হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2821)


2821 - عن عبد الرحمن بن أبي ليلى يقول: ما حدثنا أحدٌ رأى النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضُّحى غير أمِّ هانئ، فإنَّها قالت: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيتها يوم فتح مكة، فاغتسل، وصلَّى ثماني ركعات، فلم أر صلاة قط أخفَّ منها، غير أنَّه يُتم الركوع والسجود.

متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب التهجد (1176)، ومسلم في صلاة المسافرين (336/ 80) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا عمرو بن مُرَّة، قال: سمعت عبد الرحمن بن أبي ليلى فذكره.

ورواه مالك في كتاب قصر الصلاة (28) عن أبي النضر مولي عمر بن عبيد الله، أنَّ أبا مُرَّة مولي عقيل بن أبي طالب أخبره، أنَّه سمع أمَّ هانئ بنت أبي طالب تقول: ذهبتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الفتح، فوجدتُه يغتسل، وفاطمة ابنتُه تستره بثوبٍ، قالت: فسلمتُ عليه. فقال:"من هذه؟" فقلتُ: أم هانئ بنت أبي طالب. فقال: مرحبا بأمِّ هانيء" فلمَّا فرغ من غسله، قام فصلَّى ثماني ركعات، ملتحفًا في ثوب واحد، ثم انصرف. فقلت: يا رسول الله! زعم ابنُ أمِّي عليٌّ أنَّه قاتلٌ رجلًا أجرتُه: فلانُ بن هُبَيرة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أجَرْنا من أجَرْتِ يا أمَّ هانئ" قالت أم هانيء: وذلك ضُحىً.

ورواه البخاري في كتاب الصلاة (357)، ومسلم في صلاة المسافرين (336/ 82) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه أبو داود (1290) من وجه آخر عن أمِّ هانئ أنِّ النبي صلى الله عليه وسلم يوم الفتح صلَّي سُبْحةَ الضُّحي ثمان ركعات يُسلِّم من كلِّ ركعتين. وإسناده صحيح.

وقولها:"ذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم" أي إلى بيتها؛ فإن النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيتها وهي خارجة منه، فدخلت والنبي صلى الله عليه وسلم يغتسل، وفاطمة تستره.

وهذه صلاة الفتح، ولذا لم يُر أن النبي صلى الله عليه وسلم صلاها بعد ذلك، ولكنْ صادف أنه صلاها في وقت الضحى فاشتهرت بصلاة الضحى.

وقد ثبت عن بعض الصحابة أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يصلّ صلاة الضحى قط كما سيأتي في باب من لم ير سنية صلاة الضحى أصلا.




উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল রহমান ইবনু আবি লায়লা বলেন: উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কেউ আমাদেরকে এমন কোনো হাদীস বর্ণনা করেননি যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করতে দেখেছেন। কারণ তিনি বলেছেন: মক্কা বিজয়ের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (উম্মে হানির) ঘরে প্রবেশ করলেন, অতঃপর গোসল করলেন এবং আট রাকআত সালাত আদায় করলেন। আমি এর চেয়ে হালকা সালাত আর কখনও দেখিনি, তবে তিনি পূর্ণাঙ্গভাবে রুকূ ও সিজদা সম্পন্ন করেছিলেন।

অন্য বর্ণনায় উম্মে হানি বিনত আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। আমি তাঁকে দেখলাম যে তিনি গোসল করছেন এবং তাঁর কন্যা ফাতেমা তাঁকে একটি কাপড় দিয়ে আড়াল করে রেখেছেন। তিনি বলেন: আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "এ কে?" আমি বললাম: আমি উম্মে হানি বিনত আবি তালিব। তিনি বললেন: "উম্মে হানি! তোমাকে স্বাগতম।" যখন তিনি গোসল শেষ করলেন, তখন উঠে দাঁড়ালেন এবং একটি মাত্র কাপড়ে আবৃত অবস্থায় আট রাকআত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার আপন ভাই আলী ধারণা করে যে, আমি যাকে আশ্রয় দিয়েছি, সে হচ্ছে হুবাইরার পুত্র অমুক—তাকে সে হত্যা করবে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উম্মে হানি! তুমি যাকে আশ্রয় দিয়েছ, আমরাও তাকে আশ্রয় দিলাম।" উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর এটা ছিল চাশতের সময় (দুহার ওয়াক্ত)।

(অন্য এক সূত্রে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিজয়ের দিন দুহার সালাত আট রাকআত আদায় করলেন এবং তিনি প্রতি দুই রাকআত পরপর সালাম ফিরাতেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (2822)


2822 - عن أنس بن سيرين قال: سمعتُ أنسًا يقول: قال رجل من الأنصار: إنِّي لا أستطيع الصلاة معك -وكان رجلًا ضخمًا- فصنع للنبي صلى الله عليه وسلم طعامًا فدعاه إلى
منزله، فبسط له حصيرًا، ونَضَحَ طرف الحصير فصلَّي عليه ركعتين. فقال رجل من آل الجارود لأنس: أكان النبي صلى الله عليه وسلم يصلِّي الضُحى؟ قال: ما رأيتُه صلَّاها إلا يوَمئِذٍ.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (670) عن آدم، وفي التهجد (1179) عن علي بن الجعد، كلاهما عن شعبة قال: حدثنا أنس بن سيرين، فذكره.

