হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2348)


2348 - عن ابن عمر قال: رمَقْتُ النبي صلى الله عليه وسلم شهرًا، فكان يقرأ في الركعتين قبل الفجر: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.

صحيح: رواه الترمذي (417)، وابن ماجه (1149) كلاهما من طريق أبي أحمد الزبيري، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

قال الترمذي: حديث ابن عمر حديث حسن، لا نعرفه من حديث الثوري، عن أبي إسحاق إلا من حديث أبي أحمد، والمعروف عند الناس حديث إسرائيل، عن أبي إسحاق، وقد رُوِيَ عن أبي أحمد عن إسرائيل هذا الحديث أيضًا. وأبو أحمد الزبيري ثقة حافظ. قال: سمعت بندار يقول: ما رأيت أحدًا أحسن حفظًا من أبي أحمد الزبيري، وأبو أحمد اسمه: محمد بن عبد الله بن الزبير الكوفي الأسدي". انتهى.

ورواه النسائي (992) من وجه آخر عن أبي الجوَّاب، قال: حدثنا عمار بن رُزيق، عن أبي إسحاق، عن إبراهيم بن مهاجر، عن مجاهد، عن ابن عمر قال: رَمَقْتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عشرين مرة يقرأ في الركعتين بعد المغرب، وفي الركعتين قبل الفجر: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.

وأبو الجوَّاب اسمه: أحوص بن جوَّاب - بفتح الجيم، وتشديد الواو، الضبي، قال ابن معين ثقة، وقال أبو حاتم: صدوق.

وعمار بن رُزيق - مصغر - الضبي أو التيمي، وثقه يحيى بن معين، وأبو زرعة الرازيّ، وقال أبو حاتم:"لا بأس به".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক মাস ধরে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিবিড়ভাবে পর্যবেক্ষণ করেছিলাম। তিনি ফযরের পূর্বের দুই রাক'আতে 'ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন' এবং 'ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ' পাঠ করতেন।

[অন্য একটি বর্ণনায় ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন:] আমি বিশবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিবিড়ভাবে পর্যবেক্ষণ করেছি। তিনি মাগরিবের পরের দুই রাক'আতে এবং ফযরের পূর্বের দুই রাক'আতে 'ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন' ও 'ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ' পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2349)


2349 - عن جابر بن عبد الله أن رجلًا قام فركع ركعتي الفجر، فقرأ في الركعة الأولى: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} حتى انقضت السورة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هذا عبد عرف ربه" وقرأ في الآخرة: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}. حتى انقضي السورةُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا عبد آمن بربه".

فقال طلحة: فأنا أَستَحِبُّ أن أقرأ بهاتين السورتين في هاتين الركعتين.

حسن: أخرجه ابن حبان (2460) فقال: أخبرنا أحمد بن الحسن بن عبد الجبار الصوفي ببغداد، حدثنا يحيى بن معين، حدثنا يحيى بن عبد الله بن يزيد بن عبد الله بن أنيس الأنصاري، قال: سمعت طلحة بن خراش يحدث عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث.

ورواه أيضًا الطحاوي في شرحه (1/ 298) عن محمد بن إبراهيم البغدادي، عن يحيى بن معين
به مثله.

وإسناده حسن فإن يحيى بن عبد الله بن يزيد وشيخه طلحة بن خراش"صدوقان".

وفي الباب ما رُوي عن ابن مسعود. رواه الترمذي وغيره، وفيه عبد الملك بن الوليد بن معدان ضعيف.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة أيضًا في هذا الباب.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে ফাজরের (সুন্নাত) দুই রাকাত সালাত আদায় করল। সে প্রথম রাকাতে সূরা 'কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন' সম্পূর্ণ শেষ পর্যন্ত পড়ল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই বান্দা তার রবকে চিনতে পেরেছে।" এবং সে দ্বিতীয় রাকাতে সূরা 'কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ' সম্পূর্ণ শেষ পর্যন্ত পড়ল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই বান্দা তার রবের উপর ঈমান এনেছে।" তালহা বলেন, তাই আমি এই দুই রাকাতে এই দুটি সূরা পড়া পছন্দ করি।









আল-জামি` আল-কামিল (2350)


2350 - عن حفصة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا سكت المؤذِّن عن الأذان لصلاة الصُبح صلى ركعتين خفيفتين قبل أن تُقام الصلاة.

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (29) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، عن حفصة فذكرته، ورواه البخاري في الأذان (618) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المسافرين (718) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به إلا أن البخاري قال في لفظ الحديث:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اعتكف المؤذِّن للصبح، وبَدَا الصبح صلَّى ركعتين خفيفتين قبل أن تقام الصلاة".

فقوله: اعتكف قد استشكله كثير من العلماء وأجابوا عنه بأجوبة غير مقنعة فرجح الحافظ ابن حجر أنه محرف من لفظ"سكت".




