আল-জামি` আল-কামিল
2628 - عن أبي سعيد قال: اعتكف رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد، فسمِعَهم يُجهرون بالقراءةِ، فكشف الستر وقال:"أَلّا إنَّ كُلَّكُم مناجٍ ربَّه، فلا يُؤْذِينَّ بعضُكم بعضًا، ولا يَرفعُ بعضُكم على بعض في القراءة" أو قال:"في الصلاة".
صحيح: رواه أبو داود (1322) عن الحسن بن علي، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن إسماعيل ابن أمية، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد فذكره، وإسناده صحيح.
والحديث في مصنف عبد الرزاق (4216) ومن طريقه رواه الإمام أحمد (11896) وصحّحه ابن خزيمة (1162)، والحاكم (1/ 310، 311) وقال:"على شرط الشيخين".
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ইতিকাফ করছিলেন। তখন তিনি (সাহাবীদেরকে) উচ্চস্বরে কিরাত পাঠ করতে শুনলেন। তিনি পর্দা সরিয়ে বললেন: "সাবধান! নিশ্চয়ই তোমাদের প্রত্যেকেই তার রবের সাথে নীরবে কথা বলছে (মুনাজাত করছে)। সুতরাং তোমাদের কেউ যেন কাউকে কষ্ট না দেয় এবং কিরাতের সময় তোমাদের কেউ যেন অন্যের উপর আওয়াজ উঁচু না করে।" অথবা তিনি বললেন: "সালাতে (নামাজে)।"
2629 - عن ابن عمر قال: اعتكف رسول الله صلى الله عليه وسلم في العشر الأواخر من رمضان، فاتُّخِذ له فيه بيتٌ من سَعَفٍ، قال: فأخرج رأسه ذات يومٍ فقال:"إن المصلِّي يُناجي ربَّه عز وجل فلينظر أحدكم بما يناجي ربَّه، ولا يجهر بعضكم على بعض بالقراءة".
حسن: رواه الإمام أحمد (5349) عن عتَّاب، حدّثنا - أبو حمزة - يعني السكري -، عن ابن أبي ليلى، عن صدقة المكي، عن ابن عمر فذكره.
وأخرجه البزار - كشف الأستار - (726)، وابن خزيمة في صحيحه (2237) كلاهما عن طريق ابن أبي ليلى به، وابن أبي ليلى هو: محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلي سيء الحفظ، إلا أنه توبع، فقد رواه الإمام أحمد (4928) من وجه آخر عن معمر، عن صدقة المكي به، ومعمر هو: ابن راشد الصنعاني.
وأما صدقة فقال ابن خزيمة: هو ابن يسار، أي الجزري وهو ثقة، ولكن لم ينص أحد أنه سمع ابن عمر، وجعله الحافظ في التقريب في المرتبة الرابعة مات في أَوَّل خلافة بني العباس وكان ذلك سنة اثنتين وثلاثين، أي بعد المائة. وعبد الله بن عمر مات سنة ثلاث وسبعين فيكون بين وفاتيهما تسع وخمسون سنة. ولقاؤهما ممكن لو عرفنا عُمْرَ صدقةَ بنِ يسارِ عند وفاته.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন। তখন তাঁর জন্য খেজুর পাতার ডাল (সা’ফ) দিয়ে একটি তাঁবু তৈরি করা হয়েছিল। তিনি বলেন, একদিন তিনি তাঁর মাথা বের করে বললেন: “নিশ্চয় নামাজী তার মহান প্রতিপালক আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার সাথে নিভৃতে কথা বলে (মুনাজাত করে)। সুতরাং তোমাদের প্রত্যেকেই যেন লক্ষ্য করে যে সে কী দিয়ে তার রবের সাথে নিভৃতে কথা বলছে, আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের উপর উচ্চস্বরে কিরাত না পড়ে।”
2630 - عن البياضي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج على النَّاس وهم يُصلون، وقد علتْ أصواتُهم بالقراءة فقال:"إن المُصلِّي يُناجي ربَّه، فلينظُر بما يناجيه به، ولا يجهر بعضكم على بعضٍ بالقرآن".
حسن: رواه مالك في الصلاة (29) عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي حازم التَّمَّار، عن البياضي فذكره.
ورواه الإمام أحمد (19022)، والنسائي في"الكبرى" (3364، 8091) والبغوي في"شرح السنة" (608) كلهم من طريق مالك به.
قال ابن عبد البر في"التمهيد" (23/ 309):"حديث البياضي وحديث أبي سعيد ثابتان صحيحان".
ولم أقف على اسم البياضي، وهو رجل من بني بياضة من الأنصار ولا يضر ذلك في صحة الحديث، لأنه صحابي وأبو حازم التمار جعله الحافظ في مرتبة"مقبول" أي إذا توبع، فقد تابعه عطاء بن يسار كما رواه ابن أبي عاصم في"الأحاد والمثاني" (2007) مقرونًا بأبي حازم، ورواه النسائي في"الكبرى" (1360، 1361) من طريق عطاء بن يسار وحده، عن رجل من بني بياضة من الأنصار، وتابعه أيضًا أبو سلمة كما رواه النسائي في"الكبرى" (3363) وبهذه المتابعات ترتفع الإسناد إلى الحسن لغيره، وفي أبي التمار كلام غير هذا انظر"تهذيب التهذيب".
