হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2368)


2368 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان لا يدعُ أربعًا قبل الظهر، وركعتين قبل الغداة.

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1182) عن مسدد، قال: حدثنا يحيى، عن شعبة، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وقال: تابعه ابن أبي عدي وعمرو، عن شعبة.

وأخرجه أيضًا النسائي (3/ 251) من طريق عثمان بن عمر، قال: حدثنا شعبة إلا أنه أدخل بين محمد بن المنتشر وبين عائشة (مسروقًا) وقال: عامة أصحاب شعبة ممن روى هذا الحديث، فلم يذكروا مسروقًا.

قلت: لأن سماع محمد بن المنتشر من عائشة ثابت، ولذا جعل الدارقطني في"العلل" من المزيد في متصل الأسانيد، والحديث مخرج في"المنة الكبرى" (2/ 29




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুহরের পূর্বে চার রাকাত এবং ফজরের পূর্বে দুই রাকাত কখনো ত্যাগ করতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (2369)


2369 - عن عبد الله بن السائب: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي أربعًا بعد أن تزولَ
الشمسُ قبل الظهر، وقال:"إنها ساعة تُفتحُ فيها أبوابُ السماء، وأحب أن يصعدَ لي فيها عمل صالح".

حسن: رواه الترمذي في السنن (478) وفي الشمائل (289)، والنسائي في الكبرى (331) كلهم من طريق أبي داود الطيالسي، حدثنا محمد بن مسلم بن أبي الوضَّاح، وهو أبو سعيد المؤدِّب، عن عبد الكريم الجزري، عن مجاهد، عن عبد الله بن السائب فذكره.

ورواه الإمام أحمد (15396) عن أبي داود الطيالسي به أيضًا وفيه:"فأحب أن أقدِّمَ فيها عَمَلًا صالحًا".

ولا يوجد في مسند أبي داود الطيالسي مسند لعبد الله بن السائب.

قال الترمذي: حسن غريب.

قلت: رجاله ثقات غير محمد بن مسلم بن أبي الوضاح فإنه مختلف فيه، فوثَّقه جماعة من أئمة الحديث، غير أن البخاري قال فيه:"فيه نظر"، فلعله قصد بذلك الحديث الذي رواه، لا أنه في أردأ المنازل كما هو المعروف في تفسير قول البخاري. انظر كتابي:"معجم مصطلحات الحديث".

والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق يهم".

والحديث يدل على استحباب أربع ركعات بعد الزوال، وهي غير سنة الظهر القبلية.

قال الترمذي: وفي الباب عن علي وأبي أيوب.

قلت: وأما حديث علي فرواه أحمد والترمذي والنسائي وابن ماجه وغيرهم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي أربعًا قبل الظهر إذا زالت الشمس، وركعتين بعدها، وهو حديث حسن سبق تخريجه في باب ما جاء من تطوع النبي صلى الله عليه وسلم بالنهار.

وأما حديث أبي أيوب فرواه أبو داود (1270)، وابن ماجه (1157)، والترمذي في الشمائل (293) كلهم من طريق عبيدة بن معتِّب الضَبِّي، عن إبراهيم، عن سهم بن منجاب، عن قزعة، عن قَرْثع، عن أبي أيوب أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلي قبل الظهر أربعًا إذا زالت الشمس، لا يفصل بينهن بتسليم. وقال:"إن أبواب السماء تُفتح إذا زالت الشمس" وإسناده ضعيف فيه عبيدة بن معتِّب ضعَّفه أبو داود والآخرون. وقال المنذري: لا يحتج به، وتكلم فيه ابن خزيمة قائلًا: وأما الخبر الذي احتج به بعض الناس في الأربع قبل الظهر أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّاهن بتسليمة واحدة فإنه روي بإسناد لا يحتج بمثله من له معرفة برواية الأخبار، ثم رواه من الطريق الذي سبق ذكره، وتكلم على عبيدة بن معتب ومما قال فيه: سمعتُ أبا قلابة يحكي عن هلال بن يحيى قال: سمعتُ يوسف بن خالد السمتي يقول: قلت لعبيدة بن معتب: هذا الذي ترويه عن إبراهيم سمعتَه كله؟ قال: منه ما سمعتُه، ومنه ما أقيس عليه، قال: قلت: فحدثني بما سمعتَ، فإني أعلم بالقياس منك". انتهى.

إلا أن السمتي تكلم فيه غير واحد من أهل العلم، ومنهم من كذَّبَه.
ورواه الإمام أحمد (23551)، والطبراني (4/ 203)، وابن خزيمة (1215) كلهم من طريق شريك، عن الأعمش، عن المسيَّب بن رافع، عن علي بن الصلْت، عن أبي أيوب الأنصاري أنه كان يصلي أربع ركعات قبل الظهر، فقيل له: إنك تُديم هذه الصلاة فقال: إني رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله، فسألته فقال:"إنها ساعة تُفتح فيها أبوب السماء، فأحببت أن يرتفع لي فيها عمل صالح" وهو ضعيف أيضًا، فإن شريكًا هو: ابن عبد الله النخعي سيء الحفظ، وعلي بن الصلت مجهول، قال ابن خزيمة: ولست أعرف علي بن الصلت هذا، ولا أدري من أي بلاد الله هو، ولا أفهم القي أبا أيوب أم لا؟".




আব্দুল্লাহ ইবনুস সাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্য হেলে যাওয়ার পর যুহরের (ফরয) সালাতের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি বললেন: "এটি এমন একটি সময় যখন আসমানের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, আর আমি পছন্দ করি যেন এই সময়ে আমার কোনো নেক আমল উপরে ওঠে (গৃহীত হয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2370)


2370 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"رحم الله امرأً صلَّى قبل العصر أربعًا".

حسن: رواه أبو داود (1271)، والترمذي (430) كلاهما من طريق أبي داود الطيالسي، قال: حدثنا محمد بن مهران القرشي، حدثني جدي أبو المثني، عن ابن عمر فذكر الحديث.

قلت: والحديث في مسند أبي داود الطيالسي (2048) قال: حدثنا أبو إبراهيم محمد بن المثنى، عن أبيه، عن جده، عن ابن عمر فذكر مثله، فزاد فيه قوله:"عن أبيه" هكذا في نسخة مطبوعة.

قال البيهقي (2/ 473) بعد أن أخرجه من طريق أبي داود الطيالسي: هكذا وجدت في كتابي، ثم روى عن أبي داود السجستاني كما سبق وليس فيه ذكر"عن أبيه" وقال: هذا هو الصحيح، وهو أبو إبراهيم محمد بن إبراهيم بن مسلم بن مهران القرشي، سمع جده مسلم بن مهران القرشي، ويقال: محمد بن المثنى، وهو ابن أبي المثنى، لأن كنية مسلم أبو المثنى ذكره البخاري في التاريخ. وقال: وقول القائل في الإسناد الأول"عن أبيه" أراه خطأٌ، ورواه جماعة عن أبي داود دون ذكر"أبيه" منهم سلمة بن شبيب وغيره". انتهى.

قلت: حديث سلمة بن شبيب، عن أبي داود رواه ابن خزيمة في صحيحه (1193) عنه، عن أبي داود بدون ذكر"أبيه" في الإسناد.

