আল-জামি` আল-কামিল
2748 - عن خُفَاف بنِ إيماء الغِفاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة:"اللهم العَنْ بني لَحيان ورِعْلًا وذكوانَ، وعُصَيَّةَ عَصَوا الله ورسوله. غِفار غَفَر الله لها، وأسلم سالمها الله".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (679) من حديث ابن وهب، عن الليث، عن عِمران بن أبي أَنَس، عن حنظلة بن علي، عن خُفاف بن إيماء فذكره.
وفي رواية: ركع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم رفع رأسه فقال:"غِفار غفر الله لها، وأسلم سالمها الله، وعُصَيَّة عصى الله ورسولَه. اللهم العَنْ بني لَحيان. والعَنْ رِعْلًا وذكوان" ثم وقع ساجدًا، قال خُفاف: فَجُعِلتْ لعنةُ الكفرة من أجل ذلك.
খুফাফ ইবনে ঈমা আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতে (দাঁড়িয়ে) বললেন: "হে আল্লাহ! বনী লাহ্ইয়ান, রি'ল এবং যাকওয়ান গোত্রকে লানত (অভিসম্পাত) করুন। আর উসাইয়্যা গোত্র আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হয়েছে। গিফার গোত্রকে আল্লাহ ক্ষমা করুন। আর আসলাম গোত্রকে আল্লাহ নিরাপদে রাখুন।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রুকু করলেন, অতঃপর মাথা তুলে বললেন: "গিফার গোত্রকে আল্লাহ ক্ষমা করুন, আর আসলাম গোত্রকে আল্লাহ নিরাপদে রাখুন, আর উসাইয়্যা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হয়েছে। হে আল্লাহ! বনী লাহ্ইয়ানকে লানত করুন, আর রি'ল ও যাকওয়ানকে লানত করুন।" এরপর তিনি সিজদায় গেলেন। খুফাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ কারণেই কাফিরদের প্রতি অভিশাপ (কুনুতে নাযিলায়) চালু হয়েছিল।
2749 - عن ابن عمر أنه سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع من الركعة الآخرة من الفجر يقول:"اللهم العَن فلانًا وفلانًا وفلانًا" بعد ما يقول:"سمع الله لمن حمِده، ربنا ولك الحمد" فأنزل الله: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ} [سورة آل عمران: 128].
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4069) عن يحيى بن عبد الله السلمي، أخبرنا عبد الله (وهو ابن المبارك) أخبرنا معمر، عن الزهري، حدثني سالم، عن أبيه فذكره.
ثم قال: وعن حنظلة بن أبي سفيان، سمعتُ سالم بن عبد الله يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو على صفوان بن أمية، وسُهيل بن عمرو، والحارث بن هشام. فنزلت: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ}.
قوله: وعن حنظلة - هو عطف على معمر، والراوي عنه هو عبد الله بن المبارك، إلا أنه مرسل،
فإن سالم بن عبد الله بن عمر لم يدرك النبي صلى الله عليه وسلم، والثلاثة الذين سماهم قد أسلموا يوم الفتح، ولعل هذا هو السر في نزول قوله تعالى: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ} انظر: الفتح.
ووصله الترمذي (3004) بذكر"عن أبيه" وذكر فيه"أبا سفيان" بدلًا من"سهيل بن عمرو" ولكن في إسناده عمر بن حمزة الراوي عن سالم، وهو: عمر بن حمزة بن عبد الله بن عمر بن الخطاب ضعَّفه النسائي وقال: أحمد: أحاديثه مناكير، والخُلاصة كما في التقريب:"ضعيف".
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب يُستغرب من حديث عمر بن حمزة، عن سالم، عن أبيه.
وقد رواه الزهري عن سالم، عن أبيه، لم يعرفه محمد بن إسماعيل من حديث عمر بن حمزة، وعرفه من حديث الزهري". انتهى.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের শেষ রাকাআতে রুকু থেকে মাথা তোলার সময় ‘সামি‘আল্লাহু লিমান হামিদাহ, রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ’ বলার পর বলতে শুনেছেন: "হে আল্লাহ! অমুককে, অমুককে এবং অমুককে অভিশাপ দিন।" তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {এ বিষয়ে তোমার করণীয় কিছুই নেই— তিনি চাইলে তাদের ক্ষমা করতে পারেন অথবা তাদের শাস্তি দিতে পারেন, কারণ তারা জালিম (সূরা আল ইমরান: ১২৮)}।
আর হানযালা ইবনু আবী সুফিয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহকে বলতে শুনেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফওয়ান ইবনু উমাইয়া, সুহাইল ইবনু আমর এবং হারিস ইবনু হিশামের বিরুদ্ধে দু‘আ করতেন। তখন নাযিল হলো: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ}।
2750 - عن ابن عمر أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم حين رفع رأسه من صلاة الصبح من الركعة الأخيرة قال:"اللهمَّ العَنْ فُلانًا وفُلانًا" يدعو على أُناس من المنافقين. فأنزل الله عز وجل: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ} [سورة آل عمران: 128].
