আল-জামি` আল-কামিল
2868 - عن عباد بن تميم، عن عمه قال: حوَّل رسول الله صلى الله عليه وسلم رداءه، فجعل عِطافه الأيمن على عاتقه الأيسر، وجعل عِطافه الأيسر على عاتقه الأيمن، ثم دعا الله عز وجل.
حسن: رواه أبو داود (1163) عن محمد بن عوف، قال: قرأت في كتاب عمرو بن الحارث -يعني الحمصي- عن عبد الله بن سالم، عن الزبيدي، عن محمد بن مسلم (ثم أحال أبو داود على الإسناد السابق وقال:"ولم يذكر الصلاة" يعني عباد بن تميم المازني، عن عمه) فذكره.
وهذا إسناد حسن، لأن عمرو بن الحارث الحمصي لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ"مقبول".
قلت: وهو كما قال، لأنه توبع في أصل تحويل الرداء، ولم ينفرد به كما في الحديث الذي مضي، والذي سيأتي.
وقوله:"العطاف" قال الخطابي: أصل العطاف الرداء، وإنما أضاف العطاف إلى الرداء هاهنا، لأنه أراد أحد شقّي العطافي الذي عن يمينه، وعن شماله.
আবদুল্লাহ ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাদর ঘুরিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি চাদরের ডান প্রান্ত বাম কাঁধের উপর এবং বাম প্রান্ত ডান কাঁধের উপর রাখলেন, এরপর তিনি মহান আল্লাহ্র কাছে দু‘আ করলেন।
2869 - عن عبد الله بن زيد قال: استسقى رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليه خميصة سوداء، فأراد أن يأخذ بأسفلها فيجعله أعلاها، فلما ثقُلتْ قَلَبَها على عاتقه.
حسن: رواه أبو داود (1164)، والنسائي (1507) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز، عن عُمارة بن غَزِيَّة، عن عباد بن تميم، عن عبد الله بن زيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عُمارة بن غَزِيَّة فهو حسن الحديث.
وصححه ابن خزيمة (1415)، وعنه ابن حبان (2867)، ورواه أيضًا الحاكم (1/ 327) كلهم من طريق عبد العزيز -وهو ابن محمد الدراوردي- به مثله. وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم".
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বৃষ্টির জন্য সালাত (ইসতিসকা) আদায় করলেন, আর তাঁর পরিধানে ছিল একটি কালো চাদর (খামীসা)। তিনি চাদরটির নিচের দিক ধরে সেটি উপরের দিক করতে চাইলেন (উল্টাতে চাইলেন), কিন্তু যখন তা কঠিন/ভারী মনে হলো, তখন তিনি সেটিকে তাঁর কাঁধের উপর উল্টে দিলেন।
2870 - عن أنس أنَّ عمر بن الخطاب كان إذا قَحَطُوا استسقى بالعباس بن عبد المطلب فقال: اللهم إنا كنا نتوسَّل إليك بنبينا فتسقينا، وإنا نتوسل إليك بعم نبينا فاسقنا. قال: فيسقون.
صحيح: رواه البخاري في الاستسقاء (1010) عن الحسن بن محمد، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، قال: حدثني أبي عبد الله بن المشي، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن أنس فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সময় যখন দুর্ভিক্ষ হতো, তখন তিনি আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের মাধ্যমে বৃষ্টির জন্য দু‘আ (ইস্তিস্কা) করতেন এবং বলতেন: হে আল্লাহ! আমরা আপনার কাছে আপনার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাধ্যমে ওয়াসীলা (তওসসূল) গ্রহণ করতাম, আর আপনি আমাদের বৃষ্টি দিতেন। এখন আমরা আপনার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাচার মাধ্যমে ওয়াসীলা গ্রহণ করছি, সুতরাং আমাদের বৃষ্টি দিন। তিনি (আনাস) বলেন, এরপর বৃষ্টি হতো।
2871 - عن ابن مسعود قال: إن قريشًا لما استعصوا على النبي صلى الله عليه وسلم دعا عليهم بسنين كَسِنيِّ يوسف، فأصابهم قحطٌ وجَهْدٌ حتى أكلوا العظام، فجعل الرجل ينظُر إلى السماء فيرى ما بينه وبينها كهيئة الدخان من الجَهْد، فأنزل الله تعالى: {فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِي السَّمَاءُ بِدُخَانٍ مُبِينٍ (10) يَغْشَى النَّاسَ هَذَا عَذَابٌ أَلِيمٌ} [سورة الدخان: 10، 11] قال: فأُتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقيل: يا رسول الله! اسْتسْقِ الله لِمْضَرَ، فإنها قد هلكتْ، قال:"لِمُضَرَ؟ إنك لجريءٌ" فاستسقى فسُقوا. فنزلت: {إِنَّكُمْ عَائِدُونَ} فلما أصابتهم الرفاهية عادوا إلى حالهم حين أصابتهم الرفاهيةُ، فأنزل الله عز وجل: {يَوْمَ نَبْطِشُ
الْبَطْشَةَ الْكُبْرَى إِنَّا مُنْتَقِمُونَ} قال: يعني يوم بدر.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4821)، ومسلم في صفات المنافقين (2798/ 40) كلاهما من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن مسلم بن صُبيح، عن مسروق، عن ابن مسعود فذكره واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه باختلاف يسير.
وفي الروايات الصّحيحة الأخرى أنَّ الذي طلب من النبي صلى الله عليه وسلم كشف الجهْد هو أبو سفيان.
وأما ما جاء في صحيح البخاري (1020) تحت الباب المذكور من قول البخاري، وزاد أَسباط عن منصور: فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فسُقُوا الغيثَ، فأطبقتْ عليهم سبْعًا، وشكا الناس كثرة المطر فقال:"اللهم حوالينا ولا علينا" فانحدرت السحابة عن رأسه فسُقوا الناسَ حولهم، فهو جزء من حديث أنس بن مالك المذكور في باب الاستسقاء في خطبة الجمعة من غير استقبال القبلة وهذه القصة وقعت في المدينة، والظاهر أن هذا وهم من أسباط بن نصر فإنه قد وُصف بكثرةِ الخطإِ وهو مع ذلك صاحب غرائب …
وإليه يشير الشيخ ولي الله الدهلوي في جزء شرح تراجم أبواب صحيح البخاري" (ص 107) معلقًا على حديث عبد الله بن مسعود الذي ذكره البخاري تحت هذا الباب:"كأنه وقع وهم وخلط في هذا الطريق".
ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কুরাইশরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের অবাধ্যতা করলো, তখন তিনি তাদের বিরুদ্ধে ইউসুফ (আঃ)-এর সময়ের বছরগুলোর (অনুরূপ দুর্ভিক্ষের) জন্য বদদো‘আ করলেন। ফলে তাদের উপর এমন দুর্ভিক্ষ ও কষ্ট নেমে এলো যে তারা (ক্ষুধার জ্বালায়) হাড় খেতে লাগলো। কষ্টের তীব্রতার কারণে যখন কোনো ব্যক্তি আকাশের দিকে তাকাতো, তখন সে তার ও আকাশের মধ্যবর্তী স্থানে ধোঁয়ার মতো কিছু দেখতে পেত। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: “অতএব তুমি অপেক্ষা করো সেই দিনের, যেদিন আকাশ সুস্পষ্ট ধোঁয়া নিয়ে আসবে— যা মানুষকে ঢেকে ফেলবে। এটি হবে এক যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি।” [সূরা দুখান: ১০-১১] তিনি (ইবনে মাসঊদ) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বলা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আল্লাহ্র কাছে মুদার গোত্রের জন্য বৃষ্টি চান, কেননা তারা ধ্বংস হয়ে গেছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুদার গোত্রের জন্য? তুমি তো বেশ সাহস দেখাচ্ছো!" অতঃপর তিনি বৃষ্টির জন্য দু‘আ করলেন এবং তারা সিক্ত হলো (বৃষ্টি পেল)। তখন এই আয়াত নাযিল হলো: "নিশ্চয়ই তোমরা প্রত্যাবর্তনকারী (অর্থাৎ আবার কুফরির দিকে ফিরে যাবে)।" যখন তারা সুখ ও প্রাচুর্য লাভ করলো, তখন তারা তাদের পূর্বের অবস্থায় ফিরে গেল। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "যেদিন আমি বড় ধরনের পাকড়াও করব, সেদিন আমি প্রতিশোধ নেব।" তিনি (ইবনে মাসঊদ) বলেন: এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো বদরের দিন।
2872 - عن * *
২৮৭২ - ... থেকে ... থেকে
2873 - عن أبي مسعود البدري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس والقمر لا ينكسفان لموت أحد من الناس، ولكنهما آيتان من آيات الله عز وجل، فإذا رأيتموهما فقوموا فصلوا".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1041، 1057) وفي بدء الخلق (3204)، ومسلم في الكسوف (911) من طرق عن إسماعيل (هو ابن أبي خالد) عن قيس (هو ابن أبي حازم) عن أبي مسعود الأنصاري فذكره.
وزاد مسلم من وجه آخر عن سفيان ووكيع عن إسماعيل بهذا الإسناد وفيه: انكسفت الشمسُ يوم مات إبراهيم، فقال الناس: انكسفتْ لموت إبراهيم.
আবু মাসউদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় সূর্য ও চন্দ্র কোনো মানুষের মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না। বরং এ দুটি মহান আল্লাহ তা'আলার নিদর্শনসমূহের মধ্য থেকে দুটি নিদর্শন। সুতরাং যখন তোমরা এ দুটিকে (গ্রহণগ্রস্ত অবস্থায়) দেখবে, তখন তোমরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করো।"
2874 - عن المغيرة بن شعبة يقول: انكسفَتِ الشمس يوم مات إبراهيم، فقال الناس: انكسفَتْ لموت إبراهيم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس والقمر آيتان من آيات الله، لا ينكسفان لموت أحد ولا لحياته، فإذا رأيتموها فادعوا الله، وصلوا حتى ينجلي".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1060) وفي الأدب (6199) مختصرًا، ومسلم في الكسوف (915) كلاهما من طريق زائدة قال: حدثنا زياد بن علاقة، قال: سمعتُ المغيرة بن شعبة فذكر الحديث واللفظ للبخاري.
ورواه أيضًا (1043) من وجه آخر عن زياد بن عِلاقة بإسناده مثله.
ولم يذكر مسلم فقال الناس: انكسفتُ لموت إبراهيم"
قلت: ذكر أكثر أهل السيرة أن موت إبراهيم بن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في السنة العاشرة من الهجرة، وقيل قبل ذلك. والنبي صلى الله عليه وسلم شهد موته وذرفتْ عيناه.
মুগীরা ইবনু শু'বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যেদিন ইবরাহীম (নবীজির পুত্র) ইন্তেকাল করেন, সেদিন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন লোকেরা বলল: ইবরাহীমের মৃত্যুর কারণেই সূর্যগ্রহণ হয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারও মৃত্যু কিংবা জন্মের কারণে গ্রহণ হয় না। সুতরাং তোমরা যখন তা (গ্রহণ) দেখবে, তখন আল্লাহর কাছে দু'আ করো এবং তা সম্পূর্ণ আলোকিত না হওয়া পর্যন্ত সালাত আদায় করো।"
2875 - عن ابن عمر أنه كان يُخبِر عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الشمس والقمر لا يَخسفان الموت أحد ولا لحياته، ولكنهما آيتان من آيات الله، فإذا رأيتموهما فصلوا".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1042)، ومسلم في الكسوف (914) كلاهما من طريق ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن عبد الرحمن بن القاسم حدَّثه عن أبيه القاسم ابن محمد بن أبي بكر الصديق، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث، ولفظهما سواء.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন: “নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যু বা জীবনের কারণে গ্রহণ হয় না, বরং তারা আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। সুতরাং তোমরা যখন সে দুটি দেখতে পাও, তখন সালাত আদায় কর।”
2876 - عن أبي موسى الأشعري قال: خسفتِ الشمس في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام
فزِعًا يخشى أن تكون الساعةُ، حتى أتي المسجد، فقام يُصلِّي بأطول قيامٍ وركوعٍ وسجود، ما رأيتُه يفعله في صلاةٍ قطُّ، ثم قال:"إن هذه الآيات التي يُرسلَها الله، لا تكون لموت أحد ولا لحياته، ولكن الله عز وجل يرسلها يُخَوِّف بها عبادَه، فإذا رأيتم منها شيئًا فافزعوا إلى ذكره ودعائه واستغفاره".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1059)، ومسلم في الكسوف (921) كلاهما عن محمد بن العلاء، قال: حدثنا أبو أسامة، عن بُريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره ولفظهما سواء.
আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন তিনি ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় দাঁড়িয়ে গেলেন, যেন তিনি কিয়ামত হওয়ার ভয় করছিলেন। তিনি মসজিদে আসলেন। অতঃপর তিনি এমন দীর্ঘ কিয়াম, রুকু ও সিজদার সাথে সালাতে দাঁড়ালেন যা আমি এর আগে আর কোনো সালাতে তাঁকে করতে দেখিনি। এরপর তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলা যে সকল নিদর্শন প্রেরণ করেন, তা কারো মৃত্যু কিংবা কারো জন্মের কারণে হয় না। বরং আল্লাহ তাআলা এগুলো তাঁর বান্দাদেরকে ভয় দেখানোর জন্য প্রেরণ করেন। যখন তোমরা এর কোনো কিছু দেখতে পাও, তখন তাঁর যিকির, দুআ ও ইস্তেগফারের দিকে দ্রুত ধাবিত হও।"
2877 - عن عبد الله بن عمرو قال: لما كُسِفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودِيَ: إنَّ الصلاةَ جامعةٌ. فركع النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين في سجدةٍ، ثم قام فركع ركعتين في سجدة، ثم جلس، ثم جُلِّي عن الشمس.
قال: وقالت عائشة: ما سجدتُ سجودًا قط كان أطول منها، كذا في البخاري، وفي مسلم: ما ركعت ركوعًا قط ولا سجدتُ سجودًا قط كان أطول منه.
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1051)، ومسلم في الكسوف (910) كلاهما من طريق أبي معاوية (وهو شيبان النحوي) عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
ورواه أيضًا الشيخان: البخاري (1045)، ومسلم كلاهما من طريق معاوية بن سلام، عن يحيى بن أبي كثير إلَّا أنَّ البخاريَّ اقتصر على قوله:"لما كسفتِ الشمس على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودِي: إنَّ الصلاة جامعة".
والحديث عبد الله بن عمرو أسانيد أخرى خرجتها في باب ما جاء في النفخ في الصلاة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হলো, তখন ঘোষণা করা হলো: সালাত শুরু হতে যাচ্ছে (বা, সালাতের জন্য সমবেত হও)। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সিজদার মধ্যে দু’টি রুকূ’ করলেন, এরপর দাঁড়ালেন এবং এক সিজদার মধ্যে দু’টি রুকূ’ করলেন, তারপর বসলেন। এরপর সূর্য আলোকিত হয়ে গেল (গ্রহণমুক্ত হলো)।
তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বলেন: আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি এর চেয়ে দীর্ঘ সিজদাহ আর কখনো করিনি। অনুরূপ বুখারীতে আছে। আর মুসলিমের বর্ণনায় আছে: আমি এর চেয়ে দীর্ঘ রুকূ’ও কখনো করিনি এবং এর চেয়ে দীর্ঘ সিজদাহও কখনো করিনি।
2878 - عن عائشة قالت: خسفتِ الشمسُ في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالناس، فقامَ فأطال القيام، ثم ركع، فأطال الركوعَ، ثم قام، فأطال القيام، وهو دون القيام الأول، ثم ركع، فأطال الركوع، وهو دون الركوع الأول. ثم رفع فسجد، ثم فعل في الركعة الآخِرة مثل ذلك، ثم انصرف وقد تجلَّتِ الشمس. فخطب الناس، فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: إنَّ الشمسَ والقمرَ آيتان من آيات الله، لا يخسفان لموت أحد، ولا لحياته، فإذا رأيتُم ذلك فادعوا الله، وكِّبروا وتصدَّقوا، ثم قال:"يا أمة محمد! والله! ما من أحد أغْير من الله أن يزني عبدُه، أو
تزني أمتُه، يا أمة محمد! والله! لو تعلمون ما أعلم لضحكتُم قليلًا ولبكيتُم كثيرًا".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الكسوف (1) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في الكسوف (1044) عن عبد الله بن مسلمة، ومسلم في الكسوف (901) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একবার সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকলেন। অতঃপর রুকূ করলেন এবং দীর্ঘক্ষণ রুকূতে থাকলেন। অতঃপর দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকলেন, তবে তা প্রথম দাঁড়ানোর চেয়ে কম ছিল। অতঃপর রুকূ করলেন এবং দীর্ঘক্ষণ রুকূতে থাকলেন, তবে তা প্রথম রুকূর চেয়ে কম ছিল। অতঃপর মাথা উঠিয়ে সিজদা করলেন। অতঃপর শেষ রাকাআতেও অনুরূপ করলেন। অতঃপর সালাত শেষ করলেন যখন সূর্য পরিষ্কার হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি লোকদের সামনে ভাষণ দিলেন, আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, তারপর বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চাঁদ আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্য থেকে দুটি নিদর্শন। কারো মৃত্যুর জন্য অথবা কারো জন্ম-জীবনের জন্য এগুলোর গ্রহণ হয় না। সুতরাং যখন তোমরা তা দেখবে, তখন তোমরা আল্লাহর নিকট দু'আ করো, তাকবীর বলো এবং সাদকা করো।" অতঃপর তিনি বললেন: "হে মুহাম্মাদের উম্মত! আল্লাহর কসম! আল্লাহর চেয়ে বেশি আত্মমর্যাদাবোধ (غيرة) আর কারো নেই যে, তাঁর কোনো বান্দা যিনা করবে অথবা তাঁর কোনো বাঁদি যিনা করবে। হে মুহাম্মাদের উম্মত! আল্লাহর কসম! আমি যা জানি তোমরা যদি তা জানতে, তবে তোমরা অল্প হাসতে এবং বেশি কাঁদতে।"
2879 - عن عبد الله بن عباس قال: انخسَفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام قيامًا طويلًا نحوا من قراءة سورة البقرة، ثم ركع ركوعًا طويلًا، ثم رفع فقام قيامًا طويلًا وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا وهو دون الركوع الأول، ثم سجد، ثم قام قيامًا طويلًا، وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا، وهو دون الركوع الأول، ثم رفع فقام قيامًا طويلًا وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا وهو دون الركوع الأول، ثم سجد. ثم انصرف وقد تجلت الشمس فقال:"إنَّ الشمسَ والقمرَ آيتان من آيات الله لا يخسفان لموت أحدٍ، ولا لحياته، فإذا رأيتُم ذلك فاذكروا الله، قالوا: يا رسول الله! رأيناك تناولتَ شيئًا في مقامك، ثم رأيناك كَعْكَعْتَ، قال صلى الله عليه وسلم:"إنِّي رأيتُ الجنة، فتناولت عنقودًا، ولو أصبتُه لأكلتُم منه ما بَقِيَتِ الدنيا، وأُرِيتُ النار، فلم أَرَ منظرًا كاليوم قط أفظعَ، ورأيتُ أكثر أهلها النساء" قالوا: لِمَ يا رسول الله؟ قال:"لكُفرِهنَّ" قيل: يكفرن بالله؟ قال:"يكفُرنَ العَشيرَ، ويكفُرنَ الإحسانَ ولو أحسنت إلى إحداهنَّ الدهرَ كلَّه، ثم رأتْ منك شيئًا قالت: ما رأيت منك خيرًا قط".
متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (2) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
ورواه البخاري في الكسوف (1052) من طريق عن مالك، به.
ورواه مسلم في الكسوف (907) من وجه آخر عن زيد بن أسلم به، ورواه أيضًا عن محمد بن
رافع، حدثنا إسحاق (يعني ابن عيسي) أخبرنا مالك بإسناده مثله ولم يسق لفظه وإنما أحال على
الإسناد السابق.
وقوله:"كعكعت" من تكعكع وهو إذا توقف وأحجم.
ورواه مسلم من وجه آخر مختصرا عن كثير بن عباس، عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه صلي أربع ركعات في ركعتين. وأربع سجدات يوم كسفتِ الشمس بمثل حديث عروة، عن عائشة.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন সালাত আদায় করলেন। তিনি এত দীর্ঘ কিয়াম (দাঁড়িয়ে থাকা) করলেন যে, তা সূরাহ আল-বাক্বারাহ পাঠ করার কাছাকাছি ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন। তারপর (রুকূ’ থেকে) উঠে দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর সাজদাহ করলেন। এরপর তিনি (দ্বিতীয় রাকাআতের জন্য) দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা (প্রথম রাকাআতের) প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর (রুকূ’ থেকে) উঠে দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর সাজদাহ করলেন। এরপর তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, ততক্ষণে সূর্য উজ্জ্বল হয়ে উঠেছে। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্য হতে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারও মৃত্যু বা জন্মের কারণে গ্রহণ হয় না। যখন তোমরা তা (গ্রহণ) দেখবে, তখন তোমরা আল্লাহর স্মরণ করো।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে সালাতে দাঁড়ানো অবস্থায় কিছু নিতে দেখলাম, আবার দেখলাম আপনি পেছনের দিকে সরে এলেন ('কা’কা’আতা')।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: "আমি জান্নাত দেখেছিলাম, তাই একটি থোকা ধরার জন্য হাত বাড়িয়েছিলাম। যদি আমি তা পেতাম, তবে তোমরা দুনিয়া বিদ্যমান থাকা পর্যন্ত তা খেতে পারতে। আর আমাকে জাহান্নাম দেখানো হয়েছিল। আজকের মতো ভয়াবহ দৃশ্য আমি আর কখনও দেখিনি। আর আমি দেখলাম, তার (জাহান্নামের) অধিকাংশ অধিবাসী নারী।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কী কারণে?" তিনি বললেন: "তাদের কুফরীর (অকৃতজ্ঞতার) কারণে।" জিজ্ঞেস করা হলো: "তারা কি আল্লাহকে অস্বীকার করে?" তিনি বললেন: "তারা স্বামী (আশিয়ার) ও ইহসানের (উপকারের) নাশুকরি (অকৃতজ্ঞতা) করে। যদি তুমি তাদের কারও প্রতি সারা জীবনও ইহসান (দয়া) করো, এরপরও সে তোমার কাছে কোনো ত্রুটি দেখলে বলে ওঠে: 'আমি তোমার কাছে কখনও কোনো কল্যাণ দেখিনি।'"
2880 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: لما كشفت الشمس على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودي: إن الصلاة جامعة فركع النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين في سجدة، ثم قام فركع ركعتين
في سجدة، ثم جلس حتى جُلِّي عن الشمس.
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1051)، ومسلم في الكسوف (910) كلاهما من طريق أبي معاوية عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره، وسبق تخريجه.
قوله: ركعتين في سجدة -أي في كل ركعة ركعتان- وهو المَعْني بأربع ركعات في ركعتين.
وأما ما رواه أصحاب السنن من الاختصار على الركوع الواحد في كل ركعة فهو شاذ لأنَّ الذي رُوِي عن عبد الله بن عمرو حفظ منه طول السجود ولم يحفظ ركعتين في ركعة، وأبو سلمة حفظ ركعتين في ركعة وحفظ طول السجود. كما قال البيهقي (3/ 324).