إلا أن البغوي حمل النهي عن الجهر في هذا الحديث أن يكون مع الإمام فقال:"السنةُ في
القراءة، وفي كل ذكر يأتي به خلف الإمام أن يُسمِع نفسَه، لا يغلبَ جارَه، قال الشعبي: إذا قرأتَ القرآن فاقرأ قراءةً تُسمِع أذنيك، وتُفقِّهُ قلبَكَ، فإن الأذنَ عَدْلٌ بين اللسانِ والقلبِ".
وفي الباب عن أبي هريرة أن عبد الله بن حُذافة السهمي قام يُصَلِّي، فجهر بصلاته، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا ابن حُذافة! لا تُسْمِعْني، وأسمعْ ربَّك عز وجل".
رواه الإمام أحمد (8326)، والبزار"كشف الأستار" (727) كلاهما من حديث وهب بن جرير، عن أبيه، عن النعمان، يحدث عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وإسناده ضعيف فإن النعمان هو: ابن راشد الجزري أبو إسحاق الرقي ضعفه ابن معين وأبو داود والنسائي، وقال الإمام أحمد: مضطرب الحديث. وقال البخاري: في حديثه وهم كثير، وهو صدوقٌ في الأصلِ، وأدخله في الضعفاء، ولكن قال ابن أبي حاتم: سمعت أبي يقول: يُحوَّل منه. لأنَّ أبا حاتم كان حسن الرأي فيه مع اعترافه بأن في حديثه وهما كثيرا، فمثله لا يحسن حديثه ولكن لا بأس بقبوله في المتابعات لأنه حينئذ لم يكن قد وهم. وأما الهيثمي فقال في"المجمع" (2/ 256): رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير إلَّا أنَّه قال: عن أبي سلمة أنَّ عبد الله بن حُذَافة. ورجال أحمد رجال الصحيح" انتهى.
قلت: وهو كما قال فإن النعمان بن راشد من رجال مسلم، ولكن فاته بأن رجال البزار أيضًا رجال الصحيح كما رأيت.
وفي معناه ما رواه الحارث في مسنده"بغية الباحث" (231) عن جابر بن عبد الله إلا أن فيه محمد بن يعقوب المدني قال الذهبي في الميزانه:"له مناكير"، وقال ابن عدي في"الكامل" (6/ 2175، 2176): هذا بعض أحاديثه فيه إنكار، وليس حديثه إلا القليل".
وكذلك رُويَ عن علي بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن يرفعَ الرجلُ صوتَه بالقراءة قبل العِشاء وبعدها، يُغلط أصحابَه وهم يُصلُّون. رواه الإمام أحمد (663) وفيه الحارث وهو ضعيف كما قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 265).
আল-বায়াদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের কাছে বের হলেন, যখন তারা সালাত আদায় করছিল এবং তাদের কিরাআতের আওয়াজ উঁচু হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মুসল্লি তার রবের সাথে নীরবে কথা বলে (মুনাজাত করে), তাই সে যেন লক্ষ্য রাখে যে সে কী দিয়ে তাঁর সাথে মুনাজাত করছে। আর তোমাদের কেউ যেন কুরআনের তেলাওয়াতে অন্যদের উপর উচ্চস্বরে আওয়াজ না করে।"
2631 - عن حذيفة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قام للتهجد من الليل يشُوص فاه بالسواك.
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1136)، ومسلم في الطهارة (255) كلاهما من حديث حصين، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكره.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি মিসওয়াক দিয়ে তাঁর মুখ পরিষ্কার করতেন।
2632 - عن سعد بن هشام بن عامر قال: قلت يا أم المؤمنين (عائشة) أَنَبِئيني عن وِتر رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: كنا نُعِدُّ له سواكَه وطَهورَه، فيبعثه الله ما شاء أن يبعثه من الليل، فيتسوَّكُ، ويتوضأُ، ويصلِّي تسعَ ركعات لا يجلس فيها إلا في الثامنةِ … في
حديث طويل.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من حديث قتادة، عن زُرارة، عن سعد بن هشام بن عامر فذكره في حديث طويل مضى في جامع صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في اللَّيلِ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু হিশাম ইবনু 'আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিতর (সালাত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমরা তাঁর জন্য তাঁর মিসওয়াক ও ওযুর পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। অতঃপর রাতে আল্লাহ যখন ইচ্ছা তাঁকে জাগিয়ে দিতেন। তখন তিনি মিসওয়াক করতেন, ওযু করতেন এবং নয় রাক‘আত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি অষ্টম রাক‘আত ছাড়া অন্য কোনো রাক‘আতে বসতেন না... (এই হাদীসটি দীর্ঘ)।
2633 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل ليصلي افتح صلاتَه بركعتين خفيفتين.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (767) من طريق هُشَيم قال: أخبرنا أبو حُرَّة، عن الحسن، عن سعد بن هِشام، عن عائشة فذكرت مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রাতে (সালাত আদায়ের জন্য) দাঁড়াতেন, তখন তিনি তাঁর সালাত দু’রাকাত সংক্ষিপ্ত (হালকা) নামায দ্বারা শুরু করতেন।
2634 - عن أبي هريرة، قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا قام من اللَّيل يتهجّد صلّى ركعتين خفيفتين.
