আল-জামি` আল-কামিল
2381 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى العصر، فقام رجل يُصلِّي فرآه عمر فقال له: اجلسْ، فإنما هلك أهل الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصلٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحسنَ ابن الخطاب".
صحيح: رواه أحمد (23121) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن الأزرق بن قيس، عن عبد الله بن رباح، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أبو يعلى (7130 تحقيق الأثري) عن محمد بن بشار، حدثنا محمد (وهو ابن جعفر) به مثله، وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 234):"رواه أحمد وأبو يعلى ورجال أحمد رجال الصحيح"، وهو كما قال إلا أن رجال أبي يعلى مثله غير شيخه محمد بن بشار وهو: ابن عثمان العبدي أيضًا من رجال الشيخين.
وأما ما رواه أبو داود (1007) عن عبد الوهاب بن نجدة، حدثنا أشعث بن شُعبة، عن المنهال بن خليفة، عن الأزرق بن قيس قال: صلى بنا إمام لنا يُكنَّى أبا رِمْثة فقال: صليت هذه الصلاة، أو مثل هذه الصلاة مع النبي صلى الله عليه وسلم قال: وكان أبو بكر وعمر يقومان في الصف المقدم عن يمينه، وكان رجل قد شهد التكبيرة الأولى من الصلاة، فصلى نبي الله، ثم سلَّم عن يمينه وعن يساره حتى رأينا بياض خديه، ثم انفتل كانفتال أبي رِمْثَة. يعني نفسه، فقام الرجل الذي أدرك معه التكبيرة الأولى من الصلاة يشفعُ، فوثب إليه عمر، فأخذ بمنكِبِه فهزَّه ثم قال: اجلس فإنه لم يهلك أهل الكتاب إلا أنه لم يكن بين صلواتهم فصل، فرفع النبي صلى الله عليه وسلم بصرَه فقال:"أصاب الله بك يا ابن الخطاب".
ففيه أشعث بن شعبة، قال فيه أبو حاتم: لين. ولم بوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول".
والمنهال بن خليفة العجلي أبو قدامة الكوفي"ضعيف"، وقال فيه البخاري: صالح فيه نظر، وقال النسائي: ضعيف، وقال ابن حبان: كان ينفرد بالمناكير عن المشاهير لا يجوز الاحتجاج به.
وأما الحاكم (1/ 270)، فقال: صحيح على شرط مسلم، وهذا وهم منه رحمه الله تعالى،
ولذا تعقبه الذهبي بقوله:"المنهال ضعَّفه ابن معين وأشعث فيه لين، والحديث منكر".
وكذلك ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله:"أيعجز أحدكم أن يتقدم، أو يتأخر، أو عن يمينه أو عن شماله" يعني في السبحة.
رواه أبو داود (1006)، وابن ماجه (1427) كلاهما من طريق ليث، عن حجاج بن عبيد، عن إبراهيم بن إسماعيل، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف لوجود الضعفاء والمجاهيل في الإسناد.
منهم: ليث وهو: ابن أبي سليم وهو ضعيف، وشيخه الحجاج بن عبيد، وشيخه إبراهيم بن إسماعيل وهو: الحجازي مجهولان.
قال البخاري في التاريخ الكير (1/ 340) بعد أن ساق الإسناد من طريق لبث به، ومن وجه آخر عن ليث، عن أبي حمزة حُدَّثْتُ به عن أبي هريرة.
"لم يثبت هذا الحديث".
وقال في صحيحه (2/ 334) في كتاب الأذان في باب مكث الإمام في مصلاه: ويُذكر عن أبي هريرة رفعه: لا يتطوع الإمام في مكانه: ولم يصح".
قال الحافظ في"الفتح" (2/ 335) معلّقًا على قول البخاري: وذلك لضعف إسناده واضطرابه، وتفرد به ليث بن أبي سُلَيم وهو ضعيف".
قلت: ولكن ليس في الحديث ذكر الإمام، وإنما فيه العموم، ويدخل فيه أيضًا الإمام.
وكذلك ما رُوِي عن المغيرة بن شعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصل الإمام في الموضع الذي صلى فيه حتى يتحول" رواه أبو داود (616) قال: حدثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدثنا عبد العزيز بن عبد الملك القرشي، حدثنا عطاء الخراساني، عن المغيرة بن شعبة فذكره.
قال أبو داود: عطاء الخراساني لم يدرك المغيرة بن شعبة.
قلت: مات المغيرة بن شعبة الصحابي المشهور سنة خمسين على الصحيح، وعطاء وهو: ابن أبي مسلم أبو عثمان الخراساني ولد في هذه السنة، ومات سنة خمس وثلاثين ومائة وهو صدوق بهم كثيرًا، ويُرسل ويُدلس، ففي الإسناد انقطاع.
ورواه ابن ماجه (1428، 1429) من وجه آخر عن عثمان بن عطاء، عن أبيه، عن المغيرة بلفظ:"لا يُصلي الإمام في مقامه الذي صلى فيه المكتوبة، حتى يتنحَّى عنه" وفيه مع الانقطاع عثمان بن عطاء بن أبي مسلم الخراساني ضعيف، ضعَّفه ابن معين وغيره.
وقال الحاكم أبو عبد الله: يَروي عن أبيه أحاديث موضوعة.
فقه الباب:
وأحاديث الباب تدل على أن لا يَصِل المكتوبة بالتطوع من غير فصلٍ خشية الالتباس، وقد
أرشد النبي صلى الله عليه وسلم إلى ذلك بأن يتقدم أو يتكلم، ويدل عليه حديث معاوية، وحديث التنحي وإن لم يثبت ففي حديث معاوية"أن يخرج" قريب منه. فمن اشتغل بعد السلام بالأذكار المأثورة فإن ذلك يكفي، وعليه جمهور أهل العلم لقوله في حديث معاوية:"أو يتكلم".
وقال الحنفية: لا بأس أن يتطوع قبل الذكر المأثور في مكانه عقب الفرائض فإن السلام يفصل بينهما.
وأما الإمام فكره الجمهور أن يتطوع في مكانه بعد صلاته وبه قال أبو حنيفة ومالك وأحمد وإسحاق ورُوي ذلك عن علي وغيره. وما رواه البخاري عن نافع قال:"كان ابن عمر يصلي في مكانه الذي صلى فيه الفريضة" كان مأمومًا لا إمامًا.
وفيه إشارة إلى أن البخاري يرجح للمأموم أن يصلي في مكانه.
قلت: وهو الذي قال به الجمهور على أن يفصل بالأذكار المأثورة، أو الكلام كما تقدم، وبه كان يأمر ابن عباس كما رواه عطاء عنه أنه كان يأمر إذا صلى أحد المكتوبة، أن يتكلم أو يتقدم، وروي مثل هذا عن ابن عمر أنه كان يكره أن يصلي النافلة في المكان الذي يصلي فيه المكتوبة حتى يتقدم أو يتأخر أو يتكلم.
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের সালাত আদায় করলেন। তখন এক ব্যক্তি (সালাম ফিরানোর পর) দাঁড়িয়ে (নফল) সালাত আদায় করতে লাগল। তাকে দেখে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "বসে যাও! নিশ্চয়ই আহলে কিতাবগণ ধ্বংস হয়েছিল এই কারণে যে, তাদের সালাতগুলোর মধ্যে কোনো বিচ্ছেদ ছিল না।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনুল খাত্তাব উত্তম কাজ করেছে/সঠিক বলেছে।"
2382 - عن * *
হতে * *
2383 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ أحدكم إذا قام يُصلي، جاءه الشيطان، فلَبَسَ عليه. حتى لا يدري كم صلَّى؟ فإذا وجد أحدكم فليسجد سجدتين، وهو جالس".
متفق عليه: رواه مالك في السهو (1) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحن بن عوف، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه البخاري في السهو (1232) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (82) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به مثله.
ورُوِي مثل هذا أيضًا عن أبي سعيد الخدري ولفظه:"إذا صلى أحدكم فلم يدرِ زاد أم نقص، فليسجد سجدتين وهو قاعد، فإذا أتاه الشيطان فقال: إنك قد أحدثتَ فليقل: كذبتَ، إلا ما وجد ريحًا بأنفه، أو صوتًا بأذنه".
رواه أبو داود (1029)، والترمذي (396)، وابن ماجة (1204) كلهم من طريق إسماعيل بن إبراهيم (المعروف بابن علية) عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن عياض (يعني ابن بلال) عن أبي سعيد الخدري فذكره واللفظ لأبي داود، واختصر الترمذي وابن ماجة في قوله:"إذا صلى أحدكم فلم يَدرِ كم صلى فليسجد سجدتين وهو جالس".
قال الترمذي:"حسن".
قلت: بل إسناده ضعيف، فإن عياض بن بلال، وقيل: ابن أبي زهير كذا ترجمه ابن حبان في الثقات (5/ 266) لم يوثقه غيره، تفرد بالرواية عنه يحيى بن أبي كثير، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مجهول" وترجمه باسم: عياض بن هلال.
