হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2621)


2621 - عن قيس بن مروان، أنه أتى عمرَ - فقال: جئتُ يا أميرَ المؤمنين من الكوفة، وتركت بها رجلًا يُملي المصاحف عن ظَهْرِ قَلْبه، فغَضِب وانتفخ حتى كاد يملأُ ما بين شُعْبَتي الرَّحْل، فقال: ومَن هو وَيْحَك؟ قال: عبد الله بن مسعودٍ. فما زال يُطْفَأُ ويُسَرَّى عنه الغَضبُ، حتى عاد إلى حاله التي كان عليها.

ثم قال: وَيْحك، واللهِ! ما أعلمُه بقي من الناس أحد هو أحقُّ بذلك منه، وسأُحدِّثُك عن ذلك، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يزال يسمُرُ عند أبي بكر الليلةَ كذاك في الأمر من أمر المسلمين، وإنه سَمَرَ عنده ذاتَ ليلةٍ، وأنا معه، فخرجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وخرجنا معه، فإذا رجل قائم يصلِّي في المسجد، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم يَستمع قراءتَه، فلما كِدْنا أن نعرِفَه، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ سَرَّه أن يَقرأَ القُرآنَ رَطْبًا كما أُنْزِل، فلْيَقْرأه على قِراءةِ ابن أمِّ عَبْدٍ"، قال: ثم جلس الرجل يدعو، فَجَعَلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول له:"سَلْ تُعْطَهْ، سَلْ تُعْطَهْ" قال عمر: قلت: واللهِ! لأَغدُونَّ إليه فلأُبَشِّرَنَّه، قال: فغدوتُ إليه لأُبَشِّره فوجدتُ أبا بكر قد سبَقني إليه فَبشَّره، ولا والله! ما سابَقْتُه إلى خيرٍ قَطّ إلا سَبقني إليه.

صحيح: رواه الإمام أحمد (175) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة قال: جاء رجل إلى عمر وهو بعرفة.

قال أبو معاوية: وحدثنا الأعمش، عن خيثمة، عن قيس بن مروان أنه أتى عُمرَ فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (1156) ورواه من طريق أبي معاوية به مثله.

ورواه الترمذي (169) باختصار وسبق تخريجه في أبواب المواقيت باب جواز السمر بعد العِشاء.




কায়স ইবনে মারওয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আমি কুফা থেকে এসেছি এবং সেখানে এমন একজন লোককে রেখে এসেছি, যিনি কুরআন (লিখিত) কপিগুলো মুখস্থভাবে ডিক্টেট করাচ্ছেন।

এতে তিনি (উমর) রাগান্বিত হলেন এবং এমনভাবে ফুলে উঠলেন যে, প্রায় যেন উটের হাওদার দুই কড়ি-কাঠের মধ্যের স্থান ভরে দিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কী হয়েছে? সে কে? লোকটি বলল: তিনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ। এরপর তার ক্রোধ ক্রমশ কমতে শুরু করল, শান্ত হতে থাকল, যতক্ষণ না তিনি তার স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে এলেন।

এরপর তিনি বললেন: তোমার কী হয়েছে? আল্লাহর কসম! আমি জানি না বর্তমানে জীবিতদের মধ্যে কেউ তার (আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ) চেয়ে এই কাজের বেশি উপযুক্ত আছে কিনা। আমি এ ব্যাপারে তোমাকে একটি ঘটনা বলছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের কোনো বিষয় নিয়ে আলোচনার জন্য প্রায়ই রাতে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আড্ডা দিতেন। এক রাতে তিনি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আড্ডা দিলেন, আর আমিও সেখানে ছিলাম।

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইরে বেরিয়ে এলেন এবং আমরাও তার সাথে বের হলাম। তখন মসজিদে একজন লোককে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে দেখলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তার কিরাত শুনতে লাগলেন। যখন আমরা প্রায় তাকে চিনে ফেললাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি কুরআনকে অবতীর্ণ হওয়ার মতো সতেজভাবে (সাবলীল ও বিশুদ্ধ উচ্চারণে) পাঠ করে আনন্দ পেতে চায়, সে যেন ইবনে উম্মে আবদ-এর কিরাতের পদ্ধতিতে পাঠ করে।”

তিনি (উমর) বললেন: এরপর লোকটি (সালাত শেষে) বসে দু‘আ করতে লাগল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাকে বারবার বলতে লাগলেন: "চাও, তোমাকে দেওয়া হবে; চাও, তোমাকে দেওয়া হবে।"

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই সকাল বেলা তার কাছে গিয়ে তাকে সুসংবাদ দেব। তিনি বললেন: আমি সকাল বেলা তাকে সুসংবাদ দিতে গেলাম, কিন্তু গিয়ে দেখলাম যে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার আগেই সেখানে পৌঁছে তাকে সুসংবাদ দিয়ে দিয়েছেন। আল্লাহর কসম! আমি কখনোই কোনো ভালো কাজে তার সাথে প্রতিযোগিতা করিনি, কিন্তু তিনি আমাকে ছাড়িয়ে যাননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2622)


2622 - عن عبد الله بن أبي قيس قال: سألت عائشة: كيف كان قراءة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالليل يجهر أم يُسِرُّ؟ قالت: كل ذلك قد كان يفعل ربما جهر، وربَّما أسَرَّ.

حسن: رواه النسائي (1662)، وابن خزيمة (1160)، والحاكم (1/ 310) كلهم من حديث معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قيس فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح وهو ابن حدير، وهو حسن الحديث.

