হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2408)


2408 - عن عبد الله بن عمرو قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطبهم وهو مُسْنِدٌ ظهره إلى الكعبة فقال:"لا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا صلاة بعد صلاة الغداة حتى تطلع الشمسُ".

حسن: رواه الإمام أحمد (6970) عن عبد الصمد (ابن عبد الوارث) حدثنا خليفة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده (عبد الله بن عمرو بن العاص) فذكر مثله.

ورواه أبو داود الطيالسي (2374) عن خليفة بن خياط به مثله، وهو في الحقيقة قطعة من الحديث الطويل يأتي كل قطعة منه في موضعه.

وخليفة بن خياط أبو هبيرة ذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 229).

وقد توبع كما سيأتي، وهو جد خليفة بن خياط بن خليفة بن خياط العُصفري أبو عمرو البصري، لقبه شباب، الأخباري من شيوخ البخاري وغيره مات سنة أربعين ومائتين.

رواه الإمام أحمد (6681) عن يحيى (بن سعيد القطان) عن حسين (وهو ابن ذكوان) عن عمرو
ابن شُعيب، عن أبيه، عن جده في حديث طويل وفيه:"لا صلاة بعد الغداة حتى تطلع الشمس، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس" وهي متابعة قوية لما سبق.

قال الهيثمي في"المجمع" (3355):"رواه أحمد ورجاله ثقات".

وقال:"في الصحيح النهي عن الصلاة بعد طلوع الشمس".




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কাবা শরীফের দিকে পিঠ হেলান দিয়ে দাঁড়িয়ে তাদের উদ্দেশ্য করে ভাষণ দিচ্ছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "সূর্য অস্তমিত না হওয়া পর্যন্ত আসরের সালাতের পর আর কোনো সালাত নেই, এবং সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত ফজরের সালাতের পর আর কোনো সালাত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (2409)


2409 - عن سلمة بن الأكوع قال: كنتُ أسافر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فما رأيتُه صلى بعد العصر، ولا بعد الصبح قط.

صحيح: رواه الإمام أحمد (16535) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن زهير. وحدثنا يحيى بن أبي بكير، قال: حدثنا زهير بن محمد، عن يزيد بن خُصَيفَة، عن سلمة بن الأكوع فذكره.

ورواه الطبراني في الكبير (7/ 40) عن حفص بن عمر، ثنا أبو حذيفة، ثنا زهير بن محمد به مثله.

ورجاله ثقات وإسناده صحيح ويزيد بن خُصيفة هو: يزيد بن عبد الله بن خُصيفة الكندي المدني مِن رجال الجماعة وثقه ابن معين وأحمد في رواية الأثرم وأبو حاتم والنسائي. وقال أحمد في رواية أبي داود عنه:"منكر الحديث". وهذا ليس بجرح فإن الإمام أحمد يُطلق هذه الكلمة على من يُغرب على أقرانه كما بينت ذلك بالتفصيل في كتابي"دراسات في الجرح والتعديل".

ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3351): رواه أحمد والطبراني في الأوسط ورجال أحمد رجال الصحيح. وهو كما قال إلا أنه فاته العزو إلى الطبراني في الكبير، وأما في الأوسط (7504) فرواه من طريق سعيد بن سلمة بن أبي الحُسام، قال: حدثنا يزيد بن خُصيفة، عن ابن سلمة بن الأكوع، عن سلمة فذكر مثله. وقال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن ابن سلمة إلا يزيد بن خُصيفة، تفرد به سعيد بن سلمة.

قلت: ليس كما قال فقد رواه عن يزيد بن خصيفة زهير بن محمد كما ترى، وابن سلمة بن الأكوع هو إياس من رجال الجماعة.

وأما سعيد بن سلمة بن أبي الحُسام العدوي مولاهم فضعَّفه النسائي، وذكره ابن حبان في الثقات، قال الحافظ:"صدوق صحيح الكتاب، يخطئ من حفظه" ولعل هذا مما أخطأ فيه فإنه زاد في الإسناد ابن سلمة بن الأكوع فإن صحت هذه الزيادة فهي المزيد في متصل الأسانيد.

وهذا الحديث لا يعارض ما روته عائشة وأم سلمة بأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي ركعتين بعد العصر، فإن سلمة بن الأكوع يخبر عما رآه من فعل النبي صلى الله عليه وسلم في الأسفار، وهما تُخبران بما كان يفعله النبي صلى الله عليه وسلم في داخل البيت فلا تعارض بينهما كما سيأتي.




সালামাহ ইবনুল আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফর করতাম। কিন্তু আমি কখনো তাঁকে আসরের পর এবং ফজরের পর সালাত (নামাজ) আদায় করতে দেখিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (2410)


2410 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهي عن الصلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، وبعد الفجر حتى تطلع الشمس.

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (613) عن محمد بن المثنى أبي موسى، ثنا رَوح بن
عبادة، عن أسامة بن زيد، عن حفص، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن لأجل أسامة بن زيد وهو: الليثي مولاهم، أبو زيد المدني مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ولأجل حفص وهو: ابن عبيد الله بن أنس بن مالك قال أبو حاتم: لا يثبت له السماع إلا من جده. يعني أنس بن مالك.

قلت: هو من رجال الشيخين وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق" ذكر الحديث الهيثمي في"كشف الأستار"، ولم يذكره في"مجمع الزوائد".

قال البزار:"لا نعلم رواه عن حفص إلا أسامة".

قلت: ولا يضر هذا فإن أسامة صدوق ولم يأت بحديث منكر.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের পর থেকে সূর্য অস্ত যাওয়া পর্যন্ত এবং ফজরের পর থেকে সূর্য উদিত হওয়া পর্যন্ত সালাত (নামাজ) পড়তে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2411)


2411 - عن علي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي على إثر كل صلاة مكتوبة ركعتين إلا الفجر والعصر.

صحيح: رواه ابن خزيمة (1196) قال: ثنا بندار، ثنا عبد الرحمن، نا سفيان، ح وثنا محمد بن العلاء بن كُريب، ثنا أبو خالد الأحمر، ثنا سفيان، ح وثنا سَلْم بن جُنادة، ثنا وكيع، عن سفيان، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضَمْرة، عن علي فذكر مثله.

قال ابن خزيمة: هذا لفظ حديث وكيع.

وأخرجه ضياء المقدسي في"المختارة" (521) عن ابن خزيمة.

قلت: ظاهر هذا الحديث يخالف ما سيأتي عن علي رضي الله عنه. وقد أشار البيهقي إلى هذه المخالفة.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রত্যেক ফরয সালাতের পরে দু’রাকআত সালাত আদায় করতেন, ফজর ও আসর ব্যতীত।









আল-জামি` আল-কামিল (2412)


2412 - عن ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا بعد الصبح حتى ترتفع الشمس وتضحى".

صحيح: رواه الإمام أحمد (5010) عن يزيد، أخبرنا ابن أبي ذئب، عن مسلم الخبَّاط، عن ابن عمر، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُتلقَّى الركبانُ أو يبيع حاضر لبادٍ، ولا يخطبَ أحدكم على خطبة أخيه حتى ينكح أو يدعَ، ولا صلاة بعد العصر حتى تغيبَ الشمس، ولا بعد الصُّبح حتى ترتفع الشمسُ، أو تَضْحى.

ورواه أبو داود الطيالسي (2041) عن ابن أبي ذئب به واكتفى بالنهي عن الصلاة بعد الصبح حتى تطلع الشمس ويرتفع النهار، وعن الصلاة بعد العصر حتى تغرب الشمسُ. وبقية الحديث أورده في حديث آخر بالإسناد نفسه.

ورجاله ثقات ومسلم الخبَّاط هو: ابن أبي مسلم وهو ثقة أيضًا كان يبيع الخبط والحنطة وكان خياطًا فقيل له: الخبَّاط، والحنَّاط، والخياط. انظر"المؤتلف" للدارقطني (2/ 939).
إلا أن ابن رجب في شرحه للبخاري باسم"فتح الباري" (3/ 270) يرى أنه حديث غريب منكر، ظنا منه أن هذا يخالف ما رواه ابن عمر في الصحيحين:"لا يتحرى أحدكم فيصلي عند طلوع الشمس ولا عند غروبها"، والصواب أنه لا تعارض بينهما، ففي أحدهما النهي عن تحري الصلاة عند طلوع الشمس وغروبها والآخر عام في النهي عن الصلاة بعد الفجر وبعد الصبح، والله أعلم.

وفي الباب عن سعد بن أبي وقاص قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاتان لا يصلي بعدهما: الصبح حتى تطلع الشمس، والعصر حتى تغرب الشمس".

رواه الإمام أحمد (1469)، وأبو يعلى (733) كلاهما عن إسحاق بن عيسى، حدثني إبراهيم، يعني ابن سعد، عن أبيه، عن معاذ التيمي قال: سمعت سعد بن أبي وقاص فذكر الحديث.