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফজরের নামাযের জন্য মুআযযিন আযান শেষে নীরব হতেন, তখন তিনি নামাযের ইকামত দেওয়ার পূর্বে দুটি হালকা রাকাআত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2351)


2351 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يخفف الركعتين اللتين قبل صلاة الصبح حتى إني لأقول: هل قرأ بأم الكتاب أم لا؟ .

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1171)، ومسلم في المسافرين (724/ 92) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن، أنه سمع عمرة تحدث عن عائشة فذكرته.

ورواه مالك في صلاة الليل (30) عن يحيى بن سعيد، عن عائشة فأسقط في الإسناد اثنين.

وفي رواية شعبة عندهما عن محمد بن عبد الرحمن، عن عمته عمرة به.

ومحمد بن عبد الرحمن بن محمد بن عبد الرحمن بن سعد بن زرارة.

وعمرة هي: ابنة عبد الرحمن بن سعد بن زُرارة فتكون هي عمة أيه على الصحيح.

وفي البخاري (1170) من طريق مالك، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي بالليل ثلاث عشر ركعة، ثم يصلي إذا سمع النداء بالصبح ركعتين خفيفتين.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতের পূর্বের দুই রাক‘আত (সুন্নাত) এতই সংক্ষেপে আদায় করতেন যে, আমি বলতাম: তিনি কি উম্মুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) পাঠ করেছেন, নাকি করেননি?









আল-জামি` আল-কামিল (2352)


2352 - عن حفصة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أضاء الفجرُ صلى ركعتين.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (723: 89) عن محمد بن عباد، ثنا سفيان، عن
عمرو، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، قال: أخبرتني حفصة فذكرت الحديث.

وفي رواية عن زيد بن محمد قال: سمعت نافعًا يحدث عن ابن عمر عنها قالت: إذا طلع الفجر لا يُصلي إلا ركعتين خفيفتين.

ورواه ابن ماجه (1143) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أضاء له الفجرُ صلى ركعتين. وإسناده صحيح ورجاله ثقات غير أن المحفوظ هو عن ابن عمر، عن حفصة كما سبق.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন ফজর আলোকিত হতো (বা ফজর উদিত হতো), তখন তিনি দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2353)


2353 - عن حفصة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا اعتكف المؤذن للصبح وبدا الصبح صلي ركعتين خفيفتين قبل أن تقام الصلاة.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (618) عن عبد الله بن يوسف، قال: أخبرنا مالك، عن نافع، عن عبد الله بن عمر، قال: أخبرتني حفصة، فذكرت الحديث.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সুবহে সাদিকের জন্য মুয়াযযিন আযান শেষ করত এবং প্রভাত প্রকাশিত হতো, তখন তিনি সালাতের ইক্বামত শুরু হওয়ার পূর্বে দু'রাকাত সংক্ষিপ্ত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2354)


2354 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي ركعتي الفجر إذا سمع الأذان، يخففهما.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (724) عن عمرو الناقد، ثنا عبدة بن سليمان، ثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وفي رواية: إذا طلع الفجر.

وفي رواية: كان يصلي ركعتين بين النداء والإقامة من صلاة الصبح.




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আযান শুনতেন, তখন ফজরের দুই রাকাত সালাত সংক্ষেপে আদায় করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: যখন ফজর উদিত হতো (তখন আদায় করতেন)।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি ফজরের সালাতের জন্য আযান (নিদা) ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2355)


2355 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا توضأ صلى ركعتين، ثم خرج إلى الصلاة.

صحيح: رواه ابن ماجه (1146) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا أبو الأحوص، عن أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة فذكرت مثله.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، وأبو إسحاق وإن كان اختلط إلا أن أبا الأحوص روي عنه قبل الاختلاط، ومن طريقه روي له الشيخان كما قال البوصيري في زوائد ابن ماجه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ওযু করতেন, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত (নামায) আদায় করতেন, এরপর তিনি সালাতের জন্য বেরিয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2356)


2356 - عن عبد الله بن مالك بن بُحَيْنة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ برجل يُصَلِّي، وقد أقيمت صلاةُ الصبح فكلَّمه بشيءٍ، لا ندري ما هو، فلما انصرفنا أحطنا نقول: ماذا قال لك رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: قال لي:"يوشك أن يُصَلِّي أحدكم الصبح أربعًا؟" هذا لفظ مسلم.

ولفظ البخاري: فلما انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم لاث به الناسُ، وقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"آلصبح أربعًا آلصبحَ أربعًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (663)، ومسلم في صلاة المسافرين (711) كلاهما من
طريق إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن حفص بن عاصم، عن عبد الله بن مالك ابن بحينة فذكره.

وقوله: عبد الله بن مالك ابن بُحينة، والصواب: عبد الله بن بُحينة، فإن بُحينة بنت الحارث بن المطلب، واسمها عبدة، وبحينة لقبها هي والدة عبد الله، لا والدة مالك.

ومالك هو: والد عبد الله، ويكون اسمه الكامل هكذا: عبد الله بن مالك بن القِشْب.