قال الترمذي:"وقد رُوي هذا الحديث عن أبي سعيد من غير هذا الوجه".
قلت: إنه يقصد حديث أبي سعيد الآتي ذكره في البناء على اليقين، ثم سجود سجدتي السهو وعليه جمهور أهل العلم، ولكن ذهب الحسن البصري وبعض السلف إلى ظاهر هذه الأحاديث، فقالوا: إن المصلي إذا شك فلم يدرِ زاد أو نقص، فليس عليه إلا سجدتان.
وقال الجمهور: إنّ حديث أبي هريرة مجمل يفسره حديث أبي سعيد الخدري الآتي وهو:"إذا شك أحدكم في صلاته فلم يدر كم صلى ثلاثًا أو أربعًا؟ فليطرح الشكَّ، ولْيَيْنِ على ما استيقن، ثم
يسجد سجدتين قبل أن يُسلم"، لقد صدق الإمام أحمد رحمه الله تعالى عند ما قال:"الحديث يفسر بعضه بعضًا".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাতের জন্য দাঁড়ায়, তখন শয়তান এসে তাকে বিভ্রান্ত করে দেয়। ফলে সে জানে না যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে। যদি তোমাদের কেউ এমন অবস্থার সম্মুখীন হয়, তবে সে যেন বসা অবস্থায় দুটি সিজদা করে নেয়।"
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে, যার শব্দগুলো হলো: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাত আদায় করে এবং সে জানে না যে সে (রাকাত) বাড়িয়েছে নাকি কমিয়েছে, তবে সে যেন বসা অবস্থায় দুটি সিজদা করে নেয়। আর যখন তার কাছে শয়তান এসে বলে, 'তুমি (পবিত্রতা) নষ্ট করেছ,' তখন সে যেন বলে, 'তুমি মিথ্যা বলেছ,' যদি না সে তার নাকে কোনো গন্ধ পায় অথবা কানে কোনো শব্দ শুনতে পায়।"
2384 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا نُوديَ بالصلاة أدبر الشيطانُ وله ضراطٌ حتى لا يسمعَ الأذانَ، فإذا قُضِي الأذانُ أقبل، فإذا ثُوَّبَ بها أدْبَر، فإذا قُضِي التثويبُ أقبل حتى يَخطِرَ بين المرءِ ونفسه، يقول: أذكر كذا وكذا - ما لم يكن يذكرُ - حتى يَظَلَّ الرجلُ إن يدري كم صلَّى، فإذا لم يدْرِ أحدُكم كم صلَّى - ثلاثًا أو أربعًا - فليسجد سجدتين وهو جالس".
متفق عليه: رواه البخاري في السهو (1231)، ومسلم في المساجد (83: الرقم الصغير) كلاهما من طريق هشام بن أبي عبد الله الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر مثله ولفظهما سواء. ورواه مسلم من وجه آخر وزاد فيه:"فهنَّاه ومنَّاه، وذَكَّره من حاجاته ما لم يكُن يذكرُه".
وقوله:"إن يدري" إن هنا نافية بمعني ما.
وقوله:"فهنَّاه" ذكَّره المهانئ، و"منَّاه" عرضَ له الأماني، والمراد به: ما يعرض للإنسان في صلاته من أحاديث النفس ومواعيد الشيطان الكاذبة.
وقوله:"ثُوَّب" التثويب بالصلاة - إقامتها، والنداء بها."جامع الأصول" (5/ 548).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য আযান দেওয়া হয়, তখন শয়তান বায়ু ত্যাগ করতে করতে পিঠ ফিরিয়ে চলে যায়, যাতে সে আযান শুনতে না পায়। যখন আযান শেষ হয়ে যায়, তখন সে ফিরে আসে। আর যখন ইকামাত দেওয়া হয়, তখন সে আবার পিঠ ফিরিয়ে চলে যায়। যখন ইকামাত শেষ হয়, তখন সে ফিরে আসে। এমনকি সে ব্যক্তি ও তার মনের (চিন্তার) মাঝে অনুপ্রবেশ করে এবং বলতে থাকে: এটা স্মরণ করো, ওটা স্মরণ করো—যা সে আগে কখনো স্মরণ করেনি—যাতে লোকটি জানতে না পারে যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে। সুতরাং যখন তোমাদের কেউ না জানে যে সে কত রাকাত সালাত আদায় করেছে—তিন রাকাত না চার রাকাত—তখন সে যেন বসে বসেই দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করে নেয়।"
2385 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا شك أحدكم في صلاته فلم يدْر كم صلَّى؟ ثلاثًا أم أربعًا؟ فليطرح الشكَّ، وليبْن على ما استيقَ، ثم يسجدْ سَجْدتين قبل أن يُسلِّم. فإن كان صلى خمسًا شفعنَ له صلاتَه، وإن كان صلَّى إتمامًا لأربع كانتا ترغيمًا للشيطان".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (571) من طريق سليمان بن بلال، عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري فذكر مثله.
اختلف على زيد بن أسلم فرواه عنه سليمان بن بلال كما رأيت موصولًا، وكذلك رواه كل من:
هشام بن سعد. أسند عنه أبو عوانة (2/ 193) قال: أخبرنا يونس بن عبد الأعلى، قال: أنبا ابن وهب، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم بمثل حديث سليمان بن بلال بتمامه.
وأبو غسان وهو محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أيضًا أبو عوانة وأحمد (3/ 87). وعبد العزيز بن أبي سلمة، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أيضًا أبو عوانة والنسائي (1239)، وأحمد (3/ 84).
وفليح بن سليمان، عن زيد بن أسلم، أسند عنه أحمد (3/ 72) عن يونس بن محمد، ثنا فليح
ابن سليمان به.
ومحمد بن عجلان، عن زيد بن أسلم. أسند عنه أبو داود (1024)، والنسائي (1238)، وابن ماجة (1210).
وزاد أبو داود وابن ماجة واللفظ لابن ماجة:"فإن كانت صلاته تامةً كانت الركعةُ نافلةً، وإن كانت ناقصهً كانت الركعةُ لتمام صلاته، وكانت السجدتان رغْم أنْفِ الشيطان".
وفي لفظ أبي داود:"مُرَغّمَتَي الشيطان" وصحّحه الحاكم (1/ 327) على شرط مسلم، إلا أن محمد بن عجلان روي له مسلم متابعة، ومن عادة الحاكم أنه لا يفرق بين الأصالة والمتابعة.
وداود بن قيس، عن زيد بن أسلم بهذا الإسناد رواه مسلم في صحيحه عن أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، حدثني عمي عبد الله (ابن وهب) حدثني داود بن قيس به موصولًا كما قال سليمان بن بلال.
ولكن روى البيهقي (2/ 331) من طريق بحر بن نصر قال: قرئ على ابن وهب: أخبرك مالك بن أنس وداود بن قيس وهشام بن سعد أن زيد بن أسلم حدثهم، عن عطاء بن يسار، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث.
قال البيهقي: إلا أن هشامًا بلغ به أبا سعيد الخدري، هكذا رواه بحر بن نصر الخولاني وغيره، عن ابن وهب، ورواه أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، عن عمه ابن وهب فجعل الوصلَ لداود بن قيس، ثم رواه من طريق أبي بكر بن إسحاق، ثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب به وقال:"ورواه مسلم في الصحيح عن أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، ورواية بحر بن نصر كأنها أصح. وقد وصل الحديث جماعة، عن زيد بن أسلم مع سليمان بن بلال وهشام بن سعده". انتهى.
قلت: لم يذكر هذا الإسناد ابن خزيمة في صحيحه (1024).
وإنما رواه من طرق أخرى موصولة عن أبي سعيد الخدري منها يونس بن عبد الأعلى، نا ابن وهب، أخبرني هشام - وهو ابن سعد به.
فلعله أورده في المسند الكبير.
وأما مالك فأرسله عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، الصلاة: (62) قال ابن عبد البر: هكذا رواه جميع الرواة عن مالك إلا ما رُوي عن الوليد بن مسلم، عن مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم."الاستذكار" (4/ 348).
قال أبو داود بعد أن روى من طريق مالك ويعقوب بن عبد الرحمن القاري مرسلًا:"كذلك رواه ابن وهب عن مالك، وحفص بن ميسرة، وداود بن قيس، وهشام بن سعد إلا أن هشامًا بلغ به أبا سعيد الخدري".
ومعنى هذا أن مالك لم ينفرد بإرسال هذا الحديث بل تابعه أيضًا حفص بن ميسرة وداود بن قيس ويعقوب بن عبد الرحمن القاري.
فيظهر منه أن زيد بن أسلم كان يروي على وجهين مرسلًا وموصولًا. وذلك يعود إلى نشاطه وعدمه، فإذا نشط أوصل، وإن لم ينشط أرسل كما هو معلوم في علم الحديث. فالحجة مع من عنده الزيادة وهي الوصل. وبهذا صحَّ حديث أبي سعيد الخدري، وكان مسلم رحمه الله تعالى مصيبًا في اختيار الموصول.
