আল-জামি` আল-কামিল
2768 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يُحِبُّ أن تُؤتَى رُخَصُه، كما
يكره أن تُؤْتَى معصيتُه".
حسن: رواه الإمام أحمد (5873)، والبزار"كشف الأستار" (988) كلاهما من حديث عبد العزيز بن محمد (وهو الدراوردي) عن عُمارة بن عَزِيَّة، عن حرب بن قيس، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده حسن لأجل حرب بن قيس فإنَّه لم يوثِّقه غير ابن حبان، وروى عنه جمع، وقال عنه راويه عمارة بن غزيَّة: كان حرب رِضًا. وهو من رجال التعجيل.
وصحّحه ابن حبان (2742) فرواه من طريق قتيبة بن سعيد، حدثنا الدراوردي به مثله، ورواه الإمام أحمد (5866) عن قتيبة بن سعيد إلَّا أنَّه لم يذكر"حرب بن قيس" بين عُمارة ونافع، فالذي يظهر أنَّه سقط خطأً. لأنَّ ابنَ حبَّان رواه عن قتيبة وأثبته وقد تابع يحيى بن أيوب - وهو الغافقي - الدراوردي في ذكر حرب بن قيس بين عمارة ونافع، ومن طريقه رواه ابن خزيمة (950) إلَّا أنَّه تحرَّف فيه"يحيى بن أيُّوب" إلى"يحيى بن زياد".
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ পছন্দ করেন যে তাঁর সহজ বিধানগুলো (রুখসত) গ্রহণ করা হোক, যেমন তিনি অপছন্দ করেন যে তাঁর অবাধ্যতা করা হোক।"
2769 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله عز وجل يحب أن يؤتى رُخَصُهُ كما يُحِبُّ أن يؤتى عزائمه".
حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 323)، والبزار"كشف الأستار" (990) كلاهما من طريق حسين بن محمد الذارع، ثنا حصين بن نمير، ثنا هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن لأجل حسين بن محمد الذارع، وثَّقه النسائي، وقال أبو حاتم:"صدوق"، وذكره ابن حبان في الثقات، وأخرج الحديث في صحيحه (354) من هذا الطريق.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 162):"رجال البزار ثقات وكذلك رجال الطبراني".
قلت: وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته أصحها.
ورُوي هذا الحديث عن الصحابة الآخرين أيضًا ولكن لم يصح منها إلَّا ما ذكرته.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা’আলা পছন্দ করেন যে তাঁর সহজ বিধানগুলো (রুখসত বা সুযোগ-সুবিধা) পালন করা হোক, যেমন তিনি পছন্দ করেন যে তাঁর কঠোর বিধানগুলো (আযাইম বা অবশ্যপালনীয় ফরযসমূহ) পালন করা হোক।"
2770 - عن حفصٍ، عن أنس بن مالك أنَّه قال: انطلق بنا إلى الشام إلى عبد الملك، ونحن أربعون رجلًا من الأنصار ليفْرِضَ لنا. فلما رجع وكنا بفجِّ الناقة صلى بنا الظهر ركعتين، ثم سلَّم، ودخل فُسْطَاطَه، وقام القوم يُضيفون إلى ركعتيه ركعتين أخْريين. قال: فقال: قبَّح الله الوجوه، فوالله! ما أصابتِ السنةَ، ولا قَبِلتِ الرخصةَ، فأشهد لسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أَقوامًا يتعمقون في الدين، يمرُقُون كما يمرُقُ السهمُ من الرمية".
حسن: رواه الإمام أحمد (12615) عن حسين بن محمد، حدثنا خلف، عن حفص، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن لأجل خلف وهو: ابن خليفة بن صاعد وثقه ابن سعد والعجلي، وقال ابن معين والنسائي: لا بأس به، وقال أبو حاتم:"صدوق".
قلت: ومثله بحسن حديثه، وهو من رجال مسلم.
وحفص هو: ابن أخي أنس بن مالك، واسم أبيه عمر، وسماه البخاري"عبد الله" وترجم له في التاريخ الكبير (2/ 360) فقال: حفص بن عبد الله بن أبي طلحة، ابن أخي أنس الأنصاري، سمع منه خلف بن خليفة. وروى النضر بن محمد، عن عكرمة بن عمار قال: حدثني حفص بن عمر بن أبي طلحة: صبحت أنس بن مالك إلى الشام، فرأى قومًا يتطوعون في السفر، فتردد البخاري في اسم أبيه، ولكن ترجمته باسم حفص بن عبد الله يشير إلى ترجيح أن اسم أبيه"عبد الله"، ورجَّح الحافظ في التهذيب أن اسمه:"عمر" والله أعلم بالصواب، وهو صدوق، وثَّقه الدارقطني، وقال أبو حاتم:"صالح الحديث". وذكره ابن حبان في الثقات.
والمرفوع منه أخرجه البزار وغيره، وسيذكر في الموضع المناسب.
تنبيه: تحرف في"المجمع" (2941): خلف عن حفص إلى"خلف بن حفص" فقال الحافظ الهيثمي:"رواه أحمد، وخلف بن حفص لم أجد من ترجمه" فلعله كان هكذا في نسخة أحمد عنده.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমরা আনসারদের চল্লিশজন লোক আমাদের ভাতা নির্ধারণের জন্য আব্দুল মালিকের কাছে শামের (সিরিয়ার) দিকে গেলাম। এরপর যখন আমরা ফিরলাম এবং আমরা ফাজ্জুন-নাক্বাহ নামক স্থানে ছিলাম, তখন তিনি আমাদের নিয়ে যুহরের সালাত দুই রাকাত পড়লেন। অতঃপর সালাম ফিরিয়ে তার তাবুতে প্রবেশ করলেন। তখন লোকেরা দাঁড়িয়ে তার (আব্দুল মালিকের) দুই রাকাতের সাথে আরও দুই রাকাত যোগ করে নিল। (আনাস ইবনে মালিক) বললেন, তখন তিনি বললেন: আল্লাহ্ এই মুখগুলিকে অপমানিত করুন! আল্লাহর কসম, তারা সুন্নাহ অনুসরণ করেনি এবং তারা রুখসতও (ছাড়) গ্রহণ করেনি। অতএব, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই এমন কিছু লোক আছে, যারা দ্বীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করে (গভীরতা অন্বেষণ করে), তারা শিকার ভেদ করে তীর যেমন বেরিয়ে যায়, তেমনিভাবে (দ্বীন থেকে) বেরিয়ে যাবে।"
2771 - عن أنس يقول: صلَّيتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الظهر بالمدينة أربعًا، وصلَّيتُ معه العصر بذي الحُليفة ركعتين.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1089)، ومسلم في صلاة المسافرين (690) كلاهما من حديث سفيان، حدثنا محمد بن المنكدر وإبراهيم بن ميسرة سمعا أنس بن مالك يقول: فذكره. وله أسانيد أخرى في الصّحيحين.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনায় যোহরের সালাত চার রাকাত পড়েছি এবং তাঁর সাথে যুল-হুলাইফায় আসরের সালাত দুই রাকাত পড়েছি।
2772 - عن جُبَير بن نفير قال: خرجت مع شُرحبيل بن السِّمْط إلى قرية على رأس سبعة عشر، أو ثمانية عشر ميلًا. فصلى ركعتين فقلت له. فقال: رأيت عمر صلى بذي الحليفة ركعتين، فقلت له. فقال: إنَّما أفعل كما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل. صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (692) من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، ثنا شعبة، عن يزيد بن خُمير، عن حبيب بن عبيد، عن جبير بن نفير فذكره.
