হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2601)


2601 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من ذَكَرٍ ولا أُنثى إلا وعلى رأسه جرير معقودٌ ثلاثَ عُقَدٍ حين يرقُد، فإن استيقظَ فذكر اللهَ انحلتْ عقدةٌ، فإذا قام فتوضأَ انحلتْ عقدةٌ، فإذا قام إلى الصلاة انْحَلَّتْ عُقَدُه كلُّها".

صحيح: رواه الإمام أحمد (14387) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه ابن خزيمة (1133) وعنه ابن حبان (2554) من طريق حفص بن غياث، عن الأعمش وفيه:"على رأسه جرير معقود حين يرقُد، فإن استيقظ فذكر الله انحلت عقدة، فإذا قام فتوضأ وصلَّى انحلت العُقد".
ورواه ابن خزيمة من طريق شيان، عن الأعمش، وزاد فيه: وأصبح خفيفًا".

ورواه أبو يعلى (2298) من طريق عبد الله بن نمير، عن الأعمش وزاد فيه:

"وأصبح نشطًا قد أصاب خيرًا، وإن هو نام لا يذكر الله أصبح عليه عقده ثقيلا".

ورواه ابن حبان (2556) من طريق عيسى بن يونس، عن الأعمش وزاد فيه:

"وإن أصبح ولم يذكر الله أصبح وعُقَدُه عليه، وأصبح ثقيلًا كسلانًا لم يُصب خيرًا".

وللحديث طرق أخرى عن الأعمش والتي ذكرتها هي أصحها.

قال ابن خزيمة:"الجرير - الحبل".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো পুরুষ বা নারী নেই, যার মাথার ওপর তিনটি গিঁট দেওয়া একটি দড়ি বাঁধা থাকে না, যখন সে ঘুমায়। অতঃপর যখন সে জাগ্রত হয়ে আল্লাহকে স্মরণ করে, তখন একটি গিঁট খুলে যায়। আর যখন সে ওঠে এবং ওযু করে, তখন আরেকটি গিঁট খুলে যায়। আর যখন সে সালাতের জন্য দাঁড়ায়, তখন তার সকল গিঁট সম্পূর্ণরূপে খুলে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (2602)


2602 - عن عقبة بن عامر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"رجلان من أمتي يقوم أحدهما من الليل يعالج نفسه إلى الطهور، وعليه عُقَدٌ فيتوضأ، فإذا وضَّأ يديه انحلَّتْ عُقدة، وإذا وضَّأ وجْهَه انحلَّتْ عقدةٌ، وإذا مسح برأسه انحلَّتْ عقدةٌ، وإذا وضَّأ رجليه انحلت عقدةٌ. فيقول الله للذين وراء الحجاب: انظروا إلى عبدي هذا يعالج نفسَه يسألني، ما سألني عبدي فهو له".

صحيح: رواه الإمام أحمد (17790) عن هارون، قال: حدثنا عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، أن أبا عُشَّانة حدَّثه، أنه سمع عقبة بن عامر فذكر الحديث وصحّحه ابن حبان (2555) ورواه عن طريق ابن وهب به مثله.

وسبق تخريجه في كتاب الوضوء، باب ما جاء في ثواب الطهور.




উকবা ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আমার উম্মতের দু’জন লোক; তাদের একজন রাতের বেলা জাগ্রত হয় এবং পবিত্রতা অর্জনের জন্য নিজের আত্মার সাথে সংগ্রাম করে, আর তার ওপর কিছু বন্ধন (গিঁট) থাকে। অতঃপর সে ওযু করে।

যখন সে তার উভয় হাত ধোয়, তখন একটি গিঁট খুলে যায়; যখন সে তার মুখ ধোয়, তখন আরেকটি গিঁট খুলে যায়; যখন সে তার মাথা মাসেহ করে, তখন আরেকটি গিঁট খুলে যায়; এবং যখন সে তার উভয় পা ধোয়, তখন আরও একটি গিঁট খুলে যায়।

তখন আল্লাহ্ পর্দার অন্তরালে থাকা ফেরেশতাদেরকে বলেন: তোমরা আমার এই বান্দার দিকে দেখো, সে নিজের আত্মার সাথে সংগ্রাম করে আমার কাছে কিছু চাচ্ছে। আমার বান্দা আমার কাছে যা চেয়েছে, তা তার জন্য রয়েছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2603)


2603 - عن السائب بن يزيد أن شُريحًا الحضرمي ذُكر عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"لا يتوسد القرآن".

صحيح: رواه النسائي (1873) عن سويد بن نصر، قال: حدثنا عبد الله، قال: أنبأنا يونس، عن الزهري، قال: أخبرني السائب بن يزيد، فذكره.

رواه أيضًا أحمد (15724)، والطبراني في الكبير (7/ 176) كلاهما من طريق عبد الله، وهو ابن المبارك به ولفظ أحمد:"ذاك رجل لا يتوسّد القرآن". وإسناده صحيح.

والذي قيل إنه:"مخرمة بن شريح" فهو وهم كما قال الحافظ في الإصابة (2/ 147)؛ لأنه رواه الطبراني من طريق النعمان بن راشد، يحدث عن الزهري، والنعمان بن راشد سيء الحفظ، وله أسانيد أخرى إلا أنها كلها معلولة والصواب أنه: شريح الحضرمي، وشُريح الحضرمي هذا كان من أفضل أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كما قال ابن عبد البر في الاستيعاب ثم ذكر الحديث.

وقوله:"لا يتوسَّد القرآنَ" بنصب القرآن على المفعولية، معناه أنه لا يجعل القرآن تحت رأسه فينام عليه، بل يقوم قيام الليل بما معه من القرآن، فيداوم على قراءته.
وهذا الذي فهمه أيضًا النسائي فأخرج الحديث في السنن الكبرى (1307) في باب الحثّ على قيام الليل. وفيه ذمّ لمن جعل القرآن كالوسادة، وغفل عن قيام الليل والتهجد.