هذا ما يتعلّق بالإمام الذي قام إلى الخامسة، فسبّح له فلم يلتفت وظنّ أنّه لم يسْهُ، فهل يقوم المأمومون معه أو لا؟ أجاب شيخ الإسلام فقال:"إن قاموا معه جاهلين لم تبطل صلاتهم، ولكن مع العلم لا ينبغي لهم أن يتابعوه بل ينتظرونه حتَّى يسلِّم بهم، أو يسلِّموا قبله، والانتظار أحسن". مجموع الفتاوي (23/ 53).
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন তোমাদের কারো সালাতে সন্দেহ হয় এবং সে জানে না যে সে কত রাকাত আদায় করেছে—তিন রাকাত না চার রাকাত? সে যেন সন্দেহ পরিহার করে এবং যে বিষয়ে সে নিশ্চিত (কম সংখ্যা), তার ভিত্তিতে সালাত আদায় করে। অতঃপর সালাম ফেরানোর পূর্বে সে যেন দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করে। যদি সে পাঁচ রাকাত আদায় করে থাকে, তাহলে এই দুটি সিজদা তার সালাতের জন্য জোড় (পূরক) হয়ে যাবে, আর যদি সে চার রাকাত পূর্ণ করে থাকে, তবে এই দুটি সিজদা শয়তানের প্রতি অবমাননা (অপমান) স্বরূপ হবে।”
2386 - عن عثمان بن عفان قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إني صلَّيتُ فلم أدر أشفعتُ أم أوترتُ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إيايَ، وأن يتلعَّبَ بكم الشيطانُ في صلاتكم، من صلَّى منكم فلم يدرِ أشَفَعَ أو أوْتَر، فليسجدْ سجدتين، فإنهما تمام صلاته".
حسن: رواه الإمام أحمد (450) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، حدثنا مسَرَّةُ بن معبد، عن يزيد بن أبي كَبْشَة، عن عثمان بن عفان فذكر مثله.
وفي الإسناد مسرة بن معبد اللخمي الفلسطيني المقدسي قال فيه أبو حاتم:"شيخ ما به بأس"، ومثله يحسن حديثه.
وشيخه يزيد بن أبي كبشة السكسكي كان معروفًا في عصره، قال البخاري: كان عريف السكاسك، وذكره الهيثم بن عدي ومجالد بن سعيد فيمن وَلِيَ العراقين، وجاء له ذكر في صحيح البخاري في كتاب الجهاد (2996) إن إبراهيم أبا إسماعيل السكسكيّ قال: سمعتُ أبا بردة، واصطحب هو ويزيد بن أبي كبشة في سفر، فكان يزيد يصومُ في السفر فقال له أبو بردة: سمعتُ أبا موسى مرارًا يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مرض العبد، أو سافر، كُتِب له مثلُ ما كان يعملُ مقيمًا صحيحًا".
ويظهر منه أن الرجل كان محمود السيرة، وجاء له ذكر في كتب الحديث والتاريخ، ولم نجد فيها من تكلم فيه بسوء، وذكره ابن حبان في الثقات فمثله يحسن حديثه، وأما الحافظ فجعله في مرتبة"مقبول" على قاعدته وهي: أن كل من وثَّقه ابن حبان ولم يُوثِّقه غيره فهو"مقبول" عنده.
ولكن في الإسناد انقطاع فإن ابن أبي كبشة لم يسمع من عثمان، فإن بينهما مروان بن الحكم كما رواه عبد الله بن أحمد (451) عن يحيى بن معين وزياد بن أيوب، قالا: حدثنا سوَّار أبو عُمارة الرملي، عن مسرَّة بن معبد قال: صلى بنا يزيد بن أبي كبشة العصر، فانصرف إلينا بعد صلاته فقال: إني صلَّيتُ مع مروان بن الحكم، فسجد مثل هاتين السجدتين، ثم انصرف إلينا فأعلَمنا أنه
صلَّى مع عثمان وحدَّث عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله نحوه، فأقام سوَّار بن عمارة أو سوَّار أبو عُمارة
هذا الإسناد وهو"صدوق" قال فيه النسائي: ليس به بأس.
وحديث عثمان هذا مثل حديث أبي هريرة مجمل، يفسره حديث أبي سعيد الخدري.
উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি সালাত আদায় করেছি, কিন্তু আমি বুঝতে পারছি না যে আমি জোড় (রাকাআত) পড়েছি নাকি বেজোড় (বিতর) পড়েছি? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “সাবধান! শয়তান যেন তোমাদের সালাতে তোমাদেরকে নিয়ে খেলা না করে। তোমাদের মধ্যে যে সালাত আদায় করে এবং বুঝতে না পারে যে সে জোড় পড়েছে নাকি বেজোড়, সে যেন দুটি সিজদা করে নেয়। কারণ, এই দুটি সিজদাই হলো তার সালাতের পূর্ণতা।”
2387 - عن وعن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا صلَّى أحدكم فلا يدري كم صلَّى، ثلاثًا أو أربعًا، فليركع ركعة، يُحسن ركوعَها وسجودَها، ويسجد سجدتين".
صحيح: رواه ابن خزيمة (1026)، والحاكم (1/ 260، 322) كلاهما من حديث أيوب بن سليمان بن بلال، حدثني أبو بكر بن أبي أويس، عن سليمان بن بلال، عن عمر بن محمد بن زيد، عن سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله.
قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذه الزّيادة من ذكر الرابعة.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে এবং সে জানে না যে কত রাকাত পড়েছে, তিন রাকাত নাকি চার রাকাত, তখন সে যেন এক রাকাত রুকু করে, তার রুকু ও সিজদা উত্তমরূপে সম্পন্ন করে এবং দুটি সিজদা করে।
2388 - عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا شكَّ أحدكم في صلاته فلم يدرِ اثنين صَلَّى، أو ثلاثًا، فليلق الشك، ولين على اليقين".
صحيح: رواه البيهقي في"الكبري" (2/ 333) عن أبي عبد الله الحافظ في"الفوائد الكبير" لأبي العباس، ثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، ثنا أحمد بن حازم بن أبي غرزة، أنبأ جعفر، أنبأ سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح وجعفر هو: ابن عون ثقة من رجال الشيخين.
وله شاهد من حديث عبد الرحمن بن عوف وفيه مقال رواه الترمذي (398)، وابن ماجة (1209) كلاهما من حديث محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن مكحول، عن كُريب، عن ابن عباس، عن عبد الرحمن بن عوف قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سها أحدكم في صلاته فلم يَدرِ واحدًة صلَّى أو ثنتين فليبْنِ على واحدةٍ، فإن لم يدرِ ثِنتين صلَّى أو ثلاثًا فليبْنِ على ثِنْتين، فإن لم يدرِ ثلاثًا صلَّى أو أربعًا فليبْنِ على ثلاث، وليسجد سجدتين قبل أن يُسلِم".
قال الترمذي: حسن صحيح، وفي نسخة: حسن غريب صحيح.
قلت: فيه محمد بن إسحاق وهو مدلس وقد عنعن إلا أنه صرَّح بالتحديث في رواية أبي يعلى (839).
ورواه الحاكم (1/ 324) من طريق محمد بن سلمة به، وذكر فيه قصة عمر بن الخطاب مع ابن عباس وهو قول ابن عباس: جلستُ إلى عمر بن الخطاب وهو خليفة فقال: يا ابن عباس! ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم أو من أحد من أصحابه ما يذكر ما أمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا بها المرء في صلاته؟ قلت: لا، أو ما سمعت يا أمير المؤمنين؟ قال: لا، فدخل علينا عبد الرحمن بن عوف فقال: فيما أنتما؟ فقال عمر: سألته هل سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم أو من أحد من أصحابه بذكر ما أمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سها المرء في صلاته، فقال عبد الرحمن: عندي علم من ذلك، فقال عمر: هلم فأنت العدل الرضا، فقال عبد الرحمن: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا شك أحدكم في الاثنتين
فليجعلهما واحدة، وإذا شك في الاثنتين والثلاث فليجعلهما اثنتين، وإذا شك في الثلاث والأربع فليجعلهما ثلاثًا ثم يتم ما بقي من صلاته حتى يكون الوهم في الزيادة، ثم يسجد سجدتين وهو جالس قبل أن يسلم".
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم، شاهد لحديث عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان.
قلت: حديث عبد الرحمن بن ثابت رواه الحاكم من طريق عمار بن مطر الرهاوي، عنه، عن أبيه، عن مكحول، عن كريب مولى ابن عباس عن ابن عباس، عن عبد الرحمن بن عوف، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سها في صلاته في ثلاث، أو أربع فليتم، فإن الزيادة خير من النقصان".
وقال: صحيح الإسناد، وتعقبه الذهبي فقال: عمار تركوه.