صحيح: رواه أبو عوانة في"صحيحه" (2239)، ومن طريقه البغوي في"شرح السنة" (4/ 18) من طريق سليمان بن حيان، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
وكذلك رواه ابن أبي شيبة (2/ 273) - ومن طريقه البيهقيّ (3/ 6) - عن أبي خالد الأحمر، عن هشام، به، مثله.
وقد اختلف في هذا الحديث على هشام بن حسان على أربعة ألوان: هذا أوَّله.
والثاني: عنه، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قام أحدكم من الليل فليفتتح صلاتَه بركعتين خفيفتين".
رواه مسلم في صلاة المسافرين (768) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام، عن محمد، عن أبي هريرة، قال (فذكره).
وكذلك رواه الترمذيّ في"الشمائل" (266) عن محمد بن العلاء، عن أبي أسامة، به، مثله.
وكذلك رواه أبو داود (1323) عن سليمان بن حيان، عن هشام، به.
وكذلك رواه أبو عوانة في"صحيحه" (2241) عن زائدة، عن هشام.
والثالث: عنه، عن ابن سيرين، قال: قال أبو هريرة:"إذا قام أحدكم من الليل فليفتتح بركعتين خفيفتين". رواه ابن أبي شيبة عن هشيم، قال: أخبرنا هشام، به.
وهشيم هو ابن بشير الواسطي مدلس إِلَّا أنه صرَّح بالإخبار.
وكذلك قال أبو داود (1324): روى هذا الحديث حمّاد بن سلمة وزهير بن معاوية وجماعة عن هشام، عن محمد أوقفوه على أبي هريرة، وكذلك رواه أيوب وابن عون أوقفوه على أبي هريرة، ورواه ابن عون عن محمد قال:"فيهما تجوَّز". انتهى كلام أبي داود.
واللون الرابع: عن هشام، عن ابن سيرين، قال:"ما رأيته افتتح صلاة تطوع إِلَّا بركعتين خفيفتين".
رواه ابن أبي شيبة عن أبي أسامة، عن هشام، به.
والأقرب إلى الصواب من هذا الاختلاف أنه من فعل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ويشهد له حديث عائشة السّابق. ولا يُعلّ برواية من رواه موقوفًا على أبي هريرة، بل الأشبه أن المرفوع والموقوف كلاهما محفوظ. والله تعالى أعلم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে তাহাজ্জুদের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি দুটি সংক্ষিপ্ত (হালকা) রাক'আত সালাত আদায় করতেন।
2635 - عن جابر بن عبد الله أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل الصّلاة طول القنوت".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (756) من حديث أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.
ورواه من طريق أبي سفيان عن جابر قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أي الصّلاة أفضل؟ فقال:"طول القنوت".
قال النوويّ: المراد بالقنوت هنا القيام باتفاق العلماء فيما علمتُ.
قلت: القصد هنا صلاة الليل، لأن الصّلاة المفروضة المستحب فيها التخفيف.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সর্বশ্রেষ্ঠ সালাত (নামায) হলো কুনূত (দাঁড়িয়ে থাকা) দীর্ঘ করা।"
2636 - عن عبد الله بن مسعود قال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأطال حتَّى هممتُ بأمرِ سوءٍ، قال: قيل: وما هممتَ به؟ قال: هممتُ أن أجلس وأدعه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1135)، ومسلم في صلاة المسافرين (773) كلاهما من حديث الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله فذكره، واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاريّ نحوه أيضًا.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি এত দীর্ঘ করলেন যে, আমি মন্দ কিছু করার ইচ্ছা করলাম। জিজ্ঞাসা করা হলো, আপনি কী মন্দ কাজ করার ইচ্ছা করেছিলেন? তিনি বললেন, আমি বসে যেতে এবং তাঁকে (সালাত আদায়রত অবস্থায়) ছেড়ে দিতে ইচ্ছা করেছিলাম।
2637 - عن حذيفة قال: صلَّيتُ مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فافتتح البقرة، فقلت: يركع عند المائة، ثمّ مضى، فقلت: يُصَلِّي بها في ركعة فمضى، فقلت: يركع بها، ثمّ افتتح النساء فقرأها. ثمّ افتح آل عمران فقرأها. يقرأ مترسِّلًا، إذا مرَّ بآية فيها تسبيح سَبَّح. وإذا مرَّ بسُؤَال سأَل، وإذا مرَّ بتعوذٍ تعوَّذَ. ثمَّ ركع فجعل يقول:"سبحان ربي العظيم" فكان ركوعه نحوًا من قيامه، ثمّ قال:"سمع الله لمن حمده" ثمّ قام طويلًا قريبًا مما ركع، ثمّ سجد فقال:"سبحان ربي الأعلى" فكان سجوده قريبًا من قيامه.