ورواه ابن ماجة (756)، وابن حبان (5295) فأدخلا بين أنس بن سيرين وأنس بن مالك:"عبد الحميد بن المنذر بن الجارود".

فقال الحافظ في"الفتح" (2/ 158):"اقتضى ذلك أن في رواية البخاري انقطاعًا، وهو مندفع بتصريح أنس بن سيرين بسماعه عن أنس، فحينئذ رواية ابن ماجة إما من المزيد في متَّصِلِ الأسانيد، وإمَّا أن يكون فيها وهم لكون ابن الجارود كان حاضرًا عند أنس لما حدَّث بهذا الحديث، وسأله عما سأله من ذلك، فظنَّ بعض الرواة أنَّ له فيه رواية" انتهى.

تنبيه: وقع في كلام الحافظ في قوله قبل هذا: وذلك أن البخاري أخرج هذا الحديث من رواية شعبة (كما سبق) وأخرجه في موضع آخر من رواية خالد الحذاء (وهو في كتاب الأدب 6080) كلاهما عن أنس بن سيرين،"عن عبد الحميد بن المنذر بن الجارود، عن أنس".

فقوله:"عن عبد الحميد بن المنذر" خطأ من الناسخ؛ لأنه لو ثبت في رواية البخاري الثانية ذكر"عبد الحميد بن المنذر" لما كان للحافظ التعقب عليه، ثم بعد الرجوع إلى رواية خالد الحذاء تبين أنه لا يوجد فيه ذكر"عبد الحميد بن المنذر" في الإسناد، فتنبه.

وقوله: رجل من الأنصار هو: عتبان بن مالك الأنصاري، لأن قصته شبيهة بقصته كما مضتْ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসারী ব্যক্তি বললেন, আমি আপনার সাথে (জামাতে) সালাত আদায় করতে পারি না -আর তিনি ছিলেন একজন স্থূলকায় মানুষ-। তাই তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য খাবার তৈরি করলেন এবং তাঁকে তাঁর বাড়িতে দাওয়াত করলেন। এরপর তাঁর জন্য একটি মাদুর বিছিয়ে দিলেন এবং মাদুরের এক প্রান্তে পানি ছিটিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন। এরপর আল-জারূদ গোত্রের একজন লোক আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করল: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি চাশতের (দুহার) সালাত আদায় করতেন? তিনি (আনাস) বললেন: আমি তাঁকে সেদিন ছাড়া আর কখনো তা আদায় করতে দেখিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (2823)


2823 - عن معاذة أنَّها سألت عائشة: كم كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي صلاة الضُّحى؟ قالت: أربع ركعات ويزيد ما شاء.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (719) عن شيان بن فروُّخ، حدّثنا عبد الوارث،

حدثنا يزيد (يعني الرِشْك) حدثتني معاذةُ فذكرت الحديث.

وسيأتي منها قولُها: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي الضحى قط. كما سياتي أنه يُصلي الضُّحي

إذا جاء من مغيبه فالنفي يحمل على عدم المواظبة، والإثبات يحمل على مجيئه من السفر. لأن هذه

الأحاديث كلها صحيحة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুআ'যাহ তাকে জিজ্ঞেস করেছিলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাশতের সালাত (সালাতুদ-দুহা) কত রাকাত পড়তেন? তিনি (আয়িশা) বললেন: চার রাকাত, আর তিনি যা ইচ্ছা বৃদ্ধি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2824)


2824 - عن أبي ذرٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يُصبح على كلِّ سُلامَى من أحدكم صدقةٌ، فكلُّ تسبيحةٍ صدقة، وكلُّ تحميدة صدقةٌ، وكلُّ تهليلةٍ صدقةٌ، وكلُّ تكبيرةٍ صدقةٌ، وأمرٌ بالمعروف صدقة، ونهيٌ عن المنكر صدقةٌ، ويُجزِئُ من ذلك ركعتان يركعهما من الضُّحى".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (720) عن عبد الله بن محمد بن أسماء الضُبَعي، حدثنا مهدي (وهو ابن ميمون) حدثنا واصل مولى أبي عيينة، عن يحيى بن عقيل، عن يحيى بن يُعْمَر، عن أبي الأسود الدُولي، عن أبي ذر فذكره.

ورواه أبو داود (5243) عن أحمد بن منيع، عن عباد بن عباد عن واصل به وفيه من الزيادة:"تسليمُه على من لقي صدقةٌ، وإماطتُة الأذى عن الطريق صدقةٌ، وبُضْعتُه أهلَه صدقة" قالوا: يا رسول الله يأتي شهوةً وتكون له صدقةٌ؟ قال:"أرأيت لو وَضَعها في غير حقها أكان يأثم" قال:"ويُجزئ من ذلك كله ركعتان من الضُّحي" غير أنه لم يذكر بين يحيي بن يعمر وأبي ذر"أبا الأسود الدُولي" وثبت سماع يحيى من أبي ذر وغيره من الصحابة فالظاهر أنه روى الحديث على وجهين.

وقوله:"بالسُّلامَى" أراد به كل عظم ومفصل يعتمد عليه في الحركة. وأصل السلامي: عظم في فِرسن البَعير، ويجمع: السلاميات."شرح السنة" (4/ 142).




