হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2568)


2568 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام فصلَّى صلاة الصبح وهو خلْفَه، فقرأ، فالتبست عليه القراءة، فلما فرغ من صلاته قال:"لو رأيتموني وإبليس، فأهويتُ بيدي، فما زلتُ أخْنُقُه حتى وجدتُ برْد لُعابه بين أصْبعيَّ هاتين - الإبهام والتي تليها - ولولا دعوةُ أخي سليمان لأصبح مربوطًا بسارية من سواري المسجد، يتلاعبُ به صبيانُ المدينة، فمن استطاع منكم أن لا يحُولَ بينَه وبين القبلة أحدٌ فليفْعلْ".

حسن: رواه الإمام أحمد (11780) عن أبي أحمد، حدثنا مسرَّة بن معبد، حدثني أبو عبيد حاجب سليمان، قال: رأيتُ عطاء بن يزيد الليثي قائمًا يصلِّي، مُتعممًا بعمامةٍ سوداء، مرخي طرفَها من خلْفِه، مُصَفِّر اللحيةِ. فذهبتُ أمرُّ بين يديه فردَّني، ثم قال: حدثني أبو سعيد الخدري فذكر مثله.

وإسناده حسن لأجل مسرة بن معبد وهو: اللخمي الفلسطيني المقدسي اختلف فيه فقال أبو حاتم: شيخ لا بأس به، وذكره ابن حبان مرة في"الثقات" (7/ 524) وأخرى في"المجروحين" (1093) فقال:"كان ممن ينفرد عن الثقات ما ليس من أحاديث الأَثبات على قلة روايته، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد". غير أنه حسن الحديث، ولذا قال الذهبي في"الكاشف":"وُثِّق" وقال الحافظ في"التقريب":"صدوق له أوهام".

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 87): رواه أحمد ورجاله ثقات، غير أنه لم يذكر قوله:"من استطاع منكم …".

والحديث رواه أبو داود (699) عن أحمد بن سريج الرازي، أخبرنا أبو أحمد الزبيري، أخبرنا مسرة بن معبد اللخمي به مقتصرًا على قوله:"من استطاع منكم أن لا يحول بينه وبين القبلة أحد فليفعل". انظر باب منع المار بين يدي المصلي.

وأبو أحمد هو: محمد بن عبد الله بن الزبير الزبيري من رجال الجماعة.

والذي رواه عبد بن حميد (946) عن علي بن عاصم، ثنا أبو هارون العبدي، عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خرجتُ لصلاة الصبح فلقيني الشيطان في السدة، سدة المسجد فزحمني حتى إنِّي لأجد من شعره فاستمسكت منه فخنقتُه، حتى إني لأجد برد لسانه على يديَّ، فلولا دعوة أخي سليمان لأصبح مقتولًا تنظرون إليه" ففيه أبو هارون العبدي وهو: عمارة بن جُوَين - بجيم مصغرًا - مشهور بكنيته متروك، والبعض كذَّبَه.

وأما ما رُوِي عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مرَّ عليَّ الشيطانُ فأخذتُه فخنقتُه، حتى لأجد برْد لسانه في يدي فقال: أوْجَعتنِي أوْجَعتني" فهو منقطع، رواه الإمام أحمد (3926) عن أسود بن عامر، أخبرنا إسرائيل، قال: ذكر أبو إسحاق عن أبي عبيدة، عن عبد الله.

وأبو عبيدة بن عبد الله بن مسعود لم يسمع من أبيه، قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 288):
"رواه أحمد، وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه، وبقية رجاله رجال الصحيح".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন, আর তিনি (আবূ সাঈদ) ছিলেন তাঁর পিছনে। তিনি (কুরআন) পাঠ করছিলেন, তখন কিরাত তাঁর কাছে জটিল মনে হলো (ভুল হয়ে গেল)। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "যদি তোমরা আমাকে এবং ইবলিসকে দেখতে পেতে! আমি আমার হাত বাড়িয়ে দিলাম এবং ক্রমাগত তাকে শ্বাসরুদ্ধ করতে থাকলাম, এমনকি আমি তার লালার শীতলতা আমার এই দুই আঙ্গুলের মধ্যে অনুভব করছিলাম – বৃদ্ধাঙ্গুলি ও তার পাশের আঙ্গুলটির মাঝে। আমার ভাই সুলাইমান (আঃ)-এর দো‘আ না থাকলে, সে অবশ্যই মসজিদের খুঁটিগুলোর মধ্যে কোনো একটির সাথে বাঁধা অবস্থায় থাকতো, আর মদীনার শিশুরা তাকে নিয়ে খেলা করতো। অতএব, তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সক্ষম, সে যেন তার এবং ক্বিবলার মাঝে কাউকে অন্তরায় না হতে দেয়, সে যেন তাই করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2569)


2569 - عن أبي الدرداء قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم فسمعناه يقول:"أعوذ بالله منك" ثم قال:"ألْعنُك بلعْنَةِ الله" ثلاثًا. وبسط يده كأنَّه يتناولُ شيئًا. فلما فرغ من الصلاة قلنا: يا رسول الله! قد سمعناك تقول في الصلاة شيئًا لم نسمعك تقوله قبل ذلك. ورأيناك بسطْتَ يدَك قال:"إنّ عدوَّ الله إبليسَ جاء بشهاب من نار ليجعله في وجْهِي، فقلتُ: أعوذ بالله منك. ثلاث مرات، ثم قلت: أَلْعنك بلعنة الله التامة، فلم يستَأْخِرْ ثلاث مرات، ثم أردتُ أَخْذَه. والله! لولا دعوةُ أخينا سليمان لأصبح مُوثقًا يلعبُ به ولدانُ أهل المدينة".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (542) عن محمد بن سلمة المرادي، حدثنا عبد الله بن وهب، عن معاوية بن صالح، يقول: حدَّثني ربيعةُ بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي الدرداء، فذكره.