ومعاذ التيمي لم يوثقه غير ابن حبان، ولم يرو عنه سوى سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف ولذا فهو"مقبول" وهو من رجال"التعجيل" (1049)، ورواه ابن حبان (1549) من حديث إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عنه. وقد توهم البعض بأنه معاذ بن عبد الرحمن التيمي وهو من رجال"التهذيب" أخرج له الشيخان ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 225):"رواه أحمد وأبو يعلى ورجاله رجال الصحيح" والصواب أنه معاذ التيمي المكي ليس من رجال التهذيب أصلا.

وكذلك ما رواه نصر بن عبد الرحمن، عن جده مُعاذ أنه طاف مع معاذ بن عفراءَ فلم يُصَلِّ. فقلتُ: ألا تُصلي؟ فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا صلاة بعد العصر حتى تغيب الشمسُ، ولا بعد الصبح حتى تطلع الشمس".

رواه النسائي (518) عن أبي داود، قال: حدثنا سعيد بن عامر الضبعي، حدثنا شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن نصر بن عبد الرحمن فذكر مثله.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (17926) عن محمد بن جعفر قال: حدثنا شعبة به مثله.

اختلف على شعبة فقال سعيد بن عامر ومحمد بن جعفر غندر هكذا.

قال الحافظ: وقال غيرهما: عن شعبة، عن سعد، عن نصر، عن جده معاذ بن عفراء أنه طاف فقال له معاذ رجل من قريش: ما لك لا تصلي فذكر الحديث.

انظر: تهذيب التهذيب (10/ 428) ترجمة نصر بن عبد الرحمن الكناني.

ونصر بن عبد الرحمن لم يوثقه غير ابن حبان ولذا قال في التقريب:"مقبول" ومعاذ رجل من قريش لا يُعرف من هو؟ سواء كان جد نصر كما في رواية الضبعي وغندر، فإنه طاف مع معاذ وهو: ابن الحارث بن رفاعة المعروف بابن عفراء، وهي أمه، وهو صحابي معروف شهد بدرًا وما بعدها وهو من الأنصار. أو يكون هو جد نصر بن عبد الرحمن كما في رواية حفص بن عمر الحوضي رواه عنه البيهقي (2/ 464) والقائل له رجل آخر اسمه أيضًا معاذ، وهو رجل من قريش، وابن عفراء من الأنصار. فصار نصر بن عبد الرحمن مرة من قريش، وأخرى من الأنصار وهو اضطراب
في الإسناد.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আসরের পর সূর্য অস্তমিত না হওয়া পর্যন্ত কোনো সালাত নেই, আর ফজরের পর সূর্য উপরে উঠে উজ্জ্বল না হওয়া পর্যন্ত কোনো সালাত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (2413)


2413 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يتحرَّى أحدكم فيصلي عند طلوع الشمس، ولا عند غروبها".

متفق عليه: رواه مالك في القرآن (47) عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث.

ورواه البخاري في المواقيت (585) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (828) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

وفي رواية عندهما:"لا تحرَّوا بصلاتكم طلوعَ الشمسِ ولا غروبَها".

وزاد مسلم:"فإنها تطلع بقرنَي شيطان" البخاري (582) عن مسدد، قال: حدثني يحيى بن سعيد، عن هشام، عن أبيه، قال: أخبرني ابن عمر، ومسلم من طرق عن هشام به.

ثم قال البخاري: وقال: حدثني ابن عمر - أي بالإسناد السابق من حديث مسدد به. قال صلى الله عليه وسلم:"إذا طلع حاجب الشمس فأخِّروا الصلاة حتى ترتَفِع، وإذا غاب حاجب الشمس فأخروا الصلاة حتى تغيبَ" تابعه عبدة. ومثله رواه مسلم أيضًا.

وأما حديث عبدة وهو: ابن سليمان فرواه البخاري في بدء الخلق (3272) عن محمد، (يعني ابن سلام) عنه، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن ابن عمر فذكر مثله.

وفي رواية عندهما:"ولا تحيَّنوا بصلاتكم طلوع الشمس، ولا غروبها، فإنها تطلع بين قرنَي شيطان، أو الشيطان" قال عبدة كما في البخاري: لا أدري أي ذلك قال هشام (3273).

وقوله:"فإنها تطلع بين قرني الشيطان" أي بالنسبة إلى من يشاهد الشمس عند طلوعها، فلو شاهد الشيطان لرآه منتصبًا عندها. كذا في"الفتح" (6/ 340).




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন সূর্য উদয়ের সময় এবং সূর্য অস্ত যাওয়ার সময় নামায পড়ার ইচ্ছা না করে।"

তাদের উভয়ের (বুখারী ও মুসলিমের) অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা তোমাদের নামাযের দ্বারা সূর্য উদয়ের সময়কে অথবা তার অস্ত যাওয়ার সময়কে উদ্দেশ্য করো না।"

মুসলিমে অতিরিক্ত রয়েছে: "কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান দিয়ে উদিত হয়।"

ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন সূর্যের কিনার (আংশিক) উদিত হয়, তখন তা উঁচু না হওয়া পর্যন্ত নামায বিলম্বিত করো, আর যখন সূর্যের কিনার ডুবে যায়, তখন তা পুরোপুরি ডুবে না যাওয়া পর্যন্ত নামায বিলম্বিত করো।"

তাদের উভয়ের (বুখারী ও মুসলিমের) অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আর তোমরা তোমাদের নামাযের জন্য সূর্য উদয়ের সময় বা তার অস্ত যাওয়ার সময় নির্ধারণ করো না। কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে অথবা শয়তানের (দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে) উদিত হয়।" আবদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, যেমনটি বুখারীতে আছে: আমি জানি না, হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দুটির মধ্যে কোনটি বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2414)


2414 - عن عائشة أنها قالت: لم يَدَعْ رسول الله صلى الله عليه وسلم الركعتين بعد العصر، ثم قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تتحرَّوا طلوعَ الشمسَ، ولا غروبَها، فتصلوا عند ذلك".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (833/ 296) عن حسن الحلُواني، ثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের পরে দু’রাকআত সালাত কখনো পরিত্যাগ করতেন না। এরপর তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা সূর্যোদয় বা সূর্যাস্তের সময় সালাত আদায়ের ইচ্ছা করো না।”









আল-জামি` আল-কামিল (2415)


2415 - عن عائشة أنها قالت: وَهِم عمر إنما نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُتحرَّى طلوعُ الشمس وغروبُها.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (833) عن محمد بن حاتم، حدثنا بهز، حدثنا وُهَيب، حدثنا عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن عائشة فذكرت مثله.

قال البيهقي (2/ 453):"وإنما قالت ذلك لأنها رأت رسول الله صلى الله عليه وسلم صلي الركعتين بعد
العصر، وكانتا مما ثبت عنها وعن أم سلمة قضاء، وكان صلى الله عليه وسلم إذا عمل عملًا أثبته".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভুল বুঝেছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো কেবল সূর্য উদয় হওয়া এবং সূর্য অস্ত যাওয়াকে লক্ষ্য করে (ঐ সময়ে) নামায আদায় করতে নিষেধ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2416)


2416 - عن بلال قال: لم يكن يُنهى عن الصلاة إلا عند طلوع الشمس، فإنها تطلُع بين قرنَي الشيطان.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23887) عن وكيع، عن شُعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شِهاب، عن بلال فذكره.

ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (1070) من طريق شعبة به مثله.

ورواه ابن أبي شيبة (2/ 354) من طريق سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم، به إلا أنه ذكر فيه"غروب الشمس"، مكان"طلوع الشمس" وكذلك روى الروياني في مسنده (732) من حديث سفيان به، فلعل بلالًا نفسه مرة روى النَّهي"عن الصلاة عند طلوع الشمس" فروى عنه من سمع منه هذا، ثم روى النهي"عن الصلاة عند غروب الشمس" فروى عنه من سمع منه هذا فإذا جمع هذا مع ذاك أتى بالحديث الكامل موافقًا لرواية غيره.

ورجاله ثقات وإسناده صحيح، وقيس بن مسلم هو الجدلي من رجال الجماعة.

قال الهيثمي في"المجمع" (3354) رواه أحمد والطبراني في الكبير بمعناه، ورجال أحمد رجال الصحيح.

وقوله:"لم يكن يُنهي" فعل مبني للمجهول، والناهي هو النبي صلى الله عليه وسلم.




বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সূর্যোদয়ের সময় ছাড়া নামাজ আদায় করতে নিষেধ করা হতো না। কেননা সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে উদিত হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2417)


2417 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تصلوا حين تطلع الشمس، ولا حين تسقُط، فإنها تطلع بين قرنَي شيطان، وتغرب بين قرنَي شيطان".

حسن: رواه الإمام أحمد (20169) والبزار"كشف الأستار" (612)، والطبراني في الكبير (6973) كلُّهم من طريق شعبة، عن سِماك بن حرب قال: سمعتُ المهلب بن أبي صُفرة يحدث عن سمرة فذكر الحديث، وفي رواية: يخطب فقال: قال سمرة بن جندب فذكر الحديث.

وصححه ابن خزيمة (1274) ورواه من طريق شعبة به مثله.