ورواه أيضًا من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة بهذا الإسناد وقال: عن ابن السِّمْط. ولم يُسمِّ شُرحبيلَ، وقال: إنه أتى أرضًا يقال لها: دُومين من حِمص، على رأس ثمانية عشر ميلًا.
জুবাইর ইবনু নুফাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি শুরাহবীল ইবনুস সিমত (এর) সাথে সতেরো কিংবা আঠারো মাইল দূরত্বের একটি গ্রামের দিকে বের হলাম। সেখানে তিনি দু'রাক'আত সালাত আদায় করলেন। আমি তাকে (এর কারণ) জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যুল-হুলাইফায় দু'রাক'আত সালাত আদায় করতে দেখেছি। আমি তাঁকেও (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে) জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেছিলেন: আমি তো কেবল তাই করছি যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে করতে দেখেছি।
2773 - عن يحيى بن يزيد الهُنَّائي قال: سألت أنس بن مالك: عن قصر الصلاة فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا خرج مسيرة ثلاثة أميالٍ، أو ثلاثة فراسخ - شعبةُ الشَّاكُ -
صلَّى ركعتين.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (691) عن أبي بكر بن أبي شيبة وغيره، عن غُندَر (وهو محمد بن جعفر) عن شعبة، عن يحيى بن يزيد الهُنَائي فذكره، وهو في"المصنف" (2/ 332 تحقيق اللحام).
ورواه الإمام أحمد (12313) عن محمد بن جعفر به وقال في أول الحديث: سألت أنس بن مالك عن قصر الصلاة، قال: كنتُ أخرج إلى الكوفة، فأصلي ركعتين حتى أرجع. وقال أنس: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أبو داود (1201) نحو لفظ مسلم، ورواه البيهقي (3/ 146) عن أبي داود والحاكم من طريق محمد بن جعفر به وفيه يقول يحيى بن يزيد الهُنَائي: وكنت أخرج إلى الكوفة فأصلي ركعتين حتى أرجع. فقال أنس: فذكره. فظهر منه أن الذي يخرج هو يحيى بن يزيد الهُنَائي.
قوله:"إذا خرج مسيرة ثلاثة أميالٍ، أو مسيرة ثلاثة فراسخَ".
معناه: بداية القصر للمسافرِ، لا غاية السفرِ، وإلى هذا أشار القرطبي رحمه الله في المفهم (2/ 332).
ونقل الحافظ في"الفتح" (2/ 567) عن النووي: أن أهل الظاهر ذهبوا إلى أن أقل مسافة القصر ثلاثة أميال. وكأنهم احتجوا في ذلك بما رواه مسلم وأبو داود من حديث أنس … وقال الحافظ:"وهو أصح حديث ورد في بيان ذلك وأصرحُهُ. وقد حمله من خالفه على أنَّ المراد به المسافة التي يبتدأ منها القصر، لا غاية السفر، ولا يخفى بعد هذا الحمل، مع أن البيهقي ذكر في روايته من هذا الوجه أن يحيى بن يزيد راويه عن أنس قال: سألت أنسًا عن قصر الصلاة، وكنت أخرج إلى الكوفة - يعني من البصرة - فأصلي ركعتين ركعتين حتى أرجع فقال أنس: فذكر الحديث، فظهر أنه سأله عن جواز القصر في السفر، لا عن الموضع الذي يبدأ القصر منه" انتهى.
ولكن الظاهر أن المسافة المقدرة في حديث أنس هي بداية القصر.
وأما تحديد مسافة السفر فالصحيح ما قاله شيخ الإسلام ابن تيمية، ورجحه تلميذه الحافظ ابن القيم قائلًا: بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يحدَّ لأمته مسافةً محدودةً للقصر والفطر. بل أطلق لهم ذلك في مطلق السفر والضرب في الأرض، كما أطلق لهم التيمم في كل سفر، وأما ما يُروى عنه من التحديد باليوم، أو اليومين، أو الثلاثة، فلم يصح عنه منها شيء البتة" انتهى. انظر:"زاد المعاد" (1/ 481).
وأما كلام الفقهاء في تحديد مسافة القصر فانظره في"المنة الكبرى" (2/ 131).
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইয়াহইয়া ইবনে ইয়াযীদ আল-হুনাই বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সালাত কসর (সংক্ষেপ) করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তিন মাইল কিংবা তিন ফারসাখের দূরত্বের পথে বের হতেন—(বর্ণনাকারী) শু’বা এ বিষয়ে সন্দেহ প্রকাশ করেছেন—তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।
2774 - عن أنس يقول: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم من المدينة إلى مكة، فكان يُصلي ركعتين
ركعتين حتى رجعنا إلى المدينة. قلت: كم أقام بمكة؟ قال: عشرًا.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1081)، ومسلم في صلاة المسافرين (693) كلاهما من حديث يحيى بن أبي إسحاق، قال سمعتُ أنسًا يقول: فذكره.
وفي رواية عند مسلم يقول: خرجنا من المدينة إلى الحج، ثم ذكر مثله.
فأنس يشير إلى قيام النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، لأنه دخل مكة صبح رابعة من ذي الحجة، وهو يوم الأحد، وبات بالمحصب ليلة الأربعاء. وفي تلك الليلة أعمرت عائشة من التنعيم، ثم طاف عليه السلام طواف الوداع سحرًا قبل صلاة الصبح من يوم الأربعاء، وخرج صبيحته، وهو الرابع عشر. قاله المندري. انظر"نصب الراية" (2/ 184) وحديث ابن عباس الآتي يختص بفتح مكة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলাম। অতঃপর তিনি দুই রাক‘আত, দুই রাক‘আত (কসর) সালাত আদায় করছিলেন, যতক্ষণ না আমরা মদীনায় ফিরে এলাম। (বর্ণনাকারী) আমি জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি মক্কায় কতদিন অবস্থান করেছিলেন? তিনি বললেন, দশ দিন।
2775 - عن ابن عباس قال: أقام النبي صلى الله عليه وسلم تسعة عشر يَقْصُر، فنحن إذا سافرنا تسعة عشر قصرنا، وإن زدنا أتممنا.
صحيح: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1080) من طريق أبي عوانة عن عاصم وحُصَين، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ورواه أبو داود وغيره وفيه"سبع عشرة".
قال البيهقي (3/ 151):"اختلفت هذه الروايات في"تسع عشرة" و"سبع عشرة" وأصحهما عندي رواية من روى"تسع عشرة" وهي الرواية التي أودعها محمد بن إسماعيل البخاري في الجامع الصحيح. فأخذ من رواها، ولم يختلف عليه على عبد الله بن المبارك، وهو أحفظ من رواه عن عاصم الأحول" انتهى.
وهو يشير إلى ما رواه البخاري في المغازي (4298) عن عبدان، عن عبد الله (ابن المبارك) أخبرنا عاصم، عن عكرمة، عن ابن عباس أقام النبي صلى الله عليه وسلم بمكة تسعة عشر يومًا يصلِّي ركعتين. انتهى.
