আল-জামি` আল-কামিল
2561 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يشير في الصلاة.
صحيح: رواه أبو داود (943) عن أحمد بن محمد بن شبويه ومحمد بن رافع قالا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده صحيح. وهو في مصنف عبد الرزاق (3276) ومن طريقه رواه ابن خزيمة (885)، وابن حبان (2264) في صحيحيهما.
وأما ما رواه أبو هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"التسبيح للرجال" يعني في الصلاة:"والتصفيق للنساء، من أشار في صلاته إشارةً تُفهمُ عنه فليُعِد لها" يعني الصلاة. فالجزء الثاني منه منكَرٌ.
رواه أبو داود (944) عن عبد الله بن سعيد، حدثنا يونس بن بكير، عن محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عتبة بن الأخنس، عن أبي غَطفان، عن أبي هريرة فذكر مثله.
قال أبو داود:"هذا الحديثُ وهم".
قلت: وهو كما قال فعلته محمد بن إسحاق وهو مدلِّس وقد عنعن، وأتى بحديث يخالف حديث الثقات، فالنكارة إما منه، أو عَمَّن دلَّسَه.
قال الدارقطني (2/ 83):"قال لنا ابن أبي داود: (أبو غطفان هذا رجل مجهول. وآخر الحديث زيادة في الحديث. ولعله من قول ابن إسحاق. والصحيح عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يشير في الصلاة رواه أنس وجابر وغيرهما عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال الدارقطني: رواه ابن عمر وعائشة أيضًا" انتهى.
قلت: أما تعليل ابن أبي داود بأبي غطفان بأنه مجهول ففيه نظر، فقد روى عنه جماعة، ذكره ابن سعد في الطبقة الثانية من أهل المدينة وقال: كان قد لزم عثمان، وكتب له، وكتب أيضًا لمروان. ووثَّقه ابن معين والنسائي وذكره ابن حبان في الثقات فمثله لا يُحكَم عليه بالجهالة فلعله اشتبه عليه برجل آخر. فانحصرت العلة في تدليس ابن إسحاق ونكارتِه في متن الحديث، وأما الجزء الأول منه فهو صحيح لكثرة شواهده.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাতের মধ্যে ইশারা করতেন।
(সহীহ: এটি আবু দাউদ (৯৪৩) বর্ণনা করেছেন আহমদ ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে শাবভিয়াহ এবং মুহাম্মাদ ইবনে রাফে' থেকে। তাঁরা উভয়ে বলেছেন: আমাদেরকে আব্দুল রাজ্জাক বর্ণনা করেছেন, তিনি মা'মার থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আনাস ইবনে মালিক থেকে বর্ণনা করেছেন। এবং এর সনদ সহীহ। এটি মুসান্নাফ আব্দুর রাজ্জাক (৩২৭৬)-এ রয়েছে এবং তাঁর মাধ্যমে ইবনে খুযাইমাহ (৮৮৫) এবং ইবনে হিব্বান (২২৬৪) তাদের সহীহ গ্রন্থে এটি বর্ণনা করেছেন।)
আর আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যে হাদীস বর্ণিত হয়েছে: "পুরুষদের জন্য তাসবীহ পাঠ করা" – অর্থাৎ সালাতে – "এবং নারীদের জন্য হাততালি দেওয়া। যে ব্যক্তি তার সালাতে এমন ইশারা করে, যা তার থেকে বোঝা যায়, সে যেন তা—অর্থাৎ সালাত—পুনরায় আদায় করে।"—এই হাদীসের দ্বিতীয় অংশটি মুনকার (অস্বীকৃত/দুর্বল)।
এটি আবু দাউদ (৯৪৪) বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনে সাঈদ থেকে, তিনি বলেছেন: আমাদেরকে ইউনুস ইবনে বুকাইর বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক থেকে, তিনি ইয়াকুব ইবনে উতবা ইবনে আল-আখনাস থেকে, তিনি আবু গাফতান থেকে, তিনি আবু হুরায়রা থেকে। আর তিনি অনুরূপ উল্লেখ করেছেন।
আবু দাউদ বলেছেন: "এই হাদীসটি ভুল (ওয়াহম)।"
আমি (আলবানী/লেখক) বলি: তিনি যেমন বলেছেন তেমনই। মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক এটি করেছেন। আর তিনি মুদাল্লিস (সনদের ত্রুটি লুকানো বর্ণনাকারী) এবং তিনি 'আনআনা' (অস্পষ্টভাবে বর্ণনা) করেছেন। আর তিনি এমন হাদীস এনেছেন যা নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের হাদীসের বিরোধী। অতএব, এই মুনকার হওয়া হয় তার কাছ থেকে এসেছে অথবা যার কাছ থেকে তিনি তাদলীস (تدليس) করেছেন তার কাছ থেকে।
দারাকুতনী (২/৮৩) বলেছেন: "ইবনে আবী দাউদ আমাদের বলেছেন: (এই আবু গাফতান একজন মাজহুল (অজ্ঞাত) ব্যক্তি। আর হাদীসের শেষাংশটি হাদীসে অতিরিক্ত সংযোজন। হতে পারে এটি ইবনে ইসহাকের নিজস্ব কথা। আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে সহীহ হলো এই যে, তিনি সালাতে ইশারা করতেন। আনাস, জাবের এবং অন্যান্যরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে তা বর্ণনা করেছেন। দারাকুতনী বলেছেন: ইবনে উমর এবং আয়েশাও এটি বর্ণনা করেছেন।") সমাপ্ত।
আমি বলি: তবে ইবনে আবী দাউদের আবু গাফতানকে মাজহুল বলার যে ত্রুটি ধরার কারণ, তা গবেষণার দাবি রাখে। কারণ, তার থেকে অনেক লোক বর্ণনা করেছেন। ইবনে সা'দ তাকে মদীনার দ্বিতীয় স্তরের লোকেদের মধ্যে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: তিনি উসমানের সাথে লেগে থাকতেন এবং তার জন্য লিখতেন, আর মারওয়ানের জন্যও লিখতেন। ইবনে মাঈন ও নাসায়ী তাকে নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ) বলেছেন এবং ইবনে হিব্বান তাকে ছিকাত গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। এমন ব্যক্তিকে জাহালাতের (অজ্ঞাত হওয়ার) হুকুম দেওয়া যায় না। হয়তো তিনি অন্য কোনো ব্যক্তির সাথে গুলিয়ে ফেলেছেন। অতএব, ত্রুটিটি ইবনে ইসহাকের তাদলীস এবং হাদীসের মতন (মূল পাঠে) তার মুনকার হওয়ার মধ্যে সীমাবদ্ধ। তবে এর প্রথম অংশটি সহীহ, কারণ এর অনেক শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে।
2562 - عن رفاعة بن رافع قال: صليتُ خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فعطستُ فقلت: الحمد الله حمدًا كثيرًا طيبًا مباركًا فيه، مباركًا عليه كما يحب ربنا ويرضى، فلما صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم انصرف فقال:"من المتكلم في الصلاة؟" فلم يتكلم أحد، ثم قاله الثانية:"مَن المتكلم في الصلاة؟" فلم يتكلم أحد، ثم قالها الثالثة:"مَن المتكلم في الصلاة؟" فقال رفاعة بن رافع بن عفراء، أنا يا رسول الله! قال: كيف قلت؟ قال: قلت: الحمد لله حمدًا كثيرًا طيبًا مباركًا فيه، مباركًا عليه كما يحب ربُّنا ويرضى، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسي بيده! لقد ابتدرها بضعةٌ وثلاثون ملكًا أيهم
يصعد بها".