صحيح: رواه النسائي (1078) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: أنبأنا عبد الرزاق، قال: حدثنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه فذكره.
وإسناده صحيح، والحديث في مصنف عبد الرزاق (4027) وعنه رواه الإمام أحمد (6349)، وابن خزيمة (622)، وابن حبان (1987).
فقه الباب:
لا خلاف بين أهل العلم بأنَّه إذا نزلت بالمسلمين نازلةٌ يستحب لها القنوت في جميع الصلوات. ويُترك عند عدمها إلَّا الشافعي فإنَّه يرى استمرار القنوت في صلاة الصبح دائمًا، وتأوَّل الجمهور قوله:"ثمَّ تركه، أي: ترك اللَّعن والدعاء على أولئك القبائل المذكورة في الحديث. وتأوَّل الشافعيُّ ومن وافقه بأنَّه تركه في الصلوات الأربع، ولم يتركه في صلاة الصبح لما رُويَ عن أنسٍ في حديثٍ ضعيفٍ:"ما زال رسول الله صلى الله عليه وسلم يقنُتُ في صلاة الصبح حتَّى فارق الدنيا" كما سيأتي في باب ترك القنوت.
قال الإمام أحمد: لا يقنت في صلاة الفجر إلَّا عند نازلةٍ تنزِلُ بالمسلمين، فيدعو الإمام لجيوش المسلمين.
وقال سفيان: إن قنت في الصبح فحسنٌ، وأختار ترك القنوت فيها.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ফজরের সালাতের শেষ রাকাআত থেকে মাথা উঠানোর সময় শুনতে পেলেন, তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! অমুক অমুককে লা'নত (অভিশাপ) করুন।" তিনি মুনাফিকদের একদল লোকের বিরুদ্ধে দু'আ করছিলেন। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "সিদ্ধান্ত গ্রহণের কোনো ক্ষমতা তোমার নেই; আল্লাহ চাইলে তাদেরকে ক্ষমা করবেন, কিংবা শাস্তি দেবেন। কারণ তারা তো যালিম।" (সূরা আলে ইমরান: ১২৮)।
2751 - عن البراء بن عازب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقنتُ في الصبح والمغرب.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (678) من حديث شعبة، عن عمرو بن مُرَّةَ، قال: سمعتُ. ابن أبي ليلى، قال: حدثنا البراء بن عازب فذكره.
বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজর (সুবহ) এবং মাগরিবের সালাতে কুনূত পড়তেন।
2752 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قنت شهرًا يدعو على أحياء من أحياء العرب، ثم تركهـ.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4089)، ومسلم في المساجد (677/ 304) من حديث هشام، عن قتادة، عن أنس فذكره، واللفظ لمسلمٍ ولفظ البخاري:"قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا بعد الركوع يدعو على أحياء مِن العربِ".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মাস যাবৎ কুনূত পাঠ করেছেন, আরবের কিছু গোত্রের বিরুদ্ধে বদ-দোয়া করেছেন, অতঃপর তা ছেড়ে দেন।
2753 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قنت بعد الركعة في صلاته شهرًا إذا قال:"سمع الله لمن حمده" يقول في قنوته:"اللهمَّ أَنج الوليد بن الوليد، اللهمَّ نَجِّ سلمة بن هشام، اللهمَّ نَجِّ عيَّاش بن أبي ربيعة، اللهمَّ نَجِّ المستضعفين من المسلمين، اللهمَّ اشدد وطأتك على مُضَرَ. اللهمَّ اجعلها عليهم سنين كَسِنِي يوسف"، قال أبو هريرة: ثمَّ رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك الدعاء بَعدُ. فقلتُ: أُرى رسول الله صلى الله عليه وسلم قد ترك الدعاء لهم، قال: فقيل: وما تراهم قد قدموا؟ .
صحيح: رواه مسلم في المساجد (675/ 295) من طريق الوليد بن مسلم قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره وقد سبق.
قوله: قدموا: أي كان ذلك الدعاء لهم لأجل تخليصهم من أيدي الكَفَرة وقد خلصوا منهم، وجاؤوا للمدينة، فما بقى حاجة بالدعاء لهم بذلك وأما دعاؤه على الكفرة فمنهم من أسلم، ومنهم من مات، فما بقي حاجة كذلك.