قلت: وتابعه أبو عوانة كما تراه وأبو شهاب، البخاري (4299) كلاهما عن عاصم مثل رواية عبد الله بن المبارك.
انظر: لمزيد من التفصيل:"المنة الكبرى" (2/ 138).
وقول ابن عباس:"وإن زدنا أتممنا" هو مذهبه، وإلا فقد ثبت عن غير واحِدٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم والتابعين أنَّهم كانوا يقصرون الصلاة بدون تحديد المدة، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى:"وتُقصر الصلاة في كل ما يسمى سفرًا، سواء قلَّ أو كثر. ولا يتقدر بمدَّة. وهو مذهب الظاهرية، ونصره صاحب المغني فيه، وسواء كان مباحًا أو محرَّمًا. ونصره ابن عقيل في موضع، وقال بعض المتأخرين من أصحاب أحمد والشافعي: وسواء نوى إقامة أكثر من أربعة أيام أولا، وروي هذا عن جماعة من الصحابة"."الاختبارات الفقهية لشيخ الإسلام" (ص 69).
قلت: أقام أنس بن مالك بالشام شهرين يصلِّي ركعتين.
وأقام ابن عمر باذربيجان ستة أشهر يقصر الصلاة.
ووفد سعد بن أبي وقاص إلى معاوية فأقام عنده شهرًا يقصر الصلاة، أو شهر رمضان فيفطر.
وعن الحسن قال: كُنَّا مع عبد الرحمن بن سمرة ببعض بلاد فارس سنتين فكان لا يجمع، ولا يزيد على ركعتين.
وعن الحسن أيضًا أنه أقام مع أنس بن مالك بنيسابور سنتين فكان يصلي ركعتين ركعتين. انظر تخاريج هذه الآثار في"نصب الراية" (2/ 185).
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উনিশ দিন অবস্থান করেছিলেন এবং সালাত কসর করেছিলেন। সুতরাং আমরা যখন উনিশ দিনের জন্য সফর করি, তখন কসর করি। আর যদি এর চেয়ে বেশি হয়, তবে পূর্ণ সালাত আদায় করি।
2776 - عن جابر بن عبد الله قال: أقام رسول الله صلى الله عليه وسلم بتبوك عشرين يومًا يقصُر الصلاة. صحيح: رواه أبو داود (1235) عن الإمام أحمد، وهو في مسنده (14139) عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر فذكره.
والحديث في"مصنف" عبد الرزاق (4335) ومن طريقه أخرجه بن حبان في صحيحه (2752)، والبيهقي (3/ 152).
ورجال إسناده ثقات، إلا أن أبا داود أعلَّه قائلًا:"غير معمر يُرسله لا يسنده".
وقال البيهقي:"تفرَّد معمر بروايته مسندًا، ورواه علي بن المبارك وغيره عن يحيى عن ابن ثوبان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا".
قلت: حديث علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان قال: أقام النبي صلى الله عليه وسلم بتبوك عشرين ليلة يُصلي صلاة المسافر ركعتين، رواه ابن أبي شيبة (2/ 454) من طريقه.
قلت: والحديث روي من وجهين: أحدهما مسندًا. رواه معمر كما سبق.
والثاني: مرسلًا. رواه علي بن المبارك وغيره.
والحكم في هذه الحال لمن زاد حسب القواعد الحديثية. وقد نصّ البخاري وغيره أنّ زيادة الثقة مقبولة.
فليس كلّ تفرد يُعلّ به الحديث، فإن ذكر التفرد قد يكون من الإخبار دون الإعلال. مثل بيان الاختلاف على الراوي كما يفعله كثيرًا النسائي في كتابه"الكبرى"، و"المجتبى"، والدارقطني في"العلل" لأنّ أغلب السنن رويت من أوجه كثيرة، ودور المحدّث الفقيه هو اختيار ما صح منها كما فعل الإمام البخاري انتقى صحيحه من ستمائة ألف حديث وجلس فيه أكثر من خمس عشرة سنة، فليس كلُّ ما اختاره في"صحيحه" يعلّ بالأسانيد التي تركها.
وذكره النوويُّ فقال:"الحديث صحيح الإسناد على شرط البخاري ومسلم، ولا يقدح فيه تفرُّد معمر، فإنَّه ثقة حافظ، فزيادته مقبولة". انظر:"الخلاصة" (2567، 2568).
قلت: وأقرَّه الزيلعيّ بعد أن نقل قوله هذا. انظر:"نصب الراية" (2/ 186).
وأما ما رُوي عن عمران بن حُصين قال: غزوتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وشهدتُ معه الفتح، فأقام بمكة ثماني عشرة ليلة لا يصلي إلا ركعتين، ويقول:"يا أهل البلد! صلوا أربعًا، فإنا قوم سَفْرٌ" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1229)، والترمذي (545) كلاهما من طريق علي بن زيد بن جُدْعان، عن أبي نضرة، عن عمران بن حصين فذكره واللفظ لأبي داود. ولفظ الترمذي: سئل عمران بن حُصين عن صلاة المسافر. فقال: حججتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّى ركعتين، وحججت مع أبي بكر فصلَّى ركعتين، ومع عمر فصلَّى ركعتين، ومع عثمان ست سنين من خلافته، أو ثماني سنين فصلَّى ركعتين. قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: بل هو ضعيف، لأنَّ فيه علي بن زيد بن جُدْعان تكلَّم فيه أحمد وأبو زرعة، وأبو حاتم والنسائي والجوزجاني وغيرهم.
قال المنذري في مختصر أبي داود:"في إسناده علي بن زيد بن جُدْعان، وقد تكلم فيه جماعة من الأئمَّة. وقال بعضهم: هو حديث لا تقوم به حجة لكثرة اضطرابه".
قلت: ورواه الإمام أحمد (19865) من الطريق نفسه وزاد فيه:"إلا المغرب"، كما أنَّ سياقه أطول من هذا، فإنَّه جمع فيه بين الغزوة والحج والعمرة.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকে বিশ দিন অবস্থান করেছিলেন এবং তিনি সালাত ক্বসর (সংক্ষেপ) করতেন।
2777 - عن موسى بن سلمةَ الهُذَليِّ قال: سألت ابن عبَّاسٍ: كيف أصلِّي إذا كنت بمكة إذا لم أصلِّ مع الإمام؟ فقال: ركعتين سنة أبي القاسم صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (688) من طرق عن محمد بن جعفر، قال: حدثنا شعبة قال: سمعتُ قتادة يحدِّث عن موسى بن سلمة الهُذَلي فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মূসা ইবনু সালামাহ আল-হুযালী বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি মক্কায় থাকলে যদি ইমামের সাথে সালাত আদায় না করি, তবে কীভাবে সালাত আদায় করব? তিনি বললেন: দুই রাকাআত। এটাই আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত।
2778 - عن عبد الرحمن بن يزيد يقول: صلَّى بنا عثمان بمنىً أربع ركعات، فقيل ذلك لعبد الله بن مسعود فاسترجع ثم قال: صليت مع رسول الله - صلى الله عليه - وسلم بمنًى ركعتين، وصليت مع أبي بكر بمنًى ركعتين، وصليت مع عمر بمنًى ركعتين، فليت حَظِّي من أربع ركعات ركعتان متقبَّلتان.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1084)، ومسلم في صلاة المسافرين (695) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد الواحد، عن الأعمش، قال: حدَّثنا إبراهيم، قال: سمعت عبد الرحمن بن يزيد فذكره.