قلت: إسناده حسن لأجل سماك بن حرب وفيه كلام غير أنه حسن الحديث.

وفي رواية: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمرنا أن نُصلي أي ساعة شئنا من ليلٍ أو نهار، غير أنه أمرنا أن نجتنب طلوعَ الشمس وغروبها، وقال: إن الشيطان يغيب معها حين يغيب، ويطلع معها.

رواه البزار (610) من وجه آخر عن خبيب بن سليمان، عن أبيه سلمان بن سمرة، عن سمرة بن جندب فذكر مثله.

كما رواه أيضًا من وجه آخر من حديث إسماعيل بن مسلم، عن الحسن، عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تحروا بصلاتكم طلوع الشمس وغروبها، فإنها تطلع في قرنَي شيطان، وتغرب في
قرنَي شيطان".

وقال: أحاديث إسماعيل لا نعلم رواها عن الحسن غيره.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 225): رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير من طرق، ورجال أحمد ثقات.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা সালাত আদায় করবে না যখন সূর্য উদিত হয় এবং যখন তা অস্তমিত হয়। কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যবর্তী স্থানে উদিত হয় এবং শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যবর্তী স্থানে অস্তমিত হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2418)


2418 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تصلوا عند طلوع الشمس ولا عند غروبها، فإنها تطلعُ وتغربُ على قرن شيطان، وصلوا بين ذلك ما شئتُم".

حسن: رواه أبو يعلى (4216 تحقيق حسين سليم) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا رَوح، حدثنا أسامة بن زيد، عن حفص بن عبد الله، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن لأجل أسامة بن زيد وهو الليثي وقد سبق ذكر هذا الإسناد بلفظ حديث أنس. نهي النبي صلى الله عليه وسلم عن الصلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، وبعد الفجر حتى تطلع الشمس، رواه البزار.

فهل أنس روي بلفظين في مجلسين فكل من أبي يعلى والبزار وصل إليهما أحدهما، أو روي بلفظين في مجلس واحد، ولكن كل واحد منهما اكتفى بلفظ واحد فقط وهذا بعيد.

وأما الهيثمي فجمع بين اللفظين في مجمع الزوائد (3359) (تحقيق محمد عبد القادر عطا) مع عزو جزء منه إلى أبي يعلى وجزء منه إلى البزار، ولم أجده في الطبعة القديمة، ثم أورد كل جزء منه في"كشف الأستار" (613) وفي"المقصد العلي" (345) وكذا الحافظ ابن حجر في"المطالب العالية" (315) عن أبي يعلى.

وأما ما رُوِيَ عن محمد بن حُيَي بن يعلى بن أمية، عن أبيه قال: رأيتُ يعلي يُصلي قبل أن تطلعَ الشمسُ، فقال له رجل: أو قيل له: أنت رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم تُصلي قبل أن تطلعَ الشمسُ؟ قال يعلى: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الشمس تطلع بين قرنَيْ شيطان" قال له يَعْلى: فإن تطلع وأنت في أمر الله خير من أن تطلع وأنت لاهٍ.

ففيه محمد وأبوه لا يُعرفان. رواه الإمام أحمد (17959) عن أبي عاصم، حدثنا عبد الله بن أمية بن أبي عثمان القُرشي، قال: حدثنا محمد بن حُيَي بن يعلى بن أمية فذكر مثله.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 226): رواه أحمد وفيه حيي بن يعلي ولا يُعرف.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সূর্যোদয়ের সময় এবং সূর্যাস্তের সময় সালাত আদায় করো না, কারণ এটি শয়তানের শিংয়ের উপর উদিত হয় এবং অস্ত যায়, আর এর মাঝে তোমরা যতক্ষণ চাও সালাত আদায় করতে পারো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2419)


2419 - عن زيد بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم نَهي أن يُصَلَّي إذا طلع قرنُ الشمسِ، أو غاب قرنُها، وقال:"إنها تطلع بين قرنَي شيطان" أو"من بين قرنَي شيطان".

صحيح: رواه الإمام أحمد (21661) عن عفَّان، حدثنا همام، حدثنا قتادة، عن ابن سيرين، عن زيد بن ثابت فذكره. وإسناده صحيح.

وفي معناه ما رواه سعيد بن نافع قال: رآني أبو بَشير الأنصاري صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أصلي صلاة الضُحى حين طلعتِ الشمس فعاب ذلك عليَّ ونهاني ثم قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:
"لا تصلوا حتى ترتفع الشمس فإنها تطلع في قرنَي الشيطان".

رواه أحمد (21889) والبزار في مسنده (2304) وأبو يعلى كما في"إتحاف الخيرة" (1276) كلهم من طريق هارون بن معروف. قال: أخبرني مخرمة (بن بكير) عن أبيه، عن سعيد بن نافع فذكره.

وفيه سعيد بن نافع لم يوثقه أحد وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 291) وذكر الراوي عنه بكير بن الأشج فقط وعداده في أهل المدينة فهو"مقبول" في اصطلاح الحافظ ابن حجر.




যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সূর্যের প্রথম অংশ উদিত হয় অথবা যখন তার প্রথম অংশ অস্তমিত হয়, তখন সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বলেছেন: "নিশ্চয় সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্য দিয়ে উদিত হয়" অথবা, "শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান থেকে।"

এই একই অর্থে আবু বাশীর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী, বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সালাত আদায় করবে না যতক্ষণ না সূর্য উপরে উঠে যায়। কারণ, নিশ্চয় তা (সূর্য) শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যে উদিত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2420)


2420 - عن عائشة قالت: ركعتان لم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعُهما سِرًّا ولا علانية، ركعتان قبل صلاة الصبح، وركعتان بعد العصر.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (592)، ومسلم في المسافرين (835) كلاهما من طريق أبي إسحاق الشيباني، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة فذكرت مثله.

وعن شعبة، عن أبي إسحاق قال: رأيتُ الأسودَ ومسروقًا شهدا على عائشة قالت: ما كان النبي صلى الله عليه وسلم يأتيني في يوم بعد العصر إلا صلَّى ركعتين. رواه الشيخان من طريق شعبة.

وفي رواية عندهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عنها قالت: ابن أختي! ما ترك رسول الله صلى الله عليه وسلم السجدتين بعد العصر عندي قط.

وفي رواية عند البخاري (590) من وجه آخر قالت: وكان النبي صلى الله عليه وسلم يصليهما، ولا يصليهما في المسجد مخافة أن يُثَقِّلَ على أمته، وكان يحب ما يُخفِّفُ عنهم.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: দুটি রাকআত এমন ছিল যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনোই ছাড়তেন না, না নীরবে আর না প্রকাশ্যে। (তা হলো) ফজরের সালাতের আগের দুই রাকআত এবং আসরের পরের দুই রাকআত।

আর (আরেক বর্ণনায়) শু'বা সূত্রে, আবূ ইসহাক বলেছেন: আমি আসওয়াদ এবং মাসরূককে দেখেছি, তারা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে সাক্ষ্য দিয়েছেন যে, তিনি বলেছেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের পরে আমার কাছে যে দিনই এসেছেন, সেদিনই দুই রাকআত সালাত আদায় করেছেন।

আর বুখারী ও মুসলিমের অপর এক বর্ণনায় হিশাম ইবনু উরওয়াহ, তার পিতা সূত্রে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেছেন: "হে আমার ভাগ্নে! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের পরের এই দুটি সিজদা (রাকআত) আমার কাছে কখনোই ত্যাগ করেননি।"

আর বুখারীর অন্য এক বর্ণনায় (৫৯০) বর্ণিত আছে যে, তিনি (আয়েশা) বলেছেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দুটি (রাকআত) আদায় করতেন, কিন্তু উম্মতের উপর কষ্টদায়ক হয়ে যাওয়ার ভয়ে তিনি এগুলো মসজিদে আদায় করতেন না। আর তিনি এমন কিছু পছন্দ করতেন যা তাদের জন্য হালকা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2421)


2421 - عن أبي سلمة قال: إنه سأل عائشة عن السجدتين اللتين كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصليهما بعد العصر. فقالت: كان يصليهما قبل العصر، ثم إنه شُغِل عنهما أو نسيهما فصلاهما بعد العصر، ثم أثبتهما. وكان إذا صَلَّى صلاةً أثبتها. تعني: داوم عليها.

