হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2668)


2668 - عن عبد الله بن عمرو قال: حُدِّثْتُ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الرّجل قاعدًا نصفُ الصّلاة" قال: فأتيتُه فوجدتُه يُصَلِّي جالسًا، فوضعتُ يدي على رأسي فقال:"ما لك يا عبد الله بن عمرو؟" قلت: حدِّثْثُ يا رسول الله! أنك قلت:"صلاة الرّجل قاعدًا على نصف الصّلاة" وأنت تُصَلِّي قاعدًا. قال:"أجل، ولكنِّي لست كأحد منكم".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (735) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا جرير، عن منصور، عن هلال بن يساف، عن أبي يحيى، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

ورواه مالك في صلاة الجماعة (19) مختصرًا"صلاة أحدكم وهو قاعد، مثل نصف صلاته وهو قائم" رواه عن إسماعيل بن محمد بن سعد بن أبي وقَّاص، عن مولى لعمرو بن العاص، أو
لعبد الله بن عمرو بن العاص، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.

وقوله:"لست كأحد منكم" هو من خصائص النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فجُعِلت نافلته قاعدًا مع القدرة على القيام كنافلته قائمًا تشريفًا له، كما خُصَّ بأشياء أخرى.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাকে জানানো হয়েছিল যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "বসা অবস্থায় পুরুষের সালাত (নামাজ) হল (দাঁড়িয়ে পড়ার) সালাতের অর্ধেক।" তিনি বলেন: অতঃপর আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং তাঁকে বসা অবস্থায় সালাত আদায় করতে দেখলাম। তখন আমি বিস্ময় প্রকাশ করে আমার মাথায় হাত রাখলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আব্দুল্লাহ ইবনু আমর, তোমার কী হয়েছে?" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে জানানো হয়েছিল যে আপনি বলেছেন: "বসা অবস্থায় পুরুষের সালাত (দাঁড়িয়ে পড়ার) সালাতের অর্ধেক," অথচ আপনি বসা অবস্থায় সালাত আদায় করছেন। তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তবে আমি তোমাদের কারো মতো নই।"









আল-জামি` আল-কামিল (2669)


2669 - عن عائشة قالت: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي متربِّعًا.

صحيح: رواه النسائيّ (1661) عن هارون بن عبد الله قال: حَدَّثَنَا أبو داود الحُفَري، عن حفص، عن حُميد، عن عبد الله بن شقيق، عن عائشة فذكرته.

قال النسائيّ:"لا أعلم أحدًا روى هذا الحديث غير أبي داود وهو ثقة، ولا أحسب هذا الحديث إِلَّا خطأ والله تعالى أعلم". انتهى.

ورواه أيضًا في"السنن الكبرى" (1363) من الطريق نفسه وقيد فيه حُميد بأنه"الطّويل".

وقال:"لا نعلم أحدًا روى هذا الحديث غير أبي داود الحفريّ، عن حفص" ولم يذكر فيه:"ولا أحسب هذا الحديث …".

أما الأمر الأوّل فهو كما قال بأنه حُميد الطّويل وكذلك قيَّده ابن حبَّان في صحيحه (2512) وأطلقه ابن خزيمة (1238)، والحاكم (1/ 275)، وعنه البيهقيّ (2/ 305) إِلَّا أن البيهقيّ رواه أيضًا من غير طريق الحاكم عن أبي داود الحفري فقال:"فذكره إِلَّا أنه قال: عن حميد الطّويل".

فالظاهر أنه الطّويل، والحافظ المزي نَفَى في"تحفة الأشراف" (11/ 442) و"تهذيب الكمال" (7/ 374) أن يكون حميدًا الطّويل، بل قال إنه: حُميد بن طرخان.

وتعقبه الحافظ في"تهذيب التهذيب" (3/ 43) فقال: فَرَّق ابن حبَّان بينه وبين حميد الطّويل في الثّقات، وقد تقدّم أن والد حُميد الطّويل يقال له: طرخان، والطويل يرُوي عن عبد الله بن شقيق. فالظاهر أنه هذا، إذ ليس في الرواية ما يدل على أنه غيره، لا سيما وفي السنن الكبرى في رواية ابن الأحمر عن النسائيّ، عن هارون، عن أبي داود، عن حفص، عن حميد وهو الطّويل، فقوله:"وهو الطّويل" يحتمل أن يكون من قول النسائيّ، أو من قول من فوقه، أو دونه، وهو الأشبه، ثمّ وجدتُ الحديث في سنن البيهقيّ من طريق يوسف بن موسى، عن أبي داود الحفريّ، عن حفص، عن حميد الطّويل، فتبين أنه هو" انتهى.

وقال الحاكم (1/ 276): وحُميد هو: ابن تيرويه الطّويل بلا شك.

وحكم على الحديث بأنه على شرط الشّيخين.

قلت: وأبو داود الحفري هو: عمر بن سعد بن عبيد الحفري - بفتح الحاء والفاء - نسبة إلى موضع في الكوفة، وهو ثقة كما قال النسائيّ.
وأمّا الأمر الثاني وهو قول النسائيّ:"لا أعلم أحدًا روى هذا الحديث غير أبي داود وهو ثقة، ولا أحسب هذا الحديث إِلَّا خطأ" ففيه تخطئة الثّقات بالظنِّ، كما أن أبا داود لم ينفرد به، بل رواه أيضًا محمد بن سعيد بن الأصبهانيّ، ثنا حفص بن غيات، عن حُميد بن قيس، عن عبد الله بن شقيق عنها فذكرت مثله. رواه البيهقيّ (2/ 305) عن الحاكم، قال: أخبرني محمد بن صالح بن هانئ، ثنا السري بن خزيمة، ثنا محمد بن سعيد بن الأصبهاني به.