حسن: رواه أبو داود (772)، والترمذي (404)، والنسائي (931) كلهم عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا رفاعة بن يحيى بن عبد الله بن رفاعة بن رافع الزُرقي، عن عم أبيه معاذ بن رفاعة بن رافع، عن أبيه رفاعة بن رافع فذكره.
وإسناده حسن من أجل رفاعة بن يحيى إمام مسجد بني زُرَيْقٍ.
وكذلك معاذ بن رفاعة بن رافع فهو صدوق أيضًا، ولكن حكى أبو الفتح الأزدي عن عباس الدوري، عن ابن معين أنه قال فيه: ضعيف، وقال الأزدي: ولا يحتج بحديثه. إلا أن البخاري أخرج له، فأقل أحواله أنه حسن الحديث. وقد حسّنه أيضًا الترمذي. ولكن نقل الحافظ في ترجمة رفاعة بن يحيى أن الترمذي صحَّح هذا الحديث. وأعتقد أن الصواب هو تحسينه كما في غالب نسخ الترمذي.
وأصل هذا الحديث في صحيح البخاري (799) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن نُعيم بن عبد الله المُجْمر، عن علي بن خلاد الزُرقي، عن أبيه، عن رفاعة بن رافع الزّرقي قال: كنا نُصلي يومًا وراء رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الدّعاء، ولم يذكر فيه العطاس وسبق تخريجه في باب ما يقال بعد الرفع من الركوع. فلعل بعض الرواة اختصره فإن عطاسه وقع عند الرفع مع الركوع فأقر النبي صلى الله عليه وسلم هذا الدّعاء في هذا المكان من الصلاة ومنع من قال به في غير هذا المكان من أجل العطاس.
وفي الباب عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه قال: عطس شاب من الأنصار خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في الصلاة فقال: الحمد لله حمدًا كثيرًا طيبًا مباركًا فيه حتى يرضى ربُّنا، وبعد ما يرضى من أمر الدنيا والآخرة. فلما انصرف رسول الله قال:"مَن القائل الكلمة؟" قال: فسكت الشاب، ثم قال:"مَن القائل الكلمة فإنه لم يقل بأسًا" فقال: يا رسول الله! أنا قلتُها، لم أُرد بها إلا خيرًا. قال:"ما تناهت دون عرش الرحمن تبارك وتعالى".
رواه أبو داود (774) عن العباس بن عبد العظيم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا شريك، عن عاصم بن عبيد الله، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه فذكر الحديث.
وإسناده ضعيف فإن شريك بن عبد الله وعاصم بن عبيد الله العدويّ المدني ضعيفان لسوء حفظهما.
قال الترمذي بعد أن روى حديث رفاعة بن رافع: قال غير واحد من التابعين: إذا عَطَسَ الرجل في الصلاة المكتوبة فإنما يحمدُ الله في نفسه، ولم يُوسِّعوا في ذلك. وحمل حديث رفاعة بن رافع على أنه كان في التطوع.
قلت: فيه نظر، لأنه ثبت في رواية بشر بن عمر الزهراني، عن رفاعة بن يحيى أن تلك الصّلاة كانت المغرب. انظر:"الفتح" (2/ 286) وقال الحافظ:"العاطس في الصّلاة يحمد الله بغير كراهية".
ورُوي عن ابن عمر أنه كان يجهر بـ {الْحَمْدُ لِلَّهِ} وبه قال الإمام أحمد. انظر:"شرح السنة" (3/ 240).
وأما تشميت العاطس فلا يجوز في الصلاة لحديث معاوية بن الحكم، لأنه من كلام الناس.
রিফায়া ইবনু রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সালাত আদায় করছিলাম। তখন আমার হাঁচি এলো। আমি বললাম: ‘আলহামদু লিল্লাহি হামদান কাসীরান ত্বাইয়্যিবান মুবারাকান ফীহি, মুবারাকান আলাইহি, কামা ইউহিব্বু রব্বুনা ওয়া ইয়ারদা।’ (সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, এমন অধিক, পবিত্র ও বরকতময় প্রশংসা, যা তাতে বরকতময় করা হয়েছে, যাতে আমাদের রব পছন্দ করেন ও সন্তুষ্ট হন।)
যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি ফিরে বললেন: "সালাতে কে কথা বলেছে?" কেউ কিছু বলল না। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার বললেন: "সালাতে কে কথা বলেছে?" তখনও কেউ কিছু বলল না। এরপর তিনি তৃতীয়বার বললেন: "সালাতে কে কথা বলেছে?"
তখন রিফায়া ইবনু রাফে’ ইবনু আফরা বললেন: আমি, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কী বলেছিলে?" তিনি বললেন: আমি বলেছিলাম: ‘আলহামদু লিল্লাহি হামদান কাসীরান ত্বাইয়্যিবান মুবারাকান ফীহি, মুবারাকান আলাইহি, কামা ইউহিব্বু রব্বুনা ওয়া ইয়ারদা।’
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! তেত্রিশের অধিক ফেরেশতা দ্রুত প্রতিযোগিতা করছিলো যে, তাদের মধ্যে কে এটি (আল্লাহর কাছে) নিয়ে যাবে।"
2563 - عن عبد الله بن الشِّخِّير قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي، وفي صدره أزيزٌ كأزيز المِرجل من البكاء.
صحيح: رواه أبو داود (904)، والنسائي (1214)، والترمذي في الشمائل (316) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن مطرف بن عبد الله بن الشِّخِّير، عن أبيه فذكر مثله.
وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (900)، وابن حبان (665)، والحاكم (1/ 264) كلهم بهذا الإسناد.
وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আবদুল্লাহ ইবনুশ শিখখীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত আদায় করতে দেখলাম, আর কান্নার কারণে তাঁর বক্ষ থেকে ডেগের (হাঁড়ির) ফুটন্ত পানির মতো আওয়াজ আসছিল।
2564 - عن عبد الله بن عمرو قال: كسفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأطال القيام، ثم ركع، فأطال الركوعَ، ثم رفع فأطال، قال شعبةُ: وأحسبه قال في السجود نحو ذلك. وجعل يبكي في سجوده وينفخُ ويقول:"رب لم تعِدْني هذا، وأنا استغفرك، لم تعِدْني هذا وأنا فيهم".
وفي رواية: ثم نفخ في آخر سجوده فقال:"أف أف" ثم قال:"ربِّ ألم تعِدْني أن لا تعذِّبهم وأنا فيهم، ألم تعِدْني أن لا تعذبهم وهم يستغفرون؟" فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم مِن صلاته، وقد أمْحصتِ الشّمس. وساق الحديث بطوله وسيأتي في كتاب كسوف الشمس.
صحيح: رواه النسائي (1496) من طريق غندر، عن شعبة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو فذكر مثله. ورجاله كلهم ثقات إلا أن عطاء بن السائب قد اختلط، ولكن رواه شعبة عنه قبل الاختلاط. ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (6763) عن محمد بن جعفر وهو غندر عنه. كما رواه أيضًا (6868) عن عبد الرزاق، وهو في مصنفه (4938) عن سفيان، عن عطاء بن السائب به مختصرًا.
ومن هذا الوجه أخرجه ابن خزيمة في صحيحه (1393)، والحاكم (1/ 329) إلا أنهما رويا بوجهين. الوجه الأول مثل رواية عبد الرزاق، والوجه الثاني: عن سفيان، عن يعلى بن عطاء، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو مختصرًا. وفي إسنادهما مؤمل بن إسماعيل الراوي عن سفيان سيء الحفظ.
ورواه أبو داود (1194) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد (وهو بن سلمة) عن عطاء بن السائب به وهي الرواية الثانية.
وحماد بن سلمة ممن سمع من عطاء قبل الاختلاط وبعده وموافقته لشعبة تدل على أنه روى عنه هذا الحديث قبل الاختلاط.