قال ابن حبان (5/ 324) بعد أن رواه من طريق الوليد بن مسلم به:"في هذا الخبر بيان واضح أن القنوت إنَّما يُقنَتُ في الصلوات عند حدوث حادثة … فإذا عُدِم مثل هذه الأحوال لم يُقْنَت حينئذٍ. إذا المصطفى صلى الله عليه وسلم كان يقنتُ على المشركين، ويدعو للمسلمين بالنجاة. فلما أصبح يومًا من الأيام ترك القنوت. فذكر ذلك أبو هريرة فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما تراهم قد قدموا".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সালাতে রুকূ’র পর এক মাস ধরে কুনূত (দোয়া) পাঠ করেছিলেন। যখন তিনি বলতেন: "সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ", তখন তিনি তাঁর কুনূতের মধ্যে বলতেন: "হে আল্লাহ! ওয়ালীদ ইবনে ওয়ালীদকে মুক্তি দাও। হে আল্লাহ! সালামাহ ইবনে হিশামকে রক্ষা করো। হে আল্লাহ! আইয়াশ ইবনে আবী রাবী'আহকে রক্ষা করো। হে আল্লাহ! দুর্বল (অত্যাচারিত) মুসলিমদের রক্ষা করো। হে আল্লাহ! মুদার গোত্রের উপর তোমার শাস্তি কঠোর করো। হে আল্লাহ! ইউসুফ (আঃ)-এর বছরের মতো তাদের উপর দুর্ভিক্ষপূর্ণ বছর চাপিয়ে দাও।" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য দোয়া করা ছেড়ে দিয়েছেন। আমি বললাম: আমি দেখছি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য দোয়া করা ছেড়ে দিয়েছেন। তখন (তাকে) জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি দেখেননি যে তারা এসে পড়েছে?
2754 - عن أبي مالك الأشجعي قال: قلت لأبي:"يا أبتِ إنَّك قد صليتَ خلْفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر وعثمان وعلي بن أبي طالب ههنا بالكوفة نحوًا من خمس سنين، أكانوا يَقْنُتُون؟ قال: أي بُنيَّ محدَثٌ".
صحيح: رواه الترمذي (402)، وابن ماجه (1241)، والإمام أحمد (15879) كلُّهم من طريق يزيد بن هارون، قال: أخبرنا أبو مالك قال: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
قال الترمذي: حسن صحيح، والعمل عليه عند أكثر أهل العلم.
وأبو مالك اسمه: سعد بن طارق بن أَشْيَم. انتهى.
قلت: طارق بن أَشْيم بوزن أحَمر، صحابي له أحاديث، ذكره البخاري في"التاريخ الكبير" (4/ 352) وقال:"له صحبة"، وكذا ذكره ابن سعد في الطبقات (6/ 37) فلا يجوز أن يشكك في صحبته.
قال مسلم: لم يرو عنه غير ابنه. كذا في التقريب.
وهذا الحديث رواه أيضًا النسائي (1080) عن قتيبة بن سعيد عن خلف بن خليفة، عن أبي مالك الأشجعي به مثله.
وصحّحه ابن حبان (1989) ورواه عن الحسن بن سفيان، حدثنا قتيبة بن سعيد به مثله.
ورواه الإمام أحمد (27209) عن حسين بن محمد، حدثنا خلف به، وفيه: كان أبي قد صلَّى خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو ابن ست عشرة سنة … فذكر بقية الحديث مثله.
ومثله رواه أيضًا (27210) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك.
وخلف بن خليفة، هو ابن صاعد الأشجعي مولاهم، وإن كان قد اختلط بآخره، ولكن تابعه عليه غيره.
وقوله: أي بُنيَّ محدثٌ، يعني استمرار القنوت في صلاة الصبح لغير نازلة، وإلَّا فقد ثبت أنه صلى الله عليه وسلم قنت في الصيح وغيرها من الصلوات عند النوازل.
وأما ما رُوي عن أنس بن مالكٍ قال:"ما زال رسول الله صلى الله عليه وسلم يقنُت في صلاة الصبح حتى فارق الدنيا" فهو ضعيف.
رواه عبد الرزاق في مصنفه (4964) وعنه الإمام أحمد (12657)، ومن طريقه الدارقطني (2/ 39) قال عبد الرزاق: عن أبي جعفر - يعني الرازي -، عن الربيع بن أنس، عن أنس بن مالك فذكره.
ورواه البيهقي (2/ 2001) عن الحاكم من وجه آخر، عن أبي جعفر الرازي به مثله. قال الحاكم:"إسناده صحيحٌ سنده، ثقةٌ رواته"، تعقبه التركماني فقال: كيف يكون سنده صحيحًا، وراويه عن الربيع أبو جعفر عيسى بن ماهان الرازي متكلم فيه. قال ابن حنبل والنسائي: ليس بالقوي، وقال أبو زرعة: يهم كثيرًا وقال الفلاس: سيء الحفظ، وقال ابن حبان: يُحدِّث بالمناكير عن المشاهير". انتهى.
قلت: وهو كما قال، وقد قال ابن المديني: كان يُخلِّط، وقال يحيي: كان يخطئ، وأعتقد أن هذا الحديث مما أخطأ فيه أبو جعفر الرازي، فإن الروايات الصحيحة عن أنسٍ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قنت شهرًا ثمَّ تركهـ.