قال القاضي عياض: قوله صلى الله عليه وسلم:"ألْعنُك بلعنة الله، وأعوذ بالله منك" دليلُ الجواز الدعاءُ لغيره، وعلى غيره بصيغة المخاطبة خلافًا لابن شعبان من أصحاب مالك في قوله: إن الصّلاة تبطل بذلك".

قال النووي رحمه الله:"وكذا قال أصحابنا: تبطل الصلاة بالدعاء لغيره بصيغة المخاطبة كقوله للعاطس: رحمك الله، أو يرحمك الله. ولمن سلَّم عليه: وعليك السلام وأشباهه، والأحاديث السابقة في الباب الذي قبله في السلام على المصلي، تؤيد ما قاله أصحابنا. فيتأول هذا الحديث، أو يحمل على أنه كان قبل تحريم الكلام في الصلاة، أو غير ذلك" شرح مسلم.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সালাতে) দাঁড়ালেন। আমরা তাঁকে বলতে শুনলাম: "আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।" তারপর তিনি বললেন: "আমি আল্লাহর লা'নত দ্বারা তোমাকে লা'নত করি" এই বাক্যটি তিনবার। আর তিনি হাত বাড়ালেন, যেন তিনি কিছু ধরছেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সালাতে আমরা আপনাকে এমন কিছু বলতে শুনেছি, যা এর আগে কখনো শুনিনি। আর আমরা আপনাকে হাত বাড়াতেও দেখেছি। তিনি বললেন: "আল্লাহর শত্রু ইবলিস আগুনের একটি শিখা নিয়ে এসেছিল, যেন তা আমার মুখের ওপর ফেলে দেয়। আমি বললাম: আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই—তিনবার। এরপর আমি বললাম: আমি তোমাকে আল্লাহর পরিপূর্ণ লা'নত দ্বারা লা'নত করি। তবুও সে পিছিয়ে গেল না—তিনবার। তারপর আমি তাকে ধরতে চাইলাম। আল্লাহর শপথ! যদি আমাদের ভাই সুলাইমানের (আঃ) দু'আ না থাকত, তবে সে অবশ্যই বাঁধা থাকত এবং মদীনার শিশুরা তাকে নিয়ে খেলা করত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2570)


2570 - عن * *




২৫৭০ - থেকে **









আল-জামি` আল-কামিল (2571)


2571 - عن المغيرة بن شعبة قال: إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليقوم - أو لَيُصلّي - حتى تَرِم قدماه - أو ساقاه - فيقال له: فيقول:"أفلا أكون عبدًا شكورًا".

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1130)، ومسلم في كتاب صفة القيامة والجنّة والنار (2819) كلاهما من حديث زياد بن عِلاقة، عن المغيرة بن شعبة فذكره. واللفظ للبخاري.

وفي لفظ مسلم: أن النبي صلى الله عليه وسلم صَلَّى حتى انتفختْ قدماه. فقيل له: أتكلَّفُ هذا وقد غفر الله لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر؟ . فقال:"أفلا أكون عبدًا شكورًا".




মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতে) এত বেশি সময় দাঁড়িয়ে থাকতেন—অথবা সালাত আদায় করতেন—যে তাঁর দু’খানা পা অথবা তাঁর নলা ফুলে যেত।
তখন তাঁকে বলা হলো, (কেন এমন করছেন?)। তিনি বললেন: "আমি কি একজন শোকরগুজার বান্বাহ হবো না?"

মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন, এমনকি তাঁর পা ফুলে যেত। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি কি এত কষ্ট করেন, অথচ আল্লাহ্ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন? তিনি বললেন: "আমি কি শোকরগুজার বান্বাহ হবো না?"









আল-জামি` আল-কামিল (2572)


2572 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقوم من الليل حتى تتفطَّر قدماه، فقالت عائشة: لِمَ تصنعُ هذا يا رسولَ الله! وقد غفر الله لك ما تقدَّم من ذَنْبِكَ وما تأخَّر؟ قال:"أَفلا أحبُّ أن أكون عبدًا شكورًا"، فلما كَثُر لحْمه صلَّى جالسًا، فإذا أراد أن يركع قام فقرأ، ثم ركع.

متفق عليه: رواه البخاري في تفسير سورة الفتح (4837)، ومسلم في كتاب صفة القيامة (2820) كلاهما من حديث عروة بن الزبير، عن عائشة واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه.

قولها:"حتى تتفطّر قدماه" أي تشقّقت.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতে (নামাযে) এমনভাবে দাঁড়াতেন যে তাঁর উভয় পা ফেটে যেত। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কেন এমন করেন? অথচ আল্লাহ আপনার পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন?' তিনি বললেন, 'আমি কি তবে একজন কৃতজ্ঞ বান্দা হতে পছন্দ করব না?' এরপর যখন তাঁর (শরীর) ভারী হলো, তখন তিনি বসে সালাত আদায় করতেন। তবে যখন তিনি রুকূ করতে চাইতেন, তখন দাঁড়িয়ে যেতেন এবং ক্বিরাআত করতেন, এরপর রুকূ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2573)


2573 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي حتى تَرِم قدماه. قال: فقيل له: أتفعل هذا وقد جاءك: إن الله قد غفر لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر. قال:"أفلا
أكون عبدًا شكورًا".

صحيح: رواه الترمذي في الشمائل (260) عن أبي عمَّار (الحسين بن حُرَيث) حدثنا الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (1184) ورواه من طريق الفضل بن موسى به مثله.

وإسناده حسن لأجل محمد بن عمرو فإنه صدوق، ولكن له طرق أخرى.

فقد رواه أيضًا الترمذي في الشمائل (261)، وابن ماجه (1420) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي حتى تنتفخ قدماه كما عند الترمذي، وعند ابن ماجه: حتى تورَّمتْ قدماه وبقية الحديث نحوه وهذا إسناد حسن أيضًا.