وعزاه الحافظ في"التلخيص" إلى ابن خزيمة أيضًا إِلَّا أني لم أجده في مظانه. وقد رواه ابن خزيمة في موضعين، باب صفة الصّلاة جالسًا إذا لم يقدر على القيام (978) وفي باب التربع في الصّلاة إذا صلى المرءُ جالسًا (1238) وفي كِلا الموضعين رواه من طريق أبي داود الحفري.

قال الحافظ بعد ذكر متابعة محمد بن سعيد بن الأصفهاني لأبي داود:"فظهر أنه لا خطأ فيه".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চারজানু হয়ে সালাত আদায় করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (2670)


2670 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من نام عن حِزْبه، أو عن شيء منه، فقرأه فيما بين صلاة الفجر وصلاة الظهر، كتِب له كأنَّما قرأه من الليل".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (747) من حديث ابن وهب، عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن السائِب بن يزيد وعبيدالله بن عبد الله، أخبراه عن عبد الرحمن بن عبدٍ القاريّ، قال: سمعت عمر بن الخطّاب فذكره.

والحزب: ما يجعله الرّجل على نفسه من قراءةٍ أو صلاةٍ.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার নির্দিষ্ট ওযিফা (হিযব) অথবা তার কোনো অংশ আদায় করা থেকে ঘুমিয়ে যায়, অতঃপর সে তা ফজরের সালাত ও যোহরের সালাতের মধ্যবর্তী সময়ে পড়ে নেয়, তার জন্য এমন সওয়াব লেখা হয়, যেন সে তা রাতের বেলায়ই পড়েছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2671)


2671 - عن أبي الدّرداء يَبلغُ به النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"من أتى فِراشَهُ، وهو ينوي أن يقومَ فيُصَلِّي من الليل فغلبتْه عيناه حتَّى يُصبِحَ كُتِبَ له ما نوى، وكان نومُه صدقةً عليه من ربِّه".

حسن: رواه النسائيّ (1787)، وابن ماجة (1344) كلاهما عن هارون بن عبد الله الحمَّال، قال: حَدَّثَنَا الحسين بن عليّ الجُعفيّ، عن زائدة، عن سليمان الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عبدة بن أبي لُبابة، عن سُويد بن غَفَلَة، عن أبي الدّرداء فذكره.

وأخرجه ابن خزيمة (1172)، والحاكم (1/ 311) من طريق حبيب بن أبي ثابت.

وأعلّه النسائيّ وابن خزيمة بالوقف.

وأمّا الحاكم فقالي:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه، والذي عندي أنهما أعلاه بتوقيف من روى عن زائدة" انتهى.

قلت: وهو كما قال فقد خالفه معاوية بن عمرو فرواه عن زائدة من قول أبي الدّرداء، أخرجه الحاكم.

ورواه أيضًا عبد الرزّاق (4228) عن سفيان عن عبدة بإسناده عن أبي ذرّ أو أبي الدّرداء موقوفًا.

وهذا الموقوف رواه أيضًا النسائيّ وابن خزيمة.
ولكن رواه شعبة، عن عبدة بن أبي لبابة، عن سويد بن غفلة أنه عاد زِر بن حُبيش في مرضه فقال أبو ذرّ، أو أبو الدّرداء - شكَّ شعبة - قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث مرفوعًا، رواه ابن حبَّان (2588) من طريق مسكين بن بكير، عن شعبة به. ولكن فيه محمد بن سعيد الأنصاري أبو إسحاق الحراني الراوي عن مسكين بن بكير لم يوثقه غير ابن حبَّان. وقال الحافظ في التقريب:"شيخ".

إِلَّا أنَّ هذا الطريق يقوي الطريق السابق الذي فيه حبيب بن أبي ثابت، فيكون المرفوع حكما وإسنادًا وإن كان بعض أهل العلم رجّحوا الموقوف ثمّ قالوا: وحكمه الرفع لأنه مثل هذا لا يقال بالرأي.




আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার বিছানায় আসে এবং সে রাতে উঠে সালাত আদায় করার নিয়ত করে, অতঃপর ভোর হওয়া পর্যন্ত তার চোখ তাকে কাবু করে ফেলে (সে ঘুমিয়ে থাকে), তার জন্য তার নিয়তকৃত সওয়াব লেখা হয় এবং তার ঘুম তার রবের পক্ষ থেকে তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (2672)


2672 - عن عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلى الله عليه وسلم قالت: قال: رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من امرئ تكون له صلاة بليلٍ يَغلِبُه عليها نومٌ إِلَّا كتب الله له أجر صلاتِه، وكان نومُه عليه صدقةً".

حسن: رواه مالك في صلاة الليل (1) عن محمد بن المنكدر، عن سعيد بن جبير، عن رجل عنده رضًا، أنه أخبره أن عائشة أخبرت فذكرت الحديث.

ورواه أبو داود (1314)، والنسائي (1785) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورجاله ثقات غير الرّجل المبهم الذي لم يُسم وقد وصف بالرضا، ولكن الصَّحيح في هذا أنه لا يقبل توثيق المبهم حتَّى يُسمى، فوجدنا الرّجل الرضا هو الأسود بن يزيد كما رواه النسائيّ (1786) عن أبي داود قال: حَدَّثَنَا محمد بن سليمان، قال: حَدَّثَنَا أبو جعفر الرازيّ، عن محمد بن المنكدر، عن سعيد بن جبير، عن الأسود بن يزيد، عن عائشة فذكرتِ الحديث.

والأسود بن يزيد النخعي ثقة مكثر فقيه، ولكن قال النسائيّ: أبو جعفر الرازي ليس بالقوي في الحديث.