وزاد بحر بن نصر أحد شيوخ ابن خزيمة: الحمد لله الذي جعل في الأمر سعة.

وعبد الله بن أبي قيس سأل عائشة عن أشياء منها: بِكَم كان يوتر رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ ، ومنها: عن نوم رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجنابة أيغتسل قبل أن ينام؟ وكل حديث ذكر في موضعه. وهو حديث صحيح أخرج مسلم بعضه (307)، وأحمد (24453) وأصحاب السنن.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি (আব্দুল্লাহ ইবনু আবী কাইস) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের রাতের কিরাআত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম—তিনি কি উচ্চস্বরে পড়তেন নাকি নীরবে? তিনি বললেন: তিনি উভয়টিই করতেন। কখনো তিনি উচ্চস্বরে পড়তেন এবং কখনো নীরবে পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2623)


2623 - عن غُضيف بن الحارث قال: قلت لعائشة: يا أم المؤمنين! أرأيت النبي صلى الله عليه وسلم، أكان يجهر بصلاته أم يُخافِتُ بها؟ قالت: ربما جهر بصلاته، وربما خافَتَ بها، قلت: الله أكبر، الحمد لله الذي جعل في الأمر سعةً.

حسن: رواه أبو داود (226)، والنسائي (222)، وابن ماجه (1354)، كلهم من حديث برد بن سنان أبي العلاء، عن عُبادة بن نُسَيٍّ، عن غُضيف بن الحارث في حديث طويل سبق تخريجه في كتاب الغسل، باب غسل الجنابة قبل النوم وبعده.

كل يروي جزءًا منه، وروى الإمام أحمد (24202) وعنه أبو داود (226) بكامل الحديث. وصحّحه ابن حبان (2447) فرواه أيضًا من طريق برد أبي العلاء كامل الحديث وأعاده (2582) فاكتفى بذكر القراءة في الليل فقط.

وإسناده حسن من أجل برد بن سنان فإنه"صدوق" وبقية رجاله ثقات.

وفي الباب عن أبي هريرة أنه قال: كانت قراءةُ النّبي صلى الله عليه وسلم باللّيل برفع طورًا، ويخفض طورًا.

رواه أبو داود (1328) عن محمد بن بكّار بن الريان، حدّثنا عبد الله بن المبارك، عن عمران بن زائدة، عن أبيه، عن أبي خالد الوالبي، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وصححه ابن خزيمة (1159)، وابن حبان (2603)، والحاكم (1/ 310) كلّهم من طريق عمران بن زائدة، بإسناده. قال الحاكم: صحيح الإسناد".

وفي الإسناد عمران بن زائدة لم يوثقه أحد غير أن ابن حبان ذكره في الثقات، وأخرج عنه، فهو مقبول، أي إذا توبع، وكذلك أبوه زائدة، وهو ابن نشيط، لم يوثقه غير ابن حبان؛ ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة. ولم أجد لهما متابعة، ولكن توجد أصول صحيحة تقوي هذا الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গুদাইফ ইবনুল হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: হে উম্মুল মু’মিনীন! আপনি কি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন, তিনি কি তাঁর সালাতে জোরে কিরাআত পড়তেন নাকি নীরবে? তিনি বললেন: কখনো তিনি তাঁর সালাতে জোরে কিরাআত পড়তেন, আবার কখনো নীরবে। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার, সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা রেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2624)


2624 - عن ابن عباس في قوله تعالى: {وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا} [سورة الإسراء: 110] قال: نزلتْ ورسول الله صلى الله عليه وسلم مختف بمكة، كان إذا صلّى بأصحابه رفع صوته بالقرآن، فإذا سمع المشركون سَبُّوا القرآن، ومن أنزله، ومن جاء به. فقال الله
تعالى لنبيّه: {وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ} أي بقراءتك، فيسمع المشركون فيسبُّوا القرآن {وَلَا تُخَافِتْ بِهَا} عن أصحابك فلا تسمعهم {وَابْتَغِ بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلًا (110)}.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4723)، ومسلم في الصلاة (446) كلاهما من حديث هُشيم، حدثنا أبو بشر (هو جعفر بن إياس)، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وعن عائشة في قوله تعالى: {وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا} قالت: أُنزل هذا في الدعاء.

رواه البخاري في التفسير (4723)، ومسلم في الصلاة (447) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته، ولفظهما سواء.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তাআলার বাণী— {আর তুমি তোমার সালাতে তোমার স্বরকে অতি উচ্চ করো না এবং অতি ক্ষীণও করো না} [সূরা ইসরা: ১১০] সম্পর্কে বলেন: এই আয়াতটি তখন নাযিল হয় যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় গোপনে অবস্থান করছিলেন। তিনি যখন তাঁর সাহাবীদের নিয়ে সালাত আদায় করতেন, তখন উচ্চস্বরে কুরআন তিলাওয়াত করতেন। মুশরিকরা যখন তা শুনতো, তখন তারা কুরআন, যিনি তা নাযিল করেছেন এবং যিনি তা নিয়ে এসেছেন— তাঁদেরকে গালমন্দ করতো। তখন আল্লাহ তাআলা তাঁর নবীকে বললেন: {وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ} (অর্থাৎ তোমার ক্বিরাত উচ্চস্বরে করো না), ফলে মুশরিকরা তা শুনবে এবং কুরআনকে গালমন্দ করবে। {وَلَا تُخَافِتْ بِهَا} (এবং তা এত নিম্নস্বরেও করো না) যে তোমার সাথীরা শুনতে না পায়। {وَابْتَغِ بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلًا} (বরং এর মাঝামাঝি একটি পথ অবলম্বন করো)।

আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহ তাআলার বাণী— {وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا} সম্পর্কে বলেন: এটি দু'আ সম্পর্কে নাযিল হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (2625)


2625 - عن أبي قتادة أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج ليلة فإذا هو بأبي بكر يُصلي يخفضُ من صوته، قال: ومر بعمر بن الخطاب وهو يصلي رافعًا صوتَه، قال: فلما اجتمعا عند النبي صلى الله عليه وسلم قال: يا أبا بكرا مررت بك، وأنت تُصلي تخفضُ صوتك" قال: قد أسمعتُ من ناجيتُ يا رسول الله! قال: وقال لعمر:"مررتُ بك وأنت تُصلي رافعًا صوتك" قال: فقال: يا رسول الله! أوقظ الوَسْنان، وأطردُ الشيطان.

فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا أبا بكر! ارفع من صوتك شيئًا وقال لعمر:"اخفِضْ من صوتك شيئًا".

حسن: رواه أبو داود (1329)، والترمذي (447) كلاهما من طريق يحيى بن إسحاق، أخبرنا حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن عبد الله بن رباح، عن أبي قتادة فذكره.

وقد صححه ابن خزيمة (1161) ومن طريقه رواه ابن حبان (733)، والحاكم (1/ 310) كلهم من طريق يحيى بن إسحاق.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال، إلَّا أن يحيى بن إسحاق وهو: السيلحيني وإن كان من رجال مسلم إلا أن ابن معين قال فيه:"صدوق".

ولكن قال الترمذي:"حديث غريب، وإنَّما أسنده يحيى بن إسحاق، عن حماد بن سلمة، وأكثرُ النَّاس إنَّما رووا هذا الحديث عن ثابت، عن عبد الله بن رباح مرسلًا".

قلت: رواه أبو داود بإسناد آخر عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حماد، عن ثابت البناني، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا لا يؤثر في صحة الحديث فإن يحيى بن إسحاق كان ثقة حافظًا لحديثه، كما قال ابن سعد، وثقة صدوقًا كما قال أحمد فزيادته مقبولة، وموسى بن إسماعيل شيخ أبي داود وإن كان أحسن حالًا من يحيى بن إسحاق إلَّا أن النَّاس تكلموا فيه، فإرساله لا يؤثر في صحة الحديث كما
هو مقرر في أصول الحديث.

وقوله:"أوقظ الوسنانَ" أي: النائم الذي ليس بمستغرق في نومه .. كما في النهاية لابن الأثير.

ويشهد له حديث أبي هريرة الآتي.




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক রাতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বের হলেন। তখন তিনি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলেন, যিনি সালাত আদায় করছিলেন এবং নিজের কণ্ঠস্বর নিচু রাখছিলেন। তিনি বললেন: আর তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে গেলেন, যিনি সালাত আদায় করছিলেন এবং নিজের কণ্ঠস্বর উঁচু রাখছিলেন।

তিনি বললেন: অতঃপর যখন তাঁরা দু'জন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে একত্রিত হলেন, তখন তিনি বললেন: হে আবূ বকর! আমি তোমার পাশ দিয়ে গিয়েছিলাম, আর তুমি সালাত আদায় করছিলে এবং তোমার কণ্ঠস্বর নিচু রাখছিলে। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি যার সাথে কানে কানে কথা বলছিলাম (মোনাজাত করছিলাম), তাকে শুনিয়েছি।

তিনি উমারকে বললেন: আমি তোমার পাশ দিয়ে গিয়েছিলাম, আর তুমি সালাত আদায় করছিলে এবং তোমার কণ্ঠস্বর উঁচু রাখছিলে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি ঘুমন্ত ব্যক্তিকে জাগাই এবং শয়তানকে বিতাড়িত করি।

অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: হে আবূ বকর! তোমার কণ্ঠস্বর সামান্য উঁচু করো। আর তিনি উমারকে বললেন: তোমার কণ্ঠস্বর সামান্য নিচু করো।









আল-জামি` আল-কামিল (2626)


2626 - عن وعن أبي هريرة بهذه القصة، ولم يذكر:"فقال لأبي بكر ارفع من صوتك شيئًا، ولعمر اخفض شيئًا" زاد: وقد سمعتك يا بلال! وأنت تقرأ من هذه السورة، ومن هذه السورة، قال: كلام طيب يجمع الله تعالى بعضه إلى بعض فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"كلُّهم قد أصاب".

حسن: رواه أبو داود (1330) عن أبي حصين بن يحيى الرازي، حدثنا أسباط بن محمد، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في محمد بن عمرو غير أنَّه حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই ঘটনা প্রসঙ্গে বর্ণিত। তবে তিনি এতে এই কথা উল্লেখ করেননি: "তিনি আবূ বাকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার কণ্ঠস্বর কিছুটা উঁচু করুন এবং উমারকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কিছুটা নিচু করুন।" (এই বর্ণনায়) আরও অতিরিক্ত বলা হয়েছে যে, (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন,) "হে বিলাল! আমি আপনাকেও শুনতে পেয়েছি, আপনি এই সূরাহ এবং এই সূরাহ থেকে তিলাওয়াত করছিলেন।" তিনি (বিলাল) বললেন: এ তো উত্তম কথা, আল্লাহ তা‘আলা যার কিছুটাকে অন্য কিছুর সাথে একত্রিত করে দেন। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা প্রত্যেকেই সঠিক করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (2627)


2627 - عن عُقبة بن عامر الجُهني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الجاهر بالقرآن كالجاهر بالصدقة، والمُسِرُّ بالقرآن كالمْسِرِّ بالصدقة".

