আল-জামি` আল-কামিল
281 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه تبارك وتعالى يقول يوم القيامة: أين المتحابُّون لجلالي، اليوم أظلُّهم في ظلي يوم لا ظلّ إلا ظلّي".
صحيح: رواه مالك في كتاب الشعر (13) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن معمر، عن أبي الباب سعيد بن يسار، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ورواه مسلم في البر والصلة (2566) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك بن أنس، بإسناده، مثله.
ومن طريق مالك رواه أيضًا الإمام أحمد (7231).
وأورده الحافظ الذهبي في"العلو" (176) من حديث فليح (وهو ابن سليمان عن أبي طُوالة، عن سعيد بن يسار، بإسناده، وفيه:"أظلّهم في ظلّ عرشي يوم لا ظلّ إلّا ظلّي".
وحديث فليح بن سليمان رواه أبو داود الطيالسيّ في مسنده (2335) عنه، عن سعيد بن يسار، بإسناده وليس فيه:"ظلّ العرش".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা কিয়ামতের দিন বলবেন: আমার মহত্ত্বের জন্য যারা একে অপরকে ভালোবেসেছিল, তারা কোথায়? আজ আমি তাদেরকে আমার ছায়ায় ছায়া দেব, সেদিন যখন আমার ছায়া ব্যতীত আর কোনো ছায়া থাকবে না।
282 - عن العرباض بن سارية، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قال اللَّه عز وجل: المتحابون بجلالي في ظل عرشي يوم لا ظلّ إلا ظلّي".
حسن: رواه الإمام أحمد (17158)، والطبرانيّ في الكبير (8/ 258) كلاهما من حديث إسماعيل ابن عياش، عن صفوان بن عمرو، عن عبد الرحمن بن ميسرة، عن العرباض بن سارية، فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش الحمصيّ فإنّه صدوق في روايته عن أهل بلده، وهذا منه فإنّ صفوان بن عمرو وهو السكسكيّ من حمص وهو ثقة.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 279) وقال:"رواه أحمد، والطبرانيّ، وإسنادهما جيد". وكذا قال المنذريّ في الترغيب والترهيب أيضًا (4/ 48) إلّا أنه قصر في العزو على أحمد.
ইরবায ইবনে সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: যারা আমার মহত্ত্বের কারণে পরস্পরকে ভালোবাসে, তারা আমার আরশের ছায়াতলে থাকবে; যেদিন আমার ছায়া ব্যতীত অন্য কোনো ছায়া থাকবে না।
283 - عن معاذ بن جبل قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"قال اللَّه تبارك وتعالى: وجبتْ محبّتي للمتحابين فيَّ، والمتجالسين فيَّ، والمتزاورين فيَّ، والمتباذلين فيَّ".
صحيح: رواه مالك في الشعر (16) عن أبي حازم بن دينار، عن أبي إدريس الخولانيّ أنه قال:"دخل مسجد دمشق، فإذا فتى شابّ برّاق الثّنايا، وإذا النّاس معه، إذا اختلفوا في شيء أسندوا إليه، وصدروا عن قوله، فسألتُ عنه فقيل: هذا معاذ بن جبل، فلما كان الغد هجّرتُ، فوجدته قد سبقني بالتهجير، ووجدته يصلي، قال: فانتظرته حتى قضى صلاته، ثم جئتُه من قبل وجهه فسلمت عليه، ثم قال: واللَّه إني لأحبُّك للَّه، فقال آللَّه؟ فقلت: آللَّه، فقال: آللَّه؟ فقلت: آللَّه، فقال: آللَّه؟ فقلت: آللَّه. قال: فأخذ بحبُوة ردائي فجبذني إليه وقال: أبشر فإنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).
وفي رواية قال:"المتحابون في اللَّه في ظلّ العرش يوم القيامة".
رواه الإمام أحمد (22031) عن روح، حدّثنا الحجاج بن أسود، عن شهر بن حوشب، عن معاذ ابن جبل، فذكره.
وفيه شهر بن حوشب، وفيه كلام مع الانقطاع فإنه لم يلق معاذًا.
ولكن رواه الطبراني في الكبير (20/ 78)، والبزّار في البحر الزّخّار (2672)، وعبد اللَّه بن المبارك في الزهد (715) كلّهم من حديث عبد الحميد بن بهرام، عن شهر بن حوشب، قال: حدثني عائذ اللَّه بن عبد اللَّه، قال: قلت لمعاذ بن جبل، فذكر القصة.
وعائذ اللَّه هو أبو إدريس الخولاني وقد اختلف في سماعه من معاذ بن جبل، والصحيح أنّه سمع منه كما تدل عليه قصة مالك.
وأخرجه الحاكم (4/ 169) من وجه آخر عن أبي إدريس، عن معاذ بن جبل، وقال:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وقد جمع أبو إدريس -بإسناد صحيح- بين معاذ وعبادة بن الصّامت في هذا المتن".
ولكن نقل الدارقطني في العلل (6/ 71) عن محمد بن مسلم الزّهريّ بأنه رواه عن أبي إدريس الخولانيّ فقال:"أدركتُ عبادة بن الصّامت ووعيتُ عنه. . . وقال: فاتني معاذ بن جبل، وأُخبرتُ عنه" ثم قال الدارقطني:"والقول قول الزهري لأنه أحفظ الجماعة". انتهى.
وذكر قبله جماعة من أهل الحجاز والشام منهم: أبو حازم سلمة بن دينار، والوليد بن عبد الرحمن، وقيس بن محمد القاص، وذكر أيضًا عطاء الخراساني، ويزيد بن أبي مريم، ويونس ابن ميسرة بن حلبس كلّهم ذكروا أنّ أبا إدريس سمعه من معاذ، فترجيح رواية الزّهريّ على هؤلاء جميعًا فيه نظر.
মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা বলেছেন: আমার ভালোবাসা তাদের জন্য অপরিহার্য হয়ে গেল, যারা শুধু আমার জন্য একে অপরকে ভালোবাসে; যারা আমার জন্য একসাথে বসে; যারা আমার জন্য একে অপরের সাথে দেখা-সাক্ষাৎ করে; এবং যারা আমার জন্য (নিজেদের সম্পদ) পরস্পর ব্যয় করে।"
284 - عن ابن عمر، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ للَّه عبادًا ليسوا بأنبياء ولا شهداء، يغبطهم الشّهداء والنّبيّون يوم القيامة لقربهم من اللَّه تعالى، ومجلسِهم منه". فجثا أعرابيٌّ على ركبتيه فقال: يا رسول اللَّه، صفهم لنا. قال:"قومٌ من أقناء النّاس من نزّاع القبائل، تصادقوا في اللَّه، وتحابوا فيه، يضع اللَّه عز وجل لهم يوم القيامة منابر من نور، يخاف الناس ولا يخافون، هم أولياء اللَّه عز وجل الذين لا خوف عليهم ولا هم يحزنون".
صحيح: رواه الحاكم (4/ 170 - 171) عن أبي عبد اللَّه محمد بن عبد اللَّه الزّاهد الأصبهانيّ، ثنا أحمد بن يونس الضبيّ بأصبهان، ثنا أبو بدر شجاع بن الوليد، قال: سمعت زياد بن خيثمة، يحدث عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده صحيح، رجاله ثقات؛ أحمد بن يونس بن المسيب، أبو العباس الضّبيّ، كوفي الأصل، بغداديّ المنشأ، نزل أصبهان وحدّث بها، وثّقه الدارقطني وغيره، انظر: تاريخ بغداد 5/ 223 - 224.
وقال الحاكم:"حديث صحيح الإسناد".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর এমন কিছু বান্দা আছেন যারা নবীও নন, শহীদও নন। কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলার নৈকট্য ও তাঁর সান্নিধ্যের কারণে শহীদগণ ও নবীগণও তাদের প্রতি ঈর্ষা করবেন।" তখন এক বেদুঈন হাঁটু গেড়ে বসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি তাদের সম্পর্কে আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা হলো সাধারণ মানুষের মধ্য থেকে, বিভিন্ন গোত্র থেকে আগত এমন কিছু লোক যারা আল্লাহর জন্য একে অপরের সাথে সত্যবাদীতা বজায় রেখেছে এবং তাঁরই জন্য পরস্পরকে ভালোবাসে। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা কিয়ামতের দিন তাদের জন্য নূরের মিম্বর স্থাপন করবেন। মানুষ যখন ভীতসন্ত্রস্ত থাকবে, তারা তখন ভীত হবে না। তারা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার সেই ওয়ালী (বন্ধু), যাদের কোনো ভয় নেই এবং তারা চিন্তিতও হবে না।"
285 - عن أبي مالك الأشعريّ، قال: كنتُ عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنزلت هذه الآية {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ} [سورة المائدة: 101]. قالوا: فنحن نسأله، إذا قال:"إنّ للَّه عبادا ليسوا بأنبياء ولا شهداء، يغبطهم النّبيّون والشهداء بقربهم ومقعدهم من اللَّه يوم القيامة". قال: وفي ناحية القوم أعرابي فقام فحثى على وجهه ورمي بيديه ثم قال: حدِّثنا يا رسول اللَّه عنهم من هم؟ قال: فرأيتُ وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أَبْشَرَ، فقال النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"هم عبادٌ من عباد اللَّه من بلدان شتّى، وقبائل شتّى، من شعوب القبائل لم يكن بينهم أرحام يتواصلون بها، ولا دنيا يتبادلون بها، يتحابُّون بروح اللَّه، يجعلُ اللَّه وجوههم نورًا، ويجعل لهم منابر من لؤلؤ قدام الرحمن يفزع الناس ولا يفزعون، ويخاف الناس ولا يخافون".
حسن: رواه عبد الرزّاق في المصنف (20324) عن معمر، عن ابن أبي حسين، عن شهر بن حوشب، عن أبي مالك الأشعريّ، فذكره.
وعنه الطبرانيّ في"الكبير" (3433)، والبغويّ في"شرح السنة" (3464).
وفيه شهر بن حوشب مع الكلام الذي فيه فإنه لم يلق أبا مالك الأشعريّ.
لكن أقام إسناده عبد اللَّه بن المبارك في"الزهد" (714)، والإمام أحمد في"المسند" (22906)، فأدخلوا بين شهر بن حوشب، وبين أبي مالك الأشعريّ"عبد الرحمن بن غنم" وهو الأشعريّ من ثقات التابعين.