انظر تأويلات عثمان في إتمام الصلاة في مِنًى في أول جموع صلاة المسافر.
আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় আমাদের নিয়ে চার রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর বিষয়টি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জানানো হলে তিনি 'ইন্না লিল্লাহ' পড়লেন (আক্ষেপ করলেন)। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি, এবং আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি, আর আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি। সুতরাং চার রাকাতের মধ্যে যদি আমার দু’রাকাত (সালাত) কবুল হয়, তবে সেটাই আমার জন্য যথেষ্ট।
2779 - عن وعن ابن عمر قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنًى ركعتين. وأبو بكر بعده. وعمر بعد أبي بكر، وعثمان صدرًا من خلافته، ثم إنَّ عثمان صلى بعدُ أربعًا. فكان ابن عمر إذا صلَّى مع الإمام صلَّى أربعًا، وإذا صلَّاها وحده صلَّى ركعتين.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1082)، ومسلم في صلاة المسافرين (694/ 17) كلاهما من حديث عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث، واللفظ لمسلم، وفي رواية عند مسلم من طريق حفص بن عاصم، عن ابن عمر، قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم بمنًى صلاة المسافر، وأبو بكر وعمر، وعثمان ثماني سنين، أو قال: ست سنين.
قال حفص:"وكان ابن عمر يُصلِّي بمنًى ركعتين، ثم يأتي فراشه. فقلت: أي عَمِّ! لو صلَّيت بعدها ركعتين. قال: لو فعلت لأتممتُ.
قال مسلم: حارثة بن وهب الخزاعي، هو: أخو عبيد الله بن عمر بن الخطاب لأمه.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। তাঁর পরে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খিলাফতের প্রথম দিকেও (দুই রাকাত) সালাত আদায় করেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (মিনায়) চার রাকাত সালাত আদায় করেন। (এই কারণে) ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইমামের সাথে সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি চার রাকাত সালাত আদায় করতেন, আর যখন তিনি একাকী সালাত আদায় করতেন, তখন দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।
(এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। হাদীসটি বুখারী ‘সালাত কসর’ অধ্যায়ে (১০৮২) এবং মুসলিম ‘মুসাফিরদের সালাত’ অধ্যায়ে (৬৯৪/১৭) নাফি’ হতে, তিনি ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। আর হাদীসের শব্দগুলো মুসলিমের।)
মুসলিমের এক বর্ণনায় হাফস ইবনু আসিম, ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিনায় মুসাফিরের সালাত (কসর) আদায় করেছেন। আর আবূ বাকর, উমর ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আট বছর—অথবা তিনি বলেছেন: ছয় বছর—(কসর সালাত আদায় করেছেন)।
হাফস বলেন: ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করে নিজের বিছানায় চলে যেতেন। আমি বললাম: হে চাচা! আপনি যদি এর পরে আরও দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন (তাহলে ভালো হতো)। তিনি বললেন: যদি আমি তা করতাম, তবে আমি (সালাত) পূর্ণ করে ফেলতাম।
মুসলিম বলেন: হারিসাহ ইবনু ওয়াহব আল-খুযা’ঈ হলেন উবায়দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বৈমাত্রেয় ভাই।
2780 - عن أبي إسحاق قال: سمعتُ حارثة بن وهب يقول: صلى بنا النبي صلى الله عليه وسلم آمَنَ مَا كَان - بِمِنًى ركعتين.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1083) من حديث شعبة، أنبأنا أبو إسحاق، قال سمعت حارثة بن وهب فذكره.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (696) من حديث أبي الأحوص، عن أبي إسحاق به ولفظه:"صلَّيتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى - آمنَ ما كان الناسُ وأكَثَره - ركعتين".
হারিছা ইবনু ওয়াহব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন, যখন আমরা সর্বাধিক নিরাপদে ছিলাম।
2781 - عن عبد الله بن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا عجل به السيرُ يجمعُ بين المغرب والعِشاء.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (3) عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكره.
رواه مسلم في قصر صلاة المسافرين (703) من طريق مالك به مثله.
ورواه الشيخان: البخاري في تقصير الصلاة (1106)، ومسلم، كلاهما من حديث سفيان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه (هو عبد الله بن عمر) قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يجمع بين المغرب والعشاء إذا جدَّ به السيرُ.
وعندهما أيضًا البخاري (1091)، ومسلم من طريقين أُخريَيْن عن الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله أنَّ أباه قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أعجلة السير في السفر يؤخر صلاة المغرب حتى يجمع بينها وبين صلاة العشاء.
وفي رواية عند مسلم من حديث عبيد الله، عن نافع، أنَّ ابن عمر كان إذا جدَّ به السير جمع بين
المغرب والعشاء بعد أن يغيب الشفقُ، ويقول: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا جد به السير جمع بين المغرب والعشاء.
وفي المسند (5120) أنَّ ابن عمر استُصِرخ على صفية وهو بمكة فسار حتى غربت الشمس، وبَدَتِ النجوم، فقال: إنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا عجل به أمر في سفر جمع بين هاتين الصلاتين، فسار حتى غاب الشفق، فنزل فجمع بينهما.
وفي البخاري معلقًا (1092): وأخرَّ ابن عمر المغرب، وكان استُصرخَ على امرأته صفية بنت أبي عبيد، فقلت له (القائل هو سالم) الصلاة. فقال ير. فقلت: الصلاة، فقال: سِر، حتى سار ميلين، أو ثلاثة، ثم تزل فصلَّى ثم قال: هكذا رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يُصلِّي إذا أعجله السير.
ورواه بإسناد متَّصل في كتاب الجهاد (3000) عن زيد بن أسلم، عن أبيه قال: كنتُ مع عبد الله بن عمر بطريق مكَّة، فبلغه عن صفيَّة بنت أبي عبيد شدَّةُ وَجَع، فأسرع السَير، حتَّى إذا كان بعد غُرُوبِ الشفق نزل فصلَّى المغربَ والعتمةَ يجمعُ بينهما وقال: إنِّي رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم إذا جدَّ به السيرُ، أخرَّ المغربَ وجمعَ بينهما.
قال الحافظ ابن حجر:"فأفادت هذه الرواية تعيينَ السفر المذكور، ووقت انتهاء السير، والتصريح بالجمع بين الصلاتين""الفتح" (2/ 573).
واستُصْرِخ: بالضم، أي اسُتِغيث بصوت مرتفع، وهو الصراخ بالخاء المعجمة.
وصفية هي: بنت أبي عبيد، وهي زوجة عبد الله بن عمر ولدت له واقدًا، وأبا بكر، وأبا عبيدة، وعبيد الله، وعمر، وحفصة، وسودة، وقد عاشت طويلة وأسنَّتْ، فكانت تطوف على الراحلة.
وأما ما رُوي عن ابن عمر قال: ما جمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المغرب والعشاء فط في السفر إلا مرَّة. فهو منكر،
رواه أبو داود (1209) عن قتيبة، حدّثنا عبد الله بن نافع، عن أبي مودود، عن سليمان بن أبي يحيى، عن ابن عمر فذكره.
