আল-জামি` আল-কামিল
3048 - عن عبد الله بن زيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أكل من هذه الشجرة، فلا يقربنَّ مساجدنا" يعني الثوم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (8545)، مجمع البحرين (596) عن معاذ (بن المثني العنبري) ثنا علي بن المديني، ثنا معن بن عيسى القزاز، ثنا إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن عباد بن تميم، عن عمه عبد الله بن زيد فذكره.
قال الطبراني:"لم يروه عن الزهري إلا إبراهيم بن سعد، تفرد به معن القزاز".
وقال الهيثمي في المجمع (2/ 17):"رواه الطبراني في الأوسط والكبير، ورجال الكبير رجال الصحيح".
قلت: ورجال الأوسط أيضًا ثقات، ولا يضر تفردهم.
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এই গাছ খাবে, সে যেন আমাদের মসজিদগুলোর কাছে না আসে।" (তিনি রসুনকে উদ্দেশ্য করেছিলেন)।
3049 - عن خزيمة بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أكل من هذه البقلة فلا يقربنَّ مسجدنا".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (4/ 106) عن أحمد بن عبد الوهاب بن نجدة الحوطي وأبي زيد أحمد بن يزيد الحوطي، قالا: ثنا يحيى بن صالح الوحاطي، ثنا إسماعيل بن عياش، عن عبد العزيز بن عبيد الله، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي غطفان ابن طريف، عن خزيمة بن ثابت فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (2/ 18) رواه من رواية إسماعيل بن عياش عن الشاميين ورجاله موثقون. قلت: وهو كما قال فإن إسماعيل بن عياش في روايته عن أهل بلده الشاميين صدوق، وفي غيرهم مخلِّط.
খুযাইমা ইবন সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি এই সবজিটি খাবে, সে যেন আমাদের মসজিদের ধারে কাছেও না আসে।”
3050 - عن أبي ثعلبة الخشني، أنّه حدّثهم، قال: غزوتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم خيبرَ، والنّاسُ جياع، فأصبنا بها حُمُرًا من حُمُر الإنس، فذبحناها، قال: فأُخبر النبيُّ
- صلى الله عليه وسلم، فأمر عبد الرحمن بن عوف، فنادى في النّاس: إن لحوم الحمر الإنسيّة لا تحلُّ لمن شهد أنّي رسولُ الله".
قال: ووجدنا في جنانها بصلًا وثومًا، والنّاس جياعٌ، فجهدوا فراحوا، فإذا ريحُ المسجد بصل وثوم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أكل من هذه البقلة الخبيثة فلا يُقْرَبَنَا"، وقال:"لا تحلُّ النُّهبى، ولا يحلُّ كلُّ ذي ناب من السِّباع، ولا تحلُّ المجثَّمة".
حسن: رواه أحمد (17741)، والطبراني في"الكبير" (22/ 216) وهذا لفظهما، والنسائي (4341) مختصرًا بدون موضع الشاهد، كلّهم من طريق بقية بن الوليد، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن جبير بن نفير، عن أبي ثعلبة، فذكره. وفيه بقية بن الوليد مدلس وقد عنعن، ولكنه تويع.
رواه الطبراني في"الكبير" (22/ 215) من وجه آخر عن عقيل بن مدرك، عن لقمان بن عامر، عن جبير بن نفير الحضرمي، فذكر مثله.
وإسناده حسن من أجل لقمان بن عامر الوَصّابي الحمصي فإنه حسن الحديث. قال أبو حاتم:"يكتب حديثه" ووثقه ابن حبان.
وأمّا عقيل بن مدرك وهو السلميّ الشامي فلم يوثقه غير ابن حبان؛ ولذا قال الحافظ:"مقبول" وهو كذلك لأنه توبع في الإسناد الأول، وحسّنه الهيثمي في"المجمع" (2/ 18).
و"المجثمة": هي كل حيوان ينصب ويرمى ليقتل إلا أنها تكثر في الطير والأرانب وأشباه ذلك مما يجثم في الأرض. النهاية (2/ 239).