ورواه أبو يعلى (6842) من وجه آخر عن شهر بن حوشب قال: كان منا رجلٌ -معشر الأشعرين- قد صحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وشهد معه المشاهد الحسنة الجملية، مالكٌ أو ابن مالك -شكّ عوفٌ- فأتانا يومًا فقال: أتيتكم لأعلمكم وأصلّي بكم كما كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يصلي بنا. قال: فدعا بجفنة عظيمة فجعل فيها من الماء، ثم دعا بإناء صغير، فجعل يُفرغ في الإناء الصغير على أيدينا، ثم قال: اسبغوا الآن الوضوء، فتوضّأ القوم، ثم قام فصلّى بنا صلاةً تامّة وجيزة، فلما انصرف، قال: قال لنا رسول اللَّه:"قد علمتُ أنّ أقوامًا ليسوا بأنبياء ولا شهداء يغبِطُهم الأنبياء والشهداء بمكانهم من اللَّه".
فقال رجل من حَجْرة القوم أعرابيٌّ قال: وكان يعجبُنا إذا شهدنا رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يكون فينا الأعرابيُّ؛ لأنهم يَجْترئون أن يسألوا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولا نجترئ فقال: يا رسول اللَّه، سمِّهم لنا؟ قال: فرأينا وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يتهلّل. قال:"هم ناسٌ من قبائل شتى يتحابُّون في اللَّه، واللَّه إنّ وجوههم لنُور، وإنّهم لعلى نور، ما يخافون إذا خاف الناس، ولا يَحْزنون إذا حَزِنُوا".
قال الهيثمي في"المجمع" (10/ 277):"رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصّحيح غير شهر، وقد
وثقه غير واحد".
وقد حسّن الحافظ المنذريّ في الترغيب والترهيب (4563) إلّا أنه وهم فعزاه للحاكم، والصّواب أن الحاكم لم يخرّج حديث أبي مالك الأشعريّ، وإنّما أخرج حديث ابن عمر، كما سبق.
وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب فإنه حسن الحديث إذا لم يرو ما ينكر عليه.
وفي معنى: المتحابين في اللَّه أحاديث كثيرة ستأتي في مواضعها.
আবূ মালিক আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন এই আয়াতটি নাযিল হয়: "হে মু'মিনগণ! তোমরা এমন বিষয়াদি সম্পর্কে প্রশ্ন করো না, যা তোমাদের কাছে প্রকাশিত হলে তোমাদের খারাপ লাগবে।" (সূরা আল-মায়িদাহ: ১০১)। তারা (উপস্থিত সাহাবীগণ) বললেন, যদি তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্র এমন কিছু বান্দা আছেন যারা নবীও নন এবং শহীদও নন, কিন্তু কিয়ামতের দিন আল্লাহ্র নৈকট্য ও তাঁর কাছে তাদের মর্যাদার কারণে নবীগণ ও শহীদগণও তাদের প্রতি ঈর্ষা করবেন," তখন আমরা তাঁকে জিজ্ঞাসা করব।
তিনি (আবূ মালিক) বলেন, লোকদের এক কোণে একজন বেদুঈন ছিল। সে দাঁড়াল এবং নিজের মুখে এক মুষ্টি (মাটি বা বালি) নিক্ষেপ করল ও হাত ছুড়ে মারল, অতঃপর বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তারা কারা? আমাদেরকে তাদের সম্পর্কে বলুন।
তিনি বলেন, আমি দেখলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা আনন্দে উজ্জ্বল হয়ে উঠলো। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা আল্লাহ্র বান্দাদের মধ্য থেকে এমন বান্দা যারা বিভিন্ন দেশ ও বিভিন্ন গোত্রের। তারা বিভিন্ন শাখা গোত্রের লোক, যাদের মাঝে এমন কোনো আত্মীয়তার সম্পর্ক নেই যার কারণে তারা একে অপরের সাথে যোগাযোগ রক্ষা করে, আর এমন কোনো পার্থিব স্বার্থও নেই যার জন্য তারা একে অপরের সাথে আদান-প্রদান করে। তারা আল্লাহ্র রূহ্ (বা আল্লাহ্র সন্তুষ্টির) কারণে একে অপরকে ভালোবাসে। আল্লাহ্ তাদের মুখমণ্ডলকে নূরে পরিণত করবেন, এবং দয়াময় (আল্লাহ্র) সামনে তাদের জন্য মুক্তার মিম্বর তৈরি করবেন। মানুষ যখন ভীতসন্ত্রস্ত থাকবে, তখন তারা ভীত হবে না; এবং মানুষ যখন ভীত হবে, তখন তারা ভীত হবে না।"
286 - عن أبي إدريس عائذ اللَّه قال: مرّ رجلٌ فقمتُ إليه، فقلتُ: إنّ هذا حدّثني بحديث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فهل سمعته؟ يعني معاذًا، قال: ما كان يحدّثُك إلّا حقًّا، فأخبرته. قال: قد سمعتُ هذا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعني المتحابين في اللَّه يظلّهم اللَّه في ظلّ عرشه، يوم لا ظل إلا ظله، وما هو أفضل منه. قلت: أيْ رحمك اللَّه! وما هو أفضل منه؟ قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يأثر عن اللَّه عز وجل قال:"حقّت محبّتي للمتحابين فىَّ، وحقّتْ محبّتي للمتواصلين فيَّ، وحقّت محبّتي للمتزاورين فيّ، وحقّت محبّتي للمتباذلين فيَّ". ولا أدري بأيتها بدأ. قلت: من أنتَ رحمك اللَّه؟ قال: أنا عُبادة بن الصّامت".
صحيح: رواه الحاكم (4/ 169) من طريق الأوزاعيّ، عن ابن حلبس، عن أبي إدريس، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين".
ورواه الإمام أحمد (22002) ومن طريقه الحاكم (4/ 169 - 170) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن أبي إدريس، والسياق نفسه بزيادة بعض الألفاظ.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وقد رواه عطاء الخراسانيّ عن أبي إدريس الخولانيّ".
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ ইদরীস আ’ইয আল্লাহ বলেন, এক ব্যক্তি পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আমি তার কাছে দাঁড়ালাম এবং বললাম: 'এই ব্যক্তি আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি হাদীস শুনিয়েছেন, আপনি কি সেটি শুনেছেন?' তিনি মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ইঙ্গিত করছিলেন। লোকটি বললেন: ‘তিনি তোমাকে সত্য ছাড়া কিছুই বলেন না।’ তখন আমি তাকে (হাদীসটি সম্পর্কে) জানালাম। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে এই হাদীসটি অবশ্যই শুনেছি— অর্থাৎ যারা আল্লাহর জন্য পরস্পরকে ভালোবাসে, আল্লাহ তাদেরকে তাঁর আরশের ছায়ায় আশ্রয় দেবেন, যেদিন তাঁর ছায়া ছাড়া আর কোনো ছায়া থাকবে না। আর তিনি এর চেয়েও উত্তম কিছুর কথা বলেছেন। আমি বললাম: আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন! এর চেয়ে উত্তম কী? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার পক্ষ থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি যে, তিনি বলেছেন: “যারা আমার জন্য পরস্পরকে ভালোবাসে তাদের জন্য আমার ভালোবাসা অপরিহার্য (নিশ্চিত) হয়ে যায়। যারা আমার জন্য পরস্পর সম্পর্ক রাখে তাদের জন্য আমার ভালোবাসা অপরিহার্য হয়ে যায়। যারা আমার জন্য পরস্পর সাক্ষাত করে তাদের জন্য আমার ভালোবাসা অপরিহার্য হয়ে যায়। আর যারা আমার জন্য পরস্পর খরচ করে (ত্যাগ স্বীকার করে) তাদের জন্য আমার ভালোবাসা অপরিহার্য হয়ে যায়।” (রাবী) বলেন, এর মধ্যে কোনটি দিয়ে তিনি শুরু করেছিলেন, তা আমি জানি না। আমি বললাম: আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন! আপনি কে? তিনি বললেন: আমি উবাদা ইবনুস সামিত।
287 - عن أبي الدّرداء قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليبعثنَّ اللَّهُ أقوامًا يوم القيامة في وجوههم النور على منابر اللّؤلؤ، يغبطهم الناس ليسوا بأنبياء ولا شهداء". قال: جثا أعرابيّ على ركبتيه فقال: يا رسول اللَّه حِلَّهم لنا نعرفهم. قال:"هم المتحابون في اللَّه من قبائل شتى، وبلاد شتى، يجتمعون على ذكر اللَّه يذكرونه".
حسن: رواه الطبرانيّ وإسناده حسن كما قال المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (2348، 4571) ولم أقف على إسناده لأنّ مسند أبي الدّرداء لم يطبع بعد.
ويشهد له حديث عمرو بن عَبسَة قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"عن يمين الرّحمن -وكلتا يديه يمين- رجال ليسوا بأنبياء ولا شهداء يغشى بياض وجوههم وقربهم من اللَّه عز وجل". قيل:
يا رسول اللَّه من هم؟ قال:"هم جُمّاع من نوازع القبائل يجتمعون على ذكر اللَّه، فينتقون أطايب الكلام كما ينتقي آكلُ التمر أطايبه".
رواه الطبرانيّ، وإسناده مقارب لا بأس به، كذا قال المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (2347)، ولم أتمكن من الوقوف على إسناده؛ لأنّ مسند عمرو بن عبسة لم يطبع بعد، وقول المنذريّ بأن إسناده مقارب يشير إلى علّة خفية، وإلّا لحسّنه، فإنه يحسّن الأحاديث المعلولة فكيف إذا خليت من العلة؟ ولذا ذكرته في الباب ولم أذكره في صلب الموضوع.
আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ কিয়ামতের দিন এমন কিছু লোককে পুনরুত্থিত করবেন, যাদের চেহারায় নূর থাকবে এবং তারা মোতির মিম্বরে উপবিষ্ট থাকবে। লোকেরা তাদের প্রতি ঈর্ষান্বিত হবে, অথচ তারা নবীও নয়, শহীদও নয়।
বর্ণনাকারী বলেন: একজন বেদুঈন তার হাঁটুর উপর ভর করে বসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তাদের বৈশিষ্ট্য আমাদের বলে দিন, যাতে আমরা তাদের চিনতে পারি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তারা হলো ভিন্ন ভিন্ন গোত্র ও ভিন্ন ভিন্ন দেশ থেকে আগত সেই সকল লোক, যারা আল্লাহর (সন্তুষ্টির) জন্য একে অপরকে ভালোবাসে। তারা আল্লাহর যিকির করার জন্য একত্রিত হয় এবং তাঁর স্মরণ করে।
288 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ طرف صاحب الصّور مُذْ وُكِّل به مستعد ينظر نحو العرش مخافة أن يؤمر قبل أن يرتد إليه طرفه، كأنّ عينيه كوكبان درّيان".