وإسناده حسن لأجل محمد بن إبراهيم بن مسلم بن مهران المؤذن الكوفي قال فيه ابن معين والدارقطني: ليس به بأس، وجدُّه أبو المثني روي عنه جماعة، وقال أبو زرعة: ثقة.

قلت: وصحّحه أيضًا ابن حبان (2453) فرواه من طريق أبي داود الطيالسي.

قال الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى:"وقد اختلف في هذا الحديث، فصحَّحه ابن حبان، وعلَّله غيره، قال ابن أبي حاتم: سمعت أبي يقول: سألت أبا الوليد الطيالسي عن حديث محمد بن مسلم بن المثنى، عن أبيه، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم فقال: دع ذا. فقلت: إن أبا داود قد رواه. فقال: قال أبو الوليد: كان ابن عمر يقول:"حفظت عن النبي صلى الله عليه وسلم عشرَ ركعاتٍ في اليوم والليلة". فلو كان هذا العدَّه، قال أبي: كان يقول:"حفظت ثنتي عشرة ركعة".
قال الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى:"وهذا ليس بعلة أصلًا، فإن ابن عمر إنما أخبر بما حفظه من فعل النبي صلى الله عليه وسلم، لم يخبر عن غير ذلك، فلا تنافي بين الحديثين البتة". انتهى.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ সেই ব্যক্তির প্রতি রহম করুন, যে আসরের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2371)


2371 - عن علي بن أبي طالب قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي قبل العصر أربع ركعات، يفصل بينهن بالتسليم على الملائكة المقربين، ومن تبعهم من المسلمين والمؤمنين.

حسن: رواه الترمذي (429) من طريق سفيان، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي فذكره.

قال الترمذي: حسن، واختار إسحاق بن إبراهيم أن لا يُفْصَل في الأربع قبل العصر، واحتج بهذا الحديث قال إسحاق: ومعنى أنه يَفْصِل بينهن بالتسليم، يعني التشهد. ورأى الشافعي وأحمد صلاة الليل والنهار مثنى مثنى، يختاران الفصْل في الأربع قبل العصر". انتهى.

قلت: إسناده حسن لأجل الكلام في عاصم بن ضمرة فإنه"صدوق" كما في التقريب.

وأورده النووي في"الخلاصة" (1466) وأقر بحكم الترمذي. وهو اختصار من تطوع النبي صلى الله عليه وسلم بالنهار.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি সেই রাকাতগুলোর মধ্যে নিকটবর্তী ফেরেশতাগণ এবং তাদের অনুসারী মুসলিম ও মুমিনগণের প্রতি সালামের মাধ্যমে বিচ্ছিন্নতা (ফসল) করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2372)


2372 - عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلي قبل العصر ركعتين.

حسن: رواه أبو داود (1272) عن حفص بن عمر، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي فذكره.

وصحّحه النووي في الخلاصة (1821).

قلت: وإسناده حسن لأجل الكلام في عاصم بن ضمرة.

وقوله: كان يصلي قبل العمر ركعتين، أي أحيانًا، فلا ينافي ما تقدم من الأربع، ومن جهة الاختلاف في الروايات صار التخيير بين الأربع والركعتين جمعًا بين الروايات، والأربع أفضل، قال المنذري: عاصم بن ضمرة وثَّقه يحيى بن معين وغيره، وتكلم فيه غير واحد.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের আগে দু'রাকাআত সালাত (নামায) আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2373)


2373 - عن أنس بن مالك قال: كنا بالمدينة، فإذا أذَّن المؤذن لصلاة المغرب ابتدروا السواري، فيركعون ركعتين ركعتين، حتى إن الرجل الغريب ليدخلُ المسجد فيحسبُ أن الصلاة قد صُلِّيتْ من كثرة من يُصَلِّيهما.

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (625)، ومسلم في المسافرين (837) كلاهما من طريقين عن أنس، واللفظ لمسلم، وفي رواية البخاري: ولم يكن بين الأذان والإقامة شيء.

قال عثمان بن جبلة وأبو داود، عن شعبة: لم يكن بينهما إلا قليل.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মদীনায় ছিলাম। যখন মুয়াজ্জিন মাগরিবের সালাতের জন্য আযান দিতেন, তখন লোকেরা দ্রুত স্তম্ভগুলোর দিকে এগিয়ে যেত এবং দু' দু' রাকাত করে সালাত আদায় করত। এমনকি কোনো অপরিচিত লোক মসজিদে প্রবেশ করলে, যারা ওই সালাত আদায় করত তাদের সংখ্যাধিক্যের কারণে সে মনে করত যে (ফরয) সালাত আদায় করা হয়ে গেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (2374)


2374 - عن مرثد بن عبد الله اليزني قال: أتيتُ عُقبة بن عامر الجهني، فقلتُ: ألا أُعَجِّبُكَ من أبي تميم، يركع ركعتين قبل صلاة المغرب. فقال: عُقبة: إنا كنا نفعله
على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، قلت: فما يمنعك الآن؟ قال: الشُغل.

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1184) عن عبد الله بن يزيد، قال: حدثنا سعيد بن أبي أيوب، قال: حدثني يزيد بن أبي حبيب، قال: سمعت مرثد بن عبد الله فذكره.

وقوله: أعجَّبك: بضم أوله وتشديد الجيم من التعجب، أي: أخبرك بأمر تستغربه وتتعجب منه.

وأبو تميم هو: عبد الله بن مالك الجيشاني، تابعي كبير مخضرم، أسلم في عهد النبي صلى الله عليه وسلم، وقرأ القرآن على معاذ بن جبل، ثم قدم في زمن عمر فشهد فتح مصر وسكنها.

وعمل أبي تميم يدل على استمرار هذا العمل من عهد النبي صلى الله عليه وسلم وعهد الصحابة ومن بعدهم، ويشترط فيه أن لا تتأخر صلاة المغرب من أول وقتها، وقول أنس في الحديث السابق: ولم يكن بين الأذان والإقامة شيء دليل على هذا.




উকবাহ ইবনে আমের আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারছাদ ইবনে আব্দুল্লাহ আল-ইয়াযানি বলেন: আমি উকবাহ ইবনে আমের আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম: আবু তামিম সম্পর্কে আপনার কি আশ্চর্য লাগে না, তিনি মাগরিবের সালাতের পূর্বে দু’রাকাত সালাত আদায় করেন? উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা তা করতাম। আমি বললাম: তবে এখন আপনাকে কিসে বিরত রাখে? তিনি বললেন: ব্যস্ততা।









আল-জামি` আল-কামিল (2375)


2375 - عن عبد الله بن مغفل المزني، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"صلوا قبل صلاة المغرب - قال في الثالثة - لمن شاء، كراهية أن يتخذها الناس سنة".

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1183) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، عن الحسين، عن ابن بُريدة قال: حدثني عبد الله المزني فذكر الحديث. وسيأتي مزيد في الباب الذي يليه.