সায়িব ইবন ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শুরাইহ আল-হাদরামিকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: "সে যেন কুরআনকে বালিশ না বানায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2604)


2604 - عن سعد بن هشام بن عامر أنه أراد أن يغزُوَ في سبيل الله، فَقَدِم المدينة، وأراد أن يبيع عقارًا بها، فيجعله في السلاح والكُراع، ويُجاهد الرُّوم حتى يموتَ، فلما قدِم المدينة لَقِيَ أُناسًا من أهل المدينة، فنَهوه عن ذلك، وأخبروه أن رَهْطًا سِتَّةً أرادوا ذلك في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فنَهاهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وقال: أليس لكم فيَّ أسوةٌ؟ فلما حدَّثوه بذلك راجع امرأته - وقد كان طلَّقها - وأشهد على رَجْعَتِها فأتى ابن عباسٍ، فسأله عن وِتْر رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال ابنُ عباسٍ: ألا أدُلُّك على من هو أعلم أهل الأرض بوتر رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: من؟ قال: عائشة، فَأتِها فسَلْها، ثم أتِني فَأَخبرني بردِّها عليك. قال: فانطلقتُ إليها، فأتيتُ على حكيم بن أفْلحَ، فاسْتَلْحَقْتُه إليها، فقال: ما أنا بقارِبِها، لأني نهيتُها أن تقولَ في هاتين الشِّيعَتَين شيئًا، فأبَتْ فيهما إلَّا مُضيًّا، قال: فأقسمتُ عليه فجاء، فانطلقنا إلى عائشةَ، فاستأذَنَّا عليها، فأذِنَت لنا، فدخلنا عليها، فقالتْ: حكيمٌ؟ فَعَرَفَتْه، فقال: نعم، فقالت: مَنْ معك؟ قال: سعدُ بنُ هشام. قالت: مَنْ هشام؟ قال: ابنُ عامر، فتَرَحَّمَتْ عليه، وقالت خيرًا - قال قتادة: وكان أصيبَ يوم أُحُدٍ - فقلت: يا أمَّ المؤمنين! أنبئيني عن خُلُق رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالت: ألسْتَ تقرأ القرآنَ؟ قلت: بلى. قالت: فإن خُلُقَ نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم كان القرآنَ قال: فهَمَمْتُ أن أقومَ، ولا أسألَ أحدًا عن شيء حتى أموتَ، ثم بدا لي، فقلت: أنبئيني عن قيام رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: ألستَ تقرأ: {يَاأَيُّهَا الْمُزَّمِّلُ (1)}؟ قلت: بلى، قالت: فإن الله عز وجل افترض القيام في أوّل هذه السّورة، فقام نبي الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حولًا، وأمسك الله خاتمتها اثني عشر شهرًا [في السماء]، حتى أنزل الله عز وجل في آخر هذه السورة التخفيف، فصار قيام الليل تطوعًا بَعْدَ فريضةٍ، قال: قلت: يا أم المؤمنين! أنبئيني عن وِتْرِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: كنا نُعِدُّ له سِواكَه، وطَهورَه، فيبعثه الله متى شاء أَنْ يبعثَه من الليل، فيتسوَّك ويتوضأ، ويصلِّي تسع ركعات، لا يجلس فيها إلا في الثامنة، فيذكُر الله ويحمدُه [ويَدْعوه، ثم ينهض ولا يسلِّم، ثم يقومُ فيصلِّي التاسعة، ثم يقعد فيذكر الله ويحمدُه ويدعوه]، ثم يسلم تسليمًا يسمعنا، ثم يصلِّي ركعتين بعد ما يسلِّمُ وهو
قاعد، فتلك إحدى عشرَةَ ركعةً يا بُنيَّ! فلما أسَنَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وأخذه اللحمُ، أوتر بسبع، وصنع في الركعتين مثل صنيعه الأول، فتلك تسعٌ يا بنيّ! وكان نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم إذا صلى صلاةً أحبَّ أن يداوم عليها، وكان إذا غلبه نومٌ أو وَجَع عن قيام الليل صلَّى من النهار ثنتي عشرة ركعة، ولا أعلم نبيّ الله صلى الله عليه وسلم قرأ القرآن كلَّه في ليلة، ولا صلَّى ليلة إلى الصبح، ولا صام شهرًا كاملًا غير شهر رمضان، قال: فانطلقت إلى ابن عباس فحدَّثْتُه بحديثها، فقال: صَدقَتْ، ولو كنتُ أقْرَبُها، أو أدخلُ عليها، لأتيتُها حتى تُشافِهَني به، قال: قلت: لو علمتُ أنك لا تدخلُ عليها ما حدَّثْتُك حديثها".

وفي رواية قال:"انطلقتُ إلى عبد الله بن عباس، فسألتُه عن الوتر؟ - وساق الحديث بقصته - وقال فيه: قالت: مَنْ هشام؟ قلتُ: ابنُ عامر، قالت: نِعْم المرء كان عامر، أصيب يومَ أُحُدٍ".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) عن محمد بن المثنى العنزي، حدثنا محمد بن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، عن زُرارة، أن سعد بن هشام بن عامر أراد فذكره.

ورواه أبو داود (1343) من حديث: يحيى بن سعيد، عن سعيد به مثله إلا أنه قال فيه: كان يصلِّي ثمان ركعات، لا يجلس فيهن إلا عند الثامنة، فيجلس، فيذكر الله عز وجل، ثم يدعو، ثم يُسلم تسليمًا يسمعنا، ثم يُصلي ركعتين وهو جالس بعد ما يُسلم، ثم يصلي ركعة. فتلك إحدى عشرة ركعة.

والذي في صحيح مسلم: لا يُسلم في الثامنة بل يُصلي التاسعة، ثم يسلم، ثم يصلي ركعتين وهو جالس، فتلك إحدى عشرة ركعة. فلعله فعل هذا مرةً وتلك أُخرى.

وقولها: ثم يصلي ركعتين بعد ما يسلم وهو جالس: لعله صلى الله عليه وسلم فعل مرة أو مرتين، أو مرات لبيان جواز الصلاة بعد الوتر، وبيان جواز النفل جالسًا وبه قال بعض أهل العلم، وعند الإمام أحمد رواية.

وأما جمهور السلف فذهبوا إلى أن آخرَ صلاة الليل الوترُ لما تواترت الروايات في الصّحيحين وغيرهما عن عائشة وغيرها من الصحابة الآخرين بأن آخر صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل كان وترًا، كما ثبت من أمره صلى الله عليه وسلم أيضًا:"اجعلوا آخر صلاتكم في الليل وترًا" وسوف يأتي مزيد من الفائدة.