قلت: مع تدليس ابن إسحاق فإنه اختلف عليه فرواه أحمد (1677) عن إسماعيل ابن علية، عن ابن إسحاق، عن مكحول مرسلًا، قال محمد بن إسحاق: وقال لي حسين بن عبد الله: هل أسنده لك؟ فقلت: لا. فقال: لكنه حدثني أن كريبًا مولى ابن عباس حدَّثه عن ابن عباس قال: جلستُ إلى عمر بن الخطاب فذكر القصة كما مضت، وحسين ضعيف جدَّا، وهكذا أخرجه أيضًا البيهقي (2/ 332) وقال:"فصار وصل الحديث الحسين بن عبد الله وهو ضعيف. إلا أن له شاهدا من حديث مكحول".
وهو يقصد به حديث عبد الرحمن بن ثابت، عن أبيه، عن مكحول كما سبق، ومكحول أيضًا مدلس وقد عنعن.
وللحديث طرق أخرى موصولة إلا أنها كلها ضعيفة ذكرها الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (2/ 5) وقال:"هو حديث معلول" فهو يتردد بين انقطاع وموصول ضعيف مع التدليس.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমাদের কেউ তার সালাতে সন্দেহ পোষণ করে এবং সে না জানে যে সে দুই রাকাত পড়লো নাকি তিন রাকাত, তখন সে যেন সন্দেহকে পরিহার করে এবং যা সুনিশ্চিত (অল্প সংখ্যা), তার উপর নির্ভর করে।”
2389 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم انصرف من اثنتين. فقال له ذو اليدين: أقَصُرَتِ الصلاةُ أم نسيتَ يا رسول الله؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أصدق ذو اليدين؟" فقال الناس: نعم. فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فصَلَّى ركعتين أُخْرَيين، ثم سلَّم، ثم كبَّر فسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع، ثم كبَّر فسجد مِثل سجوده أو أطولَ، ثم رفع متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (58) عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكر مثله.
ورواه البخاري في الأذان (714) عن عبد الله بن مسلم، وفي السهو (1228) عن عبد الله بن يوسف، كلاهما عن مالك به مثله، ورواه مسلم في المساجد (573) من طرق عن أيوب به وفيه: صلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إحدى صلاتَي العَشي. إما الظهرَ وإما العصرَ، فسَلَّم من ركعتين، ثم أتى
جذْعًا في قبلة المسجد فاستند إليها مُغْضَبًا. وفي القوم أبو بكر وعمر فهابا أن يتكلما. وخرج سَرَعَانُ الناس فقالوا: قُصِرت الصلاة. فقام ذو اليدين فذكر مثله.
ورواه البخاري (1229) من طريق يزيد بن إبراهيم، عن محمد بن سيرين به مثله.
ورواه أيضًا مالك (59) عن داود بن الحصين، عن أبي سفيان مولى ابن أبي أحمد أنه قال: سمعتُ أبا هريرة يقول فذكر مثله.
وفيه:"فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتم ما بقي من الصلاة، ثم سجد سجدتين بعد التسليم، وهو جالس". ورواه مسلم في المساجد (573/ 99) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك به مثله.
ورواه البخاري في الصلاة (482) من وجه آخر عن ابن عون، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة قال: صَلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إحدى صلاتَي العَشِيّ. قال ابن سيرين: سمَّاها أبو هريرة، ولكن نسيتُ أنا، قال: فصلى بنا ركعتين ثم سلَّم، فقام إلى خَشَبةٍ معروضةٍ في المسجد فاتكأَ عليها كأنَّه غضبانُ، ووضع يده اليُمنى على اليُسرى، وشبَّكَ بين أصابعه، ووضع خدَّه الأيمن على ظهر كفَّه اليُسرى، وخرجتِ السَّرعانُ من أبواب المسجد فذكر بقية الحديث مثله.
وفيه بعد قوله:"ثم سلَّم"،"ثم كبَّر وسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع رأسه وكبَّر، ثم كبَّر وسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع رأسه وكبَّر، فربما سألوه: ثم سلَّم"؟ فيقول: نبئتُ أن عمران بن حصين قال:"ثم سلَّم".
أي لم يذكر في حديث أبي هريرة التسليم بعد سجدتي السهو، وإنما ذكر في حديث عمران كما سيأتي، وحديث أبي هريرة رواه أيضًا الترمذي (394) من طريق هُشيم، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عنه ولفظه:"إن النبي صلى الله عليه وسلم سجدهما بعد السلام".
وحديث ذي اليدين رواه أيضًا عمران بن حصين وعبد الله بن عمر كما سيأتي واسمه: الخرباق.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সালাতে) দু'রাকাআত আদায় করেই সালাম ফিরিয়ে দিলেন। তখন তাঁকে যুল-ইয়াদাইন বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! সালাত কি সংক্ষিপ্ত করা হয়েছে, নাকি আপনি ভুলে গেছেন? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "যুল-ইয়াদাইন কি সত্য বলছেন?" লোকেরা বলল, হ্যাঁ। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে দাঁড়ালেন এবং অবশিষ্ট দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন, তারপর সালাম ফেরালেন, এরপর তাকবীর দিলেন এবং (স্বাভাবিক) সিজদার মতো অথবা তার চেয়ে দীর্ঘ সিজদা করলেন, তারপর (মাথা) তুললেন, অতঃপর তাকবীর দিলেন এবং (স্বাভাবিক) সিজদার মতো অথবা তার চেয়ে দীর্ঘ সিজদা করলেন, তারপর (মাথা) তুললেন।
2390 - عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صَلَّى العصر فسلَّم في ثلاث ركعات، ثم دخل منزله، فقام إليه رجل يقال له الخِرباق، وكان في يديه طول، فقال: يا رسول الله! فذكر له صنيعه، وخرج غضبان يجرُّ رداءَه حتى انتهى إلى الناس فقال:"أصدق هذا؟" قالوا: نعم. فصلَّى ركعةً، ثم سلَّم، ثم سجد سجدتين، ثم سلَّم.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (574) من طريق عبد الوهاب الثقفي، وإسماعيل بن إبراهيم (المعروف بابن عُلية) كلاهما عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي المهلب، عن عمران بن حصين فذكر مثله.
وشذّ فيه أشعث بن عبد الملك الحمراني فرواه عن محمد بن سيرين، عن خالد الحذاء وزاد فيه:"ثم تشهد ثم سلم"، رواه من طريقه أبو داود (1039)، والترمذي (395) وقال:"حسن غريب"، والحاكم (1/ 323)، وقال:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، إنما اتفقا على
حديث خالد الحذاء، عن أبي قلابة، وليس فيه ذكر التشهد لسجدتي السهو".
قلت: فيه أبو المُهَلَّب عم أبي قلابة، لم يخرج له البخاري، وإنما أخرج له مسلم، وأشعث بن عبد الملك وإن كان ثقة إلا أنه خالف الحفّاظ عن ابن سيرين، فإن المحفوظ عن ابن سيرين في حديث عمران ليس فيه ذكر التشهد، ولذا ضعَّفه البيهقي وابن عبد البر، وقال ابن حبان: ما روى ابن سيرين، عن خالد غير هذا الحديث. وروى السراج من طريق سلمة بن علقمة في هذه القصة"قلت لابن سيرين: فالتشهد؟ قال: لم أسمع في التشهد شيئًا، وقال ابن المنذر:"لا أحسب التشهد في سجود السهو يثبت"، وجعل الحافظ زيادة أشعث شاذة. انظر"فتح الباري" (3/ 98، 99).
وبوَّب البخاري بقوله: باب من لم يتشهد في سجدتي السهو وأخرج فيه حديث ذي اليدين وفيه:"فصلَّى اثنتين أخريين ثم سلَّم، ثم كبَّر فسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع" وقال: حدثنا سليمان بن حرب، حدثنا حماد، عن سلمة بن علقمة قال: قلت لمحمد (ابن سيرين): في سجدتي السهو تشهدٌ؟ قال: ليس في حديث أبي هريرة". انتهى.
قلت: في الموضوع تفصيل: تبويب البخاري يوافق الحديث الذي رواه من طريق محمد بن سيرينَ عن أبي هريرة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم انصرف من اثنتين فقال له ذو اليدين فذكر الحديث فسجد سجدتي السهو بعد السلام ولم يتشهد فيهما.
وروى أبو داود (1010) من طريق سلمة بن علقمة، عن محمد بن سيرين عن أبي هريرة قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بمعنى حماد كله، إلى آخر قوله: نُبِّئْتُ أن عمران بن حصين قال: ثم سَلَّم، قال: قلت: فالتشهد؟ قال: لم أسمع في التشهد، وأحب إلي أن يتشهد.
والعلماء مختلفون في هذا. فحكى الترمذي عن أحمد وإسحاق بأن من سجد سجدتي السهو بعد السلام فإنه يتشهد. وهو قول بعض المالكية والشافعية.