صحيح: رواه أبو داود (1333)، والترمذي (2919) كلاهما من حديث إسماعيل بن عياش، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة الحضرمي، عن عقبة بن عامر الجُهني فذكر الحديث.

ورجاله ثقات غير إسماعيل بن عياش فهو ضعيف في روايته عن غير أهل بلده، وصدوق في روايته عن أهل بلده وهذا منها، كما أنَّه لم ينفرد به فقد تابعه معاوية بن صالح، عن بحير بن سعد، ومن طريقه رواه النسائي (2561)، وابن حبان (734)، وأحمد (17368، 17444) وأبو يعلى (1737) وهذا إسناد حسن فإن معاوية بن صالح وهو: ابن حُدير الحضرمي مختلف فيه فوثقه جماعة، وتكلم فيه يحيى بن سعيد وابن معين غير أنه حسن الحديث وخاصَّة إذا توبع.

وتحرف في النسائي:"بحير بن سعد" إلى"يحيى بن سعيد"، ورواه أيضًا النسائي (1663) من وجه آخر عن كثير بن مرة به، وأمَّا ما رواه الحاكم (1/ 555) من طريق يحيى بن أيوب، عن بحير ابن سعد، فإنه جعل الحديث من مسند معاذ بن جبل وأخطأ فيه يحيى بن أيوب وهو الغافقي وقد وصف بأنَّه سيء الحفظ، ووهم الحاكم وصحَّح الحديث وجعله على شرط البخاري.

وكراهية الجهر محمول على رفع الصوت عاليا. لأن فيه رياءً وإيذاء للآخرين، وأما الاعتدال والاقتصاد فلا حرج في ذلك لحديث أبي قتادة وأبي هريرة.

وقال الترمذي:"ومعنى هذا الحديث - أن الذي يُسِرُّ بقراءة القرآن أفضلُ من الذي يجهر بقراءة
القرآن، لأن صدقة السِر أفضلُ عند أهل العلم من صدقة العلانية، وإنَّما معنى هذا عند أهل العلم لكي يأمن الرجل من العُجْب، لأن الذي يُسِرُّ العملَ لا يخاف عليه العجب ما يُخاف عليه في العلانية" انتهى. وقيل: معناه الجهر مع الإمام.

وأما ما رُوي عن أبي أمامة مرفوعًا:"إن الذي يجهر بالقرآن كالذي يجهر بالصدقة، والذي يُسِر بالقرآن كالذي يُسر بالصدقة" فهو ضعيف جدًّا، لا يصلح أن يكون شاهدًا لحديث عقبة بن عامر.

رواه الطبراني في الكبير.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 266):"رواه الطبراني في الكبير من طريقين في إحداهما بشير بن نمير وهو متروك، وفي الأخرى إسحاق بن مالك ضعفه الأزدي" انتهى.

قلت: الطريق الأول أخرجه الطبراني (8/ 285) عن خلف بن عمرو العكبري، ثنا غسان بن الفضل الغلابي، ثنا عمرو بن علي المقدمي، عن بشير بن نُمير، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكر مثله.

والطريق الثَّاني رواه الطبراني (8/ 209) عن أحمد بن النضر العسكري، ثنا سليمان بن سلمة الخبائري، ثنا بقية بن الوليد، عن إسحاق بن مالك الحضرمي، عن يحيى بن الحارث، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكر مثله.

كذا"بشير بن نمير" في الطبراني ومجمع الزوائد، والصواب:"بشر بن نمير - بدون الياء - وهو القشيري من أهل البصرة، يَرِوي عن القاسم بن عبد الرحمن.

قال ابن حبان في"المجروحين" (131): منكر الحديث جدًّا، فلا ادري التخليط في حديثه من القاسم، أو منهما، لأن القاسم ليس بشيء في الحديث، وأكثر رواية بشر عن القاسم، فمن هذا وقع الاشتباه فيه".

وقال ابن عدي في"الكامل" (2/ 441):"عامة ما يرويه عن القاسم وعن غيره لا يتابع عليه، وهو ضعيف كما ذكروه".

وأمَّا إسحاق بن مالك الحضرمي شامي، فهو ضعيف أيضًا كما قال الأزديّ، وقال ابن القطان: لا يعرف، انظر ترجمته في"الميزان، و"اللسان".




উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রকাশ্যে উচ্চস্বরে কুরআন পাঠ করে, সে ঐ ব্যক্তির মতো যে প্রকাশ্যে উচ্চস্বরে দান (সদকা) করে। আর যে ব্যক্তি গোপনে (নিচু স্বরে/মনে মনে) কুরআন পাঠ করে, সে ঐ ব্যক্তির মতো যে গোপনে দান (সদকা) করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2628)


2628 - عن أبي سعيد قال: اعتكف رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد، فسمِعَهم يُجهرون بالقراءةِ، فكشف الستر وقال:"أَلّا إنَّ كُلَّكُم مناجٍ ربَّه، فلا يُؤْذِينَّ بعضُكم بعضًا، ولا يَرفعُ بعضُكم على بعض في القراءة" أو قال:"في الصلاة".

صحيح: رواه أبو داود (1322) عن الحسن بن علي، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن إسماعيل ابن أمية، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد فذكره، وإسناده صحيح.

والحديث في مصنف عبد الرزاق (4216) ومن طريقه رواه الإمام أحمد (11896) وصحّحه ابن خزيمة (1162)، والحاكم (1/ 310، 311) وقال:"على شرط الشيخين".