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হলো, তখন ঘোষণা করা হলো: 'আস-সালাতু জামিআহ' (নামাজের জন্য সমবেত হও)। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক সিজদায় দুইবার রুকু করলেন, অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন এবং এক সিজদায় দুইবার রুকু করলেন, এরপর তিনি বসে রইলেন, যতক্ষণ না সূর্যগ্রহণ কেটে গেল।
2881 - عن جابر بن عبد الله، قال: كسفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في يوم شديد الحرِّ، فصلّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بأصحابه، فأطال القيام، حتى جعلوا يَخِرُّون، ثم ركع فأطال، ثم رفع فأطال، ثم ركع فأطال، ثم رفع فأطال، ثم سجد سجدتين، ثم قام فصنع نحوًا من ذاك. فكانت أربع ركعات وأربع سجداتٍ، ثم قال:"إنه غُرِضَ عليَّ كل شيء تولَجُونَهُ، فعُرِضَتْ علىَّ الجنةُ، حتى لو تناولْتُ منها قِطْفًا أخَذْتُه (أو قال تناولتُ منها قِطْفًا) فقصُرَتْ يَدِي عنه، وعُرِضَتْ علىَّ النارُ، فرأيتُ فيها امرأةً من بني إسرائيل تعذَّبُ في هِرَّةٍ لها، ربطتها فلم تُطْعِمْها، ولم تَدَعْهَا تأكلُ من حشَاشِ الأرض، ورأيتُ أبا ثُمامة عمرو بن مالك يَجُرُّ قُصْبَهُ في النار، وإنهم كانوا يقولون: إن الشمسَ والقمرَ لا يخسِفان إلا لموتِ عظيمٍ، وإنهما آيتان من آيات الله يُرِيكُمُوهُما، فإذا خَسَفَا فَصَلُّوا حتى يَنْجَلي".
صحيح: رواه مسلم في الكسوف (904) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقي، حدثنا إسماعيل ابن علية، عن هشام الدستوائي، قال: حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক প্রচণ্ড গরমের দিনে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি এত দীর্ঘ কিয়াম (দাঁড়িয়ে থাকা) করলেন যে, তারা (কষ্টে) পড়ে যেতে লাগলেন। তারপর তিনি দীর্ঘ রুকু করলেন, তারপর উঠলেন এবং দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকলেন, তারপর তিনি আবার দীর্ঘ রুকু করলেন, তারপর উঠলেন এবং দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকলেন, এরপর তিনি দু’টি সিজদা করলেন। এরপর তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং অনুরূপভাবে কাজ করলেন। সুতরাং এটি ছিল চার রুকু এবং চার সিজদা।
এরপর তিনি বললেন: "তোমরা যে সব কিছুর মধ্যে প্রবেশ করবে, সবকিছুই আমার সামনে পেশ করা হয়েছিল। জান্নাতও আমার সামনে পেশ করা হয়েছিল। এমনকি আমি যদি তার একটি থোকা তুলে নিতে চাইতাম, তবে তা নিতে পারতাম (অথবা তিনি বলেছেন: আমি একটি থোকা তুলে নিতে চাইলাম) কিন্তু আমার হাত সেখানে পৌঁছতে পারেনি। আর জাহান্নামও আমার সামনে পেশ করা হয়েছিল। আমি তাতে বনী ইসরাঈলের এক নারীকে দেখলাম, যাকে তার একটি বিড়ালের কারণে শাস্তি দেওয়া হচ্ছিল। সেটিকে সে বেঁধে রেখেছিল, তাকে খাবারও দেয়নি এবং যমীনের তৃণলতা থেকেও খেতে দেয়নি। আর আমি জাহান্নামে আবূ সুমামা আমর ইবনে মালিককে দেখলাম, সে তার নাড়িভুঁড়ি টেনে নিয়ে বেড়াচ্ছে। আর (জাহিলিয়াতের যুগে) লোকেরা বলতো, নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কোনো মহামানবের মৃত্যুর কারণে গ্রহণ হয়। অথচ এ দু'টি আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দু'টি নিদর্শন, যা তিনি তোমাদেরকে দেখান। অতএব, যখন সূর্য বা চন্দ্রগ্রহণ হয়, তখন তোমরা সালাত আদায় করতে থাকো, যতক্ষণ না তা আলোকিত হয়ে যায়।"
2882 - عن أبي هريرة قال: كُسَفَتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام فصلَّى للناس، فأطال القيام ثم ركع فأطال الركوع، ثم قام فأطال القيام وهو دون القيام الأول، ثم ركع فأطال الركوع وهو دون الركوع الأول، ثم سجد فأطال السجود، ثم رفع ثم سجد فأطال السجود وهو دون السجود الأول، ثم قام فصلى ركعتين، وفعل فيهما مثل ذلك ثم سجد سجدتين يفعل فيهما مثل ذلك حتى فرغ من صلاته، ثم قال:"إن الشمس والقمر آيتان من آيات الله وإنَّهما لا ينكسفان لموت أحد ولا الحياته، فإذا رأيتم ذلك فافزعوا إلى ذكر الله عزوجل وإلى الصلاة".
حسن: رواه النسائي (1483) عن محمد بن عبيدالله بن عبد العظيم، قال: حدثني إبراهيم سَبَلان، قال: حدثنا عباد بن عبادٍ المُهلبي، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو: ابن علقمة بن وقاص الليثي. وإبراهيم سَبَلان هو: ابن زياد.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন তিনি লোকদের নিয়ে সালাতে দাঁড়ালেন। তিনি দীর্ঘ কিয়াম করলেন, অতঃপর রুকু করলেন এবং দীর্ঘ রুকু করলেন। এরপর আবার দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘ কিয়াম করলেন, যা প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর রুকু করলেন এবং দীর্ঘ রুকু করলেন, যা প্রথম রুকু অপেক্ষা কম ছিল। এরপর সিজদা করলেন এবং দীর্ঘ সিজদা করলেন। অতঃপর মাথা উঠালেন, এরপর আবার সিজদা করলেন এবং দীর্ঘ সিজদা করলেন, যা প্রথম সিজদা অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং দুই রাকআত সালাত আদায় করলেন এবং সে দুটিতেও অনুরূপ করলেন। এরপর তিনি দুটি সিজদা করলেন এবং সে দুটিতেও অনুরূপ করলেন, যতক্ষণ না তিনি তাঁর সালাত শেষ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। কারো মৃত্যু বা কারো জন্মের কারণে তাদের গ্রহণ হয় না। যখন তোমরা তা দেখবে, তখন তোমরা আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা-এর যিকির এবং সালাতের দিকে ধাবিত হও।"
2883 - عن أبي بكرة قال: كُنَّا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فانكسفت الشمسُ، فقام النبي صلى الله عليه وسلم يجرُّ رداءَه حتى دخل المسجد، فدخلنا، فصلَّي بنا ركعتين حتى انجلتِ الشمسُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس والقمر لا ينكسفان لموت أحد، فإذا رأيتموهما فصلوا، وادعوا حتى يُكشفَ ما بكم".