فالذي يظهر أن الصَّحيح من هذه الأسانيد هو الذي فيه الرّجل المبهم مع توثيقه من تلميذه سعيد بن جبير وقد عرفنا أنه الأسود بن يزيد، فإن رواية أبي جعفر الرازي مع ضعَّفه يُقوِّي هذا الاحتمال.

ورواه أيضًا ابن أبي الدُّنيا في"كتاب التهجد" (206) من طريق أبي داود الطَّيالسيّ - وهو في مسنده (1527). عن ورقاء، عن محمد بن المنكدر، عن سعيد بن جبير، عن عائشة، فذكرت نحوه، وفيه انقطاع؛ فإنَّ سعيد بن جبير لم يسمع من عائشة. وأورده المنذري في"الترغيب والترهيب" وعزاه إلى ابن أبي الدُّنيا وقال:"إسناده جيّد، رواته محتجّ بهم في الصَّحيح". انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি রাতে (নফল) সালাত আদায়ের নিয়ত করে, কিন্তু ঘুম তার ওপর চেপে যায়, আল্লাহ তার জন্য তার সালাতের সওয়াব লিখে দেন। আর তার সেই ঘুম তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2673)


2673 - عن جندب بن عبد الله البجلي قال: اشتكى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فلم يَقُم ليلةً أو ليلتين.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1124) عن أبي نُعيم، قال: حَدَّثَنَا سفيان، عن الأسود بن قيس قال: سمعتُ جنديًا يقول فذكر الحديث هكذا مختصرًا، وساقه في فضائل القرآن تامًّا (4983) عن أبي نُعيم، حَدَّثَنَا سفيان، عن الأسود بن قيس قال: سمعتُ جندبًا يقول: اشتكى النَّبِيّ
- صلى الله عليه وسلم فلم يَقُم ليلةً، أو ليلتين، فأتتْه امرأةٌ فقالت: يا محمد! ما أرى شيطانك إِلَّا قد تركك. فأنزل الله عز وجل: {وَالضُّحَى (1) وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَى (2) مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَى} [سورة الضحى: 1 - 3].

ورواه أيضًا مسلم في كتاب الجهاد (1797/ 115) من حديث سفيان به مثله.




জুণদুব ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হলেন এবং এক বা দুই রাত তিনি (সালাতের জন্য) দাঁড়ালেন না। তখন তাঁর কাছে এক মহিলা এসে বলল: হে মুহাম্মাদ! আমার মনে হয়, আপনার শয়তান আপনাকে ছেড়ে চলে গেছে। তখন মহান আল্লাহ নাযিল করলেন: শপথ পূর্বাহ্নের, শপথ রাতের যখন তা নিঝুম হয়, আপনার রব আপনাকে ত্যাগ করেননি এবং আপনার প্রতি অসন্তুষ্টও হননি। (সূরা আদ-দুহা: ১-৩)।









আল-জামি` আল-কামিল (2674)


2674 - عن عائشة قالت: كان نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم إذا صلَّى صلاةً أحب أن يدوامَ عليها، وكان إذا غلبه نوم، أو وجع عن قيام الليل صلَّى من النهار ثنتي عشرةَ ركعةً. ولا أعلم نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم قرأ القرآن كلَّه في ليلة. ولا صلَّى ليلة إلى الصبح، ولا صام شهرًا كاملًا غير رمضان.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) عن محمد بن المثنى العنزيّ، حَدَّثَنَا محمد بن أبي عديّ، عن سعيد، عن قتادة، عن زرارة، أن سعد بن هشام بن عامر أراد أن يغزو في سبيل الله، فقدم المدينة وسألَ أم المؤمنين عن أشياء منها عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل فذكرت مثله في حديث طويل كما مضى في باب جامع صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في الليل.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি তার উপর নিয়মিত থাকতে ভালোবাসতেন। আর যখন ঘুমের কারণে অথবা কষ্টের (ব্যথার) কারণে তাঁর রাতের কিয়াম (সালাত) ছুটে যেত, তখন তিনি দিনের বেলায় বারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। আমি জানি না যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনো এক রাতে সম্পূর্ণ কুরআন পাঠ করেছেন, অথবা তিনি কোনো এক রাত ফজর পর্যন্ত সালাত আদায় করেছেন, অথবা রমযান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাস সম্পূর্ণ রোযা রেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2675)


2675 - عن خَبَّاب بن الأرَتِّ قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة فأطالها فقالوا: يا رسول الله! صليتَ صلاة لم تكن تُصليها. قال:"أجل، إنها صلاة رغبةٍ ورهبةً، إنِّي سألت الله فيها ثلاثًا، فأعطاني اثنتين، ومنعني واحدةً، سألتُه أن لا يُهلك أمتي بسنةٍ فأعطانيها، وسألتُه أن لا يُسلِّط عليهم عدوًّا من غيرهم، فأعطانيها، وسألتُه أن لا يُذيق بعضَهم بأسَ بعضٍ فمنعنيها".

صحيح: رواه الترمذيّ (2175)، والنسائي (1638) كلاهما من حديث الزّهريّ، قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن عبد الله بن خبَّاب بن الأَرَتِّ، عن أبيه فذكر الحديث واللّفظ للترمذي.

ولفظ النسائيّ: أنه راقب رسول الله صلى الله عليه وسلم الليلة كلّها حتَّى كان مع الفجر، فلمّا سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم من صلاته جاءه خَبَّاب. فقال: يا رسول الله بأبي أنت وأمي! لقد صليت الليلة صلاةً ما رأيتك صليت نحوها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أجل" فذكر الحديث وفيه:"سألت ربي عز وجل أن لا يُهلكنا بما أهلك به الأمم قبلنا، فأعطانيها. وسألت ربي عز وجل أن لا يُظهر علينا عدوًّا من غيرنا، فأعطانيها. وسألت ربي أن لا يلبسنا شيعًا فمنعنيها".