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের প্রত্যেকের শরীরের প্রতিটি জোড়ার উপর প্রতিদিন সকালে সাদকা আবশ্যক। প্রতিটি তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলা সাদকা, সৎ কাজের আদেশ করা সাদকা এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করা সাদকা। আর এই সবকিছুর জন্য যথেষ্ট হবে দু’রাকাত সালাত, যা সে চাশতের (দুহা) সময় আদায় করে।"

(অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে): "কারও সঙ্গে সাক্ষাৎ হলে তাঁকে সালাম দেওয়াও সাদকা, রাস্তা থেকে কষ্টদায়ক বস্তু সরানো সাদকা এবং তার স্ত্রীর সাথে সহবাস করাও সাদকা।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সে তো তার কামনা চরিতার্থ করে, তা কি তার জন্য সাদকা হবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কি মনে করো না যে, যদি সে তা হারাম/অন্যায় পথে ব্যয় করত, তবে কি তার গুনাহ হতো? আর এই সবকিছুর জন্য যথেষ্ট হবে চাশতের দু'রাকাত সালাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2825)


2825 - عن أبي ذر قال: أوصاني حبيبي صلى الله عليه وسلم بثلاثة لا أدعُهن إن شاء الله تعالى أبدًا.

أوصاني بصلاة الضُّحى، وبالوتر قبل النوم، وبصيام ثلاثة أيام من كل شهر.

صحيح: رواه النسائي (2404) عن علي بن حجر، قال: حدثنا إسماعيل، حدثنا محمد بن أبي حرملة، عن عطاء بن يسار، عن أبي ذرٍّ فذكره.

إسناده صحيحٌ، وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (1083) فرواه عن علي بن حجر السعدي، والإمام أحمد (21518) عن سليمان بن داود الهاشمي، كلاهما عن إسماعيل به مثله.

وإسماعيل هو: ابن جعفر بن أبي كثير الأنصاري الزُّرَقي من رجال الجماعة.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ের উপদেশ দিয়েছেন, যা আমি আল্লাহ্‌র ইচ্ছায় কখনো ছাড়ব না। তিনি আমাকে চাশতের (দুহা) সালাতের, ঘুমানোর পূর্বে বিতর সালাতের এবং প্রতি মাসে তিন দিন সওম (রোযা) পালনের উপদেশ দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2826)


2826 - عن أبي الدرداء وأبي ذر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الله عز وجل أنَّه قال:"ابن آدم اركع لي من أوَّل النهار أربع ركعات أكفِك آخِرَه".

حسن: رواه الترمذي (475) عن أبي جعفر السمناني، حدثنا أبو مُسْهِر، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن جبير بن نفير، عن أبي الدرداء وأبي ذر فذكراه.

وإسناده حسن لأجل إسماعيل بن عياش فإنه صدوق في روايته عن أهل بلده، ويحبر بن سعد من بلده الحمص الشامي، وبقية رجاله ثقات.

قال الترمذي:"حسن غريب".

ورواه الإمام أحمد (27480) من وجه آخر عن أبي المغيرة، قال: حدثنا صفوان، قال: حدثني شُريح بن عبيد الحضرمي وغيره عن أبي الدرداء نحوه.

قال الهيثمي (3410) رواه أحمد ورجاله ثقات.

قلت: وهو كما قال إلَّا أنَّ فيه انقطاعًا، فإن شريح بن عبيد لم يسمع من أبي الدّرداء.




আবূ দারদা ও আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর পক্ষ থেকে বর্ণনা করেন যে, আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "হে আদম সন্তান! তুমি দিনের প্রথমভাগে আমার জন্য চার রাকাত সালাত আদায় করো, আমি তোমার দিনের শেষভাগের জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2827)


2827 - عن أبي الدرداء قال: أوصاني حبيبي بثلاث، لن أدعَهن ما عِشتُ: بصيام ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاةِ الضُّحى، وبأن لا أنامَ حتى أوتر.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (722) عن هارون بن عبد الله ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا ابن أبي فُديك، عن الضّحاك بن عثمان، عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنين، عن أبي مُرة مولى أم هانيء، عن أبي الدرداء فذكره.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমার প্রিয় বন্ধু (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ে উপদেশ দিয়েছেন, আমি যতদিন জীবিত থাকব, ততদিন এগুলো ত্যাগ করব না: প্রতি মাসে তিন দিন সাওম পালন করা, চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় না করে না ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2828)


2828 - عن بريدة يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"في الإنسان ثلاثمائة وستون مفْصلًا، فعليه أن يتصدق عن كل مفْصلٍ منه بصدقةٍ" قالوا: ومن يُطيق ذلك يا نبي الله؟ قال:"النخاعة في المسجد تدفِنُها، والشيء تُنحّيه عن الطريق، فإن لم تجد فركعتا الضُّحي تُجزئك".

حسن: رواه أبو داود (5242) عن أحمد بن محمد المروزي، قال: حدثني علي بن حسين، قال: حدثني أبي، قال: حدثني عبد الله بن بريدة، قال: سمعتُ أبي بريدةَ فذكر الحديث.

وإسناده حسن للكلام في حين وهو: ابن واقد المروزيّ غير أنَّه حسن الحديث.