صحيح: رواه البخاري في الكسوف (1040) عن عمرو بن عون، قال: حدثنا خالد، عن يونس، عن الحسن، عن أبي بكرة فذكره.
ورواه البخاري أيضًا (1048) من طريق حماد بن زيد، عن يونس، عن الحسن، عن أبي بكرة، وزاد فيه:"ولكن الله تعالى يخوِّف بها عبادَه".
وقال: وتابعه موسي، عن مبارك، عن الحسن قال: أخبرني أبو بكرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الله يخوّفُ بهما عباده".
আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, এমন সময় সূর্যগ্রহণ হলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাদর টানতে টানতে দাঁড়ালেন এবং মসজিদে প্রবেশ করলেন। আমরাও প্রবেশ করলাম। তিনি আমাদের নিয়ে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন, যতক্ষণ না সূর্যগ্রহণ মুক্ত হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না। সুতরাং যখন তোমরা এ দুটিকে (গ্রহণগ্রস্ত) দেখবে, তখন সালাত আদায় করো এবং দুআ করতে থাকো, যতক্ষণ না তোমাদের কষ্ট দূর হয়ে যায়।"
2884 - عن عبد الرحمن بن سمرة قال: بينما أنا أرمي بأَسْهُمي في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ انكسفت الشمسُ فنبذتُهنَّ، وقلت: لأنظرنَّ إلى ما يحدث لرسول الله صلى الله عليه وسلم في انكساف الشمس اليومَ، فانتهيتُ إليه وهو رافع يديه، يدعو ويُكبِّر ويحمد ويُهلِّل. حتى جُلِّي عن الشمس، فقرأ سورتين، وركع ركعتين.
وفي رواية: فأتيتُه وهو قائم في الصلاة رافع يديه، فجعل يُسَبِّح ويحمدُ ويُهلِّل ويُكبِّر ويدعو. حتي حُسر عنها، قال: فلما حُسِر عنها قرأ سورتين، وصَلَّى ركعتين.
صحيح: رواه مسلم في الكسوف (913) من طرق عن الجُريري عن أبي العلاء حيان بن عُمير، عن عبد الرحمن بن سمرة، وكان من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
والرواية الأولى تخالف الرواية الثانية في الظاهر لأن في الرواية الأولى صلى لما انكسفتِ الشمس، وفي الثانية وجَدَه وهو يصلي، وهذا هو الصحيح يجب حمل الرواية الأولى على الثانية، لأنه لم يقل أحد بابتداء الصلاة بعد انتهاء كسوف الشمسُ، وإنما الذي حصل هو أن الرواة جمعوا كل ما حصل من النبي صلى الله عليه وسلم في هذه الفترة المذكورة من صلاة وتسبيح وتحميد وتهليل وتكبير وغيرها.
قال النووي في شرح مسلم:"وكانت السورتان بعد الانجلاء تتميمًا للصلاة، وتمتْ جملة
الصلاة ركعتين أولها في حال الكسوف، وآخرها بعد الانجلاء".
وقوله:"ركع ركعتين" قال البيهقي (3/ 332):"يحتمل أن يكون مراده بذلك في كل ركعة، فقد روينا عن جماعة أثبتوه، والمثبت شاهد، فهو أولى بالقبول". وقال الذهبي في"مهذب السنن":
"يحتمل أنه أراد ركع ركعتين في كل ركعة".
আব্দুল রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জীবদ্দশায় আমি যখন আমার তীর নিক্ষেপ করছিলাম, হঠাৎ সূর্যগ্রহণ হলো। আমি তখন তীরগুলো ফেলে দিলাম এবং বললাম: আজ সূর্যগ্রহণের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী করেন, আমি অবশ্যই তা দেখব। আমি তাঁর কাছে পৌঁছলাম, তিনি তখন হাত তুলে দু'আ করছিলেন, তাকবীর বলছিলেন, তাহমিদ বলছিলেন এবং তাহলীল বলছিলেন। যতক্ষণ না সূর্য মেঘমুক্ত হলো। অতঃপর তিনি দুটি সূরা পাঠ করলেন এবং দুই রাকাত রুকূ' করলেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: আমি তাঁর কাছে আসলাম, তখন তিনি সালাতে দাঁড়িয়ে ছিলেন এবং হাত তুলেছিলেন। তিনি তাসবীহ, তাহমিদ, তাহলীল, তাকবীর বলছিলেন এবং দু'আ করছিলেন। যতক্ষণ না সূর্য মেঘমুক্ত হলো। বর্ণনাকারী বলেন: যখন সূর্য মেঘমুক্ত হলো, তখন তিনি দুটি সূরা পাঠ করলেন এবং দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।
2885 - عن جابر قال: انكسفت الشمسُ في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم مات إبراهيم بن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال الناس: إنما انكسفت لموت إبراهيم، فقام النبي صلى الله عليه وسلم فصلي بالناس سِتَّ ركعات بأربع سجدات، بَدَأ فَكَبَّرَ، ثُمَّ قَرَأ فأَطَالَ الْقِرَاءةَ، ثم ركع نحوًا مِمَّا قَامَ. ثُمَّ رَفع رأسه من الركوع فقرأ قراءةً دون القراءة الأولى، ثم ركع نحوًا مما قام، ثم رفع رأسه من الركوع فقرأ قراءةً دونَ الثانية، ثم ركع نحوًا مما قام، ثم رفع رأسَه من الركوع. ثم انحَدَرَ بالسُّجُودِ فسجد سجدتين، ثم قام فركع أيضًا ثلاث ركعاتٍ، ليس فيها ركعةٌ إلا التي قبلها أطولُ من التي بعدها، وركوعُه نحوًا من سجوده، ثم تأَخَّر وتأَخَّرتِ الصُّفوف خلفه، حتى انتهينا. (وقال أبو بكر: حتى انتهى إلى النساء) ثم تقدم وتقدم الناسُ معه، حتى قام في مقامِه، فانصرفَ حين انصرفَ، وقد آضِتِ الشَّمْس، فقال"يا أيُّهَا الناسُ! إنَّما الشمسُ والقَمَرُ آيتان من آياتِ الله، وإنهما لا ينكَسِفان لمَوتِ أحدٍ من الناس (وقال أبو بكر: لِمَوتِ بَشَرٍ) فإذا رأيتُم شيئًا من ذلك فَصَلُّوا حتى تنجلِيَ، ما من شيء تُوعَدونه إلا قد رأيتُهُ في صلاتي هذه، لقد جيءَ بالنار، وذلكم حين رأيتُموني تأخَّرتُ مخافَةَ أن يُصيبَني من لفْحِها، وحتى رأيتُ فيها صاحب المحجَن يَجُرُّ قُصبَه في النار، كان يسرق الحاج بمحْجَنِه، فإن فُطِن له قال: إنما تَعَلَّقَ بمحجني، وإن غُفِلَ عنه ذهب به، وحتى رأيتُ فيها صاحبَةَ الهِرَّةِ التي رَبَطتْها فلم تُطْعِمْها، ولم تدَعْها تأكل من خشاش الأرض حتى ماتت جوعًا، ثم جيءَ بالجنة، وذلكم حين رأيتموني تقدمتُ حتى قمتُ في مقامي، ولقد مددتُ يَدِي وأنا أريد أن أتناول من ثمرها لتنظروا إليه، ثم بدا لي أن لا أفعل، فما من شيء توعدونه إلا قد رأيتُه في صلاتي هذه".