ورواه أيضًا الإمام أحمد (21053)، والطَّبرانيّ (3621) من طريق الزّهريّ، ولفظ أحمد مثل لفظ النسائيّ.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب".

قلت: وهو كذلك فإن رجاله ثقات، وإسناده صحيح.

وقوله:"صلاة رغبة ورهبة" أي: صلاة دعوت فيها راغبًا في الإجابة، وراهبًا عن ردها.




খাব্বাব ইবনুল আরাত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একবার সালাত আদায় করলেন এবং তা দীর্ঘায়িত করলেন। তখন তাঁরা (সাহাবীগণ) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি এমন সালাত আদায় করেছেন, যা ইতিপূর্বে আদায় করতেন না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ। এটি ছিল আশা ও ভয়ের সালাত। আমি এতে আল্লাহর নিকট তিনটি জিনিস চেয়েছিলাম। তিনি আমাকে দুটি দান করেছেন এবং একটি থেকে বঞ্চিত করেছেন। আমি তাঁর কাছে চেয়েছিলাম, তিনি যেন আমার উম্মতকে দুর্ভিক্ষ দ্বারা ধ্বংস না করেন। তিনি আমাকে তা দান করেছেন। এবং আমি তাঁর কাছে চেয়েছিলাম, তিনি যেন তাদের উপর তাদের ছাড়া অন্য কোনো শত্রুকে চাপিয়ে না দেন (যাতে তারা তাদের মূল উৎপাটন করতে পারে)। তিনি আমাকে তা দান করেছেন। আর আমি চেয়েছিলাম যে, তিনি যেন তাদের (উম্মতের) একাংশকে অন্য অংশের দ্বারা শাস্তি ভোগ না করান। তিনি আমাকে তা থেকে বঞ্চিত করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2676)


2676 - عن عائشة قالت: ولا أعلم نبي الله صلى الله عليه وسلم قرأ القرآن كلَّه في ليلة، ولا صلَّى ليلةً إلى الصبح، ولا صام شهرًا كاملًا غير رمضان.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) في حديث طويل في جامع صلاة الليل من طريق قتادة، عن زرارة، عن سعد بن هشام بن عامر، عن عائشة فذكرت الحديث.

وسبق ذكر هذا الحديث بكاملهِ في جامع صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في الليل.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জানি না যে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনো এক রাতে সম্পূর্ণ কুরআন তিলাওয়াত করেছেন, অথবা তিনি রাতভর ফজর পর্যন্ত সালাত আদায় করেছেন, অথবা রমযান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাস পূর্ণরূপে সিয়াম পালন করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2677)


2677 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا نَعَس أحدُكم وهو يُصَلِّي فليرقُدْ حتَّى يذهب عنه النومُ، فإن أحدكم إذا صَلَّى وهو ناعِسٌ لا يدري لعلّه يذهبُ يستغفر فيسبُّ نفسَه".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (3) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرت مثله.

ورواه البخاي في الوضوء (212) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (786) - من طرق - كلاهما عن مالك بن أنس به مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করার সময় তন্দ্রাচ্ছন্ন হয়, তখন সে যেন শুয়ে পড়ে যতক্ষণ না তার থেকে ঘুম চলে যায়। কারণ তোমাদের কেউ যখন তন্দ্রাচ্ছন্ন অবস্থায় সালাত আদায় করে, তখন সে জানে না, সম্ভবত সে ক্ষমা চাইতে গিয়ে নিজেকেই গালমন্দ করে বসবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2678)


2678 - عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا نعَس أحدُكم في الصّلاة فلينَمْ حتَّى يعلمَ ما يقرأ".

صحيح: رواه البخاريّ في الوضوء (213) عن أبي معمر، قال: حَدَّثَنَا عبد الوارث، حَدَّثَنَا أيوب، عن أبي قِلابة، عن أنس فذكره.

ورواه النسائيّ (443) من وجه آخر عن أيوب به ولفظه:"إنْ نعس أحدكم في صلاته فلينصرف وليرقُدْ".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাতের মধ্যে তন্দ্রাচ্ছন্ন হয়ে পড়ে, তখন সে যেন ঘুমিয়ে নেয়, যতক্ষণ না সে বুঝতে পারে যে সে কী পাঠ করছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2679)


2679 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قام أحدكم من الليل فاستعجم القرآن على لسانه فلم يدر ما يقول: فليضطجع".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (787) عن محمد بن رافع، حَدَّثَنَا عبد الرزّاق، حَدَّثَنَا معمر، عن همام بن مُنَبِّه قال: هذا ما حَدَّثَنَا أبو هريرة، عن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر أحاديث منها هذا.

وهو في مصنف عبد الرزّاق (500) وزاد فيه قبل"فليضطجع""فلينصرفْ".
وهذا الحديث مما انفرد به مسلم عن البخاريّ، وأمّا قول الحافظ البغوي في"شرح السنة" (4/ 58):"هذا حديث متفق على صحته، أخرجه مسلم عن محمد بن رافع، عن عبد الرزّاق …" ففيه وهم، لأن البخاريّ لم يخرج هذا الحديث لا من طريق همام بن منبه ولا من غيره، ومن عادة البغوي أنه إذا قال:"متفق عليه" فهو يقصد به الشيخان، إِلَّا أنه لا يلتزم ببيان طريقة إخراجهما، فأحيانًا يذكر طريقهما، وأحيانًا يكتفي بذكر طريق أحدهما، ولكن أصل الحديث فيهما فتنبه.

وقوله:"فاستعجم" أي: استَبْهَمَ واستغلق.




আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমাদের কেউ রাতের সালাতের জন্য দাঁড়ায় এবং তার জিহ্বায় কুরআন পাঠে জড়তা সৃষ্টি হয়, ফলে সে বুঝতে না পারে যে সে কী বলছে, তবে সে যেন শুয়ে পড়ে (বা বিশ্রাম নেয়)।”









আল-জামি` আল-কামিল (2680)


2680 - عن علقمة قال: سألت أم المؤمنين عائشة قلت: يا أم المؤمنين! كيف كان عمل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم هل كان يخصُّ شيئًا من الأيام؟ قالت: لا، كان عملُه دِيمةً، وأيّكم يستطيع ما كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يستطيع.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6466)، ومسلم في صلاة المسافرين (783) من حديث جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن علقمة فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, হে উম্মুল মু'মিনীন! নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আমল কেমন ছিল? তিনি কি কোনো দিনকে বিশেষভাবে নির্দিষ্ট করতেন? তিনি বললেন, না। তাঁর আমল ছিল নিরবচ্ছিন্ন। আর তোমাদের মধ্যে কে আছে, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা করতে পারতেন, তা করতে পারে?









আল-জামি` আল-কামিল (2681)


2681 - عن مسروق قال: قلت لعائشة أي العمل كان أحبَّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: الدائم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1132)، ومسلم في صلاة المسافرين (741) كلاهما من طريق أبي الأحوص، عن الأشعث بن سُليم، عن أبيه، عن مسروق فذكر الحديث، انظر باب قيام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في أوقات مختلفة من الليل.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক বলেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল কোনটি ছিল? তিনি বললেন: নিয়মিত আমল।









আল-জামি` আল-কামিল (2682)


2682 - عن عائشة أنها قالت: سُئِل النَّبِيّ: أي الأعمال أحب إلى الله؟ قال: أدومها وإن قل" وقال:"اكْلَفُوا من الأعمال ما تُطِيقون".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6465)، ومسلم في صلاة المسافرين (782/ 216) كلاهما من حديث شعبة، عن سعد بن إبراهيم، أنه سمع أبا سلمة يحدث عن عائشة فذكرت الحديث واللّفظ للبخاريّ، ولم يذكر مسلم الجزء الثاني من الحديث.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: আল্লাহ্‌র নিকট কোন্ আমলটি সর্বাধিক প্রিয়? তিনি বললেন: যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা অল্প হয়। তিনি আরও বললেন: তোমরা ততটুকু আমলের দায়িত্ব নাও যতটুকু তোমরা বহন করতে সক্ষম।









আল-জামি` আল-কামিল (2683)


2683 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يحتجر حصيرًا بالليل فيصلِّي، ويبسطه بالنهار فيجلس عليه، فجعل الناس يثوبونَ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيصلون بصلاته حتَّى كثروا فأقبل فقال:"يا أيها الناس! خذوا من الأعمال ما تطيقون، فإن الله لا يَملُّ حتَّى تملُّوا، وإن أحب الأعمال إلى الله ما دام وإن قلَّ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5861)، ومسلم في صلاة المسافرين (782) كلاهما من حديث عبد الله، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرته. واللّفظ للبخاريّ،
ولفظ مسلم قريب منه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে একটি চাটাই দিয়ে বেড়া তৈরি করতেন এবং তার মধ্যে সালাত আদায় করতেন, আর দিনে তা বিছিয়ে দিতেন এবং তার উপর বসতেন। অতঃপর লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতে শুরু করল এবং তাঁর সালাতের সাথে (মুক্তাদী হয়ে) সালাত আদায় করতে লাগল, এমনকি তাদের সংখ্যা বেড়ে গেল। তখন তিনি তাদের দিকে মুখ করে বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা ততটুকু আমলই গ্রহণ করো যা তোমরা করার সামর্থ্য রাখো। কেননা আল্লাহ্ (প্রতিদান দেওয়া থেকে) বিরত হন না, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা বিরক্ত হয়ে যাও। আর আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা পরিমাণে কম হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2684)


2684 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحب الأعمالِ إلى الله تعالى أدومُها وإن قلَّ" وكانت عائشة إذا عملت العملَ لزِمَتْه.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (783/ 218) من حديث سعد بن سعيد، أخبرني القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো, যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা পরিমাণে কম হয়।" আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কোনো আমল করতেন, তখন তা নিয়মিত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2685)


2685 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها وعندها امرأة قال:"من هذه؟" قالت: فلانة، تذكر من صلاتها. قال:"مَهْ! عليكم بما تطيقون، فواللهِ! لا يملُّ اللهُ حتَّى تَمَلُّوا".

وكان أحبَّ الدينِ إليهِ ما دام عليه صاحبه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (43)، ومسلم في صلاة المسافرين (785/ 221) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن هشام، قال: أخبرني أبي، عن عائشة فذكرت مثله واللّفظ للبخاريّ.

ورواه البخاريّ أيضًا في التهجد (1151) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كانت عندي امرأة من بني أسد، ثمّ ذكرت مثله، إِلَّا أن مالكًا لم يرو هذه الرواية في رواية يحيى الليثي المتداول عندنا، وإنما رواه في صلاة الليل (4) عن إسماعيل بن أبي حكيم، أنه بلغه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع امرأة من الليل تُصَلِّي فقال:"من هذه؟" فقيل له: هذه الحولاءُ بنتُ تُوَيْتِ لا تنامُ الليلَ. فكره ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى عُرفت الكراهية في وجهه ثمّ قال: فذكرت الحديث نحوه.

وهذا منقطع، والذي وصله البخاريّ لم يكن من هذا الطريق، بل رواه من طريق عبد الله بن مسلمة القعنبيّ، وهو تفرّد بروايته عن مالك في الموطأ دون بقية رواته، فإنهم اقتصروا منه على طرف مختصر. كذا قاله ابن عبد البر. انظر:"الفتح" (3/ 37).