وفي رواية من الزيادة: فقال:"سَمِع الله لمن حمده ربنا لك الحمد".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (772) من طرق عن الأعمش، عن سَعْد بن عبيدة، عن المستورد بن الأحْنف، عن صِلة بن زفر، عن حذيفة فذكره.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি এক রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি (সালাত শুরু করে) সূরা আল-বাকারা শুরু করলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো একশো আয়াত পড়ার পরই রুকু করবেন। এরপর তিনি সামনে এগোতে থাকলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো এই সূরা দিয়েই এক রাকাআত শেষ করবেন। কিন্তু তিনি আরও এগোতে থাকলেন। আমি মনে মনে বললাম: তিনি হয়তো এই সূরা শেষ করে রুকু করবেন। এরপর তিনি সূরা আন-নিসা শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। এরপর তিনি সূরা আলে ইমরান শুরু করলেন এবং তা পড়লেন। তিনি ধীরে ধীরে পড়ছিলেন। যখন তিনি এমন কোনো আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যাতে আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করা হয়েছে, তখন তিনি তাসবীহ পড়তেন। যখন তিনি কোনো প্রার্থনার আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি (আল্লাহর কাছে) চাইতেন। আর যখন তিনি কোনো আশ্রয় চাওয়ার আয়াতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইতেন। এরপর তিনি রুকু করলেন এবং বলতে লাগলেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আযীম (আমার মহান প্রতিপালক পবিত্রতম)"। তাঁর রুকু তাঁর কিয়ামের (দাঁড়িয়ে থাকার) কাছাকাছি দীর্ঘ ছিল। এরপর তিনি বললেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শোনেন, যে তার প্রশংসা করে)"। এরপর তিনি দীর্ঘ সময় ধরে দাঁড়ালেন, যা তাঁর রুকুর কাছাকাছি ছিল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং বললেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আ'লা (আমার মহান প্রতিপালক অতি পবিত্রতম)"। তাঁর সিজদা তাঁর কিয়ামের কাছাকাছি দীর্ঘ ছিল।
অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: তিনি বলেছেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শোনেন, যে তার প্রশংসা করে) রাব্বানা লাকাল হামদ (হে আমাদের প্রতিপালক! আপনার জন্যই সকল প্রশংসা)।"
2638 - عن ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنت أَبيتُ عند باب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأُعْطِيه وَضُوءه
فأسمعه الهَويَّ من الليل يقول:"سمع الله لمن حمده"، وأسمعه الهَوِيَّ من الليل يقول: {الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ}.
صحيح: رواه الترمذيّ (3416) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا النضر بن شُميل ووهب بن جرير وأبو عامر العقدي وعبد الصمد بن عبد الوارث قالوا: حَدَّثَنَا هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، حَدَّثَنِي ربيعة بن كعب فذكره، قال الترمذيّ: حسن صحيح.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (16575، 16578) من طرق أخرى، عن هشام به، مثله.
ورواه النسائيّ (1618)، وأحمد (16574) كلاهما من طريق معمر، وقرنه أحمد بالأوزاعيّ، كلاهما عن يحيى بن أبي كثير وفيه: يقول صلى الله عليه وسلم:"سبحان الله ربّ العالمين" الهَوِيّ، ثمّ يقول:"سبحان الله وبحمده" الهَوِيَّ.
ورواه ابن ماجة (3879) من حديث شيبان، عن يحيى به مثله.
ولكن رواه أبو عوانة (2235) من طريق الوليد بن مسلم، قال: حَدَّثَنَا الأوزاعيّ، عن يحيى وفيه:"سبحان ربي وبحمده، سبحان ربي وبحمده، سبحان ربي وبحمده، سبحان ربّ العالمين" ثلاثًا الهَوِيَّ.
والوليد بن مسلم مدلِّس إِلَّا أنه صرَّح.
وأصل حديث ربيعة هذا في صحيح مسلم (489) من طريق هِقْل بن زياد، قال: سمعت الأوزاعي قال: حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، قال: حَدَّثَنِي أبو سلمة قال: حَدَّثَنِي ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنت أبيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتيتُه بوضوئه وحاجته، فقال لي:"سلْ" فقلت: أسألك مرافقتك في الجنّة. قال:"أو غير ذلك؟" قلت: هو ذاك. قال:"فأعِنِّي على نفسك بكثرة السجود" وسبق تخريجه في فضل السجود والحث عليه.
فالذي يبدو أن ربيعة كان يحدث بكل هذا، ولكن بعض الرواة جزّؤوه.
والهَوِيَّ معناه حين من الزمن من الليل، وفيه إشارة إلى أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُطيل قيام الليل.
وربيعة هذا كان من أصحاب الصُفَّة، ولم يزل مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى أن قُبِض، فخرج من المدينة، فنزل في بلاد أسلم على بَرِيدٍ من المدينة، وبقي أيام الحَرَّة، ومات بالحَرَّة سنة ثلاث وستين في ذي الحجة.
وروى المبارك بن فَضالة عن أبي عِمران الجُوْني قصة غريبة في تزوجه، رواه الإمام أحمد (16577) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، قال: حَدَّثَنَا المبارك بن فَضالة، قال: حَدَّثَنَا أبو عمران الجوني فذكر الفصة، والمبارك بن فَضالة مع التدليس وصفه النسائيّ بأنه ضعيف، ورواه أيضًا الحاكم (2/ 175) من هذا الوجه وقال: صحيح على شرط مسلم، وتعقبه الذّهبيّ بقوله: لم يحتج مسلم بمبارك، انظر القصة بالكامل في ترجمته في كتاب"فضائل الصّحابة".
রবী‘আহ ইবনু কা‘ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজায় রাত যাপন করতাম এবং আমি তাঁকে তাঁর ওযূর পানি সরবরাহ করতাম। আমি রাতের দীর্ঘ সময় ধরে তাঁকে বলতে শুনতাম: “সামি‘আল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার প্রশংসা শুনেন, যে তার প্রশংসা করে)।” এবং আমি রাতের দীর্ঘ সময় ধরে তাঁকে বলতে শুনতাম: “আলহামদু লিল্লা-হি রাব্বিল ‘আ-লামীন (সকল প্রশংসা বিশ্বজগতের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য)।”
2639 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قَسَّم سورةَ البقرةِ في ركعتين.