وقال النووي في"الخلاصة" (2229):"إن الأخبار الصحيحة تدل على أنه: وإن سجدهما بعد السلام لم يتشهد لهما"، وأما من سجد سجدتي السهو قبل السلام فالجمهور على أنه لا يتشهد، فإن التشهد الأول يغنيه.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের সালাত আদায় করলেন এবং তিন রাকাত আদায় করার পর সালাম ফিরিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি তাঁর গৃহে প্রবেশ করলেন। তখন তাঁর নিকট আল-খিরবাক নামক এক ব্যক্তি দাঁড়ালেন—যিনি দীর্ঘ হাত বিশিষ্ট ছিলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! অতঃপর তিনি তাঁর এই কাজের কথা (ভুলের কথা) উল্লেখ করলেন। অতঃপর তিনি রাগান্বিত অবস্থায় তাঁর চাদর টানতে টানতে বের হয়ে আসলেন এবং মানুষের কাছে পৌঁছে বললেন: “এ কি সত্য বলছে?” তারা বললেন, হ্যাঁ। অতঃপর তিনি এক রাকাত সালাত আদায় করলেন, তারপর সালাম ফেরালেন, অতঃপর (সাহু সেজদা হিসেবে) দুটি সেজদা করলেন, তারপর সালাম ফেরালেন।
2391 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سَهَا فَسَلَّم في الركعتين، فقال له رجل يقال له ذو اليدين: يا رسول الله! أَقَصُرتُ أو نَسيتَ؟ قال:"ما قَصُرَتْ وما نسيتُ" قال: إذًا فَصليتَ ركعتين. قال:"أكما يقول ذو اليدين؟" قالوا: نعم. فتقدم فصلى ركعتين، ثم سلَّم، ثم سجد سجدتي السهو.
صحيح: رواه أبو داود (1017)، وابن ماجة (1213) عن أبي كريب الهمداني، عن أبي أسامة، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله. واللفظ لابن ماجة، لأن أبا داود أحال على لفظ حديث أبي هريرة.
وإسناده صحيح، وأبو أسامة هو: حماد بن أسامة القرشي مولاهم، الكوفي أبو أسامة، مشهور بكنيته من رجال الجماعة.
وأبو كريب هو: محمد بن العلاء بن كُريب الهمداني، أبو كريب، مشهور بكنيته، وهو من رجال الجماعة.
وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (1034) عن محمد بن العلاء الهمداني، (أبو كريب)، وبشر بن خالد العسكري، كلاهما عن أبي أسامة به مثله.
وقال:"هذا خبر ما رواه عن أبي أسامة غير أبي كُريب وبشر بن خالد".
قلت: وهو ليس كما قال، فقد رواه أيضًا أحمد بن محمد بن ثابت وهو ثقة - رواه عنه أبو داود، وأحمد بن سنان القطان - وهو من الثقات الأثبات، وعلي بن محمد بن إسحاق الطنافسي ثقة عابد - روى عنهما ابن ماجة.
وقد انتقد الزيلعيُّ الدارقطنيَّ في قوله: لا نعلم حدَّث به غير أحمد بن سنان قائلًا:"والعجب من الدارقطني وعلو مرتبته كيف يقول مثل هذا؟ ، وقد رواه أبو كريب وأحمد بن ثابت وبشر بن خالد، ولكن تخلص بقوله: لا نعلم والله أعلم". انتهى."نصب الراية" (2/ 68).
وذو اليدين: هو السلمي، يقال له: الخِرباق كما سيأتي في حديث عمران بن حصين عن مسلم، وسُمي بذي اليدين لما في يديه من طول، فكان يعمل بهما، وبقي بعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم يحدث بهذا الحديث. ومات في خلافة عمر.
والذي رواه مالك في الصلاة (60) عن ابن شهاب، عن أبي بكر بن سليمان بن أبي حثمة قال: بلغني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ركع ركعتين من إحدى صلاتي النهار. الظهر أو العصر فسَلَّم من اثنتين. فقال له ذو الشمالين … إلخ الحديث.
وذو الشمالين هو: عمير بن عمرو بن غبشان الخزاعي، قتل يوم بدر، وهو غير المتكلم في حديث السهو.
هذا قول الحفاظ إلا الزهري فقال: هو هو. واتفقوا على تغليط الزهري في هذا، وإنه لم يُتابعْه عليه أحد.
قال الحافظ ابن عبد البر:"الزهري وإن كان إمامًا عظيمًا في هذا الشأن، فالغلط لا يسلم منه بشر، والكمال لله تعالى".
وقد تكلمت في تحديد ذي اليدين بإسهاب في"المنة الكبرى" (2/ 476، 479) فارجع إليه إن شئت للمزيد.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতে) ভুলে গিয়ে দুই রাকাতের পর সালাম ফিরিয়ে দিলেন। তখন তাঁকে যুল-ইয়াদাইন নামে এক ব্যক্তি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! সালাত কি সংক্ষিপ্ত করা হয়েছে নাকি আপনি ভুলে গেছেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: না, সালাত সংক্ষিপ্ত করা হয়নি এবং আমি ভুলিওনি। লোকটি বললেন: তাহলে তো আপনি দুই রাকাতই সালাত আদায় করেছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সাহাবীদেরকে লক্ষ্য করে) বললেন: যুল-ইয়াদাইন কি যা বলছে তা কি ঠিক? তারা বললেন: হ্যাঁ। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে গেলেন এবং আরও দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর সালাম ফেরালেন এবং সিজদাহ সাহু (ভুলের সিজদাহ) করলেন।
2392 - عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صَلَّى الظهر خمسًا، فقيل له: أزيد في الصلاة؟ فقال:"ما ذاك؟" قال: صلَّيتَ خمسًا. فسجد سجدتين بعد ما سلمَّ.
متفق عليه: رواه البخاري في السهو (1226)، ومسلم في المساجد (91 الرقم الصغير) كلاهما من حديث شعبة، عن الحكم، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود فذكر مثله ولفظهما سواء.
ورواه الشيخان أيضًا - البخاري في الصلاة (401)، ومسلم - كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن إبراهيم به وفيه"فثنى رجليه، واستقبل القبلة، وسجد سجدتين، ثم سلَّم، فلما أقبل علينا بوجهه قال:"إنه لو حدث في الصّلاة شيء لنبَّأتُكم به، ولكن إنما أنا بشر مثلكم، أنسى كما تنسون، فإذا نسيتُ فذكروني. فإذا شك أحدُكم في صلاته فليتحرَّى الصواب. فليُتِمَّ عليه، ثم ليُسلم، ثم يسجد سجدتين".
وفي روايةٍ عند مسلمٍ (95) عن حفص وأبي معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم به."أن النبي صلى الله عليه وسلم سجد سجْدَتَي السهو بعد السلام والكلام".
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، قالوا: إذا صلَّى الرجلُ الظهرَ خمْسًا فصلاتُه جائزة، وسجد سجدتي السهو، وإن لم يجلس في الرابعة، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق. وقال بعضهم: إذا صلى الظهر خمسًا، ولم يقعد في الرابعة مقدار التشهد فسدتْ صلاته، وهو قول سفيان الثوري وبعض أهل الكوفة"،"الترمذي" (2/ 239).
وقال الخطابي:"قال أبو حنيفة: إن كان لم يقعد في الرابعة قدر التشهد، وسجد في الخامسة فصلاته فاسِدَة، وعليه أن يستقبل الصلاة. وإن كان قد قعد في الرابعة قدر التشهد فقد تمت له الظهر، والخامسة تطوع وعليه أن يضيف إليها ركعة، ثم يتشهد ويُسلِّم، ويسجد سجدتي السهو وتمت صلاته".
قال:"ومتابعة السنة أولى، وإسناد هذا الحديث إسناد لا مزيد عليه في الجودة في إسناد أهل الكوفة".
وأما ما رُوي عن ثوبان، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لكل سهو سجدتان بعد ما يسلم" فهو ضعيف، ضعَّفه الحافظ في بلوغ المرام، وسبقه البيهقي وابن الجوزي وعبد الحق وغيرهم.
قلت: رواه أبو داود (1038) قال: حدثنا عمرو بن عثمان والربيع بن نافع وعثمان بن أبي شيبة، وشجاع بن مَخْلَد - بمعنى الإسناد - أن ابن عياش حدثهم عن عبيد الله بن عبيد الكَلاعي، عن زهير - يعني: ابن سالم العنسِيّ، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَيْر، قال عمرو وحده: عن أبيه، عن ثوبان فذكر مثله.
ورواه ابن ماجة (1219) عن هشام بن عمَّار وعثمان بن أبي شيبة قالا: حدثنا إسماعيل بن عياش به مثله.
وزهير بن سالم العَنسِيّ لم يوثقه غير ابن حبان: وقال الدارقطني:"حمصي منكر الحديث، روي عن ثوبان ولم يسمع منه".
وقال البيهقي (2/ 337): وهذا إسناد فيه ضَعف، وحديث أبي هريرة وعمران وغيرهما في
اجتماع عدد من السهو عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم اقتصاره على السجدتين يخالف هذا".
يعني أنّ سجدتي السهو تتكرّر بتكرر السهو، بينما حديث أبي هريرة وعمران يدلان على سجدتي السهو فقط ولو تكرر السهو، ثم قد تبين أنّ سجدتي السهو قد تكونان في بعض الصور قبل التسليم.
وللحديث أسانيد أخرى عند الطبراني وغيره وهي أضعف من هذا.