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মাগরিবের সালাতের আগে সালাত আদায় করো।" (তৃতীয়বার বলার পর) তিনি বললেন: "যে চায় তার জন্য।" এই আশঙ্কায় যে, লোকেরা যেন এটিকে সুন্নাত (বাধ্যতামূলক রীতি) হিসেবে গ্রহণ না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2376)


2376 - عن مختار بن فُلفُل قال: سألت أنس بن مالك عن التطوع بعد العصر، فقال: كان عمر يضرب الأيدي على صلاةٍ بعد العصر، وكنا نُصلي على عهد النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين بعد غروب الشمس قبل صلاة المغرب، فقلت له: أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّاهما؟ قال: كان يرانا نصليهما فلم يأمرنا، ولم ينهنا.

صحيح: رواه مسلم في المسافرين (836) من طريق ابن فُضيل، عن مختار بن فُلْفُل قال: فذكره.

وأما ما رواه طاوس قال: سُئل ابن عمر عن الركعتين قبل المغرب فقال: ما رأيتُ أحدًا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصليهما، ورخص في الركعتين بعد العصر.

رواه أبو داود (1284) عن ابن بشار، ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن أبي شُعيب، عن طاوس فذكر مثله، قال أبو داود: سمعتُ يحيى بن معين يقول: هو شُعيب، يعني وهم شعبة في اسمه.

ومن طريق أبي داود رواه البيهقي (2/ 476، 477)، وقال:"القول في مثل هذا قول من شاهد دون من لم يشاهد".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুকতার ইবনে ফুলফুল (রহ.) বলেন: আমি তাঁকে আসরের পর নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসরের পরে সালাত আদায় করার কারণে (মানুষের) হাতে আঘাত করতেন (বা কঠোরতা অবলম্বন করতেন)। আর আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে সূর্যাস্তের পর মাগরিবের সালাতের পূর্বে দু’রাকআত সালাত আদায় করতাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি এই সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি আমাদের তা আদায় করতে দেখতেন, কিন্তু তিনি আমাদের নির্দেশও দেননি, আবার নিষেধও করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2377)


2377 - عن عبد الله بن مغفل قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"بين كل أذانين صلاة، بين كل أذانين صلاة" ثم قال في الثالثة:"لمن شاء".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (627)، ومسلم في صلاة المسافرين (838) كلاهما من
طريق كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن مغفل قال: فذكره.

وفي رواية الجُريري، عن ابن بريدة قال:"بين كل أذانين صلاة - ثلاثًا - لمن شاء" البخاري (624)، ومسلم (838) إلا أنه قال في الرابعة:"لمن شاء" وليس بين الروايتين اختلاف فإن قوله في البخاري: ثلاثًا - أي قالها ثلاثًا، وقال في الرابعة: لمن شاء.

وما زاد حيان بن عبد الله، عن عبد الله بن بريدة"ما خلا المغرب" فهو ضعيف رواه البيهقي (2/ 474) وغيره، ضعَّفه الحافظ في"التلخيص" (506).




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “প্রত্যেক দু'টি আযানের (আযান ও ইকামাতের) মাঝে সালাত রয়েছে, প্রত্যেক দু'টি আযানের মাঝে সালাত রয়েছে।” অতঃপর তিনি তৃতীয়বার বললেন: “যে (পড়তে) চায় তার জন্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (2378)


2378 - عن حذيفة قال: قالت لي أمي: متى عهدُك بالنبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: فقلت: ما لي به عهد منذ كذا وكذا. قال: فهمَّتْ بي، فقلت: يا أمَّه دَعِينِي حتى أذهب إلى النبي صلى الله عليه وسلم فلا أدعَه حتى يستغفر لي، ويستغفر لكِ، قال: فجئتُه فصليتُ معه المغرب، فلما قضى الصلاة قام يُصَلِّي، فلم يزل يُصلي حتى صلى العشاء، ثم خرج.

حسن: رواه الترمذي (3781) عن عبد الله بن عبد الرحمن وإسحاق بن منصور، قالا: أخبرنا محمد بن يوسف، عن إسرائيل، عن ميسرة بن حبيب، عن المنهال بن عمرو، عَنْ زِر بن حُبيش، عن حذيفة. ورواه الإمام أحمد (23436) عن زيد بن الحُباب، عن إسرائيل به مثله واللفظ له.

وصحّحه ابن خزيمة (1194)، وابن حبان (1960)، والحاكم (1/ 312) كلهم من طريق زيد بن الحباب به مختصرًا.

وإسناده حسن لأجل ميسرة بن حبيب والمنهال بن عمرو فإنهما صدوقان.

وسيأتي هذا الحديث في فضائل الصحابة، باب أن الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة.




হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা আমাকে জিজ্ঞেস করলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে তোমার শেষ কবে সাক্ষাৎ হয়েছিল? তিনি (হুযাইফা) বলেন, আমি বললাম: অনেক দিন হয়ে গেল তাঁর সাথে আমার কোনো সাক্ষাৎ নেই। এতে আমার মা আমার উপর খুব রাগান্বিত হলেন। তখন আমি বললাম: হে আমার মা! আমাকে অনুমতি দিন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাই। আমি তাঁকে ছাড়ব না, যতক্ষণ না তিনি আমার জন্য ক্ষমা চান এবং আপনার জন্যও ক্ষমা চান। তিনি বলেন, অতঃপর আমি তাঁর নিকট আসলাম এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করলাম। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি দাঁড়িয়ে (নফল) সালাত আদায় করতে লাগলেন। তিনি সালাত আদায় করতেই থাকলেন যতক্ষণ না তিনি এশার সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি বেরিয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2379)


2379 - عن تميم الداري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أول ما يحاسب به العبدُ يوم القيامة صلاتُه، فإن أكملها كتبتْ له كاملةً، فإن لم يكن أكملها، قال الله سبحانه لملائكته: انظروا، هل تجدون لعبدي من تطوع؟ فأكملوا بها ما ضيّع من فريضته، ثم تؤخذ الأعمال على حسب ذلك".

صحيح: رواه ابن ماجه (1426) عن أحمد بن سعيد الدارمي، قال: حدثنا سليمان بن حرب، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن داود بن أبي هند، عن زرارة بن أوفى، عن تميم الدارمي فذكر مثله.

ورجاله ثقات وإسناده صحيح. ورواه أيضًا أبو داود (866) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد به وأحال على لفظ أبي هريرة الذي سيأتي. وأخرجه الحاكم في المستدرك (1/ 262، 263)
من طريق موسى بن إسماعيل به مثله. وقال:"هو شاهد صحيح على شرط مسلم".

وأما ما روي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن أول ما يُحاسب الناس به يوم القيامة من أعمالهم: الصلاة، قال: يقول ربنا جلَّ وعلا لملائكته - وهو أعلم - انظروا في صلاة عبدي أتمها أم نقصها؟ فإن كانت تامة كتبتْ له تامةٌ، وإن كان انتقص منها شِئًا قال: انظروا هل لعبدي من تطوع؟ فإن كان له تطوع قال: أتموا لعبدي فريضته من تطوعه، ثم تؤخذُ الأعمال على ذاكم".