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ইতিকাফ করছিলেন। তখন তিনি (সাহাবীদেরকে) উচ্চস্বরে কিরাত পাঠ করতে শুনলেন। তিনি পর্দা সরিয়ে বললেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই তোমাদের প্রত্যেকেই তার রবের সাথে নীরবে কথা বলছে (মুনাজাত করছে)। সুতরাং তোমাদের কেউ যেন কাউকে কষ্ট না দেয় এবং কিরাতের সময় তোমাদের কেউ যেন অন্যের উপর আওয়াজ উঁচু না করে।" অথবা তিনি বললেন: "সালাতে (নামাজে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2629)


2629 - عن ابن عمر قال: اعتكف رسول الله صلى الله عليه وسلم في العشر الأواخر من رمضان، فاتُّخِذ له فيه بيتٌ من سَعَفٍ، قال: فأخرج رأسه ذات يومٍ فقال:"إن المصلِّي يُناجي ربَّه عز وجل فلينظر أحدكم بما يناجي ربَّه، ولا يجهر بعضكم على بعض بالقراءة".

حسن: رواه الإمام أحمد (5349) عن عتَّاب، حدّثنا - أبو حمزة - يعني السكري -، عن ابن أبي ليلى، عن صدقة المكي، عن ابن عمر فذكره.

وأخرجه البزار - كشف الأستار - (726)، وابن خزيمة في صحيحه (2237) كلاهما عن طريق ابن أبي ليلى به، وابن أبي ليلى هو: محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلي سيء الحفظ، إلا أنه توبع، فقد رواه الإمام أحمد (4928) من وجه آخر عن معمر، عن صدقة المكي به، ومعمر هو: ابن راشد الصنعاني.

وأما صدقة فقال ابن خزيمة: هو ابن يسار، أي الجزري وهو ثقة، ولكن لم ينص أحد أنه سمع ابن عمر، وجعله الحافظ في التقريب في المرتبة الرابعة مات في أَوَّل خلافة بني العباس وكان ذلك سنة اثنتين وثلاثين، أي بعد المائة. وعبد الله بن عمر مات سنة ثلاث وسبعين فيكون بين وفاتيهما تسع وخمسون سنة. ولقاؤهما ممكن لو عرفنا عُمْرَ صدقةَ بنِ يسارِ عند وفاته.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন। তখন তাঁর জন্য খেজুর পাতার ডাল (সা’ফ) দিয়ে একটি তাঁবু তৈরি করা হয়েছিল। তিনি বলেন, একদিন তিনি তাঁর মাথা বের করে বললেন: “নিশ্চয় নামাজী তার মহান প্রতিপালক আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার সাথে নিভৃতে কথা বলে (মুনাজাত করে)। সুতরাং তোমাদের প্রত্যেকেই যেন লক্ষ্য করে যে সে কী দিয়ে তার রবের সাথে নিভৃতে কথা বলছে, আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের উপর উচ্চস্বরে কিরাত না পড়ে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2630)


2630 - عن البياضي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج على النَّاس وهم يُصلون، وقد علتْ أصواتُهم بالقراءة فقال:"إن المُصلِّي يُناجي ربَّه، فلينظُر بما يناجيه به، ولا يجهر بعضكم على بعضٍ بالقرآن".

حسن: رواه مالك في الصلاة (29) عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي حازم التَّمَّار، عن البياضي فذكره.

ورواه الإمام أحمد (19022)، والنسائي في"الكبرى" (3364، 8091) والبغوي في"شرح السنة" (608) كلهم من طريق مالك به.

قال ابن عبد البر في"التمهيد" (23/ 309):"حديث البياضي وحديث أبي سعيد ثابتان صحيحان".

ولم أقف على اسم البياضي، وهو رجل من بني بياضة من الأنصار ولا يضر ذلك في صحة الحديث، لأنه صحابي وأبو حازم التمار جعله الحافظ في مرتبة"مقبول" أي إذا توبع، فقد تابعه عطاء بن يسار كما رواه ابن أبي عاصم في"الأحاد والمثاني" (2007) مقرونًا بأبي حازم، ورواه النسائي في"الكبرى" (1360، 1361) من طريق عطاء بن يسار وحده، عن رجل من بني بياضة من الأنصار، وتابعه أيضًا أبو سلمة كما رواه النسائي في"الكبرى" (3363) وبهذه المتابعات ترتفع الإسناد إلى الحسن لغيره، وفي أبي التمار كلام غير هذا انظر"تهذيب التهذيب".

إلا أن البغوي حمل النهي عن الجهر في هذا الحديث أن يكون مع الإمام فقال:"السنةُ في
القراءة، وفي كل ذكر يأتي به خلف الإمام أن يُسمِع نفسَه، لا يغلبَ جارَه، قال الشعبي: إذا قرأتَ القرآن فاقرأ قراءةً تُسمِع أذنيك، وتُفقِّهُ قلبَكَ، فإن الأذنَ عَدْلٌ بين اللسانِ والقلبِ".

وفي الباب عن أبي هريرة أن عبد الله بن حُذافة السهمي قام يُصَلِّي، فجهر بصلاته، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا ابن حُذافة! لا تُسْمِعْني، وأسمعْ ربَّك عز وجل".