قال ابن سعد: قدم مالك بن القشب مكة في الجاهلية، فحالف بني المطلب بن عبد مناف، وتزوج بحينة بنت الحارث بن المطلب.

وعلى هذا فيجب أن يكتب ابن بُحينة بزيادة ألف، ويُعرب إعراب عبد الله كما في عبد الله بن أبَيّ

بن سلول، ومحمد بن علي ابن الحنفية، انظر"الفتح" (2/ 149، 150).

وقوله: لاث به، أي: دار به، ولاذ به.




আব্দুল্লাহ ইবনু মালিক ইবনু বুহায়না (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে সালাত আদায় করছিল, অথচ ফজরের সালাতের ইক্বামত দেওয়া হয়ে গিয়েছিল। তিনি তাকে কিছু একটা বললেন, যা আমরা জানি না। যখন আমরা ফিরে এলাম, তখন আমরা তাকে ঘিরে ধরে বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে কী বললেন? সে বললো: তিনি আমাকে বললেন, “তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ ফজরের সালাত চার রাকাত পড়তে চলেছে!?”

এ হল মুসলিমের শব্দ। আর বুখারীর শব্দে এসেছে: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রস্থান করলেন, লোকেরা তাকে ঘিরে ধরল, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, “ফজর কি চার রাকাত? ফজর কি চার রাকাত?”









আল-জামি` আল-কামিল (2357)


2357 - عن عبد الله بن سرجس قال: دخل رجل المسجد، ورسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة الغداة، فصلى ركعتين في جانب المسجد، ثم دخل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا فلان! بأي الصلاتين اعتدت، بصلاتك وحدك، أم بصلاتك معنا؟".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (712) من طريق عاصم الأحول، عن عبد الله بن سَرْجِس فذكر مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনে সারজিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক মসজিদে প্রবেশ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতে (ব্যস্ত) ছিলেন। লোকটি মসজিদের একপাশে দুই রাকাত (সালাত) আদায় করল, অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (জামাআতে) শামিল হল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফিরালেন, তখন তিনি বললেন: "হে অমুক! তুমি কোন সালাতটি গণ্য করলে? তোমার একা সালাতটি, নাকি আমাদের সাথে (জামাআতে) আদায় করা সালাতটি?"









আল-জামি` আল-কামিল (2358)


2358 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أُقيمتِ الصلاة، فلا صلاة إلا المكتوبة".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (710) عن أحمد بن حنبل، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن وَرْقاءَ، عن عمرو بن دينار، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أيضًا من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، عن عمرو بن دينار به مثله.

قال حماد: ثم لقيت عمروًا فحدَّثني به ولم يرفعه. انتهى.

قلت: كذلك روي سفيان بن عيينة عن عمرو بن دينار ولم يرفعه.

قال الترمذي: والحديث المرفوع أصح عندنا.

وكذلك رجح المرفوع البغوي في"شرح السنة" (3/ 362) والنووي في"شرح مسلم" والبيهقي وغيرهم، لأن في الرفع زيادة، وهي مقبولة عند الجمهور.

وأما ما ورد من استثناء ركعتي الفجر ففي الإسناد حجاج بن نُصير، عن عباد بن كثير، عن ليث، وهم كلهم ضعفاء وهو مخرج بالتفصيل في"المنة الكبرى" (2/ 310).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য ইকামত দেওয়া হয়, তখন ফরয সালাত ছাড়া অন্য কোনো সালাত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (2359)


2359 - عن ابن عباس قال: أقيمت صلاةُ الصبح، فقام رجل يُصَلِّي الركعتين، فجذب رسول الله صلى الله عليه وسلم بثوبه فقال:"أتُصلي الصُّبح أربعًا؟".

حسن: رواه الإمام أحمد (2130) عن يزيد، حدثنا صالح بن رستم أبو عامر، عن عبد الله بن
أبي مليكة، عن ابن عباس فذكر مثله.

ورواه أيضًا (3329) عن وكيع، عن صالح بن رستم به ولفظه: أقيمت الصلاة، ولم أُصل الركعتين فرآني وأنا أصليهما فجذبني وقال:"أتُريد أن تُصلي الصبح أربعًا؟" فقيل لابن عباس: عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: نعم. فظهر من هذا أن الذي كان يصلي ركعتي الفجر بعد الإقامة هو ابن عباس نفسه ومثله رواه أيضًا أبو يعلى (2568)، وابن خزيمة في صحيحه (1124)، والحاكم (1/ 307) كلهم من طرق عن وكيع به مثله.

ورواه ابن حبان (2469) في صحيحه من وجه آخر عن أبي عامر الخزاز - وهو صالح بن رستم - به مثله.

وإسناده حسن فإن صالح بن رستم وإن كان من رجال مسلم إلا أنه مختلف فيه والخلاصة أنه حسن الحديث. وبقية رجاله ثقات، وتفرد يحيى بن سعيد القطان فرواه عن أبي عامر الخزاز، عن أبي يزيد، عن عكرمة، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل المسجد لصلاة الغداة، وإذا رجل يُصلي ركعتي الفجر فذكر الحديث.