فإسناده مضطرب: رواه أبو داود (864) عن يعقوب بن إبراهيم حدثنا إسماعيل، حدثنا يونس، عن الحسن، عن أنس بن حكيم الضبي قال: خاف من زياد، أو ابن زياد، فأتي المدينة، فلقي أبا هريرة قال: فنسَبني فانتسبت له، فقال: يا فتى! ألا أحدثك حديثًا؟ قال: قلت: بلى رحمك الله. قال يونس: وأحسبه ذكره عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. قال النووي في"الخلاصة" (1777) إسناده ضعيف.

قلت: فيه من العلل:

العلّة الأولى: الشك في الرفع.

العلّة الثانية: أنس بن حكيم الضبي شيخ الحسن"مجهول" كما قال ابن القطان وغيره. وفي التقريب:"مستور".

والحسن مدلس وقد عنعن، وتابعه علي بن زيد، عن أنس بن حكيم الضبي: رواه ابن ماجه (1425) عن أبي بكر بن أبي شيبة ومحمد بن بشار، قالا: حدثنا يزيد بن هارون، عن سفيان بن حسين، عن علي بن زيد عنه.

وعلي بن زيد هو: ابن جدعان ضعيف.

والعلّة الثالثة: الاختلاف على الحسن، فقيل عنه عن حُريث بن قبيصة رواه النسائي (465)، والترمذي (413) من طريق همام، عن قتادة، عن الحسن، عن حريث بن قبيصة قال: قدمتُ المدينة قال: قلت: اللهم! يَسِّر لي جليسًا صالحًا، فجلستُ إلى أبي هريرة قال: فقلتُ: إني دعوتُ الله عز وجل أن يُيسر لي جليسًا صالحًا فحدثني بحديث سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم لعل الله أن ينفعني به قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أول ما يحاسب به العبدُ بصلاته، فإن صلحتْ فقد أفلح وأنجح، وإن فسدتُ فقد خاب وخسر" قال همام: لا أدري هذا من كلام قتادة، أو من الرواية؟"فإن انتقص من فريضته شيء قال: انظروا هل لعبدي من تطوع فيكمَّل به ما نقص من الفريضة، ثم يكون سائر عمله على نحو ذلك" واللفظ للنسائي.

وقال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه".

قلت: حريث بن قبيصة، أو قبيصة بن حريث قال فيه الحافظ: جهَّلَه ابن القطان. وقال النسائي: لا يصح حديثه. وذكر أبو العرب التميمي أن أبا الحسن العجلي قال: قبيصة بن حريث تابعي ثقة. وأفرط ابن حزم فقال: ضعيف مطروح".
قال النسائي: وخالفه أبو العوام ثم روى من طريقه، عن قتادة، عن الحسن بن زياد، عن أبي رافع، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال فذكر الحديث، ثم رواه بإسناد آخر عن حماد بن سلمة، عن الأزرق بن قيس، عن يحيى بن يعمر، عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

ورواه الإمام أحمد (16614) في ترجمة رجل (غير أبي هريرة) عن حسن بن موسى قال: حدثنا حماد بن سلمة، به مثله. قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 291)،"روى النسائي عن يحيى بن يعمر، عن أبي هريرة مثل هذا، فلا أدري أهو هذا أم لا؟ وقد ذكره الإمام أحمد في ترجمة رجل غير أبي هريرة ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، فرجال أحمد ثقات، ولكن حماد بن سلمة قد تغير في آخر عمره، فلعل هذا الخلاف في الإسناد يعود إليه.

وأبو العوام اسمه: عمران بن داوَر مختلف فيه، فضعَّفه ابن معين وأبو داود والنسائي، وقال الدارقطني: كثير المخالفة، وليّنَ القولَ فيه أحمد والبخاري والترمذي والخلاصة فيه:"أنه صدوق بهم" كما في التقريب.

فرواية قتادة أرجح منه إلا أن فيه عنعنة قتادة والحسن وكلاهما مدلسان مع اختلاف في شيخ الحسن.

قال الحافظ في ترجمة أنس بن حكيم الضبي في"التهذيب":"حديث مضطرب، اختلف فيه على الحسن فقيل: عنه هكذا، وقيل: عنه عن حريث بن قبيصة، وقيل: عنه عن صعصعة عم الأحنف، وقيل: عنه عن رجل من بني سليط، وقيل عنه غير ذلك".

قلت: حديث رجل من بني سليط أخرجه أبو داود (865) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن حميد، عن الحسن، عن رجل من بني سليط، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه.

وحديث صعصعة بن معاوية: رواه المروزي في"تعظيم قدر الصلاة" (183) عن الحسن بن عيسى، ثنا ابن المبارك، أنا إسماعيل المكي، عن الحسن، عن صعصعة بن معاوية قال: لقيت أبا هريرة فقال: ممن أنت؟ فقلت: من أهل العراق، فقال: ألا أحدثك حديثًا ينفع من بعدك؟ فذكر مثله.

وقول الحافظ: وقيل عنه غير ذلك - لعله يشير إلى أنَّ هذا الحديث رُوِيَ عن أبي هريرة موقوفًا أيضًا. فقد رواه عبد الوارث بن سعيد، عن يُونس بن عُبيد، عن الحسن سمع أنس بن حكيم، سمع أبا هريرة ولم يرفعه. ورواه أبو نعيم، عن علي بن علي الرفاعي، عن الحسن، عن أبي هريرة قوله.

ورواه مبارك بن فضالة، عن رجل من أهل البصرة - كان يجالس أبا هريرة - عن أبي هريرة قوله.

ذكره المزي في الاستدراكات"تحفة الأشراف" (9/ 299).

ومثل هذا لا يحكم عليه بالحسن فضلًا عن الصحة، ويغني عنه حديث تميم الداري، فلا تغترن بتصحيح الحاكم في المستدرك (1/ 262) على أن بعض أهل العلم يقبلون مثل هذا في الشواهد.

وكذلك ما روي عن أنس بلفظ:"أول ما يحاسب به العبد يوم القيامة الصلاة، فإن صلحتْ
صلح له سائر عمله، وإن فسدتْ فسد له سائر عمله".

رواه الطبراني في الأوسط"مجمع البحرين" (532) من طريق إسماعيل بن عيسى الواسطي، ثنا إسحاق بن يوسف الأزرق، ثنا القاسم بن عثمان، عن أنس مرفوعًا. وفيه القاسم بن عثمان ضعّفه البخاري والدارقطني وغيرهما.

ورواه أيضًا من طريق روح بن عبد الواحد القرشي، ثنا خليد بن دعلج، عن قتادة، عن أنس مرفوعًا ولفظه:"أول ما يسأل عنه العبد يوم القيامة ينظر في صلاته، فإن صلحت فقد أفلح، وإن فسدت فقد خاب وخسر".

وفيه روح بن عبد الواحد ضعيف، غمزه ابن عدي، وقال العقيلي: لا يتابع عليه. وخليد بن دعلج السدوسي البصري ضعيف أيضًا ضعَّفه ابن معين وأحمد وأبو داود وغيرهم.

وكذلك ما رُوِي عن أبي سعيد الخدري مرفوعًا:"أول ما يسأل العبد عنه ويحاسب به صلاته، فإن قبلتْ منه قبل سائر عمله، وإن ردت عليه رد عليه سائر عمله". أخرجه السلفي في"الطيوريات" كما قال الشيخ الألباني رحمه الله، وفيه عطية العوفي وهو ضعيف.