حسن: رواه الحاكم (4/ 558 - 559) من طريق محمد بن هشام بن ملاس النّمريّ، عن مروان ابن معاوية الفزاريّ، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الأصمّ، ثنا يزيد بن الأصمّ، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أبو الشيخ في"العظمة" (391) من وجه آخر عن مروان بن معاوية، بإسناده نحوه.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وقال الذهبي:"صحيح على شرط مسلم". وأخرجه في"العلو" (81) عن الحاكم وأقرّ تصحيحه.
قلت: الصواب أنه حسن فقط؛ فإنّ محمد بن هشام بن ملاس النمريّ الدّمشقيّ، ليس من رجال مسلم، بل ليس من رجال التهذيب غير أنه"صدوق" كما قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (8/ 116).
ولذا حسّنه الحافظ في"الفتح" (11/ 368).
وسيأتي مزيد من التخريج مع شاهده عن أنس في جموع الإيمان باليوم الآخر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিঃসন্দেহে শিঙাধারী ফেরেশতা যখন থেকে এর দায়িত্বপ্রাপ্ত হয়েছেন, তখন থেকেই তিনি প্রস্তুত। তিনি আরশের দিকে তাকিয়ে আছেন এই ভয়ে যে, তাঁর দৃষ্টি তাঁর কাছে ফিরে আসার আগেই যেন তাঁকে আদেশ করা না হয়। যেন তাঁর দুই চোখ দুটি উজ্জ্বল তারকার মতো।"
289 - عن جابر قال: لما رجعتْ إلى رسول اللَّه مهاجرة البحر، قال:"ألا تحدّثوني بأعاجيبَ ما رأيتم بأرض الحبشة؟". قال فتية منهم: بلى يا رسول اللَّه، بينا نحن جلوسٌ مرّتْ بنا عجوزٌ من عجائز رهابينهم تحمل على رأسها قلَّةً من ماء، فمرّتْ بفتى منهم، فجعل إحدى يديه بين كتفيها، ثم دفعها فخرّت على ركبتيها فانكسرت قلّتُها. فلما ارتفعت التفتتْ إليه، فقالت: سوف تعلم يا غُدَر! إذا وضع اللَّه الكرسيَّ وجمع الأوّلين والآخرين وتكلمت الأيدي والأرجل بما كانوا يكسبون، فسوف تعلم كيف أمري وأمرك عنده غدًا. قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صدقتْ صدقتْ، كيف يقدس اللَّه أمّةً لا يؤخذ لضعيفهم من شديدهم".
حسن: رواه ابن ماجه (4010)، وابن حبان (5058)، وابن أبي الدنيا في الأهوال (242)
كلهم من طريق عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزّبير، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم فإنه حسن الحديث.
وأورده الذهبي في"العلو" (179) وقال:"إسناده صالح".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন সমুদ্র পাড়ি দেওয়া (হাবশা থেকে আগত) মুহাজিরগণ আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে ফিরে আসলেন, তিনি বললেন: "হাবশার ভূমিতে তোমরা যেসব আশ্চর্যজনক বিষয় দেখেছো, সেগুলো কি আমাকে বলবে না?"
তাদের মধ্য থেকে কয়েকজন যুবক বলল: "অবশ্যই, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা বসে ছিলাম, এমন সময় তাদের (খ্রিস্টানদের) ধার্মিক বৃদ্ধাদের মধ্য থেকে একজন বৃদ্ধা মাথার উপর পানির কলসি নিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি তাদের (হাবশার) যুবকদের মধ্য থেকে একজনের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। যুবকটি তার এক হাত বৃদ্ধার দুই কাঁধের মাঝখানে রেখে ধাক্কা মারল। ফলে তিনি হাঁটু গেড়ে পড়ে গেলেন এবং তার কলসিটি ভেঙে গেল। যখন তিনি উঠে দাঁড়ালেন, তখন যুবকটির দিকে ফিরে বললেন: 'ওহে বিশ্বাসঘাতক! তুমি শীঘ্রই জানতে পারবে! যখন আল্লাহ্ তাঁর কুরসি স্থাপন করবেন, প্রথম ও শেষ প্রজন্মের সকলকে একত্রিত করবেন এবং তাদের হাত ও পা তাদের কৃতকর্ম সম্পর্কে কথা বলবে, তখন তুমি শীঘ্রই জানতে পারবে আগামীকাল আল্লাহর কাছে আমার ও তোমার অবস্থা কেমন হবে।' "
বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে সত্য বলেছে, সে সত্য বলেছে। আল্লাহ্ এমন জাতিকে কিভাবে পবিত্র করতে পারেন, যেখানে তাদের দুর্বলদের পক্ষ থেকে সবলদের কাছ থেকে (অধিকারের) প্রতিশোধ নেওয়া হয় না?"
290 - عن بريدة قال: سأل رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم جعفرًا حين قدم من الحبشة:"ما أعجبُ شيء رأيتَه؟". قال: رأيتُ امرأةً تحمل على رأسها مكتلًا من طعام، فمر فارس فركضه فأبذره، فجلست تجمع طعامها، ثم التفتتْ فقالت: ويلٌ لك، إذا وضع الملك تبارك وتعالى كرسيَّه فأخذ للمظلوم من الظالم، فقال رسول صلى الله عليه وسلم تصديقا لقولها:"لا قُدِّستْ أمّةٌ -أو كيف تقدّس أمّة- لا يأخذ ضعيفُها حقَّه من شديدها، وهو غير متعتع".
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1596) -، والبيهقي في الأسماء والصفات (860) كلاهما من طريق سعيد بن سليمان، عن منصور بن أبي الأسود، ثنا عطاء بن السائب، عن محارب بن دثار، عن ابن بريدة (وهو سليمان)، عن أبيه بريدة بن الحصيب، فذكره.
قال البزّار:"لا نعلم له عن بريدة طريقًا غير هذا، تفرّد به منصور".
قلت: ليس كما قال، فقد رواه عمرو بن أبي قيس، عن عطاء بن السّائب، ومن طريقه رواه ابن أبي عاصم في السنة (582).
ولكن في الإسناد عطاء بن السّائب وهو مختلط، ومنصور بن أبي الأسود وعمرو بن أبي قيس ليسا ممن سمع منه قبل الاختلاط، ولكن الشّواهد تؤكّد أنّ عطاء بن السّائب لم يختلط في هذا الحديث، ولذا حسّنه ابنُ حجر وغيره.
وللجزء المرفوع شاهد من حديث أبي سفيان بن الحارث بن عبد المطلب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه لا يقدّس أمّة لا يأخذ الضّعيف حقّه من القويّ وهو غير متعتع".
أخرجه الحاكم في المستدرك (3/ 256) ولكن فيه شيخ لم يسم، قال الحاكم:"وقد سمّاه غندر (محمّد بن جعفر) غير أنه لم يذكر أبا سفيان في الإسناد". انتهى.
قلت: فهو إمّا منقطع أو مرسل.
وأما ما روي عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أخذ بيدي، فقال: يا أبا هريرة، إنّ اللَّه خلق السماوات والأرضين وما بينهما في ستّة أيام، ثم استوى على العرش يوم السابع، وخلق التربة يوم السبت، والجبال يوم الأحد، والشجر يوم الاثنين، والتُقْن يوم الثلاثاء، والنّور يوم الأربعاء، والدواب يوم الخميس، وآدم يوم الجمعة في آخر ساعة من النّهار بعد العصر، وخلق أديم الأرض، أحمرها وأسودها وطيّبها وخبيثها، من أجل ذلك جعل اللَّه عز وجل من آدم الطيب
والخبيث". فهو غريب.
رواه النسائي في السنن الكبرى (11328) في سورة السجدة عن إبراهيم بن يعقوب، قال: حدثني محمد بن الصّباح، قال: حدثنا أبو عبيد الحدّاد، قال: حدثنا الأخضر بن عجلان، عن ابن جريج المكيّ، عن عطاء، عن أبي هريرة، فذكره.
وأورده الذهبي في"العلو" (205) عن النسائي وقال:"الأخضر وثقه ابن معين، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه، وليّنه الأزديّ، وحديثه في السنن الأربعة. وهذا الحديث غريب من أفراده". انتهى.
قلت: وهو كما قال، وقد وثقه أيضًا النسائيّ، وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 63).
ويشهد لمتنه ما رواه مسلم في"صحيحه" في صفات المنافقين (2789) من طرق عن حجاج بن محمد، قال: قال ابن جريج: أخبرني إسماعيل بن أمية، عن أيوب بن خالد، عن عبد اللَّه بن رافع مولى أمّ سلمة، عن أبي هريرة، قال:"أخذ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يدي فقال:"خلق اللَّه عز وجل التربة يوم السبت، وخلق فيها الجبال يوم الأحد، وخلق الشّجر يوم الاثنين، وخلق المكروه يوم الثلاثاء، وخلق النور يوم الأربعاء، وبثَّ فيها الدّواب يوم الخميس، وخلق آدم عليه السلام بعد العصر من يوم الجمعة في آخر الخلق، في آخر ساعة من ساعات الجمعة فيما بين العصر والليل".
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (8341).
وقد عاب العلماءُ إخراج مسلم هذا الحديث في صحيحه؛ لأنه مخالف لصريح القرآن، لأن اللَّه يقول: {فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ} [سورة الأعراف: 54، يونس: 3، هود: 7، الفرقان: 59، السجدة: 4، ق: 38، الحديد: 4]، وقد ثبت أنّ آخر الخلق كان يوم الجمعة، فيلزم أن يكون أول الخلق يوم الأحد، ولو كان أول الخلق يوم السبت وآخره يوم الجمعة لكان قد خلقه في سبعة أيام، وهو خلاف ما أخبر به القرآن.
انظر: مجموع فتاوي شيخ الإسلام (17/ 235)، (18/ 18 - 19).
وقال ابن كثير في تفسيره بعد أن أورد الحديث من طريق مسلم:"هذا الحديث من غرائب صحيح مسلم"، وقد تكلّم عليه ابن المديني، والبخاريّ وغير واحد من الحفّاظ، وجعلوه من كلام كعب، وأن أبا هريرة إنما سمعه من كلام كعب الأحبار، وإنّما اشتبه على بعض الرّواة فجعلوه مرفوعًا".