رواه البزار - كشف الأستار - (518) عن إبراهيم بن محمد التيمي، ثنا يحيى بن سعيد القطان فذكره.

قال البزار:"رواه بعضهم عن ابن أبي مليكة، عن ابن عباس، ولا نعلم رواه بهذا الإسناد إلا يحيى عن أبي عامر".

قلت: لا يضر تفرد يحيى بن سعيد فإنه ثقة حافظ، وشيخ شيخه وهو أبو يزيد - المدني من أهل البصرة، لا يعرف اسمه، ولكنه اشتُهِر بكنيته، وثَّقه ابن معين وروى له البخاري، ومن عرف حجة على من لم يعرف.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফজরের সালাতের ইকামত দেওয়া হলো। তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে দু’রাকাআত (সুন্নাত) সালাত আদায় করতে লাগল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পোশাক ধরে টান দিলেন এবং বললেন: “তুমি কি ফজরের সালাত চার রাকাআত পড়বে?”









আল-জামি` আল-কামিল (2360)


2360 - عن أنس قال: خرج النبي صلى الله عليه وسلم حين أقيمتِ الصلاةُ، فرأى ناسًا يصلون ركعتين بالعجلة، فقال:"أصلاتان معا؟" فنهى أن يُصلَّى في المسجد إذا أقيمت الصلاة.

حسن: رواه ابن خزيمة (1126) عن علي بن حجر السعدي بخبر غريب غريب، قال: ثنا محمد بن عمار، يعني الأنصاري، عن شريك بن عبد الله - وهو ابن أبي نمر - عن أنس فذكره.

وإسناده حسن لأجل ابن أبي نمر فإنه وإن كان من رجال الشيخين إلا أنه اختلف فيه، والخلاصة أنه"صدوق يخطيء" كما في التقريب.

ورواه البزار من طريق ابن أبي نمر به وجعل أن ذلك في صلاة الصبح.

وهذا الحديث رُوِي مرفوعًا ومرسلًا، فأما المرفوع فكما ذكرتُ، ورواه مالك في صلاة الليل (31) عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه قال: سمع قوم الإقامة، فقاموا يصلون، فخرج عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أصلاتان معًا؟ أصلاتان معًا؟ ، وذلك في صلاة
الصبح في الركعتين اللتين قبل الصبح. انتهى.

قال ابن عبد البر في"الاستذكار" (5/ 302) رواه الوليد بن مسلم، عن مالك فأسنده عن أنس، والصواب عن مالك مرسلًا".

وهو كما قال فإنه رُوِيَ عن مالك مرسلًا، وعن غيره مرفوعًا ومرسلًا.

قال ابن خزيمة: روى هذا الخبر مالكُ بن أنس وإسماعيل بن جعفر عن شريك بن أبي نمر، عن أبي سلمة مرسلًا، وروى إبراهيم بن طهمان، عن شريك كلا الخبرين عن أنس، وعن أبي سلمة جميعًا.

حدثنا بهما محمد بن عقيل، ثنا حفص بن عبد الله، نا إبراهيم بن طهمان، بالإسنادين جميعًا منفردين، خبر أنس منفردًا، وخبر أبي سلمة منفردًا". انتهى.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সালাতের ইকামত দেওয়া হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বের হলেন। তিনি দেখলেন যে কিছু লোক দ্রুততার সাথে দুই রাকাত সালাত আদায় করছে, তখন তিনি বললেন: "দুইটি সালাত কি একসাথে?" অতঃপর তিনি নিষেধ করলেন যে ইকামত দেওয়া হলে মসজিদে যেন সালাত আদায় করা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2361)


2361 - عن أبي موسى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يُصَلِّي ركعتي الفجر حين أخذ المؤذن يُقيم، فغمز النبي صلى الله عليه وسلم منكبه وقال:"ألا كان هذا قبل هذا؟".

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط" كما في"مجمع البحرين" (771) عن أحمد بن حمدان أبي سعيد التستري بعبادان، ثنا إبراهيم بن يوسف الصيرفي، ثنا عبد الرحمن بن محمد المحاربي، عن سليمان الشيباني، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن يوسف الصيرفي، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2/ 75):"رجاله موثقون".

ونقل الشوكاني في"النيل" (2/ 314) عن العراقي أنه قال:"إسناده جيد".

وفي الباب أيضًا عن زيد بن ثابت وعائشة وابن عمر، وفي أسانيدهم كلام، وأحاديث الباب تدل على كراهة صلاة سنة الفجر عند إقامة الصلاة المكتوبة.