وقد أخرجه ابن خزيمة (1226)، وابن حبان (1642، 2540) كلاهما من طريق حسين بن واقد به مثله.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মানুষের শরীরে তিনশত ষাটটি গ্রন্থি (বা জোড়) রয়েছে। অতএব, তার উচিত সেগুলোর প্রত্যেকটির পক্ষ থেকে একটি করে সাদাকা (দান) করা।" সাহাবাগণ বললেন, "হে আল্লাহর নবী, কে তা করার সামর্থ্য রাখে?" তিনি বললেন, "মসজিদে কফ পুঁতে দেওয়া এবং রাস্তা থেকে কোনো কষ্টদায়ক জিনিস সরিয়ে দেওয়াও (সাদাকা)। আর যদি তুমি তা না পাও, তাহলে দু'রাকাত সালাতুদ-দুহা তোমার জন্য যথেষ্ট হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2829)


2829 - عن عِتبان بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى في بيته سُبْحةَ الضُّحي، فقاموا وراءه فصلّوا بصلاته.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23773) عن عثمان بن عمر، حدثنا يونس، عن الزهري، عن محمود بن الربيع، عن عِتْبان بن مالك فذكره.

ورواه أيضًا (16479) عن يحي بن آدم، قال: حدثنا ابن المبارك، عن معمر، عن الزهري به ولفظه: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم ضُحّي، وسلَّمنا حين سلَّم، وأنه -يعني- صلَّى بهم في مسجدٍ عندهم، وصحّحه ابن خزيمة (1231) ورواه من طريق عثمان بن عمر به مثله.

وأصل حديث عِتبان عند مالك في قصر الصلاة (86) عن ابن شهاب، عن محمود بن الربيعلاالأنصاري أنَّ عِتبان بن مالك كان يؤُم قومه، وهو أعمى، وأنَّه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إنَّها تكون الظُّلمةُ، والمطرُ، والسيلُ، وأنا رجلٌ ضريرُ البصرِ، فصَلِّ يا رسول الله! في بيتي مكانًا اتخذه مُصلًّى، فجاءه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أين تحبُّ أن أصلِّيَ؟ فأشار له إلى مكانٍ من البيت. فصلَّي فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه البخاري في الأذان (667) عن إسماعيل، قال: حدثني مالك به مثله. ورواه هو أيضًا في مواضع منها في الصلاة -المساجد في البيوت- (425) ومنها في الأذان (838، 840).
ومسلم في المساجد (33/ 263) من طرقٍ غير مالك، عن ابن شهاب به مختصرًا ومطوَّلًا.

ورواه البغوي في"شرح السنة" (4/ 136) من طريق عثمان بن عمر، نا يونس، عن الزهري، به ولفظه:"صلَّى في بيته سُبحة الضُّحى، فقاموا وراءه فصلَّوا". وقال:"متفق على صحته".

وفيه نظر، فإن الشيخين لم يخرجا اللفظ الذي ساقه البغوي وحديث يونس عن الزهري رواه البخاري في المغازي (4010) وليس فيه لفظ الضُحى، ولكن ذكره البخاري معلَّقًا وبوَّبه بقوله:

"صلاة الضُّحى في الحضر قاله عِتْبان بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم""الفتح" (3/ 56) وأشار الحافظ إلى رواية الإمام أحمد عن عثمان بن عمر، عن يونس به.




ইৎবান ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘরে চাশতের (দুহা’র) নফল সালাত আদায় করলেন। তখন সাহাবীগণ তাঁর পেছনে দাঁড়ালেন এবং তাঁর অনুসরণ করে সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2830)


2830 - عن أبي هريرة قال: أوصاني خليلي بثلاث، لا أدعهن حتى أموت: صوم ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاة الضُّحى، ونوم على وتر.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1178)، ومسلم في صلاة المسافرين (721) كلاهما من طريق شُعبة، حدثنا عباس الجُريري -وهو ابن فروُّخ- عن أبي عثمان النهدي، عن أبي هريرة فذكره، واللفظ للبخاري.

وفي لفظ مسلم:"وركعتي الضُّحي".

وزاد أحمد (10559)، وابن خزيمة (1223) من طريق سليمان بن أبي سليمان، عن أبي هريرة بعد قوله: وصلاة الضُّحى-"فإنَّها صلاة الأوَّابين".

ولكن سليمان بن أبي سليمان قال فيه الدارقطني: مجهول، ولم يوثقه غير ابن حبان وسيأتي حديث زيد بن أرقم:"صلاة الأوَّابين حين ترمض الفِصال" وهي صلاةُ الضُّحى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার বন্ধু (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ে অসিয়ত করেছেন, যা আমি মৃত্যু পর্যন্ত ছাড়ব না: প্রতি মাসে তিন দিন সওম (রোযা) পালন করা, চাশ্‌তের (দুহা) সালাত (নামায) আদায় করা এবং বিতর নামায পড়ে ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2831)


2831 - عن أبي هريرة قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثًا، فأعظَموا الغنيمةَ وأسرعوا الكرَّة، فقال رجل: يا رسول الله! ما رأينا بعثًا قط أسرع كرَّةٌ، ولا أعظم منه غنيمةً من هذا البعث؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أخبركم بأسرع كرَّةً منه، وأعظم غنيمةً! رجل توضأ في بيته فأحسن وضوءَه، ثم عمد إلى المسجد فصلَّي فيه الغداةَ، ثم عقَّب بصلاة الضَّحْوةِ، فقد أسرع الكرَّة وأعظم الغنيمة".