আবু সা'লাবা আল-খুশানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খায়বারের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলাম। তখন লোকেরা ছিল ক্ষুধার্ত। আমরা সেখানে গৃহপালিত গাধা পেলাম, অতঃপর আমরা সেগুলো যবেহ করলাম। তিনি (আবু সা'লাবা) বলেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দেওয়া হলো। তিনি আবদুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন। তিনি লোকদের মধ্যে ঘোষণা করলেন: যে ব্যক্তি সাক্ষ্য দেয় যে আমি আল্লাহর রাসূল, তার জন্য গৃহপালিত গাধার মাংস হালাল নয়।
তিনি বলেন: আর আমরা সে এলাকার বাগানসমূহে পেঁয়াজ ও রসুন পেলাম। লোকেরা ক্ষুধার্ত ছিল, তাই তারা (ক্ষুধা নিবারণের জন্য) সেগুলো খেল এবং সন্ধ্যা পর্যন্ত সেগুলো খেল। ফলে মসজিদের ভেতরে পেঁয়াজ ও রসুনের গন্ধ ভরে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি এই নিকৃষ্ট উদ্ভিদ (পেঁয়াজ-রসুন) থেকে খেয়েছে, সে যেন আমাদের কাছে না আসে।" এবং তিনি বললেন: "লুণ্ঠিত সম্পদ হালাল নয়, আর হিংস্র জন্তুসমূহের মধ্যে যেগুলোর ছেদন দাঁত আছে তার কোনটিই হালাল নয়, এবং মুজাসসামাহ (যেসব পশুকে বেঁধে রেখে লক্ষ্যবস্তু বানিয়ে হত্যা করা হয়) হালাল নয়।"
3051 - عن أبي أيوب الأنصاري قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أُتِيَ بطعام أكل منه، وبعث بفضله إليَّ، وإنه بعث إليَّ يومًا بفضلةٍ لم يأكل منها، لأن فيها ثومًا. فسألتُه: أحرام هو؟ قال: لا ولكني أكرهه من أجل ريحه".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الأشربة (2053) عن محمد بن المثي وابن بشار، قالا: حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن سماك بن حرب، عن جابر بن سمرة، عن أبي أيوب فذكر الحديث.
আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট খাবার আনা হতো, তখন তিনি তা থেকে খেতেন এবং তার অবশিষ্ট অংশ আমার নিকট পাঠিয়ে দিতেন। একদিন তিনি আমার নিকট কিছু অবশিষ্ট খাবার পাঠালেন যা থেকে তিনি নিজে খাননি, কারণ তাতে রসুন ছিল। তখন আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: এটা কি হারাম? তিনি বললেন: না, তবে আমি এর গন্ধের কারণে তা অপছন্দ করি।
3052 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليُصلِّ أحدكم في مسجده، ولا يتتبعِ المساجدَ".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (5176) عن محمد بن أحمد بن نصر أبي جعفر الترمذي،
قال: حدثنا عُبادةُ بن زياد الأسدي، قال: حدثنا زهير بن معاوية، عن عبيدالله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل عُبادة بن زياد الأسدي، ويقال: عباد بن زياد أيضًا مختلف فيه، قال موسي بن هارون الحمَّال: تركت حديثه. وقال ابن عدي: عُبادةُ من أهل الكوفة، من الغالين في التشيع، وله أحاديث مناكير في الفضائل. انتهى.
قلت: لعل موسي بن هارون تركهـ لأحاديثه في الفضائل. وأما في غير الفضائل فهو صدوق لأنه لم يُتَّهَم ولذا قال الحافظ في القريب:" صدوق رُمِيَ بالقدر والتشيع"، إلا أن الهيثمي قال في"المجمع" (2/ 24): ورواه الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله موثقون إلا شيخ الطبراني محمد ابن أحمد بن النضر الترمذي ولم أجد من ترجمة. وذكر ابن حبان في الثقات في الطبقة الرابعة محمد بن أحمد بن النضر ابن ابنة معاوية بن عمرو فلا أدري هو هذا أم لا؟ . انتهى.
قلت: ترجم الحافظ في"اللسان" (5/ 46) محمد بن أحمد بن نصر الترمذي أبا جعفر الفقيه المتوفي سنة 295 هـ، قال فيه الخطيب: كان ثقة من أهل العلم والفضل والزهد.
فالظاهر أنّ هذا هو شيخ الطبراني، فإنه ولد عام 260 هـ، وتوفي عام 360 هـ فأدركه وعمره خمس وثلاثون سنة. انظر: تاريخ بغداد (1/ 365).
بسند ضعيف"، وقال في"التلخيص" (4/ 77، 78):"رواه أبو داود والحاكم وابن السكن وأحمد ابن حنبل والدارقطني والبيهقي من حديث حكيم بن حزام، ولا بأس بإسناده". انتهى.
قلت: حديث حكيم بن حزام أصح شيء في هذا الباب، وبه قال جمهور الفقهاء -منهم الحنفية والشافعية والحنابلة- بأنه لا تُقام الحدود في المساجد صيانة لها، وتعظيمًا.
وفي الباب أحاديث أضعف منه، منها:
حديث ابن عباس: رواه الترمذي (1401)، وابن ماجه (2599) وفي إسناده إسماعيل بن مسلم المكي وهو ضعيف.
وحديث عبد الله بن عمرو بن العاص: رواه ابن ماجه (2600)، وفي إسناده ابن لهيعة.
وحديث جبير بن مطعم: رواه إسحاق بن راهويه -إتحاف الخيرة- (1468) عن يحيى بن آدم، ثنا ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، عن أبيه، عن جبير بن مطعم، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر مثله.
ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.
ورواه البزار"كشف الأستار" (1565) والحارث بن أبي أسامة في مسنده"بغية الباحث" (134) وعنه أبو نعيم في المعرفة الصحابة" (2/ 522) عن محمد بن عمر، ثنا إسحاق بن حازم، عن أبي الأسود، عن نافع بن جبير بن مطعم، عن أبيه فذكر الحديث ولفظه:"لا تُقام الحدودُ في المساجد".
ومحمد بن عمر هو: الواقدي وهو متروك.