صحيح: رواه مسلم في الكسوف (904/ 10) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا عبد الله بن نُمير. ح وحدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: حدثنا أبي، حدثنا عبد الملك عن عطاء، عن جابر فذكره.
وقوله: وقد آضتِ الشمسُ" معناه رجعت إلى حالها الأول قبل الكسوف، وهو من أض يَئيضُ إذا رجع ومنه قولهم: أيضًا. وهو مصدر منه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের যুগে, যেদিন তাঁর পুত্র ইবরাহীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করেন, সেদিন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। লোকেরা তখন বলল: ইবরাহীমের মৃত্যুর কারণেই সূর্যগ্রহণ হয়েছে। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দাঁড়ালেন এবং লোকদের নিয়ে চার সিজদাসহ ছয় রুকুতে সালাত আদায় করলেন। তিনি তাকবীর বলে শুরু করলেন, এরপর দীর্ঘ কিরাআত পড়লেন। এরপর তিনি তার দাঁড়ানোর পরিমাণ অনুযায়ী রুকু করলেন। রুকু থেকে মাথা উঠিয়ে তিনি প্রথম কিরাআতের চেয়ে কিছুটা সংক্ষিপ্ত কিরাআত পড়লেন। এরপর তিনি তার দাঁড়ানোর পরিমাণ অনুযায়ী রুকু করলেন। এরপর রুকু থেকে মাথা উঠিয়ে তিনি দ্বিতীয় কিরাআতের চেয়ে কিছুটা সংক্ষিপ্ত কিরাআত পড়লেন। এরপর তিনি তার দাঁড়ানোর পরিমাণ অনুযায়ী রুকু করলেন। এরপর রুকু থেকে মাথা উঠালেন। এরপর তিনি সিজদায় অবনত হলেন এবং দুটি সিজদা করলেন। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং আবারও তিনটি রুকু করলেন। এগুলোর মধ্যে এমন কোনো রুকু ছিল না যার আগের রুকু তার পরের রুকু থেকে দীর্ঘ ছিল না। আর তাঁর রুকুও ছিল তাঁর দাঁড়ানোর প্রায় সমপরিমাণ। এরপর তিনি পিছনে সরে গেলেন এবং তাঁর পিছনে কাতারগুলোও সরে গেল, অবশেষে আমরা শেষ প্রান্তে গিয়ে পৌঁছলাম। (আবূ বাকর বলেছেন: এমনকি তিনি মহিলাদের কাছাকাছি পৌঁছে গেলেন।) এরপর তিনি অগ্রসর হলেন এবং তাঁর সাথে লোকেরাও অগ্রসর হলো, অবশেষে তিনি তাঁর জায়গায় এসে দাঁড়ালেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, ততক্ষণে সূর্য উজ্জ্বল হয়ে গিয়েছিল। তিনি বললেন: "হে লোক সকল! নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারো মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না। (আবূ বাকর বলেছেন: কোনো মানুষের মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না।) সুতরাং যখন তোমরা এমন কিছু দেখতে পাও, তখন তোমরা সালাত আদায় করো, যতক্ষণ না তা আলোকিত হয়ে যায়। এমন কোনো বিষয় নেই যার ওয়াদা তোমাদের কাছে করা হয়েছে, কিন্তু আমি আমার এই সালাতে তা দেখিনি। নিশ্চয়ই জাহান্নামকে আমার কাছে আনা হয়েছিল, আর তা তখনই যখন তোমরা আমাকে পিছিয়ে যেতে দেখেছিলে, এই ভয়ে যে এর উত্তাপ যেন আমাকে স্পর্শ না করে। এমনকি আমি সেখানে বাঁকা লাঠিওয়ালা (মহ্জনধারী) ব্যক্তিকে দেখলাম, যে আগুনে তার নাড়িভুঁড়ি টেনে নিয়ে বেড়াচ্ছে। সে বাঁকা লাঠি দিয়ে হাজীদের মালপত্র চুরি করত। যদি কেউ তাকে ধরে ফেলত, তখন সে বলত: 'আমার লাঠির সাথে লেগে গেছে।' আর যখন কেউ লক্ষ্য করত না, তখন সে তা নিয়ে যেত। এমনকি আমি সেখানে সেই বিড়ালওয়ালী মহিলাকেও দেখলাম, যে বিড়ালটিকে বেঁধে রেখেছিল, তাকে খাবার দেয়নি এবং সে যেন জমিনের কীট-পতঙ্গও খেতে না পারে সেজন্য তাকে ছেড়েও দেয়নি, অবশেষে সেটি ক্ষুধায় মারা গেল। এরপর জান্নাতকে আনা হয়েছিল, আর তা তখনই যখন তোমরা আমাকে অগ্রসর হতে দেখেছিলে, এমনকি আমি আমার জায়গায় এসে দাঁড়ালাম। আমি হাতও বাড়িয়ে দিয়েছিলাম, যেন আমি এর ফল থেকে কিছু নিতে পারি, যাতে তোমরা তা দেখতে পাও। কিন্তু আমার মনে হলো (বা আল্লাহর পক্ষ থেকে নির্দেশ এলো) যে আমি তা না করি। এমন কোনো বিষয় নেই যার ওয়াদা তোমাদের কাছে করা হয়েছে, কিন্তু আমি আমার এই সালাতে তা দেখিনি।"
2886 - عن عطاء يقول: سمعتُ عُبَيد بن عُمير يقول: حدثني من أصدِّقُ -حسبتُه يُريد عائشة- أن الشمس انكسفتْ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام قيامًا شديدًا، يقوم قائمًا ثم يركع، ثم يقوم ثم يركع، ثم يقوم ثم يركع، ركعتين في ثلاث ركعات، وأربع سجدات، فانصرف، وقد تَجَلَّتِ الشمسُ، وكان إذا ركع قال:"الله أكبر" ثم يركع، وإذا رفع رأسه قال:"سمع الله لمن حمده" فقام فحمد الله، وأثنى عليه، ثم قال:"إن الشمس والقمر لا يكسفان لموت أحد ولا لحياته، ولكنهما من آيات الله يُخوِّفُ الله بهما عبادَه، فإذا رأيتُم كُسُوفًا فاذكروا الله حتى ينجليا".