সা'দ ইবনে হিশাম ইবনে আমির থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর রাস্তায় জিহাদে বের হওয়ার ইচ্ছা পোষণ করলেন। তিনি মদীনায় আগমন করলেন এবং সেখানে নিজের স্থাবর সম্পত্তি বিক্রি করে সেই অর্থ অস্ত্রশস্ত্র ও আরোহী পশুর জন্য ব্যয় করতে চাইলেন এবং আমৃত্যু রোমকদের বিরুদ্ধে জিহাদ করতে চাইলেন। যখন তিনি মদীনায় এলেন, তখন মদীনার কিছু লোকের সাথে তার দেখা হলো, যারা তাকে এই কাজ থেকে বিরত থাকতে বললেন। তারা তাকে জানালেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জীবদ্দশায় ছয়জন লোকের একটি দলও একই ইচ্ছা পোষণ করেছিল, কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের নিষেধ করে বলেছিলেন: "আমার মধ্যে কি তোমাদের জন্য উত্তম আদর্শ নেই?"

যখন তারা তাকে এই বিষয়ে অবহিত করলেন, তখন তিনি তার স্ত্রীকে ফিরিয়ে নিলেন—যাকে তিনি (জিহাদে যাওয়ার উদ্দেশ্যে) তালাক দিয়েছিলেন—এবং তাকে ফিরিয়ে নেওয়ার জন্য সাক্ষী রাখলেন।

এরপর তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিতর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি কি তোমাকে এমন ব্যক্তির সন্ধান দেবো না, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিতর সালাত সম্পর্কে পৃথিবীর সবচেয়ে জ্ঞানী?" তিনি বললেন: "কে?" তিনি বললেন: "আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তুমি তাঁর কাছে যাও এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করো। এরপর আমার কাছে এসে তাঁকে তোমার কী জবাব দিয়েছেন, তা আমাকে জানাও।"

তিনি (সা'দ) বললেন: আমি তাঁর (আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) দিকে রওয়ানা হলাম। আমি হাকীম ইবনে আফলাহর কাছে এসে তাঁকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যেতে অনুরোধ করলাম। তিনি বললেন: "আমি তাঁর কাছে যাবো না। কারণ আমি তাঁকে এই দুটি দলের (অর্থাৎ যুদ্ধরত দলগুলো) ব্যাপারে কোনো কথা বলতে বারণ করেছিলাম, কিন্তু তিনি (আমার বারণ সত্ত্বেও) ঐ বিষয়ে তার বক্তব্য পেশ করা থেকে বিরত হননি।" সা'দ বললেন: "আমি তাঁকে আল্লাহর কসম দিলাম।" তখন তিনি এলেন। এরপর আমরা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম এবং অনুমতি চাইলাম। তিনি আমাদের অনুমতি দিলেন, আর আমরা তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি বললেন: "হাকীম?"—তিনি তাকে চিনতে পারলেন। হাকীম বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তোমার সাথে কে?" হাকীম বললেন: "সা'দ ইবনে হিশাম।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "কে হিশাম?" তিনি বললেন: "ইবনে আমির।" তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জন্য রহমত চাইলেন এবং তাঁর সম্পর্কে উত্তম কথা বললেন। (কাতাদা বললেন: তিনি ওহুদের দিনে শহীদ হয়েছিলেন)।

আমি বললাম: "হে উম্মুল মু'মিনীন! আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চরিত্র সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি বললেন: "তুমি কি কুরআন পড়ো না?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহর নবীর চরিত্র ছিল কুরআন।"

সা'দ বললেন: তখন আমি উঠে যেতে চাইলাম এবং ভাবলাম, মৃত্যু পর্যন্ত আর কারো কাছে কিছু জিজ্ঞাসা করব না। কিন্তু পরে আবার ইচ্ছা হলো, তাই আমি বললাম: "আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কিয়াম (রাত্রিকালীন সালাত) সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি বললেন: "তুমি কি 'ইয়া আইয়্যুহাল মুজ্জাম্মিল' (সূরা মুজ্জাম্মিল)-এর প্রথম অংশ পড়ো না?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা এই সূরার শুরুতে কিয়ামুল লাইলকে ফরয করেছিলেন। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ এক বছর ধরে কিয়ামুল লাইল করলেন। আর আল্লাহ তা'আলা এই সূরার শেষাংশ বারো মাস ধরে (আসমানে) আটকে রাখলেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তা'আলা এই সূরার শেষাংশে (ফরয থেকে) লঘুতা (হালকা করার বিধান) নাযিল করলেন। সুতরাং, ফরয হওয়ার পর তাহাজ্জুদ সালাত নফল হয়ে গেল।"

সা'দ বললেন: আমি বললাম: "হে উম্মুল মু'মিনীন! আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিতর সালাত সম্পর্কে অবহিত করুন।" তিনি বললেন: আমরা তাঁর জন্য মেসওয়াক ও উযূর পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। অতঃপর আল্লাহ রাতের যে অংশে তাঁকে জাগাতে চাইতেন, তিনি জাগিয়ে দিতেন। তিনি মেসওয়াক করতেন, উযূ করতেন এবং নয় রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি অষ্টম রাকাত ছাড়া বসতেন না। অষ্টম রাকাতে তিনি আল্লাহকে স্মরণ করতেন, তাঁর প্রশংসা করতেন [এবং তাঁর কাছে দু'আ করতেন। অতঃপর তিনি সালাম না ফিরিয়ে উঠে যেতেন, তারপর দাঁড়িয়ে নবম রাকাত আদায় করতেন, অতঃপর বসতেন এবং আল্লাহকে স্মরণ করতেন, তাঁর প্রশংসা করতেন ও দু'আ করতেন], এরপর আমাদের শোনানোর মতো করে সালাম ফিরিয়ে সালাত শেষ করতেন। তারপর তিনি বসে দু'রাকাত সালাত আদায় করতেন। হে আমার বৎস! এই মোট এগারো রাকাত।

যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বৃদ্ধ হলেন এবং তাঁর শরীর ভারী হলো, তখন তিনি সাত রাকাত বিতর আদায় করতেন এবং (সালামের পর) বসে দু'রাকাত সালাত আদায় করতেন, যেমন তিনি আগে করতেন। হে আমার বৎস! এই মোট নয় রাকাত।

আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো সালাত আদায় করলে তাতে নিয়মিততা বজায় রাখতে পছন্দ করতেন। আর রাতের সালাত আদায়ে যদি ঘুম বা ব্যথা তাঁকে পরাভূত করত, তবে তিনি দিনের বেলায় বারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। আমি জানি না যে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো এক রাতে সম্পূর্ণ কুরআন পাঠ করেছেন, বা কোনো এক রাত ভোর পর্যন্ত সালাত আদায় করেছেন, অথবা রমযান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাস পূর্ণ রোযা রেখেছেন।

সা'দ বললেন: এরপর আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁর কাছে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা পেশ করলাম। তিনি বললেন: "তিনি সত্য বলেছেন। যদি আমি তাঁর কাছে যাওয়ার মতো নিকটবর্তী হতাম বা তাঁর কাছে প্রবেশ করার অনুমতি পেতাম, তবে আমি তাঁর কাছে যেতাম, যেন তিনি এই কথাগুলো আমার মুখোমুখি হয়ে আমাকে বলতে পারেন।" সা'দ বললেন: "আমি বললাম: যদি আমি জানতাম যে আপনি তাঁর কাছে প্রবেশ করতে পারবেন না, তবে আমি আপনাকে তাঁর বর্ণনা জানাতাম না।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি বললেন: "আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁকে বিতর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম।" — এরপর তিনি সম্পূর্ণ ঘটনা বর্ণনা করলেন। তাতে তিনি বললেন: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "কে হিশাম?" আমি বললাম: "ইবনে আমির।" তিনি বললেন: "আমির কতই না উত্তম লোক ছিলেন! তিনি ওহুদের দিন শহীদ হয়েছিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2605)


2605 - عن ابن عباس قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي من اللَّيل في بُرْدٍ له حضرمي متوشِّحًا به، ما عليه غيره.

حسن: أخرجه الإمام أحمد (2384) عن يعقوب، ثنا أبي، عن ابن إسحاق حدّثني سلمة بن
كُهَيل الحضرمي، ومحمد بن الوليد بن نويفع مولى آل الزبير، كلاهما حدّثني عن كُرَيبٍ مولى عبد الله بن عبَّاسٍ، عن عبد الله بن عبَّاسٍ فذكره.

وإسناده حسن لأجل ابن إسحاق؛ فإنَّه قد صرَّح بالتحديث، وهو صدوق.

وقد صحّحه ابن حبَّان (2570) ورواه من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه بهذا الإسناد، ومحمد بن الوليد بن نويفع"مقبول" لأنه توبع.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি রাতে তাঁর একটি হাদরামি চাদর পরিধান করে সালাত (নামাজ) আদায় করছিলেন, তা ছাড়া তাঁর গায়ে আর কিছু ছিল না।









আল-জামি` আল-কামিল (2606)


2606 - عن مسروق قال: سألت عائشة رضي الله عنها: أي العمل كان أحبَّ إلى النبي صلى الله عليه وسلم؟ قالت: الدائم، قلت: متى كان يقوم؟ قالت: إذا سمع الصارخَ قام فصَلَّى.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1132)، ومسلم في صلاة المسافرين (741) كلاهما من طريق أبي الأحوص، عن الأشعث، عن أبيه، عن مسروق فذكره. ولفظهما سواء.

قوله:"الصارخ" قال النووي:"هنا الديك باتفاق العلماء، قالوا: سمي بذلك لكثرة صياحه". انتهى.

وقال الحافظ:"الصرخة - الصيحة الشديدة، وجرت العادة أن الديك يصيح عند نصف الليل غالبًا قاله محمد بن ناصر".

قال ابن التين:"وهو موافق لقول ابن عباس: نصف الليل أو قبله بقليل أو بعده بقليل".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (মাসরূক বলেন,) আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে সবচেয়ে প্রিয় আমল কোনটি ছিল? তিনি বললেন: সর্বদা (নিয়মিতভাবে) করা আমল। আমি জিজ্ঞেস করলাম: তিনি কখন (নামাযের জন্য) দাঁড়াতেন? তিনি বললেন: যখন তিনি উচ্চস্বরে আহ্বানকারীকে (মোরগের ডাক) শুনতেন, তখনই তিনি উঠে দাঁড়াতেন এবং সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2607)


2607 - عن عائشة قالت: ما أَلْفاهُ السَّحَرُ عِنْدي إلَّا نائمًا - تعني النبي صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1133) عن موسى بن إسماعيل، قال: حدثنا إبراهيم بن سعد، قال: ذكر أبي، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرت مثله. كذا قال:"ذكر أبي".

ورواه أبو داود (1318) عن أبي توبة، عن إبراهيم بن سعد، عن أبيه فذكر مثله. وبهذا انتفت شبهة الانقطاع، ورواه مسلم في صلاة المسافرين (742) من طريق مسعر، عن سعد، عن أبي سلمة عنها قالت: ما ألْفي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم السحرُ الأعلى في بيتي، أو عندي إلا نائمًا.

قوله: السحر الأعلى: هو من آخر الليل ما قبيل الصبح

وقوله: ما ألفاه - بالفاء - أي ما وجده.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাহার (ভোররাতের শেষ প্রহর) তাঁকে [নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে] আমার নিকট ঘুমন্ত অবস্থাতেই পেত।









আল-জামি` আল-কামিল (2608)


2608 - عن الأسود بن يزيد قال: سألت عائشة رضي الله عنها: كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالليل؟ قالت: كان ينامُ أَوَّلَه، ويُحيي آخره، ثم إن كانت له حاجة إلى أهله قضى حاجته، ثم ينام. فإذا كان عند النداء الأول وَثَبَ فأفاض عليه الماء، وإن لم يكن جُنبًا توضأ وُضوءَ الرجلِ للصَّلاةِ ثم صلَّى الركعتين.

وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي من الليل حتى يكون آخر صلاته الوتر.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (739) من طريق أبي إسحاق، قال: سألت الأسود بن يزيد عما حدَّثته عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, (আল-আসওয়াদ ইবনে ইয়াযীদ তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলেন:) রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের প্রথমভাগে ঘুমাতেন এবং শেষভাগ ইবাদতে জাগিয়ে রাখতেন। এরপর যদি তাঁর স্ত্রী-পরিজনদের প্রতি কোনো প্রয়োজন থাকত, তিনি তা পূর্ণ করতেন, তারপর ঘুমাতেন। যখন প্রথম আযানের সময় আসত, তখন তিনি উঠে পড়তেন এবং নিজের ওপর পানি ঢালতেন (গোসল করতেন)। আর যদি তিনি জুনুবী (নাপাক) না হতেন, তবে সালাতের জন্য পুরুষের ন্যায় ওযু করতেন, তারপর দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে সালাত আদায় করতেন, এমনকি তাঁর শেষ সালাতটি বিতর হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (2609)


2609 - عن عائشة قالت: إنْ كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليوقظه الله عز وجل بالليل، فما يجيءُ السَّحَر حتى يفرغ من حزبه.

حسن: رواه أبو داود (1316) عن حسين بن يزيد الكوفيّ، حدّثنا حفص، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل حسين بن يزيد الكوفيّ وهو الطّحّان، روى عنه جمع، وهو من شيوخ أبي داود، وأخرج عنه مسلم في خارج"الصّحيح"، وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 188) فمثله يُحسَّن حديثه إلا أن أبا حاتم ليّنه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআ'লা রাতের বেলায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জাগ্রত করে দিতেন। অতঃপর সাহার (ভোরের পূর্বমুহূর্ত) আসার আগেই তিনি তাঁর (নৈশ ইবাদতের) অংশটুকু শেষ করে ফেলতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2610)


2610 - عن أنس قال: ما كُنَّا نشاءُ أن نرى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل مصلِّيًا إلا رأيناه، ولا نشاءُ أن نراه نائمًا إلا رأيناه.

صحيح: رواه النسائي (1628) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: حدثنا يزيد، عن حُميد، عن أنس فذكره.

وإسناده صحيح وهذا مختصر، وأصله في صحيح البخاري في التهجد (1141) عن حُميد أنه سمع أنسًا يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُفطر من الشهر حتى نظنَّ أن لا يصوم منه، ويصوم حتى نظن أن لا يُفطر منه شيئًا، وكان لا نشاءُ أن نراه من الليل مُصليًا إلا رأيته، ولا نائمًا إلا رأيته.

رواه عن عبد العزيز بن عبد الله، قال: حدثني محمد بن جعفر، عن حُميد فذكره.

قال البخاري:"تابعه سليمان وأبو خالد الأحمر، عن حُميد".

قلت: وأما حديث أبي خالد الأحمر فرواه في الصوم (1973) وسيأتي في كتاب الصوم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখনই রাতের বেলা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে সালাত আদায়রত অবস্থায় দেখতে চাইতাম, তখনই তাঁকে দেখতে পেতাম। আর যখনই তাঁকে ঘুমন্ত অবস্থায় দেখতে চাইতাম, তখনই তাঁকে দেখতে পেতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2611)


2611 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: قلت وأنا في سفر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم: والله! لأرقبنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لصلاة حتى أرى فِعلَه، فلما صلى صلاة العشاء وهي العتمة اضطجع هويًّا من الليل، ثم استيقظ فنظر في الأفق فقال: {رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَذَا بَاطِلًا .. }. حتى بلغ: {إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ الْمِيعَادَ} [سورة آل عمران: 191 - 194) ثم أهوى رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى فراشه، فاستلَّ منه سواكًا، ثم أفرغ في قدح من إداوة عنده ماءً، فاستنَّ، ثم قام فصَلَّى حتى قلت: قد صلى قدر ما نام، ثم اضطجع حتى قلت: قد نام قدر ما صلى، ثم استيقظ ففعل كما فعل أوَّل مرّة، وقال مثل ما قال: ففعل رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث مرات قبل الفجر.

صحيح: رواه النسائي في قيام الليل (1627) عن محمد بن مسلمة، حدثنا ابن وهب، عن
يونس، عن ابن شهاب، قال: حدثني حُميد بن عبد الرحمن بن عوف أن رجلًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال فذكره.

وأخرجه أيضًا في عمل اليوم والليلة (307) وفي السنن الكبرى (10066) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكيم، عن شُعيب، قال: حدثنا الليث، قال: حدثني خالد، عن ابن أبي هلال، عن الأعرج، قال: أخبرني حُميد بن عبد الرحمن، به مثله.

وإسناده صحيح. وجهالة الصحابي لا تضر كما هو مقررٌ في أصول الحديث.




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। আমি (মনে মনে) বললাম: আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নামাযের প্রতি লক্ষ্য রাখব, যেন তাঁর কার্য দেখতে পাই। অতঃপর তিনি যখন ইশার সালাত (‘আতামাহ’) আদায় করলেন, তখন তিনি রাতের অনেকটা সময় শুয়ে থাকলেন। এরপর তিনি জেগে উঠলেন এবং দিগন্তের দিকে তাকিয়ে বললেন: "হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি এগুলো অনর্থক সৃষ্টি করেননি..." [সূরা আলে ইমরান: ১৯১] থেকে শুরু করে "...নিশ্চয় আপনি অঙ্গীকারের ব্যতিক্রম করেন না।" [১৯৪] পর্যন্ত পড়লেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বিছানার দিকে মনোযোগ দিলেন, সেখান থেকে একটি মিসওয়াক বের করলেন, অতঃপর তাঁর কাছে থাকা পাত্র (ইদাওয়াহ) থেকে একটি পেয়ালায় পানি ঢেলে নিলেন এবং মিসওয়াক করলেন। অতঃপর তিনি দাঁড়িয়ে নামায আদায় করলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি যতখানি ঘুমিয়েছিলেন, ততখানিই নামায আদায় করলেন। এরপর তিনি আবার শুয়ে পড়লেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি যতখানি নামায আদায় করেছিলেন, ততখানিই ঘুমিয়ে নিলেন। এরপর তিনি আবার জেগে উঠলেন এবং প্রথমবারের মতো একই কাজ করলেন এবং অনুরূপ কথা বললেন। ফযরের পূর্বে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবে তিনবার করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2612)


2612 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أخبر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له:"أَحَبُّ الصلاةِ إلى اللهِ صلاةُ داود عليه السلام وأحبُ الصيام إلى اللهِ صيامُ داود" وكان ينام نصف الليل، ويقوم ثلثَه، وينام سُدسَه، ويصومُ يومًا ويُفطر يومًا.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1131)، ومسلم في الصوم (1159/ 189) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن أوس، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.