قال البوصيري: إسناد حديث جبير ضعيف، من طريقين معًا الأول فتدليس أبي إسحاق، والثاني لضعف الواقدي". انتهي
وقال البزار:"هذا أحسن إسناد يُروَى في ذلك، ولا نعلمه بإسناد متَّصلٍ من وجه صحيح، وقد تكلم بعض أهل العلم في محمد بن عمر وضَعَّفوا حديثه". انتهي
قلت: وهو كما قال. فقد رواه أيضًا عبد الرزاق في مصنفه (1709) قال: أخبرني من سمع عمرو بن دينار، يحدث عن نافع بن جبير بن مطعم قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تُنشد الأشعار، وأن يتأس الجراحات، وأن تقام الحدود في المساجد.
وفيه رجل لم يُسم، كما أن نافع بن جبير وإن كان ثقة إلا أنه تابعي لم يلق النبي صلى الله عليه وسلم. ذكره العلائي في"جامع التحصيل" (820).
رواه ابن ماجه (750) عن أحمد بن يوسف السُلمي، قال: حدثنا مسلم بن إبراهيم، قال: حدثنا الحارث بن نَبْهان قال: حدثنا عُتبة بن يقظان، عن أبي سعيد، عن مكحول، عن واثلة بن الأسقع فذكر الحديث. وإسناده ضعيف جدًّا فإن الحارث بن نبهان"متروك" كما في التقريب.
ورُوِيَ مثل هذا عن أبي الدرداء، وأبي أمامة، ومعاذ بن جبل، ولم يصح منها شيء. انظر"نصب الراية" (2/ 492).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের মধ্যে কেউ যেন তার নিজের মসজিদে সালাত আদায় করে, এবং (উত্তমতার খোঁজে) যেন বিভিন্ন মসজিদ খুঁজে না বেড়ায়।
3053 - عن * *
৩০৫৩ - থেকে * *
3054 - عن عائشة قالت: دخل أبو بكر وعندي جاريتان من جواري الأنصار يُغنِّينان بما تقاولتِ الأنصار يوم بُعاث. قالت: وليستا بمغنيتين، فقال أبو بكر: أَمزامير الشيطان في بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ وذلك في يوم عيد. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أبا بكر! إنَّ لكلِّ قوم عيدًا، وهذا عيدنا".
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (952)، ومسلم في العيدين (892) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته ولفظهما سواء وسيأتي بالتفصيل في باب إباحة اللعب يوم العيد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: একদিন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে এলেন, তখন আমার নিকট আনসারদের দুটি ছোট বালিকা বু‘আসের যুদ্ধের দিন আনসাররা যেসব কবিতা আবৃত্তি করেছিল, তা গাইছিল। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তারা কিন্তু পেশাদার গায়িকা ছিল না। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরে শয়তানের বাঁশি?! আর এটা ছিল ঈদের দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে আবূ বকর! প্রত্যেক কওমের জন্য ঈদ আছে, আর এটা হচ্ছে আমাদের ঈদ।”
3055 - عن أنس قال: قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة، ولهم يومان يلعبون فيهما، فقال:"ما هذان اليومان؟" قالوا: كنَّا نلعبُ فيهما في الجاهلية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله قد أبدلكم بهما خيرًا منهما، يوم الأضحي ويوم الفطر".
صحيح: رواه أبو داود (1134)، والنسائي (1556) كلاهما من حديث حميد، عن أنس فذكره ولفظهما سواء، ورواه الحاكم (1/ 294) وصحَّحه على شرط مسلم، والحديث في مسند الإمام أحمد (12006) كلاهما من هذا الطريق.
وقال النووي في الخلاصة" (2883):"رواه أبو داود والنسائي وغيرهما بأسانيد صحيحة".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করলেন। তখন মদীনাবাসীদের দুটি দিন ছিল, যেগুলোতে তারা খেলাধুলা করত। তিনি বললেন, "এই দিন দুটি কী?" তারা বলল: জাহেলিয়াতের যুগে আমরা এই দিন দুটিতে খেলাধুলা করতাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদেরকে এর চেয়ে উত্তম দুটি দিন বদলে দিয়েছেন: ঈদুল আযহার দিন এবং ঈদুল ফিতরের দিন।"
3056 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يغدو يومَ الفطرِ حتى يأكل تمرات.
وفي رواية: وكان يأكلهنَّ وتْرًا.
صحيح: رواه البخاري في العيدين (953) عن محمد بن عبد الرحيم، حدثنا سعيد بن سليمان، حدثنا هُشيم، قال: أخبرنا عبيدالله بن أبي بكر بن أنس، عن أنس فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতরের দিন কয়েকটি খেজুর না খেয়ে (সালাতের জন্য) বের হতেন না।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি তা বিজোড় সংখ্যায় খেতেন।
3057 - عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يخرج يوم الفطر حتى يطعم، ولا يطعم يومَ الأضحى حتى يُصلِّي.
حسن: رواه الترمذي (542)، وابن ماجه (1756) كلاهما من طريق ثواب بن عُتبْة المَهري، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره، واللفظ للترمذي، ولفظ ابن ماجه:"وكان لا يأكل يوم النحر
حتى يرجع".