معنى الحديث:

قال أبو بكر بن العربي في"عارضة الأحوذي": يحتمل أن يكون يكمل له ما نقص من فرض الصلاة وأعدادها بفضل التطوع، ويحتمل ما نقصه من الخشوع، والأول عندي أظهر لقوله - ثم الزكاة كذلك، وسائر الأعمال، وليس في الزكاة إلا فرض، أو فضل، فكما يكمل فرض الزكاة بفضلها كذلك الصلاة، وفضل الله أوسع، ووعده أنفذ، وعزمه أعم وأتم".

وقال العراقي:"يحتمل أن يراد به ما انتقصه من السنن والهيئات المشروعة فيها من الخشوع والأذكار والأدعية، وأنه يحصل له ثواب ذلك في الفريضة، وإن لم يفعله فيها، وإنما فعله في التطوع، ويحتمل أن يراد به ما انتقص أيضًا من فروضها وشروطها، ويحتمل أن يراد ما ترك من الفرائض رأسًا فلم يصله فيعوض عنه من التطوع. والله سبحانه وتعالى يقبل من التطوعات الصحيحة عوضًا عن الصلوات المفروضة""تحفة الأحوذي" (2/ 413 - 464).

وأما ما رُوِي: ولا تُقبل نافلة المصلِّي حتى يُؤدي الفريضة" فهو ضعيف كما ذكره الشيخ المباركفوري صاحب"التحفة"




তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কিয়ামতের দিন বান্দার প্রথম যে আমলের হিসাব নেওয়া হবে, তা হলো তার সালাত (নামাজ)। যদি তা পূর্ণ হয়, তবে তার জন্য তা পূর্ণ হিসেবে লেখা হবে। আর যদি তা পূর্ণ না হয়, তখন আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলা তাঁর ফেরেশতাদেরকে বলবেন: দেখ, তোমরা কি আমার বান্দার জন্য কোনো নফল (স্বেচ্ছামূলক) ইবাদত খুঁজে পাও? অতঃপর এর দ্বারা তার ফরয (সালাত)-এর ঘাটতি পূর্ণ করে দাও। এরপর বাকি আমলসমূহও অনুরূপভাবে হিসাব করা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2380)


2380 - عن عمر بن عطاء بن أبي الخُوار، أن نافع بن جبير أرسله إلى السائب ابن أخت نَمر، يسأله عن شيء رآه منه معاوية في الصلاة. فقال: نعم. صليتُ معه الجمعةَ في المقصورة. فلما سلَّم الإمامُ قُمت في مقامي فصلَّيْتُ، فلما دخل أرسل
إليَّ فقال: لا تَعْدْ لما فعلتَ. إذا صلَّيتَ فلا تَصِلْها بصلاةٍ حتى تكلَّم أو تخرجَ. فإن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أمرنا بذلك. أن لا تُوصل صلاةٌ بصلاةٍ حتى نتكلَّم، أو نخرجَ.

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (883) عن أبي بكر بن أبي شيبة وهو في المصنف (2/ 139) حدثنا غندر، عن ابن جريج، قال: أخبرني عمر بن عطاء بن أبي الخُوار فذكره.

ورواه عبد الرزاق في مصنفه (5534) وعنه أبو داود (1129) عن ابن جريج به مثله. وفيه السائب هو: ابن يزيد ابن أخت نمر.

والمقصورة: هي الحجرة المبنية في المسجد أحدثها معاوية بعد ما ضربه الخارجي.




সায়েব ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনে আতা ইবনে আবিল খাওওয়ার বলেন, নাফে ইবনে জুবাইর তাঁকে (আমার কাছে) মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক সালাত বিষয়ে তাঁর মধ্যে দেখা একটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করার জন্য পাঠিয়েছিলেন। সায়েব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, আমি তাঁর (মু'আবিয়ার) সাথে মাকসূরায় জুমু‘আর সালাত আদায় করেছিলাম। যখন ইমাম সালাম ফিরালেন, আমি আমার স্থানে দাঁড়িয়ে (সুন্নাত) সালাত আদায় করলাম। যখন মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (ঘরে) প্রবেশ করলেন, তখন তিনি আমার কাছে লোক পাঠিয়ে বললেন: তুমি যা করেছ তা পুনরায় করো না। যখন তুমি সালাত আদায় করবে, তখন তার সাথে অন্য সালাতকে যুক্ত করবে না যতক্ষণ না তুমি কথা বলো অথবা (স্থান থেকে) বেরিয়ে যাও। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এই মর্মে নির্দেশ দিয়েছিলেন যে, আমরা যেন এক সালাতের সাথে অন্য সালাতকে যুক্ত না করি যতক্ষণ না আমরা কথা বলি অথবা (স্থান থেকে) বেরিয়ে যাই।









আল-জামি` আল-কামিল (2381)


2381 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى العصر، فقام رجل يُصلِّي فرآه عمر فقال له: اجلسْ، فإنما هلك أهل الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصلٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحسنَ ابن الخطاب".

صحيح: رواه أحمد (23121) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن الأزرق بن قيس، عن عبد الله بن رباح، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.

ورواه أبو يعلى (7130 تحقيق الأثري) عن محمد بن بشار، حدثنا محمد (وهو ابن جعفر) به مثله، وإسناده صحيح.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 234):"رواه أحمد وأبو يعلى ورجال أحمد رجال الصحيح"، وهو كما قال إلا أن رجال أبي يعلى مثله غير شيخه محمد بن بشار وهو: ابن عثمان العبدي أيضًا من رجال الشيخين.

وأما ما رواه أبو داود (1007) عن عبد الوهاب بن نجدة، حدثنا أشعث بن شُعبة، عن المنهال بن خليفة، عن الأزرق بن قيس قال: صلى بنا إمام لنا يُكنَّى أبا رِمْثة فقال: صليت هذه الصلاة، أو مثل هذه الصلاة مع النبي صلى الله عليه وسلم قال: وكان أبو بكر وعمر يقومان في الصف المقدم عن يمينه، وكان رجل قد شهد التكبيرة الأولى من الصلاة، فصلى نبي الله، ثم سلَّم عن يمينه وعن يساره حتى رأينا بياض خديه، ثم انفتل كانفتال أبي رِمْثَة. يعني نفسه، فقام الرجل الذي أدرك معه التكبيرة الأولى من الصلاة يشفعُ، فوثب إليه عمر، فأخذ بمنكِبِه فهزَّه ثم قال: اجلس فإنه لم يهلك أهل الكتاب إلا أنه لم يكن بين صلواتهم فصل، فرفع النبي صلى الله عليه وسلم بصرَه فقال:"أصاب الله بك يا ابن الخطاب".

ففيه أشعث بن شعبة، قال فيه أبو حاتم: لين. ولم بوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول".

والمنهال بن خليفة العجلي أبو قدامة الكوفي"ضعيف"، وقال فيه البخاري: صالح فيه نظر، وقال النسائي: ضعيف، وقال ابن حبان: كان ينفرد بالمناكير عن المشاهير لا يجوز الاحتجاج به.