وممن تابعه أيضًا عبد العزيز بن عبد الصمد، عن عطاء بن السائب به، رواه النسائي (1482) عن هلال بن بِشْر، عن عبد العزيز بن عبد الصمد به وهو ممن سمع عنه أيضًا قبل الاختلاط.
وممن تابعهم أيضًا: محمد بن فُضيل، قال: حدثنا عطاء بن السائب به وهو ممن سمع منه بعد الاختلاط. رواه الإمام أحمد (6483) عنه، وهذه المتابعات تفيد بأن عطاء بن السائب لم يختلط في هذا الحديث.
ووالد عطاء هو: السائب بن مالك، أو ابن زيد الكوفي ثقة.
قال الخطابي:"وفي الحديث دليل على أن النفخ لا يقطع الصلاة إذ لم يكن له هجاء فيكون كلمة تامة. وقوله:"أُفْ" لا تكون كلامًا حتى تُشَدِّدَ الفاء فيكون على ثلاثة أحرف من التأفيف. كقولك: أفٍّ لكذا، فأما والفاء خفيفة فليس بكلام.
وأما ما رُوِي عن زيد بن ثابت قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن النفخ في السجود، وعن النفخ في الشراب فهو ضعيف جدًّا. فيه خالد بن إلياس أو إياس، أبو الهيثم المدني العدوي إمام المسجد النبوي ضعيف جدًّا، قال الإمام أحمد والنسائي: متروك قال البخاري وأبو حاتم: منكر الحديث.
رواه الطبراني في الكبير قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 83) فيه خالد بن إلياس متروك.
في الباب أيضًا عن أبي هريرة وفيه عبد المنعم بن بشير منكر الحديث.
وفي الباب أيضًا عن أم سلمة قالت: رأى النبي صلى الله عليه وسلم غلامًا لنا يقال له: أفلح إذا سجد نفخ فقال:"يا أفلح! ترِّبْ وجْهك" رواه الترمذي (381) عن أحمد بن منيع، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، أخبرنا ميمون أبو حمزة، عن أبي صالح مولى طلحة، عن أم سلمة فذكرت مثله.
قال الترمذي: حديث أم سلمة إسناده ليس بذاك، وميمون أبو حمزة قد ضعَّفه بعض أهل العلم" انتهى.
قلت: وفيه أيضًا أبو صالح مولى طلحة لم يوثقه إلا ابن حبان ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" ومن طريقه رواه ابن حبان في صحيحه (1913) قال: كنتُ عند أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فأتاها ذو قرابتِها غلامٌ شاب ذو جمَّةٍ، فقام يُصَلِّي، فلما ذهب ليسجدَ نَفَخَ. فقالتْ: لا تفعل فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول لغلام لنا أسود:"يا رباح! ترِّبْ وجهك".
ويقال اسمه زاذان كما في التقريب، ومن طريقه رواه الطبراني في"الكبير" (23/ 394) وحيث لم يوجد من تابعه فهو"لين الحديث" وأما ميمون أبو حمزة فقد تابعه عند ابن حبان داود بن أبي هند فرواه عن أبي صالح مولى آل طلحة كما سبق.
وكذلك لا يصح بوجه من الوجوه:"من نفخ في الصّلاة فقد تكلم" أو بلفظ"النفخ في الصلاة كلام".
قال العلامة ابن القيم:"لا أصل له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وإنما رواه سعيد في سننه عن ابن عباس من قوله إن صحَّ""زاد المعاد" (1/ 270).
والنفخ لا يكون كلامًا من حيث اللغة، لأنه ليس فيه هجاء إلا إنْ شُدِّدت الفاء فيكون على ثلاثة أحرف من التأفيف كما قال الخطابي وقال:"وأما والفاء خفيفة فليس بكلام والنافخ لا يُخرج الفاء في نفخة مشددةٍ، ولا يكاد يخرجها فاء صادقة من مخرجها بين الشفة السُفلى، ومقاديم الأسنان العليا، ولكنه يُغشيها من غير إطباق السنِّ على الشفة، وما كان كذلك لم يكن كلامًا".
ثم قال:"وقد قال عامة الفقهاء: إذا نفخ في صلاته فقال:"أف" فسدتْ صلاته إلا أبا يوسف فإنه قال: صلاته جائزة". انتهى.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করলেন এবং তিনি কিয়াম (দাঁড়ানো) দীর্ঘায়িত করলেন, তারপর রুকু করলেন এবং রুকুও দীর্ঘায়িত করলেন, এরপর মাথা তুললেন এবং সেই অবস্থাও দীর্ঘায়িত করলেন। (রাবী) শু‘বা বলেন: আমার ধারণা, তিনি সিজদার ক্ষেত্রেও অনুরূপ কিছু বলেছিলেন। আর তিনি তাঁর সিজদায় কাঁদতে লাগলেন, ফুঁ দিতে লাগলেন এবং বলতে লাগলেন: "হে রব, আপনি আমাকে এর প্রতিশ্রুতি দেননি, আমি আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি। আপনি এর প্রতিশ্রুতি দেননি, অথচ আমি তাদের মধ্যে আছি।"
অন্য এক বর্ণনায় (আছে): অতঃপর তিনি তাঁর সিজদার শেষে ফুঁ দিলেন এবং বললেন: "উহ, উহ (আফ, আফ)।" এরপর তিনি বললেন: "হে রব! আপনি কি আমাকে প্রতিশ্রুতি দেননি যে, আমি তাদের মধ্যে থাকা অবস্থায় আপনি তাদের শাস্তি দেবেন না? আপনি কি আমাকে প্রতিশ্রুতি দেননি যে, তারা ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকলে আপনি তাদের শাস্তি দেবেন না?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সালাত শেষ করলেন, আর ততক্ষণে সূর্য পরিষ্কার হয়ে গিয়েছিল।
2565 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ عِفريتا من الجنِّ تفلَّتَ عليَّ البارحةَ - أو كلمة نحوها - ليقطعَ عليَّ صَلاتي. فأمكنني الله منه فأخذتُه فأردتُ أن أرْبُطَه على ساريةٍ من سواري المسجد حتى تنظروا إليه كُلُّكم. فذكرْتُ دعوةَ أخي سليمان: {رَبِّ اغْفِرْ لِي وَهَبْ لِي مُلْكًا لَا يَنْبَغِي لِأَحَدٍ مِنْ بَعْدِي} [سورة ص: 35] فرددتُه خاسئًا. عِفْريت: متمرد من إنس أو جان مثل زِبْنِيَة جماعتها الزَّبانية.
متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3423)، ومسلم في المساجد (541) كلاهما عن محمد بن بشار، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن محمد بن زياد، قال: سمعتُ أبا هريرة فذكر الحديث واللفظ للبخاريّ.
وزاد مسلم في رواية النضر بن شُميل، عن شعبة بعد قوله:"فأمكنني الله منه":"فذعتُه" بالذال المعجمة، وتخفيف العين المهملة. بمعنى: خَنَقْتُه.
ثم قال مسلم: فأما ابن أبي شيبة (عن شبابة، عن شعبة) فقال في روايته:"فدعتُه" بالدال المهملة. بمعنى: دفعتُه دفْعًا شديدًا.
قال النووي:"وأنكر الخطابي المهملة وقال: لا تصح، وصحّحها غيره وصوَّبوها، وإن كانت المعجمة أوضح وأشهر. وفيه دليل على جواز العمل القليل في الصلاة".
وقوله:"ثم ذكرتُ قول أخي سليمان …" أي: أن النبي صلى الله عليه وسلم قد قدر على ربطه في سارية المسجد، فلما تذكر قول سليمان عليه السلام امتنع من ذلك تواضعًا وتأدبًا. وتمكينه صلى الله عليه وسلم لا ينافي قوله تعالى: {وَهَبْ لِي مُلْكًا لَا يَنْبَغِي لِأَحَدٍ مِنْ بَعْدِي} [سورة ص: 35] إذ لا يبطل اختصاص تمام
الملك لسليمان بهذا القدر.