حسن: رواه أبو يعلى"المقصد العلي" (405) عن الحسن بن حمّاد، سجَّادة، ثنا حفص بن غياث، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن لأجل سجَّادة وهو: الحسن بن حمّاد بن كُسَيب، الملقب"سجادة"، قال الإمام أحمد: صاحب سنة وما بلغني عنه إِلَّا خيرًا"تاريخ بغداد" (3755).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূরা বাকারাকে দুই রাক’আতে (ভাগ করে) পাঠ করেছিলেন।
2640 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلِّي إحدى عشرة ركعة، كانت تلك صلاته، يسجد السجدة من ذلك قَدْرَ ما يقرأُ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1123) عن أبي اليمان قال: أخبرنا شُعيب، عن الزّهريّ، قال: أخبرني عروة، أن عائشة أخبرته.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (736) من وجه آخر عن ابن شهاب بإسناده إِلَّا أنه لم يذكر قولها:"يسجد السجدة من ذلك قَدْرَ ما يقرأُ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগারো রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করতেন। এটাই ছিল তাঁর সালাত। তিনি (প্রত্যেক) সিজদায় এত দীর্ঘ সময় অতিবাহিত করতেন যে, তোমাদের কেউ মাথা তোলার পূর্বে পঞ্চাশটি আয়াত পাঠ করার সমপরিমাণ সময় লাগত।
2641 - عن أنس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خرج إليهم في رمضان فخفَّف بهم، ثمّ دخل فأطال، ثمّ خرج فخفَّف بهم، ثمّ دخل فأطال، فلمّا أصبحنا قلنا: يا نبي الله! جلسنا الليلة فخرجتَ إلينا فخفَّفتَ، ثمّ دخلتَ فأطلتَ؟ قال:"من أجلكم فعلتُ".
حسن: رواه الإمام أحمد (12570) والحارث"بغية الباحث" (238) كلاهما عن أسود بن عامر، حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثُمامة، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن لأجل ثُمامة وهو: ابن عبد الله بن أنس بن مالك الأنصاري البصريّ، روى عن جده أنس، قال ابن عدي: له أحاديث عن أنس، وأرجو أنه لا بأس به، وأحاديثه قريب من غيره، وهو صالح فيما يرويه عن أنس عندي. انتهى.
ووثَّقه أحمد والنسائي وغيرهما ولكن رُوي عن أبي يعلى أن ابن معين أشار إلى تضعيفه، ولكن اعتمد الشيخان توثيق من وثَّقه فأخرجا عنه، وهو حسن الحديث.
ورواه الإمام أحمد في مواضع أخرى (12918، 13213، 13821، 14102) من طرق عن حمّاد بن سلمة، به مثله.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (12005) والبزّار"كشف الأستار" (731) وأبو يعلى (3755)، وابن خزيمة (1627) من طرق عن حُميد بن أبي حُميد الطّويل، عن أنس قال: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي ذات ليلة في حجرته، فجاء أُناسُ فصلوا بصلاته، فخفَّف فدخل البيت، ثمّ خرج، فعاد مرارًا، كل ذلك يُصَلِّي، فلمّا أصبح قالوا: يا رسول الله صليتَ ونحن نُحب أن تمد في صلاتِك، قال:"قد
علمت بمكانكم، وعمدًا فعلتُ ذلك".
قال البوصيري في"إتحاف الخيرة" (2368):"إسناده صحيح".
قوله:"حجرته" قال السندي: الظاهر أن المراد بها ما اتخذه حجرة من الحصير في المسجد ليصلي فيه بالليل، لا حجرة البيت.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজান মাসে তাদের নিকট (সালাতের জন্য) বের হলেন এবং সালাত সংক্ষিপ্ত করলেন। অতঃপর তিনি (ঘরে) প্রবেশ করলেন এবং (সালাত) দীর্ঘায়িত করলেন। এরপর আবার তিনি বের হলেন এবং তাদের নিয়ে সংক্ষিপ্ত করলেন। এরপর আবার প্রবেশ করলেন এবং (সালাত) দীর্ঘায়িত করলেন। যখন সকাল হলো, আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! আমরা গত রাতে বসেছিলাম, আপনি আমাদের দিকে বের হয়ে সালাত সংক্ষিপ্ত করলেন, এরপর ভেতরে প্রবেশ করে দীর্ঘ করলেন? তিনি বললেন: "আমি তোমাদের জন্যই তা করেছি।"
2642 - عن كُريب مولى ابن عباس، أن عبد الله بن عباس أخبره أنه بات ليلةً عند ميمونة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهي خالته. قال: فاضطجعتُ في عرض الوسادة، واضطجع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأهله في طولها. فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى إذا انتصف الليلُ أو قبله بقليل، أو بعده بقليل، استيقظ رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلس يمسح النوم عن وجهه بيده. ثمّ قرأ العشر الآيات الخواتم من سورة آل عمران، ثمّ قام إلى شَنٍّ معلَّقٍ فتوضَّأ منه، فأحسن وُضؤه، ثمَّ قام يُصَلِّي.