صحيح: رواه مسلم في المسافرين (835) من طريق إسماعيل بن جعفر، قال: أخبرني محمد بن أبي حرملة، قال: أخبرني أبو سلمة فذكر مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামাহ তাঁকে আসরের পর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যে দু’রাক‘আত সালাত আদায় করতেন, সে সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেগুলো আসরের আগে আদায় করতেন। এরপর হয়তো তিনি (ব্যস্ততার কারণে) সেগুলো থেকে বিরত ছিলেন অথবা ভুলে গিয়েছিলেন, তাই তিনি আসরের পরে সেগুলো আদায় করেন। এরপর তিনি সেগুলোকে স্থায়ী করে নেন। আর তিনি যখন কোনো সালাত আদায় করতেন, তখন তা স্থায়ী করে নিতেন। এর অর্থ হলো: তিনি তা নিয়মিত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2422)


2422 - عن كريب أنَّ ابن عباس والمسور بن مخرمة وعبد الرحمن بن أزهر رضي الله عنهم أرسلوه إلى عائشة رضي الله عنها فقالوا: اقرأ عليها السلام مِنَّا جميعًا وسَلْها عن الركعتين بعدَ صلاةِ العصر وقُل لها: إنا أُخبِرْنا أنَّكِ تُصلِّينَهما، وقد بَلَغَنا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى عنها، وقال ابن عباس: وكنتُ أضربُ الناسَ مع عمر بن الخطاب عنها، قال كُرَيبٌ: فدخلتُ على عائشة رضي الله عنها فبلَّغتُها ما أرسلوني، فقالت: سَلْ أمَّ سَلمةَ، فخَرجتُ إليهم فأخبرتُهم بقولها، فرَدُّوني إلى أمِّ سلمة بمثلِ ما
أرسلوني به إلى عائشةَ، فقالت أمُّ سلمةَ رضي الله عنها: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم ينهي عنها، ثمَّ رأيتُه يُصلِّيهما حينَ صلَّى العصرَ، ثمَّ دَخَل عليَّ وعنِدي نِسوةٌ من بني حَرام منَ الأنصار فأرسلتُ إليهِ الجاريةَ فقلت: قومي بجَنبهِ قولي لهُ: تقولُ لكَ أمُّ سلمة يا رسولَ الله سمعتُكَ تنهي عن هاتَين وأراكَ تُصلِّيهما، فإن أشارَ بيدِه فاستأخِري عنهُ، ففعلَتِ الجاريةُ، فأشارَ بيده، فاستأخرَتْ عنهُ، فلما انصرَفَ قال: يا ابنَةَ أبي أميَّةَ! سألتِ عن الركعتين بعدَ العصر، وإنه أتاني ناسٌ من عبد القيس فشغلوني عن الركعتين اللتَين بعدَ الظهر، فهُما هاتانِ".

متفق عليه: رواه البخاري في كتاب السهو (1233)، ومسلم في المسافرين (834) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكير، عن كريب فذكر مثله.

وفي رواية النسائي (580) وغيره من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى في بيتها بعد العصر ركعتين مرة واحدة، وأنها ذكرت ذلك له فقال:"هما ركعتان كنت أصليهما بعد الظهر فشُغِلتُ عنهما حتى صليت العصر" ومثله رواه أيضًا عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عنها.

والروايات الصحيحة كلها تدل على أنه صلى الله عليه وسلم أول ما صلاها صلاها قضاءً ثم أثبتها لنفسه بعد العصر فإنه صلى الله عليه وسلم إذا صلى صلاة أثبتها كما ذكرت عائشة في الحديث السابق والمثبت مقدَّم على النافي، ثم لعل النبي صلى الله عليه وسلم لم يواظب عليهما إلا في بيت عائشة ويُحمل عليه أيضًا حديث ابن عباس وهو وإن كان ضعيفًا:"إنما صلى النبي صلى الله عليه وسلم الركعتين بعد العصر؛ لأنه أتاه مال فشغله عن الركعتين بعد الظهر، فصلاهما بعد العصر، ثم لم يَعُد لهما".

فيحمل النفي على علم الراوي فإنه لم يطَّلِع على ذلك، والمثبت مقدم على النافي كذا قال الحافظ ابن حجر.

قلت: وحديث ابن عباس رواه الترمذي (184) عن قتيبة، حدثنا جرير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكر الحديث.

وعطاء بن السائب مختلط، وجرير بن عبد الحميد ممن سمع منه بعد الاختلاط، ورواه أيضًا ابن حبان (1575) من طريق حميد بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن عطاء بن السائب به، ووالد حميد وهو عبد الرحمن بن حميد بن عبد الرحمن الرؤاسي الكوفي، وهو وإن كان ثقة من رجال مسلم إلا أنه سمع منه بعد الاختلاط أيضًا.

لقد نصَّ النسائيُّ على أن رواية حماد بن زيد وشعبة، وسفيان عنه جيدة. ومنهم من زاد الرابع وهو: حماد بن سلمة وهو مختلَف فيه. انظر:"الكواكب النيرات" رقم (39)، فاختلف أهل العلم في تأويل حديث عائشة، وقد ثبت النهي عن الصلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس.

فذهب الجمهور إلى أنه خاص بالنبي صلى الله عليه وسلم، لحديث أم سلمة قالت: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم -
العصر، ثم دخل بيتي فصلى ركعتين، فقلت: يا رسول الله! صليت صلاةً لم تكن تصليها. فقال:"قدم عَليَّ مال، فشغلني عن ركعتين كنت أركعهما قبل العصر، فصليتهما الآن" فقلت: يا رسول الله! أفنقضيهما إذا فاتَتْنا؟ قال:"لا".

رواه الإمام أحمد (26678)، وأبو يعلى (7028)، والطبراني في الكبير (23/ 248) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن الأزرق بن قيس، عن ذكوان، عن أم سلمة، فذكرت مثله.

وصحّحه ابن حبان (2653) فرواه من هذا الطريق. وأخرجه الطحاوي (1/ 306) واحتج به على أنه من خصائصه صلى الله عليه وسلم.

وأورده الحافظ في"الفتح" (2/ 64، 65) وضعَّفه.

وذلك لأن حماد بن سلمة وإن كان أحد الأئمة، ولكن تغير حفظه بآخره، وكان أثبت الناس في ثابت، أما في غيره فليس كذلك فروايته عن الأزرق بن قيس لا يخلو من وهم، وهو تفرد بزيادة في هذا الحديث ولم يوافق عليها أحد من كان في طبقته.

وكذلك رواه أبو داود (1280) من طريق ابن إسحاق، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن ذكوان مولى عائشة أنها حدثته أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلي بعد العصر وينهى عنه، ويواصل وينهى عن الوصال.

وفي إسناده محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.

وفيه أيضًا إشارة إلى اختصاصه باستدامة هاتين الركعتين بعد وقوع القضاء بما فعل في بيت أم سلمة، كما قال البيهقي (2/ 458).

وذهب ابن الزبير إلى جواز الصلاة بعد العصر وسيأتي ما يدل على ذلك.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইব বর্ণনা করেন যে, ইবনু আব্বাস, মিসওয়ার ইবনু মাখরামা এবং আবদুর রহমান ইবনু আযহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন এবং বললেন: আমাদের সকলের পক্ষ থেকে তাঁকে সালাম বলবে এবং তাঁকে আসরের সালাতের পরের দুই রাকাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করবে। তাঁকে বলবে: আমাদের খবর দেওয়া হয়েছে যে আপনি এই দুই রাকাত সালাত আদায় করেন, অথচ আমাদের নিকট পৌঁছেছে যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা থেকে নিষেধ করেছেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে এই সালাত আদায়কারী লোকদেরকে প্রহারও করতাম। কুরাইব বললেন: অতঃপর আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম এবং তাঁরা আমাকে যা বলে পাঠিয়েছিলেন তা তাঁকে জানালাম। তিনি (আয়িশা) বললেন: তুমি উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করো।

আমি তাঁদের (ইবনু আব্বাস ও অন্যদের) নিকট ফিরে এসে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য জানালাম। অতঃপর তাঁরা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আমাকে যা বলে পাঠিয়েছিলেন, সেই একই বিষয়ে উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আমাকে আবার পাঠালেন।

তখন উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই দুই রাকাত থেকে নিষেধ করতে শুনেছি, কিন্তু এরপর তাঁকে আসরের সালাত আদায় করার পর এই দুই রাকাত সালাত আদায় করতে দেখেছি। এরপর তিনি আমার কাছে আসলেন। তখন আমার কাছে আনসার গোত্রের বনু হারাম শাখার কতিপয় নারী উপস্থিত ছিলেন। আমি তাঁর (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) কাছে একজন দাসীকে পাঠালাম এবং বললাম: তুমি তাঁর পাশে দাঁড়িয়ে তাঁকে বলো: উম্মু সালামা আপনাকে বলছেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে এই দুই রাকাত (সালাত) থেকে নিষেধ করতে শুনেছি, অথচ এখন আপনাকে তা আদায় করতে দেখছি। যদি তিনি হাত দ্বারা ইশারা করেন, তবে তুমি তাঁর থেকে দূরে সরে যাবে। দাসীটি তা-ই করলো। তিনি হাত দ্বারা ইশারা করলেন, আর দাসীটি তাঁর থেকে দূরে সরে গেল।

অতঃপর যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: হে আবু উমাইয়্যার কন্যা! তুমি আমাকে আসরের পরের দুই রাকাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছ। আসলে আবদুল কায়েস গোত্রের কিছু লোক আমার কাছে এসেছিল, ফলে তারা আমাকে যুহরের পরের দুই রাকাত (সুন্নাত) থেকে ব্যস্ত করে দিয়েছিল। এই দুটিই হলো সেই দুই রাকাত।









আল-জামি` আল-কামিল (2423)


2423 - عن قال عبد العزيز بن رفيع: رأيتُ عبد الله بن الزبير يُصلي ركعتين بعد العصر، ويُخبِر أن عائشة رضي الله عنها حدَّثتْه أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يدخُل بيتها إلا صلاهما".