ورواه النسائي (1645) من وجه آخر عن سفيان، عن عاصم بن كُلَيب عن أبيه، عن أبي هريرة مختصرًا: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي حتى تزلغ - يعني تشقَّقُ - قدماه. وهذا سند صحيح أيضًا، وهذه الطرق يُقوي بعضُها بعضًا فيصير الحديث صحيحًا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এত দীর্ঘ সময় সালাত আদায় করতেন যে তাঁর পা ফুলে যেত। (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি এই কাজটি করছেন, অথচ আপনার কাছে তো এই সুসংবাদ এসেছে যে, আল্লাহ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ মাফ করে দিয়েছেন? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি কি একজন কৃতজ্ঞ বান্বদা হব না?









আল-জামি` আল-কামিল (2574)


2574 - عن أنس بن مالك، قال: قام النّبيُّ صلى الله عليه وسلم حتَّى تورّمتْ قدماه، أو ساقاه. قال: فقيل: يا رسول الله! قد غفر اللَّهُ لك ما تقدَّم من ذنبك وما تأخَّر؟ قال:"أفلا أكونُ عبدًا شكورًا".

صحيح: رواه أبو يعلى (2900) عن عبد الله بن عون الخرّاز، حدّثنا محمد بن بشر، عن مسعر بن كدام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (2/ 271) وعزاه إلى أبي يعلى، والبزّار، والطّبراني في"الأوسط" وقال:"رجاله رجال الصّحيح".

قلت: وهو كما قال، إلّا أنّ الحديث أُعلّ بأنّ المشهور عن مسعر، عن زياد بن علاقة، عن المغيرة بن شعبة، كما سبق في أوّل الباب، وهو الذي أخرجه الشيخان، ولكن لا يبعد أن يكون لهذا الحديث مخرجٌ آخر - وهو ما رواه محمد بن بشر - وهو العبديّ، وصف بأنّه ثقة حافظ، عن مسعر بن كدام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.

وأنس بن مالك وهو خادم رسول الله صلى الله عليه وسلم، لقد اطلّع على فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم ما لم يطّلع عليه غيره، ويشهد لهذا الطريق ما رواه أبو الشيخ الأصبهانيّ في"أخلاق النبيّ صلى الله عليه وسلم" (ص 160) عن أحمد بن محمد بن علي الخزاعيّ، نا قرّة بن حبيب، نا عبد الحكم، عن أنس بن مالك، قال:"تعبَّد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى صار كالشِّن البالي، فقالوا: يا رسول الله! ما يحملك على هذا؟ أليس قد غفر الله لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر؟ قال: أفلا أكون عبدًا شكورًا".

إلّا أنّ فيه عبد الحكم وهو ابن عبد الله القسمليّ، ضعيف كما في التقريب، ولكن بمجموع الطريقين يدلان على أنّ لهذا الحديث أصلّا عن أنس أيضًا.
فائدة: قال ابن خزيمة:"في هذا دلالة على أن الشّكر لله عز وجل قد يكون بالعمل له، لأنَّ الشكر كلُّه لله، وقد يكون باللسان. قال الله تعالى: {اعْمَلُوا آلَ دَاوُودَ شُكْرًا} [سورة سبأ: 13] فأمرهم عز وجل أن يعملوا شكرًا، فالشكر قد يكون بالقول والعمل جميعًا. لا على ما يتوهم العامة أن الشكر إنما يكون باللّسان فقط".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (নামাযে) এত দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকতেন যে তাঁর দুই পা অথবা দুই পায়ের গোছা ফুলে যেত। তিনি বলেন: তখন তাঁকে বলা হলো, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন (তবু কেন এত কষ্ট করেন)?’ তিনি বললেন, ‘আমি কি একজন কৃতজ্ঞ বান্দা হব না?’









আল-জামি` আল-কামিল (2575)


2575 - عن سعد بن هشام بن عامر قال: قلت لأم المؤمنين عائشة: أَنبئِيني عن خُلُقِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: أما تقرأ القرآن؟ قلت: بلى، قالت: فإن خلق رسول الله صلى الله عليه وسلم كان القرآن. قال: فهممتُ أن أقومَ فبدا لي فقلت لها: أَنبئِيني عن قيام رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: أما تقرأ هذه السورة {يَاأَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ} [المزمل: 1] قال: قلت: بلى. قالت: فإن الله افترض القيام في أول هذه السورة، فقام نبي الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حولًا، حتى انتفخت أقدامُهم، وأمسك الله خاتمتها اثني عشر شهرًا، ثم أنزل الله التخفيف في آخر السورة، فصار قيام الليل تطوعًا بعد فريضةٍ.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من طريق عبد الرزاق، وهو في مصنفه (4714) عن عمر، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام بن عامر فذكره في حديث طويل كما سيأتي في جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل.

وعلى هذا يدل قول ابن عباس في قوله تعالى في سورة المزمل: {قُمِ اللَّيْلَ إِلَّا قَلِيلًا (2) نِصْفَهُ} [المزمل: 2، 3] نسختها الآية التي فيها: {عَلِمَ أَنْ لَنْ تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ فَاقْرَءُوا مَا تَيَسَّرَ مِنَ الْقُرْآنِ} [المزمل: 20] و {نَاشِئَةَ اللَّيْلِ} [المزمل: 1] أولَه. وكانت صلاتهم لأول الليل، يقول: هو أجدرُ أن تحصوا ما فرض الله عليكم من قيام الليل، وذلك أنَّ الإنسان إذا نام لم يدرِ متى يستيقظ. وقوله: {وَأَقْوَمُ قِيلًا} [المزمل: 6] هو أجدر أنْ يفقهَ في القرآن. وقوله: {إِنَّ لَكَ فِي النَّهَارِ سَبْحًا طَوِيلًا} [المزمل: 7] يقول: فراغًا طويلًا.