وأما ما رواه ابن ماجه (1147) من حديث علي رضي الله عنه أنه قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي الركعتين عند الإقامة، ففي إسناده الحارث الأعور وهو ضعيف، وقد رُميَ بالكذب، وضعَّفه البوصيري في زوائد ابن ماجه، ثم هو يخالف ما ثبت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان يبادر بهما عند سماع أذان الفجر.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন একজন ব্যক্তিকে দেখলেন, যে ফজরের দুই রাকাত (সুন্নাত) সালাত আদায় করছে, যখন মুয়াজ্জিন ইকামত দেওয়া শুরু করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাঁধে আলতো আঘাত করলেন এবং বললেন: "এটা কি এর আগে হওয়া উচিত ছিল না?"









আল-জামি` আল-কামিল (2362)


2362 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نام عن ركعتي الفجر فقضاهما بعد ما طلعت الشمس.

حسن: رواه ابن ماجه (1155) عن عبد الرحمن بن إبراهيم ويعقوب بن حُميد بن كاسب، قالا: حدثنا مروان بن معاوية، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن لأجل يزيد بن كيسان، وهو من رجال مسلم إلا أنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقد صحّحه ابن حبان فرواه في صحيحه (2652) من وجه آخر عن مروان بن معاوية به مثله.
وأصل الحديث في صحيح مسلم (680/ 310) عن يحيى بن سعيد، عن يزيد بن كيسان به في قصة تعريس النبي صلى الله عليه وسلم فلم يستيقظ حتى طلعت الشمس، وفيه: وسجد سجدتين، ثم أقيمت الصلاة فصلى الغداة، ومضى في كتاب الأذان.

ورواه الترمذي (423) عن عقبة بن مكرم العَمِّي البصري، حدثنا عمرو بن عاصم، حدثنا همام، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لم يُصلِّ ركعتي الفجر فليصلهما بعد ما تطلع الشمس".

قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفُه إلَّا من هذا الوجه".

وقد رُوي عن ابن عمر أنه فعله.

والعملُ على هذا عند بعض أهل العلم.

وبه يقول سفيانُ الثوريُّ، وابن المبارك، والشافعيُّ وأحمد، وإسحاقُ.

قال: ولا نعلم أحدًا رَوي هذا الحديث عن همّام بهذا الإسناد نحو هذا إلا عمرو بن عاصم الكِلابي.

والمعروفُ من حديث قتادة عن النضر بن أنس عن بشير بن نهيكٍ عن أبي هريرة عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك ركعة من صلاةِ الصبح قبل أن تطلع الشمسُ فقد أدرك الصبح".

وتعقبه الشيخ أحمد شاكر قائلًا بأنهما حديثان، وعمرو بن عاصم الكلابي ثقة حافظ فانفراده بهذه الرواية لا يضر، وقد رواه الحاكم (1/ 247) من طريق عمرو بن عاصم بلفظ:"من لم يصل ركعتي الفجر حتى تطلع الشمس فليصلهما" وصحّحه على شرط الشيخين، ورواه أيضًا بنحوه (1/ 306)، وصححه، وذكر الشارح أنه رواه أيضًا الدارقطني، انتهى.

وصحّحه ابن خزيمة (1117) فرواه من طريق عمرو بن عاصم به ولفظه:"من نسي ركعتي الفجر فليصلهما إذا طلعت الشمسُ".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের দুই রাকাত (সুন্নাত) না পড়ে ঘুমিয়ে গেলেন। অতঃপর সূর্য উদিত হওয়ার পর তিনি তা আদায় করে নিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2363)


2363 - عن قيس بن عمرو قال: رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا يُصَلِّي بعد الصبح ركعتين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الصبح ركعتان" فقال الرجل: إني لم أكن صليت الركعتين اللتين قبلهما، فصليتهما الآن. فسكت رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (1267) حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا ابن نمير، عن سعد بن سعيد، حدثني محمد بن إبراهيم، عن قيس بن عمرو فذكره.

ورواه أيضًا ابن ماجه (1154) عن أبي بكر بن أبي شية، قال: حدثنا ابن نمير به مثله، وأخرجه الحاكم في المستدرك (1/ 275) عن أبي بكر بن أبي شيبة به مثله إلا أنه سمى الصحابي باسم"قيس بن فهد".

ورواه الترمذي (422) عن محمد بن عمرو السواق البلخي، قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن سعد بن سعيد به، يقول قيس: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فأقيمت الصلاةُ، فصليتُ معه الصبحَ، ثم
انصرف النبي صلى الله عليه وسلم فوجدني أصلي. فقال:"مهلًا يا قيس! أصلاتان معًا؟" قلت: يا رسول الله! إني لم أكن ركعت ركعتي الفجر، قال:"فلا إذن".