صحيح: رواه مسلم في الكسوف (901) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، قال: سمعت عطاءً فذكره.
ورواه من وجه آخر عن قتادة، عن عطاء بن أبي رباح، وفيه عن عائشة بدون شك، أن نبي الله صلى الله عليه وسلم صلَّي ستَّ ركعات وأربعَ سجدات.
وقوله:"ركعتين في ثلاث ركعات" هو بمعنى قوله:"ست ركعات وأربع سجدات" أي: أنه صلى ركعتين، وفي كل ركعة ثلاث ركوع وسجدتان.
وفي سنن أبي داود (1177):"فقام النبي صلى الله عليه وسلم قيامًا شديدًا … حتى إن رجالًا يومئذ لَيُغشَي عليهم مما قام بهم، حتى إنَّ سِجال الماء لتُصَبُّ عليهم".
وأما ما ورد في نصب الراية (2/ 226) عن ابن عباس أنه عليه السلام صلي في الكسوف فقرأ ثمَّ ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم سجد، وقال الأخرى مثلها. رواه مسلم عن طاوس، عن ابن عباس، فهذا وهم من المصنف رحمه الله تعالى، والصواب أنه: قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، يعني أربع ركعات كما سيأتي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তিনি অত্যন্ত দীর্ঘ কিয়ামে (দাঁড়িয়ে) ছিলেন। তিনি দাঁড়িয়ে থাকতেন, এরপর রুকু করতেন; অতঃপর আবার দাঁড়াতেন, এরপর আবার রুকু করতেন; অতঃপর আবার দাঁড়াতেন, এরপর আবার রুকু করতেন। এভাবে তিনি দুই রাক‘আতে তিনটি রুকু ও চারটি সিজদা করেন। যখন তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, তখন সূর্য প্রকাশিত হয়ে গিয়েছিল। তিনি যখন রুকু করতেন, তখন ‘আল্লাহু আকবার’ বলতেন, আর যখন মাথা উঠাতেন, তখন ‘সামি‘আল্লাহু লিমান হামিদাহ’ বলতেন। অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন, আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও তাঁর গুণগান করলেন। এরপর বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যু বা জীবনের কারণে গ্রহণ হয় না। বরং এগুলো আল্লাহর নিদর্শনগুলোর মধ্যে দুটি নিদর্শন, যার মাধ্যমে আল্লাহ তাঁর বান্দাদেরকে ভয় দেখান। সুতরাং যখন তোমরা গ্রহণ দেখতে পাও, তখন তোমরা আল্লাহর যিকির করো, যতক্ষণ না তা আলোকিত হয় (গ্রহণ মুক্ত হয়)।"
2887 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه صَلَّى في كسوف، قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم قرأ ثم ركع، ثم سجد، قال: والأخرى مثلها.
وفي رواية: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم حين كسفتِ الشمسُ ثمان ركعات في أربع سجدات، وعن علي مثل ذلك.
صحيح: رواه مسلم في الكسوف (909) من طريق يحيى، عن سفيان، قال: حدثنا حبيب، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
والرواية الثانية رواها (908) من طريق إسماعيل ابن عُلية، عن سفيان.
وهذا حديث صحيح رواه أيضًا أبو داود (1183)، والترمذي (560)، والنسائي (1468) كلهم من طريق يحيي به، وقال الترمذي: حسن صحيح، وسكت عليه أبو داود والمنذري، وتكلم البيهقي (3/ 327) بما لا يشفي وهذا لفظه:"وأما محمد بن إسماعيل رحمه الله فإنَّه أعرض عن هذه الروايات التي فيها خلاف رواية الجماعة، وقد رُوِينا عن عطاء بن يسار وكثير بن عباس، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه صلاها ركعتين في كل ركعة ركوعان، وحبيب بن أبي ثابت وإن كان من الثقات فقد كان يدلِّس، ولم أجده ذكر سماعه في هذا الحديث عن طاوس، ويحتمل أن يكون حمله عن غير موثوقٍ به عن طاوس" انتهى.
وكون الرواة رووا عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه صلى ركعتين في كل ركعة ركوعان لا يمنع من صحة حديث حبيب بن أبي ثابت لإمكان التعدد، فإنه إذا جُمعت أحاديث الكسوف كما ستري فإنها تدل على أنها تكررت وتعددت صفاتها.
وقول مسلم: وعن علي مثل ذلك. هو الحديث الآتي:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্যগ্রহণের সালাত আদায় করলেন। তিনি কিরাত পড়লেন, অতঃপর রুকু করলেন, আবার কিরাত পড়লেন, অতঃপর রুকু করলেন, আবার কিরাত পড়লেন, অতঃপর রুকু করলেন, আবার কিরাত পড়লেন, অতঃপর রুকু করলেন, অতঃপর সিজদা করলেন। বর্ণনাকারী বলেন: আর দ্বিতীয় রাকআতটিও অনুরূপ ছিল।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সূর্যগ্রহণ হলো, তখন চার সিজদার মাধ্যমে আটটি রুকু সহ সালাত আদায় করলেন। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে।