আবূ মালিক আল-আশজাঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতাকে বললাম: "হে আব্বা, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে, আর আবূ বকর, উমার, উসমান এবং আলী ইবনু আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে এখানে কূফায় প্রায় পাঁচ বছর ধরে সালাত আদায় করেছেন। তাঁরা কি (সালাতে) কুনূত পড়তেন?" তিনি বললেন: "হে আমার প্রিয় বৎস, এটি (পরবর্তীকালে) প্রবর্তন করা হয়েছে।"
2755 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان لا يقنت إلا أن يدعو الأحد، أو يدعو على
أحد، وكان إذا قال:"سمع الله لمن حمده" قال:"ربّنا ولك الحمد، اللهم انج" فذكر الحديث.
صحيح: رواه ابن خزيمة (619) عن محمد بن يحيى، نا أبو داود، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن سعيد وأبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وأصله في صحيح البخاري (4560) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا إبراهيم بن سعد بإسناده، فذكره كما مضى.
وعزاه ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 431) إلى ابن حبان (ولم أجده في النسخ المطبوعة) وقال صاحب"التنقيح":"رواته ثقات". وقال الحافظ ابن حجر في"الدراية" (1/ 195) معلقًا عليه:"وعند ابن خزيمة مثله، وإسناد كل منهما صحيح".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুনূত পড়তেন না, তবে যখন কারো জন্য দোয়া করতেন অথবা কারো বিরুদ্ধে দোয়া করতেন (তখন পড়তেন)। আর যখন তিনি বলতেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদা", তখন বলতেন: "রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ। আল্লাহুম্মা আনজি [মুক্তি দাও]..."— এরপর তিনি (বর্ণনাকারী) অবশিষ্ট হাদীসটি উল্লেখ করেন।
2756 - عن أنس بن مالك:"أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان لا يقنت إلا إذا دعا لقوم، أو على قوم".
صحيح: رواه ابن خزيمة (620) عن محمد بن محمد بن مرزوق الباهلي، حدّثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك، فذكره.
وأخرجه الخطيب في كتاب"القنوت" له: أخبرني عبيد الله بن أبي الفتح، ثنا المعافى بن زكريا، ثنا محمد بن مرزوق، ثنا محمد بن عبد الله الأنصاريّ، بإسناده، مثله. ذكره ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 431) وقال صاحب"التنقيح":"هذا إسناد صحيح، والحديث نصٌّ في أنّ القنوت مختص بالنازل".
আনাস ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুনূত পাঠ করতেন না, তবে যখন তিনি কোনো গোত্রের (কল্যাণের জন্য) দু‘আ করতেন অথবা কোনো গোত্রের (বিরুদ্ধে) বদদু‘আ করতেন (তখন করতেন)।
2757 - عن ابن عباس قال: قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا متتابِعًا في الظهر والعصر والمغرب والعشاء وصلاة الصبح في دبر كلِّ صلاة إذا قال:"سمع الله لمن حمده" من الركعة الآخرة. يدعو على أحياء من بني سُليم، على رِعْلٍ وذكوَانَ وعُصيَّة. ويُؤَمِّنُ مَن خَلفَه.
حسن: رواه أبو داود (1443) عن عبد الله بن معاوية الجُمحي، حدَّثنا ثابت بن يزيد، عن هلال بن خَبَّاب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسنٌ لأجل هِلال بن خبَّاب فإنه مختلف فيه غير أنَّه صدوق يُحسَّن حديثه، وقد تغير بآخره.
وصحّحه ابن خزيمة (618) ورواه من طريق ثابت بن يزيد أبو زيد الأحول، ورواه الإمام أحمد (2746) عن عبد الصمد وعفان، قالا: حدثنا ثابت به، وزادا بعد قوله:"يؤمِّن مَن خَلفَه""وأرسل إليهم يدعوهم إلى الإسلام فقتلوهم".
قال عكرمة:"هذا مفتاح القنوت".
ووهمَ الحاكم (1/ 225، 226) فقال: على شرط البخاري، والصواب أنه ليس على شرط البخاري؛ لأن هلالًا ليس من رجاله وإنما هو من رجال السنن.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একাধারে এক মাস যুহর, আসর, মাগরিব, ইশা এবং ফজরের সালাতে কুনূত পাঠ করেছেন—প্রতি সালাতের শেষ রাকা'আতে 'সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ' বলার পর। তিনি বনু সুলাইম গোত্রের কিছু শাখা, যেমন – রি'ল, যাকওয়ান ও উসাইয়ার উপর বদদোয়া করছিলেন। আর তাঁর পেছনের লোকেরা 'আমিন' বলছিল।
2758 - عن أنس بن مالك في قصة القرّاء وقتلهم، قال: فقال لي أنس: لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم كلّما صلّى الغداة رفع يديه يدعو عليهم، يعني على الذين قتلوهم.