في إسناده عبد الله بن نافع أبو محمد المخزومي، مولاهم المدني الصائغ ليِّن الحفظ تكلم عليه المنذري في المختصر بالتفصيل، وهو مخالف لما في الصحيحين وغيرهما، وقد أعلَّه أبو داود بأنَّه موقوف على ابن عمر قائلًا:"وهذا يُروى عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر موقوفًا على ابن عمر، أنَّه لم يُر ابن عمر جمع بينهما قط إلا تلك اللَّيلة - يعني ليلة استصرخ على صفيَّة، ورُوي عن مكحول، عن نافع أنه رأى ابن عمر فعل ذلك مرة أو مرتين" انتهى.
ولكن روايته في الصحيحين وغيرهما تدل على أنَّ من عادة النبيِّ صلى الله عليه وسلم أنَّه كان يجمع بين الصلاتين في السفر، وعلى هذا فما رُوي من فعل ابن عمر بأنه لم ير جمع بين الصلاتين إلا ليلة استصرخ على صفية، أو جمع مرَّة أو مرَّتين مخالفٌ لفعل النبي صلى الله عليه وسلم، وكذلك لا يصح ما رواه أبو
داود (1262) من طريق محمد بن فُضيل، عن أبيه، عن نافع وعبد الله بن واقد، أنَّ مؤْذن ابن عمر قال: الصلاة. قال: سِرْ سِرْ حتَّى إذا كان قبل غروب الشفق نزل فصلي المغرب، ثم انتظر حتى غاب الشفق، وصلى العشاء، ثم قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا عجل به أمرٌ صنع مثل الذي صنعتُ، فسار في ذلك اليوم والليلة مسيرة ثلاث، فإنَّه شاذ، لأن فُضيل بن غزوان خالف أصحاب نافع، قال البيهقي (3/ 160):"اتفقت رواية يحيى بن سعيد الأنصاري وموسى بن عقبة وعبيد الله بن عمر وأيّوب السختياني وعمر بن محمد بن زيد، عن نافع على أنَّ جمع ابن عمر بين الصلاتين كان بعد غيبوبةِ الشفق، وخالفهم من لا يُداليهم في حفظ أحاديث نافع، ثم قال: ورواية الحفاظ من أصحاب نافع أولي بالصّواب" انتهى.
وأعتقد أن الخطأ ليس من فُضيل بن غزوان لأنَّه ثقة ضابط، ولكن من ابنه محمد الذي وصفه بالوهم.
আবদুল্লাহ ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন দ্রুত সফর করতেন, তখন তিনি মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করতেন।
2782 - عن أنس بن مالك قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا ارتحل قبل أن تزيغَ الشمسُ أخَّر الظهر إلى وقت العصر، ثم يجمع بينهما. وإذا زاغ صلى الظهر ثم ركب.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1112)، ومسلم في صلاة المسافرين (704) كلاهما عن قتيبة بن سعيد عن المفضَّل بن فَضالة، عن عُقيل، عن ابن شهاب، عن أنس فذكره.
وفي رواية عند مسلم من وجه آخر عن عقيل بن خالد: إذا أراد أن يجمع بين الصلاتين في السفر، أخَّر الظهر حتى يدخل أول وقت العصر، ثم يجمع بينهما.
وعنده من وجه آخر عن عُقيل: إذا عجل عليه السفر يؤخر الظهر إلى أوَّل وقت العصر، فيجمع بينهما، ويؤخِّر المغرب حتَّى يجمع بينها وبين العشاء حين يغيبُ الشفَقُ.
ورواه إسحاق بن راهويه بإسناده عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا كان في سفر فزالت الشمس، صلَّى الظهر والعصر جميعًا ثم ارتحل. رواه البيهقي (3/ 162) من طريق إسحاق بن راهويه قال النووي في"المجموع" (4/ 372):"إسناده صحيح".
وأقره الحافظ في"التلخيص" (2/ 49) وأطال الكلام في التخريج.
وفيه جواز جمع التقديم.
وأما ما رواه البزار"كشف الأستار" (688) من طريق محمد بن إسحاق، عن حفص قال: كان أن إذا أراد أن يجمع بين الصلاتين في السفر أخر الظهر إلى آخر وقتها وصلاها، وصلَّى العصر في أوَّل وقتها، ويصلي المغرب في آخر وقتها، ويصلي العشاء في أوَّل وقتها، ويقول: هكذا كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجمع بين الصلاتين في السفر.
قال البزار:"لا نعلم أحدًا تابع حفص بن عبيد الله على هذه الرواية، ورواه الزّهريّ بخلاف ما رواه حفص" انتهى.
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 160):"رواه البزار وفيه ابن إسحاق وهو ثقة ولكنَّه مدلس" انتهى.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে যাওয়ার পূর্বে সফর শুরু করতেন, তখন তিনি যোহরের সালাতকে আসরের ওয়াক্ত পর্যন্ত বিলম্বিত করতেন, অতঃপর উভয়কে একত্রে আদায় করতেন। আর যখন সূর্য হেলে যেত, তখন তিনি যোহরের সালাত আদায় করে নিতেন, অতঃপর আরোহণ করতেন।
2783 - عن معاذ بن جبل قال: إنّهم خرجوا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عام تبوك فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجمع بين الظهر والعصر، والمغرب والعشاء، قال: فأخَّر الصلاة يومًا. ثم خرج فصلى الظهر والعصر جميعًا، ثم دخل. ثم خرج فصلى المغرب والعشاء جميعًا.
صحيح: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (2) عن أبي الزبير المكي، عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن معاذ بن جبل فذكر في حديث طويل سيأتي في كتاب المعجزات وأبو الزبير مدلس، ولكنه صرَّح بالتحديث عند مسلم (706/ 53) فإنه رواه من طريق قُرَّة بن خالد، حدّثنا أبو الزبير، حدّثنا عامر بن واثلة، حدّثنا معاذ بن جبل فذكره.
وفيه: قال: فقلت: ما حمله على ذلك؟ قال: فقال: أراد أن لا يُحرِجَ أمَّتَه.
وقد جاء تفصيل هذا الحديث عند أبي داود (1208) فرواه عن يزيد بن خالد بن يزيد بن عبد الله بن موْهَب الرملي الهمداني، حدّثنا المفضل بن فضالة والليث بن سعد، عن هشام بن سعد، عن أبي الزبير، عن أبي الطفيل، عن معاذ بن جبل:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في غزوة تبوك إذا زاغتِ الشمس قبل أن يرتحل جمع الظهر والعصر، وإن ارتحل قبل أن تزيغ الشمس أخَّر الظهر حتى ينزل للعصر، وفي المغرب مثل ذلك. إن غابت الشمس قبل أن يرتحل جمع بين المغرب والعشاء، وإن يرتحل قبل أن تغيب الشمس أخَّر المغرب حتى ينزل للعشاء، ثم جمع بينهما".
وهذا إسناد حسن، من أجل هشام بن سعد المدني.
وأما ما رواه أبو داود (1208)، والترمذي (553)، والبيهقي (3/ 163)، وابن حبان (1498، 1593) كلّهم من حديث قتيبة بن سعيد، أخبرنا الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن معاذ بن جبل، فذكره، مثله. فهو غير محفوظ.
أعله الأئمّة بأنّ قتيبة بن سعيد تفرد بهذا الإسناد وأخطأ فيه.