وكذلك ما رُوِي عن عائشة قالت: قال رسول الله:"سجدتا السهو لكل زيادة ونقصان" ضعيف رواه البزار"كشف الأستار" (574) قال: حدثنا حُميد بن الربيع، ثنا محمد بن بكَّار، ثنا حكيم بن نافع، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكر الحديث مثله.
ورواه أبو يعلى"المقصد العَلِيُّ" (321) عن إسماعيل بن إبراهيم، ثنا حكيم بن نافع به مثله.
وحكيم بن نافع هو الرقي قال فيه أبو زرعة: ليس بشيء، ووثقه ابن معين. وجاء عنه تليينه.
وهذه الحديث ساقه ابن عدي في"الكامل" (2/ 639) عن أحمد بن محمد بن منصور الحاسب وعلي بن سعيد الرازي، قالا: حدثنا محمد بن بكار.
وقال: حدثنا حمد بن حفص، قال: حدثنا الترجماني، قالا: حدثنا حكيم بن نافع به، ولفظه"سجدتان تجزئان من كل زيادة ونقصان" ولم يقل الحاسب وعلي:"تجزئان".
قال ابن عدي: وهذا الحديث لا أعلم رواه عن هشام بن عروة غير حكيم بن نافع، وروي عن أبي جعفر الرازي، عن هشام بن عروة: ويقال: إن أبا جعفر هو: كنيةُ حكيم بن نافع، فكأنَّ الحديث رجع إلى أنه لم يروه عن هشام غير حكيم. انتهى.
قال الذهبي في الميزان (1/ 586):"وساق له ابن عديٍّ أحاديث ما هي بالمنكرة جدًّا، وجاء عن ابن معين تلْيينه".
وفيه إشارة إلى تضعيف الحديث، وللحديث أسانيد أخرى أضعف منها.
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাত পাঁচ রাকআত আদায় করলেন। অতঃপর তাঁকে বলা হলো: সালাতে কি বৃদ্ধি করা হয়েছে? তিনি বললেন: "কী ব্যাপার?" বলা হলো: আপনি পাঁচ রাকআত সালাত আদায় করেছেন। তখন তিনি সালামের পরে সাহুর দু'টি সিজদা করলেন।
অপর এক বর্ণনায় আছে যে, তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু'পা ভাঁজ করলেন এবং কিবলামুখী হলেন। এরপর দু'টি সিজদা করলেন, অতঃপর সালাম ফিরালেন। যখন তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরালেন, তখন বললেন: "সালাতে যদি নতুন কিছু ঘটতো, তবে আমি অবশ্যই তোমাদেরকে সে সম্পর্কে জানিয়ে দিতাম। কিন্তু আমি তো তোমাদেরই মতো একজন মানুষ, তোমরা যেমন ভুলে যাও আমিও তেমন ভুলে যাই। সুতরাং আমি যদি ভুলে যাই, তাহলে তোমরা আমাকে স্মরণ করিয়ে দিও। যখন তোমাদের কারো সালাতে সন্দেহ হয়, তখন সে যেন সঠিকটি অনুসন্ধান করে নেয় এবং সেই অনুযায়ী সালাত পূর্ণ করে, এরপর সালাম ফিরায় এবং দু'টি সাহুর সিজদা করে।"
মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে যে, "নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ও কথোপকথনের পর সাহুর দু'টি সিজদা করেছিলেন।"
2393 - عن عبد الله ابن بُحينة، أنه قال: صلَّى لنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ركعتين، ثم قام فلم يجلس، فقام الناس معه. فلما قضى صلاته، ونظرنا تسليمه، كبَّر، ثم سجد سجدتين، وهو جالس قبل التسليم، سَلَّم.
متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (65) عن ابن شهاب، عن الأعرج، عن عبد الله بن بحينة فذكر مثله.
ورواه البخاري في السهر (1224) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (570) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
ورواه مالك (66) عن يحيى بن سعيد، عن عبد الرحمن بن هرمز، عن عبد الله بن بحينة أنه
صلاة الظهر.
ورواه البخاري (1225) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله.
ورواه مسلم من وجه آخر عن يحيى بن سعيد به.
ورواه الترمذي (391) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث به وفيه:"فلما أتم صلاته سجد سجدتين، يُكبِّر في كل سجدةٍ وهو جالس قبل أن يُسَلِّم، وسجدهما الناس معه مكان ما نسي من الجلوس".
وقال:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم. وهو قول الشافعي، يري سجدتي السهو كله قبل السلام، ويقول: هذا الناسخ لغيره من الأحاديث، ويذكر أن آخر فعل النبي صلى الله عليه وسلم كان على هذا".
ثم نقل قول الإمام أحمد:"ما رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم في سجدتي السهو فيُستَعمَلُ كل على جهته. يرى إذا قام في الركعتين على حديث ابن بحينة بسجدهما قبل السلام، وإذا صلَّى الظهر خمسًا فإنه يسجدهما بعد السلام، وإذا سلَّم في الركعتين من الظهر والعصر فإنه يسجدهما بعد السلام، كل يُستعمل على جهته. وكل سهو ليس فيه عن النبي صلى الله عليه وسلم ذكر فإن سجدتي السهو فيه قبل السلام.
وقال إسحاق نحو قول أحمد في هذا كله، إلا أنه قال: كل سهو ليس فيه عن النبي صلى الله عليه وسلم ذكر فإن كانت زيادةً في الصلاة يسجدهما بعد السلام، وإن كان نقصانًا يسجدهما قبل السلام".
وذكر أيضًا قول أهل الكوفة والثوري بأن سجدتي السهو بعد السلام دائمًا.
আব্দুল্লাহ ইবনু বুহাইনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে দুই রাকআত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর (প্রথম তাশাহহুদের জন্য) না বসে দাঁড়িয়ে গেলেন। লোকেরাও তাঁর সাথে দাঁড়িয়ে গেল। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন এবং আমরা তাঁর সালাম ফেরানোর অপেক্ষায় ছিলাম, তখন তিনি তাকবীর বললেন, অতঃপর বসা অবস্থায় সালাম ফেরানোর আগে দু'টি সিজদা করলেন, এরপর সালাম ফেরালেন।
2394 - عن قيس بن أبي حازم قال: صَلَّى بنا المغيرة بن شعبة، فقام من الركعتين قائمًا، فقلنا: سبحان الله، فأومأ وقال: سبحان الله، فمضى في صلاته، فلما قضى صلاته وسلَّم، سجد سجدتين وهو جالس، ثم قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستوى قائمًا من جلوسه، فمضى في صلاته، فلما قضى صلاته سجد سجدتين وهو جالس، ثم قال:"إذا صلَّى أحدُكم فقام من الجلوس، فإن لم يَسْتَتِم قائمًا فليجلس، وليس عليه سجدتان، فإن استوى قائمًا فَلْيَمْضِ في صلاته، ولْيَسْجُدْ سجدتين وهو جالس".
صحيح: رواه الطّحاوي في"شرحه" (2499) عن ابن مرزوق، قال: ثنا أبو عامر، عن إبراهيم بن طهمان، عن المغيرة بن شُبيل، عن قيس بن أبي حازم فذكر مثله.
وإسناده صحيح. وإبراهيم بن طهمان إمام ثقة إلا أن المزي لم يذكره من رواة المغيرة بن شُبيل، فلعله لم يقف على هذا الإسناد، وقد نصَّ الحافظ ابن حجر في"الإتحاف" (13/ 435) على هذا الإسناد كما هو، وتابعه أيضًا قيس بن الربيع، عن المغيرة بن شيل، وقد نصّ الحافظ في"الإتحاف" على ذلك أيضًا.
إلا أن الدارقطني (1419) رواه عن قيس بن الربيع، عن جابر (وهو الجعفي)، عن المغيرة بن شُبيل. فهل وقع خطأ؟ أو أن قيسًا يروي من وجهين وقد تغيّر لما كبر وأدخل عليه ابنه ما ليس من حديثه فحدّث به. والله تعالى أعلم.
ورواه أبو داود (1036)، وابن ماجة (1208) من طريق جابر الجُعفي، عن المغيرة بن شُبيل به نحوه.
وجابر الجعفي ضعيف قال المنذري: لا يحتج به، وقال أبو داود: ليس في كتابي عن جابر الجعفي إلا هذا الحديث.
ثم رواه أبو داود (1037)، والترمذي (365) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، عن المسعودي، عن زياد بن عِلاقَة قال: صلَّى بنا المغيرة بن شعبة فذكر نحوه.
قال ابن الملقن في"البدر المنير" (4/ 223):"صحَّ عن زياد بن علاقة قال (فذكر الحديث").
وقال الترمذي:"حسن صحيح، وقد روي هذا الحديث من غير وجه عن المغيرة بن شعبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: وهو يشير إلى ما سبق، وكذلك قال البيهقي في"المعرفة" (3/ 286):"جابر لا يحتج به غير أنه يُروي من وجهين آخرين، وحديثه أشهرهما بين الفقهاء".
عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة بن مسعود الكوفي المسعودي صدوق اختلط قبل موته.
قال الحافظ: وضابطه أن من سمع منه بغداد فبعد الاختلاط.