قال الترمذي:"حديث غريب".
قلت: لأنَّ فيه ثواب بن عتبة مختلف فيه فوثقه ابن معين، وقال أبو داود: ليس به بأس، وقال البخاري: لا أعرف لثواب بن عتبة غير هذا الحديث.
ولكنه توبع فقد روى الإمام أحمد (22984) من طريق عقبة بن عبد الله الرفاعي، قال: حدثني عبد الله بن بريدة، عن أبيه وفيه: ولا يأكل يوم الأضحى حتى يرجع، فيأكل من أضحيته.
والحديث هذا صحَّحه ابن خزيمة (1436)، وابن حبان (2812)، والحاكم (1/ 294) كلُّهم من طريق ثواب بن عتبة المَهري به مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه وثواب بن عتبة المهري قليل الحديث، ولم يُجرح بنوع يسقط به حديثه، وهذه سنة عزيزة من طريق الرواية، مستفيضة في بلاد المسلمين".
বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতরের দিন কিছু খেয়ে তবে বের হতেন, আর তিনি ঈদুল আযহার দিন সালাত আদায় না করা পর্যন্ত খেতেন না।
3058 - عن عطاء أنه سمع ابن عباس يقول: إن استطعتم أن لا يغدوُ أحدكم يوم الفطر حتى يطعم فليفعلْ. قال: فلم أدعْ أن آكُل قبل أن أغدوَ منذ سمعتُ ذلك من ابن عباس، فآكل من طرف الصَريقة الأُكلةَ، أو أشربُ اللبن، أو الماءَ.
قلت: فعلامَ يُؤوَّلُ هذا؟ قال: سمعه أظنُّ عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: كانوا لا يخرجون حتى يمتدَّ الضحاءُ، فيقولون: نطعمُ لئلا نُعجلَ عَن صلاتنا.
صحيح: رواه الإمام أحمد (2866) عن عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عطاء فذكره. والحديث في"مصنف عبد الرزاق" (5734) إلَّا أنَّه زاد فيه تفسير طرف الصريقة فقال: قلنا له (القائل ابن جريج) ما الصريقة؟ فقال: خبز الرقاق الأكلة، وزاد فيه أيضًا: أو النبيذ - بعد اللبن.
وقال في آخره: قال: وربما غدوتُ ولم أذق إلَّا الماء. ابن عباس القائل. وأخرجه أيضًا الطبراني في"الكبير" (11427) من طريق عبد الرزاق، وإسناده صحيح.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি তোমাদের কারো পক্ষে সম্ভব হয় যে, সে ঈদুল ফিতরের দিন কিছু না খেয়ে ঘর থেকে বের হবে না, তবে সে যেন তাই করে। (বর্ণনাকারী) আতা বলেন: ইবনে আব্বাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছ থেকে এ কথা শোনার পর থেকে আমি বাইরে যাওয়ার পূর্বে আহার করা কখনো ছাড়িনি। আমি সরিকার (পাতলা রুটি) এক পাশ থেকে এক গ্রাস খাই, অথবা দুধ পান করি, অথবা পানি পান করি। (আতা বলেন,) আমি জিজ্ঞেস করলাম: এর কারণ কী? তিনি বললেন: আমার ধারণা, তিনি (ইবনে আব্বাস) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে শুনেছেন যে, তিনি বলেছেন: তারা (সাহাবীগণ) সেদিন ততক্ষণ বের হতেন না যতক্ষণ না পূর্বাহ্ন দীর্ঘ হতো। তারা বলতেন: আমরা খাবার খাই, যাতে আমরা সালাত আদায়ে তাড়াহুড়ো না করি।
3059 - عن ابن عباس قال: من السُّنَّة أن لا تخرُجَ يوم الفطر حتَّى تُخْرجَ الصدقةَ، وتطعم شيئا قبل أن تخرج.
حسن: رواه الطبراني في الكبير (11/ 141، 142) عن الحسين بن جعفر القتات الكوفي، ثنا إسماعيل بن الخليل الخزاز، ثنا علي بن مسهر، عن الحجاج بن أرطاة، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
والحسين بن جعفر القتات قال الدارقطني: صدوق. والحجاج بن أرطاة مدلس، وقد عنعن لكنه توبع.
تابعه ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: من السنة أن لا تخرج يوم الفطر حتى
تطعم، ولا يوم النحر حتى ترجع.
رواه الطبراني في الأوسط (454) عن أحمد بن خليد، حدثنا إسحاق بن عبد الله التميمي الأذني، حدثنا إسماعيل ابن علية، عن ابن جريج، عن عطاء، به.
والحديث بهذين الإسنادين يرتقي إلى درجة الحسن.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 99):"رواه البزار والطبراني في الأوسط والكبير، وإسناد الطبراني حسن".
ورواه البزار"كشف الأستار" (651) عن إبراهيم بن هانئ، ثنا محمد بن عبد الوهاب، عن أبي شهاب عبد ربه بن نافع -كوفي مشهور-، عن الأعمش، عن مسلم بن صبيح، عن ابن عباس قال: من السنة أن يطعم قبل أن يخرج ولو بتمرة.