رواه أبو داود (1304) عن أحمد بن محمد المروزي بن شَبُّوَيْهِ، حدثني علي بن حسين، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في علي بن حسين وهو ابن واقد فقد تكلم فيه النسائي وغيره، ومشّاه الآخرون غير أنه لا ينزل عن درجة الحسن.

وأما يزيد النحوي فهو: ابن أبي سعيد المروزي ثقة.

وقوله: لما نزلت أول المزمل كانوا يقومون نحوًا من قيامهم في شهر رمضان، حتى نزل آخرها، وكان بين أولها وآخرها سنة.
رواه أبو داود (1305) عن أحمد بن محمد - يعني المروزي -، حدثنا وكيع، عن مِسْعَر، عن سِماك الحنفي، عن ابن عباس فذكر مثله.

وإسناده حسن لأجل سِماك الحنفي، وهو: ابن الوليد أبو زميل وثقه أحمد وابن معين وغيرهما. وقال أبو حاتم: صدوق، وقال النسائي: ليس به بأس.

قلت: وهو حسن الحديث.

وأخرجه الحاكم (2/ 505) من طريق مِسعر به وقال:"صحيح الإسناد".

هذا الحكم خاص بأمة محمد صلى الله عليه وسلم فإنه لا خلاف بين أهل العلم بأن قيام الليل ليس بواجب. قال الشافعي رحمه الله تعالى مستدلًّا بقوله تعالى: {فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ} أنها ناسخة لقيام الليل ونصفه وثلثه وما تيسر"الرسالة" (ص 116).

ولكن وقع الخلاف بين السلف في حق النبي صلى الله عليه وسلم هل كان فرضًا عليه أم لا؟ قال ابن القيم رحمه الله تعالى وهذا ملخص كلامه:"الطائفتان احتجوا بقوله تعالى: {وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ} قالوا: فهذا صريح في عدم الوجوب.

وقال الآخرون: أمره بالتهجد في هذه السورة كما أمره في قوله تعالى: {يَاأَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ (1)} ولم يجيء ما ينسخه عنه. وأما قوله تعالى: {نَافِلَةً لَكَ} فلو كان المراد به التطوع لم يخصه بكونه نافلة له، وإنما المراد بالنافلة الزيادة. ومطلق الزيادة لا يدل على التطوع قال تعالى: {وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً} أي زيادة على الولد، وكذلك النافلة في تهجد النبي صلى الله عليه وسلم زيادة في درجاته، وفي أجره ولهذا خصه بها، فإن قيام الليل في حق غيره مباح، ومكفِّر للسيئات، وأما النبي صلى الله عليه وسلم فقد غفر الله له ما تقدم من ذنبه وما تأخر، فهو يعمل في زيادة الدرجات وعلو المراتب، وغيره يعمل في التكفير".

ثم قال رحمه الله تعالى:"والمقصود أن النافلة في الآية لم يُرَد بها ما يجوز فعلُه وتركُه، كالمستحب والمندوب، وإنما المراد بها الزيادة في الدرجات، وهذا قدر مشترك بين الفرض والمستحب، فلا يكون قوله: {نَافِلَةً لَكَ} نافيًا لما دلَّ عليه الأمر من الوجوب". انظر:"زاد المعاد" (1/




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাদ ইবনু হিশাম ইবনু আমির (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র সম্পর্কে অবহিত করুন।

তিনি বললেন: তুমি কি কুরআন পড়ো না? আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই পড়ি। তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র ছিল কুরআন।

সাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি উঠতে উদ্যত হলাম, কিন্তু আমার মনে আরেকটি বিষয় উদয় হলো। তাই আমি তাঁকে বললাম: আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (রাতে) সালাত আদায় (কিয়ামুল লাইল) সম্পর্কে অবহিত করুন।

তিনি বললেন: তুমি কি এই সূরাটি পড়ো না: {হে বস্ত্রাবৃত!} (সূরা মুয্‌যাম্মিল: ১)। আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই পড়ি। তিনি বললেন: আল্লাহ তা'আলা এই সূরার শুরুতে কিয়ামুল লাইলকে ফরয করেছিলেন। ফলে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ এক বছর ধরে (রাতে) সালাত আদায় করলেন, এমনকি তাঁদের পদযুগল ফুলে যেত। আর আল্লাহ এর শেষাংশ বারো মাস পর্যন্ত অবতীর্ণ করা থেকে বিরত রইলেন। অতঃপর আল্লাহ সূরার শেষাংশে সহজতা (হালকা করার বিধান) নাযিল করলেন। ফলে কিয়ামুল লাইল ফরয হওয়ার পর তা নফল (স্বেচ্ছামূলক) হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (2576)


2576 - عن عائشة قالت: قام النبي صلى الله عليه وسلم بآية من القرآن ليلةً.

صحيح: رواه الترمذي (448) عن أبي بكر محمد بن نافع البصري، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، عن إسماعيل بن مسلم العبدي، عن أبي المتوكِّل الناجي، عن عائشة فذكر مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

قوله:"حسن" فيه تقصير، والصواب أنه صحيح.
قلت: وأبو بكر هو: محمد بن أحمد بن نافع العبدي البصري مشهور بكنيته، وينسب إلى جده، وهو من رجال مسلم. وبقية الرجال رجال الصحيح أيضًا ويشهد له حديث أبي ذر الآتي:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে কুরআনের একটি আয়াত দ্বারা (সালাতে) দাঁড়িয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2577)


2577 - عن أبي ذر قال: قام النبي صلى الله عليه وسلم بآية حتى أصبح يردِّدُها. والآية: {إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [المائدة: 118].

حسن: رواه النسائي (1010)، وابن ماجه (1350) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد القطان، قال: حدثنا قُدامة بن عبد الله، قال: حدثتني جَسرة بنتُ دجاجةَ، قالت: سمعتُ أبا ذر فذكره.