قلت: ورواه مسلم (785) من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عروةُ بن الزُّبير أن عائشة أخبرتْه أن الحولاءَ بنتَ تُوَيْتِ بن حبيب بن أسد بن عبد العُزَّى مرتْ بها، وعندها رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقلت: هذه الحولاءَ بنتَ تُوَيْتِ، وزعموا أنها لا تنام الليلَ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنامُ الليل! خذوا من العمل ما تطيقون. فواللهِ لا يَسْأَمُ الله حتَّى تسْأَمُوا" ووقعت القصة مثل هذا لزينب كما في الذي بعده.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে এলেন, তখন তাঁর কাছে একজন মহিলা ছিলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "এ কে?" তিনি (আয়েশা) বললেন: "অমুক মহিলা," তার সালাত (ইবাদত) সম্পর্কে উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "থামো! তোমাদের সামর্থ্য অনুযায়ী আমল করো। আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তায়ালা ক্লান্ত হন না, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা ক্লান্ত হয়ে যাও।" আর তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের) কাছে দীনের সেই আমলটিই অধিক প্রিয় ছিল, যা এর আমলকারী নিয়মিতভাবে করে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (2686)


2686 - عن أنس بن مالك قال: دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فإذا حبل ممدود بين الساريتين. فقال: ما هذا الحبل؟ قالوا: هذا حبل لزينب، فإذا فترتْ تعلقتْ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا، حُلوا ليُصلِّ أحدكم نشاطَه فإذا فتر فليقعُد".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1150)، ومسلم في صلاة المسافرين (784) كلاهما من
حديث عبد الوارث، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس فذكره، واللّفظ للبخاريّ. ولفظ مسلم قريب منه إِلَّا أنه قال:"كَسِلَتْ أو فترتْ أمْسَكتْ به" فقال:"حُلُّوه ليصل أحدكم نشاطه فإذا كسِلَ أو فَتَر قعد" وفي رواية"فليقعُد".

وزينب هي: بنت جحش أم المؤمنين كذا ادعى أكثر الشراح، ولكن رُوي من وجوهٍ أخرى أنها: حمنة بنت جحش.

منها: ما رواه أبو داود (1312) عن زياد بن أيوب وهارون بن عباد الأزديّ، أن إسماعيل بن إبراهيم حدَّثهم، حَدَّثَنَا عبد العزيز عن أنس قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم المسجد، وحبل ممدود بين ساريتين، فقال:"ما هذا الحبل؟" فقيل: يا رسول الله! هذه حمنة بنت جحش تُصلي، فإذا أعيتْ تعلقتْ به. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لتُصل ما أطاقتْ، فإذا أعيتْ فلتجلس".

قال زياد: فقال: ما هذا؟" فقالوا: لزينب تُصلي، فإذا كسلتْ، أو فترتْ أمسكتْ به، فقال:"حُلُّوه"، فقال:"ليُصلِّي أحدكم نشاطَه، فإذا كسل، أو فتر فليقعد".

هارون بن عباد الأزدي أبو محمد الأنطاكي"مقبول" كما قال الحافظ، إِلَّا أنه لم يتابع على ذلك فهو لين الحديث.

وبقية رجاله ثقات رجال الشّيخين، إسماعيل بن إبراهيم هو: ابن مقسم المعروف بابن عليه.

وتابعه على ذلك مرسل، ومسند من وجه آخر عن أنس.

ومنها: ما رواه الإمام أحمد (12915، 13690) وأبو يعلى (3831) مرسلًا، كلاهما عن حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم حبلًا ممدودًا بين سارتين، فقال:"لمن هذا؟" فقالوا: لحمنة بنت جحش تُصلي فذكره، وإسناده صحيح غير أنه مرسل لأن عبد الرحمن بن أبي ليلى تابعي.

ومنها: ما رواه أحمد (12916، 13692) مسندًا عقب المرسل عن عبد الرحمن، حَدَّثَنَا حمّاد، عن حميد، عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله.

أي مثل مرسل عبد الرحمن بن أبي ليلى. وهذا إسناد صحيح، إِلَّا أن حميدًا وهو الطّويل كان كثير التدليس عن أنس، وجعله الحافظ في المرتبة الثالثة، والمرسل يقوي المسند.

ولفظ زياد بن أيوب أن القصة وقعت لزينب، وهي كما قال أكثر الشراح: زينب بنت جحش أم المؤمنين"، وتابعه على ذلك جماعة من الحفاظ عند مسلم، فالذي يترجح أن القصة وقعت لزينب كما في الصحيحين، ولا يمنع أن تقع مثل هذا لحمنة بنت جحش أيضًا، وجمع الحافظ بين القضيتين بصورة غريبة فانظرها إن شئت في"فتح الباري".

وأمّا ما رواه ابن خزيمة (1181) من حديث أبي حبيب مسلم بن يحيى مؤذن مسجد بني رفاعة، ثنا شعبة، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس بن مالك أن ذلك كان لميمونة بنت الحارث، فقد
حكم عليه الحافظ بأنه شاذ.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন। হঠাৎ তিনি দু’টি খুঁটির মাঝখানে একটি দড়ি ঝুলানো দেখতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “এই দড়ি কিসের?” লোকেরা বলল: এটা যায়নাবের জন্য। তিনি যখন দুর্বল বা ক্লান্ত হয়ে যান, তখন এটা ধরে থাকেন (নামাজ পড়ার সময়)। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “না, এটা খুলে ফেলো। তোমাদের প্রত্যেকে যেন ততটুকুই সালাত আদায় করে যতটুকু সে সতেজ থাকা অবস্থায় পারে। আর যখন সে ক্লান্ত বা দুর্বল হয়ে পড়বে, তখন যেন বসে যায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (2687)


2687 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم أُخْبرَ أَنَّك تقومُ الليلَ وتصومُ النهارَ؟" قلت: إني أفعل ذلك. قال:"فإنَّك إن فعلت ذلك هَجَمَتْ عينُك، ونَفِهَتْ نفسك، وإنَّ لنفسِك حقًّا، ولأهلك حقًّا، فصُم وأفطِر، وقُم ونَمُ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1153)، ومسلم في الصوم (1159/ 188) كلاهما عن سفيان، عن عمرو، عن أبي العباس، قال: سمعتُ عبد الله بن عمرو فذكره.