وقوله:"حتى تنظروا إليه كلكم" فيه دليل على أن رؤيةَ الجنِّ غيرُ مستحيلةٍ، فأما قوله تعالى: {إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ} [الأعراف: 27] فإنه حكم الأعم والأغلبِ من الآدميين امتحنهم بذلك ليفْزَعُوا إليه عز وجل ويستعيذوا به من شرهم. انظر:"شرح السنة" (3/ 270).
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক ইফরিত জিন গত রাতে (অথবা এই জাতীয় কোনো শব্দ বললেন) আমার উপর হামলা করার চেষ্টা করেছিল—যাতে সে আমার সালাত নষ্ট করে দিতে পারে। অতঃপর আল্লাহ আমাকে তার উপর ক্ষমতা দিলেন। আমি তাকে পাকড়াও করলাম এবং ইচ্ছা করলাম যেন তাকে মসজিদের খুঁটির সাথে বেঁধে রাখি, যাতে তোমরা সকলে তাকে দেখতে পাও। কিন্তু আমার ভাই সুলাইমান (আঃ)-এর দু'আটি আমার মনে পড়ল: {হে আমার রব! আমাকে ক্ষমা করে দিন এবং আমাকে এমন এক রাজত্ব দান করুন যা আমার পরে অন্য কারো জন্য শোভনীয় নয়} [সূরা সোয়াদ: ৩৫]। ফলে আমি তাকে লাঞ্ছিত ও বিতাড়িত করে দিলাম।"
2566 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي، فأتاه الشيطان فأخذه، فصرعه فخنقَه، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حتى وجدتُ بردَ لسانه على يدي، ولولا دعوة أخي سليمان عليه السلام لأصبح موثقًا حتى يراه الناس".
صحيح: رواه النسائي في"الكبرى" (11375) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: أخبرنا يحيى بن آدم، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن حصين، عن عبيد الله، عن عائشة فذكرت مثله.
وصحّحه ابن حبان فرواه في صحيحه (2350) من طريق محمد بن أبان، حدثنا أبو بكر بن عياش به مثله.
وحصين هو: ابن عبد الرحمن السلمي أبو الهذيل الكوفي من رجال الجماعة.
وعبيد الله بن عبد الله هو: ابن عتبة بن مسعود الهذلي من رجال الجماعة أيضًا. ومحمد بن أبان في إسناد ابن حبان هو الواسطي تكلم فيه الأزدي إلا أنه توبع عند النسائي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করছিলেন। তখন শয়তান তাঁর কাছে এসে তাঁকে ধরল, তাঁকে মাটিতে ফেলে দিল এবং গলা টিপে ধরল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমনকি আমি আমার হাতের উপর তার জিহ্বার শীতলতা অনুভব করলাম। আর যদি আমার ভাই সুলাইমান (আঃ)-এর দোয়া না থাকত, তবে সে অবশ্যই বাঁধা অবস্থায় সকাল পর্যন্ত থাকত, যাতে লোকেরা তাকে দেখতে পেত।"
2567 - عن جابر بن سمرة قال: صلَّى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاة الفجر، فجعل يَهْوِي بيده، قال خَلَفٌ: يَهْوِي في الصلاة قُدَّامَه. فسأله القومُ حين انصرف فقال:"إن الشيطان هو كان يُلْقِي عَلَيَّ شَرارَ النار ليَفْتِنَنِي عن صلاتي، فتناولتُه، فلو أخذتُه ما انفلتَ مني حتى يُناطَ إلى سارية من سواري المسجد، ينظر إليه وِلدانُ أهل المدينة".
حسن: رواه الإمام أحمد (21000) عن عبد الرزاق وخَلف بن الوليد، قالا: حدثنا إسرائيل، عن سماك أنه سمع جابر بن سمرة فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل سماك بن حرب. والحديث في مصنف عبد الرزاق (2338) من هذا الوجه. ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (1925) من طريق خلف بن الوليد به مثله.
وأمّا ما رواه الطبراني (2053)، والدارقطني (1/ 365)، والبيهقي (2/ 450) من طرق عن المفضل بن صالح، عن سماك به بلفظ: صلَّينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة مكتوبة، فضَمَّ يده في الصلاة. فلما قضى الصلاة قلنا يا رسول الله! أَحَدَثَ في الصّلاة شيء؟ قال:"لا إلا أن الشيطان أراد أن يمر بين يدي فَخَنقتُهُ حتى وجدتُ برد لسانه على يدي، وايم الله! لولا ما سبقني إليه أخي سليمان لنيط بسارية من سواري المسجد، حتى يُطيف به ولدان أهل المدينة"، فهو ضعيف، فيه المفضل بن صالح ضعَّفه البخاري وأبو حاتم كذا في"المجمع" (2/ 61).
জাবির ইবন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। তিনি তার হাত দ্বারা ইশারা (কিছু ধরার চেষ্টা) করতে লাগলেন। (রাবী) খলফ বলেছেন: তিনি সালাতের মধ্যে তাঁর সম্মুখপানে ইশারা করছিলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, লোকেরা তাঁকে জিজ্ঞেস করল। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই শয়তান আমার সালাত থেকে আমাকে বিভ্রান্ত করার জন্য আমার ওপর আগুনের স্ফুলিঙ্গ নিক্ষেপ করছিল। তাই আমি তাকে ধরতে চেয়েছিলাম। আমি যদি তাকে ধরে ফেলতাম, তবে সে আমার কাছ থেকে মুক্ত হতে পারত না, যতক্ষণ না তাকে মসজিদের খুঁটিগুলোর মধ্যে কোনো একটির সাথে বেঁধে রাখা হতো, আর মদীনার শিশুরা তাকে দেখত।"
2568 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام فصلَّى صلاة الصبح وهو خلْفَه، فقرأ، فالتبست عليه القراءة، فلما فرغ من صلاته قال:"لو رأيتموني وإبليس، فأهويتُ بيدي، فما زلتُ أخْنُقُه حتى وجدتُ برْد لُعابه بين أصْبعيَّ هاتين - الإبهام والتي تليها - ولولا دعوةُ أخي سليمان لأصبح مربوطًا بسارية من سواري المسجد، يتلاعبُ به صبيانُ المدينة، فمن استطاع منكم أن لا يحُولَ بينَه وبين القبلة أحدٌ فليفْعلْ".
حسن: رواه الإمام أحمد (11780) عن أبي أحمد، حدثنا مسرَّة بن معبد، حدثني أبو عبيد حاجب سليمان، قال: رأيتُ عطاء بن يزيد الليثي قائمًا يصلِّي، مُتعممًا بعمامةٍ سوداء، مرخي طرفَها من خلْفِه، مُصَفِّر اللحيةِ. فذهبتُ أمرُّ بين يديه فردَّني، ثم قال: حدثني أبو سعيد الخدري فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل مسرة بن معبد وهو: اللخمي الفلسطيني المقدسي اختلف فيه فقال أبو حاتم: شيخ لا بأس به، وذكره ابن حبان مرة في"الثقات" (7/ 524) وأخرى في"المجروحين" (1093) فقال:"كان ممن ينفرد عن الثقات ما ليس من أحاديث الأَثبات على قلة روايته، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد". غير أنه حسن الحديث، ولذا قال الذهبي في"الكاشف":"وُثِّق" وقال الحافظ في"التقريب":"صدوق له أوهام".
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 87): رواه أحمد ورجاله ثقات، غير أنه لم يذكر قوله:"من استطاع منكم …".