قال ابن عباس: فقمتُ فصنعتُ مثل ما صنع، ثمّ ذهبتُ فقمتُ إلى جنبه، فوضع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده اليُمنى على رأسي، وأخذ بأُذُنِي اليُمنى يَفْتِلُها، فصلى ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ أوتر، ثمّ اضطجع حتَّى أتاه المؤذن فصَلَّى ركعتين خفيفتين، ثمّ خرج فصَلَّى الصبح. انتهى.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (11) عن مخرمة بن سليمان، عن كريب مولى ابن عباس به مثله.
رواه البخاريّ في الوضوء (183) عن إسماعيل وهو ابن أبي أويس، ومسلم في صلاة المسافرين (763/ 182) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله، يعني ثلاث عشرة ركعة. وهي من أصح الروايات عن ابن عباس، عن عدد صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وهي موافقة لما رواه ابن وهب، حَدَّثَنَا عمرو، عن عبد ربه بن سعيد، عن مخرمة بن سليمان به وفيه: فصَلَّى في تلك الليلة ثلاث عشرة ركعة، ثمّ نام حتَّى نفخ، وكان إذا نام نفخ، ثمّ أتاه المؤذن فخرج فصَلَّى ولم يتوضأ. البخاريّ (698)، ومسلم (763/ 184).
وهي موافقة أيضًا لما رواه سفيان، عن سلمة بن كُهيل، عن كريب به بأن صلى من الليل ثلاث عشرة ركعة. البخاريّ (6316)، ومسلم (763/ 181) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان به وكان من دعائه:"اللَّهُمَّ اجعل في قلبي نورًا، وفي بصري نورًا، وفي سمعي نورًا، وعن يميني نورًا، وعن يساري نورًا، وفوقي نورًا، وتحتي نورًا، وأمامي نورًا، وخلفي نورًا،
وأعظِم لي نورًا". قال كُرَيب: وسبعًا في التابوت.
فلقيتُ بعض وَلَدِ العباس فحدَّثني بهن. فذكر:"عَصَبِي ولحمي ودمي وشعري وبشري"، وذكر خصلتين.
قوله:"وسبعًا في التابوت" أي ذكر في الدعاء سبعًا، أي سبع كلمات نسيتُها، قالوا: المراد بالتابوت: الأضلاع وما يحويه من القلب وغيره تشبيهًا بالتابوت الذي كالصندوق يحرز فيه المتاع، أي: وسبعًا في قلبي، ولكن نسيتها.
وقوله:"فلقيت بعض ولد العباس" القائل هو: سلمة بن كُهيل.
وصرَّح في رواية بأن دعاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلتئذ تسع عشرة كلمة. قال كريبُ: فحفظت منها ثتي عشرة، ونسيت ما بقي.
واثنتا عشرة هي:"اللَّهُمَّ اجعل لي في قلبي نورًا، وفي لساني نورًا، وفي سمعي نورًا، وفي بصري نورًا، ومن فوقي نورًا، ومن تحتي نورًا، وعن يميني نورًا، وعن شمالي نورًا، ومن بين يديَّ نورًا، ومن خلفي نورًا، واجعل في نفسي نورًا، وأعظم لي نورًا".
ورواه سعيد بن جبير، عن ابن عباس وفيه: ثمّ جاء فصلي أربع ركعات، ثمّ نام ثمّ قام، فجئت فقمت عن يساره فجعلني عن يمينه فصلي خمس ركعات، ثمّ صلى ركعتين، ثمّ نام حتَّى سمعتُ غطيطه، ثمّ خرج إلى الصّلاة.
رواه البخاريّ (697) عن سليمان بن حرب، قال: حَدَّثَنَا شعبة عن الحكم، قال: سمعت سعيد بن جبير فذكر مثله.
وهي موافقة كما رواه الضَّحَّاك عن مخرمة بن سليمان، عن كريب به وفيه: فصَلَّى إحدى عشرة ركعة. فلمّا تبين له الفجر صلى ركعتين خفيفتين. رواه مسلم (763/ 185)، فالذي قال: ثلاث عشرة ضم إليها ركعتي الفجر.
وانفرد مسلم (763/ 191) في رواية حُصَين بن عبد الرحمن، عن حبيب بن أبي ثابت، عن محمد بن عليّ بن عبد الله بن عباس، عن أبيه، عن عبد الله بن عباس بذكره، ثمّ قام فصلى ركعتين، فأطال فيهما القيامَ والركوعَ والسجودَ، ثمّ انصرف فنام حتَّى نفخ، ثمّ فعل ذلك ثلاث مرات ست ركعات، ثمّ أوتر بثلاث.