رواه الإمام أحمد (8326)، والبزار"كشف الأستار" (727) كلاهما من حديث وهب بن جرير، عن أبيه، عن النعمان، يحدث عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وإسناده ضعيف فإن النعمان هو: ابن راشد الجزري أبو إسحاق الرقي ضعفه ابن معين وأبو داود والنسائي، وقال الإمام أحمد: مضطرب الحديث. وقال البخاري: في حديثه وهم كثير، وهو صدوقٌ في الأصلِ، وأدخله في الضعفاء، ولكن قال ابن أبي حاتم: سمعت أبي يقول: يُحوَّل منه. لأنَّ أبا حاتم كان حسن الرأي فيه مع اعترافه بأن في حديثه وهما كثيرا، فمثله لا يحسن حديثه ولكن لا بأس بقبوله في المتابعات لأنه حينئذ لم يكن قد وهم. وأما الهيثمي فقال في"المجمع" (2/ 256): رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير إلَّا أنَّه قال: عن أبي سلمة أنَّ عبد الله بن حُذَافة. ورجال أحمد رجال الصحيح" انتهى.

قلت: وهو كما قال فإن النعمان بن راشد من رجال مسلم، ولكن فاته بأن رجال البزار أيضًا رجال الصحيح كما رأيت.

وفي معناه ما رواه الحارث في مسنده"بغية الباحث" (231) عن جابر بن عبد الله إلا أن فيه محمد بن يعقوب المدني قال الذهبي في الميزانه:"له مناكير"، وقال ابن عدي في"الكامل" (6/ 2175، 2176): هذا بعض أحاديثه فيه إنكار، وليس حديثه إلا القليل".

وكذلك رُويَ عن علي بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن يرفعَ الرجلُ صوتَه بالقراءة قبل العِشاء وبعدها، يُغلط أصحابَه وهم يُصلُّون. رواه الإمام أحمد (663) وفيه الحارث وهو ضعيف كما قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 265).




আল-বায়াদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের কাছে বের হলেন, যখন তারা সালাত আদায় করছিল এবং তাদের কিরাআতের আওয়াজ উঁচু হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মুসল্লি তার রবের সাথে নীরবে কথা বলে (মুনাজাত করে), তাই সে যেন লক্ষ্য রাখে যে সে কী দিয়ে তাঁর সাথে মুনাজাত করছে। আর তোমাদের কেউ যেন কুরআনের তেলাওয়াতে অন্যদের উপর উচ্চস্বরে আওয়াজ না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2631)


2631 - عن حذيفة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قام للتهجد من الليل يشُوص فاه بالسواك.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1136)، ومسلم في الطهارة (255) كلاهما من حديث حصين، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكره.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি মিসওয়াক দিয়ে তাঁর মুখ পরিষ্কার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2632)


2632 - عن سعد بن هشام بن عامر قال: قلت يا أم المؤمنين (عائشة) أَنَبِئيني عن وِتر رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: كنا نُعِدُّ له سواكَه وطَهورَه، فيبعثه الله ما شاء أن يبعثه من الليل، فيتسوَّكُ، ويتوضأُ، ويصلِّي تسعَ ركعات لا يجلس فيها إلا في الثامنةِ … في
حديث طويل.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من حديث قتادة، عن زُرارة، عن سعد بن هشام بن عامر فذكره في حديث طويل مضى في جامع صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في اللَّيلِ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু হিশাম ইবনু 'আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিতর (সালাত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমরা তাঁর জন্য তাঁর মিসওয়াক ও ওযুর পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। অতঃপর রাতে আল্লাহ যখন ইচ্ছা তাঁকে জাগিয়ে দিতেন। তখন তিনি মিসওয়াক করতেন, ওযু করতেন এবং নয় রাক‘আত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি অষ্টম রাক‘আত ছাড়া অন্য কোনো রাক‘আতে বসতেন না... (এই হাদীসটি দীর্ঘ)।









আল-জামি` আল-কামিল (2633)


2633 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل ليصلي افتح صلاتَه بركعتين خفيفتين.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (767) من طريق هُشَيم قال: أخبرنا أبو حُرَّة، عن الحسن، عن سعد بن هِشام، عن عائشة فذكرت مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রাতে (সালাত আদায়ের জন্য) দাঁড়াতেন, তখন তিনি তাঁর সালাত দু’রাকাত সংক্ষিপ্ত (হালকা) নামায দ্বারা শুরু করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2634)


2634 - عن أبي هريرة، قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا قام من اللَّيل يتهجّد صلّى ركعتين خفيفتين.

صحيح: رواه أبو عوانة في"صحيحه" (2239)، ومن طريقه البغوي في"شرح السنة" (4/ 18) من طريق سليمان بن حيان، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.

وكذلك رواه ابن أبي شيبة (2/ 273) - ومن طريقه البيهقيّ (3/ 6) - عن أبي خالد الأحمر، عن هشام، به، مثله.

وقد اختلف في هذا الحديث على هشام بن حسان على أربعة ألوان: هذا أوَّله.

والثاني: عنه، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قام أحدكم من الليل فليفتتح صلاتَه بركعتين خفيفتين".

رواه مسلم في صلاة المسافرين (768) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام، عن محمد، عن أبي هريرة، قال (فذكره).

وكذلك رواه الترمذيّ في"الشمائل" (266) عن محمد بن العلاء، عن أبي أسامة، به، مثله.

وكذلك رواه أبو داود (1323) عن سليمان بن حيان، عن هشام، به.

وكذلك رواه أبو عوانة في"صحيحه" (2241) عن زائدة، عن هشام.

والثالث: عنه، عن ابن سيرين، قال: قال أبو هريرة:"إذا قام أحدكم من الليل فليفتتح بركعتين خفيفتين". رواه ابن أبي شيبة عن هشيم، قال: أخبرنا هشام، به.