والحديث رواه أبو داود (699) عن أحمد بن سريج الرازي، أخبرنا أبو أحمد الزبيري، أخبرنا مسرة بن معبد اللخمي به مقتصرًا على قوله:"من استطاع منكم أن لا يحول بينه وبين القبلة أحد فليفعل". انظر باب منع المار بين يدي المصلي.
وأبو أحمد هو: محمد بن عبد الله بن الزبير الزبيري من رجال الجماعة.
والذي رواه عبد بن حميد (946) عن علي بن عاصم، ثنا أبو هارون العبدي، عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خرجتُ لصلاة الصبح فلقيني الشيطان في السدة، سدة المسجد فزحمني حتى إنِّي لأجد من شعره فاستمسكت منه فخنقتُه، حتى إني لأجد برد لسانه على يديَّ، فلولا دعوة أخي سليمان لأصبح مقتولًا تنظرون إليه" ففيه أبو هارون العبدي وهو: عمارة بن جُوَين - بجيم مصغرًا - مشهور بكنيته متروك، والبعض كذَّبَه.
وأما ما رُوِي عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مرَّ عليَّ الشيطانُ فأخذتُه فخنقتُه، حتى لأجد برْد لسانه في يدي فقال: أوْجَعتنِي أوْجَعتني" فهو منقطع، رواه الإمام أحمد (3926) عن أسود بن عامر، أخبرنا إسرائيل، قال: ذكر أبو إسحاق عن أبي عبيدة، عن عبد الله.
وأبو عبيدة بن عبد الله بن مسعود لم يسمع من أبيه، قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 288):
"رواه أحمد، وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه، وبقية رجاله رجال الصحيح".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন, আর তিনি (আবূ সাঈদ) ছিলেন তাঁর পিছনে। তিনি (কুরআন) পাঠ করছিলেন, তখন কিরাত তাঁর কাছে জটিল মনে হলো (ভুল হয়ে গেল)। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "যদি তোমরা আমাকে এবং ইবলিসকে দেখতে পেতে! আমি আমার হাত বাড়িয়ে দিলাম এবং ক্রমাগত তাকে শ্বাসরুদ্ধ করতে থাকলাম, এমনকি আমি তার লালার শীতলতা আমার এই দুই আঙ্গুলের মধ্যে অনুভব করছিলাম – বৃদ্ধাঙ্গুলি ও তার পাশের আঙ্গুলটির মাঝে। আমার ভাই সুলাইমান (আঃ)-এর দো‘আ না থাকলে, সে অবশ্যই মসজিদের খুঁটিগুলোর মধ্যে কোনো একটির সাথে বাঁধা অবস্থায় থাকতো, আর মদীনার শিশুরা তাকে নিয়ে খেলা করতো। অতএব, তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সক্ষম, সে যেন তার এবং ক্বিবলার মাঝে কাউকে অন্তরায় না হতে দেয়, সে যেন তাই করে।"
2569 - عن أبي الدرداء قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم فسمعناه يقول:"أعوذ بالله منك" ثم قال:"ألْعنُك بلعْنَةِ الله" ثلاثًا. وبسط يده كأنَّه يتناولُ شيئًا. فلما فرغ من الصلاة قلنا: يا رسول الله! قد سمعناك تقول في الصلاة شيئًا لم نسمعك تقوله قبل ذلك. ورأيناك بسطْتَ يدَك قال:"إنّ عدوَّ الله إبليسَ جاء بشهاب من نار ليجعله في وجْهِي، فقلتُ: أعوذ بالله منك. ثلاث مرات، ثم قلت: أَلْعنك بلعنة الله التامة، فلم يستَأْخِرْ ثلاث مرات، ثم أردتُ أَخْذَه. والله! لولا دعوةُ أخينا سليمان لأصبح مُوثقًا يلعبُ به ولدانُ أهل المدينة".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (542) عن محمد بن سلمة المرادي، حدثنا عبد الله بن وهب، عن معاوية بن صالح، يقول: حدَّثني ربيعةُ بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي الدرداء، فذكره.
قال القاضي عياض: قوله صلى الله عليه وسلم:"ألْعنُك بلعنة الله، وأعوذ بالله منك" دليلُ الجواز الدعاءُ لغيره، وعلى غيره بصيغة المخاطبة خلافًا لابن شعبان من أصحاب مالك في قوله: إن الصّلاة تبطل بذلك".
قال النووي رحمه الله:"وكذا قال أصحابنا: تبطل الصلاة بالدعاء لغيره بصيغة المخاطبة كقوله للعاطس: رحمك الله، أو يرحمك الله. ولمن سلَّم عليه: وعليك السلام وأشباهه، والأحاديث السابقة في الباب الذي قبله في السلام على المصلي، تؤيد ما قاله أصحابنا. فيتأول هذا الحديث، أو يحمل على أنه كان قبل تحريم الكلام في الصلاة، أو غير ذلك" شرح مسلم.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সালাতে) দাঁড়ালেন। আমরা তাঁকে বলতে শুনলাম: "আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।" তারপর তিনি বললেন: "আমি আল্লাহর লা'নত দ্বারা তোমাকে লা'নত করি" এই বাক্যটি তিনবার। আর তিনি হাত বাড়ালেন, যেন তিনি কিছু ধরছেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সালাতে আমরা আপনাকে এমন কিছু বলতে শুনেছি, যা এর আগে কখনো শুনিনি। আর আমরা আপনাকে হাত বাড়াতেও দেখেছি। তিনি বললেন: "আল্লাহর শত্রু ইবলিস আগুনের একটি শিখা নিয়ে এসেছিল, যেন তা আমার মুখের ওপর ফেলে দেয়। আমি বললাম: আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই—তিনবার। এরপর আমি বললাম: আমি তোমাকে আল্লাহর পরিপূর্ণ লা'নত দ্বারা লা'নত করি। তবুও সে পিছিয়ে গেল না—তিনবার। তারপর আমি তাকে ধরতে চাইলাম। আল্লাহর শপথ! যদি আমাদের ভাই সুলাইমানের (আঃ) দু'আ না থাকত, তবে সে অবশ্যই বাঁধা থাকত এবং মদীনার শিশুরা তাকে নিয়ে খেলা করত।"
2570 - عن * *
২৫৭০ - থেকে **
2571 - عن المغيرة بن شعبة قال: إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليقوم - أو لَيُصلّي - حتى تَرِم قدماه - أو ساقاه - فيقال له: فيقول:"أفلا أكون عبدًا شكورًا".
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1130)، ومسلم في كتاب صفة القيامة والجنّة والنار (2819) كلاهما من حديث زياد بن عِلاقة، عن المغيرة بن شعبة فذكره. واللفظ للبخاري.
وفي لفظ مسلم: أن النبي صلى الله عليه وسلم صَلَّى حتى انتفختْ قدماه. فقيل له: أتكلَّفُ هذا وقد غفر الله لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر؟ . فقال:"أفلا أكون عبدًا شكورًا".
মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতে) এত বেশি সময় দাঁড়িয়ে থাকতেন—অথবা সালাত আদায় করতেন—যে তাঁর দু’খানা পা অথবা তাঁর নলা ফুলে যেত।
তখন তাঁকে বলা হলো, (কেন এমন করছেন?)। তিনি বললেন: "আমি কি একজন শোকরগুজার বান্বাহ হবো না?"
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন, এমনকি তাঁর পা ফুলে যেত। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি কি এত কষ্ট করেন, অথচ আল্লাহ্ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন? তিনি বললেন: "আমি কি শোকরগুজার বান্বাহ হবো না?"