وقد أشار البخاري إلى أنّ بعض الضعفاء أدخله عليه، حكاه الحاكم في معرفة علوم الحديث (ص 183).
وقال أبو حاتم الرازي:"والذي عندي أنه دخل عليه حديثٌ في حدي؛ حدّثنا أبو صالح، حدّثنا الليث، عن هشام بن سعد، عن أبي الزبير، عن أبي الطفيل، عن معاذ".
وذكر الدارقطني حديث قتيبة في كتابه"العلل (6/ 42) وأشار إلى رواية الليث، عن هشام بن سعد ورجّحها حيث قال:"ورواه المفضل بن فضالة، عن الليث، عن هشام بن سعد، عن أبي الزبير، عن أبي الطفيل، عن معاذ بهذه القصة بعينها، وهو أشبه بالصواب".
كذا قال:"المفضل بن فضالة عن الليث" والصواب:"والليث" فإن الليث من أقرانه وليس من شيوخه، ولم يذكره المزي في شيوخه.
ويفهم من هذا أنّ إعلال هؤلاء الأئمة للحديث إنما هو متوجه إلى حديث قتيبة فقط؛ ولذا قال
البيهقي في"السنن" (3/ 163): طوإنما أنكروا من هذا رواية يزيد بن أبي حبيب عن أبي الطفيل، فأما رواية أبي الزبير عن أبي الطفيل فهي محفوظة صحيحة".
قلت: ورواية أبي الزبير جاءت مجملة ومفضلة ولا تعارض بينهما.
وعمل أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوي الرواية المفضلة.
حكى ابن المنذر عن سعد بن أبي وقاص، وأسامة بن زيد، وابن عمر، وابن عباس، وأبي موسى الأشعري.
ومن التابعين طاوس، ومجاهد، وعكرمة.
ومن الأئمة الفقهاء: مالك، وأحمد، وإسحاق، وأبي ثور وهو قول أبي يوسف ومحمد بن الحسن.
وحكاه البيهقي عن عمر بن الخطاب، وعثمان أيضًا. انظر: المجموع (4/ 371).
ومن هؤلاء من كانوا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك وشاهدوا منه الجمع تقديمًا وتأخيرًا؛ ولأنه لا يتصور أنّهم فعلوا ذلك اجتهادًا بتقديم الصلاة عن وقتها؛ لأن الله تعالى يقول: {إِنَّ الصَّلَاةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَابًا مَوْقُوتًا} [النساء: 103].
ونقل الترمذي عن الشافعي وأحمد وإسحاق أنّهم قالوا:"لا بأس أن يجمع بين الصلاتين في السفر في وقت إحداهما".
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা তাবূক যুদ্ধের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হয়েছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহর ও আসর এবং মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করতেন। তিনি (মু'আয) বলেন: একদিন তিনি সালাত আদায় করতে বিলম্ব করলেন। এরপর তিনি (বের হয়ে) যুহর ও আসর একত্রে আদায় করলেন, তারপর ভেতরে প্রবেশ করলেন। এরপর তিনি (পুনরায়) বের হয়ে মাগরিব ও ইশা একত্রে আদায় করলেন।
(অন্য এক বর্ণনায় আছে:) তিনি (মু'আয) বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, "তিনি কেন এমন করলেন?" তিনি বললেন: "তিনি তাঁর উম্মতকে কষ্ট দিতে চাননি।"
2784 - عن ابن عباس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم جمع بين الصلاة في سَفْرةٍ سافرها في غزوة تبوك، فجمع بين الظهر والعصر، والمغرب والعشاء. قال سعيد: فقلت لابن عباس: ما حمله على ذلك؟ قال: أراد أن لا يُحرِج أمَّته.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (705/ 51) من طريق قرة، عن أبي الزبير، حدّثنا سعيد بن جبير، حدّثنا ابن عباس فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة (967) هذا هو الصحيح عنه.
وأما ما رُوي عن ابن عباس قال: ألا أحدِّثكم عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر؟ قال: قلنا: بلى. قال: كان إذا زاغت الشمس في منزله، جمع بين الظهر والعصر قبل أن يركب، وإذا تم تزغ له في منزله سار حتَّى إذا حانت العصر نزل. فجمع بين الظهر والعصر، وإذا حاني المغرب في منزله جمع بينها وبين العشاء، وإذا لم تحِنْ في منزله ركب، حتى إذا حانت العشاء نزل، فجمع بينهما، فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (3480) عن عبد الرزاق، وهو في"مصنفه" (4405) قال: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني حسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس، عن عكرمة وعن كريب أن ابن عباس قال فذكره.
ورواه أيضًا الدارقطني (1/ 388)، والبيهقي (3/ 163) وغيرهما من طريق حسين بن عبد الله، وقد اختلف عليه، وجمع الدارقطني في سننه وجوه الاختلاف إلَّا أنَّ علَّته حسين بن عبد الله الهاشمي المدني ضعيف، ضعَّفه ابن معين وأبو حاتم، وقال النسائي: متروك، وقال الجوزجاني:"ولا يُشَتَغَل بحديثه". ومع ذلك قال البيهقي: وهو بما تقدّم من شواهده يقوى".
انظر للمزيد التلخيص"الحبير" (2/ 48) و"المنة الكبرى" (2/ 150).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক যুদ্ধের সফরে সালাত একত্রিত (জম'আ) করেছিলেন। তিনি যুহর ও আসর এবং মাগরিব ও ইশা একত্রিত করেছিলেন। সাঈদ বলেন: আমি ইবনে আব্বাসকে জিজ্ঞেস করলাম: কিসের ভিত্তিতে তিনি এমনটি করেছিলেন? তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: তিনি চেয়েছিলেন যেন তাঁর উম্মতকে কষ্টের মধ্যে না ফেলতে হয়।
2785 - عن وعن أبي سعيد قال: جمع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين الظهر والعصر، وبين المغرب والعشاء، وأخَّر المغرب وعجَّل العشاء فصلاهما جميعًا.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (7990) عن موسى بن هارون، قال: حدّثنا محمد بن عبد الواهب الحارثي، قال: حدّثنا أبو شهاب الحناط، عن عوف، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره.
ورواه البزار"كشف الأستار" (686) عن إبراهيم بن هانئ، عن محمد بن عبد الواهب مختصرًا بلفظ:"إنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يجمع بين الصلاتين في السفر".
وقال:"لا نعلمه عن أبي سعيد إلا من هذا الوجه، ومحمد ثقة مشهور بالعبادة".
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 159):"ورواه الطبراني في الأوسط وقال: تفرَّد به محمد بن عبد الوهاب الحارثي، ورواه البزار مختصرًا وقال: محمد بن عبد الوهاب ثقة مشهور بالعبادة، قلت: وبقية رجاله ثقات" انتهى.
قلت: لم يظهر لي ما هو الصحيح: محمد بن عبد الوهاب، أو محمد بن عبد الواهب؟ ولكن أيًّا كان فقد وثَّقه البزَّار، وبقيَّة الرجال ثقات كما قال الهيثمي، وقد ترجم ابن حبان في الثقات (9/ 83) فقال: محمد بن عبد الوهاب .. فليراجع ذلك.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহর (যোহর) ও আসরের সালাত এবং মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রিত (জম'আ) করে আদায় করেছেন। তিনি মাগরিবকে বিলম্বিত করেছেন এবং ইশাকে এগিয়ে এনেছেন, অতঃপর উভয় সালাত একসাথে আদায় করেছেন।
2786 - عن وعن ابن مسعود كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجمع بين الصلاتين في السفر.