وأخرجه الحاكم (1/ 241) من هذا الوجه، وصحّحه.

وصحّحه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجه، وذكره ابن خزيمة (1/ 271) بدون إسناد وعلَّق الخبر على الصحة. ورواه الإمام أحمد (21328) عن محمد بن فُضيل، حدثني فُليت العامري - وهو قدامة بن عبد الله وزاد فيه: فلما أصبح، قلت: يا رسول الله! ما زلتَ تقرأ هذه الآية حتى أصبحت، تركع بها وتسجد بها؟ قال:"إني سألت ربي الشفاعة لأمتي فأعطانيها، وهي نائلة إن شاء الله لمن لا يشرك بالله شيئًا".

وإسناده حسن لأجل جَسْرة بنت دَجَاجةَ العامرية، وثَّقه العجلي وابن حبان، وقال الدارقطني: يعتبر بحديثها، يعني في الشواهد والمتابعات. وإلا فهي"مقبولة". كما قال الحافظ في التقريب، وجعلها أبو نعيم في الصحابة، وهو وهم منه.

والخلاصة إن حديث أبي ذر يشهد له حديث عائشة، وله شاهد أيضًا من حديث أبي سعيد الآتي:

وأما ما رُوي عن أبي سعيد الخدري أن النبي صلى الله عليه وسلم ردَّدَ آية حتى أصبح ففيه رجل لم يعرف من هو؟ رواه الإمام أحمد (11593/ 2) عن زيد بن الحباب، أخبرني إسماعيل بن مسلم الناجي، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 273):"فيه إسماعيل بن مسلم الناجي ولم أجد من ترجمه".

قلت: ولم يترجم له الحافظ في"التعجيل" فلعله من رجال الكتب الستة نُسب إلى غير أبيه، أو غير مهنته، وأخشى أن يكون هو: إسماعيل بن مسلم المكي؛ لأنه في طبقته إلا أنه ضعيف جدًّا.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক আয়াত দিয়ে সারা রাত দাঁড়িয়ে থাকলেন, ভোর হওয়া পর্যন্ত তিনি সেটিই পুনরাবৃত্তি করছিলেন। আয়াতটি হলো: {যদি আপনি তাদেরকে শাস্তি দেন, তবে তারা তো আপনারই বান্দা; আর যদি আপনি তাদেরকে ক্ষমা করে দেন, তবে আপনি তো পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়} [সূরা মায়েদা: ১১৮]।

যখন ভোর হলো, (আবু যর) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি সকাল পর্যন্ত এই আয়াত বারবার পড়ছিলেন, রুকু ও সিজদা করছিলেন?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই আমি আমার রবের কাছে আমার উম্মতের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) প্রার্থনা করেছি, আর তিনি আমাকে তা দান করেছেন। ইনশাআল্লাহ, এটি তাদের কাছে পৌঁছাবে যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2578)


2578 - عن ابن عباس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل يتهجد قال:"اللهم! لك الحمدُ أنت قَيِّمُ السماوات والأرض ومن فيهن، ولك الحمدُ لك ملكُ السماوات والأرض ومن فيهن، ولك الحمدُ أنت نورُ السماوات والأرضِ، ولك الحمدُ أنت مالك السماوات والأرض، ولك الحمدُ أنت الحق، ووعدك الحق، ولقاءُك حق،
وقولك حق، والجنة حق والنار حق، والنبيون حق، ومحمد حق، والساعة حق. اللهم! لك أسلمتُ، وبك آمنتُ، وعليك توكلتُ، وإليك أنبتُ، وبك خاصمتُ، وإليك حاكمتُ، فاغفر لي ما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وما أسررتُ، وما أعلنتُ، أنت المقَدِّم، وأنت المؤخِّر لا إله إلا أنتَ لا إله غيرك".

قال سفيان: وزاد عبد الكريم أبو أمية:"ولا حولَ ولا قوةَ إلا باللهِ".

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1120)، ومسلم في صلاة المسافرين (769) كلاهما من حديث سفيان، عن سليمان بن أبي مسلم الأحول، عن طاوسٍ، سمع ابن عباس فذكره.

ورواه مالك في القرآن (34) عن أبي الزبير المكي، عن طاوسٍ اليماني، عن عبد الله بن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قام إلى الصلاة من جوفِ الليل يقول فذكر مثله، وفيه"أنت قيَّامُ السماوات والأرض" بدل من"قيِّم السماوات …"، وقال في آخر الحديث:"أنت إلهي لا إله إلا أنت".

ورواه مسلم (769) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك.

وهو مخرج في"المنة الكبري" (2/ 385).

وفي رواية قال ابن عباس: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في التهجد يقول بعد ما يقول: الله أكبر.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য উঠতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনিই আসমানসমূহ, যমীন এবং এগুলোর মধ্যে যা কিছু আছে তার ধারক। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আসমানসমূহ, যমীন এবং এগুলোর মধ্যে যা কিছু আছে তার রাজত্ব আপনারই। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনি আসমানসমূহ ও যমীনের জ্যোতি। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনি আসমানসমূহ ও যমীনের মালিক। আর আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। আপনিই সত্য, আপনার ওয়াদা সত্য, আপনার সাক্ষাৎ সত্য, আপনার বাণী সত্য, জান্নাত সত্য, জাহান্নাম সত্য, নবীগণ সত্য, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য এবং কিয়ামত সত্য। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছেই আত্মসমর্পণ করলাম, আপনার প্রতিই ঈমান আনলাম, আপনার উপরই ভরসা করলাম, আপনার দিকেই প্রত্যাবর্তন করলাম, আপনার পক্ষেই বিতর্কে অবতীর্ণ হলাম এবং আপনার কাছেই বিচার চাইলাম। অতএব, আপনি আমার পূর্বের ও পরের, গোপন ও প্রকাশ্য সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দিন। আপনিই অগ্রবর্তীকারী এবং আপনিই বিলম্বকারী। আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই; আপনি ব্যতীত অন্য কোনো উপাস্য নেই।"

সুফইয়ান বলেন: আব্দুল কারীম আবূ উমাইয়াহ অতিরিক্ত বলেছেন: "আর আল্লাহর সাহায্য ছাড়া পাপ থেকে বাঁচার বা পুণ্য করার কোনো ক্ষমতা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (2579)


2579 - عن عُبادة بن الصامت، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من تعارَّ من الليل فقال: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمدُ، وهو على كل شيء قدير، الحمد لله، وسبحان الله، ولا إله إلا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلا بالله، ثم قال: اللهم! اغفر لي، أو دعا، استُجيب له، فإن توضأ وصلَّى قُبلتْ صلاتُه".