قلت: يزيد بن هارون ممن سمع منه بعد الاختلاط. ورواه عنه أبو داود الطيالسي في مسنده (695) وهو أيضًا ممن سمع منه بعد الاختلاط. ولكن اجتماعهما وموافقة غيره يجعل القلب يطمئن بأنه لم يختلط في هذا.
মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কায়স ইবনু আবী হাযিম বলেছেন: মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তিনি দুই রাকাআত শেষে না বসে সোজা দাঁড়িয়ে গেলেন। আমরা বললাম: 'সুবহানাল্লাহ'। তিনি ইশারা করলেন এবং বললেন: 'সুবহানাল্লাহ' এবং তাঁর সালাত চালিয়ে গেলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন এবং সালাম ফেরালেন, তখন তিনি বসা অবস্থায় দুটি সিজদা (সিজদায়ে সাহু) করলেন।
এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করেছিলেন, (তখন) তিনি বসার স্থান থেকে সোজা দাঁড়িয়ে গেলেন এবং তাঁর সালাত চালিয়ে গেলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বসা অবস্থায় দুটি সিজদা (সিজদায়ে সাহু) করলেন।
অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে যখন কেউ সালাত আদায় করে এবং (প্রথম বৈঠকে) বসা থেকে দাঁড়িয়ে যায়, আর সে যদি পুরোপুরি সোজা হয়ে না দাঁড়ায়, তবে সে যেন বসে পড়ে। তার উপর কোনো দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) আবশ্যক নয়। কিন্তু যদি সে সোজা হয়ে পুরোপুরি দাঁড়িয়ে যায়, তবে সে যেন তার সালাত চালিয়ে যায় এবং বসা অবস্থায় দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করে নেয়।"
2395 - عن عمرو بن العاص أنه صلى بالناس، فقام عن تشهده. فصاح به الناس فقالوا: سبحان الله! سبحان الله، فصلَّى كما هو، فلما تم صلاته سجد سجدتين ثم قال: يا أيها الناس! إنه لم يخف عليَّ الذي أردتم، ولم يمنعني من الجلوس إلا الذي صنعت من السنة.
صحيح: رواه ابن أبي عمر العدني قال: ثنا حيوة، أخبرني يزيد بن أبي حبيب، حدثني عبد الرحمن بن شِماسة، قال: صلي عمرو بن العاص بالناس فذكره.
قال البوصيري: إسناد رجاله ثقات"إتحاف المهرة" (2106).
قلت: وهو كذلك، وقوله:"من السنة" أي: من سنة النبي صلى الله عليه وسلم وفيه إشارة إلى أنه صلى الله عليه وسلم فعل كما فعلت، أو أمر به. لأن جمهور المحدثين على أن قول الصحابي:"من السنة" حكمه حكم المرفوع.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি একবার লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন এবং তাশাহহুদ না পড়েই দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন লোকেরা উচ্চস্বরে দৃষ্টি আকর্ষণ করে বললো: সুবহানাল্লাহ! সুবহানাল্লাহ! কিন্তু তিনি যেমন ছিলেন তেমনই সালাত চালিয়ে গেলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন দুটি সিজদা করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: হে লোকসকল! তোমরা যা চেয়েছো তা আমার অজানা ছিল না। তবে আমাকে বসতে না দেওয়ার একমাত্র কারণ হলো, আমি যা করেছি তা সুন্নাহর অন্তর্ভুক্ত।
2396 - عن عقبة بن عامر الجهني قام، وعليه جلوس، فقال الناس: سبحان الله،
سبحان الله، فلم يجلس، ومضى على قيامه، فلما كان في آخر صلاته سجد سجدتين، وهو جالس، فلما سلَّم قال: إنِّي سمعتكم آنفًا تقولون: سبحان الله، لكيما أجلس، لكن السنة الذي صنعت.
صحيح: رواه الحارث بن أبي أسامة"بغية الباحث" (187)، والحاكم (1/ 325) كلاهما من طريق يزيد بن أبي حبيب، أنه سمع عبد الرحمن بن شماسة المهري، يقول: صلى بنا عقبة بن عامر فذكر مثله واللفظ للحاكم. قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
قلت: الصواب أنه على شرط مسلم، فإن عبد الرحمن بن شِماسة - بكسر الشين المعجمة من رجال مسلم وأنه ثقة. ويبدو أن القصة وقعت من عمرو بن العاص وعقبة بن عامر، وكان عبد الرحمن بن شِماسة قد حضر الصلاة معهما جميعًا.
উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন, যখন অন্যান্য লোকেরা বসে ছিল। তখন লোকেরা বলতে লাগল: সুবহানাল্লাহ, সুবহানাল্লাহ। কিন্তু তিনি বসলেন না এবং দাঁড়িয়ে থাকলেন। অতঃপর যখন তিনি তার সালাতের শেষ প্রান্তে এলেন, তখন তিনি বসা অবস্থায় দুটি সিজদা করলেন। সালাম ফেরানোর পর তিনি বললেন: আমি এইমাত্র তোমাদেরকে সুবহানাল্লাহ বলতে শুনছিলাম, যাতে আমি বসে যাই। কিন্তু আমি যা করেছি, সেটাই সুন্নাহ।
2397 - عن وعن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى بهم صلاة العصر، أو الظهر، فقام في الركعتين، فسبَّحُوا به فمضى في صلاته. فلما قضى الصلاة سجد سجدتين، ثم سلَّم.
صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (576) عن الحسن بن يحيى الأزدي، ثنا أبو زيد سعيد بن الربيع، ثنا علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن ضمضم بن جَوس، عن أبي هريرة فذكر مثله.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 151): رواه البزار ورجاله ثقات.
وفي الباب عن عطاء بن أبي رباح قال: صلي ابن الزبير بالناس صلاة المغرب، فسلَّم فيها - أي في الركعتين - ثم قام إلى الحجر يستلمه فسَبَّحُوه به، فرجع فصلَّى الركعة الباقية. ثم سلَّم، وسجد سجدتين. فذُكِر ذلك لابن عباس فقال: ما أماط سنة نبيه صلى الله عليه وسلم.
وفي رواية: أصاب وأصابوا.
رواه أبو يعلى وأحمد والبزار وابن أبي شيبة وعبد الرزاق ومسدد وأبو داود الطيالسي والحارث بن أبي أسامة والبيهقي من طرق، عن عطاء بن أبي رباح ولكن لم يسلم منها شيء.
وعن سعد بن أبي وقاص رواه البزار"كشف الأستار" (575)، وأبو يعلى وأحمد بن منيع والحاكم (1/ 322، 323) والصواب أنه موقوف كما قال البزار.
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 151):"قال أبو عثمان عمرو بن محمد الناقد: لم نسمع أحدًا يرفع هذا الحديث غير أبي معاوية".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একবার তাদেরকে নিয়ে আসরের অথবা যোহরের সালাত আদায় করছিলেন। তিনি দুই রাকআত শেষে (না বসে) দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন সাহাবীগণ সুবহানাল্লাহ বলে তাঁকে সতর্ক করলেন, কিন্তু তিনি তাঁর সালাতে এগিয়ে গেলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন দুটি সিজদা (সাহু সিজদা) করলেন, অতঃপর সালাম ফিরালেন।
2398 - عن معاوية بن خُدَيج أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى يومًا فسلَّم، وبقيت من الصلاة ركعةٌ، فأدركه رجل فقال: نسيت من الصلاة ركعة. فرجع فدخل المسجد، وأمر
بلالًا فأقام الصلاة، فصلَّى للناس ركعة. فأخبرتُ بذلك الناسَ، فقالوا لي: أتعرف الرجل؟ قلت: لا إلا أن أراه فمرَّ بي، فقلت: هذا هو، فقالوا: هذا طلحة بن عبيد الله.
صحيح: رواه أبو داود (1023)، والنسائي (664) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليثُ - يعني ابن سعد - عن يزيد بن أبي حبيب، أن سويد بن سعيد أخبره عن معاوية بن خُديج فذكر مثله.
وإسناده صحيح، ومعاوية بن خُديج - بضم الحاء وفتح الدال، صحابي صغير أسلم قبل وفاة النبي صلى الله عليه وسلم بشهرين، وكان ممن صلى وراء النبي صلى الله عليه وسلم صلاة المغرب فسها فيها النبي، صلى الله عليه وسلم فسلَّم في الركعتين، رواها الحاكم (1/ 261) من طريق يحيى بن أيوب، عن يزيد بن أبي حبيب فذكر مثله.
قال الحاكم: اختصره الليث بن سعد، عن ابن أبي حبيب، ثم روى من طريقه وقال: صحيح الإسناد على شرط الشيخين، وهو من النوع الذي يطلبان للصحابي متابعًا في الرواية على أنهما جميعًا قد خرَّجا مثل هذا".
وصححه أيضًا ابن خزيمة (1052، 1053) فروي من وجهين عن الليث بن سعد مختصرًا، وعن يحيى بن أيوب مفصلا كما قال الحاكم.