حسن: رواه البيهقي (2/ 211) عن علي بن صقر بن نصر السّكري بغداد في سويقة غالب من كتابه، ثنا عفان بن مسلم، ثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
قال النووي في"شرح المهذب" (3/ 500):"إسناده صحيح أو حسن".
قال البيهقي: إنّ عددًا من الصحابة رفعوا أيديهم في القنوت، وقال: عن أبي رافع قال: صليت خلف عمر بن الخطاب فقنت بعد الركوع، ورفع يديه وجهر بالدّعاء. وقال: وهذا عن عمر صحيح.
وأمّا مسح الوجه باليدين بعد الفراغ من الدّعاء، فقال النووي في"شرح المهذب" (3/ 500):"فإن قلنا لا يرفع اليدين لم يشرع المسح بلا خلاف، وإن قلنا: يرفع، فوجهان: أشهرهما أنه يستحبّ، والثاني: لا يمسح. وهذا هو الصحيح، صحّحه البيهقيّ.
قال البيهقي: لستُ أحفظ في مسح الوجه هنا عن أحد من السّلف شيئًا، وإن كان يُروى عن بعضهم في الدّعاء خارج الصلاة، فأما في الصلاة فهو عمل لم يثبت فيه خبر، ولا أثر، ولا قياس، فالأولى أن لا يفعله، ويقتصر على ما نقله السلف عنهم رفع اليدين دون مسحهما بالوجه في الصلاة"."السنن الكبرى" (2/ 212).
وأما ما رُوي عن ابن عباس في مسح الرجل وجهه بيديه بعد فراغه من الدعاء فهو ضعيف، رواه ابن ماجه (1181) عن أبي كريب ومحمد بن الصباح قالا: حدَّثنا عائذ بن حبيب، عن صالح بن حسَّان الأنصاري، عن محمد بن كعب القُرظي، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دعوت الله فادعُ بباطن كفيك، ولا تدعُ بظهورهما، فإذا فرغْتَ فامسحْ بهما وجهَك".
وإسناده ضعيف جدًّا. فإن صالح بن حسّان منكر الحديث كما قال البخاري، وقال النسائي: متروك الحديث.
ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 536) من طريقه بصيغة التمريض.
وتابعه عيسى بن ميمون عن محمد بن كعب به ولفظه:"إذا سألتم الله فاسألوه ببطون أكفكم، ثم لا تردُّوها حتَّى تمسحوا بها وجوهَكم".
وفي رواية:"فإنَّ الله جاعل فيها بركة".
وعيسى بن ميمون هذا قال فيه ابن حبان: يروي أحاديث كلها موضوعات. وقال النسائي: ليس بثقة،
وقال البخاري: صاحب مناكير عن محمد بن كعب. وضعَّفه أيضًا ابن معين والفلاس وغيرهما.
قال أبو داود: سمعت أحمد وسئل عن الرجل يمسح وجهه بيديه إذا فرغ في الوتر فقال: لم أسمع فيه بشيء، وقال: وعيسى بن ميمون الذي روى حديث ابن عباس ليس هو ممن يحتج بحديثه، وكذلك صالح بن حسان.
وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع يديه في الدعاء لم يحطهما حتى يمسح بهما وجهه.
رواه الترمذي في جامعه (3386)، وعبد بن حميد (39)، والحاكم في المستدرك (1/ 536) كلهم من طريق حماد بن عيسى الجهني، عن حنظلة بن أبي سفيان الجمحي، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، عن عمر بن الخطاب فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث حماد بن عيسى وقد تفرد به، وهو قليل الحديث، وقد حدث عنه الناس، وحنظلة بن أبي سفيان هو ثقة، وثّقه يحيى بن سعيد القطان".
قلت: حماد بن عيسى بن عبيدة الجهني ضعيف، ضعّفه أبو داود، وأبو حاتم، وابن حبان وغيرهم.
وسئل أبو زرعة عن هذا الحديث فقال:"هو حديث منكر، أخاف ألا يكون له أصل"."العلل" (2106).
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কুররাদের (ক্বারীদের) হত্যার ঘটনা প্রসঙ্গে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি, যখনই তিনি ফজর (সুবহের) সালাত আদায় করতেন, তখনই তিনি তাদের—অর্থাৎ যারা তাদের হত্যা করেছিল—বিরুদ্ধে দু'আ করার জন্য তাঁর উভয় হাত উঠাতেন।
2759 - عن * *
২৭৫৯ - ... থেকে বর্ণিত।
2760 - عن عائشةَ زوجِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم أنَّها قالت: فُرضت الصلاةُ ركعتين ركعتين في الحضر والسفر، فأُقِرَّتْ صلاةُ السفر، وزيد في صلاة الحضر.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (8) عن صالح بن كيسان، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.