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1154) عن صَدَقَة بن الفضل، أخبرنا الوليد، عن الأوزاعي، قال: حدثني عُمير بن هانئ، قال: حدثني جنادةُ بن أبي أمية، حدثني عُبادة بن الصامت فذكره.

قال البغوي:"قوله:"تعارّ" أي استيقظ من النوم، وأصلُ التعارِّ: السَّهرُ والتقلبُ على الفراش، ويقال: إن التعارَّ لا يكون إلا مع كلامٍ وصوتٍ مأخوذ من عِرار الظليم، وهو صوته""شرح السنة" (4/ 72).

وقال ابن التين: ظاهر الحديث أن معنى تعارَّ استيقظ، لأنه قال:"من تعارَّ فقال" فعطف القول على التعار".




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি রাতের বেলায় পাশ ফিরে জেগে ওঠে এবং বলে: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু, ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর, আলহামদুলিল্লাহ, ওয়া সুবহানাল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়াল্লাহু আকবার, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই। তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান। সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, আল্লাহ পবিত্র, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আল্লাহ মহান, আল্লাহর সাহায্য ছাড়া কোনো শক্তি বা সামর্থ্য নেই), এরপর সে যদি বলে: 'আল্লাহুম্মাগফির লী' (হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করে দাও), অথবা (অন্য) কোনো দোয়া করে, তবে তার দোয়া কবুল করা হয়। আর যদি সে ওযু করে এবং সালাত আদায় করে, তবে তার সালাতও কবুল করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2580)


2580 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف قال: سألت عائشة أُمَّ المؤمين: بأيّ شيء كان نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم يفتح صلاتَه إذا قام من الليل؟ قالت: كان إذا قام من الليل
افتتح صلاته:"اللهم! ربَّ جَبْرَائيل وميكائيل وإسرافيل. فاطرَ السماوات والأرض، عالمَ الغيب والشهادةِ، أنت تحكم بين عبادك فيما كانوا فيه يختلفون، اهدني لما اختُلِف فيه من الحق بإذنك إنك تهدي من تشاءُ إلى صراط مستقيم".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (770) من طرق عن عمر بن يونس، حدثنا عكرمة بن عمار، حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: নবীউল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (সালাতের জন্য) দাঁড়াতেন, তখন তিনি এই বলে সালাত শুরু করতেন: "হে আল্লাহ! জিবরাঈল, মিকাঈল ও ইসরাফীল-এর প্রতিপালক, আসমান ও যমীনের স্রষ্টা, প্রকাশ্য ও অপ্রকাশ্য সবকিছুর জ্ঞাতা! আপনিই আপনার বান্দাদের মধ্যে ফয়সালা করেন যে বিষয়ে তারা মতভেদ করে থাকে। যে সত্য বিষয়ে মতভেদ করা হয়েছে, আপনি আপনার ইচ্ছায় আমাকে সেই সত্যের দিকে পথনির্দেশ করুন। নিশ্চয়ই আপনি যাকে চান, সরল পথের দিকে পরিচালিত করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2581)


2581 - عن عاصم بن حُميد قال: سألت عائشة: بأي شيء كان يفتتح رسول الله صلى الله عليه وسلم قيام الليل؟ فقالت: لقد سألتني عن شيء ما سألني عنه أحد قبلك، كان إذا قام كبَّر عَشرًا، وحَمِدَ الله عشرًا، وسبَّح عشرًا، وهلَّل عشرًا، واستغفر عشرًا، وقال:"اللهم! اغفر لي، واهدني، وارزقني" ويتعوذ من ضيق المقام يوم القيامة.

حسن: رواه أبو داود (766)، والنسائي (1618)، وابن ماجه (1356) كلّهم من حديث زيد بن الحُباب، عن معاوية بن صالح، قال: حدثني أزهر بن سعيد، عن عاصم بن حُميد فذكره.

وإسناده حسن لأجل معاوية بن صالح بن حُدير، وثقه النسائي وغيره. وقال ابن عدي: هو عندي صدوق إلا أنه يقع في حديثه إفرادات.

وكذلك في الإسناد أزهر بن سعيد الحرازي حمصي"صدوق" كما قال الحافظ في التقريب.

وصححه ابن حبان (2602) فرواه من طريق ابن وهب، عن معاوية بن صالح به، مثله.

ورواه الإمام أحمد (25102) عن يزيد، قال: أخبرنا الأصبغ، عن ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، قال: حدثني ربيعة الجرشي قال: سألت عائشة فقلت: فذكر الحديث، إلا أنه لم يذكر"حمد الله عشرًا" وزاد بعد قوله"اللهم! اغفر لي …" عشرًا، ولم يذكر"وعافني"، وزاد بعد"اللهم! إني أعوذ بك من الضيق يوم الحساب" عشرًا.

والأصبغ هو: ابن زيد أبو عبد الله الوراق الواسطي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إلا أن ابن عدي قال في الكامل:"هذا إسناد غير محفوظ يرويه يزيد بن هارون، عن أصبغ، ولا أعلم روي عن أصبغ هذا غير يزيد بن هارون".