وهشيم هو ابن بشير الواسطي مدلس إِلَّا أنه صرَّح بالإخبار.

وكذلك قال أبو داود (1324): روى هذا الحديث حمّاد بن سلمة وزهير بن معاوية وجماعة عن هشام، عن محمد أوقفوه على أبي هريرة، وكذلك رواه أيوب وابن عون أوقفوه على أبي هريرة، ورواه ابن عون عن محمد قال:"فيهما تجوَّز". انتهى كلام أبي داود.
واللون الرابع: عن هشام، عن ابن سيرين، قال:"ما رأيته افتتح صلاة تطوع إِلَّا بركعتين خفيفتين".

رواه ابن أبي شيبة عن أبي أسامة، عن هشام، به.

والأقرب إلى الصواب من هذا الاختلاف أنه من فعل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ويشهد له حديث عائشة السّابق. ولا يُعلّ برواية من رواه موقوفًا على أبي هريرة، بل الأشبه أن المرفوع والموقوف كلاهما محفوظ. والله تعالى أعلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি দুটি সংক্ষিপ্ত (হালকা) রাক'আত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2635)


2635 - عن جابر بن عبد الله أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل الصّلاة طول القنوت".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (756) من حديث أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.

ورواه من طريق أبي سفيان عن جابر قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أي الصّلاة أفضل؟ فقال:"طول القنوت".

قال النوويّ: المراد بالقنوت هنا القيام باتفاق العلماء فيما علمتُ.

قلت: القصد هنا صلاة الليل، لأن الصّلاة المفروضة المستحب فيها التخفيف.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সর্বশ্রেষ্ঠ সালাত (নামায) হলো কুনূত (দাঁড়িয়ে থাকা) দীর্ঘ করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (2636)


2636 - عن عبد الله بن مسعود قال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأطال حتَّى هممتُ بأمرِ سوءٍ، قال: قيل: وما هممتَ به؟ قال: هممتُ أن أجلس وأدعه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1135)، ومسلم في صلاة المسافرين (773) كلاهما من حديث الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله فذكره، واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاريّ نحوه أيضًا.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি এত দীর্ঘ করলেন যে, আমি মন্দ কিছু করার ইচ্ছা করলাম। জিজ্ঞাসা করা হলো, আপনি কী মন্দ কাজ করার ইচ্ছা করেছিলেন? তিনি বললেন, আমি বসে যেতে এবং তাঁকে (সালাত আদায়রত অবস্থায়) ছেড়ে দিতে ইচ্ছা করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2637)


2637 - عن حذيفة قال: صلَّيتُ مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فافتتح البقرة، فقلت: يركع عند المائة، ثمّ مضى، فقلت: يُصَلِّي بها في ركعة فمضى، فقلت: يركع بها، ثمّ افتتح النساء فقرأها. ثمّ افتح آل عمران فقرأها. يقرأ مترسِّلًا، إذا مرَّ بآية فيها تسبيح سَبَّح. وإذا مرَّ بسُؤَال سأَل، وإذا مرَّ بتعوذٍ تعوَّذَ. ثمَّ ركع فجعل يقول:"سبحان ربي العظيم" فكان ركوعه نحوًا من قيامه، ثمّ قال:"سمع الله لمن حمده" ثمّ قام طويلًا قريبًا مما ركع، ثمّ سجد فقال:"سبحان ربي الأعلى" فكان سجوده قريبًا من قيامه.

وفي رواية من الزيادة: فقال:"سَمِع الله لمن حمده ربنا لك الحمد".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (772) من طرق عن الأعمش، عن سَعْد بن عبيدة، عن المستورد بن الأحْنف، عن صِلة بن زفر، عن حذيفة فذكره.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি (সালাত শুরু করে) সূরা আল-বাকারা শুরু করলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো একশো আয়াত পড়ার পরই রুকু করবেন। এরপর তিনি সামনে এগোতে থাকলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো এই সূরা দিয়েই এক রাকাআত শেষ করবেন। কিন্তু তিনি আরও এগোতে থাকলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো এই সূরা শেষ করে রুকু করবেন। এরপর তিনি সূরা আন-নিসা শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। এরপর তিনি সূরা আলে ইমরান শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। তিনি ধীরে ধীরে পড়ছিলেন। যখন তিনি এমন কোনো আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যাতে আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করা হয়েছে, তখন তিনি তাসবীহ পড়তেন। যখন তিনি কোনো প্রার্থনার আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি (আল্লাহর কাছে) চাইতেন। আর যখন তিনি কোনো আশ্রয় চাওয়ার আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইতেন। এরপর তিনি রুকু করলেন এবং বলতে লাগলেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আযীম (আমার মহান প্রতিপালক পবিত্রতম)"। তাঁর রুকু তাঁর কিয়ামের (দাঁড়িয়ে থাকার) কাছাকাছি দীর্ঘ ছিল। এরপর তিনি বললেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শোনেন, যে তার প্রশংসা করে)"। এরপর তিনি দীর্ঘ সময় ধরে দাঁড়ালেন, যা তাঁর রুকুর কাছাকাছি ছিল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং বললেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আ'লা (আমার মহান প্রতিপালক অতি পবিত্রতম)"। তাঁর সিজদা তাঁর কিয়ামের কাছাকাছি দীর্ঘ ছিল।

অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: তিনি বলেছেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শোনেন, যে তার প্রশংসা করে) রাব্বানা লাকাল হামদ (হে আমাদের প্রতিপালক! আপনার জন্যই সকল প্রশংসা)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2638)


2638 - عن ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنت أَبيتُ عند باب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأُعْطِيه وَضُوءه
فأسمعه الهَويَّ من الليل يقول:"سمع الله لمن حمده"، وأسمعه الهَوِيَّ من الليل يقول: {الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ}.