2572 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقوم من الليل حتى تتفطَّر قدماه، فقالت عائشة: لِمَ تصنعُ هذا يا رسولَ الله! وقد غفر الله لك ما تقدَّم من ذَنْبِكَ وما تأخَّر؟ قال:"أَفلا أحبُّ أن أكون عبدًا شكورًا"، فلما كَثُر لحْمه صلَّى جالسًا، فإذا أراد أن يركع قام فقرأ، ثم ركع.
متفق عليه: رواه البخاري في تفسير سورة الفتح (4837)، ومسلم في كتاب صفة القيامة (2820) كلاهما من حديث عروة بن الزبير، عن عائشة واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه.
قولها:"حتى تتفطّر قدماه" أي تشقّقت.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতে (নামাযে) এমনভাবে দাঁড়াতেন যে তাঁর উভয় পা ফেটে যেত। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কেন এমন করেন? অথচ আল্লাহ আপনার পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন?' তিনি বললেন, 'আমি কি তবে একজন কৃতজ্ঞ বান্দা হতে পছন্দ করব না?' এরপর যখন তাঁর (শরীর) ভারী হলো, তখন তিনি বসে সালাত আদায় করতেন। তবে যখন তিনি রুকূ করতে চাইতেন, তখন দাঁড়িয়ে যেতেন এবং ক্বিরাআত করতেন, এরপর রুকূ করতেন।
2573 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي حتى تَرِم قدماه. قال: فقيل له: أتفعل هذا وقد جاءك: إن الله قد غفر لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر. قال:"أفلا
أكون عبدًا شكورًا".
صحيح: رواه الترمذي في الشمائل (260) عن أبي عمَّار (الحسين بن حُرَيث) حدثنا الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (1184) ورواه من طريق الفضل بن موسى به مثله.
وإسناده حسن لأجل محمد بن عمرو فإنه صدوق، ولكن له طرق أخرى.
فقد رواه أيضًا الترمذي في الشمائل (261)، وابن ماجه (1420) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي حتى تنتفخ قدماه كما عند الترمذي، وعند ابن ماجه: حتى تورَّمتْ قدماه وبقية الحديث نحوه وهذا إسناد حسن أيضًا.
ورواه النسائي (1645) من وجه آخر عن سفيان، عن عاصم بن كُلَيب عن أبيه، عن أبي هريرة مختصرًا: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي حتى تزلغ - يعني تشقَّقُ - قدماه. وهذا سند صحيح أيضًا، وهذه الطرق يُقوي بعضُها بعضًا فيصير الحديث صحيحًا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এত দীর্ঘ সময় সালাত আদায় করতেন যে তাঁর পা ফুলে যেত। (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি এই কাজটি করছেন, অথচ আপনার কাছে তো এই সুসংবাদ এসেছে যে, আল্লাহ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ মাফ করে দিয়েছেন? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি কি একজন কৃতজ্ঞ বান্বদা হব না?
2574 - عن أنس بن مالك، قال: قام النّبيُّ صلى الله عليه وسلم حتَّى تورّمتْ قدماه، أو ساقاه. قال: فقيل: يا رسول الله! قد غفر اللَّهُ لك ما تقدَّم من ذنبك وما تأخَّر؟ قال:"أفلا أكونُ عبدًا شكورًا".
صحيح: رواه أبو يعلى (2900) عن عبد الله بن عون الخرّاز، حدّثنا محمد بن بشر، عن مسعر بن كدام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
أورده الهيثميّ في"المجمع" (2/ 271) وعزاه إلى أبي يعلى، والبزّار، والطّبراني في"الأوسط" وقال:"رجاله رجال الصّحيح".
قلت: وهو كما قال، إلّا أنّ الحديث أُعلّ بأنّ المشهور عن مسعر، عن زياد بن علاقة، عن المغيرة بن شعبة، كما سبق في أوّل الباب، وهو الذي أخرجه الشيخان، ولكن لا يبعد أن يكون لهذا الحديث مخرجٌ آخر - وهو ما رواه محمد بن بشر - وهو العبديّ، وصف بأنّه ثقة حافظ، عن مسعر بن كدام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
وأنس بن مالك وهو خادم رسول الله صلى الله عليه وسلم، لقد اطلّع على فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم ما لم يطّلع عليه غيره، ويشهد لهذا الطريق ما رواه أبو الشيخ الأصبهانيّ في"أخلاق النبيّ صلى الله عليه وسلم" (ص 160) عن أحمد بن محمد بن علي الخزاعيّ، نا قرّة بن حبيب، نا عبد الحكم، عن أنس بن مالك، قال:"تعبَّد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى صار كالشِّن البالي، فقالوا: يا رسول الله! ما يحملك على هذا؟ أليس قد غفر الله لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر؟ قال: أفلا أكون عبدًا شكورًا".
إلّا أنّ فيه عبد الحكم وهو ابن عبد الله القسمليّ، ضعيف كما في التقريب، ولكن بمجموع الطريقين يدلان على أنّ لهذا الحديث أصلّا عن أنس أيضًا.
فائدة: قال ابن خزيمة:"في هذا دلالة على أن الشّكر لله عز وجل قد يكون بالعمل له، لأنَّ الشكر كلُّه لله، وقد يكون باللسان. قال الله تعالى: {اعْمَلُوا آلَ دَاوُودَ شُكْرًا} [سورة سبأ: 13] فأمرهم عز وجل أن يعملوا شكرًا، فالشكر قد يكون بالقول والعمل جميعًا. لا على ما يتوهم العامة أن الشكر إنما يكون باللّسان فقط".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (নামাযে) এত দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকতেন যে তাঁর দুই পা অথবা দুই পায়ের গোছা ফুলে যেত। তিনি বলেন: তখন তাঁকে বলা হলো, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন (তবু কেন এত কষ্ট করেন)?’ তিনি বললেন, ‘আমি কি একজন কৃতজ্ঞ বান্দা হব না?’
2575 - عن سعد بن هشام بن عامر قال: قلت لأم المؤمنين عائشة: أَنبئِيني عن خُلُقِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: أما تقرأ القرآن؟ قلت: بلى، قالت: فإن خلق رسول الله صلى الله عليه وسلم كان القرآن. قال: فهممتُ أن أقومَ فبدا لي فقلت لها: أَنبئِيني عن قيام رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: أما تقرأ هذه السورة {يَاأَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ} [المزمل: 1] قال: قلت: بلى. قالت: فإن الله افترض القيام في أول هذه السورة، فقام نبي الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حولًا، حتى انتفخت أقدامُهم، وأمسك الله خاتمتها اثني عشر شهرًا، ثم أنزل الله التخفيف في آخر السورة، فصار قيام الليل تطوعًا بعد فريضةٍ.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من طريق عبد الرزاق، وهو في مصنفه (4714) عن عمر، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام بن عامر فذكره في حديث طويل كما سيأتي في جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل.
وعلى هذا يدل قول ابن عباس في قوله تعالى في سورة المزمل: {قُمِ اللَّيْلَ إِلَّا قَلِيلًا (2) نِصْفَهُ} [المزمل: 2، 3] نسختها الآية التي فيها: {عَلِمَ أَنْ لَنْ تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ فَاقْرَءُوا مَا تَيَسَّرَ مِنَ الْقُرْآنِ} [المزمل: 20] و {نَاشِئَةَ اللَّيْلِ} [المزمل: 1] أولَه. وكانت صلاتهم لأول الليل، يقول: هو أجدرُ أن تحصوا ما فرض الله عليكم من قيام الليل، وذلك أنَّ الإنسان إذا نام لم يدرِ متى يستيقظ. وقوله: {وَأَقْوَمُ قِيلًا} [المزمل: 6] هو أجدر أنْ يفقهَ في القرآن. وقوله: {إِنَّ لَكَ فِي النَّهَارِ سَبْحًا طَوِيلًا} [المزمل: 7] يقول: فراغًا طويلًا.