رواه البخاري في الصلاة (350) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (685) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
ورواهما أيضًا من حديث سفيان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: الصلاة أوّلُ ما فُرضتْ ركعتين. فأُقِرَّتْ صلاة السفر، وأُتِمَّت صلاة الحضر.
قال الزهري: فقلت لعروة: ما بال عائشة تُتِم؟ قال: تأولتْ ما تأوَّل عثمان. البخاري (1090).
ورواه ابن خزيمة (944)، وابن حبان (2738) كلاهما من طريق محبوب بن الحسن، عن داود ابن أبي هند، عن الشعبيّ، عن مسروق، عن عائشة وزادا فيه:"وتركت صلاة الفجر لطول القراءة، وصلاة المغرب لأنها وتر النهار".
وإسناده حسن لأجل محبوب بن الحسن وهو: محمد بن الحسن بن هلال ابن أبي زينب، أبو جعفر أو أبو الحسن، لقبه: محبوب، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. أخرج له البخاري مقرونًا.
ومعنى قول عروة: تأوَّلَتْ ما تأول عثمان: قال الجمهور: معنى تأويلهما أنَّهما رأيا القَصْرَ جائزًا لا واجبًا، وقيل غير ذلك. قاله النووي في"الخلاصة" (2/ 725).
وأما ما رُويَ عن عثمانَ مرفوعًا:"من تأهَّل في بلد فليصلِّ صلاة المقيم" فهو حديث ضعيف.
رواه الإمام أحمد (443) عن أبي سعيد، يعني مولى بني هاشم، حدثنا عكرمة بن إبراهيم الباهلي، حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي ذُباب، عن أبيه، أن عثمان بن عفان صلَّى بِمِنىَ أربع ركعاتٍ، فأنكره الناس عليه، فقال: يا أيُّها الناس! إنِّي تأهَّلت بمكة منذ قَدِمتُ، وإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
فيه عكرمة بن إبراهيم الباهلي نقل الحافظ في"التعجيل" عن الحسيني أنه قال:"ليس بالمشهور".
وقال أبو زرعة:"لا أعرف حاله" ولكن تعقبه الحافظ بأنه:"مشهور وحاله معروفه" ظنًّا منه أنه عكرمة بن إبراهيم الأزدي، ثم نقل كلام أهل العلم في تضعيف الأزدي، وقال: ينظر فيمن نسبه باهِلِيًّا.
قلت: وفي كلا الحالين سواء كان باهِلِيًّا أو أزديًّا فالإسناد ضعيف.
وفي الإسناد أيضًا عبد الرحمن بن أبي ذُباب لم يوثقه غير ابن حبان فهو في مرتبة"مقبول" عند الحافظ.
ومن تأويلات عثمان ما بيَّنه هو نفسه: إنما يقصر الصلاة من حمل الزاد والمزاد، وحل وارتحل. ذكره الطحاوي في"شرحه" (1/ 426) وذكره فيه تأويلات أخرى أيضًا. انظر للمزيد"أحكام السفر والإقامة" (49) لشيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى. وخلاصته ما قاله النووي بأنَّ عثمان كان يرى القصر جائزًا لا واجبًا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী ছিলেন, তিনি বলেন: সালাত (নামায) যখন ফরয করা হয়েছিল, তখন সফর ও গৃহে অবস্থান—উভয় অবস্থাতেই দুই দুই রাকাত করে ফরয করা হয়েছিল। অতঃপর সফরের সালাতকে (দুই রাকাতের উপর) বহাল রাখা হয় এবং গৃহে অবস্থানের সালাতে রাকাত বৃদ্ধি করা হয়।
2761 - عن ابن عباس قال: فرض الله الصلاةَ على لسان نبيكم في الحضر أربعًا وفي السفر ركعتين، وفي الخوف ركعة.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (687) من طرق عن مجاهد وغيره عن ابن عباس، وعن موسى بن سلمة الهُذَلي قال: سألت ابن عباس: كيف أُصَلِّي إذا كنتُ بمكة، إذا لم أُصَلِّ مع الإمام. فقال: ركعتين. سنة أبي القاسم صلى الله عليه وسلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জবানে সালাত (নামাজ) নির্ধারণ করেছেন—মুকিম অবস্থায় চার রাকাত, সফরে দুই রাকাত এবং ভয়ের (বিপদসংকুল) অবস্থায় এক রাকাত।
মূসা ইবনে সালামাহ আল-হুযালী (রহ.) বলেন, আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আমি যখন মক্কায় থাকি এবং ইমামের সাথে সালাত আদায় না করি, তখন কীভাবে সালাত আদায় করব? তিনি বললেন: দুই রাকাত। এটা আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত।
2762 - عن عمر قال: صلاة السفر ركعتان، وصلاة الجمعة ركعتان، والفطر والأضحى ركعتان، تمام غير قَصْرٍ على لسان محمد صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه ابن ماجة (1064) من طريق يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن زبيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن عمر فذكره.