صحيح: رواه الترمذيّ (3416) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا النضر بن شُميل ووهب بن جرير وأبو عامر العقدي وعبد الصمد بن عبد الوارث قالوا: حَدَّثَنَا هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، حَدَّثَنِي ربيعة بن كعب فذكره، قال الترمذيّ: حسن صحيح.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16575، 16578) من طرق أخرى، عن هشام به، مثله.

ورواه النسائيّ (1618)، وأحمد (16574) كلاهما من طريق معمر، وقرنه أحمد بالأوزاعيّ، كلاهما عن يحيى بن أبي كثير وفيه: يقول صلى الله عليه وسلم:"سبحان الله ربّ العالمين" الهَوِيّ، ثمّ يقول:"سبحان الله وبحمده" الهَوِيَّ.

ورواه ابن ماجة (3879) من حديث شيبان، عن يحيى به مثله.

ولكن رواه أبو عوانة (2235) من طريق الوليد بن مسلم، قال: حَدَّثَنَا الأوزاعيّ، عن يحيى وفيه:"سبحان ربي وبحمده، سبحان ربي وبحمده، سبحان ربي وبحمده، سبحان ربّ العالمين" ثلاثًا الهَوِيَّ.

والوليد بن مسلم مدلِّس إِلَّا أنه صرَّح.

وأصل حديث ربيعة هذا في صحيح مسلم (489) من طريق هِقْل بن زياد، قال: سمعت الأوزاعي قال: حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، قال: حَدَّثَنِي أبو سلمة قال: حَدَّثَنِي ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنت أبيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتيتُه بوضوئه وحاجته، فقال لي:"سلْ" فقلت: أسألك مرافقتك في الجنّة. قال:"أو غير ذلك؟" قلت: هو ذاك. قال:"فأعِنِّي على نفسك بكثرة السجود" وسبق تخريجه في فضل السجود والحث عليه.

فالذي يبدو أن ربيعة كان يحدث بكل هذا، ولكن بعض الرواة جزّؤوه.

والهَوِيَّ معناه حين من الزمن من الليل، وفيه إشارة إلى أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُطيل قيام الليل.

وربيعة هذا كان من أصحاب الصُفَّة، ولم يزل مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى أن قُبِض، فخرج من المدينة، فنزل في بلاد أسلم على بَرِيدٍ من المدينة، وبقي أيام الحَرَّة، ومات بالحَرَّة سنة ثلاث وستين في ذي الحجة.

وروى المبارك بن فَضالة عن أبي عِمران الجُوْني قصة غريبة في تزوجه، رواه الإمام أحمد (16577) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، قال: حَدَّثَنَا المبارك بن فَضالة، قال: حَدَّثَنَا أبو عمران الجوني فذكر الفصة، والمبارك بن فَضالة مع التدليس وصفه النسائيّ بأنه ضعيف، ورواه أيضًا الحاكم (2/ 175) من هذا الوجه وقال: صحيح على شرط مسلم، وتعقبه الذّهبيّ بقوله: لم يحتج مسلم بمبارك، انظر القصة بالكامل في ترجمته في كتاب"فضائل الصّحابة".




রবী‘আহ ইবনু কা‘ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজায় রাত যাপন করতাম এবং আমি তাঁকে তাঁর ওযূর পানি সরবরাহ করতাম। আমি রাতের দীর্ঘ সময় ধরে তাঁকে বলতে শুনতাম: “সামি‘আল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শুনেন, যে তার প্রশংসা করে)।” এবং আমি রাতের দীর্ঘ সময় ধরে তাঁকে বলতে শুনতাম: “আলহামদু লিল্লা-হি রাব্বিল ‘আ-লামীন (সকল প্রশংসা বিশ্বজগতের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য)।”









আল-জামি` আল-কামিল (2639)


2639 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قَسَّم سورةَ البقرةِ في ركعتين.
حسن: رواه أبو يعلى"المقصد العلي" (405) عن الحسن بن حمّاد، سجَّادة، ثنا حفص بن غياث، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن لأجل سجَّادة وهو: الحسن بن حمّاد بن كُسَيب، الملقب"سجادة"، قال الإمام أحمد: صاحب سنة وما بلغني عنه إِلَّا خيرًا"تاريخ بغداد" (3755).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূরা বাকারাকে দুই রাক’আতে (ভাগ করে) পাঠ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2640)


2640 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلِّي إحدى عشرة ركعة، كانت تلك صلاته، يسجد السجدة من ذلك قَدْرَ ما يقرأُ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1123) عن أبي اليمان قال: أخبرنا شُعيب، عن الزّهريّ، قال: أخبرني عروة، أن عائشة أخبرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (736) من وجه آخر عن ابن شهاب بإسناده إِلَّا أنه لم يذكر قولها:"يسجد السجدة من ذلك قَدْرَ ما يقرأُ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগারো রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করতেন। এটাই ছিল তাঁর সালাত। তিনি (প্রত্যেক) সিজদায় এত দীর্ঘ সময় অতিবাহিত করতেন যে, তোমাদের কেউ মাথা তোলার পূর্বে পঞ্চাশটি আয়াত পাঠ করার সমপরিমাণ সময় লাগত।