وقال أيضًا:"وفيه استيعاب الأيام السبعة، واللَّه تعالى قال: {فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ}، ولهذا تكلّم البخاريّ وغير واحد من الحفّاظ في هذا الحديث، وجعلوه من رواية أبي هريرة عن كعب الأحبار ليس مرفوعًا".
قلت: وهو ما ذكره البخاريّ في"التاريخ الكبير" (1/ 413 - 414) من طريق إسماعيل بن أمية، به ثم قال: وقال بعضهم عن أبي هريرة، عن كعب، وهو أصح".
ورواه البيهقي في"الأسماء والصفات" (812) من طريق مسلم وقال: قال ابن المديني:"وما أرى إسماعيل بن أمية أخذ هذا إلا عن إبراهيم بن أبي يحيى. قلت (يعني البيهقي): وقد تابعه على ذلك موسى بن عبيدة الرّبذيّ عن أيوب بن خالد، إلّا أنّ موسى بن عبيدة ضعيف، وروي عن بكر بن الشرود، عن إبراهيم بن أبي يحيى، عن صفوان بن سُليم، عن أيوب بن خالد، وإسناده ضعيف".
ويرى بعض أهل العلم أن هذا الحديث يشير إلى تدبير الأرض لا الخلق، ولكن يصادم هذا القول قوله تعالى في سورة فصلت: {قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِالَّذِي خَلَقَ الْأَرْضَ فِي يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُ أَنْدَادًا ذَلِكَ رَبُّ الْعَالَمِينَ (9) وَجَعَلَ فِيهَا رَوَاسِيَ مِنْ فَوْقِهَا وَبَارَكَ فِيهَا وَقَدَّرَ فِيهَا أَقْوَاتَهَا فِي أَرْبَعَةِ أَيَّامٍ سَوَاءً لِلسَّائِلِينَ} [فصلت: 9، 10] فجعل تدبير الأرض مع خلقها في أربعة أيام: الأحد والاثنين خلق الأرض، والثلاثاء والأربعاء تدبيرها، ثم قال: {فَقَضَاهُنَّ سَبْعَ سَمَاوَاتٍ فِي يَوْمَيْنِ. . .} [فصلت: 12] أي: بقية اليومين من السنة، وهما: الخميس والجمعة.
هكذا تم خلْق السماوات والأرض وما فيهما في ستة أيام كما نص عليه القرآن في عدة آيات في كتاب اللَّه.
বুরয়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাবশা থেকে আসলেন, তখন তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি সবচেয়ে আশ্চর্যজনক কী জিনিস দেখেছ?" তিনি বললেন: আমি এক মহিলাকে দেখলাম যে তার মাথার ওপর এক ঝুড়ি খাবার বহন করছিল। তখন একজন অশ্বারোহী তার পাশ দিয়ে গেল এবং তাকে আঘাত করে ঝুড়িটি ফেলে দিল। মহিলাটি তখন বসে পড়ল এবং তার খাবারগুলো জড়ো করতে লাগল। এরপর সে ফিরে তাকাল এবং বলল: তোমার জন্য দুর্ভোগ! যখন বরকতময় ও সুমহান আল্লাহ তাঁর কুরসি স্থাপন করবেন এবং জালিমের কাছ থেকে মজলুমের হক আদায় করে নেবেন! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কথার সত্যতা প্রমাণ করে বললেন: "সেই উম্মাহ পবিত্র হতে পারে না – অথবা কীভাবে পবিত্র হবে সেই উম্মাহ – যেখানে দুর্বল ব্যক্তি শক্তিশালী ব্যক্তির কাছ থেকে তার অধিকার আদায় করতে পারে না, অথচ সে ভীত-সন্ত্রস্ত হবে না।"
291 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ينزل اللَّه تبارك وتعالى كلّ ليلة إلى السّماء الدّنيا حين يبقى ثلثُ اللّيل الآخر، فيقول: من يدعوني فأستجيبَ له، من يسألني فأُعطيه، من يستغفرني فأغفرَ له".
متفق عليه: رواه مالك في القرآن (30) عن ابن شهاب، عن أبي عبد اللَّه الأغرّ، وأبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاريّ في التهجد (1145) عن عبد اللَّه بن مسلمة، ومسلم في صلاة المسافرين (758) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك، به، مثله.
ورواه مسلم من وجه آخر وفيه من الزيادة:"حتى يُضيء الفجر".
قال أبو عيسى الترمذيّ (3/ 309):"ورُوي هذا الحديث من أوجه كثيرة عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، وروي عنه أنه قال: ينزل اللَّه عز وجل حين يبقى ثلث اللّيل الآخر وهو أصح الروايات" انتهى.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা প্রতি রাতে পৃথিবীর নিকটবর্তী আকাশে অবতরণ করেন, যখন রাতের শেষ তৃতীয়াংশ অবশিষ্ট থাকে। তখন তিনি বলেন: ‘কে আমাকে ডাকে যে আমি তার ডাকে সাড়া দেব? কে আমার কাছে চায় যে আমি তাকে দান করব? কে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করে যে আমি তাকে ক্ষমা করে দেব?’
292 - عن أبي سعيد وأبي هريرة، قالا: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه يمهل حتى إذا ذهب ثلث اللّيل الأوّل نزل إلى السّماء الدّنيا، فيقول: هل من مستغفر؟ هل من تائب؟ هل من سائل؟ هل من داع؟ حتى ينفجر الفجر".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (758: 172) من طرق عن جرير، عن منصور، عن أبي إسحاق، عن الأغر أبي مسلم، يرويه عن أبي سعيد، وأبي هريرة، فذكراه.
ورواه أيضًا عن شعبة، عن أبي إسحاق، بهذا الإسناد غير أن حديث منصور أتم وأكثر.
ورواه ابن أبي الدّنيا في التهجد (246) من طريق أبي عوانة، عن أبي إسحاق بإسناده غير أن فيه:"إنّ اللَّه تعالى يهبط إذا ذهب ثلث الأول، وبقي ثلث الليل. . ." والباقي مثله.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (8974) غير أنه قال:"إنّ اللَّه يُمهل حتى يذهب ثلثُ الليل، ثم يهبط فيقول: هل من داع، فيستجاب له؟ هل من مستغفر فيغفر له؟".
ورواه أيضًا (11295) من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، مثل لفظ مسلم.
আবু সাঈদ ও আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ অবকাশ দিতে থাকেন, যখন রাতের প্রথম তৃতীয়াংশ চলে যায়, তখন তিনি (আল্লাহ) সর্বনিম্ন আকাশে অবতরণ করেন এবং বলেন: কোনো ক্ষমা প্রার্থনাকারী কি আছ? কোনো তওবাকারী কি আছ? কোনো যাচনাকারী কি আছ? কোনো আহ্বানকারী (বা দু'আকারী) কি আছ? (এই আহ্বান চলতে থাকে) যতক্ষণ না ফজর উদিত হয়।"
293 - عن وعن أبي هريرة يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ينزل اللَّهُ في السّماء الدّنيا لشطر اللّيل، أو لثلث اللّيل الآخر، فيقول: من يدعوني فأستجيبَ له، أو يسألني فأعطيه، ثم يقول: من يُقْرِضُ غيرَ عديم ولا ظلوم".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (758: 171) عن حجّاج بن الشاعر، حدّثنا محاضر أبو المورِّع، حدّثنا سعد بن سعيد، قال: أخبرني ابن مرجانة، قال: سمعتُ أبا هريرة، فذكره.
وقوله:"غير عديم" قال أهل اللّغة: يقال: أعدم الرّجل إذا افتقر، فهو معدِم وعديم وعدوم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা'আলা রাতের অর্ধাংশে, অথবা রাতের শেষ তৃতীয়াংশে নিকটবর্তী (পৃথিবীর) আকাশে অবতরণ করেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘কে আছে আমাকে ডাকবে, আমি তার ডাকে সাড়া দেবো? অথবা কে আছে আমার কাছে চাইবে, আমি তাকে দান করবো?’ এরপর তিনি বলেন: ‘কে আছে এমন সত্তাকে ঋণ দেবে যিনি দরিদ্রও নন এবং অত্যাচারীও নন?’
294 - عن أبي هريرة قال: حدّثني رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه عز وجل إذا كان يوم القيامة نزل إلى العباد ليقضي بينهم".
صحيح: رواه الترمذيّ (2382) عن سويد بن نصر، أخبرنا عبد اللَّه بن المبارك، أخبرنا حيوة بن شريح، أخبرنا الوليد بن أبي الوليد أبو عثمان المدائني، أنّ عقبة بن مسلم حدّثه، أنّ شُفيًّا الأصبحيّ حدّثه، عن أبي هريرة، فذكره في حديث طويل وهو مذكور في موضعه.
وصحّحه ابن خزيمة (2482)، والحاكم (1/ 418 - 419)، وروياه من وجه آخر عن عبد اللَّه ابن المبارك بإسناده، مثله في حديث طويل.
وإسناده صحيح، والوليد بن أبي الوليد عثمان المدني أبو عثمان، قال فيه ابن حجر:"لين الحديث" والحقّ أنّه ثقة، وثّقه أبو زرعة والذهبيّ في"الكاشف" وغيرهما.
وأصل هذا الحديث في صحيح مسلم من وجه آخر إلا أنه ليس فيه ذكر النزول (1905).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা যখন কিয়ামতের দিন আসবে, তখন তিনি বান্দাদের মধ্যে বিচার ফায়সালা করার জন্য তাদের নিকট অবতরণ করবেন।"
295 - عن رفاعة الجهنيّ قال: أقبلنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى إذا كُنّا بالكديد -أو قال: بقُديد- فجعل رجالٌ منّا يستأذنون إلى أهليهم، فيَأُذنُ لهم، فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"ما بال رجال يكون في شِقُّ الشجرة التي تلي رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم أبغضَ إليهم من الشِّقِ الآخر". فلم نر عند ذلك من القوم إلّا باكيًا، فقال رجل: إنّ الذي يستأذِنُك بعد هذا لسفيهٌ. فحمدَ اللَّه وقال حينئذ:"أشهد عند اللَّه لا يموتُ عبد يشهد أن لا إله إلا اللَّه، وأنّي رسول اللَّه صِدْقًا من قلبه، ثم يُسدِّدُ
إلّا سلك في الجنة". قال:"وقد وعدني ربي عز وجل أن يُدخلَ من أُمّتي سبعين ألفًا لا حساب عليهم ولا عذاب، وإني لأرْجُو أن لا يدخلوها حتى تبوَّءُوا أنتم ومن صلح من آبائكم وأزواجكم وذرياتكم مساكن في الجنة".