حسن: رواه ابن أبي شيبة (2/ 458) وعنه أبو يعلى"المقصد العلي" (352)، والبزار في مسنده (5/ 414)، والطبراني في"الكبير" كلهم من طريق عيسى، نا ابن أبي ليلى، عن أبي قيس الأودي، عن هزيل، عن ابن مسعود.
عيسى هو: ابن عبد الرحمن بن أبي ليلى الأنصاري ثقة وأبوه عبد الرحمن بن أبي ليلى ثقة أيضًا.
وأبو قيس الأودي هو: عبد الرحمن بن ثَروان مختلف فيه غير أنه أصدوق ربما خالف" كما قال الحافظ في التقريب، ومثله لا بأس به في الاستشهاد وهو من رجال البخاريّ.
قال الهيثمي في"المجمع" (2966):"رواه أبو يعلى والبزار والطبراني في"الكبير" ورجال أبي يعلى رجال الصحيح".
قلت: وهو كذلك ورجال البزّار مثله.
فقه هذا الباب:
استدل بعض أهل العلم بقول ابن عمر: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا عجل به السير جمع بين المغرب والعشاء بأنَّ الجمع لا يجوز في السفر وهو نازل مقيم غير سائر إلَّا في عرفة لأجل اتصال الوقوف، وإنَّما شرع الجمع إذا جدَّ به السير لتخفيف المشقَّة.
وتعقبه ابن المنذر فقال:"ولعلَّ بعض من لم يتسع في العلم يحسب أن الجمع بين الصلاتين في السفر لا يجوز إلَّا في الحال التي يَجِدُّ بالمسافر السيرُ، وليس ذلك كذلك، وقد ثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه جمع بين الظهر والعصر، وهو نازل غير سائر، ثم أخرج حديث معاذ بن جبل من طريق هشام، عن أبي الزبير، عن أبي الطفيل، عن معاذ بن جبل قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، فكان لا يروح حتى يبرد، ويجمع بين الظهر والعصر، فإذا أمسى جمع بين المغرب والعشاء.
فقال: فدلَّ قوله: فكان لا يروح على أنه جمع بينهما، وهو نازل غير سائر، ثم استدل بحديث مالك: فأخر الصلاة يومًا ثم خرج فصلى الظهر والعصر جميعًا، ثم دخل، ثم خرج فصلى المغرب والعشاء جميعًا يدل على أنَّه جمع بين الصلاتين، وهو نازل غير سائر. وليس هذا خلافًا للذي ذكره ابن عمر، لأنَّ الجمع بينهما جائز نازلًا وسائرًا. حكى ابن عمر ما رأى من فعله، وذكر معاذ ما فعل، فأخبر كل واحد منهما ما رأى، فالجمع بين الصلاتين في السفر جائز نازلًا وسائرًا كما فعل النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يذكر أحد عن النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه نهى عن الجمع بين الصلاتين في السفر في حال دون حال، فيوقف عن الجمع بينهما لنهي النبي صلى الله عليه وسلم انتهى."الأوسط" (2/ 420).
وقلت في"المنة الكبرى" (2/ 143):"والقيد في حديث ابن عمر وأنس بن مالك لمن جدَّ به السير للغالب، وليس شرطًا في الجمع، لما نرى إطلاق الأمر في أحاديث الجمع" انتهى.
ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সফরে দুই ওয়াক্ত সালাত একত্রে আদায় করতেন।
2787 - عن عبد الله بن عباس أنَّه قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم الظهر والعصر جميعًا، والمغرب والعشاء جميعًا في غير خوف ولا سفر.
قال مالك: أرى ذلك كان في مطرٍ.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (4) عن أبي الزبير المكي، عن سعيد بن جبير، عن عبد الله بن عباس.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (705) عن يحيى بن يحيى، قال: قرات على مالك به مثله.
قال أبو الزبير: فسألت سعيدًا: لِم فعل ذلك؟ فقال: سأل ابن عباس كما سألتني، فقال: أراد أن لا يُحرج أحدًا من أمّته.
ورواه الشيخان: البخاري في مواقيت الصلاة (543)، ومسلم (705/ 56) من حديث حماد بن
زيد، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن زيد (وهو أبو الشعثاء) عن ابن عباس أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم صلَّى بالمدينة سبعًا وثمانيًا: الظهر والعصر، والمغرب والعشاء.
زاد البخاري: فقال أيوب: لعلَّه في ليلةٍ مطيرة؟ قال: عسي.
وأيوب هو: السختياني.
والمقول له هو: جابر بن زيد أبو الشعثاء.
وللحديث أسانيد أخرى ذكرها مسلم منها: ما رواه حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير وفيه: في غير خوف ولا مطر. وفيه رد على من قال إن ذلك كان لمطرٍ.
ويبدو أن ابن خزيمة أيضًا لم يقف على متن الحديث ففي ذكر المطر. انظر صحيحه (2/ 86).
وفي رواية عبد الله بن شقيق قال: خطبنا ابن عباس يومًا بعد العصر حتى غربت الشمسُ وبدت النجومُ. وجعل الناس يقولون. الصلاة. الصلاة. قال: فجاءه رجل من بني تميم، لا يفتُر ولا ينثني: الصلاةَ الصلاةَ. فقال ابن عباس: أتُعلمني بالسنة؟ لا أم لك! . ثمَّ قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم جمع بين الظهر والعصر، والمغرب والعشاء.
وفي رواية: لا أمَّ لك أتعلمنا بالصلاة؟ ! وكنَّا نجمع بين الصلاتين على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال عبد الله بن شقيق: فحاك في صدري من ذلك شيء. فأتيتُ أبا هريرة فسألتُه، فصدَّق مقالتَه.
وهذه الروايات كلُّها صحيحة وهي في صحيح مسلم.
ورويا أيضًا: البخاري (1174)، ومسلم (55) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار به.
قال عمرو بن دينار: قلت يا أبا الشعثاء! أظنُّه أخَّر الظهر وعجَّل العصر، وعجل العشاء وأخَّر المغرب، فقال: وأنا أظنُّه.
فهم بعض أهل العلم من قول أبي الشعثاء بأنَّه جمع صوري وهو أن يؤخِّر الأولى إلى آخر وقتها، ويقدِّم الثانية عقبها في أوّل وقتها.
والصواب أن الجمع الصوري لم يقع من النّبيّ صلى الله عليه وسلم، وإنّما هو ظنٌّ وتخمين من أبي الشّعثاء - واسمه جابر بن زيد -، وقد ضعَّف غير واحد من أهل العلم الجمع الصور لما فيه من المشقة أكثر من أدائها في وقتها، والنّبي صلى الله عليه وسلم إنما أراد بالجمع رفع الحرج والمشقة عن أمته.
وقوله: فأتيت أبا هريرة فصَدَّق مقالته. هذا هو الصحيح من تصديق أبي هريرة لحديث ابن عباس. ولا يصح ما رُوي عنه مرفوعًا كما سيأتي.