حسن: رواه أبو يعلي (6528) عن أبي (وهو ابن أبي شيبة) حدثنا حاتم (ابن إسماعيل) عن حُميد بن صَخْرٍ، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235): رجاله رجال الصحيح.

قلت: وهو كما قال إلَّا أنَّ حميد بن صخر وإن كان من رجال مسلم وهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
أبي بكر بن أبي شيبة به مثله.

وأورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 463) وقال كما قال الهيثمي وزاد: والبزار وابن حبان في صحيحه، وبين البزار في روايته أن الرجل أبو بكر رضي الله عنه. انتهى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সামরিক বাহিনী প্রেরণ করলেন। তারা প্রচুর গণীমত অর্জন করল এবং দ্রুত ফিরে এল। তখন এক ব্যক্তি বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা এই অভিযানের চেয়ে দ্রুত প্রত্যাবর্তনকারী বা এর চেয়ে অধিক গণীমত অর্জনকারী কোনো বাহিনী দেখিনি।’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমি কি তোমাদেরকে এর চেয়েও দ্রুত প্রত্যাবর্তনকারী এবং অধিক গণীমত অর্জনকারী বিষয়ে অবহিত করব না? সে হলো এমন ব্যক্তি, যে তার ঘরে উত্তমরূপে উযু করল, অতঃপর মসজিদের দিকে গেল এবং সেখানে ফজরের সালাত আদায় করল, অতঃপর (সূর্যোদয়ের পর) দুহা (চাশত)-এর সালাত আদায় করল। সে-ই দ্রুত প্রত্যাবর্তন করল এবং প্রচুর গণীমত অর্জন করল।”









আল-জামি` আল-কামিল (2832)


2832 - عن نُعيم بن هَمَّار، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يقول الله عز وجل: يا ابنَ آدم لا تُعجزني من أربعِ ركعاتٍ في أوَّل نهارك، أَكْفِك آخره".

حسن: رواه أبو داود (1289) عن داود بن رُشيد، ثنا الوليد، عن سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن كثير بن مُرَّة، عن نُعيم بن هَمَّار فذكره.

إسناده صحيح ورجاله ثقات غير أن الوليد بن مسلم كان يدلس تدليس التسوية، وقد صرَّح بالتحديث في رواية الإمام أحمد (22470) فإنه رواه عن الوليد بن مسلم قال: حدثنا سعيد، يعني ابن عبد العزيز إلَّا أنَّه سقط من السند"كثير بن مُرَّة" بين مكحول ونُعيم بن هَمَّار.

ولم أجد من نَصَّ على سماع مكحول من نُعَيم بن هَمَّار، وقد ثبت ذكر كثير بن مُرَّة في الأسانيد الأخرى، منها ما رواه الإمام أحمد (22475) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، حدثنا محمد بن راشد الدمشقي، حدثنا مكحول، عن كثير بن مرة الحضرمي، عن نعيم بن هَمَّار فذكر الحديث. وهذا الإسناد رجاله ثقات غير محمد بن راشد الدمشقي فهو صدوق.

كما رواه أيضًا الإمام أحمد بأسانيد أخرى بذكر كثير بن مُرَّة، وكذا رواه أيضًا ابن حبان (2533) من وجه آخر عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن كثير بن مُرَّة، عن قيس الجُذامي، عن نُعَيم بن همَّار، فأدخل بين كثير بن مُرَّة ونُعَيم"قيس الجذامي".

ورواه أيضًا ابن حبان (2534) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم، ثنا الوليد بن سليمان بن أبي السائب، عن بسر بن عبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن نعيم بن همار الغطفاني فذكره. وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات، وقد صرَّح الوليد بن مسلم بالتحديث.

وأمَّا ما رواه أحمد (22473) عن أبي مُرَّة الطائفي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مثله فجعل بعض أهل العلم اعتمادًا على هذه الرواية بأنَّ أبا مُرَّة من الصحابة، ولذا افرده الهيثمي في"المجمع" (2/ 236) وقال: رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح، ولم يجزم بصحبته الحافظ في"التقريب" فقال في ترجمة"أبي مرة" شيخ لمكحول، يقال: له صحبة، وقيل: الصواب: أنه كثير بن مُرَّة. انتهى.

قلت: هذا الأخير هو أقرب إلى الصّواب.

لأن الإمام أحمد رواه عن يحيى بن إسحاق، قال: أخبرني سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن أبي مرة الطائفي قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. وسبق أن رواه عن الوليد بن مسلم، حدثنا سعيد -يعني ابن عبد العزيز- حدثنا مكحول، عن نعيم بن همار (22470).

قال المزي في"التحفة" (9/ 288) بعد أن عزا حديث أبي مُرَّة إلى النسائي في الكبري:
المحفوظ حديث سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن نعيم بن همار، وقيل: عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن قيس الجذامي، عن نعيم بن همار" انتهى.

وكثير بن مُرَّة الحضرميّ الحمصيّ من الثانية، قال الحافظ في التقريب: ووهم من عدّه من الصحابة. وهو ثقة. انتهى.