وقال:"إذا مضي نصفُ اللّيل -أو قال: ثُلثا اللّيل- ينزلُ اللَّه عز وجل إلى السّماء الدُّنيا، فيقول: لا أسألُ عن عبادي أحدًا غيري، من ذا يستغفرني فأغفر له، من الذي يدْعوني فأستجيب له، من ذا الذي يسألني فأُعطيه حتى ينفجر الصُّبحُ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16215) عن إسماعيل بن إبراهيم، قال: حدثنا هشام الدّستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن هلال بن أبي ميمونة، عن عطاء بن يسار، عن رفاعة الجهنيّ، فذكره.
إسناده صحيح، صححه ابن خزيمة وأخرجه في كتاب التوحيد (1/ 289 - 291)، وابن حبان (212) من طرق عن الوليد بن مسلم، قال: حدّثني الأوزاعيّ، قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، قال: حدثني هلال بن أبي ميمونة، قال: حدثني عطاء بن يسار، قال: حدثني رفاعة بن عرابة الجهنيّ، فذكر الحديث نحوه.
هكذا رواه ابن خزيمة وابن حبان بالتحديث إلى آخر الإسناد.
وهذا الإسناد أصحّ ما جاء به هذا الحديث، وقد صححه شيخ الإسلام ابن تيمية، وابن القيم، والحافظ ابن حجر وغيرهم.
ورواه ابن ماجه (1367، 2090) مختصرًا من طريق محمد بن مصعب، عن الأوزاعيّ. ومحمد بن مصعب ضعيف، وبه ضعّفه أيضًا البوصيريّ.
قال فيه صالح بن محمد:"عامة أحاديثه عن الأوزاعيّ مقلوبة".
وقد رُوي هذا الحديث عن عقبة بن عامر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال الدّارقطني في"كتاب النزول" (65) وفيه نظر.
وقال بعد أن أخرج الحديث من طريق علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، قال: حدثني هلال بن أبي ميمونة، أن عطاء بن يسار حدّثه، أنّ عقبة بن عامر حدّثه، فذكر الحديث ثم قال:"وروى هذا الحديث جماعةٌ منهم: هشام الدّستوائيّ، وعبد الرحمن الأوزاعيّ، وأبان العطّار، عن يحيى بن أبي كثير، عن هلال بن أبي ميمونة، عن عطاء بن يسار، عن رفاعة بن عرابة الجهنيّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو المحفوظ" انتهى.
রিফাআ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আগমন করছিলাম। যখন আমরা আল-কাদীদ নামক স্থানে পৌঁছলাম – অথবা তিনি বলেন: কুদাইদ নামক স্থানে – তখন আমাদের মধ্য থেকে কিছু লোক তাদের পরিবারের কাছে যাওয়ার জন্য অনুমতি চাইতে শুরু করল এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের অনুমতি দিলেন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: "কী হয়েছে এমন লোকদের, যারা (যাত্রা বিরতিকালে) গাছের সেই পাশটিতে থাকা, যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটবর্তী, সেটিকে অন্য পাশের চেয়ে অপছন্দ করে?"
এ কথা শোনার পর আমরা সে জনগোষ্ঠীর মধ্যে ক্রন্দনকারী ছাড়া আর কাউকে দেখলাম না। তখন এক ব্যক্তি বলল: এরপরও যে ব্যক্তি আপনার কাছে অনুমতি চাইবে, সে নিশ্চয়ই নির্বোধ। অতঃপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন এবং তখন বললেন: "আমি আল্লাহর কাছে সাক্ষ্য দিচ্ছি, যে বান্দা অন্তরের গভীর থেকে সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), অতঃপর সে সঠিক পথে অবিচল থাকে, সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
তিনি আরও বললেন: "আমার পরাক্রমশালী প্রতিপালক আমাকে প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন যে, তিনি আমার উম্মতের সত্তর হাজার লোককে বিনা হিসাব ও বিনা শাস্তিতে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। আর আমি আশা করি যে, তারা (ঐ সত্তর হাজার লোক) জান্নাতে প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না তোমরা এবং তোমাদের সৎকর্মশীল পিতা-মাতা, স্ত্রী ও সন্তান-সন্ততি জান্নাতে নিজেদের বাসস্থান প্রতিষ্ঠা করে নেবে।"
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "যখন অর্ধরাত্রি অতিবাহিত হয় – অথবা তিনি বললেন: রাতের দুই-তৃতীয়াংশ অতিবাহিত হয় – তখন পরাক্রমশালী আল্লাহ সর্বনিম্ন আকাশে অবতরণ করেন এবং বলেন: আমি ছাড়া আমার বান্দাদের ব্যাপারে আমি আর কাউকে জিজ্ঞেস করি না (আমার কাছেই জানতে চাইব)। কে আছে যে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করবে, ফলে আমি তাকে ক্ষমা করে দেব? কে আছে যে আমাকে ডাকবে, ফলে আমি তার ডাকে সাড়া দেব? কে আছে যে আমার কাছে কিছু চাইবে, ফলে আমি তাকে তা দান করব? – ফজর উদিত হওয়া পর্যন্ত (তিনি এ কথা বলতে থাকেন)।"
296 - عن نافع بن جبير، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ينزل اللَّهُ عز وجل في كلّ ليلة إلى السّماء الدّنيا فيقول: هل من سائل فأُعطيه، هل من مستغفر فأغفر له، حتى يطلع الفجرُ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16745)، والبزّار -كشف الأستار (3152) -، وأبو يعلى (7408)، والنسائيّ في اليوم واللّيلة (487)، وابن أبي عاصم في"السنة" (507)، والدّارقطني في النزول (4) كلّهم من طريق حماد بن سلمة، عن عمرو بن دينار، عن نافع بن جبير، به، واللّفظ لأحمد.
وصحّحه ابنُ خزيمة، وأخرجه في كتاب التوحيد (1/ 292).
وإسناده صحيح على شرط مسلم، وصحّحه أيضًا الحافظ ابن القيم كما في"مختصر الصواعق" (ص 374).
ولا يُعلُّ هذا بما رواه نافع بن جبير مرةً عن أبيه، ومرةً عن أبي هريرة، وأخرى عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم؛ فإنّ الرّاوي قد يشك في اسم الصحابي، فمن جزم حجة على من لم يجزم، وأمّا كونه عن أبيه، أو عن أبي هريرة، فلعلّ نافعًا سمع من الاثنين.
ولذا وقع الخلاف في بعض ألفاظ الحديث ففي حديثه عن أبي هريرة:"حتى تُرجل الشّمس" هكذا ذكره ابن خزيمة في كتاب التوحيد (1/ 294).
وقال:"وبين طلوع الفجر وبين ترجل الشّمس ساعة طويلة. فلفظ خبره الذي روى عن أبيه، أو عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم غير مسمّى - غيرُ لفظ خبره الذي روى عن أبي هريرة. فهذا كالدّال على أنّهما خبران لا خبرًا واحدًا".
জুবাইর ইবন মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা প্রতি রাতে দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন এবং বলেন: 'কোনো প্রার্থনাকারী আছে কি, যাকে আমি দান করব? কোনো ক্ষমা প্রার্থনাকারী আছে কি, যাকে আমি ক্ষমা করে দেব?' ফজর উদিত হওয়া পর্যন্ত (এই আহ্বান চলতে থাকে)।"
297 - عن عليّ بن أبي طالب، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لولا أن أشقّ على أمّتي لأمرتهم بالسّواك عند كلّ صلاة، ولأخرتُ العشاء الآخرة إلى ثلث اللّيل، فإنّه إذا مضى ثلث اللّيل الأوّل هبط اللَّه تبارك وتعالى إلى السّماء الدّنيا، فلم يزل هنالك حتى يطلع الفجر يقول: ألا سائل فيُعطى، ألا داعٍ يجاب، ألا مستشفع فيشفَّع، ألا تائب مستغفر فيغفر له".
حسن: رواه البزّار (477، 478) قال: حدثنا سليمان بن سيف الحراني، ثنا سعيد بن بزيع، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الرحمن بن يسار، ح. وحدّثنا إبراهيم بن سعيد الجوهريّ، والفضل بن سهل، وأحمد بن منصور، قالوا: حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الرحمن بن يسار، عن عبيد اللَّه بن أبي رافع، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، فذكر الحديث.
قال البزار:"واللّفظ لفظ سعيد بن بزيع، وهذا الحديث قد رُوي عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم من وجوه، لا تعلمه بروي عن علي، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم إلا من هذا الوجه بهذا الإسناد" انتهى.
وإسناده حسن لأجل سعيد بن بزيع وهو الحرّانيّ، قال فيه أبو زرعة:"صدوق" الجرح والتعديل (4/ 8).
ومحمد بن إسحاق مدلّس إلّا أنّه صرّح بالتحديث.
وعبد الرحمن بن يسار هو القرشيّ مولاهم، عن عبيد اللَّه بن أبي رافع، وعنه ابن أخيه محمد بن إسحاق، وثّقه ابن معين. وذكره ابن حبان في الثقات. انظر:"تعجيل المنفعة" (654).
قلت: هكذا صرّح محمد بن إسحاق في رواية الإمام أحمد (968)، والدّارميّ (1492)، والدّارقطنيّ في"النزول" (1) فقال: حدّثني عمي عبد الرحمن بن يسار إلّا أن أحمد، والدّارميّ لم يذكرا لفظ الحديث، وإنّما أحالا على لفظ أبي هريرة، وحديث أبي هريرة جزء منه سيأتي في كتاب الطهارة - باب السواك، وجزء منه في كتاب الصلاة. المواقيت، والجزء الثالث سبق قريبًا.
الإمام أحمد (967، 10618)، والدّارميّ (1491) جمعاه كله في حديث واحد، وروياه من طريق محمد بن إسحاق، قال: حدثني سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن عطاء مولى أمّ صُبيّة، عن أبي هريرة.