قال البزار:"لا نعلمه بهذا اللفظ إلا بهذا الإسناده، وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 99):"رواه البزار وفيه من لم أعرفه".
لعله أراد به شيخ البزار، والبقية معروفون.
وفي الباب عن ابن عمر رواه ابن ماجه وفيه جُبارة بن المُغَلِّس وشيخه مندل بن علي ضعيفان، وعن علي بن أبي طالب عند الطبراني وفيه سوار بن مصعب وهو ضعيف، وعن ابن عباس عند الطبراني والدارقطني وفيه الحجاج بن أرطأة مختلف فيه ورواه البزار من وجه آخر قال فيه الهيثمي في"المجمع" (2/ 202):"فيه من لا أعرفه" وعن جابر بن سمرة عند البزار وفي إسناده ناصح أبو عبد الله ضعَّفه ابن معين والبخاري وأبو داود وغيرهم، وعن أبي سعيد الخدري رواه الإمام أحمد (11226) وفيه عبد الله بن محمد بن عقيل وهو يُحسَّن حديثه إذا لم يخالِف، وقد أتي في هذا الحديث بشيء منكر وهو قوله: فإذا قضى صلاته صلى ركعتين. والصحيح الثابت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه ما كان يصلي قبل صلاة العيد ولا بعده.
ونظرًا لهذه الأحاديث والآثار الواردة عن الصحابة والتابعين ذهب الجمهور إلى تعجيل الإفطار يوم الفطر قبل الخروج، وتأخيره يوم الأضحى إلَّا أنَّ الإمام أحمد أحبَّ لمن عنده أضحية.
قال البوصيري في الزوائد: فيه جُبارة ضعف، وحجاج بن تميم ضعيف أيضًا.
وكذلك لا يصح ما روي عن الفا كهـ بن سعد، وكانت له صحبة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يغتسل يوم الفطر، ويوم النحر، ويوم عرفة، وكان الفاكه يأمر أهله بالغسل في هذه الأيام.
رواه ابن ماجه (1316) عن نصر بن علي الجهضمي قال: حدثنا يوسف بن خالد، قال: حدثنا أبو جعفر الخطْمِي، عن عبد الرحمن بن عقبة بن الفا كهـ بن سعد، عن جده الفاكه بن سعد فذكره.
وفيه يوسف بن خالد السمتي قال فيه ابن معين: كذاب زنديق لا يكتب عنه، وقال في موضع آخر: كذاب خبيث عدو الله، رجل سوء.
وكذبه أيضًا أبو داود والفلاس، وقال النسائي: متروك الحديث.
وقال ابن حبان: كان يضع الحديث على الشيوخ ويقرأ عليهم، ثم يرويها عنهم، لا تحل الرواية عنه بحيلة، ولا يجوز الاحتجاج به بحال.
وفيه أيضًا عبد الرحمن بن عقبة بن الفاكه مجهول.
والحديث رواه عبد الله بن أحمد في زوائده على مسند أبيه (16720) عن نصر بن علي به وزاد فيه"يوم الجمعة".
ومنها حديث أبي رافع رواه البزار"كشف الأستار" (648) من طريق مندل، عن محمد بن عبد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم اغتسل للعيدين.
قال الزيلعي في"نصب الراية" (1/ 86): ذكره عبد الحق في"أحكامه" من جهة البزار. وقال: إسناده ضعيف.
قال ابن القطان في كتابه: وعلته محمد بن عبيدالله. قال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث واهيه، وقال البخاري: منكر الحديث. ومندل بن علي أشبه حالًا منه، مع أنَّه ضعيف. انتهي.
وقال الهيثمي في"المجمع" مندل فيه كلام، ومحمد هذا ومن فوقه لا أعرفهم.
والخلاصة: أنَّهُ لم يثبت في هذا الباب شيءٌ مرفوع يُعتمد عليه، قال البزار:"لا أحفظ في الاغتسال في العيدين حديثًا صحيحًا" انظر"التلخيص الحبير" (2/ 81).
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এটা সুন্নাহ যে, তুমি ঈদুল ফিতরের দিন বের হবে না, যতক্ষণ না সাদাকাহ (ফিতর) আদায় কর এবং বের হওয়ার পূর্বে কিছু খাও।
3060 - عن ابن عمر قال: إن عمر أخذ جبةً من استبرق تُباع في السوق، فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! ابتع هذه، تجمل بها للعيد والوفود، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّما هذه لباس من لا خلاق له فلبث عمر ما شاء الله أن يلبثَ، ثم أرسل إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم بِجُبَّةِ ديباجٍ، فأقبل بها عمر، فأتي بها رسول الله صلى الله عليه وسلم
فقال: يا رسول الله! إنك قلت: إنَّما هذه لباس من لا خلاق له، وأرسلت إليَّ بهذه الجُبَّةِ؟ ! ، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: تَبيعُها أو تُصيب بها حاجتَك".