নুআইম ইবনু হাম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেন, 'হে আদম সন্তান! দিনের শুরুতে (পূর্বাহ্নে) আমার জন্য তুমি চার রাকাত নামায আদায় করতে অপারগ হয়ো না, [যদি তা করো] তাহলে আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত সকল কাজের জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।'"









আল-জামি` আল-কামিল (2833)


2833 - عن عقبة بن عامر الجُهني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله يقول: يا ابن آدم! اكفني أوَّل النهار بأربع ركعاتٍ، أكفِك بهنَّ آخرَ يومِك".

صحيح: رواه الإمام أحمد (17390)، وأبو يعلى (1757) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، حدثنا أبان بن يزيد العَطَّار، عن قتادة، عن نُعيم بن هَمَّار، عن عقبة بن عامر فذكره.

وإسناده صحيح، وقتادة وإن كان مدلَّسًا فقد صرَّح بالتحديث عند الإمام أحمد في رواية أخرى (17794) رواه عن عفَّان، قال: أخبرنا أبان، قال: حدثنا قتادة، قال: حدثنا نعيم بن همار به مثله.

ونعيم بن همار وعقبة بن عامر كلاهما صحابيان فصحَّ الحديث من وجهين، ولا يُعل أحدُهما الآخر.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رواه أحمد وأبو يعلى ورجاله رجال ثقات".




উকবাহ ইবনু আমির আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বলেন: হে আদম সন্তান! দিনের শুরুতে আমার জন্য চারটি রাকআত যথেষ্ট করো (আদায় করো); এর বিনিময়ে আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত তোমার জন্য যথেষ্ট হয়ে যাব।"









আল-জামি` আল-কামিল (2834)


2834 - عن النوَّاس بن سمعان قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"قال الله عز وجل: ابن آدم، لا تعجزنَّ من أربع ركعات في أوَّل النهار، أكْفِك آخِرَه".

صحيح: قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 236): رواه الطبراني في الكبير ورجاله ثقات". إلا أني لم أقف على إسناده، وهذا الحكم مبني على قول الهيثمي، ثم وقفت على كلام العيني في عمدة القاري (7/ 147) فقال: حديث النواس بن سمعان عند الطبراني في الكبير من رواية أبي إدريس الخولاني، قال: سمعت النواس بن سمعان، فذكر الحديث، وقال:"إسناده صحيح".




নাওয়াস বিন সামআন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “আল্লাহ তাআলা বলেন: হে আদম সন্তান, তুমি দিনের শুরুতে চার রাকাত (নামায) আদায়ে অলসতা করো না, আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত তোমার জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।”









আল-জামি` আল-কামিল (2835)


2835 - عن أبي أمامة قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من خرج من بيته متطهَّرًا إلى صلاة مكتوبة فأجره كأجر الحاج المحرم، ومن خرج إلى تسبيح الضُّحى لا ينصبه إلَّا إيَّاه فأجره كأجر المعتمر، وصلاة إِثرَ صلاة لا لغو بينهما كتاب في عليَّين".

حسن: رواه أبو داود (558) وأحمد (22304) كلاهما من طريق يحيى بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره. واللفظ لأبي داود.

وإسناده حسن لأجل الكلام في القاسم وهو: ابن عبد الرحمن الشامي الدمشقي مختلف فيه، وثقه ابن معين والعجلي والترمذي وغيرهم، وضعَّفه البعض بأنَّ عِنده مناكير، وقد قيل: إنَّ المناكير عمَّن رواه عنه من الضعفاء، وأما الثقات فلا، والخلاصة فيه أنَّه حسن الإسناد إذا لم يرو ما يُنْكَر عليه.




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ফরয সালাতের জন্য নিজ ঘর থেকে পবিত্রতা অর্জন করে বের হয়, তার সওয়াব মুহরিম হাজী ব্যক্তির সওয়াবের মতো। আর যে ব্যক্তি কেবল সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায়ের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং অন্য কোনো উদ্দেশ্য তাকে প্রেরণা না যোগায়, তার সওয়াব উমরাহকারীর সওয়াবের মতো। আর এক সালাতের পর আরেক সালাত—যার মাঝে কোনো অনর্থক কথা নেই—তা 'ইল্লিয়্যীনে' লিপিবদ্ধ হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2836)


2836 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سَريَّةً، فغَنِموا، وأسْرَعوا الرجْعَة، فتحدَّث الناس بقُرْبِ مغْزاهم، وكثرة غَنيمتِهم، وسرعة رَجْعتِهم،
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أدلُّكم على أقرب منه مغزىّ، وأكثرَ غَنيمةً، وأوشك رجْعَةً؟ من توضَّأ ثمَّ غدا إلى المسجد لسُبحةِ الضُّحى، فهو أقربُ مغرّى، وأكثرُ غَنيمَةً، وأوشك رَجْعَةً".

حسن: رواه الإمام أحمد (6638) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حُدثني حُييُّ بن عبد الله، أن أبا عبد الرحمن الحُبُلي حدَّثه، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وإسناده حسن فإنَّ حييَّ بن عبد الله مختلف فيه، وخلاصة القول فيه كما قال ابن عدي: أرجو أنَّه لا بأس به إذا روى عنه ثقة.