وعطاء المدنيّ مولى أم صُبيّة مجهول، ومحمد بن إسحاق وإن كان عنعن في بعض الرّوايات، فإنه صرّح أيضًا في البعض الآخر.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যদি আমি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর মনে না করতাম, তবে আমি অবশ্যই তাদেরকে প্রত্যেক সালাতের সময় মিসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম, এবং আমি অবশ্যই ইশার শেষ নামাজকে রাতের এক তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম। কারণ, যখন রাতের প্রথম এক তৃতীয়াংশ অতিবাহিত হয়, তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা নিকটবর্তী (পৃথিবীর) আকাশে অবতরণ করেন এবং ফজর উদিত না হওয়া পর্যন্ত তিনি সেখানেই থাকেন। তিনি বলেন: 'কোনো প্রশ্নকারী আছে কি, যাকে দান করা হবে? কোনো আহ্বানকারী (দোয়াকারী) আছে কি, যার আহ্বানে সাড়া দেওয়া হবে? কোনো সুপারিশকারী আছে কি, যার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে? কোনো তওবাকারী ক্ষমা প্রার্থনাকারী আছে কি, যাকে ক্ষমা করা হবে?'"
298 - عن ابن مسعود، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان ثلثُ اللّيل الباقي، يهبِطُ اللَّهُ عز وجل إلى السّماء الدّنيا، ثم تُفتح أبوابُ السماء، ثم يبسط يده فيقول: هل من سائل يُعطى سؤلَه، فلا يزال كذلك حتى يطلع الفجر".
حسن: رواه الإمام أحمد (3673، 3821) عن عبد الصّمد، حدّثنا عبد العزيز بن مسلم، حدّثنا أبو إسحاق الهمداني، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، فذكره.
رواه أيضًا أبو يعلى (5319) من هذا الوجه.
قال الهيثمي في"المجمع":"رواه أحمد، وأبو يعلى، ورجالهما رجال الصّحيح".
قلت: وهو كما قال إلّا أنّ فيه أبا إسحاق السّبيعيّ وهو ممن اختلط في آخره، وكان مدلّسًا وقد عنعن.
ولكن رواه أيضًا الإمام أحمد (4268) عن معاوية بن عمرو، قال: حدثنا زائدة، حدثنا إبراهيم الهجري، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"إنّ اللَّه عز وجل يفتح أبوابَ السّماء ثلث اللّيل الباقي، ثم يهبط إلى السّماء الدّنيا، ثم يبسط يده ثم يقول: ألا عبد يسألني فأعطيه حتى يسطع الفجرُ".
وهذا إسناد ضعيف للكلام في إبراهيم الهجريّ وهو ابن مسلم العبديّ ضعّفه الجمهور ومشّاه ابنُ عدي فقال:"يكتبُ حديثه مع ضعفه""الكامل" (1/ 211) فإذا ضُمَّ هذا إلى رواية أبي إسحاق يحدث قوّة فيصير الحديث حسنًا.
وأبو الأحوص هو عوف بن مالك بن نضلة الجشميّ.
تعليق: قال الإمام محمد بن إسحاق بن خزيمة:"نشهد شهادةَ مقر بلسانه، مصدِّق بقلبه، مستيقن بما في هذه الأخبار؛ من ذكر نزول الرّب من غير أن نصف الكيفيّة؛ لأنّ نبينا المصطفى لم
يصفْ لنا كيفيةَ نزول خالقنا إلى سماء الدّنيا، وأعلَمنا أنه ينزل، واللَّه جلّ وعلا لم يترك، ولا نبيَّه عليه السلام بيان ما بالمسلمين إليه الحاجة من أمر دينهم.
فنحن قائلون مصدِّقون بما في هذه الأخبار، من ذكر النزول غير متكلّفين القول بصفة الكيفية، إذ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يصف لنا كيفية النّزول.
وفي هذه الأخبار ما بان وثبت وصحّ أنّ اللَّه جلّ وعلا فوق سماء الدّنيا الذي خبَّرنا نبيُّنا صلى الله عليه وسلم أنه ينزل إليه. إذْ محال في لغة العرب أن تقول: نزل من أسفل إلى أعلى، ومفهومٌ في الخطاب أنّ النّزول من أعلى إلى أسفل"."كتاب التوحيد" (1/ 275).
وفي الباب ما رواه الدّارقطنيّ في كتاب"النزول" (6، 7) قالوا: وحدّثنا محاضر بن المورّع، قال: قال الأعمش: وأري أبا سفيان ذكره عن جابر أنه قال:"ذلك في كلّ ليلة".
ولفظه:"إنّ اللَّه ينزل كلَّ ليلة إلى السّماء الدّنيا لثلث اللّيل فيقول: ألا عبد من عبادي يدعوني فأستجيب له، أو ظالم لنفسه يدعوني فأغفر له، ألا مُقَتَّرٍ عليه فأرزقه، ألا مظلوم يستنصر فأنصره، ألا عان يدعوني فأفكّ عنه، فيكون ذلك مكانه حتى يُصلّي الفجرُ ثم بعلو ربُّنا عز وجل إلى السّماء العليا على كرسيّه".
رواه عن أحمد بن محمد بن مسعدة، وعبد الرحمن بن الحسن بن أحمد الهمداني، قالا: ثنا إبراهيم بن الحسين الهمدانيّ، قال: ثنا محمد بن إسماعيل الجعفريّ، ثنا عبد اللَّه بن سلمة بن أسلم، عن محمد بن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاري، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وفي الإسناد محمد بن إسماعيل الجعفريّ، قال فيه أبو حاتم: منكر الحديث. ترجمه الذهبيّ في"الميزان" وقال الحافظ في"اللّسان": قال أبو نعيم الأصبهانيّ: متروك.
قلت: هو محمد بن إسماعيل بن جعفر بن إبراهيم بن محمد بن علي بن عبد اللَّه بن جعفر بن أبي طالب. وشيخه عبد اللَّه بن سلمة بن أسلم ضعّفه الدّارقطنيّ، وقال أبو نعيم: متروك. وسلمة تحرّف في كتاب"النزول" إلى"مسلمة".
وفي الإسناد أيضًا رجال لا أعرفهم.
وأصل حديث جابر في"صحيح مسلم" في كتاب صلاة المسافرين (757) من وجهين أحدهما من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ في اللّيل لساعةً لا يوافقها رجل مسلم يسأل اللَّه خيرًا من أمر الدّنيا والآخرة إلّا أعطاه إياه، وذلك كلّ ليلة".
والوجه الثاني من طريق معقل، عن أبي الزّبير، عن جابر، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ من اللّيل ساعةً لا يوافقها عبد مسلم يسأل اللَّه خيرًا إلّا أعطاه إيّاه". وليس في أحدهما ذكر نزول اللَّه تبارك وتعالى.
وكذلك ما روي عن عمرو بن عبسة مرفوعًا:"إن اللَّه عز وجل يتدلّي في جوف اللّيل فيغفر إلّا
ما كان من الشّرك والبغي" في حديث طويل سيأتي في كتاب الوضوء -باب ثواب الطهور- وليس فيه هذا اللّفظ.
رواه الإمام أحمد (19433) عن يزيد بن هارون، حدّثنا حريز بن عثمان -وهو الرّحبيّ-، حدّثنا سُليم بن عامر، عن عمرو بن عبسة.
ومن طريق يزيد بن هارون رواه أيضًا الدارقطني في كتاب"النزول" (66، 67)، قال أبو حاتم:"لم يسمع سُليم بن عامر من عمرو بن عبسة".
وإنما الصّحيح في الإسناد هو ما رواه أبو أمامة، عن عمرو بن عبسة السلميّ. رواه أبو داود (1277)، والترمذيّ (3579)، والنسائيّ (572) من طريقه.
ولفظ الحديث:"أقرب ما يكون الرّبُ من العبد في جوف اللّيل الآخر، فإن استطعت أن تكون ممن يذكر اللَّه في تلك السّاعة فكن".
وقال:"حسن صحيح غريب من هذا الوجه".
وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1147) ورواه من هذا الوجه.
وكذلك ما روي عن عثمان بن أبي العاص مرفوعًا:"إنّ اللَّه ينزلُ إلى السّماء الدّنيا في كل ليلة فيقول: هل من داع فأستجيب له، هل من مستغفر فأغفر له".
رواه الطبراني (8373)، وابن خزيمة في"كتاب التوحيد" (266)، وابن أبي عاصم (508) كلّهم من طريق حمّاد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جدعان، عن الحسن، عن عثمان بن أبي العاص، فذكره.
وإسناده ضعيف لضعف علي بن زيد بن جدعان قال فيه أحمد: ليس بشيء، وقال عثمان الدارمي: ليس بذاك القوي، وقال النسائي: ضعيف.
والحسن هو البصريّ الإمام مدلّس وقد عنعن، واختلف في سماعه من عثمان ابن أبي العاص فأثبته البخاريّ ونفاه غيره.
وهذا الحديث أخرجه أيضًا الإمام أحمد (16280) من طريق حماد بن سلمة وفيه:"ينادي منادٍ كلّ ليلة. . ." ولم يذكر فيه نزول الربّ عز وجل.
وفي الباب أيضًا عن عبادة بن الصّامت، وأبي الدّرداء.
وكذلك ما رُوي عن عدد من الصّحابة عن نزول الرّب سبحانه وتعالى ليلة النصف من شعبان فلا يصح منه شيء، ومن هؤلاء:
1 - عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ينزلُ ربُّنا وتعالى ليلة النّصف من شعبان فيغفر لكل نفس إلّا مشرك باللَّه ومشاحن".
رواه الدّارميّ في الرّد على الجهميّة (136)، وابن أبي عاصم في"السنة" (509)، والبزّار -
كشف الأستار (2045)، وابن خزيمة في"كتاب التوحيد" (269)، واللالكائيّ في"أصول الاعتقاد" (750) كلّهم من طريق عمرو بن الحارث، عن عبد الملك بن عبد الملك، عن المصعب ابن أبي ذئب، عن القاسم بن محمد، عن أبيه، أو عن عمّه، عن جدّه أبي بكر، فذكر الحديث، واللّفظ للدّارميّ. وفي بعض الرّوايات:"وفي قلبه شحناء".
وإسناده ضعيف فإنّ عبد الملك بن عبد الملك وشيخه المصعب بن أبي ذئب ذكرهما ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل فلم يقل فيهما شيئًا؛ في ترجمة عبد الملك بن عبد الملك إلا قول أبيه:"روى عنه عمرو بن الحارث" (5/ 359)، وقال في ترجمة الثاني (8/ 306 - 307):"مصعب بن أبي ذئب، روي عن القاسم بن محمد، روى عنه عبد الملك بن أبي ذئب، روي عمرو بن الحارث، عن عبد الملك بن عبد الملك، عن مصعب بن أبي ذئب هذا، سمعت أبي يقول: لا يعرف منهم إلّا القاسم بن محمد - يعني في الإسناد".