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (948) عن أبي اليمان، قال: أخبرنا شُعيب، عن الزهري، قال: أخبرني سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكره.
والحديث رواه مالك في اللباس (18) عن نافع، عن عبد الله إلَّا أنَّه قال:"للجمعة والوفود" بدلًا من"للعيد والوفود" وزاد في آخره:"فكساها عمر أخًا له مشرِكًا بمكَّة".
ورواه البخاري في الجمعة (886) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في اللِّباس والزينة (2068) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
وسوف يأتي في كتاب الجمعة بالتفصيل أكثر.
قال الحافظ: ووجه الاستدلال به من جهة تقريره صلى الله عليه وسلم لعمر على أصل التجمل للجمعة (وكذلك للعيد) وقصر الإنكار على لبس مثل تلك الحُلَّة لكونها كانت حريرًا".
وأمَّا ما رُوِي عن جابر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يلبس بُرْدَهُ الأحمر في العيدين والجمعة، ففيه الحجاج بن أرطاة وهو ليِّن الحديث لكثرة أخطائه وتدليسه. رواه ابن خزيمة (1766) ولفظه: كانت للنبي صلى الله عليه وسلم جبة يلبسها في العيدين، ويوم الجمعة، والبيهقي (3/ 280) كلاهما عن الحجاج ابن أرطاة، عن أبي جعفر، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وكذلك لا يصح ما رواه الشافعي عن إبراهيم بن محمد، ثنا جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يلبس بردة حَبْرَةً في كل عيدٍ. فإنَّه ضعيف مع إرساله كما قال الذهبي في"المهذب في اختصار السنن الكبري" (5455)، وضعفه أيضًا النووي في الخلاصة" (2890).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাজার থেকে ইসতাবরাকের (ঘন রেশমি কাপড়) একটি জুব্বা (পোশাক) নিলেন, যা বিক্রি হচ্ছিল। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি এটি কিনে নিন, আপনি এটি দিয়ে ঈদ ও প্রতিনিধি দলের (অভ্যর্থনার) জন্য সৌন্দর্যবর্ধন করতে পারবেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "এটি কেবল তার পোশাক, যার আখিরাতে কোনো অংশ নেই।" অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহ যতটুকু চাইলেন ততটুকু সময় অপেক্ষা করলেন, তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে একটি রেশমি জুব্বা পাঠালেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা নিয়ে এলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনিই তো বলেছিলেন, 'এটি কেবল তার পোশাক, যার আখিরাতে কোনো অংশ নেই,' আর আপনি আমার নিকট এই জুব্বাটি পাঠালেন?! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "তুমি এটা বিক্রি করে দাও অথবা এর মাধ্যমে তোমার প্রয়োজন পূরণ করো।"
3061 - عن جابر بن عبد الله قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا كان يومُ عيد خالف الطريق.
صحيح: رواه البخاري في العيدين (986) عن محمد (بن سلام) قال: أخبرنا أبو تُميلة يحيى ابن واضح، عن فليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن جابر فذكره.
وقال البخاري:"تابعه يونس بن محمد، عن فُلَيح، وحديث جابر أصح".
هذا القول من البخاري استشكلَه كثير من أهل العلم وإليكم خلاصة ما لخَّصه الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على الترمذي (2/ 425):"وهذه العبارة مُشكِلة، أطال الكلام عليها الحافظ في الفتح (2/ 473)، ورجح سقوط شيءٍ منها، دل عليه بعض نُسُخ البخاري والمستخرجات والأطراف، وعندي نسخة صحيحة عتيقة من صحيح البخاري، مكتوبة في شيراز سنة 834 هـ فيها الكلام على الصواب، وهو:"تابعه يونس بن محمد عن فليح، وقال محمد بن الصلت عن فُليح
عن سعيد عن أبي هريرة، وحديث جابر أصح"، وانظر الفتح (2/ 393، 394) والراجح عندي أنَّ كلا الحديثين صحيح، وأنَّ سعيد بن الحارث سمعهما من جابر ومن أبي هريرة، فكان يروي مرَّةً حديثَ هذا، ومرَّة حديث ذاك، ويُؤَيِّده أن الحاكم رواه في المستدرك (1/ 296) من طريق يونس ابن محمد عن فُليح عن سعيد، عن أبي هريرة، وصححه هو والذهبي على شرط الشيخين، ونسب ابن حجر هذه الرواية أيضًا إلى ابن خزيمة، والبيهقي، ثُمَّ قال: والذي يغلب على الظنَّ أنَّ الاختلافَ فيه من فُليح، فلعل شيخه سمعه من جابر ومن أبي هريرة، ويقوي ذلك اختلاف اللفظين، وقد رجَّح البخاري أنَّه عن جابر، وخالفه أبو مسعود والبيهقي فرجَّحا أنَّه عن أبي هريرة، ولم يظهر لي في ذلك ترجيح". هكذا قال الحافظ، وأنا أرجَّح صحتهما معًا" انتهى.