قلت: يزيد بن هارون حافظ ضابط من كبار شيوخ الإمام أحمد.

قال الإمام أحمد:"كان حافظًا للحديث". وقال ابن المديني:"ما رأيت أحفظ منه". وهذا الإسناد يقوي ما قبله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আসেম ইবনে হুমায়দ) বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী দিয়ে কিয়ামুল লাইল (রাতের সালাত) শুরু করতেন? তিনি বললেন: তুমি আমাকে এমন একটি বিষয়ে প্রশ্ন করেছ যা তোমার আগে আর কেউ আমাকে জিজ্ঞাসা করেনি। তিনি যখন দাঁড়াতেন, তখন দশবার তাকবীর বলতেন, দশবার আল্লাহর প্রশংসা করতেন, দশবার তাসবীহ বলতেন, দশবার তাহলীল বলতেন, দশবার ইস্তেগফার করতেন এবং বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন, আমাকে হেদায়েত দান করুন এবং আমাকে রিযিক দিন।" আর তিনি কিয়ামত দিবসে সংকীর্ণ অবস্থান (বা কঠিন স্থান) থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2582)


2582 - عن ابن عباس أنه بات ليلة عند ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم وهي خالته، قال:
فاضطجعتُ في عرض الوسادة، واضطجع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأهلُه في طولها. فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى إذا انتصف الليلُ، أو قبله بقليل أو بعده بقليل استيقظ رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلس يمسح النومَ عن وجهه بيده ثم قرأ العشر الآيات الخواتم من سورة آل عمران وهي قوله تعالى {إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِأُولِي الْأَلْبَابِ (190)} إلى قوله تعالى: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اصْبِرُوا وَصَابِرُوا وَرَابِطُوا وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ}. [سورة آل عمران: 190 - 200].

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (11) عن مخرمة بن سليمان، عن كريب مولى ابن عباس به في حديث طويل سيأتي في باب عدد صلاة الليل.

ورواه البخاي في الوضوء (183) عن إسماعيل (وهو ابن أبي أويس)، ومسلم في صلاة المسافرين (763/ 182) عن يحيى بن يحيى كلاهما عن مالك به.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী এবং তাঁর খালা মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এক রাতে অবস্থান করেছিলেন। তিনি বলেন: আমি বালিশের আড়াআড়ি দিকে শুয়ে পড়লাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর পরিবারবর্গ লম্বালম্বি দিকে শুলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমালেন। যখন মধ্যরাত হলো, অথবা তার সামান্য আগে বা সামান্য পরে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাগ্রত হলেন এবং বসে গেলেন। তিনি নিজের হাত দিয়ে তাঁর মুখমণ্ডল থেকে ঘুমের চিহ্ন মুছলেন। এরপর তিনি সূরা আল ইমরানের শেষ দশটি আয়াত তিলাওয়াত করলেন, যা আল্লাহ তা’আলার বাণী: {নিশ্চয় আসমান ও যমীন সৃষ্টিতে, এবং রাত ও দিনের পরিবর্তনে জ্ঞানীদের জন্য নিদর্শনাবলী রয়েছে (১৯০)} থেকে শুরু করে আল্লাহ তা’আলার বাণী: {হে মুমিনগণ! তোমরা ধৈর্য ধারণ কর, ধৈর্যে প্রতিযোগিতা কর এবং সর্বদা প্রস্তুত থাকো আর আল্লাহকে ভয় কর, যাতে তোমরা সফল হতে পারো (২০০)} পর্যন্ত (সূরা আল ইমরান: ১৯০-২০০)।









আল-জামি` আল-কামিল (2583)


2583 - عن علي بن أبي طالب أخبر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم طرقَه وفاطمةَ بنتَ النبي صلى الله عليه وسلم ليلةً فقال:"ألا تُصلِّيان؟" فقلت: يا رسول الله! أنفسنا بيد الله، فإذا شاء أن يَبْعَثَنا بَعَثَنا. فانصرف حين قلت ذلك ولم يرجع إليَّ شيئًا، ثم سمعتُه وهو مُوَلٍّ يضرب فخذه وهو يقول: {وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا} [سورة الكهف: 54].

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1127)، ومسلم في صلاة المسافرين (775) كلاهما من حديث الزهري، عن علي بن الحسين، أن حسين بن علي أخبره، عن علي بن أبي طالب فذكره.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বর্ণনা করেন যে, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমার নিকট আসলেন এবং বললেন: "তোমরা কি সালাত আদায় করবে না?" আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের প্রাণ তো আল্লাহর হাতে। যখন তিনি আমাদের জাগাতে চাইবেন, তখনই জাগিয়ে দেবেন।' আমি যখন এই কথা বললাম, তখন তিনি ফিরে গেলেন এবং আমাকে আর কিছু বললেন না। এরপর তিনি যখন ফিরে যাচ্ছিলেন, তখন আমি তাঁকে শুনতে পেলাম যে, তিনি তাঁর উরুতে হাত মারছেন এবং বলছেন: "মানুষ সবকিছুর চেয়ে বেশি তর্কপ্রিয়।" [সূরা আল-কাহফ: ৫৪]।









আল-জামি` আল-কামিল (2584)


2584 - عن ابن عمر قال: كان الرجل في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رأى رُؤيا قصَّها على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فتمنَّيتُ أن أرى رؤيا فأقصها على رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكنت غلامًا شابًا، وكنت أنام في المسجد على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فرأيتُ في النوم كأنَّ ملكين أخذاني فذهبا بي إلى النار، فإذا هي مطوية كطيّ البئر، وإذا لها قرنان، وإذا فيها أناس قد عرفتُهم فجعلت أقول: أعوذ بالله من النار. قال: فلقينا ملك آخر فقال لي: لَم تُرَعْ. فقصصتُها على حفصة، فقصَّتْها حفصةُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"نعم الرجل عبد الله لو كان يُصلي من الليل".