وإسناده حسن لأجل يزيد بن زياد بن أبي الجعد الأشجعي فإنه"صدوق".
ومن هذا الوجه رواه ابن خزيمة في صحيحه (1425)، والبيهقي (3/ 199).
وخالفه سفيان الثوري فرواه عن زبيد ولم يذكر كعب بن عُجْرة بين ابن أبي ليلى وعمر. ومن هذا الوجه رواه النسائي (1566)، والإمام أحمد (257)، وابن حبان (2783)، وسفيان أحفظ من يزيد بن زياد بن أبي الجعد، ولذا رجَّح أبو حاتم رواية الثوري. انظر:"العلل" (1/ 138).
قلت: تابعه على ذلك شعبة عند النسائي (1440) وشريك بن عبد الله عند ابن ماجة (1963) فروياه عن زبيد ولم يذكرا"كعب بن عُجْرة" بين عبد الرحمن بن أبي ليلى وعمر بن الخطاب.
واختلف أهل العلم في سماع عبد الرحمن بن أبي ليلى من عمر بن الخطاب فقال النسائي وغيره:"إنه لم يسمع منه". وأثبته مسلم في مقدمة صحيحه قائلًا:"وأسند عبد الرحمن بن أبي ليلى، وحفظ عن عمر بن الخطاب … وصحب عليًّا، وروى عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم حديثًا".
فمرة روايته عن كعب بن عُجرة، عن عمر بن الخطاب، وأخرى عنه مباشرة فيُحكم على الأوَّل بأنّه: المزيد في متصل الأسانيد، أو كان أولًا سمع من كعب بن عجرة، ثم تيسر له السماع من عمر بن الخطاب فروى زبيد على وجهين وتلاميذه كل منهم روى على وجه واحد. والله أعلم بالصواب.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সফরের সালাত দুই রাকাত, জুমু'আর সালাত দুই রাকাত, এবং ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহার সালাত দুই রাকাত; যা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জবানীতে পূর্ণ সালাত, কসর (হ্রাসকৃত) নয়।
2763 - عن أُمَيَّة بن عبد الله بن خالد بن أَسِيد أنَّه قال لعبد الله بن عمر: إنَّا نَجِد صلاة الحضر وصلاة الخوف في القرآن. ولا نجد صلاة السفر في القرآن. فقال له عبد الله بن عمر: يا ابن أخي! إنَّ الله عز وجل بعث إلينا محمدًا صلى الله عليه وسلم، ولا نعلم شيئًا، وإنَّما نفعل كما رأينا محمدًا صلى الله عليه وسلم يفعل.
حسن: رواه ابن ماجة (1066)، والنسائي (1434) وصحّحه ابن خزيمة (946)، وابن حبان (1451)، والحاكم (1/ 258) كلهم من طريق الليث بن سعد، قال: حدثني ابن شهاب، عن عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أمية بن عبد الله بن خالد فذكره.
وقال الحاكم: هذا حديث رواته مدنيون ثقات.
ورجاله ثقات غير عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن فإنَّه لم يوثّقه إلَّا ابن عبد الرحيم البرقي كما في التهذيب، مع إخراج ابن خزيمة وابن حبان والحاكم له، ولذا قال الحافظ في التقريب:"صدوق" وأظنه كذلك، وقد روى عنه جمع إلَّا أنَّ البخاري قال فيه:"لا يصح حديثه" قلت: وهذا لا يمنع من تحسينه. والله تعالى أعلم.
وقرَّر البيهقي (3/ 136) هذا الإسناد، وانتقد جماعةً رووا عن ابن شهاب فلم يقيموا إسناده.
قلت: ومن هؤلاء الإمام مالك، فإنه رواه عن ابن شهاب، عن رجل من آل خالد بن أسيد، أنه سأل عبد الله بن عمر فذكره. قصر الصلاة (7).
قال ابن عبد البر: هكذا يَروِي مالكٌ هذا الحديثَ عن ابن شهاب، وسائر أصحاب ابن شهاب يروونه عن ابن شهاب، عن عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أمية بن عبد الله بن خالد بن أسيد، عن ابن عمر. انتهى.