قال الترمذي: حديث محمد بن إبراهيم لا نعرفه إلا من حديث سعد بن سعيد، وقال سفيان بن عيينة: سمع عطاء بن أبي رباح من سعد بن سعيد هذا الحديث، وإنما يروى هذا الحديث مرسلًا، وقال: سعد بن سعيد هو أخو يحيى بن سعيد الأنصاري، قال: وقيس هو جد يحيى بن سعيد الأنصاري، ويقال: هو"قيس بن عمرو"، ويقال هو:"قيس بن قهد" وإسناد هذا الحديث ليس بمتصل، محمد بن إبراهيم التيمي لم يسمع من قيس". انتهى

وقال أبو داود: حدثنا حامد بن يحيى البلخي، قال: قال سفيان: كان عطاء بن أبي رباح يحدث بهذا الحديث عن سعد بن سعيد.

قال أبو داود: وروى عبد ربه ويحيى ابنا سعيد هذا الحديث مرسلًا أن جدهم زيدًا صلى مع النبي صلى الله عليه وسلم، بهذه القصة". انتهى.

وقوله:"زيدًا" خطأ من النساخ، وإنما هو"قيس".

وحديث سفيان رواه البيهقي (2/ 456) من طريق الحميدي، عنه، عن سعد بن سعيد بن قيس الأنصاري، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن قيس جد سعد.

ورواه ابن خزيمة (1116) عن أبي الحسن عمر بن حفص، ثنا سفيان به مثله. وفيه انقطاع فإن محمد بن إبراهيم لم يسمع من قيس كما سبق.

وأما حديث عطاء بن أبي رباح فرواه ابن حزم في المحلي (3/ 154) من طريق الحسن بن ذكوان، عن عطاء، عن رجل من الأنصار. وهذا مرسل، فإن الرجل من الأنصار هو سعد بن سعيد كما قال أبو داود والترمذي.

ولكن نقل الشوكاني عن العراقي أنه حسَّن إسناده.

وقال: ويحتمل أن الرجل في حديث عطاء بن أبي رباح الذي أبهمه هو قيس بن عمرو فيكون الإسناد متصلًا. وهذا الاحتمال الثاني يؤيده ما رواه الطبراني في الكبير (18/ 367، 368) حدثنا إبراهيم بن متويه الأصبهاني، ثنا أحمد بن الوليد بن برد الأنطاكي، ثنا أيوب بن سهل، عن ابن جريج، عن عطاء أن قيس بن سهل الأنصاري حدَّث أنه دخل المسجد فذكر الحديث.

وأيوب بن سهل كما في النسخة المطبوعة، يبدو أنه محرف، والصواب: أيوب بن سويد، وهو الرملي السيباني الحميري روي عن ابن جريج وهو مختلف فيه والخلاصة أنه صدوق يخطئ.

قلت: ومثله لا بأس به في المتابعات.

وللحديث طريق آخر رواه ابن خزيمة (1116) عن الربيع بن سليمان المرادي ونصر بن مرزوق بخبر غريب غريب قالا: حدثنا أسد بن موسى، ثنا الليث بن سعد، حدثني يحيى بن سعيد، عن
أبيه، عن جده قيس بن عمرو أنه صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الصبح، ولم يكن ركع ركعتي الفجر، فلما سلم رسول الله صلى الله عليه وسلم قام، فركع ركعتي الفجر، ورسول الله صلى الله عليه وسلم ينظر إليه، فلم ينكر ذلك عليه.

ورواه ابن حبان (1563) عن ابن خزيمة، إلا أنه لم ينقل عنه أن الخبر غريب غريب. ورواه أيضًا الحاكم (1/ 274، 275) من طريق الربيع بن سليمان به، وقال: قيس بن فهد الأنصاري صحابي، والطريق إليه صحيح على شرطهما،

قلت: لكنْ أسد بن موسى وإنْ كان ثقة فليس من شرط الشيخين، وسعيد، والد يحيى لم يخرج له الشيخان، ولا أصحاب السنن، ذكره ابن حبان في الثقات (4/ 281)، وقال: روى عنه ابنه يحيى قلت: وقد روى عنه ابنه سعد وعبد ربه أيضًا كما مضى، فارتفعت عنه جهالة العين.

وإن كان لسعيد ابن آخر اسمه عبد الله فهو روى عنه أيضًا كما في مسند الإمام أحمد (23761) ثنا عبد الرزاق، أنا ابن جريج، قال وسمعت عبد الله بن سعيد أخا يحيى بن سعيد يحدث عن جده.

كما أن في إسناد الحاكم الربيع بن سليمان وهو ليس من شرط أحدهما.

والخلاصة أن الحديث لكثرة طرقه يرتقي إلى درجة الحسن لغيره، وله شاهد من حديث ثابت بن قيس بن شماس وفيه ضعف.

روى الطبراني في الكبير (2/ 69) عن ثابت بن قيس بن شماس قال: أتيتُ المسجد، والنبي صلى الله عليه وسلم في الصلاة، فلما سلَّم النبي صلى الله عليه وسلم في التفت إلي وأنا أصلي، فجعل ينظر إلي، وأنا أصلي، فلما فرغتُ قال:"ألم تُصل معنا؟" قلت: نعم، قال:"فما هذه الصلاة؟" قلت: يا رسول الله! ركعتا الفجر، خرجت من منزلي، ولم أكن صليتهما، قال: فلم يُعب ذلك عليَّ.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 228): فيه راويان لم يسميا، وبقية بن الوليد، عن الجراح بن منهال بالعنعنة، والجراح منكر الحديث، قاله البخاري. انتهى.