وابن لهيعة فيه كلام معروف، إلَّا أنَّه توبع؛ فقد رواه الطبراني في"الكبير" (100 - قطعة من الجزء 13 - 14) من وجه آخر عن ابن وهب، حدّثني حيي، بإسناده مثله.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رواه أحمد والطبراني في الكبير، وفيه ابن لهيعة وفيه كلام، ورجال الطبراني ثقات، لأنه جعل بدل ابن لهيعة ابن وهب".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 463):"رواه أحمد من رواية ابن لهيعة، والطبراني بإسناد جيد".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ছোট সামরিক দল (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন। তারা গণীমত লাভ করল এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তন করল। তখন লোকেরা তাদের অভিযানের নৈকট্য, গণীমতের প্রাচুর্য এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের বিষয়ে আলোচনা করতে লাগল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে এমন একটি অভিযানের সন্ধান দেব না যা এর চেয়েও বেশি নিকটে, অধিক গণীমতপূর্ণ এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের অধিকারী? যে ব্যক্তি উযু করে, অতঃপর সালাতুদ্-দুহার (চাশতের) সালাত আদায়ের জন্য মসজিদের দিকে যায়, তবে এটি হলো সবচেয়ে নিকটে অভিযান, অধিক গণীমতপূর্ণ এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের অধিকারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (2837)


2837 - عن علي قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلَّي من الضَّحى.

حسن: رواه الإمام أحمد (682) عن سليمان بن داود، أخبرنا شعبةُ، عن أبي إسحاق، سمع عاصم بن ضمْرة، عن علي فذكره.

وسليمان بن داود هو: ابن الجارود أبو داود الطيالسي صاحب المسند (ت 204) والحديث في مسنده (129) من هذا الوجه وعنه رواه النسائي في الكبري (471).

ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1232) عن محمد بن عبد الله المخرَّمي، ثنا أبو عامر، عن شعبة به مثله. قال المخرَّمي: هكذا حدثنا به مختصرًا.

قلت: هذا حديث مختصر من حديث طويل، انظر: تطوع النبي صلى الله عليه وسلم في النهار، جموع أبواب النوافل التابعة للفرائض وفيه: إذا كان الشمس من هاهنا كهيئتها من هاهنا عند العصر صلى ركعتين. فهذه صلاة الضُّحى قاله ابن خزيمة.

وإسناده حسن لأجل عاصم بن ضمْرة.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رجال أحمد ثقات".

وأما ما رُوي عن أبي أمامة، وعتبة بن عبد الله السلمي حدثاه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من صلى صلاة الصبح في جماعة، ثم ثبت في المسجد يسبح الله سبحة الضُّحى كان له كأجر حاج ومعتمر، تامًّا له حجته وعمرته" فهو ضعيف.
رواه الطبراني في الكبير (8/ 174، 180، 181) (17/ 129) من طرق عن الأحوص بن حكيم، عن عبد الله بن عامر، عن أبي أمامة وعتبة، وفي بعض طرقه عن أبي أمامة وحده.

قال الهيثمي في"المجمع" (10/ 104): وفيه الأحوص بن حكيم وثقه العجلي وغيره، وضعَّفه جماعة، وبقية رجاله ثقات. وفي بعضهم خلاف".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 296):"رواه الطبراني وإسناده جيد".

قلت: ليس إسناده بجيد، فإنَّ الأحوصّ بنَ حكيم تكلَّم فيه أهل العلم، فقال ابن معين: ليس بشيء، وقال السعدي: ليس بالقوي في الحديث، وقال النسائي: ضعيف.

وفي التقريب: أطلق الحافظ عليه كلمة:"ضعيف الحفظ".

وكذلك ما رُوي عن معاذ بن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قعد في مصلاه حين ينصرف من صلاة الصبح حتى يُسبّح ركعتي الضُّحى، لا يقول إلَّا خيرًا، غُفِر له خطاياه، وإن كانت أكثر من زبد البحر".

رواه أبو داود (1287) عن محمد بن سلمة المرادي، حدثنا ابن وهب، عن يحيى بن أيوب، عن زبَّان بن فائد، عن سهل بن معاذ بن أنس الجهني، عن أبيه فذكر الحديث.

وإسناده ضعيف فإن زبان بن فائد -بالفاء- البصري قال فيه ابن معين: شيخ ضعيف، وقال الإمام أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن حبان: منكر الحديث جدَّا. وأطلق عليه حافظ كلمة"ضيف الحديث".

وكذلك ما رُوي عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لأن أذكر الله تعالى من طلوع الشمس أكبِّر وأهللُ وأسبح، أحبُّ إلي من أن أُعتق أربعًا من ولد إسماعيل، ولأن أذكر الله من صلاة العصر إلى أن تغيب الشمسُ أحبُّ إلي من أن أعتق كذا وكذا من وَلَد إسماعيل".

رواه أحمد (22185)، والطبراني في"الكبير" (8028) وفي"الدعاء" (1882) في الجميع من طريق سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي طالب الضُبعي، عن أبي أمامة فذكره.

وعلي بن زيد - هو ابن جدعان ضعيف.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2838)


2838 - عن عائشة أنها قالت: ما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي سُبحةَ الضُّحى قط، وإني لأُسَبِّحُها، وإن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليدعُ العملَ، وهو يُحبُّ أن يعملَه خشية أن يعمل به الناسُ فيُفرضَ عليهم.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (29) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة

فذكرت مثله.