قال النوويّ رحمه الله في"شرح مسلم":"هذه الرواية فيها مخالفة لباقي الروايات في تخليل النوم بين الركعات، وفي عدد الركعات فإنه لم يذكر في باقي الروايات تخلل النوم، وذكر الركعات ثلاث عشرة. قال القاضي عياض: هذه الرواية، وهي رواية حُصَين، عن حبيب بن أبي ثابت، مما استدركه الدَّارقطنيّ على مسلم لاضطرابها، واختلاف الرواة، قال الدَّارقطنيّ ورُوي عنه على سبعة أوجه، وخالف فيه الجمهور، قلت: ولا يقدح هذا في مسلم، فإنه لم يذكر هذه الرواية متأصلة
مستقلة، إنّما ذكرها متابعة. والمتابعات يحتمل فيها ما لا يحتمل في الأصول، كما سبق بيانه في مواضع، قال القاضي: ويحتمل أنه لم يعد في هذه الصّلاة الركعتين الأوّليين الخفيفتين اللتين كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يستفتح صلاة الليل بهما، كما صرحت الأحاديث بها في مسلم وغيره، ولهذا قال: صلى ركعتين فأطال فيهما، فدل على أنهما بعد الخفيفتين فتكون الخفيفتان، ثمّ الطويلتان، ثمّ الست المذكورات، ثمّ ثلاث بعدها كما ذكر فصارت الجملة ثلاث عشرة كما في باقي الروايات. والله أعلم". انتهى.
আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (কুরাইবকে) জানিয়েছেন যে, তিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এক রাতে অবস্থান করেন। তিনি (মায়মূনা) ছিলেন তাঁর (ইবনু আব্বাসের) খালা। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বালিশের আড়াআড়িভাবে শুয়ে পড়লাম, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর পরিবার লম্বালম্বিভাবে শুয়ে পড়লেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমালেন, অতঃপর যখন মধ্যরাত হলো অথবা তার সামান্য আগে বা সামান্য পরে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাগ্রত হলেন। তিনি বসে গেলেন এবং নিজের হাত দিয়ে মুখমণ্ডল থেকে ঘুমের ঘোর মুছলেন। এরপর তিনি সূরাহ আলে ইমরানের শেষ দশটি আয়াত তিলাওয়াত করলেন। এরপর তিনি একটি ঝুলন্ত মশকের কাছে উঠে গেলেন এবং তা থেকে সুন্দরভাবে উযু (ওযু) করলেন। অতঃপর তিনি সালাত আদায় করতে দাঁড়ালেন।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি উঠলাম এবং তিনি যা যা করলেন, আমিও ঠিক তাই তাই করলাম। এরপর আমি গিয়ে তাঁর পাশে দাঁড়ালাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান হাত আমার মাথার উপর রাখলেন এবং আমার ডান কান ধরে তা মুচড়াতে (মলে দিতে) লাগলেন। অতঃপর তিনি দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন, এরপর বিতর (সালাত) আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন, অবশেষে মুয়াযযিন এসে তাঁকে খবর দিলেন। তখন তিনি হালকাভাবে দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন, এরপর বেরিয়ে গেলেন এবং ফজরের সালাত আদায় করলেন।
আর তাঁর দু‘আর মধ্যে ছিল: "হে আল্লাহ! আমার অন্তরে নূর দাও, আমার দৃষ্টিতে নূর দাও, আমার শ্রবণে নূর দাও, আমার ডান দিকে নূর দাও, আমার বাম দিকে নূর দাও, আমার উপরে নূর দাও, আমার নিচে নূর দাও, আমার সামনে নূর দাও, আমার পিছনে নূর দাও, এবং আমার জন্য নূরকে বৃহৎ করো।"
কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আর সাতটি (বিষয়) সিন্দুকের মধ্যে (স্মরণ করা হয়েছিল)। এরপর আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সন্তানদের একজনের সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তিনি আমাকে সেগুলোর কথা জানালেন। তিনি উল্লেখ করলেন: "আমার পেশিতে, আমার মাংসে, আমার রক্তে, আমার চুলে এবং আমার চামড়ায় (নূর দাও)," আর তিনি আরও দুটি বৈশিষ্ট্য উল্লেখ করেছিলেন।
তাঁর (কুরাইব) বক্তব্য "আর সাতটি (বিষয়) সিন্দুকের মধ্যে" এর উদ্দেশ্য হলো: দু‘আর মধ্যে সাতটি শব্দ (বা প্রার্থনা) উল্লেখ করা হয়েছিল যা তিনি ভুলে গেছেন। তারা (উলামায়ে কেরাম) বলেছেন: ‘তাবূত’ (সিন্দুক) বলতে পাঁজরের হাড় এবং তার অভ্যন্তরে যা কিছু রয়েছে, যেমন অন্তর ইত্যাদিকে বোঝানো হয়েছে, যার মাধ্যমে মালামাল সুরক্ষিত রাখা হয়—এমন সিন্দুকের সাথে সাদৃশ্য করে। অর্থাৎ, "আর সাতটি (বিষয়) আমার অন্তরে (ছিল), কিন্তু আমি তা ভুলে গেছি।"
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই রাতের দু‘আ ছিল ঊনিশটি শব্দে—এমনটিও একটি বর্ণনায় সুস্পষ্টভাবে এসেছে। কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি তার মধ্য থেকে বারোটি মুখস্থ করেছিলাম, বাকিগুলো ভুলে গেছি। সেই বারোটি শব্দ হলো: "হে আল্লাহ! আমার অন্তরে নূর দাও, আমার জিহ্বায় নূর দাও, আমার শ্রবণে নূর দাও, আমার দৃষ্টিতে নূর দাও, আমার উপরের দিকে নূর দাও, আমার নিচের দিকে নূর দাও, আমার ডান দিকে নূর দাও, আমার বাম দিকে নূর দাও, আমার সামনের দিকে নূর দাও, আমার পিছনের দিকে নূর দাও, আমার সত্তায় নূর দাও, এবং আমার জন্য নূরকে বৃহৎ করো।"
2643 - عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي من الليل ثلاث عشر ركعة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1138)، ومسلم في صلاة المسافرين (764) كلاهما من حديث شعبة، قال: حَدَّثَنِي أبو جَمْرة، عن ابن عباس فذكره.