وأما ما رُوي عن ابن عمر قال: جمع لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم مقيمًا غير مسافر بين الظهر والعصر والمغرب، فقال رجل لابن عمر: لِم ترى النبي صلى الله عليه وسلم فعل ذلك؟ قال: لأن لا يحرج أمته إن جمع رجلٌ.
فهو ضعيف، رواه عبد الرزاق (4437) عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن عبد الله بن عمر فذكره.
قال البخاري:"لم يسمع ابن جريج من عمرو بن شعيب". يعني أنه دلّسه.
وكذلك ما رُوي عن أبي هريرة:"جمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بين الصلاتين في المدينة من غير خوف" فهو ضعيف.
رواه البزار"كشف الأستار" (689) عن الحسن بن أبي زيد، ثنا عثمان بن خالد، ثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.
وعثمان بن خالد هو: الأموي العثماني أبو عفان المدني قال فيه البخاري والنسائي وأبو أحمد الحاكم:"منكر الحديث"، وقال ابن حبان: يروي المقلوبات عن الثقات، لا يجوز الاحتجاج به.
وقال الهيثمي في المجمعه (2/ 161):"هو ضعيف" وقال الحافظ في"التقريب":"متروك الحديث".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم جمع بين الظهر والعصر، وبين المغرب والعشاء بالمدينة من غير خوف، رواه تمام (433) من حديث الربيع بن يحيى، نا سفيان الثوري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره.
ظاهرة السلامة، ولكن قال ابن أبي حاتم في"العلل" (313): سمعت أبي وقيل له: حديث محمد بن المنكدر، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم في الجمع بين الصلاتين فقال:"حدثنا الربيع بن يحيى، عن الثوري غير أنه باطل عندي، هذا خطأ لم أدخله في التصنيف، أراد أبا الزبير، عن جابر، أو أبا الزبير عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، والخطأ من الربيع" انتهى.
قلت: الربيع بن يحيى أبو الفضل البصري الأشناني من رجال البخاري قال فيه أبو حاتم: ثقة ثبت، وذكره ابن حبان في الثقات، ولكن قال ابن قانع: ضعيف، وقال الدارقطني: ضعيف ليس بالقوي، يخطئ كثيرًا، حدَّث عن الثوري، عن ابن المنكدر، عن جابر جمع النبي صلى الله عليه وسلم بين الصلاتين. وهذا حديث ليس لابن المنكدر فيه ناقة ولا جمل. وهذا يسقط مائة ألف حديث" وقال أبو حاتم: في العلل: باطل عن الثوري. انظر:"تهذيب التهذيب" (3/ 253).
وفي الباب أيضًا حديث ابن مسعود وسيأتي في الباب الذي يليه.
فقه الباب:
أحاديث هذا الباب تدل على جواز الجمع بين الصلاتين في الحضر من غير خوف ولا مطر ولا مرض إلا أن الترمذي ادَّعَى في أوَّل كتابه"العلل" الذي في آخر السنن: جميع ما في هذا الكتاب من الحديث فهو معمول به، وقد أخذ به بعض أهل العلم ما خلا حديثين. أحدهما حديث ابن عباس"إن النبي صلى الله عليه وسلم جمع بين الظهر والعصر بالمدينة، والمغرب والعشاء من غير خوف ولا سفر ولا مطر".
والثاني: قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا شرب الخمر فاجلدوه فإن عاد في الرابعة فاقتلوه".
فأما قوله في حديث ابن عباس ففيه نظر من وجهين:
الوجه الأول: أنَّه لم يذكر علَّة حديث ابن عباس بعد أن رواه عن طريق حبيب بن أبي ثابت كما
مضى عند مسلم إلَّا قوله: وقد رُوي عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم في غير هذا، ثم رواه عن أبي سلمة يحيى بن خلف البصري، حدّثنا المعتمر بن سليمان، عن أبيه، عن حَنَش، عن عكرمة، عن ابن عباس مرفوعًا:"من جمع بين الصلاتين من غير عذر فقد أتى بابًا من أبواب الكبائر" (188).
وقال:"حَنَش هذا هو: أبو علي الرحبي - وهو حُسَين بن قيس - وهو ضعيف عند أهل الحديث، ضعَّفه أحمد وغيره، والعمل على هذا عند أهل العلم، أن لا يجمع بين الصلاتين إلا في السفر، أو بعرفة، ورخَّص بعض أهل العلم من التابعين في الجمع بين الصلاتين للمريض، وبه يقول أحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم: يجمع بين الصلاتين في المطر.
وبه يقول الشافعي وأحمد وإسحاق. ولم ير الشافعي للمريض أن يجمع بين الصلاتين".
قلت: ورواه الدارقطني (1/ 395)، والحاكم (1/ 275)، والبيهقي (3/ 169) أيضًا كلهم من طريق المعتمر بن سليمان به مثله.
قال الحاكم:"حَنَش بن قيس الرحبي، يقال له: أبو علي من أهل اليمن سكن الكوفة ثقة".
وتعقبه الذهبي فقال:"بل ضعَّفوه". وقال الدارقطني:"الرحبي متروك".
وقال البيهقي:"تفرد به حسين بن قيس أبو علي الرحبي، المعروف بِحَنَش وهو ضعيف عند أهل النقل، لا يحتج بخبره".
إذا لا ينهض هذا الحديث أن يكون معارضًا لحديث ابن عباس الصحيح الثابت، وإن كان الترمذي لم يُبين درجته من الصحة.
والثاني: لم يترك العمل على حديث ابن عباس، بل قال به بعض السلف على أن لا يتخذه عادة.
قال الخطابي في معالمه في شرح هذا الحديث:"هذا حديث لا يقول به أكثر الفقهاء، وإسناده جيِّد، إلَّا ما تكلموا فيه من أمر حبيب، وكان ابن المنذر يقول به، ويحكيه عن غير واحد من أصحاب الحديث، وسمعت أبا بكر القفَّال يحكيه عن أبي إسحاق المروزي. قال ابن المنذر: ولا معنى لحمل الأمر فيه على عذر من الأعذار، لأن ابن عباس قد أخبر بالعلة فيه وهو قوله: أراد أن لا يُحرِج أمَّته. وحكي عن ابن سيرين أنَّه كان لا يرى بأسًا أن يجمع بين الصلاتين إذا كانت حاجة، أو شيء ما لم يتخذه عادة" انتهى.
وكذلك رد النووي في شرح مسلم على قول الترمذي وقال:"أما حديث ابن عباس فلم يجمعوا على ترك العمل به، بل لهم أقوال، فذكر هذه الأقوال.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভয় কিংবা সফর ব্যতীত যুহরের এবং আসরের সালাত একত্রে এবং মাগরিবের ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করেছেন।
(ইমাম) মালিক (রহ.) বলেন: আমি মনে করি, এটি বৃষ্টির কারণে হয়েছিল। (সহীহ মুসলিমের অন্য বর্ণনায় রয়েছে:)
আবু যুবাইর (রহ.) বলেন: আমি সাঈদ ইবনে জুবাইরকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেন এমন করেছিলেন? সাঈদ বললেন: (ইমাম) ইবনে আব্বাসকে তুমি যেমন আমাকে জিজ্ঞেস করছো, তেমনি জিজ্ঞেস করা হয়েছিল, তখন তিনি বলেছিলেন: তিনি চেয়েছিলেন যেন তাঁর উম্মতের কারও জন্য কোনো প্রকার কষ্ট বা অসুবিধা না হয়।