وهذا صريح في تجهيل عبد الملك وشيخه المصعب بن أبي ذئب.
وقال البخاريّ"في حديثه نظر" يعني حديث عمرو بن الحارث، عن عبد الملك، وقال ابن حبان:"لا يتابع على حديثه". ونقل ابنُ عدي أيضًا وساق الحديث وقال:"هو معروف بهذا الحديث، لا يرويه عنه غير عمرو بن الحارث، وهو حديث منكر بهذا الإسناد". انظر للمزيد:"لسان الميزان" (4/ 67) في ترجمة عبد الملك بن عبد الملك.
وقال ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 67):"هذا حديث لا يصح ولا يثبت". وتعقّب الهيثمي البزّار في قوله:"عبد الملك ليس بمعروف، وقد روي هذا الحديث أهلُ العلم واحتملوه"، فقال:"هذا كلام ساقط". كشف الأستار (2/ 436).
2 - وعن أبي ثعلبة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان ليلة النصف من شعبان يطلع اللَّه عز وجل إلى خلقه فيغفر للمؤمنين، ويترك أهل الضغائن وأهل الحقد بحقدهم".
رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (511)، واللالكائي في"أصول الاعتقاد" (760)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (23) كلّهم من طريق الأحوص بن حكيم، عن مهاجر بن حبيب، عن أبي ثعلبة الخشني، فذكر الحديث واللّفظ لابن أبي عاصم.
وفي إسناده الأحوص بن حكيم العنسيّ الحمصيّ قال النسائيّ: ضعيف. وقال أبو حاتم: ليس بقوي، منكر الحديث. وقال الجوزجانيّ: ليس بالقوي في الحديث. والخلاصة فيه: أنّه ضعيف الحفظ كما في التقريب.
وأورد ابن الجوزيّ هذا الحديث في"العلل المتناهية" (2/ 70) وقال:"هذا حديث لا يصح، قال أحمد بن حنبل: الأحوص لا يُروى حديثُه. وقال يحيى: ليس بشيء. وقال الدّارقطنيّ: منكر الحديث، وقال: مضطرب غير ثابت".
وقال الهيثمي في"المجمع" (8/ 65):"رواه الطبرانيّ، وفيه الأحوص بن حكيم وهو ضعيف".
وأمّا مهاجر بن حبيب فهو أبو ضمرة بن حبيب الزّبيديّ قال أبو حاتم: لا بأس به. الجرح والتعديل (8/ 439 - 440)، ورواه البيهقي أيضًا موقوفًا على مكحول.
3 - وعن عائشة قالت: فقدت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة، فخرجتُ فإذا هو بالبقيع، فقال:"أكنتِ تخافين أن يحيفَ اللَّه عليك ورسولُه؟". قلت: يا رسول اللَّه، ظننتُ أنّك أتيتَ بعض نسائك. فقال:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى ينزلُ ليلة النّصف من شعبان إلى السّماء الدّنيا، فيغفر لأكثر من عدد شعر غنم كلب".
رواه الترمذيّ (739)، وابن ماجه (1389) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، قال: أخبرنا الحجاج بن أرطاة، عن يحيى بن أبي كثير، عن عروة، عن عائشة، فذكرتِ الحديث، واللّفظ للترمذيّ.
قال الترمذيّ:"حديث عائشة لا نعرفه إلّا من هذا الوجه من حديث الحجّاج، وسمعتُ محمدًا يضعِّفُ هذا الحديث. وقال: يحيى بن أبي كثير لم يسمع من عروة. وقال محمد: والحجاج بن أرطاة لم يسمع من يحيى بن أبي كثير".
قلت: وكلاهما مدلّسان وقد عنعنا.
وأخرجه البيهقيّ في"الشّعب" (3824) وقال:"إنّما المحفوظ هذا الحديث من حديث الحجاج بن أرطاة، عن يحيى بن أبي كثير مرسلًا.
والحديث رواه الإمام أحمد (26018) عن يزيد بن هارون وفيه قالت عائشة: فإذا هو بالبقيع رافع رأسه إلى السّماء.
ومن طريقه رواه ابن الجوزيّ في"العلل المتناهية" (2/ 66) وقال: قال الدّارقطنيّ:"قد روي من وجوه، وإسناده مضطرب غير ثابت".
4 - عن أبي موسى، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه ليطلع في ليلة النّصف من شعبان فيغفر الجميع خلقه إلا لمشرك أو مشاحن".
رواه ابن ماجه (1390) عن راشد بن سعيد بن راشد الرّمليّ، قال: حدّثنا الوليد، عن ابن لهيعة، عن الضّحّاك بن أيمن، عن الضّحّاك بن عبد الرحمن بن عَرْزَب، عن أبي موسى الأشعريّ، فذكر الحديث.
ورواه أيضًا من وجه آخر عن النّضر بن عبد الجبّار، قال: حدّثنا ابن لهيعة، عن الزبير بن سُليم، عن الضّحاك بن عبد الرحمن، عن أبيه، قال: سمعتُ أبا موسى، فذكر نحوه.
وإسناده ضعيف لأجل ابن لهيعة فإنه اضطرب في هذا الإسناد في الأول قال: قال الضّحاك بن عبد الرحمن بن عزرب، عن أبي موسى. وزاد في الثاني:"عن أبيه". مع جهالة عبد الرحمن بن
عزرب والد الضّحاك كما في"التقريب".
وكذلك في الإسناد الأوّل الضّحاك بن أيمن الكلبيّ شيخ ابن لهيعة وهو مجهول أيضًا، ولكن رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (510) من طريق ابن لهيعة، عن الربيع بن سليمان، عن الضّحّاك ابن عبد الرحمن، عن أبيه - فزاد فيه:"عن أبيه".
وفي"أصول الاعتقاد" للالكائيّ (763): الزبير بن سليمان، وفي الإسناد الثاني عند ابن ماجه الزبير بن سُليم وهو مجهول أيضًا.
وشيخ شيخه هل رواه عن أبيه أم عن أبي موسى فهو كله يدل على أنْ ابن لهيعة اضطرب فيه اضطرابًا شديدًا.
5 - وعن معاذ بن جبل، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يطلع اللَّه إلى خلقه ليلة النّصف من شعبان فيغفر الجميع خلقه إلّا مشرك أو مشاحن".
رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (512) عن هشام بن خالد، ثنا أبو خُليد عتبة بن حماد، عن الأوزاعيّ وابن ثوبان، عن مكحول، عن مالك بن يخامر، عن معاذ بن جبل، فذكر الحديث.
ورواه أيضًا ابن حبان في"صحيحه" (5665)، والطبراني في"الكبير" (20/ 109)، والبيهقيّ في فضائل الأوقات (22) كلّهم من هذا الوجه، وزادوا بعد ابن ثوبان:"عن أبيه". والظاهر أنه سقط في"السنة" لأنّ كلَّ مَنْ رواه من طريق شيخ ابن أبي عاصم أثبت ذلك.
قال الهيثميّ في"المجمع" (8/ 65): رواه الطبراني في"الكبير"، و"الأوسط" ورجالهما ثقات".
قلت: وهو كما قال إلّا أنه لم يتنبّه أنّ في الإسناد انقطاعًا فإن مكحولا لم يلقَ مالك بن يخامر كما قال الذهبيّ.
وقد رُوي موصولًا إلّا أنه لم يصح أيضًا لأن في إسناده سليمان بن أحمد الواسطيّ كذّبه يحيى، وضعفه النسائيّ.
6 - عن عبد اللَّه بن عمرو، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يطلع اللَّه عز وجل إلى خلقه ليلة النّصف من شعبان، فيغفر لعباده إلّا الاثنين: مشاحن، وقاتل نفس".
رواه الإمام أحمد (6647) عن حسن، حدّثنا ابن لهيعة، حدّثنا حُييّ بن عبد اللَّه، عن أبي عبد الرحمن الحُبليّ، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.
وفي الإسناد ابنُ لهيعة وفيه كلام معروف، وشيخه حييُّ بن عبد اللَّه، قال فيه الإمام أحمد: أحاديثه مناكير، وقال البخاريّ: فيه نظر، وقال النسائي: ليس بالقويّ، ومشّاه ابن معين، وابن عدي، وابن حبان، ولذا حسّنتُ حديثه في الشّواهد إذا روى عنه غير ابن لهيعة.
7 - وعن أبي هريرة قال: قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا كان ليلة النّصف من شعبان يغفر اللَّه لعباده إلّا لمشرك أو مشاحن".
رواه البزّار -كشف الأستار (2046) - عن أبي غسّان روح بن حاتم، ثنا عبد اللَّه بن غالب، ثنا هشام بن عبد الرحمن، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال البزّار:"لا يتابع هشام على هذا، ولم يرو عنه إلّا عبد اللَّه بن غالب، وابن غالب ليس به بأس". انتهى.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (8/ 65):"رواه البزّار، وفيه هشام بن عبد الرحمن، ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات".
وأخرجه ابن الجوزيّ في"العلل المتناهية" (2/ 560) من هذا الوجه.
8 - وعن عوف بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يطلع اللَّه تبارك وتعالى على خلقه ليلة النّصف من شعبان، فيغفر لهم كلهم إلّا لمشرك أو لمشاحن".
رواه البزار -كشف الأستار (2048) - عن أحمد بن منصور، ثنا أبو صالح الحرّانيّ -يعني عبد الغفار بن داود-، ثنا عبد اللَّه بن لهيعة، عن عبد الرحمن بن زياد بن أنعم، عن عبادة بن نسي، عن كثير بن مرة، عن عوف بن مالك، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 65):"رواه البزار، وفيه عبد الرحمن بن زياد بن أنعم، وثّقه أحمد بن صالح، وضعّفه جمهور الأئمّة، وابن لهيعة ليّن، وبقية رجاله ثقات". انتهى.
وقال أبو محمد الجوهريّ في"المجلس السابع":"إسناده ضعيف". نقله الشيخ الألبانيّ في"الصحيحة" (3/ 137).
9 - وعن عليّ بن أبي طالب، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا كانت ليلةُ النّصف من شعبان، فقوموا ليلها وصوموا نهارها، فإنّ اللَّه ينزل فيها لغروب الشّمس إلى سماء الدنيا فيقول: ألا من مستغفر لي فأغفر له، ألا مسترزق فأرزقه، ألا مبتلى فأعافيه، ألا كذا، ألا كذا حتى يطلع الفجر".