رواه أبو داود (1304) عن أحمد بن محمد المروزي بن شَبُّوَيْهِ، حدثني علي بن حسين، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن لأجل الكلام في علي بن حسين وهو ابن واقد فقد تكلم فيه النسائي وغيره، ومشّاه الآخرون غير أنه لا ينزل عن درجة الحسن.
وأما يزيد النحوي فهو: ابن أبي سعيد المروزي ثقة.
وقوله: لما نزلت أول المزمل كانوا يقومون نحوًا من قيامهم في شهر رمضان، حتى نزل آخرها، وكان بين أولها وآخرها سنة.
رواه أبو داود (1305) عن أحمد بن محمد - يعني المروزي -، حدثنا وكيع، عن مِسْعَر، عن سِماك الحنفي، عن ابن عباس فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل سِماك الحنفي، وهو: ابن الوليد أبو زميل وثقه أحمد وابن معين وغيرهما. وقال أبو حاتم: صدوق، وقال النسائي: ليس به بأس.
قلت: وهو حسن الحديث.
وأخرجه الحاكم (2/ 505) من طريق مِسعر به وقال:"صحيح الإسناد".
هذا الحكم خاص بأمة محمد صلى الله عليه وسلم فإنه لا خلاف بين أهل العلم بأن قيام الليل ليس بواجب. قال الشافعي رحمه الله تعالى مستدلًّا بقوله تعالى: {فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ} أنها ناسخة لقيام الليل ونصفه وثلثه وما تيسر"الرسالة" (ص 116).
ولكن وقع الخلاف بين السلف في حق النبي صلى الله عليه وسلم هل كان فرضًا عليه أم لا؟ قال ابن القيم رحمه الله تعالى وهذا ملخص كلامه:"الطائفتان احتجوا بقوله تعالى: {وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ} قالوا: فهذا صريح في عدم الوجوب.
وقال الآخرون: أمره بالتهجد في هذه السورة كما أمره في قوله تعالى: {يَاأَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ (1)} ولم يجيء ما ينسخه عنه. وأما قوله تعالى: {نَافِلَةً لَكَ} فلو كان المراد به التطوع لم يخصه بكونه نافلة له، وإنما المراد بالنافلة الزيادة. ومطلق الزيادة لا يدل على التطوع قال تعالى: {وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً} أي زيادة على الولد، وكذلك النافلة في تهجد النبي صلى الله عليه وسلم زيادة في درجاته، وفي أجره ولهذا خصه بها، فإن قيام الليل في حق غيره مباح، ومكفِّر للسيئات، وأما النبي صلى الله عليه وسلم فقد غفر الله له ما تقدم من ذنبه وما تأخر، فهو يعمل في زيادة الدرجات وعلو المراتب، وغيره يعمل في التكفير".
ثم قال رحمه الله تعالى:"والمقصود أن النافلة في الآية لم يُرَد بها ما يجوز فعلُه وتركُه، كالمستحب والمندوب، وإنما المراد بها الزيادة في الدرجات، وهذا قدر مشترك بين الفرض والمستحب، فلا يكون قوله: {نَافِلَةً لَكَ} نافيًا لما دلَّ عليه الأمر من الوجوب". انظر:"زاد المعاد" (1/
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাদ ইবনু হিশাম ইবনু আমির (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র সম্পর্কে অবহিত করুন।
তিনি বললেন: তুমি কি কুরআন পড়ো না? আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই পড়ি। তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র ছিল কুরআন।
সাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি উঠতে উদ্যত হলাম, কিন্তু আমার মনে আরেকটি বিষয় উদয় হলো। তাই আমি তাঁকে বললাম: আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (রাতে) সালাত আদায় (কিয়ামুল লাইল) সম্পর্কে অবহিত করুন।
তিনি বললেন: তুমি কি এই সূরাটি পড়ো না: {হে বস্ত্রাবৃত!} (সূরা মুয্যাম্মিল: ১)। আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই পড়ি। তিনি বললেন: আল্লাহ তা'আলা এই সূরার শুরুতে কিয়ামুল লাইলকে ফরয করেছিলেন। ফলে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ এক বছর ধরে (রাতে) সালাত আদায় করলেন, এমনকি তাঁদের পদযুগল ফুলে যেত। আর আল্লাহ এর শেষাংশ বারো মাস পর্যন্ত অবতীর্ণ করা থেকে বিরত রইলেন। অতঃপর আল্লাহ সূরার শেষাংশে সহজতা (হালকা করার বিধান) নাযিল করলেন। ফলে কিয়ামুল লাইল ফরয হওয়ার পর তা নফল (স্বেচ্ছামূলক) হয়ে গেল।
2576 - عن عائشة قالت: قام النبي صلى الله عليه وسلم بآية من القرآن ليلةً.
صحيح: رواه الترمذي (448) عن أبي بكر محمد بن نافع البصري، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، عن إسماعيل بن مسلم العبدي، عن أبي المتوكِّل الناجي، عن عائشة فذكر مثله.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".
قوله:"حسن" فيه تقصير، والصواب أنه صحيح.
قلت: وأبو بكر هو: محمد بن أحمد بن نافع العبدي البصري مشهور بكنيته، وينسب إلى جده، وهو من رجال مسلم. وبقية الرجال رجال الصحيح أيضًا ويشهد له حديث أبي ذر الآتي:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে কুরআনের একটি আয়াত দ্বারা (সালাতে) দাঁড়িয়েছিলেন।
2577 - عن أبي ذر قال: قام النبي صلى الله عليه وسلم بآية حتى أصبح يردِّدُها. والآية: {إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [المائدة: 118].
حسن: رواه النسائي (1010)، وابن ماجه (1350) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد القطان، قال: حدثنا قُدامة بن عبد الله، قال: حدثتني جَسرة بنتُ دجاجةَ، قالت: سمعتُ أبا ذر فذكره.
وأخرجه الحاكم (1/ 241) من هذا الوجه، وصحّحه.
وصحّحه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجه، وذكره ابن خزيمة (1/ 271) بدون إسناد وعلَّق الخبر على الصحة. ورواه الإمام أحمد (21328) عن محمد بن فُضيل، حدثني فُليت العامري - وهو قدامة بن عبد الله وزاد فيه: فلما أصبح، قلت: يا رسول الله! ما زلتَ تقرأ هذه الآية حتى أصبحت، تركع بها وتسجد بها؟ قال:"إني سألت ربي الشفاعة لأمتي فأعطانيها، وهي نائلة إن شاء الله لمن لا يشرك بالله شيئًا".
وإسناده حسن لأجل جَسْرة بنت دَجَاجةَ العامرية، وثَّقه العجلي وابن حبان، وقال الدارقطني: يعتبر بحديثها، يعني في الشواهد والمتابعات. وإلا فهي"مقبولة". كما قال الحافظ في التقريب، وجعلها أبو نعيم في الصحابة، وهو وهم منه.
والخلاصة إن حديث أبي ذر يشهد له حديث عائشة، وله شاهد أيضًا من حديث أبي سعيد الآتي:
وأما ما رُوي عن أبي سعيد الخدري أن النبي صلى الله عليه وسلم ردَّدَ آية حتى أصبح ففيه رجل لم يعرف من هو؟ رواه الإمام أحمد (11593/ 2) عن زيد بن الحباب، أخبرني إسماعيل بن مسلم الناجي، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 273):"فيه إسماعيل بن مسلم الناجي ولم أجد من ترجمه".