وعمرو هو: ابن دينار. وأبو العباس هو: السائب بن فروخ ويعرف بالشاعر.

قوله: هَجَمَتْ: ضَعُفَتْ لكثرة السهر.

وقوله: نَفِهتُ: أي كلَّت.

ولهذا الحديث قصة طويلة رواها الإمام أحمد (6477) عن هُشيم، عن حصين بن عبد الرحمن ومغيرة الضَّبِّي، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمرو، قال: زوَّجني أبي امرةً من قريشٍ، فلمّا دَخَلَتْ عليَّ جَعَلْتُ لا أنحاشُ لها، ممَّا بي من القوّة على العبادة، من الصوم والصلاة، فجاء عمرو بن العاص إلى كَنَّتِه، حتَّى دخل عليها، فقال لها: كيف وَجَدْتِ بَعْلَكِ؟ قالت: خَيْرُ الرِّجال، أو كخير البُعُولَة، مِن رجل لم يُفَتِّشْ لنا كَنَفًا، ولم يَعْرفْ لنا فِرَاشًا! فَأَقْبَل عليَّ، فَعَذَمَني وعضَّني بلسانه، فقال: أنْكحْتُك امرأةً من قريش ذاتَ حَسَبٍ، فَعَضَلْتَها، وَفَعَلْتَ وَفَعَلْتَ! ثمّ انطلق إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فشكانيّ، فأرسل إليَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فأتيته، فقال لي:"أَتَصُومُ النَّهَارَ؟" قلتُ: نعم، قال:"وتَقُومُ اللَّيْلَ؟" قلتُ: نعم، قال:"لكنِّي أصومُ وأفْطِرُ، وأُصلِّي وأنامُ، وأمَسُّ النساءَ، فمن رَغِبَ عن سُنَّتِي، فليس مِنِّي"، قال:"اقْرَأِ القرآنَ في كل شهرٍ"، قلت: إني أجدُني أقْوَى من ذلك، قال:"فاقرأه في كل عشرةِ أيامٍ"، قل: إني أجدُني أقْوى من ذلك، قال أحدُهما: إما حُصَيْنٌ وإما مغيرة: قال:"فاقرأه في كلِّ ثلاثٍ"، قال: ثمّ قال:"صُمْ في كلِّ شهرٍ ثلاثةَ أيام"، قلت: إني أقوى من ذلك، قال: لم يَزَلْ يَرْفَعُنِي حتَّى قال:"صُمْ يومًا وأفْطِرْ يومًا، فإنه أفضلُ الصيامِ، وهو صيامُ أخي داود صلى الله عليه وسلم".

قال حُصين في حديثه: ثمّ قال صلى الله عليه وسلم:"فإنَّ لكل عابدٍ شِرَّةً، ولكل شِرَّةٍ فَتْرَة، فإمَّا إلى سُنَّة، وإما إلى بِدْعة، فمن كانت فَتْرَتُه إلى سُنَّةٍ، فقد اهتدى، ومن كانت فَتْرَتُه إلى غير ذلك، فقد هَلَكَ".

قال مجاهد: فكان عبد الله بن عمرو، حيثُ ضَعُف وكَبِير، يصومُ الأيامَ كذلك، يَصِلُ بعضَها إلى بعض، ليتقوَّى بذلك، ثمّ يُفطِرُ بِعَدِّ تلك الأيام، قال: وكان يقرأ في كُلٍّ حزبه كذلك، يزيدُ أحيانًا، ويَنْقُصُ أحيانًا، غير أنه يُوفي العَدَد، إما في سَبْعٍ، وإما في ثلاثٍ، قال: ثمّ كان يقولُ بعد ذلك: لأن أكونَ قَبْلُتُ رخصةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أحبُّ إليَّ مما عُدلَ به أو عَدَل، لكنِّي فارقتُه على أمرٍ أكرهُ أن
أًخَالِفَه إلى غيره، وإسناده صحيح.

ومن طريق مغيرة الضَّبِّي رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5052) إِلَّا أنه اختصره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমাকে কি এ কথা জানানো হয়নি যে তুমি সারা রাত জেগে ইবাদাত করো এবং সারা দিন রোযা রাখো?" আমি বললাম: "আমি তো তাই করি।" তিনি বললেন: "তুমি যদি এমনটি করো, তবে তোমার চোখ দুর্বল হয়ে যাবে, তোমার মন ক্লান্ত হয়ে পড়বে। আর তোমার ওপর তোমার নফসের হক রয়েছে, তোমার পরিবারেরও হক রয়েছে। অতএব, রোযা রাখো এবং রোযা ভাঙ্গো (বিরতি দাও), নামাজ পড়ো এবং ঘুমাও।"

(মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘তাহাজ্জুদ’ (১১৫৩) অধ্যায়ে এবং মুসলিম ‘সওম’ (১১৫৯/১৮৮) অধ্যায়ে বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ান থেকে, তিনি আমর থেকে, তিনি আবূ আল-আব্বাস থেকে, যিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আমরকে বলতে শুনেছি, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।)