فأسقط مالك رجلًا كما أنه لم يسم الرجل من آل خالد بن أسيد.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমাইয়া ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে খালিদ ইবনে আসীদ তাকে বললেন: আমরা কুরআনে মুকিম অবস্থার সালাত এবং ভয়কালীন সালাত খুঁজে পাই, কিন্তু আমরা কুরআনে সফরের সালাত খুঁজে পাই না। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: হে আমার ভাতিজা! নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আমাদের নিকট মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রেরণ করেছেন, আর (তাঁকে প্রেরণের পূর্বে) আমরা কিছুই জানতাম না। আমরা কেবল তাই করি যা আমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে করতে দেখেছি।
2764 - عن يعلى بن أُمَيَّةَ قال: قلت لعمر بن الخطاب: {فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَقْصُرُوا مِنَ الصَّلَاةِ إِنْ خِفْتُمْ أَنْ يَفْتِنَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا} [النساء: 101] فقد أمِن الناس. فقال: عجبتُ مما عجبتَ منه. فسألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك فقال:"صدقة تصدق الله بها عليكم فاقبلوا صدقته".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (686) من طرق عن عبد الله بن إدريس، عن ابن جريج، عن ابن أبي عمار، عن عبد الله بن بابَيْهِ، عن يعلى بن أمية فذكره.
ورواه عبد الرزاق عن ابن جريج، قال: سمعت عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمار، يحدث عن
عبد الله بن باباه به ومن هذا الطريق رواه الترمذي (3034)، وأبو داود (1199).
وأما النسائي (3/ 116)، وابن ماجة (1065) فروياه من طريق عبد الله بن إدريس مثل مسلم.
قال الشافعي:"فدلَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على أن القصر في السفر بلا خوف صدقة من الله، والصدقة رخصة لا حتم من الله أن يقصروا".
وقالت عائشة: كل ذلك فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم أتمَّ في سفره، وقصر.
ইয়া'লা ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, "তোমাদের উপর কোনো পাপ নেই যদি তোমরা সালাত সংক্ষেপ করো, যদি তোমরা আশঙ্কা করো যে, কাফিররা তোমাদেরকে পরীক্ষায় ফেলবে।" [সূরা নিসা: ১০১] অথচ এখন তো মানুষ নিরাপদ। তিনি (উমার) বললেন: তুমি যে বিষয়ে আশ্চর্য হয়েছ, আমিও সেই বিষয়ে আশ্চর্য হয়েছিলাম। অতঃপর আমি এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "এটা এমন এক দান (উপহার) যা আল্লাহ তোমাদের উপর সদাকাহ (দান) করেছেন। সুতরাং তোমরা তাঁর সদাকাহ গ্রহণ করো।"
2765 - عن عدي بن ثابت قال: سمعتُ البراء يُحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه كان في سفر فصلَّى العشاء الآخِرة. فقرأ في إحدى الركعتين: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ}.
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (767)، ومسلم في الصلاة (464) كلاهما من حديث شعبة، عن عدي بن ثابت فذكره.
وقال البراء في رواية:"فَمَا سَمِعتُ أحدًا أحسنَ صوتًا منه".
বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফরে ছিলেন। তিনি এশার শেষ সালাত (নামাজ) আদায় করলেন এবং দুই রাকাআতের মধ্যে এক রাকাআতে সূরা "ওয়াত-তীন ওয়ায-যায়তূন" পাঠ করলেন।
বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অন্য এক বর্ণনায় বলেন: "আমি তাঁর (রাসূলুল্লাহর) চেয়ে বেশি সুন্দর কণ্ঠস্বর আর কারো শুনিনি।"
2766 - عن ابن عبَّاس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج من المدينة إلى مكة، لا يخاف إلا الله رب العالمين، فصلَّى ركعتين.
صحيح: رواه الترمذي (547)، والنسائي (1435) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا هُشيم، عن منصور بن زاذان، عن ابن سيرين، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
ورواه الإمام أحمد (1852) عن هُشيم به وزاد في آخر الحديث:"حتى رجع".
وهُشيم هو: ابن بَشِير السلمي من رجال الجماعة إلَّا أنَّه كان يدلِّس، وقد ثبت التَّصريح بالتحديث في رواية الطبراني (12863) فانتفت عنه تهمة التدليس ثمَّ له متابعة فقد رواه النسائي أيضًا من وجه آخر عن محمد بن سيرين به مثله.
تنبيه: لقد وقع انقلابٌ في المتن في سنن النسائي في الموضع الأوّل فقال:"خرج من مكة إلى المدينة" والعكس هو الصّحيح.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন, আল্লাহ রাব্বুল আলামীন ব্যতীত অন্য কাউকেও ভয় না করে, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।
2767 - عن عبد الله بن مسعود يقول: صلَّيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر ركعتين، ومع أبي بكر ركعتين، ومع عمرَ ركعتين.
صحيح: رواه النسائي (1439) عن محمد بن علي بن الحسن بن شقيق، قال: أخبرني أبي، أخبرنا أبو حمزة - وهو السُّكَّري - عن منصور، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله فذكره.
وإسناده صحيح. ويبدو أنَّه اختصار لما رواه الشيخان عنه كما سيأتي في قَصْر الصلاةِ في مِنًى.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে দু'রাক'আত সালাত আদায় করেছি, আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও দু'রাক'আত, এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও দু'রাক'আত।