صحيح: رواه البخاري في الحج (1631) عن الحسن بن محمد هو الزعفراني، حدثنا عبيدة بن حُميد، حدثني عبد العزيز بن رُفيع فذكره.

وللحديث تفصيل: رواه الإمام أحمد (25506) عن علي بن عاصم، قال: أخبرنا حنظلة السدوسي، عن عبد الله بن الحارث بن نوفل قال: صلى معاوية بالناس العصر، فالتفت فإذا أُناس يصلون بعد العصر، فدخل ودَخَلَ عليه ابن عباس وأنا معه، فأوسَعَ له معاويةُ على السَّرير، فجَلَسَ معه، قال: ما هذه الصلاةُ التي رأيتُ الناس يُصلُّونها، ولم أر النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّيها ولا أمَرَ بها؟ ! قال: ذاك ما يُفْتيهم ابن الزبير، فدخل ابن الزبير، فسَلَّمَ، فجلس، فقال معاوية: يا ابن الزبير! ما هذه الصلاةُ التي تأمُرُ الناسَ يُصلُّونها، لم نر رسول الله صلى الله عليه وسلم صَلَّاها، ولا أمَرَ بها؟ قال: حدثتني عائشة أم المؤمنين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّاها عندها في بيتها، قال: فأمَرَني معاويةُ ورجلًا آخر أن نأتيَ
عائشةَ، فنسألَها عن ذلك؟ قال: فدَخَلْتُ عليها، فسَألْتُها عن ذلك، فأخبرتُها بما أخْبَرَ ابنُ الزبير عنها، فقالت: لم يَحْفَظ ابن الزبير، إنما حدَّثْتُه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى هذه الركعتين بعد العصر عندي، فسألتُهُ، قلتُ: إنَّك صَلَّيْتَ ركعتين لم تكن تُصَلِّيْهما؟ قال:"إنَّه كان أتاني شيءٌ، فَشُغِلتُ في قِسْمَتِهِ عَنِ الركعتين بعدَ الظُّهْرِ، وأتاني بلالٌ، فناداني بالصلاة، فكَرِهْتُ أنْ أحْبِسَ الناسَ فَصَلَّيْتُهُما" قال: فَرَجَعْتُ فأخبرتُ معاوية. قال: قال ابن الزبير: أليسَ قد صَلَّاهما؟ لا نَدَعهما، فقال له معاوية: لا تزال مُخَالفًا أبدًا.

وعلي بن عاصم وهو الواسطي وشيخه حنظلة ضعيفان.

ورواه أيضا ابن ماجه (1159) مختصرًا وفيه يزيد بن أبي زياد ضعيف، وللحديث أسانيد أخرى كلها ضعيفة وبعضها أسند الخبر إلى أم سلمة.




আব্দুল আযীয ইবনে রুফাই' থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইরকে আসরের পর দুই রাকাত সালাত আদায় করতে দেখেছি এবং তিনি খবর দিতেন যে, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বলেছেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখনই তাঁর ঘরে প্রবেশ করতেন, তখনই তা আদায় না করে যেতেন না।

আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিস ইবনে নাওফাল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আউইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের নিয়ে আসরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে তাকালেন এবং দেখলেন যে কিছু লোক আসরের পর সালাত আদায় করছে। তিনি (ঘরে) প্রবেশ করলেন এবং আমি তাঁর সাথে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। মু'আউইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জন্য বিছানায় জায়গা করে দিলেন। তিনি তাঁর পাশে বসলেন। মু'আউইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই সালাত কী, যা আমি লোকদের আদায় করতে দেখলাম? আমি তো নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তা আদায় করতে দেখিনি এবং তিনি এর আদেশও দেননি! ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইবনু যুবাইর তাদের এ ব্যাপারে ফতোয়া দেন। এরপর ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন এবং বসলেন। মু'আউইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে ইবনু যুবাইর! এই সালাত কী, যা তুমি লোকদেরকে আদায় করার আদেশ দিচ্ছো? আমরা তো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তা আদায় করতে দেখিনি এবং তিনি এর আদেশও দেননি? ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর বাড়িতে তাঁর সামনে তা আদায় করেছিলেন। আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস বলেন: মু'আউইয়াহ আমাকে এবং অন্য একজনকে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গিয়ে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতে আদেশ করলেন। তিনি বলেন: আমি তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম এবং তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সম্পর্কে যা বলেছিলেন, আমি তাঁকে জানালাম। তিনি (আয়িশা) বললেন: ইবনু যুবাইর (তা সঠিকভাবে) সংরক্ষণ করতে পারেননি। আমি তাঁকে কেবল এইটুকুই বলেছিলাম যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের পর এই দুই রাকাত সালাত আমার কাছে আদায় করেছিলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম, আমি বলেছিলাম: আপনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন, যা আপনি সাধারণত আদায় করতেন না? তিনি বললেন: "আসলে, আমার কাছে কিছু জিনিস এসেছিল, আর তা বন্টন করতে গিয়ে আমি যোহরের পরের দুই রাকাত (সুন্নাত) থেকে ব্যস্ত হয়ে পড়েছিলাম। এরই মধ্যে বিলাল এসে আমাকে সালাতের জন্য ডাকলেন, তাই আমি লোকজনকে আটকে রাখা অপছন্দ করলাম এবং (বিলম্বিত সুন্নাত) তখন আসরের পর আদায় করলাম।" আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস বলেন: আমি ফিরে এসে মু'আউইয়াহকে সে খবর দিলাম। ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি কি তা আদায় করেননি? আমরা তা পরিত্যাগ করব না। মু'আউইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: তুমি চিরকাল বিরোধীই থাকবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2424)


2424 - عن علي بن أبي طالب قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصلاة بعد العصر إلا أن تكون الشمس بيضاء نقية مرتفعة.

حسن: رواه أبو داود (1274)، والنسائي (573) كلاهما من طريق منصور بن المعتمر، عن هلال بن يساف، عن وهب بن الأجدع، عن علي رضي الله عنه. ورجاله ثقات غير وهب بن الأجدع فقد وثَّقه العجلي وابن حبان، وقال ابن سعد: كان قليل الحديث.

قلت: مثله يحسن حديثه، وأما الحافظ فقال فيه في التقريب:"ثقة" والحق أن يقال فيه"صدوق".

وأخرجه ابن خزيمة (1284، 1285) وعنه رواه ابن حبان في صحيحه (1562) عن منصور به ولفظه:"لا يُصلى بعد العصر إلا أن تكون الشمسُ مرتفعة".

قال ابن خزيمة:"هذا حديث غريب، سمعتُ محمد بن يحيى يقول: وهب بن الأجدع قد ارتفع عنه اسم الجهالة، وقد روى عنه الشعبي أيضًا وهلال بن يساف".

وقال الحافظ في"الفتح" (2/ 63):"رواه أبو داود بإسناد صحيح قوي".

وأما البيهقي فأبدى تحفظه عن قبول هذا قائلًا: هذا حديثُ واحدٍ، وما مضى في النهي عنها ممتد إلى غروب الشمس حديثُ عددٍ، فهو أولى أن يكون محفوظًا وقد رُوِي عن عليٍّ ما يخالف هذا، وروي ما يوافقه" (2/ 459).

هو يقصد بالمخالفة ما سبق ذكره في باب النهي عن الصلاة بعد الصبح وبعد العصر.

وقال الحافظ في"الفتح":"ورُوِي عن ابن عمر تحريم الصلاة بعد الصبح حتى تطلع الشمس، وإباحتها بعد العصر حتى تصفرَّ، وبه قال ابنُ حزمٍ، واحتج بحديث علي بن أبي طالب وذكر الحديث، ثم قال: والمشهور إطلاق الكراهة في الجميع". انتهى.
وقال في"التلخيص" (1/ 185) بعد أن ذكر حديث علي بن أبي طالب:"وظاهره مخالف لما تقدم مع صحَّةِ إسناده".

قلت: الوقت وقتان: وقت ضيق، ووقت موسع.

فأما الضيق فهما عند طلوع الشمس وعند غروبها، وهذا لا خلاف بين أهل العلم في تحريم الصلاة عندهما.

وأما الوقت الموسع فهما من صلاة الصبح حتى تطلع الشمس، ومن صلاة العصر حتى تغرب الشمس، فالجمهور على تحريم الصّلاة في هذين الوقتين.

ويرى جماعة من أهل العلم من الصحابة والتابعين ومن بعدهم بأنه لا بأس بالصّلاة فيهما. ومن هؤلاء: ابن عمر لما رواه مرفوعًا:"لا يتحرى أحدكم فيصلي عند طلوع الشمس" ورواه أيضًا البخاري بإسناده عنه قال:"أصلِّي كما رأيتُ أصحابي يصلون، لا أنهى أحدًا يُصلي بليل ولا نهار ما شاء غير أن لا تحرَّوا طلوع الشمس ولا غروبها" (589)، وقالت مثله عائشة كما مضى من حديثها في إيهام عمر في النهي عن الصلاة بعد الفجر وبعد العصر، وإنما النهي أن يتحرَّى أحد طلوع الشمس وَغروبها.