قلت: وحديث أبي هريرة رواه الترمذي (541) والإمام أحمد (8454)، وابن خزيمة (1468)، وابن حبان (2815)، والحاكم (1/ 296)، والبيهقي (3/ 308)، وابن ماجه (1301) في بعض النسخ كلهم من طرق عن فُليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن أبي هريرة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا خرج يوم العيد في طريق رجع في غيره.
قال الترمذي:"حديث أبي هريرة حسن غريب، وروى أبو تُميلة ويونس بن محمد هذا الحديث عن فُليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن جابر بن عبد الله.
وقد استحب بعض أهل العلم للإمام إذا خرج في طريق أن يرجع في غيره، اتباعًا لهذا الحديث، وهو قول الشافعي، وحديث جابر كأنَّه أصح". انتهي.
قلت: وفي الباب عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم أخذ يوم العيد في طريق، ثم رجع في طريق. رواه أبو داود (1156)، وابن ماجه (1299)، والإمام أحمد (5879)، والحاكم (1/ 296)، والبيهقي (3/ 308) كلهم من طريق عبد الله بن عمر، عن نافع، عن عبد الله بن عمر بن الخطاب فذكره واللفظ لأبي داود.
وعبد الله بن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب العمري ضعيف.
وعن أبي رافع أخرجه ابن ماجه (1300) وفيه مندل بن علي وشيخه محمد بن عبيدالله بن أبي رافع ضعيفان. وعن غيرهما وكلها ضعيفة.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিয়ম ছিল, যখন ঈদের দিন আসত, তিনি (যাওয়ার এবং ফেরার) পথ ভিন্ন করতেন।
3062 - عن يزيد بن خُمير الرحبي قال: خرج عبد الله بن بُسْرٍ صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم مع الناس في يوم عيدِ فِطرٍ، أو أضحىً، فأنكر إبطاء الإمام فقال: إنَّا كنَّا قد فرغنا ساعتنا هذه، وذلك حين التسبيح.
حسن: رواه أبو داود (1135) عن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو المغيرة، حدثنا صفوان، حدثنا يزيد بن خُمير الرحبي فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 295) وعنه البيهقي (3/ 282) من طريق القَطيعي، ثنا عبد الله بن أحمد، ثني أبي به مثله.
وقد أورده الحافظ ابن حجر في"أطراف المسند" (2/ 688) (3075) وفي"إتحاف المهرة" (6/ 530) (6938) ولم أجد هذا الحديث في مسند الإمام أحمد في النسخة المطبوعة، فلعله في النسخ الخطية التي كانت عند الحافظ.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".
والصواب أنه على شرط مسلم، كما قال النووي في"الخلاصة" (2914) لأنَّ البخاري إنَّما روي عن الرحبي تعليقًا، ولكن تبين لي بعد الدراسة أنَّ الحاكم لا يفرق بين ما رواه البخاري معلقًا ومسندًا في الحكم على رجاله، والرحبي هذا صدوق، وبه صار الإسناد حسنًا.
والحديث رواه أيضًا ابن ماجه (1317) من وجه آخر عن صفوان بن عمرو به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঈদুল ফিতর অথবা ঈদুল আযহার দিনে লোকদের সাথে বের হলেন। অতঃপর তিনি ইমামের বিলম্ব দেখে অসন্তুষ্টি প্রকাশ করে বললেন: আমরা তো এই সময়েই (নামাজ) শেষ করে ফেলতাম। আর তা ছিল তাসবীহ পড়ার সময় (অর্থাৎ সূর্যোদয়ের পর)।
3063 - عن ابن عباس أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى يوم الفِطر ركعتين، لم يُصَلِّ قبلها ولا بعدها، ثم أتى النساء، ومعه بلال، فأمرهن بالصدقة، فجعلن يُلْقِينَ، تُلْقي المرأةُ خُرْصَها وسِخابَها.
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (964)، ومسلم في العيدين (884) كلاهما من حديث شعبة، عن عَدِيّ بن ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس واللفظ للبخاري، وفي مسلم:"أضحى أو فطر".
والخرُص: الحلقة الصغيرة من الحُلِيِّ.
والسِخاب: وجمعه سُخُب ككتاب وكتب، هو قلادة من طيب معجون على هيئة الخرز، يكون من مسك أو قرنفل، أو غيرهما من الطيب، وليس فيه شيء من الجوهر، يلبسها الصبيان والجواري.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঈদুল ফিতরের দিন দু'রাকাআত সালাত আদায় করেন। তিনি এর পূর্বে বা পরে কোনো সালাত আদায় করেননি। অতঃপর তিনি মহিলাদের কাছে এলেন, তাঁর সাথে বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তিনি তাদেরকে সাদাকা করার নির্দেশ দিলেন। ফলে তারা (তা দান করতে) শুরু করলেন। মহিলারা তাদের কানের ছোট রিং (খুরস) এবং সুগন্ধিযুক্ত গলার হার (সিখাব) ছুঁড়ে দিতে লাগলেন।
3064 - عن أبي سعيد الخدري أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخرج يوم العيد، فيُصلِّي ركعتين، ثمَّ يخطب فيأمر بالصدقة، فيكون أكثرُ من يتصدق النساء، فإن كانت له حاجة، أو أراد أن يبعث بعثًا تكلَّم وإلَّا رجع.