وأما الحاكم (1/ 270)، فقال: صحيح على شرط مسلم، وهذا وهم منه رحمه الله تعالى،
ولذا تعقبه الذهبي بقوله:"المنهال ضعَّفه ابن معين وأشعث فيه لين، والحديث منكر".

وكذلك ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله:"أيعجز أحدكم أن يتقدم، أو يتأخر، أو عن يمينه أو عن شماله" يعني في السبحة.

رواه أبو داود (1006)، وابن ماجه (1427) كلاهما من طريق ليث، عن حجاج بن عبيد، عن إبراهيم بن إسماعيل، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف لوجود الضعفاء والمجاهيل في الإسناد.

منهم: ليث وهو: ابن أبي سليم وهو ضعيف، وشيخه الحجاج بن عبيد، وشيخه إبراهيم بن إسماعيل وهو: الحجازي مجهولان.

قال البخاري في التاريخ الكير (1/ 340) بعد أن ساق الإسناد من طريق لبث به، ومن وجه آخر عن ليث، عن أبي حمزة حُدَّثْتُ به عن أبي هريرة.

"لم يثبت هذا الحديث".

وقال في صحيحه (2/ 334) في كتاب الأذان في باب مكث الإمام في مصلاه: ويُذكر عن أبي هريرة رفعه: لا يتطوع الإمام في مكانه: ولم يصح".

قال الحافظ في"الفتح" (2/ 335) معلّقًا على قول البخاري: وذلك لضعف إسناده واضطرابه، وتفرد به ليث بن أبي سُلَيم وهو ضعيف".

قلت: ولكن ليس في الحديث ذكر الإمام، وإنما فيه العموم، ويدخل فيه أيضًا الإمام.

وكذلك ما رُوِي عن المغيرة بن شعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصل الإمام في الموضع الذي صلى فيه حتى يتحول" رواه أبو داود (616) قال: حدثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدثنا عبد العزيز بن عبد الملك القرشي، حدثنا عطاء الخراساني، عن المغيرة بن شعبة فذكره.

قال أبو داود: عطاء الخراساني لم يدرك المغيرة بن شعبة.

قلت: مات المغيرة بن شعبة الصحابي المشهور سنة خمسين على الصحيح، وعطاء وهو: ابن أبي مسلم أبو عثمان الخراساني ولد في هذه السنة، ومات سنة خمس وثلاثين ومائة وهو صدوق بهم كثيرًا، ويُرسل ويُدلس، ففي الإسناد انقطاع.

ورواه ابن ماجه (1428، 1429) من وجه آخر عن عثمان بن عطاء، عن أبيه، عن المغيرة بلفظ:"لا يُصلي الإمام في مقامه الذي صلى فيه المكتوبة، حتى يتنحَّى عنه" وفيه مع الانقطاع عثمان بن عطاء بن أبي مسلم الخراساني ضعيف، ضعَّفه ابن معين وغيره.

وقال الحاكم أبو عبد الله: يَروي عن أبيه أحاديث موضوعة.

فقه الباب:

وأحاديث الباب تدل على أن لا يَصِل المكتوبة بالتطوع من غير فصلٍ خشية الالتباس، وقد
أرشد النبي صلى الله عليه وسلم إلى ذلك بأن يتقدم أو يتكلم، ويدل عليه حديث معاوية، وحديث التنحي وإن لم يثبت ففي حديث معاوية"أن يخرج" قريب منه. فمن اشتغل بعد السلام بالأذكار المأثورة فإن ذلك يكفي، وعليه جمهور أهل العلم لقوله في حديث معاوية:"أو يتكلم".

وقال الحنفية: لا بأس أن يتطوع قبل الذكر المأثور في مكانه عقب الفرائض فإن السلام يفصل بينهما.

وأما الإمام فكره الجمهور أن يتطوع في مكانه بعد صلاته وبه قال أبو حنيفة ومالك وأحمد وإسحاق ورُوي ذلك عن علي وغيره. وما رواه البخاري عن نافع قال:"كان ابن عمر يصلي في مكانه الذي صلى فيه الفريضة" كان مأمومًا لا إمامًا.

وفيه إشارة إلى أن البخاري يرجح للمأموم أن يصلي في مكانه.

قلت: وهو الذي قال به الجمهور على أن يفصل بالأذكار المأثورة، أو الكلام كما تقدم، وبه كان يأمر ابن عباس كما رواه عطاء عنه أنه كان يأمر إذا صلى أحد المكتوبة، أن يتكلم أو يتقدم، وروي مثل هذا عن ابن عمر أنه كان يكره أن يصلي النافلة في المكان الذي يصلي فيه المكتوبة حتى يتقدم أو يتأخر أو يتكلم.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের সালাত আদায় করলেন। তখন এক ব্যক্তি (সালাম ফিরানোর পর) দাঁড়িয়ে (নফল) সালাত আদায় করতে লাগল। তাকে দেখে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "বসে যাও! নিশ্চয়ই আহলে কিতাবগণ ধ্বংস হয়েছিল এই কারণে যে, তাদের সালাতগুলোর মধ্যে কোনো বিচ্ছেদ ছিল না।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনুল খাত্তাব উত্তম কাজ করেছে/সঠিক বলেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2382)


2382 - عن * *




হতে * *









আল-জামি` আল-কামিল (2383)


2383 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ أحدكم إذا قام يُصلي، جاءه الشيطان، فلَبَسَ عليه. حتى لا يدري كم صلَّى؟ فإذا وجد أحدكم فليسجد سجدتين، وهو جالس".

متفق عليه: رواه مالك في السهو (1) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحن بن عوف، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في السهو (1232) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (82) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به مثله.

ورُوِي مثل هذا أيضًا عن أبي سعيد الخدري ولفظه:"إذا صلى أحدكم فلم يدرِ زاد أم نقص، فليسجد سجدتين وهو قاعد، فإذا أتاه الشيطان فقال: إنك قد أحدثتَ فليقل: كذبتَ، إلا ما وجد ريحًا بأنفه، أو صوتًا بأذنه".

رواه أبو داود (1029)، والترمذي (396)، وابن ماجة (1204) كلهم من طريق إسماعيل بن إبراهيم (المعروف بابن علية) عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن عياض (يعني ابن بلال) عن أبي سعيد الخدري فذكره واللفظ لأبي داود، واختصر الترمذي وابن ماجة في قوله:"إذا صلى أحدكم فلم يَدرِ كم صلى فليسجد سجدتين وهو جالس".

قال الترمذي:"حسن".

قلت: بل إسناده ضعيف، فإن عياض بن بلال، وقيل: ابن أبي زهير كذا ترجمه ابن حبان في الثقات (5/ 266) لم يوثقه غيره، تفرد بالرواية عنه يحيى بن أبي كثير، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مجهول" وترجمه باسم: عياض بن هلال.

قال الترمذي:"وقد رُوي هذا الحديث عن أبي سعيد من غير هذا الوجه".

قلت: إنه يقصد حديث أبي سعيد الآتي ذكره في البناء على اليقين، ثم سجود سجدتي السهو وعليه جمهور أهل العلم، ولكن ذهب الحسن البصري وبعض السلف إلى ظاهر هذه الأحاديث، فقالوا: إن المصلي إذا شك فلم يدرِ زاد أو نقص، فليس عليه إلا سجدتان.