وفي صحيح ابن حبان (1568) من رواية شعبة، عن المِقدام بن شُريح، عن أبيه قال: سألتُ عائشة عن الصلاة بعد العصر فقالت: صَلِّ إنما نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الصلاة إذا طلعت الشمس.

ومنهم بلال، فقد روى الإمام أحمد (23887)، والطبراني (1070) من رواية شعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، عن بلال قال: لم يكن يُنهى عن الصلاة إلا عند طلوع الشمس، فإنها تطلع بين قرني الشيطان.

وإسناده صحيح، ورجاله رجال الصحيح، ورواه ابن أبي شيبة (2/ 354) من طريق سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم به إلا أنه ذكر فيه غروب الشمس مكان طلوعها.

وممن رخّص في الصّلاة بعد العصر والشمس مرتفعة: علي بن أبي طالب، وتميم الداري، وأبو أيوب، وأبو موسى، وزيد بن خالد الجهني، وابن الزبير، والنعمان بن بشير، وأم سلمة، رضي الله عنهم جميعًا.

ومن التابعين: الأسود، ومسروق، وشريح، وعمرو بن ميمون، وعبد الرحمن بن الأسود، وعبيدة، والأحنف بن قيس، وطاوس. وحكي رواية عن أحمد.

قال إسماعيل بن سعيد الشالَنجي: سألت أحمد: هل ترى بأسًا أن يصلي الرجل تطوعًا بعد العصر، والشمس بيضاء مرتفعةً: قال: لا نفعله، ولا نُعيب فاعله.

ويظهر من قولهم أنهم كانوا يمنعون عن الصلاة عند طلوع الشمس وعند غروبها لمشابهة الكفار في سجودهم للشمس في هذين الوقتين، وأما قبل الطلوع وقبل الغروب فكانوا يرون أن المنع منه
سدًّا للذريعة، وبهذا علل عمر بن الخطاب عندما ضرب بِدُرّته تميمًا الداريَّ وهو يصلي بعد العصر فلما انتهى من صلاته قال: لِمَ ضربتي؟ قال: لأنّك ركعت هاتين الركعتين وقد نهيتُ عنهما. قال: إني قد صليتُهما مع من هو خير منك؛ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال عمر: إنه ليس بي إيّاكم أيّها الرّهط، ولكني أخاف أن يأتي بعدكم قومٌ يصلُّون ما بين العصر إلى المغرب حتى يمروا بالساعة التي نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُصلي فيها كما صلوا بين الظهر والعصر، ثم يقولون: قد رأينا فلانًا وفلانًا يصلون بعد العصر.

أخرجه الطبراني في الأوسط (8679) وفيه عبد الله بن صالح وفيه كلام إلا أنه حسن الحديث.

وكذلك وقعت هذه القصة مع زيد بن خالد أن عمر رآه يصلي بعد العصر ركعتين، فمشى إليه فضربه بالدرة وهو يُصلي، فلما انصرف قال: دعها يا أمير المؤمين! فوالله! لا أدعها أبدًا بعد إذ رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصليهما. فجلس إليه عمر فقال: يا زيد! لولا أني أخشى أن يتخذها الناس سُلَّمًا إلى الصلاة حتى الليل لم أضرب فيهما.

رواه الإمام أحمد (17036) وفيه رجال غير معروفين.

فمن رأى أن النهي في هذين الوقتين سدًّا للذريعة في الصلاة في وقت الكراهة لم يُحرم.

ومن تمسك بالنص العام ذهب إلى تحريم الصلاة في هذين الوقتين.

حكى الترمذي عن أكثر أهل العلم من الصحابة ومن بعدهم، وهو قول مالك والأوزاعي والثوري وأبي حنيفة والشافعي وأحمد وإسحاق وأبي ثور.

ولم يذكر مسلم في صحيحه التعليل الذي ذكر في قصة عمر سدًّا للذريعة فقد رواه في صلاة المسافرين (836) من حديث المختار بن فلفل قال: سألت أنس بن مالك، عن التطوع بعد العصر فقال: كان عمر يضرب الأيدي على صلاة بعد العصر. انتهى.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের পর সালাত (নামাজ) পড়তে নিষেধ করেছেন, তবে সূর্য যখন সাদা, উজ্জ্বল ও উপরে থাকে (তখন পড়া যায়)।

(এই হাদীসটি) হাসান (শ্রেণির)। এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাউদ (১২৭৪) এবং নাসাঈ (৫৭৩)। তাঁরা উভয়েই মনসুর ইবনে মু’তামির, তিনি হিলাল ইবনে ইয়াসাফ, তিনি ওয়াহব ইবনুল আজদা', তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ওয়াহব ইবনুল আজদা' ব্যতীত এর বর্ণনাকারীগণ সবাই নির্ভরযোগ্য (সিকাহ)। ওয়াহব ইবনুল আজদা'কে ইজলী ও ইবনে হিব্বান নির্ভরযোগ্য বলেছেন। ইবনে সা’দ বলেছেন: তিনি অল্প হাদীস বর্ণনা করতেন।

আমি (গ্রন্থকার) বলি: তার মতো বর্ণনাকারীর হাদীস ‘হাসান’ পর্যায়ে উন্নীত হয়। তবে হাফিয ইবনে হাজার তাক্বরীব গ্রন্থে তাকে ‘সিকাহ’ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন। আর সঠিক হলো তাকে ‘সাদূক’ (সত্যবাদী) বলা।

এটি ইবনে খুযাইমাহও (১২৮৪, ১২৮৫) বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর থেকে ইবনে হিব্বান তাঁর সহীহ গ্রন্থে (১৫৬২) মনসুরের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তাঁর শব্দ হলো: “আসরের পর সালাত পড়া হবে না, তবে সূর্য যখন উপরে থাকবে (তখন পড়া যাবে)।”

ইবনে খুযাইমাহ বলেছেন: “এটি একটি গারীব (একক) হাদীস। আমি মুহাম্মাদ ইবনে ইয়াহইয়াকে বলতে শুনেছি: ওয়াহব ইবনুল আজদা'-এর উপর থেকে জাহালাতের (অজ্ঞাতনামার) নাম উঠে গেছে। তার থেকে শা‘বী এবং হিলাল ইবনে ইয়াসাফও হাদীস বর্ণনা করেছেন।”

হাফিয ইবনে হাজার ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (২/৬৩) বলেছেন: “আবূ দাউদ এটিকে সহীহ ও শক্তিশালী সূত্রে বর্ণনা করেছেন।”

আর বাইহাকী এটিকে গ্রহণ করতে দ্বিধা প্রকাশ করে বলেছেন: “এটি একক (গারীব) হাদীস, কিন্তু আসরের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত সালাত আদায়ে নিষেধ সম্বলিত যে হাদীসগুলো পূর্বে বর্ণিত হয়েছে, তা বহু সংখ্যক বর্ণনাকারীর (হাদীস)। সুতরাং সেটিই অধিকতর সংরক্ষিত। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর বিপরীত হাদীসও বর্ণিত হয়েছে, আবার এর সমর্থক হাদীসও বর্ণিত হয়েছে।” (২/৪৫৯)।

তিনি বিপরীত বলতে পূর্বে বর্ণিত ফজর এবং আসরের পর সালাত আদায় নিষেধ সংক্রান্ত অধ্যায়ের বিষয়বস্তুকে উদ্দেশ্য করেছেন।

হাফিয ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে বলেছেন: “ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, ফজরের পর সূর্য ওঠা পর্যন্ত সালাত হারাম এবং আসরের পর সূর্য হলুদ না হওয়া পর্যন্ত সালাত বৈধ। ইবনে হাযমও এই মত দিয়েছেন এবং তিনি আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন ও হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। অতঃপর তিনি (ইবনে হাযম) বলেছেন: তবে প্রসিদ্ধ মত হলো সব ক্ষেত্রেই সাধারণভাবে মাকরুহ হওয়া।” সমাপ্ত।

‘আত-তালখীস’ গ্রন্থে (১/১৮৫) আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করার পর তিনি বলেছেন: “এর সনদ সহীহ হওয়া সত্ত্বেও বাহ্যিক দিক দিয়ে এটি পূর্বে বর্ণিত মতের বিরোধী।”

আমি (গ্রন্থকার) বলি: সালাতের সময় দু’ধরনের— সংকীর্ণ সময় এবং প্রশস্ত সময়।

সংকীর্ণ সময় হলো সূর্যের উদয়কাল ও অস্তকাল। এ সময় সালাত হারাম হওয়া নিয়ে আহলে ইলমদের মধ্যে কোনো মতভেদ নেই।

আর প্রশস্ত সময় হলো ফজরের সালাতের পর থেকে সূর্য ওঠা পর্যন্ত এবং আসরের সালাতের পর থেকে সূর্য ডোবা পর্যন্ত। জুমহুর (অধিকাংশ) ফকীহগণের মতে এই দুই সময়ে সালাত হারাম।