وأبو جمرة: بالجيم والراء هو: الضُبَعِي واسمه: نصر بن عمران بن عصام الضُبَعِي، مشهور بكنيته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন।
2644 - عن عائشة قالت: كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم من الليل عشر ركعات. يوتر بسجدة، ويركع ركعتي الفجر. فتلك ثلاث عشر ركعة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1140)، ومسلم في صلاة المسافرين (738/ 128) كلاهما من حديث حنظلة، عن القاسم بن محمد قال: سمعت عائشة تقول فذكرت مثله واللّفظ لمسلم.
ولفظ البخاريّ: كان يُصَلِّي من الليل ثلاث عشرة ركعة، منها الوتر وركعتا الفجر.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রাতের সালাত ছিল দশ রাকাত। তিনি এক সিজদা দ্বারা বিতর আদায় করতেন এবং ফজরের দুই রাকাত (সুন্নত) সালাত পড়তেন। ফলে তা তেরো রাকাত হতো।
2645 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه أَخْبَرَ: أنه سأل عائشة رضي الله عنها: كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: ما كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يزيدُ في رمضان ولا في غيره على إحدى عشرة ركعة. يُصَلِّي أربعًا فلا تسأل عن حسنهن وطولهن، ثمّ يُصَلِّي أربعًا فلا تسأل عن حسنهن وطولهن، ثمّ يُصَلِّي ثلاثًا، قالت عائشة: فقلتُ يا رسول الله! أتنامُ قبل أن تُوتِر؟ فقال:"يا عائشة! إن عينيَّ تنامان، ولا ينام قلبي".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف أنه سأل عائشة كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبرته بذلك.
ورواه البخاريّ في التهجد (1147)، ومسلم في صلاة المسافرين (738) من طريق مالك بن أنس، به مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আবু সালামা ইবনু আবদির রহমান জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমাদান মাসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদান মাসে এবং রমাদান মাস ছাড়া অন্য সময়ে এগারো রাকাতের বেশি আদায় করতেন না। তিনি চার রাকাত সালাত আদায় করতেন—তুমি এর সৌন্দর্য ও দৈর্ঘ্যের কথা জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি আবার চার রাকাত সালাত আদায় করতেন—তুমি এর সৌন্দর্য ও দৈর্ঘ্যের কথা জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকাত সালাত আদায় করতেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি বিতর আদায়ের আগে ঘুমিয়ে যান? তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমার চোখ দুটি ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"
2646 - عن أبي سلمة قال: سألت عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: كان يُصلِّي ثلاث عشرة ركعة يُصَلِّي ثمان ركعات، ثمّ يوتر، ثمّ يُصلِّي ركعتين وهو جالس، فإذا
أراد أن يركع قام فركع، ثمّ يُصَلِّي ركعتين بين النداء والإقامة من صلاة الصبح.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738/ 126) عن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا ابن أبي عديّ، حَدَّثَنَا هشام، عن يحيى، عن أبي سلمة فذكره.
ورواه أيضًا (137) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي لبيد، سمع أبا سلمة قال: أتيت عائشة فقلت: أَي أُمَّهْ! أَخبِرِيني عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: كانت صلاته في شهر رمضان وغيره ثلاث عشرة ركعة بالليل، منها ركعتا الفجر.
وهشام هو: أبن حسان الأزدي. ويحيى هو: ابن أبي كثير.
التوفيق بين الروايتين أن أبا سلمة يروي مرة من قولها ثلاث عشرة مع الركعتين قبل الصبح، وأخرى إحدى عشرة أي بدون ركعتي الفجر.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সালামাহ (রহ.) বলেন, আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: তিনি তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি আট রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর বিতর পড়তেন, এরপর তিনি বসে বসে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি রুকু’ করতে ইচ্ছা করতেন, তখন দাঁড়িয়ে রুকু’ করতেন। এরপর তিনি ফজরের সালাতের আযান ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।
2647 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي إحدى عشرة ركعة. كانت تلك صلاتَه - تعني بالليل - فيسجد السجدة من ذلك قدر ما يقرأ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه. ويركع ركعتين قبل صلاة الفجر، ثمّ يضطجع على شِقِّه الأيمن حتَّى يأتيه المؤذِّن للصّلاة.
صحيح: رواه البخاريّ في الوتر (994) ومسلم في صلاة المسافرين (736) كلاهما من طريق الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته، واللّفظ للبخاريّ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এটাই ছিল তাঁর সালাত—অর্থাৎ রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ)। তিনি এর মধ্যে এমন পরিমাণ দীর্ঘ সিজদা করতেন যে তোমাদের কেউ মাথা তোলার আগে পঞ্চাশ আয়াত তিলাওয়াত করতে পারে। আর তিনি ফজরের সালাতের আগে দুই রাকাত (সুন্নাত) পড়তেন, এরপর তিনি তাঁর ডান কাত হয়ে শুয়ে থাকতেন, যতক্ষণ না মুয়াযযিন তাঁকে সালাতের জন্য ডাকতে আসতেন।