وقال الجمهور: إنّ حديث أبي هريرة مجمل يفسره حديث أبي سعيد الخدري الآتي وهو:"إذا شك أحدكم في صلاته فلم يدر كم صلى ثلاثًا أو أربعًا؟ فليطرح الشكَّ، ولْيَيْنِ على ما استيقن، ثم
يسجد سجدتين قبل أن يُسلم"، لقد صدق الإمام أحمد رحمه الله تعالى عند ما قال:"الحديث يفسر بعضه بعضًا".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাতের জন্য দাঁড়ায়, তখন শয়তান এসে তাকে বিভ্রান্ত করে দেয়। ফলে সে জানে না যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে। যদি তোমাদের কেউ এমন অবস্থার সম্মুখীন হয়, তবে সে যেন বসা অবস্থায় দুটি সিজদা করে নেয়।"

আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে, যার শব্দগুলো হলো: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাত আদায় করে এবং সে জানে না যে সে (রাকাত) বাড়িয়েছে নাকি কমিয়েছে, তবে সে যেন বসা অবস্থায় দুটি সিজদা করে নেয়। আর যখন তার কাছে শয়তান এসে বলে, 'তুমি (পবিত্রতা) নষ্ট করেছ,' তখন সে যেন বলে, 'তুমি মিথ্যা বলেছ,' যদি না সে তার নাকে কোনো গন্ধ পায় অথবা কানে কোনো শব্দ শুনতে পায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2384)


2384 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا نُوديَ بالصلاة أدبر الشيطانُ وله ضراطٌ حتى لا يسمعَ الأذانَ، فإذا قُضِي الأذانُ أقبل، فإذا ثُوَّبَ بها أدْبَر، فإذا قُضِي التثويبُ أقبل حتى يَخطِرَ بين المرءِ ونفسه، يقول: أذكر كذا وكذا - ما لم يكن يذكرُ - حتى يَظَلَّ الرجلُ إن يدري كم صلَّى، فإذا لم يدْرِ أحدُكم كم صلَّى - ثلاثًا أو أربعًا - فليسجد سجدتين وهو جالس".

متفق عليه: رواه البخاري في السهو (1231)، ومسلم في المساجد (83: الرقم الصغير) كلاهما من طريق هشام بن أبي عبد الله الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر مثله ولفظهما سواء. ورواه مسلم من وجه آخر وزاد فيه:"فهنَّاه ومنَّاه، وذَكَّره من حاجاته ما لم يكُن يذكرُه".

وقوله:"إن يدري" إن هنا نافية بمعني ما.

وقوله:"فهنَّاه" ذكَّره المهانئ، و"منَّاه" عرضَ له الأماني، والمراد به: ما يعرض للإنسان في صلاته من أحاديث النفس ومواعيد الشيطان الكاذبة.

وقوله:"ثُوَّب" التثويب بالصلاة - إقامتها، والنداء بها."جامع الأصول" (5/ 548).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য আযান দেওয়া হয়, তখন শয়তান বায়ু ত্যাগ করতে করতে পিঠ ফিরিয়ে চলে যায়, যাতে সে আযান শুনতে না পায়। যখন আযান শেষ হয়ে যায়, তখন সে ফিরে আসে। আর যখন ইকামাত দেওয়া হয়, তখন সে আবার পিঠ ফিরিয়ে চলে যায়। যখন ইকামাত শেষ হয়, তখন সে ফিরে আসে। এমনকি সে ব্যক্তি ও তার মনের (চিন্তার) মাঝে অনুপ্রবেশ করে এবং বলতে থাকে: এটা স্মরণ করো, ওটা স্মরণ করো—যা সে আগে কখনো স্মরণ করেনি—যাতে লোকটি জানতে না পারে যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে। সুতরাং যখন তোমাদের কেউ না জানে যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে—তিন রাকাত না চার রাকাত—তখন সে যেন বসে বসেই দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2385)


2385 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا شك أحدكم في صلاته فلم يدْر كم صلَّى؟ ثلاثًا أم أربعًا؟ فليطرح الشكَّ، وليبْن على ما استيقَ، ثم يسجدْ سَجْدتين قبل أن يُسلِّم. فإن كان صلى خمسًا شفعنَ له صلاتَه، وإن كان صلَّى إتمامًا لأربع كانتا ترغيمًا للشيطان".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (571) من طريق سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري فذكر مثله.

اختلف على زيد بن أسلم فرواه عنه سليمان بن بلال كما رأيت موصولًا، وكذلك رواه كل من:

هشام بن سعد. أسند عنه أبو عوانة (2/ 193) قال: أخبرنا يونس بن عبد الأعلى، قال: أنبا ابن وهب، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم بمثل حديث سليمان بن بلال بتمامه.

وأبو غسان وهو محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أيضًا أبو عوانة وأحمد (3/ 87). وعبد العزيز بن أبي سلمة، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أيضًا أبو عوانة والنسائي (1239)، وأحمد (3/ 84).

وفليح بن سليمان، عن زيد بن أسلم، أسند عنه أحمد (3/ 72) عن يونس بن محمد، ثنا فليح
ابن سليمان به.

ومحمد بن عجلان، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أبو داود (1024)، والنسائي (1238)، وابن ماجة (1210).

وزاد أبو داود وابن ماجة واللفظ لابن ماجة:"فإن كانت صلاته تامةً كانت الركعةُ نافلةً، وإن كانت ناقصهً كانت الركعةُ لتمام صلاته، وكانت السجدتان رغْم أنْفِ الشيطان".

وفي لفظ أبي داود:"مُرَغّمَتَي الشيطان" وصحّحه الحاكم (1/ 327) على شرط مسلم، إلا أن محمد بن عجلان روي له مسلم متابعة، ومن عادة الحاكم أنه لا يفرق بين الأصالة والمتابعة.

وداود بن قيس، عن زيد بن أسلم بهذا الإسناد رواه مسلم في صحيحه عن أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، حدثني عمي عبد الله (ابن وهب) حدثني داود بن قيس به موصولًا كما قال سليمان بن بلال.


ولكن روى البيهقي (2/ 331) من طريق بحر بن نصر قال: قرئ على ابن وهب: أخبرك مالك بن أنس وداود بن قيس وهشام بن سعد أن زيد بن أسلم حدثهم، عن عطاء بن يسار، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث.

قال البيهقي: إلا أن هشامًا بلغ به أبا سعيد الخدري، هكذا رواه بحر بن نصر الخولاني وغيره، عن ابن وهب، ورواه أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، عن عمه ابن وهب فجعل الوصلَ لداود بن قيس، ثم رواه من طريق أبي بكر بن إسحاق، ثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب به وقال:"ورواه مسلم في الصحيح عن أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، ورواية بحر بن نصر كأنها أصح. وقد وصل الحديث جماعة، عن زيد بن أسلم مع سليمان بن بلال وهشام بن سعده". انتهى.

قلت: لم يذكر هذا الإسناد ابن خزيمة في صحيحه (1024).