صحيح: رواه النسائي (1579) عن عمرو بن علي قال: حدثنا يحيى (وهو ابن سعيد القطان) قال: حدثنا داود بن قيس، قال: حدثني عياض (وهو ابن عبد الله بن أبي سرح) عن أبي سعيد فذكره ورواه عبد الرزاق (5634) وعنه الإمام أحمد (11507) وعن يحيى بن سعيد (11508) قال عبد الرزاق: بالخاتم والقُرط والشيء فذكر معناه.
ورواه ابن ماجه (1288) عن أبي كريب قال: حدثنا أبو أسامة قال: حدثنا داود بن قيس وفيه:
كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخرج يوم العيد، فيصلي بالناس ركعتين، ثمّ يُسلم فيقفُ على رجليه، فيستقبل الناسَ وهم جلوس، فيقول:"تصدَّقوا تصدقوا" فأكثر من يتصدق النساءُ بالقُرْط والخاتَم والشيء، فإن كانت له حاجة يُريد أن يبعث بعثًا يذكره لهم، وإلَّا انصرف.
وأصل حديث أبي سعيد في الصَّحيحين وغيرهما وسيأتي في باب"الصّلاة قبل الخطبة".
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন বের হতেন। তিনি দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন। এরপর তিনি খুতবা দিতেন এবং সাদকা করার নির্দেশ দিতেন। তখন অধিকাংশ মহিলা সাদকা করতো। যদি তাঁর কোনো প্রয়োজন থাকতো, অথবা তিনি কোনো সেনাবাহিনী পাঠাতে চাইতেন, তবে সে বিষয়ে কথা বলতেন, অন্যথায় ফিরে যেতেন।
3065 - عن عمر بن الخطّاب قال: صلاة الأضحى ركعتان، وصلاة الفطر ركعتان، وصلاة المسافر ركعتان، وصلاة الجمعة ركعتان، تمام ليس بقصْر على لسان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه ابن ماجة (1064) عن محمد بن عبد الله بن نُمَير، ثنا محمد بن بشرٍ، قال: أنبأنا يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن زُبَيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن عمر، فذكره.
ورواه ابن خزيمة (1425) من طريق محمد بن بشر، بإسناده.
يزيد بن أبي زياد بن أبي الجعد الأشجعي الكوفيّ، وثَّقه ابن معين، والعجليّ، وقال أبو حاتم:"ما بحديثه بأس". ولكنَّه خالفه سفيان، فرواه عن زبيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمر. ومن هذا الطريق رواه النسائي (1420، 1566) والإمام أحمد (357) وابن حبَّان (2783).
وهذا منقطع، لأنَّ عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يُدرك عمر كما قال ابن المديني ويحيي بن معين وشعبة وغيرهم، وقد قيل: يُحتمل سماعه منه؛ لأنَّه وُلد في خلافة الصديق، أو قبله، وقد رجَّح أبو حاتم الرواية المنقطعة، كما في"العلل" (1/ 138)، لأنَّ سفيان أحفظ من يزيد بن زياد.
وقال غيره: زيادة الثقة مقبولة. والله أعلم.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ঈদুল আযহার সালাত দুই রাকাত, ঈদুল ফিতরের সালাত দুই রাকাত, মুসাফিরের সালাত দুই রাকাত এবং জুমুআর সালাত দুই রাকাত। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষ্যে (নির্দেশিত) এইগুলো কসর নয়, বরং পূর্ণ (সালাত)।
3066 - عن ابن عمر أنَّه خرج يوم عيد فلم يُصَلِّ قبلها ولا بعدها، وذكر أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فعله.
حسن: رواه الترمذيّ (538) عن أبي عمار الحسين بن حُريث، حَدَّثَنَا وكيع، عن أبان بن عبد الله البجليّ، عن أبي بكر بن حفص، وهو ابن عمر بن سعد بن وقَّاص، عن ابن عمر فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (5212)، والحاكم (1/ 295)، والبيهقي (3/ 302)، وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: هو حسن لأجل الكلام في أبان بن عبد الله البجلي فإنه وإن كان من رجال الجماعة، فقد تكلَّم فيه ابن حبَّان فقال: ممن فحش خطؤه وانفرد بالمناكير.
قلت: إنه لم يأتِ هنا بما ينكر عليه، وهو"صدوق في نفسه".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঈদের দিন বের হলেন এবং ঈদের সালাতের পূর্বে বা পরে কোনো সালাত আদায় করলেন না। আর তিনি উল্লেখ করেন যে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরূপই করতেন।
3067 - عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جدِّه أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يُصلِّ قبلها ولا بعدها في عيد.
حسن: رواه ابن حبَّان (1292) عن علي بن محمد قال: حَدَّثَنَا وكيع، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن للكلام في عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي غير أنه حسن الحديث. انظر تفصيل ذلك في باب تكبيرات العيدين.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন এর (ঈদের সালাতের) আগে কিংবা পরে কোনো সালাত আদায় করেননি।