رواه ابن ماجه (1388) عن الحسن بن علي الخلّال، قال: حدثنا عبد الرزّاق، قال: أنبأنا ابن أبي سبرة، عن إبراهيم بن محمد، عن معاوية بن عبد اللَّه بن جعفر، عن أبيه، عن عليّ بن أبي طالب، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه البيهقيّ في"فضائل الأوقات" (24).
وفي الإسناد ابن أبي سبرة وهو: أبو بكر بن عبد اللَّه بن محمد بن أبي سبرة. قال فيه أحمد: يضع الحديث ويكذب. وقال ابن عدي: عامة ما يرويه غير محفوظ، وهو في جملة من يضع الحديث. وقال ابن حبان: كان ممن يروي الموضوعات عن الأثبات، لا يحلّ كتابة حديثه، ولا الاحتجاج به بحال.
10 - عن ابن كردوس، عن أبيه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أحيى ليلتي العيد، وليلة النصف من شعبان لم يمت قلبه يوم تموت فيه القلوب".
رواه ابن الجوزيّ في"العلل المتناهية" (2/ 71) من طريق عيسي بن إبراهيم القرشيّ، عن سلمة بن سليمان الجزريّ، عن مروان بن سالم، عن ابن كردوس، فذكره.
قال ابن الجوزيّ:"هذا حديث لا يصح عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وفيه آفات. أما مروان بن سالم فقال أحمد: ليس بثقة، وقال النسائيّ والدّارقطني والأزديّ: متروك. وأما سلمة بن سليمان فقال الأزدي: هو ضعيف، وأما عيسى فقال يحيى: ليس بشيء". انتهى.
وفيه أيضًا عن أبي أمامة الباهليّ، وعقبة بن عامر ولا يصح.
وخلاصة القول: إنّه لا يوجد في نزول اللَّه تبارك وتعالى في ليلة النّصف من شعبان وفضله حديث يعتمد عليه. ولكن ورود هذه الأحاديث الكثيرة في نزول اللَّه تبارك وتعالى في ليلة النصف من شعبان يدل على أن له أصلًا. وقد ثبت في الأحاديث الصحيحة نزول تبارك وتعالى كل ليلة، وليلة النصف من شعبان داخل فيها.
وأما إحياء ليلة النصف من شعبان، وإقامة مجالس الذكر والدعاء، وتقسيم الأطعمة على الفقراء والمساكين وغيرها من أنواع العبادات فلم يرِدُ فيها شيءٌ.
قال العقيليّ في"الضعفاء" (3/ 29):"وفي النزول في ليلة النصف من شعبان أحاديث فيها لين، والرواية في النزول في كل ليلة أحاديث ثابتة صحاح، فليلة النصف من شعبان داخلة فيها إن شاء اللَّه".
وقال القاسميّ في كتابه"إصلاح المساجد":"ونقل عن أهل التعديل والتجريح قولهم: إنه ليس في فضل ليلة النصف من شعبان حديث صحيح".
وقد سئل سماحة الشّيخ ابن باز رحمه الله عن ليلة النّصف من شعبان فأجاب بأن الأحاديث الواردة في ليلة النصف من شعبان كلّها ضعيفة، وأن إحياء هذه اللّيلة بدعة، لم يثبت عن النبيّ صلى الله عليه وسلم ولا عن أحد من الصّحابة إحياء ليلة النصف من شعبان، إنّما روي عن بعض أهل الشّام أنّهم كانوا يجتمعون ليلة النصف من شعبان لإحيائها، وهي كلّها مردودة لقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كلّ عمل ليس عليه أمرنا فهو مردود" وأطال رحمه اللَّه تعالى في بيان بدعة إحياء هذه اللّيلة. انظر: مجموع فتاوى ابن باز (1/ 186 - 192).
وهل العرش يخلو من نزوله سبحانه وتعالى أم لا؟
فقول جمهور أهل الحديث أنه لا يخلو.
قال شيخ الإسلام ابن تيمية:"وهو المأثور عن الأئمّة المعروفين بالسنة".
وقال:"ولم ينقل عن أحد منهم بإسناد صحيح ولا ضعيف أن العرش يخلو منه، وما ذكره عبد الرحمن (أي ابن محمد بن إسحاق بن منده الأصبهانيّ المتوفى سنة (470 هـ) من تضعيف الرواية عن إسحاق، فقد ذكرنا الرواية الأخرى الثابتة التي رواها ابن بطّة وغيره. وذكرنا أيضًا
اللّفظ الثابت عن سليمان بن حرب عن حماد بن زيد، رواه الخلال وغيره. وأمّا رسالة أحمد بن حنبل إلى مسدّد بن مسرهد فهي مشهورة عند أهل الحديث والسنة من أصحاب أحمد وغيرهم، تلقوها بالقبول، وقد ذكرها أبو عبد اللَّه بن بطّة في كتاب"الإبانة" واعتمد عليها غير واحد كالقاضي أبي يعلى، وكتبها بخطّه". انظر: شرح حديث النزول (ص 201).
وقد احتجّ إسحاق بن راهويه على بعض الجهمية بحضرة الأمير عبد اللَّه بن طاهر أمير خراسان، فسئل عن حديث النزول أصحيح هو؟ فقال: نعم، فقال له بعض قوُّاد عبد اللَّه: يا أبا يعقوب، أتزعم أن اللَّه ينزل كلّ ليلة؟ ! قال: نعم. قال: كيف ينزل؟ قال: أثبتْه فوق حتى أصف لك النزول. فقال له الرجل: أثبتُه فوق. فقال له إسحاق: قال اللَّه تعالى: {وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا} [سورة الفجر: 22]. فقال الأمير عبد اللَّه بن طاهر: يا أبا يعقوب، هذا يوم القيامة. فقال إسحاق: أعزّ اللَّه الأمير، ومن يجيء يوم القيامة من يمنعه اليوم؟ !". شرح حديث النزول (ص 149).
وقال الخلال في كتاب"السنة" حدثنا جعفر بن محمد الفريابيّ، ثنا أحمد بن محمد المقدميّ، ثنا سليمان بن حرب، قال: سأل بشر بن السّري حماد بن زيد فقال: يا أبا إسماعيل، الحديث الذي جاء:"ينزل ربُّنا إلى سماء الدنيا" يتحوّل من مكان إلى مكان؟ فسكت حمّاد بن زيد ثم قال:"وهو في مكانه يقرب من خلقه كيف شاء". شرح حديث النزول (ص
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন রাতের শেষ তৃতীয়াংশ বাকি থাকে, আল্লাহ তা‘আলা নিকটবর্তী আসমানে অবতরণ করেন, অতঃপর আকাশের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়, অতঃপর তিনি তাঁর হাত প্রসারিত করে বলেন: এমন কোনো প্রার্থী আছে কি যাকে তার কাঙ্ক্ষিত জিনিস দেওয়া হবে? ফজর উদিত না হওয়া পর্যন্ত তিনি এভাবেই থাকেন।
299 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فيأتيهم اللَّه في غير الصورة التي يعرفون، فيقول: أنا ربكم، فيقولون: نعوذ باللَّه منك، هذا مكاننا حتى يأتينا ربنا، فإذا أتانا ربنا عرفناه، فيأتيهم اللَّه في الصورة التي يعرفون".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7437) ومسلم في الإيمان (182) كلاهما من حديث إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي هريرة، فذكره في حديث طويل، انظر: باب الصراط جسر جهنم في جموع أبواب اليوم الآخر.
انظر بقية الأحاديث في باب رؤية النبي صلى الله عليه وسلم ربه في المنام.
وقال تعالى: {وَالَّذِينَ صَبَرُوا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِمْ} [سورة الرعد: 22].
وقال تعالى: {يُرِيدُونَ وَجْهَهُ} [سورة الكهف: 28].
وقال تعالى: {إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِ الْأَعْلَى} [سورة الليل: 20].
وغيرها من الآيات البيّنات.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তখন আল্লাহ তাদের কাছে এমন রূপে আসবেন যা তারা চেনে না। তিনি বলবেন, ‘আমি তোমাদের রব।’ তারা বলবে, ‘আমরা তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। এটা আমাদের জায়গা, যতক্ষণ না আমাদের রব আমাদের কাছে আসেন। যখন আমাদের রব আসবেন, তখন আমরা তাঁকে চিনতে পারব।’ তখন আল্লাহ তাদের কাছে সেই রূপে আসবেন যা তারা চেনে।"
300 - عن سعد بن أبي وقاص أنه قال: جاءني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعودني عام حجّة الوداع من وَجَع اشتدّ بي. فقلتُ: يا رسول اللَّه، قد بلغ بي من الوجع ما ترى، وأنا ذو مال ولا يرثني إلا ابنةٌ لي، أفأتصدّق بثلثي مالي؟ قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا". فقلت: فالشّطر؟ قال:"لا". ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الثلث، والثلث كثير، إنّك إنْ تذرْ ورثتك أغنياء خير من أن تذرهم عالةً يتكفّفون النّاس، وإنّك لن تنفق نفقةً تبتغي بها وجه اللَّه إلّا أُجرت حتى ما تجعل في في امرأتك".
متفق عليه: رواه مالك في الوصية (4) عن ابن شهاب، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه، فذكر الحديث بطوله، وسيأتي في موضعه.
ورواه البخاريّ في الجنائز (1295) عن عبد اللَّه بن يوسف، عن مالك بإسناده، ورواه مسلم في الوصية (1628) من وجه آخر عن إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب بإسناده، مثله.
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিদায় হজ্জের বছর আমি তীব্র অসুস্থতায় ভুগছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এলেন। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার অসুস্থতা তো আপনি দেখতেই পাচ্ছেন। আমি অনেক সম্পদের মালিক, আর আমার কেবল একটিই কন্যা উত্তরাধিকারী হিসেবে আছে। আমি কি আমার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ সদকা করে দেব? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "না।" আমি বললাম, তাহলে কি অর্ধেক? তিনি বললেন, "না।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এক-তৃতীয়াংশ। আর এক-তৃতীয়াংশও অনেক। তুমি তোমার উত্তরাধিকারীদেরকে ধনী অবস্থায় রেখে গেলে, তা তাদেরকে অভাবগ্রস্ত অবস্থায় রেখে যাওয়ার চেয়ে উত্তম—যখন তারা মানুষের কাছে হাত পাতবে। আর তুমি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে যে কোনো খরচ করবে, তার বিনিময়ে তোমাকে প্রতিদান দেওয়া হবে; এমনকি তোমার স্ত্রীর মুখে যা তুলে দাও তার জন্যও।"