وإنما رواه من طرق أخرى موصولة عن أبي سعيد الخدري منها يونس بن عبد الأعلى، نا ابن وهب، أخبرني هشام - وهو ابن سعد به.

فلعله أورده في المسند الكبير.

وأما مالك فأرسله عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، الصلاة: (62) قال ابن عبد البر: هكذا رواه جميع الرواة عن مالك إلا ما رُوي عن الوليد بن مسلم، عن مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم."الاستذكار" (4/ 348).

قال أبو داود بعد أن روى من طريق مالك ويعقوب بن عبد الرحمن القاري مرسلًا:"كذلك رواه ابن وهب عن مالك، وحفص بن ميسرة، وداود بن قيس، وهشام بن سعد إلا أن هشامًا بلغ به أبا سعيد الخدري".

ومعنى هذا أن مالك لم ينفرد بإرسال هذا الحديث بل تابعه أيضًا حفص بن ميسرة وداود بن قيس ويعقوب بن عبد الرحمن القاري.
فيظهر منه أن زيد بن أسلم كان يروي على وجهين مرسلًا وموصولًا. وذلك يعود إلى نشاطه وعدمه، فإذا نشط أوصل، وإن لم ينشط أرسل كما هو معلوم في علم الحديث. فالحجة مع من عنده الزيادة وهي الوصل. وبهذا صحَّ حديث أبي سعيد الخدري، وكان مسلم رحمه الله تعالى مصيبًا في اختيار الموصول.

هذا ما يتعلّق بالإمام الذي قام إلى الخامسة، فسبّح له فلم يلتفت وظنّ أنّه لم يسْهُ، فهل يقوم المأمومون معه أو لا؟ أجاب شيخ الإسلام فقال:"إن قاموا معه جاهلين لم تبطل صلاتهم، ولكن مع العلم لا ينبغي لهم أن يتابعوه بل ينتظرونه حتَّى يسلِّم بهم، أو يسلِّموا قبله، والانتظار أحسن". مجموع الفتاوي (23/ 53).




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন তোমাদের কারো সালাতে সন্দেহ হয় এবং সে জানে না যে সে কত রাকাত আদায় করেছে—তিন রাকাত না চার রাকাত? সে যেন সন্দেহ পরিহার করে এবং যে বিষয়ে সে নিশ্চিত (কম সংখ্যা), তার ভিত্তিতে সালাত আদায় করে। অতঃপর সালাম ফেরানোর পূর্বে সে যেন দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করে। যদি সে পাঁচ রাকাত আদায় করে থাকে, তাহলে এই দুটি সিজদা তার সালাতের জন্য জোড় (পূরক) হয়ে যাবে, আর যদি সে চার রাকাত পূর্ণ করে থাকে, তবে এই দুটি সিজদা শয়তানের প্রতি অবমাননা (অপমান) স্বরূপ হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2386)


2386 - عن عثمان بن عفان قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني صلَّيتُ فلم أدر أشفعتُ أم أوترتُ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إيايَ، وأن يتلعَّبَ بكم الشيطانُ في صلاتكم، من صلَّى منكم فلم يدرِ أشَفَعَ أو أوْتَر، فليسجدْ سجدتين، فإنهما تمام صلاته".

حسن: رواه الإمام أحمد (450) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، حدثنا مسَرَّةُ بن معبد، عن يزيد بن أبي كَبْشَة، عن عثمان بن عفان فذكر مثله.

وفي الإسناد مسرة بن معبد اللخمي الفلسطيني المقدسي قال فيه أبو حاتم:"شيخ ما به بأس"، ومثله يحسن حديثه.

وشيخه يزيد بن أبي كبشة السكسكي كان معروفًا في عصره، قال البخاري: كان عريف السكاسك، وذكره الهيثم بن عدي ومجالد بن سعيد فيمن وَلِيَ العراقين، وجاء له ذكر في صحيح البخاري في كتاب الجهاد (2996) إن إبراهيم أبا إسماعيل السكسكيّ قال: سمعتُ أبا بردة، واصطحب هو ويزيد بن أبي كبشة في سفر، فكان يزيد يصومُ في السفر فقال له أبو بردة: سمعتُ أبا موسى مرارًا يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مرض العبد، أو سافر، كُتِب له مثلُ ما كان يعملُ مقيمًا صحيحًا".

ويظهر منه أن الرجل كان محمود السيرة، وجاء له ذكر في كتب الحديث والتاريخ، ولم نجد فيها من تكلم فيه بسوء، وذكره ابن حبان في الثقات فمثله يحسن حديثه، وأما الحافظ فجعله في مرتبة"مقبول" على قاعدته وهي: أن كل من وثَّقه ابن حبان ولم يُوثِّقه غيره فهو"مقبول" عنده.

ولكن في الإسناد انقطاع فإن ابن أبي كبشة لم يسمع من عثمان، فإن بينهما مروان بن الحكم كما رواه عبد الله بن أحمد (451) عن يحيى بن معين وزياد بن أيوب، قالا: حدثنا سوَّار أبو عُمارة الرملي، عن مسرَّة بن معبد قال: صلى بنا يزيد بن أبي كبشة العصر، فانصرف إلينا بعد صلاته فقال: إني صلَّيتُ مع مروان بن الحكم، فسجد مثل هاتين السجدتين، ثم انصرف إلينا فأعلَمنا أنه
صلَّى مع عثمان وحدَّث عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله نحوه، فأقام سوَّار بن عمارة أو سوَّار أبو عُمارة

هذا الإسناد وهو"صدوق" قال فيه النسائي: ليس به بأس.

وحديث عثمان هذا مثل حديث أبي هريرة مجمل، يفسره حديث أبي سعيد الخدري.




উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি সালাত আদায় করেছি, কিন্তু আমি বুঝতে পারছি না যে আমি জোড় (রাকাআত) পড়েছি নাকি বেজোড় (বিতর) পড়েছি? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “সাবধান! শয়তান যেন তোমাদের সালাতে তোমাদেরকে নিয়ে খেলা না করে। তোমাদের মধ্যে যে সালাত আদায় করে এবং বুঝতে না পারে যে সে জোড় পড়েছে নাকি বেজোড়, সে যেন দুটি সিজদা করে নেয়। কারণ, এই দুটি সিজদাই হলো তার সালাতের পূর্ণতা।”









আল-জামি` আল-কামিল (2387)


2387 - عن وعن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا صلَّى أحدكم فلا يدري كم صلَّى، ثلاثًا أو أربعًا، فليركع ركعة، يُحسن ركوعَها وسجودَها، ويسجد سجدتين".

صحيح: رواه ابن خزيمة (1026)، والحاكم (1/ 260، 322) كلاهما من حديث أيوب بن سليمان بن بلال، حدثني أبو بكر بن أبي أويس، عن سليمان بن بلال، عن عمر بن محمد بن زيد، عن سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذه الزّيادة من ذكر الرابعة.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে এবং সে জানে না যে কত রাকাত পড়েছে, তিন রাকাত নাকি চার রাকাত, তখন সে যেন এক রাকাত রুকু করে, তার রুকু ও সিজদা উত্তমরূপে সম্পন্ন করে এবং দুটি সিজদা করে।