل: إنه طين وحل، وقيل: الرزغ - بالزاء والمعنى واحد.
وقوله: عَزْمة - بسكون الراء - ضد الرخصة.
وقوله: والدَحْض - بفتح الدال وسكون الحاء وهو الزلق.
আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি কাদাচ্ছন্ন দিনে আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন। মুয়াজ্জিন যখন ‘হাইয়্যা আলাস-সালাহ’ পর্যন্ত পৌঁছালেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যেন ঘোষণা দেয়: ‘আস-সালাতু ফির-রিহাল’ (তোমরা যার যার স্থানে সালাত আদায় করো)। এতে লোকেরা পরস্পরের দিকে তাকাতে লাগল। তখন তিনি বললেন: ‘আমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তি এটি করেছেন, আর এটি অবশ্যই একটি দৃঢ় আদেশ (বা অবশ্যপালনীয় বিধান)।’
2298 - عن محمود بن الربيع الأنصاري أنَّ عِتبان بن مالك وهو من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا من الأنصار أنه أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! قد أنكرتُ بَصَرِي وأنا أصلِّي لقَوميّ، فإذا كانتِ الأمطارُ سالَ الوادي الذي بَيني وبينَهم لم أستَطِع أن آتيَ مسجدَهم فأُصلِّي بهم. وودِدْتُ يا رسولُ الله! أَنَّكَ تأتيني فتُصَلِّي في بَيتي فأَتخذَهُ مُصلًّى. قال: فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"سأفعلُ إن شاءَ الله". قال
عِتبانُ: فغدا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر حينَ ارتَفَعَ النهارُ فاستأذَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فَأَذِنتُ له، فلم يجلسْ حتَّى دخلَ البيتَ ثمّ قال:"أينَ تُحِبُّ أن أصلِّيَ من بَيْتِكَ؟" قال: فأشرتُ له إلى ناحيةٍ من البيت، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فكبَّرَ، فقُمنا فصفَفْنا فصلَّى رَكعتَيِنِ ثمّ سلَّمَ. فذكر الحديث. وهو في كتاب الإيمان بطوله. قال ابنُ شِهابٍ: ثمَّ سَأَلتُ الْحُصينَ بنَ محمد الأنصاري - وهو أحدُ بني سالم وهو من سَراتِهم - عن حديث محمود بن الربيع، فصدَّقه بذلك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (425)، ومسلم في المساجد (263) كلاهما من طريق ابن شهاب، قال: أخبرني محمود بن الربيع فذكر مثله واللّفظ للبخاريّ.
وفي مسلم قال محمود: فحدثتُ بهذا الحديث نفرًا فيهم أبو أيوب الأنصاريّ، فقال: ما أظنُّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال ما قُلتَ. قال: فحلفتُ إن رجعتُ إلى عِتْبان أن أسألَه، قال: فرجعت إليه فوجدته شيخًا كبيرًا قد ذهب بصرُه. وهو إمام قومه، فجلستُ إلى جنبه فسألتُه عن هذا الحديث فحدثنيه كما حدثنيه أولَ مرةٍ.
قال الزهري: ثمّ نزلتْ بعد ذلك فرائض وأمور نرى أن الأمر انتهى إليها. فمن استطاع أن لا يغتر فلا يغترَّ. انتهى.
ورواه البخاريّ (670) عن أنس يقول: قال رجل من الأنصار: إني لا أستطيع الصّلاةَ معك - وكان رجلًا ضخمًا - فصنع للنبي صلى الله عليه وسلم طعامًا فدعاه إلى منزله، فبسط له حصيرًا، ونضح طرف الحصير، فصلى عليه ركعتين …
وقوله: رجل من الأنصار - يقال: هو عتبان بن مالك السالمي الأنصاري الأعمى، لأن قصته شبيهة بقصته.
وقوله: ضخمًا - أي سمينًا، وفي هذا الوصف إشارة إلى علة تخلفه، وقد عدَّد ابن حبان من الأعذار المرخصة في التأخير عن الجماعة. انظر"فتح الباري" (2/ 158).
ইতবান ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের এবং আনসারদের মধ্যে যারা বদরে অংশ নিয়েছিলেন তাদের অন্যতম, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার দৃষ্টিশক্তি কমে গেছে। আমি আমার কওমের ইমামতি করি। যখন বৃষ্টি হয়, তখন আমার ও তাদের মধ্যবর্তী উপত্যকা প্লাবিত হয়। ফলে তাদের মসজিদে গিয়ে তাদের নিয়ে সালাত আদায় করা আমার পক্ষে সম্ভব হয় না। ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি চাই যে আপনি আমার ঘরে এসে সালাত আদায় করুন, যাতে আমি সেই স্থানটিকে সালাতের স্থান (মুসাল্লা) বানিয়ে নিতে পারি।" তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "ইনশাআল্লাহ আমি তা করব।" ইতবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: পরের দিন, যখন দিন কিছুটা চড়ে উঠলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। আমি তাকে অনুমতি দিলাম। তিনি বসার আগেই ঘরে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "তোমার ঘরের কোন জায়গাটিতে আমি সালাত আদায় করি, তা তুমি পছন্দ করো?" তিনি বললেন: আমি ঘরের এক কোণে তাঁর দিকে ইশারা করলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তাকবীর বললেন। আমরাও দাঁড়ালাম এবং কাতারবদ্ধ হলাম। তিনি দু’রাকআত সালাত আদায় করলেন এবং সালাম ফিরালেন। (হাদীসের অবশিষ্ট অংশ কিতাবুল ঈমানে বিস্তারিতভাবে বর্ণিত আছে।)
2299 - عن جابر قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفرٍ فمُطرنا فقال:"ليُصَلِّ من شاء منكم في رحله".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (698) من طريق زهير أبي خيثمة، قال: حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر فذكر الحديث.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে এক সফরে বের হলাম। অতঃপর আমরা বৃষ্টির সম্মুখীন হলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে ইচ্ছা করে, সে যেন নিজ নিজ আস্তানায় সালাত আদায় করে নেয়।"
2300 - عن عمرو بن أوس يقول: أنبأنا رجل من ثقيف أنه سمع مُنادي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يعني في ليلة مَطيرةٍ في السفر يقول:"حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح، صَلُّوا في رحالكم".
صحيح: رواه النسائيّ (653) عن قُتَيبة قال: حَدَّثَنَا سفيان، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن
أوس فذكر مثله. وإسناده صحيح، ولا يضر إبهام الرّجل فإنه صحابي.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (15433) عن أبي نعيم (وهو الفضل بن دكين) حَدَّثَنَا مسعر، عن عمرو بن دينار به مثله.
আমর ইবনু আওস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাকীফ গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁকে খবর দেন যে, সে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুআযযিনকে সফরের সময় বৃষ্টির এক রাতে (আযানে) বলতে শুনেছে: "হাইয়্যা 'আলাস-সালাহ, হাইয়্যা 'আলাল-ফালাহ (সাফল্যের জন্য এসো), তোমরা তোমাদের অবস্থানস্থলেই সালাত আদায় করো।"