[আমর হলেন ইবনু দীনার। আর আবূ আল-আব্বাস হলেন আস-সাইব ইবনু ফাররুখ, যিনি শাইর নামে পরিচিত।]

[তাঁর বাণী ‘হাজামাত’ (هَجَمَتْ)-এর অর্থ: বেশি রাত জাগার কারণে দুর্বল হয়ে যাওয়া। আর তাঁর বাণী ‘নাফিহাত’ (نَفِهَتْ)-এর অর্থ: ক্লান্ত হয়ে পড়া।]

এই হাদীসের একটি দীর্ঘ প্রেক্ষাপট (ঘটনা) রয়েছে, যা ইমাম আহমাদ (৬৪৭৭) হুশাইম থেকে, তিনি হুসাইন ইবনু আব্দুর রহমান ও মুগীরাহ আদ-দাব্বী থেকে, তাঁরা উভয়ে মুজাহিদ থেকে এবং তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার বাবা কুরাইশের এক নারীর সাথে আমার বিয়ে দিলেন। যখন সে আমার কাছে এলো, আমি ইবাদতের শক্তি—রোযা ও নামাযে মগ্ন থাকার কারণে তার প্রতি মনোযোগ দিলাম না। অতঃপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (আমার বাবা) তার পুত্রবধূর কাছে এলেন এবং তার কাছে প্রবেশ করে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি তোমার স্বামীকে কেমন পেয়েছো?" সে বলল: "সে সর্বশ্রেষ্ঠ পুরুষ অথবা শ্রেষ্ঠ স্বামীদের মধ্যে সে একজন; এমন পুরুষ যে আমাদের জন্য কোনো বিছানা স্পর্শ করেনি এবং আমাদের কোনো পার্শ্বও অনুসন্ধান করেনি!" অতঃপর তিনি আমার দিকে এগিয়ে এলেন, আমাকে ধমকালেন এবং জিহ্বা দিয়ে তিরস্কার করলেন (কঠোর ভাষায় ভর্ৎসনা করলেন)। তিনি বললেন: "আমি তোমার জন্য কুরাইশের উচ্চ বংশের এক নারীকে বিবাহ দিয়েছি, আর তুমি তাকে উপেক্ষা করেছ, তুমি এটা করেছ, ওটা করেছ!" এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং আমার বিরুদ্ধে অভিযোগ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে লোক পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে এলাম। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি দিনের বেলা রোযা রাখো?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আর কি রাতে ইবাদত করো?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "কিন্তু আমি রোযা রাখি ও রোযা ভাঙি, আমি নামায পড়ি ও ঘুমাই এবং আমি নারীদের কাছেও যাই (সহবাস করি)। যে আমার সুন্নাত থেকে বিমুখ হবে, সে আমার দলভুক্ত নয়।" তিনি বললেন: "প্রতি মাসে একবার পূর্ণ কুরআন পড়ো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি অনুভব করি।" তিনি বললেন: "তাহলে দশ দিনে একবার পড়ো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি অনুভব করি।" বর্ণনাকারীদের মধ্যে একজন (হয় হুসাইন অথবা মুগীরাহ) বললেন, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তিন দিনে একবার পড়ো।" বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি বললেন: "প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি রাখি।" তিনি ক্রমাগত আমাকে কমাতে থাকলেন, যতক্ষণ না তিনি বললেন: "একদিন রোযা রাখো এবং একদিন ইফতার (ভাঙো)। এটিই সর্বোত্তম সিয়াম। আর এটি হলো আমার ভাই দাউদ (আলাইহিস সালাম)-এর রোযা।" হুসাইন তাঁর বর্ণনায় অতিরিক্ত বললেন: অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রত্যেক ইবাদতকারীর একটি উদ্যম থাকে এবং প্রত্যেক উদ্যমের পরে একটি ক্লান্তি আসে। অতএব, হয় তা সুন্নাতের দিকে যাবে, নয়তো বিদ’আতের দিকে। সুতরাং যার ক্লান্তি সুন্নাতের দিকে ধাবিত হয়, সে হেদায়েত লাভ করল। আর যার ক্লান্তি এর ভিন্ন দিকে ধাবিত হয়, সে ধ্বংস হলো।" মুজাহিদ বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন দুর্বল ও বৃদ্ধ হয়ে গেলেন, তিনি সেই দিনগুলোতে রোযা রাখতেন, কখনো কখনো পরস্পর যুক্ত করে রাখতেন, যেন এর মাধ্যমে শক্তি সঞ্চয় করতে পারেন। অতঃপর সেই দিনের হিসাব অনুযায়ী ইফতার করতেন। তিনি বলেন: আর তিনি তাঁর নির্ধারিত অংশ (হিজব) সেভাবেই পড়তেন, কখনো কখনো বাড়াতেন, কখনো কমাতেন, তবে সংখ্যা পূর্ণ করতেন—হয় সাত দিনে, নয়তো তিন দিনে। তিনি বলেন: এরপর তিনি বলতেন: "যদি আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেওয়া সহজ অনুমতি (রুখসাত) গ্রহণ করতাম, তবে তা আমার কাছে সেই জিনিসের চেয়ে বেশি প্রিয় ছিল, যার সমান বা ভালো কিছু করা যেত। কিন্তু আমি তাঁকে যে অবস্থায় ত্যাগ করে এসেছিলাম, তার বিপরীত কোনো কিছুর দিকে যেতে ঘৃণা বোধ করি।" এর সনদ (ইসনদ) সহীহ। মুগীরাহ আদ-দাব্বী-এর সূত্রে বুখারী এটিকে ‘কুরআনের ফযীলত’ (৫০৫২) অধ্যায়ে সংক্ষিপ্ত আকারে বর্ণনা করেছেন।