رواه البخاري في التهجد (1128) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (718) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

ثم روى مالك عن زيد بن أسلم، عن عائشة: أنها كانت تُصلي الضُّحي ثماني ركعات، ثم تقول: لو نُشر لي أبوايَّ ما تركتُهن.

وفيه انقطاع، لأن زيد بن أسلم لم يسمع من عائشة.

ورواه النسائي في"الكبرى" (484) بشيء من التفصيل من طريق عاصم بن عمر بن قتادة، عن جدته رُميثة قالت: أصبحتُ عند عائشة، فلمَّا أصبحنا، قامت فاغتسلت، ثم دخلت بيتًا لها، فأجافتِ البابَ، قلت: يا أم المؤمنين! ما أصبحتُ عندكِ إلَّا لهذه الساعة، قالت: فادخلي، قالت: فدخلتُ. فقامت، فصلَّتْ ثماني ركعات، لا أدري أقيامهنَّ أطولُ أم ركوعهنَّ، أم سجودهنَّ؟ ثم التفَتتْ إلىَّ فضربتْ فخذيّ، فقالت: يا رْميثةُ! رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصليها، ولو نُشر لي أبوايَّ على تركها ما تركتُها.

ورواه الإمام أحمد (25078) مختصرًا عن وكيع، حدثنا أبي، عن سعيد بن مسروق، عن أبان ابن صالح، عن أم حكيم، عن عائشة فذكرت باختصار.

وأم حكيم هي: رميثة الصحابية جدة عاصم بن عمر. قال المزي: قيل: إنها رميثة بنت حكيم.

قلت: وقيل غير ذلك.

وفي إسناد الإمام أحمد والد وكيع وهو: الجراح بن مُليح مختلف فيه.

قال الحافظ في التقريب:"صدوق يهم".

وقول عائشة:"ما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُصلى سبحة الضُّحى قط" لعلها قصدت عدم مداومته، وإلا فقد ثبت في الأحاديث الصحيحة أنه صلى الله عليه وسلم صلَّاها إلَّا انَّه لم يُداوم عليها خشيةَ أن تُفرضَ.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কখনও দুহার (চাশতের) সালাত আদায় করতে দেখিনি। কিন্তু আমি অবশ্যই তা আদায় করি। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো আমলকে পছন্দ করা সত্ত্বেও তা ছেড়ে দিতেন, এই আশঙ্কায় যে, লোকেরা যদি তা নিয়মিত করে, তবে তা তাদের উপর ফরয হয়ে যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2839)


2839 - عن أبي هريرة قال: ما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم صلى الضُّحي قط إلَّا مرةً واحدةً.

حسن: رواه الإمام أحمد (9758) عن وكيع، والبزار"كشف الأستار" (696) من طريق قبيصة كلاهما عن سفيان، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن للكلام في عاصم وأبيه غير أنهما صدوقان.

قال البزّار: لا نعلم رواه عن عاصم إلا سفيان، ورواه عن سفيان قبيصةُ ووكيع.

قلت: وهو كما قال، ورواه أيضًا النسائي في"الكبرى" (479) من طريق وكيع، إلَّا أنَّه لم يذكر المستثني، وهو قول أبي هريرة:"إلَّا مَرَّة واحدة"، والبزّار من طريق قبيصة، عن سفيان به.

ونفي أبي هريرة محمول على علمه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কখনো সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করতে দেখিনি, কেবল একবার ছাড়া।









আল-জামি` আল-কামিল (2840)


2840 - عن عبد الله بن شقيق قال: قلتُ لعائشة: أكان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضُّحى؟ قالت: لا، إلا أن يجيء من مَغِيبِه.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (717) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا يزيد بن زُريع، عن سعيد الجُريري، عن عبد الله بن شقيق به مثله.

ويحمل عليه حديث عائشة رواه ابن حبان في صحيحه (2531) قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بيتي فصلي الضُّحى ثمان ركعات. وفيه المطلب بن عبد الله بن حنطب يروي عن عائشة، وفي سماعه منها اختلاف وأكثر الأئمة على أنه لم يسمع منها. قال أبو حاتم: لم يدرك عائشة، وعامة حديثه مراسيل. وقال أبو زرعة: أرجو أن يكون سمع منها.

وقد ثبت في صحيح مسلم أنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يُصلِّي الضُّحى أربع ركعات ويزيد ما شاء، ولعلها تقصد من الزيادة هذه الثمانية.

ولأهل العلم عدة أقوال في الجمع بين أقوال عائشة، انظر:"الفتح" (3/ 56)، وأشهرها ما قاله ابن حبان في صحيحه (6/ 271): إثبات عائشة صلاة الضُّحى للمصطفى صلى الله عليه وسلم أرادت به في البيت دون مسجد الجماعة، لأنه صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل صلاتكم في بيوتكم إلا المكتوبة" انتهى.

قال الحافظ بعد أن عزا هذا الجمع إلى المحب الطبري وبأنه أخذه من كلام ابن حبان:"ويُعكِّر عليه حديث الباب -وهو قولها: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم سبَّح سُبحةَ الضُّحي، وإني لأسبِّحها- قال: ويجاب عنه بأن المنفي صفة مخصوصة" انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুল্লাহ ইবনে শাকীক) বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি চাশতের (দুহা’র) সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: না, তবে যখন তিনি কোনো সফর বা অনুপস্থিতি থেকে ফিরে আসতেন (তখন আদায় করতেন)।