ورواه مسلم أيضًا من حديث ابن جريج، أخبرني عمرو بن دينار أن عمرو بن أوس أخبره عن عبد الله بن عمرو بن العاص أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أحب الصيام إلى الله صيام داود، كان يصومُ نصفَ الدهر، وأحب الصلاة إلى الله عز وجل صلاةُ داود، كان يرقدُ شطرَ الليل، ثم يقومُ، ثم يرقدُ آخره، يقومُ ثلث الليل بعد شطره" قال: قلت لعمرو بن دينار: أعمرو بن أوس كان يقول: يقوم ثلث الليل بعد شطره؟ قال: نعم.

قال الحافظ:"ظاهره أن تقدير القيام بالثلث من تفسير الراوي، فيكون في الرواية الأولى إدراج، ويحتمل أن يكون قوله: عمرو بن أوس - ذكره - أي بسنده فلا يكون مدرجًا"."الفتح" (3/




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বলেছিলেন: "আল্লাহর নিকট সর্বাধিক প্রিয় সালাত হলো দাউদ (আঃ)-এর সালাত এবং আল্লাহর নিকট সর্বাধিক প্রিয় সিয়াম হলো দাউদ (আঃ)-এর সিয়াম।" তিনি (দাউদ আঃ) রাতের অর্ধেক ঘুমাতেন, রাতের এক-তৃতীয়াংশ ইবাদতে কাটাতেন এবং (শেষে) রাতের এক-ষষ্ঠাংশ ঘুমাতেন। আর তিনি একদিন রোযা রাখতেন এবং একদিন রোযা ভাঙতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2613)


2613 - عن الأسود بن يزيد قال: سألت عائشة، كيف صلاةُ النبي صلى الله عليه وسلم بالليل؟ قالت:"كان ينامُ أوَّلَه ويقومُ آخره فيُصلِّي، ثم يرجعُ إلى فراشه، فإذا أذَّن المؤذِّن وثَب، فإن كانت به حاجة اغتسل، وإلا توضأ وخرج".

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1146)، ومسلم في صلاة المسافرين (739) كلاهما من حديث أبي إسحاق، عن الأسود بن يزيد به واللفظ للبخاري.

وفي الحديث تفاصيل أخرى مذكورة في كتاب الوضوء باب جواز النوم للجنب بدون وضوء.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আসওয়াদ ইবনু ইয়াযীদ বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলাম, রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: তিনি রাতের প্রথমভাগে ঘুমাতেন এবং শেষভাগে উঠে সালাত আদায় করতেন। এরপর তিনি তাঁর বিছানায় ফিরে যেতেন। যখন মুয়াযযিন আযান দিতেন, তখন তিনি দ্রুত উঠে যেতেন। যদি তাঁর গোসলের প্রয়োজন থাকত, তবে গোসল করতেন, অন্যথায় শুধু ওযু করে (সালাতের জন্য) বেরিয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2614)


2614 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ينزل ربُّنا تبارك وتعالى كلَّ ليلة إلى السماء الدنيا حين يبقى ثلث الليل الآخر. فيقول: من يدعوني فأستجيب له؟ من يسألني فأعطِيَه، من يستغفرني فأغفر له".

متفق عليه: رواه مالك في القرآن (30) عن ابن شهاب، عن أبي عبد الله الأغر وأبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في التهجد (1145) عن عبد الله بن مسلمة، ومسلم في صلاة المسافرين (758) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به مثله.

وروى مسلم بأسانيد أخرى منها: من حديث سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة مرفوعًا: ينزل الله إلى السماء الدنيا كل ليلة حين يمضي ثلث الليل الأول، فيقول: أنا الملك. أنا الملك. من ذا الذي يدعوني فأستجيب له، من ذا الذي يَسْألني فأعطِيَه، من ذا الذي يستغفرني فأغفر له، فلا يزال كذلك حتى يُضِئَ الفجرُ".

ومنها: من حديث الأوزاعي، عن يحيى، حدثنا أبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله:"إذا مضى شطر الليل، أو ثلثاه، ينزل الله تبارك وتعالى إلى السماء الدنيا فيقول: هل من سائلٍ يُعْطَى، هل من داعٍ يستجابُ له، هل من مستغفرٍ يُغفر له، حتى ينفجر الصبحُ".

ومنها: من حديث محاضر أبي المُورّع، حدثنا سعد بن سعيد، قال أخبرني ابن مرجانة، قال: سمعت أبا هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ينزل الله في السماء الدنيا لشطر الليل، أو لثلث الليل الآخِر، فيقول: من يدعوني فأستجيب له، أو يسألني فأعطيه، ثم يقول: من يُقرضُ غير عديمٍ ولا ظلوم". قال مسلم: ابن مرجانة هو: سعيد بن عبد الله، ومرجانة أمه.

ورواه سليمان بن بلال، عن سعد بن سعيد بهذا الإسناد وزاد:"ثم يبسطُ يديه تبارك وتعالى يقول: من يقرضُ غير عَدُومٍ ولا ظلوم".

ومنها: من حديث منصور، عن أبي إسحاق، عن الأغَرِّ أبي مسلم، يرويه عن أبي سعيد وأبي هريرة قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله يُمهِلُ حتى إذا ذهب ثلثُ الليل الأولُ نزل إلى السماء الدنيا فيقول: هل من مستغفر، هل من تائب، هل من سائل، هل من داع، حتى ينفجر الفجرُ".

ورواه شعبة عن أبي إسحاق بهذا الإسناد، غير أن حديث منصور أتم وأكثر. انتهى بما في صحيح مسلم.

قال الترمذي (446) بعد أن رواه من حديث سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة:"وقد رُوي هذا الحديثُ من أوجه كثيرة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وروي عنه أنه قال:"ينزل الله عز وجل حين يبقى ثلثُ الليل الآخر" وهو أصح الروايات" انتهى.
انظر بقية أحاديث نزول الرب تبارك وتعالى في كتاب الإيمان والدعوات.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমাদের রব, যিনি মহান ও বরকতময়, তিনি প্রতি রাতে দুনিয়ার আসমানে নেমে আসেন, যখন রাতের শেষ তৃতীয়াংশ বাকি থাকে। অতঃপর তিনি বলেন: 'কে আমাকে ডাকে যে আমি তার ডাকে সাড়া দেব? কে আমার কাছে চায় যে আমি তাকে দান করব? কে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করে যে আমি তাকে ক্ষমা করে দেব?'