তবে সাহাবা ও তাবেঈনদের মধ্য থেকে একদল আলেম মনে করেন, এই দুই সময়ে সালাত আদায় করায় কোনো অসুবিধা নেই। তাঁদের মধ্যে রয়েছেন ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), কেননা মারফূ’ সূত্রে তাঁর থেকে বর্ণিত: “তোমাদের কেউ যেন সালাতের জন্য ইচ্ছাকৃতভাবে এমন সময়কে বেছে না নেয় যখন সূর্য উদিত হচ্ছে।” এটি বুখারীও তাঁর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: “আমি সেভাবেই সালাত আদায় করি যেভাবে আমার সাথীদের সালাত আদায় করতে দেখেছি। আমি কাউকে দিন বা রাতে যখন ইচ্ছা সালাত আদায় করতে নিষেধ করি না, তবে তোমরা যেন সূর্যোদয় বা সূর্যাস্তকে বেছে না নাও।” (৫৮৯)। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ বলেছেন, যেমন পূর্বে তাঁর হাদীস উল্লেখ করা হয়েছে, যেখানে তিনি ফজর ও আসরের পর সালাত আদায়ে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিষেধের বিষয়ে সন্দেহ প্রকাশ করেছেন। তিনি বলেছেন, আসলে নিষেধ হলো সূর্যোদয় ও সূর্যাস্তকে বেছে নেওয়ার বিষয়ে।

সহীহ ইবনে হিব্বানে (১৫৬৮) শু’বাহ, তিনি মিকদাম ইবনে শুরাইহ, তিনি তাঁর পিতা সূত্রে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আসরের পর সালাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: তুমি সালাত আদায় করো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো শুধু সূর্য ওঠার সময় সালাত আদায়ে নিষেধ করেছেন।

তাঁদের (যারা প্রশস্ত সময়ে সালাত বৈধ মনে করেন) মধ্যে বিলালেও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রয়েছেন। ইমাম আহমাদ (২৩৮৮৭) ও তাবারানী (১০৭০) শু’বাহ, তিনি কায়স ইবনে মুসলিম, তিনি তারিক ইবনে শিহাব, তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সূর্যোদয়ের সময় ছাড়া অন্য কোনো সময় সালাত আদায়ে নিষেধ করা হতো না, কেননা সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে উদিত হয়।

এর সনদ সহীহ এবং এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ গ্রন্থের রাবী। ইবনে আবী শাইবাহ (২/৩৫৪) সুফইয়ান সাওরী, তিনি কায়স ইবনে মুসলিমের সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন, তবে সেখানে সূর্যোদয়ের স্থলে সূর্যাস্তের কথা উল্লেখ করা হয়েছে।

যারা আসরের পর সূর্য উপরে থাকা অবস্থায় সালাত আদায় করার অনুমতি দিয়েছেন, তাঁদের মধ্যে রয়েছেন: আলী ইবনে আবী তালিব, তামীম আদ-দারী, আবূ আইয়্যুব, আবূ মূসা, যাইদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী, ইবন যুবাইর, নু‘মান ইবনে বাশীর, উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) – এঁরা সবাই।

তাবেঈনদের মধ্যে রয়েছেন: আসওয়াদ, মাসরূক, শুরাইহ, ‘আমর ইবনে মাইমুন, ‘আবদুর রহমান ইবনুল আসওয়াদ, উবাইদাহ, আহনাফ ইবনে কায়স এবং তাউস। আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকেও একটি বর্ণনা বর্ণিত আছে।

ইসমাঈল ইবনে সাঈদ আশ-শালানজী বলেন: আমি আহমাদ (ইবনে হাম্বল) কে জিজ্ঞেস করলাম: আসরের পর সূর্য সাদা ও উপরে থাকা অবস্থায় কোনো ব্যক্তির নফল সালাত আদায় করতে আপনি কি কোনো অসুবিধা দেখেন? তিনি বললেন: আমরা তা করি না, তবে যে তা করে তাকে আমরা দোষারোপও করি না।

তাঁদের বক্তব্য থেকে বোঝা যায় যে, তাঁরা সূর্য উদয় ও অস্তের সময় সালাত আদায়ে বাধা দিতেন কাফিরদের সাথে সাদৃশ্য এড়াতে, যারা এই দুই সময়ে সূর্যকে সিজদা করে। আর উদয়ের আগে এবং অস্তের আগে নিষেধ করা হতো ‘সাদদুয যারীয়াহ’ (অকল্যাণের পথ বন্ধ করা)-এর নীতি হিসেবে। উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কারণেই তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আঘাত করেছিলেন যখন তিনি আসরের পর সালাত আদায় করছিলেন। সালাত শেষে তিনি বললেন: আপনি আমাকে কেন আঘাত করলেন? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কারণ তুমি এ দু’রাকাআত সালাত আদায় করেছো অথচ আমি তা থেকে নিষেধ করেছি। তামীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তো তা এমন ব্যক্তির সাথে আদায় করেছি যিনি আপনার চেয়ে উত্তম— অর্থাৎ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে লোকেরা! আমি তোমাদের নিয়ে শঙ্কিত নই, তবে আমি ভয় করি যে, তোমাদের পরে এমন লোকেরা আসবে যারা আসর থেকে মাগরিব পর্যন্ত সালাত আদায় করবে, ফলে তারা সেই সময়ের সম্মুখীন হবে যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন, যেমন তারা যোহর ও আসরের মাঝে সালাত আদায় করে। অতঃপর তারা বলবে: আমরা অমুক অমুককে আসরের পর সালাত আদায় করতে দেখেছি।

এটি তাবারানী আওসাত গ্রন্থে (৮৬৭৯) বর্ণনা করেছেন। এতে আবদুল্লাহ ইবনে সালিহ রয়েছেন, তার ব্যাপারে কিছু আলোচনা আছে, তবে তিনি হাসানুল হাদীস (যার হাদীস হাসান পর্যায়ে)।

অনুরূপ ঘটনা যায়দ ইবনে খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও ঘটেছিল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে আসরের পর দু’রাকাআত সালাত আদায় করতে দেখে তার দিকে এগিয়ে যান এবং সালাতের মধ্যেই তাকে দোররা দিয়ে আঘাত করেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তিনি বললেন: হে আমীরুল মু’মিনীন! এটা বাদ দিন! আল্লাহর কসম, আমি এটি কখনোই ছাড়ব না, কেননা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তা আদায় করতে দেখেছি। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে বসলেন এবং বললেন: হে যায়দ! যদি আমি আশঙ্কা না করতাম যে, লোকেরা এটাকে সিঁড়ি বানিয়ে রাত পর্যন্ত সালাত আদায় করতে শুরু করবে, তবে আমি এর জন্য কাউকে আঘাত করতাম না।

এটি ইমাম আহমাদ (১৭০৩৬) বর্ণনা করেছেন এবং এতে কিছু অপরিচিত রাবী রয়েছেন।

সুতরাং যারা মনে করেন যে এই দুই সময়ে নিষেধ করা হয়েছে ‘সাদদুয যারীয়াহ’ (অকল্যাণের পথ বন্ধ করা)-এর নীতি হিসেবে, তারা (প্রশস্ত সময়ে) সালাতকে হারাম মনে করেন না।

আর যারা সাধারণ নসের (হাদীসের) উপর নির্ভর করেন, তারা এই দুই সময়ে সালাতকে হারাম বলে মনে করেন।

তিরমিযী সাহাবী ও তাবেঈনদের অধিকাংশ আহলে ইলমের মত উদ্ধৃত করেছেন যে, এটি মালিক, আওযাঈ, সাওরী, আবূ হানীফা, শাফিঈ, আহমাদ, ইসহাক ও আবূ সাউর (রাহিমাহুল্লাহ)-এরও অভিমত।

মুসলিমের সহীহ গ্রন্থে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনায় ‘সাদদুয যারীয়াহ’ (অকল্যাণের পথ বন্ধ করা)-এর যে কারণ উল্লেখ করা হয়েছে, তা তিনি উল্লেখ করেননি। বরং তিনি ‘সালাতুল মুসাফিরীন’ (৮৩৬) অধ্যায়ে মুখতার ইবনে ফুলফুল থেকে বর্ণনা করেছেন। মুখতার বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আসরের পর নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসরের পর সালাত আদায়কারীদের হাতে আঘাত করতেন। সমাপ্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (2425)


2425 - عن جبير بن مطعم يبلغ به النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تمنعوا أحدًا يطوف بهذا البيت، ويصلي أي ساعة شاءَ من ليل أو نهار".

وفي رواية:"يا بني عبد مناف! لا تمنعوا أحدًا".

حسن: رواه أبو داود (1894)، والترمذي (868)، والنسائي (585)، وابن ماجه (1254) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي الزبير، عن عبد الله بن باباه، عن جبير بن مطعم فذكره واللفظ لأبي داود. وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.

ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1280) من هذا الطريق، ومن طريق ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع عبد الله بن باباه فذكر نحوه.
فقد صرَّح فيه ابن جريج وشيخه بالتحديث والسماع، وأما ابن حبان فاختار أن يروي عن شيخه ابن خزيمة من الطريق الأولى وليس فيه التحديث، ثم رواه من طريق ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن أبا الزبير حدثه، عن ابن باباه (1552، 1553).

ورواه الحاكم في"المستدرك" (1/ 448) من طريق سفيان به. وقال: صحيح على شرط مسلم.

وأما ما رُوِي عن أبي ذر أنه أخذ بحلْقَةِ باب الكعبة، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا صلاة بعد العصر حتى تغربَ الشمس، ولا بعد الفجر حتى تطلع الشمسُ إلا بمكة" فهو ضعيف.

رواه أحمد (21462)، والطبراني في الأوسط (851)، والدارقطني (1/ 424)، والبيهقي (2/ 461) كلهم من طريق عبد الله بن مؤمل، عن حُميد مولى عفراء، عن قيس بن سعد، عن مجاهد، عن أبي ذر فذكر الحديث.

إلا أن حميد مولى عفراء سقط في مسند أحمد. وهو ضعيف كما قال البيهقي وغيره. ومجاهد لم يسمع من أبي ذر كما قال ابن عبد البر في التمهيد (13/ 45)، ورواه ابن خزيمة (2748) وقال: أنا أشك في سماع مجاهد من أبي ذر.

وفيه أيضًا عبد الله بن مؤمل ضعيف إلا أن إبراهيم بن طهمان قد تابعه عن حميد ومن طريقه رواه البيهقي.

قال ابن عبد البر بعد أن تكلم على حديث أبي ذر وضعَّفه:"ففي حديث جبير بن مطعم ما يُقوِّيه مع قول جمهور علماء المسلمين به. وذلك أن ابن عباس وابن عمر وابن الزبير والحسن والحسين وعطاء وطاوس ومجاهدًا والقاسم بن محمد وعروة بن الزبير كانوا يطوفون بعد العصر، وبعضهم بعد الصبح أيضًا، ويصلون بأثر فراغهم من طوافهم ركعتين في ذلك الوقت. وبه قال الشافعي وأحمد وإسحاق وأبو ثور وداود بن علي. وقال مالك بن أنس: من طاف بالبيت بعد العصر أخر ركعتي الطواف حتى تغرب الشمس، وكذلك من طاف بالبيت بعد الصبح لم يركعهما حتى تطلع الشمس وترتفع. وقال أبو حنيفة: يركعهما إلا عند غروب الشمس وطلوعها واستوائها".




জুবাইর ইবনে মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: “কেউ যেন এই ঘরের (কা'বার) তাওয়াফ করতে এবং দিন বা রাতের যেকোনো সময় যখন ইচ্ছা সালাত আদায় করতে কাউকে বাধা না দেয়।”

অন্য এক বর্ণনায় আছে: “হে আবদুল মানাফের বংশধরেরা! তোমরা কাউকে বাধা দিও না।”









আল-জামি` আল-কামিল (2426)


2426 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من نسي صلاةً فليصلِّ إذا ذكرها، لا كفارة لها إلا ذلك، {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي} [سورة طه: 14].

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (597) عن أبي نعيم وموسى بن إسماعيل، قالا: حدثنا همام، عن قتادة، عن أنس فذكر مثله.

قال موسى: قال همام: سمعته يقول بعد: {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي} وقال حبان، حدثنا همام، حدثنا قتادة، حدثنا أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه.

ورواه مسلم في المساجد (184) عن هدَّاب بن خالد، حدثنا همام به مثله.
ورواه من طرق أخرى عن أبي عوانة، عن قتادة به ولم يذكر"لا كفارة لها إلا ذلك".

وبوَّب البخاري بقوله:"من نسي صلاة فليصلها إذا ذكرها، ولا يُعيد إلا تلك الصلاة" اسْتُفِيد منه أنه لا يجب غير إعادتها، وذهب مالك إلى أن من ذكر بعد أن صلى صلاة أنه لم يُصل التي قبلها، فإنه يُصلي التي ذكر، ثم يُصلي التي كان صلاها مراعاة للترتيب. انتهى.

ويحتمل أنه أشار بقوله:"ولا يعيد إلا تلك الصلاة" ما وقع في بعض طرق حديث أبي قتادة عند مسلم في قصة النوم عن الصلاة حيث قال:"فإذا كان الغد فليصلها عند وقتها" فصارت الإعادة مرتين: عند ذكرها، وعند حضور مثلها من الوقت الآتي. انظر:"الفتح" (2/ 71) وهو الحديث الآتي.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাত (নামাজ) ভুলে যায়, সে যেন যখনই স্মরণ হয় তখনই তা আদায় করে নেয়। এর কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত) এর বাইরে আর কিছু নেই। (আল্লাহ্‌ বলেছেন:) 'আর আমার স্মরণে সালাত কায়েম কর।' [সূরা ত্বাহা: ১৪]"









আল-জামি` আল-কামিল (2427)


2427 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما إنه ليس في النوم تفريط، إنما التفريط على من لم يُصَلِّ الصلاة حتى يجيءَ وقت الصلاة الأخرى، فمن فعل ذلك فليُصلها حين ينتبه لها، فإذا كان الغد فليصلها عند وقتها".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (681) من طريق ثابت، عن عبد الله بن رباح، عن أبي قتادة في حديث طويل سبق تخريجه في الأذان.

وقوله:"فإذا كان الغد فليصلها عند وقتها" معناه أن وقت صلاة الصبح لم يتحول إلى ما بعد طلوع الشمس، فإذا كان الغد فصلُّوا في وقتها المعتاد.

ولكن رواه أبو داود (438) من طريق خالد بن سُمير قال: قدم علينا عبد الله بن رباح الأنصاريّ من المدينة فقال: حدثني أبو قتادة فذكر الحديث بطوله وفيه:"فمن أدرك منكم صلاة الغداة من غد صالحًا فليقض معها مثلها" وهذا يدل على قضاء الفائتة مرتين، مرة في الحال عند الذكر، ومرة في الغد في وقتها المعتاد.

وإلى هذا ذهب بعض أهل العلم، قال الخطابي: يشبه أن يكون الأمر فيه للاستحباب ليحوز فضيلة الوقت في القضاء، وتعقبه الحافظ في الفتح" (2/ 71) فقال:"ولم يقل أحد من السلف باستحباب ذلك، بل عدوا الحديث غلطًا من راويه.

وحكى ذلك الترمذي وغيره عن البخاري. وقال: ويؤيد ذلك ما رواه النسائي من حديث عمران بن حصين: أنهم قالوا: يا رسول الله! ألا نقضيها لوقتها من الغد؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا ينهاكم الله عن الربا ويأخذه منكم" انتهى.

قلت: قد يكون هذا الخطأ من خالد بن سُمير السّدوسيّ فإنه وصف بالوهم في حفظه فلعله روى الحديث بالمعنى فأخطأ فيه، فإنه لم يتابع على حديثه هذا.

وأما ما أشار إليه الحافظ بقوله:"لا ينهاكم الله عن الربا ويأخذه منكم" في حديث عمران عند النسائي فلم أجده لا في الكبرى ولا في الصغرى، ولكن رواه الإمام أحمد (19964) عن يزيد قال: أخبرنا هشام. وروح، قال: حدثنا هشام، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكر قصة
تعريب النبي صلى الله عليه وسلم وفيه فقالوا: يا رسول الله! ألا نُعبدها في وقتها من الغَدِ؟ قال:"أينهاكم الله عن الربا ويقبله منكم؟" ورواه أيضًا ابن خزيمة (994) وعنه ابن حبان في صحيحه (1461) عن محمد بن يحيى الذهلي، نا يزيد بن هارون به مثله.

ورواه ابن حبان (2650)، واليهقي (2/ 217) من أوجه أخرى عن هشام به مثله. وروح هو: ابن عبادة. وهشام هو: ابن حسان.

ورجاله رجال الصحيح إلا أن فيه الحسن البصري وهو مدلِّس وقد عنعن، وقد قيل إنه لم يسمع من عمران بن حصين ولكن أثبت الحاكم في"المستدرك، (1/ 274) صحة سماعه من عمران بن حصين وفي مسند أحمد (19965) عقب الرّواية السّابقة، حدثنا معاوية، حدثنا زائدة، عن هشام، قال: زعم الحسنُ أن عمران بن حصين حدَّثه قال: أسرَينا مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة فذكر الحديث.

وسبق تخريج هذا الحديث في أبواب الأذان. باب الأذان للفائت.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! ঘুমের মধ্যে কোনো ত্রুটি বা শিথিলতা নেই। ত্রুটি তো কেবল তার, যে এক নামায না পড়ে ততক্ষণ পর্যন্ত থাকে, যতক্ষণ না অন্য নামাযের সময় এসে যায়। অতএব, যে ব্যক্তি এমন করে, সে যখন জাগ্রত হয়, তখনই যেন তা আদায় করে নেয়। আর যখন পরের দিন হবে, তখন যেন তা নির্দিষ্ট সময়ে আদায় করে।"