فكان بعدُ لا ينام من الليل إلا قليلًا.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1121، 1122)، ومسلم في كتاب فضائل الصحابة (2479) كلاهما من طريق عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه،
فذكره ولفظهما سواء. إلا أن مسلمًا كرر: أعوذ بالله من النار، ثلاث مرات. وكذا عند البخاري أيضًا (3738) والقائل:"فكان بعدُ لا ينام من النيل إلا قليلًا" هو سالم.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় কোনো ব্যক্তি যখন কোনো স্বপ্ন দেখত, তখন সে তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বর্ণনা করত। তাই আমিও ইচ্ছা করলাম যে, আমিও যেন একটি স্বপ্ন দেখি এবং তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বর্ণনা করি। আমি তখন একজন যুবক বালক ছিলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যামানায় আমি মসজিদে ঘুমাতাম। তখন আমি স্বপ্নে দেখলাম যে, যেন দুইজন ফেরেশতা আমাকে ধরে জাহান্নামের দিকে নিয়ে গেলেন। দেখলাম, জাহান্নামটি কূয়ার মতো ভাঁজ করা (বা চারদিক দেওয়াল দিয়ে ঘেরা), আর তার দুটো শিং (বা কিনার) রয়েছে। আর তাতে এমন কিছু লোক ছিল যাদেরকে আমি চিনতে পারলাম। তখন আমি বলতে লাগলাম: আমি আল্লাহর কাছে জাহান্নাম থেকে আশ্রয় চাই। তিনি (ইবনু উমর) বললেন, অতঃপর আমাদের সাথে অন্য একজন ফেরেশতার সাক্ষাৎ হলো। তিনি আমাকে বললেন: ভয় করো না। এরপর আমি স্বপ্নটি হাফসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে বর্ণনা করলাম। আর হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বর্ণনা করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আব্দুল্লাহ কতোই না উত্তম লোক, যদি সে রাতে সালাত (তাহাজ্জুদ) আদায় করত।”

এরপর থেকে তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু উমর) রাতে খুব কমই ঘুমাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2585)


2585 - عن أم سلمة قالت: استيقظ النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فقال:"سبحان الله ماذا أُنزِل الليلة من الفِتن، وماذا فُتح من الخزائن، من يُوقِظُ صواحبَ الحُجُرات؟ يا رُبَّ كاسيةٍ في الدنيا، عاريةٍ في الآخرةِ".

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1126) عن ابن مقاتل، حدثنا عبد الله (هو ابن المبارك)، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن هند بنت الحارث، عن أم سلمة فذكرتِ الحديث.

وهذا الحديث رواه مالك في الموطأ في كتاب اللباس (8) عن يحيى بن سعيد، عن ابن شهاب الزهري مرسلًا.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুম থেকে জেগে উঠলেন এবং বললেন: "সুবহানাল্লাহ! আজ রাতে কতই না ফিতনা (বিপর্যয়) অবতীর্ণ করা হয়েছে এবং কতই না ভান্ডার খুলে দেওয়া হয়েছে! হুজরাবাসিনীদের (তাঁর স্ত্রীদের) কে জাগাবে? হায়, কতই না এমন নারী আছে যারা দুনিয়াতে কাপড় পরিহিতা, কিন্তু আখিরাতে উলঙ্গিনী হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2586)


2586 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصيام بعد رمضان شهر الله المحرم، وأفضل الصلاة بعد الفريضة صلاةُ الليل".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1163) عن قتيبة بن سعيد، ثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، عن حُميد بن عبد الرحمن الحِمْيري، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমজানের পর সর্বোত্তম সিয়াম হলো আল্লাহর মাস মুহাররমের সিয়াম, আর ফরয সালাতের পর সর্বোত্তম সালাত হলো রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2587)


2587 - عن أبي سعيد وأبي هريرة قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أيقظ الرجلُ أهلَه من الليل، فصلَّيا، أو صلى ركعتين جميعًا كتبا في الذاكرين والذاكرات".

صحيح: رواه أبو داود (1309)، وابن ماجه (1335) كلاهما من طريق شيبان أبي معاوية، عن الأعمش، عن علي بن الأقمر، عن الأغرِّ، عن أبي سعيد وأبي هريرة فذكر الحديث.

إسناده صحيح والأغر هو: أبو مسلم المديني من رجال مسلم، وشيبان هو: ابن عبد الرحمن التميمي مولاهم أبو معاوية البصري من رجال الجماعة.

قال أبو داود: ولم يرفعه ابن كثير، ولا ذكر أبا هريرة جعله كلام أبي سعيد.

قلت: ومن رفع معه زيادة.

وقد صحّحه ابن حبان (2568)، والحاكم (1/ 316)، وروياه من هذا الطريق إلا أن الحاكم وهم في قوله: على شرط الشيخين، لأن الأغر لم يرو عنه البخاري إلا إن قصد غير الصحيح، فإنّ البخاري روى عنه في الأدب المفرد، وأما مسلم فأخرج عنه، إذًا هو على شرط مسلمٍ وحده، وقد أعِلَّ بأنه موقوف، ولكن الصواب أنه مرفوع، لأن من رفع عنده زيادة علم، فيجب قبولها لأنه ثقة.




আবূ সাঈদ ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো ব্যক্তি রাতে তার স্ত্রীকে (বা পরিবারের সদস্যদের) জাগিয়ে তোলে এবং তারা দু’জন সালাত আদায় করে, অথবা উভয়ে একত্রে দু’রাকাত সালাত আদায় করে, তখন তাদের উভয়কে আল্লাহকে অধিক স্মরণকারী পুরুষ ও নারীর (আল-যাকিরীন ওয়াল-যাকিরাত) অন্তর্ভুক্ত করা হয়।