আল-জামি` আল-কামিল (2615)


2615 - عن أبي هريرة يرفعه قال: سئل: أيُّ الصلاة أفضل بعد المكتوبة؟ وأيُّ الصيام أفضلُ بعد شهر رمضان؟ فقال:"أفضلُ الصلاة بعد الصلاة المكتوبة، الصلاة في جوف الليل، وأفضل الصيام بعد شهر رمضان صيام شهر الله المحرم".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1163/ 203) عن زهير بن حرب، حدثنا جرير، عن عبد الملك بن عُمير، عن محمد بن المُنْتَشِر، عن حُميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মারফূ' সূত্রে বর্ণনা করেন যে) বলেন, (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: ফরয নামাযের পরে সর্বোত্তম নামায কোনটি? আর রমযান মাসের পরে সর্বোত্তম রোযা কোনটি? জবাবে তিনি বললেন: ফরয নামাযের পরে সর্বোত্তম নামায হলো রাতের গভীরে (তাহাজ্জুদের) নামায, আর রমযান মাসের পরে সর্বোত্তম রোযা হলো আল্লাহর মাস মুহাররমের রোযা।









আল-জামি` আল-কামিল (2616)


2616 - عن عمرو بن عبسة يقول: قلت: يا رسول الله! هل من ساعة أقرب من الأخرى؟ أو هل من ساعة يُبتغَي ذكرُها؟ قال:"نعم، إن أقرب ما يكون الرب عز وجل من العبد جوف الليل الآخر، فإن استطعت أن تكون ممن يذكر الله عز وجل في تلك الساعة فكُن، فإن الصلاة محضورة مشهودَةٌ إلى طلوع الشمس".

صحيح: رواه النسائي (572) عن عمرو بن منصور، أخبرنا آدم بن أبي إياس، حدثنا الليث بن سعد، حدثنا معاوية بن صالح، قال: أخبرني أبو يحيي سُليم بن عامر وضمرة بن حبيب وأبو طلحة نعيم بن زياد قالوا: سمعنا أبا أمامة الباهلي يقول: سمعت عمرو بن عَبَسَة فذكره.

ورواه الترمذي (3579) من طريق معاوية بن صالح به مختصرًا وقال:"حسن صحيح غريب من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال فإنه صحيح، وقد صحّحه أيضا ابن خزيمة فأخرجه من هذا الطريق في صحيحه (1147).

ورواه أبو داود (1277) وعنه البيهقي (2/ 455) من وجه آخر عن أبي أمامة، عن عمرو بن عبسة وفيه: أي الليل أسمع؟ فقال:"جوف الليل الآخر، فصَلِّ ما شئت، فإن الصلاة مشهودة مكتوبه. وهذا إسناد صحيح، وأبو أمامة هو صُدي بن عجلان الباهليّ، صحابيّ مشهور.

وأما ما رواه ابن ماجه (1251) من وجه آخر عن عبد الرحمن بن البيلماني، عن عمرو بن عَبَسَة وفيه:"جوف الليل الأوسطه فهو منكر، لأن فيه عبد الرحمن بن البيلماني ضعيف، والراوي عنه يزيد بن طلق مجهول، ومن نكارتهما قولهما:"الليل الأوسط"، وأما أصل الحديث فهو في صحيح مسلم في صلاة المسافرين (832) في قصة إسلام عمرو بن عبسة وسبق تخريجه في ثواب الوضوء، وفي المواقيت، وليس فيه ذكر لجوف الليل الآخر.

وفي الباب عن أبي مسلم قلت لأبي ذر: أي قيام الليل أفضل؟ قال أبو ذر: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم كما سألتني فقال:"جوف الليل الغابر - أو نصف الليل - وقليل فاعلُه".
إسناده ضعيف، رواه الإمام أحمد (21555) عن محمد بن جعفر، حدثنا عوف، عن مهاجر أبي خالد، حدثني أبو العالية، حدثني أبو مسلم، قال فذكره.

ورواه ابن حبان (2564)، والنسائي في الكبرى (1310) كلاهما من حديث عوف الأعرابي، به مثله.

في الإسناد مهاجر وهو: ابن مخلد، أبو خالد، ويقال: أبو مخلد أيضًا مولى البكرات، اختلف فيه فقال ابن معين: صالح، وقال أبو حاتم:"ليِّن الحديث، ليس بذاك، وليس بالمتقن، يكتب حديثه".

وذكره ابن حبان في الثقات. وقال الساجي: هو صدوق معروف، وليس من قال فيه مجهول بشيء.

قلت: فمثله يحسن حديثه، وبخاصة في الشواهد، ولكن قال الحافظ في التقريب:"مقبول".

إلَّا أنَّ في الإسناد علّة أخرى وهو أبو مسلم وهو: الجَذْمِي، لم يوثقه أحد غير ابن حبان فذكره في"الثقات" (5/ 584) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع، ولكنه لم يتابع فهو"لين الحديث".

وفي الباب عن أبي أمامة قال: جاء رجلٌ إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: أيُّ الصّلاة أفضل؟ فقال: جوف اللّيل الأوسط". قال: أيّ الدّعاء أسمع؟ قال:"دبر المكتوبات".

رواه ابن أبي الدنيا في كتاب"التهجّد" (240) عن محمد بن حميد، حدّثنا الفضل بن موسى، حدّثنا ابن جريج، عن عبد الرحمن بن سابط، عن أبي أمامة، فذكره.

ولكن رواه الترمذي (3499)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (108) كلاهما عن محمد بن يحيى بن أيوب الثقفيّ المروزيّ، قال: حدّثنا حفص بن غياث، قال: حدّثنا ابن جريج، بإسناده، ولفظه:"أي الدّعاء أسمع؟ قال:"جوف الليل الآخر، ودبر الصَّلوات المكتوبات".

وهذا أصح من حديث محمد بن حميد وهو ابن حبان الرّازيّ، قال الحافظ في"التقريب":"حافظ ضعيف، وكان ابن معين حسن الرّأي فيه". وقال الذهبي:"وثقه جماعة، والأولى تركهـ".