قلت: ولم يترجم له الحافظ في"التعجيل" فلعله من رجال الكتب الستة نُسب إلى غير أبيه، أو غير مهنته، وأخشى أن يكون هو: إسماعيل بن مسلم المكي؛ لأنه في طبقته إلا أنه ضعيف جدًّا.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক আয়াত দিয়ে সারা রাত দাঁড়িয়ে থাকলেন, ভোর হওয়া পর্যন্ত তিনি সেটিই পুনরাবৃত্তি করছিলেন। আয়াতটি হলো: {যদি আপনি তাদেরকে শাস্তি দেন, তবে তারা তো আপনারই বান্দা; আর যদি আপনি তাদেরকে ক্ষমা করে দেন, তবে আপনি তো পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়} [সূরা মায়েদা: ১১৮]।
যখন ভোর হলো, (আবু যর) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি সকাল পর্যন্ত এই আয়াত বারবার পড়ছিলেন, রুকু ও সিজদা করছিলেন?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই আমি আমার রবের কাছে আমার উম্মতের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) প্রার্থনা করেছি, আর তিনি আমাকে তা দান করেছেন। ইনশাআল্লাহ, এটি তাদের কাছে পৌঁছাবে যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে না।"
2578 - عن ابن عباس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل يتهجد قال:"اللهم! لك الحمدُ أنت قَيِّمُ السماوات والأرض ومن فيهن، ولك الحمدُ لك ملكُ السماوات والأرض ومن فيهن، ولك الحمدُ أنت نورُ السماوات والأرضِ، ولك الحمدُ أنت مالك السماوات والأرض، ولك الحمدُ أنت الحق، ووعدك الحق، ولقاءُك حق،
وقولك حق، والجنة حق والنار حق، والنبيون حق، ومحمد حق، والساعة حق. اللهم! لك أسلمتُ، وبك آمنتُ، وعليك توكلتُ، وإليك أنبتُ، وبك خاصمتُ، وإليك حاكمتُ، فاغفر لي ما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وما أسررتُ، وما أعلنتُ، أنت المقَدِّم، وأنت المؤخِّر لا إله إلا أنتَ لا إله غيرك".
قال سفيان: وزاد عبد الكريم أبو أمية:"ولا حولَ ولا قوةَ إلا باللهِ".
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1120)، ومسلم في صلاة المسافرين (769) كلاهما من حديث سفيان، عن سليمان بن أبي مسلم الأحول، عن طاوسٍ، سمع ابن عباس فذكره.
ورواه مالك في القرآن (34) عن أبي الزبير المكي، عن طاوسٍ اليماني، عن عبد الله بن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قام إلى الصلاة من جوفِ الليل يقول فذكر مثله، وفيه"أنت قيَّامُ السماوات والأرض" بدل من"قيِّم السماوات …"، وقال في آخر الحديث:"أنت إلهي لا إله إلا أنت".
ورواه مسلم (769) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك.
وهو مخرج في"المنة الكبري" (2/ 385).
وفي رواية قال ابن عباس: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في التهجد يقول بعد ما يقول: الله أكبر.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য উঠতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনিই আসমানসমূহ, যমীন এবং এগুলোর মধ্যে যা কিছু আছে তার ধারক। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আসমানসমূহ, যমীন এবং এগুলোর মধ্যে যা কিছু আছে তার রাজত্ব আপনারই। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনি আসমানসমূহ ও যমীনের জ্যোতি। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনি আসমানসমূহ ও যমীনের মালিক। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনিই সত্য, আপনার ওয়াদা সত্য, আপনার সাক্ষাৎ সত্য, আপনার বাণী সত্য, জান্নাত সত্য, জাহান্নাম সত্য, নবীগণ সত্য, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য এবং কিয়ামত সত্য। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছেই আত্মসমর্পণ করলাম, আপনার প্রতিই ঈমান আনলাম, আপনার উপরই ভরসা করলাম, আপনার দিকেই প্রত্যাবর্তন করলাম, আপনার পক্ষেই বিতর্কে অবতীর্ণ হলাম এবং আপনার কাছেই বিচার চাইলাম। অতএব, আপনি আমার পূর্বের ও পরের, গোপন ও প্রকাশ্য সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিন। আপনিই অগ্রবর্তীকারী এবং আপনিই বিলম্বকারী। আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই; আপনি ব্যতীত অন্য কোনো উপাস্য নেই।"
সুফইয়ান বলেন: আব্দুল কারীম আবূ উমাইয়াহ অতিরিক্ত বলেছেন: "আর আল্লাহর সাহায্য ছাড়া পাপ থেকে বাঁচার বা পুণ্য করার কোনো ক্ষমতা নেই।"
2579 - عن عُبادة بن الصامت، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من تعارَّ من الليل فقال: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمدُ، وهو على كل شيء قدير، الحمد لله، وسبحان الله، ولا إله إلا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلا بالله، ثم قال: اللهم! اغفر لي، أو دعا، استُجيب له، فإن توضأ وصلَّى قُبلتْ صلاتُه".
صحيح: رواه البخاري في التهجد (1154) عن صَدَقَة بن الفضل، أخبرنا الوليد، عن الأوزاعي، قال: حدثني عُمير بن هانئ، قال: حدثني جنادةُ بن أبي أمية، حدثني عُبادة بن الصامت فذكره.
قال البغوي:"قوله:"تعارّ" أي استيقظ من النوم، وأصلُ التعارِّ: السَّهرُ والتقلبُ على الفراش، ويقال: إن التعارَّ لا يكون إلا مع كلامٍ وصوتٍ مأخوذ من عِرار الظليم، وهو صوته""شرح السنة" (4/ 72).
وقال ابن التين: ظاهر الحديث أن معنى تعارَّ استيقظ، لأنه قال:"من تعارَّ فقال" فعطف القول على التعار".
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি রাতের বেলায় পাশ ফিরে জেগে ওঠে এবং বলে: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু, ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর, আলহামদুলিল্লাহ, ওয়া সুবহানাল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়াল্লাহু আকবার, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই। তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান। সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, আল্লাহ পবিত্র, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আল্লাহ মহান, আল্লাহর সাহায্য ছাড়া কোনো শক্তি বা সামর্থ্য নেই), এরপর সে যদি বলে: 'আল্লাহুম্মাগফির লী' (হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করে দাও), অথবা (অন্য) কোনো দোয়া করে, তবে তার দোয়া কবুল করা হয়। আর যদি সে ওযু করে এবং সালাত আদায় করে, তবে তার সালাতও কবুল করা হয়।"
2580 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف قال: سألت عائشة أُمَّ المؤمين: بأيّ شيء كان نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم يفتح صلاتَه إذا قام من الليل؟ قالت: كان إذا قام من الليل
افتتح صلاته:"اللهم! ربَّ جَبْرَائيل وميكائيل وإسرافيل. فاطرَ السماوات والأرض، عالمَ الغيب والشهادةِ، أنت تحكم بين عبادك فيما كانوا فيه يختلفون، اهدني لما اختُلِف فيه من الحق بإذنك إنك تهدي من تشاءُ إلى صراط مستقيم".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (770) من طرق عن عمر بن يونس، حدثنا عكرمة بن عمار، حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: নবীউল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (সালাতের জন্য) দাঁড়াতেন, তখন তিনি এই বলে সালাত শুরু করতেন: "হে আল্লাহ! জিবরাঈল, মিকাঈল ও ইসরাফীল-এর প্রতিপালক, আসমান ও যমীনের স্রষ্টা, প্রকাশ্য ও অপ্রকাশ্য সবকিছুর জ্ঞাতা! আপনিই আপনার বান্দাদের মধ্যে ফয়সালা করেন যে বিষয়ে তারা মতভেদ করে থাকে। যে সত্য বিষয়ে মতভেদ করা হয়েছে, আপনি আপনার ইচ্ছায় আমাকে সেই সত্যের দিকে পথনির্দেশ করুন। নিশ্চয়ই আপনি যাকে চান, সরল পথের দিকে পরিচালিত করেন।"