والخلاصة كما قلت في"المنة الكبرى" (2/ 323): إن حديث قيس بن فهد مع متابعاته وشاهده لا ينزل عن درجة الحسن، وهو يخصص النهي الوارد عن الصلوات بعد الصبح، ومن ناحية النظر: هي صلاة محلها قبل طلوع الشمس، فيستحب أداؤها في وقتها، وأما النهي عن الصلوات بعد الصبح حتى تطلع الشمس فهو خاص بالصلوات التي تُصلي بدون سبب، وركعتا الفجر من الصلوات التي ورد فيها التأكيد من الشارع، وهو سبب في أدائها". انتهى.

وبه قال الشافعي وأحمد وقوم من أهل مكة، ورُوِي هذا عن عبد الله بن عمر ورُوي عنه أيضًا أنه صلَّى بعد طلوع الشمس، وكأنَّه ذهب إلى كلا الأمرين، وكذا نُقل عن الشافعي أيضًا.

وقال أبو حنيفة وأصحابه: إن أحبَّ قَضَاهما إذا ارتفعت الشمس، فإن لم يفعل فلا شيء عليه، لأنه تطوع، وقال مالك: يقضيهما ضُحىً إلى زوال الشمس، ولا يقضيهما بعد الزوال، انظر:
"معالم السنن" للخطابي.




কায়স ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন লোককে ফজরের সালাতের পর দু’রাকাআত সালাত আদায় করতে দেখলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “ফজরের (ফরয) সালাত তো দু’রাকাআত।” লোকটি বললো, আমি তার (ফরযের) আগের দু'রাকাআত (সুন্নাত) পড়িনি, তাই এখন তা আদায় করছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চুপ থাকলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2364)


2364 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلى ركعتي الفجر، اضطجع على شِقِّه الأيمن.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1160) عن عبد الله بن يزيد، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، قال: حدثني أبو الأسود، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرت مثله.

ورواه مسلم (736) بإسناد آخر وسيأتي بكامله في صلاة الليل، باب عدد صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ফজরের দুই রাকাত (সুন্নাত) সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি তাঁর ডান পাশে কাত হয়ে শয়ন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2365)


2365 - عن أبي هريرة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلّى الفجر اضطجع.

صحيح: رواه ابن ماجه (1199) عن عمر بن هشام، قال: حدّثنا النّضر بن شميل، قال: أنبأنا شعبة، قال: حدّثني سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.

وأما ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا صلى أحدكم الركعتين قبل الصبح فليضطجع على يمينه". فهو منكر.

رواه أبو داود (1261)، والترمذي (420) وأحمد (9368) كلهم من طريق عبد الواحد بن زياد، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

وزاد أبو داود: فقال له مروان بن الحكم: أما يجزئ أحدَنا ممشاه إلى المسجد حتى يضطجع على يمينه؟ .

قال عبيد الله بن عمر بن ميسرة (الراوي عن عبد الواحد عند أبي داود): لا. قال: فبلغ ذلك ابن عمر فقال: أكثر أبو هريرة على نفسه، قال: فقيل لابن عمر: هل تنكر شيئًا مما يقول؟ قال: لا، ولكنه اجترأ وجَبُنَّا.

قال: فبلغ ذلك أبا هريرة، قال:"فما ذنبي إن كنت حفظت ونسوا" انتهى.

قال الترمذي: حديث أبي هريرة حسن، وفي نسخة:"حسن صحيح" وصحّحه ابن خزيمة (1120) وابن حبان (2468) فروياه من طريق عبد الواحد بن زياد به مثله.

وقال النووي في"شرح مسلم" (6/ 19): إسناده على شرط الشيخين، وصحّحه أيضًا في"المجموع" (4/ 28).

قلت: وعبد الواحد بن زياد وإن كان من رجال الشيخين إلا أنه تكلم فيه بعضُ النقاد من قبل حفظه، وقالوا: إنه لم يكن يحفظ حديث الأعمش؛ ولذا قالوا: إنّه انفرد عن أصحاب الأعمش فجعله من أمر النّبيّ صلى الله عليه وسلم. وقد رواه سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، من فعل النبي
- صلى الله عليه وسلم كما مضى، وكذلك رواه محمد بن إبراهيم عن أبي صالح، عن أبي هريرة، حكاية عن فعل النبي صلى الله عليه وسلم، قال البيهقي (3/ 45):"وهذا أولى أن يكون محفوظا لموافقته سائر الروايات عن عائشة وابن عباس". انتهى

وقال الزّركشيّ في"النكت على مقدمة ابن الصّلاح" (2/ 163):"قال البيهقيّ: خالف عبد الواحد العدد الكثير في هذا الحديث، فإنّ النّاس إنّما رووه من فعل النبي صلى الله عليه وسلم لا من أمره، وانفرد عبد الواحد من بين ثقات أصحاب الأعمش بهذا اللّفظ".