قلت: وتكلَّم فيه البخاريّ والنسائيّ ويعقوب بن شيبة وغيرهم.

وأما محمد بن يحيى بن أيوب فهو ثقة حافظ.

قال الترمذي:"حسن".

قلت: ولكن فيه عبد الرحمن بن سابط لم يسمع من أبي أمامة كما قال ابن معين.




আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এক ঘণ্টার চেয়ে অন্য কোনো ঘণ্টা কি আল্লাহর নৈকট্যের দিক দিয়ে অধিক নিকটবর্তী? অথবা এমন কোনো নির্দিষ্ট সময় আছে কি যখন আল্লাহর স্মরণ অন্বেষণ করা উচিত? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ। নিশ্চয়ই বান্দা তার রবের (আল্লাহ্ তা‘আলার) সবচেয়ে নিকটবর্তী হয় শেষ রাতের গভীরে। সুতরাং তুমি যদি সেই সময়ে আল্লাহ তা‘আলার স্মরণকারীদের অন্তর্ভুক্ত হতে পারো, তবে হও। কেননা ফজর উদয় হওয়া পর্যন্ত সেই সালাত উপস্থিত এবং এতে ফেরেশতাগণ সাক্ষী থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2617)


2617 - عن جابر، قال: سمعت النّبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ في اللّيل لساعةً، لا يوافقها رجلٌ مسلم يسأل الله خيرًا من أمر الدّنيا والآخرة إلَّا أعطاه إيّاه، وذلك كلّ ليلة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (757) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن معقل، عن أبي الزّبير، عن جابر، نحوه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই রাতের মধ্যে এমন একটি মুহূর্ত (সময়) আছে, যখন কোনো মুসলিম ব্যক্তি আল্লাহ্‌র কাছে দুনিয়া ও আখিরাতের কোনো কল্যাণকর বস্তু প্রার্থনা করে, তবে আল্লাহ্‌ অবশ্যই তাকে তা দান করেন। আর তা প্রতি রাতেই হয়ে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2618)


2618 - عن عائشة قالت: سمع النبي صلى الله عليه وسلم رجلًا يقرأ في المسجد، فقال:"رحمه الله لقد أذكرني كذا وكذا آية أسقطتُهن من سورة كذا وكذا" وزاد عبَّادُ بن عبد الله، عن عائشة: تهجد النبي صلى الله عليه وسلم في بيتي، فسمع صوت عبَّادٍ يُصلي في المسجد فقال:"يا عائشة! أصوتُ عبَّاد هذا"؟ قالت: نعم، قال:"اللَّهم! ارحم عبَّادًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الشهادات (2655) عن محمد بن عبيد بن ميمون، أخبرنا عيسى بن يونس، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.

وأخرجه هو في فضائل القرآن (5038)، ومسلم في صلاة المسافرين (788) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن هشام به نحوه.

ورواه مسلم من حديث عبدة وأبي معاوية، عن هشام وفيه: كان النبي صلى الله عليه وسلم يستمع قراءة رجل في المسجد فقال: رحمه الله، لقد أذكرني آية كنتُ أُنْسِيتُها".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন লোককে মসজিদে তিলাওয়াত করতে শুনলেন। তখন তিনি বললেন, "আল্লাহ তার উপর রহম করুন! সে আমাকে অমুক অমুক আয়াত স্মরণ করিয়ে দিয়েছে, যা আমি অমুক অমুক সূরা থেকে ভুলে গিয়েছিলাম (বা বাদ দিয়েছিলাম)।"

আব্বাদ ইবনে আবদুল্লাহ, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণনা করেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার ঘরে তাহাজ্জুদ আদায় করছিলেন। তখন তিনি মসজিদে আব্বাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সালাত আদায়ের শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "হে আয়িশা! এটি কি আব্বাদের কণ্ঠস্বর?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" তখন তিনি বললেন, "হে আল্লাহ! আব্বাদকে রহম করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2619)


2619 - عن ابن عباس قال: كانت قراءةُ النبي صلى الله عليه وسلم على قدر ما سمعه مَن في الحجرة، وهو في البيت.

حسن: رواه أبو داود (1327)، وأحمد (2446) كلاهما من حديث ابن أبي الزّناد، عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب، عن عِكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في ابن أبي الزناد وهو: عبد الرحمن فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد قال الحافظ في التقريب: صدوق، تغيّر حفظه لما قدم بغداد، وكان فقيهًا".

ووجدنا له طريقا آخر أخرجه ابن خزيمة (1157) ومن طريقه ابن حبان (2581) من حديث الليث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال عن مخرمة بن سليمان أن كريبًا أخبره قال: سألت ابن عباس فقلت: ما صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالليل؟ قال:"كان يقرأ في بعض حجره، فيسمع من كان خارجًا". وإسناده حسن وإنه يُقوِّي الإسناد الأوّل.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ক্বিরাআত (তিলাওয়াত) সেই পরিমাণের ছিল যা তিনি ঘরে থাকা অবস্থায়ও কক্ষের ভেতরে যারা ছিল তারা শুনতে পেত।









আল-জামি` আল-কামিল (2620)


2620 - عن أم هانئ بنت أبي طالب، قالت: كنتُ أسمع قراءة النبيّ صلى الله عليه وسلم باليل، وأنا على عريشي.

حسن: رواه النسائي (1013)، وابن ماجه (1349)، والترمذي في"الشّمائل" (318)، وأحمد (26905) كلهم من حديث وكيع، قال: حدثنا مسعر بن كدام، عن أبي العلاء العبدي، عن يحيى بن
جعدة، عن أمّ هانئ، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل أبي العلاء العبدي وهو هلال بن خباب فإنه حسن الحديث.

ورواه أحمد (2694) من وجه آخر عن هلال بن خبّاب، قال: نزلت أنا ومجاهد على يحيى بن جعدة أبن أمّ هانئ، فحدثنا عن أم هانئ، قالت (فذكرت الحديث)، وزادت فيه:"وهو عند الكعبة".




উম্মে হানী বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাতে আমার পালঙ্কের উপর থাকা অবস্থায় নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কিরাত (কুরআন পাঠ) শুনতে পেতাম।