وقال رحمه الله تعالى:"هذه القصة غير قصة ذي اليدين، لأن المعْلِم النبي صلى الله عليه وسلم أنه سها في هذه القصة طلحةُ بن عبيد الله، ومخبرُ النبي صلى الله عليه وسلم في تلك القصة ذو اليدين، والسهوُ من النبي صلى الله عليه وسلم في قصة ذي اليدين إنما كان في الظهر أو العصر، وفي هذه القصة إنما كان السهوُ في المغرب لا في الظهر ولا في العصر.
وقصة عمران بن حصين قصة الخِرباق قصة ثالثة، لأن التسليم في خبر عمران من الركعة الثالثة، وفي قصة ذي اليدين من الركعتين، وفي خبر عمران دخل النبي صلى الله عليه وسلم حجرته ثم خرج من الحجرة، وفي خبر أبي هريرة، قام النبي صلى الله عليه وسلم إلى خشبة معروضة في المسجد، فكل هذه أدلة على أن هذه القصص هي ثلاث قصص، سها النبي صلى الله عليه وسلم مرَّة فسلَّم من الركعتين، وسها مرة أخرى فسلَّم في ثلاث ركعاتٍ، وسها مرةً ثالثة فسلَّم في الركعتين من المغرب، فتكلَّم في المرات الثلاث، ثم أتمَّ صلاته". انتهى
فقه الحديث:
قوله:"وأمر بلالًا فأقام الصلاة" الظاهر منه إقامة الصلاة المعروفة، وكذلك بوَّبه أيضًا النسائي، وأوَّل البعضُ بأن المقصود منه إعلام الناس بالصلاة، لا الإقامة المعروفة.
قلت: الإقامة المعروفة أيضًا المقصود منها الإعلام بالصلاة فلا حاجة إلى تأويل قول النبي صلى الله عليه وسلم.
মু'আবিয়া ইবনে খুদাইজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করলেন এবং সালাম ফেরালেন, অথচ সালাতের একটি রাকাত বাকি ছিল। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁকে বলল: আপনি সালাতের একটি রাকাত ভুলে গেছেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে এসে মসজিদে প্রবেশ করলেন এবং বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাতের ইক্বামত দিতে আদেশ করলেন। অতঃপর তিনি লোকদের নিয়ে (বাকি) এক রাকাত সালাত আদায় করলেন।
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি এই বিষয়টি লোকদের জানালাম। তারা আমাকে জিজ্ঞেস করল: আপনি কি লোকটিকে চেনেন? আমি বললাম: না, তবে তাকে দেখলে চিনতে পারব। এরপর লোকটি আমার পাশ দিয়ে অতিক্রম করল, তখন আমি বললাম: এই সেই ব্যক্তি। তারা বলল: ইনি হলেন তালহা ইবনে উবায়দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
2399 - عن عقبة بن عامر قال: ثلاث ساعات كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ينهانا أن نصلي فيهن، أو نقبر فيهن موتانا: حين تطلعُ الشمسُ بازغة حتى ترتفع، وحين يقوم قائم الظهيرة حتى تميلَ الشمسُ، وحين تضيف الشمسُ للغروب حتى تغربَ.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (831) عن يحيى بن يحيى، حدثنا عبد الله بن وهب، عن موسى بن علي، عن أبيه، قال: سمعتُ عقبة بن عامر الجهني يقول: فذكر الحديث.
وقوله:"بازغة" - أي طالعة.
وقوله:"تضيَّف" إذا مالت للغروب.
উকবা ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে তিনটি সময়ে সালাত আদায় করতে অথবা আমাদের মৃতদেরকে দাফন করতে নিষেধ করতেন: যখন সূর্য উদিত হতে শুরু করে, যতক্ষণ না তা ভালোভাবে উপরে উঠে যায়; যখন ঠিক দুপুরের সময় হয়, যতক্ষণ না সূর্য হেলে পড়ে; এবং যখন সূর্য অস্ত যাওয়ার জন্য ঝুঁকে যায়, যতক্ষণ না তা সম্পূর্ণ অস্তমিত হয়ে যায়।
2400 - عن عمرو بن عَبَسَة السُلمي قال: قلت: يا نبي الله! أخبرني عمَّا علمَّك الله وأجهلُه. أخبرني عن الصلاة. قال:"صَلِّ صلاة الصبح. ثم أقْصر عن الصلاة حتى تطلعَ الشمسُ حتى ترتفعَ، فإنها تطلع حين تطلع بين قرني شيطان، وحينئذ يسجد لها الكفار، ثم صَلِّ فإن الصلاة مشهودة محضورة حتى يستقل الظل بالرُّمح، ثم أقْصِر عن الصلاة فإن حينئذ تُسْجرُ جَهنمُ، فإذا أقبل الفيءُ فصَلِّ فإن الصلاة مشهودة محضورة حتى تُصلِّي العصر، ثم أقْصِر عن الصلاة حتى تغربَ الشمسُ، فإنها تغربُ بين قرني شيطان، وحينئذ يسجد لها الكفار".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (832) عن أحمد بن جعفر المعقري، حدثنا النضر بن محمد، حدثنا عكرمة بن عمار، حدثنا شداد بن عبد الله أبو عمار ويحيى بن أبي كثير، عن أبي أُمامة قال: قال عمرو بن عَبَسَة فذكر قصة إسلامه في حديث طويل سبق ذكره في ثواب الوضوء.
وقد رُوي هذا الحديث من مسند أبي أمامة نفسه أنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم فقال: ما أنت؟ قال:"نبي" قال: إلى من أُرسِلت؟ قال:"إلى الأحمر والأسود" قال: أيُّ حينٍ تكره الصلاة؟ قال:"من حين تصلي الصبح حتى ترتفع الشمس قدر رُمْح، ومن حين تصفرَّ الشمسُ إلى غروبها" قال: فأي الدعاء أسمع؟ قال:"شطر الليل الآخر وأدبار المكتوبات" قال: فمتى غروب الشمس؟ قال:"من أول ما تصفَرُّ الشمس حين تدخلها صفرةٌ إلى حين أن تغربَ الشمسُ".
أخرجه عبد الرزاق (3948) عن ابن جريج، قال: أخبرني عبد الرحمن بن سابط، أن أبا أمامة
سأل النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله.
ورجاله ثقات، وابن جريج مدلس ولكنه صرَّح بالإخبار إلا أن عبد الرحمن بن سابط لم يسمع من أبي أمامة كما قال ابن معين، ففيه انقطاع.
ورواه الإمام أحمد (22245) وأبو يعلى"إتحاف الخيرة" (1272)، والطبراني في الكبير (8105، 8107)، والحارث بن أبي أسامة"إتحاف الخيرة" (1271) كلهم من طريق ليث، عن ابن سابط، عن أبي أمامة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تصلوا عند طلوع الشمس، فإنها تطلع بين قرنَي شيطان، ويسجدُ لها كلُّ كافر، ولا عند غروبها فإنها تغرب بين قرنَي شيطان، ويسجد لها كل كافر، ولا نصفَ النهار فإنه عند سَجْر جهنَّم".
وليث هو: ابن أبي سليم بن زُنَيم، بالزاء والنون، مصغرًا وُصِف بسوء حفظه بعد اختلاطه، فكان يقلب الأسانيد ويرفع المراسيل، ويأتي عن الثقات بما ليس من حديثهم كما قال ابن حبان، فأخشى أن يكون هذا الحديث من مسند عمرو بن عَبَسَة كما رواه مسلم وسبق تخريجه، فجعله من مسند أبي أمامة.
আমর ইবনে আবাসা আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর নবী! আল্লাহ আপনাকে যা শিখিয়েছেন আর যা আমি জানি না, সে সম্পর্কে আমাকে জানান। আমাকে সালাত (নামায) সম্পর্কে জানান।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি ফজরের সালাত আদায় করো। এরপর সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো যতক্ষণ না সূর্য উঠে এবং বেশ ওপরে উঠে যায়। কেননা, যখন তা উদিত হয়, তখন তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান দিয়ে উদিত হয়, আর ঐ সময় কাফেররা তাকে সিজদা করে। এরপর তুমি সালাত আদায় করো। কারণ সেই সালাত প্রত্যক্ষকৃত ও উপস্থিত (ফেরেশতাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত) থাকে যতক্ষণ না বর্শার ছায়া (মধ্যাহ্ন আসার আগ পর্যন্ত) স্থির হয়। এরপর তুমি সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো। কেননা ঐ সময় জাহান্নামের আগুনকে উত্তপ্ত করা হয়। যখন ছায়া (পূর্ব দিক থেকে) ঢলতে শুরু করে, তখন সালাত আদায় করো। কারণ সেই সালাত প্রত্যক্ষকৃত ও উপস্থিত (ফেরেশতাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত) থাকে আসরের সালাত আদায় করা পর্যন্ত। এরপর সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো যতক্ষণ না সূর্য ডুবে যায়। কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান দিয়ে ডুবে যায়, আর ঐ সময় কাফেররা তাকে সিজদা করে।"