وقال الذّهبيّ في"الميزان" في ترجمة عبد الواحد بن زياد العبدي البصري أحد المشاهير احتجّا به في الصّحيحين، وتجنّبا تلك المناكير التي نُقمت عليه، فيحدّث عن الأعمش بصيغة السّماع، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا صلّى أحدكم الركعتين قبل الصّبح فليضطجع على يمينه" أخرجه أبو داوده.

ونقل الحافظ ابن القيم عن شيخ الإسلام ابن تيمية من قوله:"هذا باطل، وليس بصحيح، وإنّما الصّحيح عنه الفعل لا الأمر بها، والأمر تفرّد به عبد الواحد بن زياد، وغلط فيه". زاد المعاد (1/ 319).

وأما حديث ابن عباس الذي أشار إليه البيهقي ففيه انقطاع كما قال.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ফজরের সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি (ডান কাতে) শুয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2366)


2366 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا صلَّى فإن كنت مستيقظة حدثني وإلا اضطجع حتى يؤذَّن بالصلاة.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1161)، ومسلم في صلاة المسافرين (743) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، قال: حدثني سالم أبو النضر، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرت مثله.

قلت: هكذا بوَّبه البخاري، قال الحافظ في الفتح:"أشار بهذه الترجمة إلى أنه صلى الله عليه وسلم لم يكن يداوم عليها، وبذلك احتج الأئمة على عدم الوجوب، وحملوا الأمر الوارد في حديث أبي هريرة عند أبي داود وغيره على الاستحباب، وفائدة ذلك الراحة والنشاط لصلاة الصبح، وعلى هذا فلا يُستحب ذلك إلا للمتهجد وبه جزم ابن العربي". انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (রাতের) সালাত সমাপ্ত করতেন, তখন যদি আমি সজাগ থাকতাম, তবে তিনি আমার সাথে কথা বলতেন; আর যদি না (সজাগ থাকতাম), তবে তিনি শুয়ে পড়তেন, যতক্ষণ না (পরবর্তী) সালাতের জন্য আযান দেওয়া হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (2367)


2367 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى أربع ركعات قبل الظهر، وأربعًا بعدها حَرَّمَ الله لحمَه على النار".

صحيح: رواه النسائي (1812) من طريق موسى بن أعين، عن أبي عمرو الأوزاعي، عن حسان بن عطية قال: لما نُزل بعنبسة، جعل يتضَوَّر، فقيل له: فقال: أما إني سمعت أم حبيبة زوج
النبي صلى الله عليه وسلم تحدث فذكر الحديث وقال: فما تركتُهن منذ سمعتُهن. وإسناده صحيح.

وقوله: يتضوَّر - يُظهر الضور بمعنى الضر، يقال: ضاره يضوره ويضيره، وآخر الحديث يفيد أنه كان يفعل ذلك فرحًا بالموت اعتمادًا على صدق الموعد. كذا قاله السيوطي.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (26762) عن رَوح، قال: حدثنا الأوزاعي به وفيه: لما نزل بعنبسة بن أبي سفيان الموتُ، اشتدَّ جزعُه، فقيل له: ما هذا الجزعُ؟ قال: أما إني سمعت أم حبيبة، يعني أخته تقول فذكر الحديث.

ورَوح هو: ابن عُبادة. وهذا من أصح الأسانيد التي روي عنه هذا الحديث.

وتابع حسانَ بن عطية القاسمُ أبو عبد الرحمن، ومن طريقه رواه الترمذي (428)، والنسائي. قال الترمذي:"حسن صحيح غريب من هذا الوجه. والقاسم هو: ابن عبد الرحمن يكنى أبا عبد الرحمن، وهو مولى عبد الرحمن بن خالد بن معاوية ثقة شامي، وهو صاحب أبي أمامة". انتهى

وأخرجه أبو داود (1269)، والنسائي من طريق مكحول، عن عنبسة بن أبي سفيان به مثله، قال النسائي: مكحول لم يسمع من عنبسة شيئًا.

ورواه أيضًا الترمذي (427)، والنسائي، وابن ماجه (1160) من طريق محمد بن عبد الله الشُعيثي، عن أبيه، عن عنبسة بن أبي سفيان به مثله، قال الترمذي: حسن غريب.

قلت: بل هذا الإسناد ضعيف لأجل عبد الله الشُعيني أبي محمد وهو: ابن المهاجر، فإنه لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول".

وأما ابنه محمد فهو"صدوق". ولا بأس بذكر هذه الأسانيد للتقوية.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি যুহরের (ফরযের) পূর্বে চার রাকাত এবং তার পরে চার রাকাত সালাত (নফল/সুন্নাত) আদায় করবে, আল্লাহ তার দেহকে জাহান্নামের আগুনের জন্য হারাম করে দেবেন।"