হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3061)


3061 - عن جابر بن عبد الله قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا كان يومُ عيد خالف الطريق.

صحيح: رواه البخاري في العيدين (986) عن محمد (بن سلام) قال: أخبرنا أبو تُميلة يحيى ابن واضح، عن فليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن جابر فذكره.

وقال البخاري:"تابعه يونس بن محمد، عن فُلَيح، وحديث جابر أصح".

هذا القول من البخاري استشكلَه كثير من أهل العلم وإليكم خلاصة ما لخَّصه الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على الترمذي (2/ 425):"وهذه العبارة مُشكِلة، أطال الكلام عليها الحافظ في الفتح (2/ 473)، ورجح سقوط شيءٍ منها، دل عليه بعض نُسُخ البخاري والمستخرجات والأطراف، وعندي نسخة صحيحة عتيقة من صحيح البخاري، مكتوبة في شيراز سنة 834 هـ فيها الكلام على الصواب، وهو:"تابعه يونس بن محمد عن فليح، وقال محمد بن الصلت عن فُليح
عن سعيد عن أبي هريرة، وحديث جابر أصح"، وانظر الفتح (2/ 393، 394) والراجح عندي أنَّ كلا الحديثين صحيح، وأنَّ سعيد بن الحارث سمعهما من جابر ومن أبي هريرة، فكان يروي مرَّةً حديثَ هذا، ومرَّة حديث ذاك، ويُؤَيِّده أن الحاكم رواه في المستدرك (1/ 296) من طريق يونس ابن محمد عن فُليح عن سعيد، عن أبي هريرة، وصححه هو والذهبي على شرط الشيخين، ونسب ابن حجر هذه الرواية أيضًا إلى ابن خزيمة، والبيهقي، ثُمَّ قال: والذي يغلب على الظنَّ أنَّ الاختلافَ فيه من فُليح، فلعل شيخه سمعه من جابر ومن أبي هريرة، ويقوي ذلك اختلاف اللفظين، وقد رجَّح البخاري أنَّه عن جابر، وخالفه أبو مسعود والبيهقي فرجَّحا أنَّه عن أبي هريرة، ولم يظهر لي في ذلك ترجيح". هكذا قال الحافظ، وأنا أرجَّح صحتهما معًا" انتهى.

قلت: وحديث أبي هريرة رواه الترمذي (541) والإمام أحمد (8454)، وابن خزيمة (1468)، وابن حبان (2815)، والحاكم (1/ 296)، والبيهقي (3/ 308)، وابن ماجه (1301) في بعض النسخ كلهم من طرق عن فُليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن أبي هريرة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا خرج يوم العيد في طريق رجع في غيره.

قال الترمذي:"حديث أبي هريرة حسن غريب، وروى أبو تُميلة ويونس بن محمد هذا الحديث عن فُليح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن جابر بن عبد الله.

وقد استحب بعض أهل العلم للإمام إذا خرج في طريق أن يرجع في غيره، اتباعًا لهذا الحديث، وهو قول الشافعي، وحديث جابر كأنَّه أصح". انتهي.

قلت: وفي الباب عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم أخذ يوم العيد في طريق، ثم رجع في طريق. رواه أبو داود (1156)، وابن ماجه (1299)، والإمام أحمد (5879)، والحاكم (1/ 296)، والبيهقي (3/ 308) كلهم من طريق عبد الله بن عمر، عن نافع، عن عبد الله بن عمر بن الخطاب فذكره واللفظ لأبي داود.

وعبد الله بن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب العمري ضعيف.

وعن أبي رافع أخرجه ابن ماجه (1300) وفيه مندل بن علي وشيخه محمد بن عبيدالله بن أبي رافع ضعيفان. وعن غيرهما وكلها ضعيفة.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিয়ম ছিল, যখন ঈদের দিন আসত, তিনি (যাওয়ার এবং ফেরার) পথ ভিন্ন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3062)


3062 - عن يزيد بن خُمير الرحبي قال: خرج عبد الله بن بُسْرٍ صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم مع الناس في يوم عيدِ فِطرٍ، أو أضحىً، فأنكر إبطاء الإمام فقال: إنَّا كنَّا قد فرغنا ساعتنا هذه، وذلك حين التسبيح.

حسن: رواه أبو داود (1135) عن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو المغيرة، حدثنا صفوان، حدثنا يزيد بن خُمير الرحبي فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 295) وعنه البيهقي (3/ 282) من طريق القَطيعي، ثنا عبد الله بن أحمد، ثني أبي به مثله.

وقد أورده الحافظ ابن حجر في"أطراف المسند" (2/ 688) (3075) وفي"إتحاف المهرة" (6/ 530) (6938) ولم أجد هذا الحديث في مسند الإمام أحمد في النسخة المطبوعة، فلعله في النسخ الخطية التي كانت عند الحافظ.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".

والصواب أنه على شرط مسلم، كما قال النووي في"الخلاصة" (2914) لأنَّ البخاري إنَّما روي عن الرحبي تعليقًا، ولكن تبين لي بعد الدراسة أنَّ الحاكم لا يفرق بين ما رواه البخاري معلقًا ومسندًا في الحكم على رجاله، والرحبي هذا صدوق، وبه صار الإسناد حسنًا.

والحديث رواه أيضًا ابن ماجه (1317) من وجه آخر عن صفوان بن عمرو به مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঈদুল ফিতর অথবা ঈদুল আযহার দিনে লোকদের সাথে বের হলেন। অতঃপর তিনি ইমামের বিলম্ব দেখে অসন্তুষ্টি প্রকাশ করে বললেন: আমরা তো এই সময়েই (নামাজ) শেষ করে ফেলতাম। আর তা ছিল তাসবীহ পড়ার সময় (অর্থাৎ সূর্যোদয়ের পর)।









আল-জামি` আল-কামিল (3063)


3063 - عن ابن عباس أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى يوم الفِطر ركعتين، لم يُصَلِّ قبلها ولا بعدها، ثم أتى النساء، ومعه بلال، فأمرهن بالصدقة، فجعلن يُلْقِينَ، تُلْقي المرأةُ خُرْصَها وسِخابَها.

متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (964)، ومسلم في العيدين (884) كلاهما من حديث شعبة، عن عَدِيّ بن ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس واللفظ للبخاري، وفي مسلم:"أضحى أو فطر".

والخرُص: الحلقة الصغيرة من الحُلِيِّ.

والسِخاب: وجمعه سُخُب ككتاب وكتب، هو قلادة من طيب معجون على هيئة الخرز، يكون من مسك أو قرنفل، أو غيرهما من الطيب، وليس فيه شيء من الجوهر، يلبسها الصبيان والجواري.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঈদুল ফিতরের দিন দু'রাকাআত সালাত আদায় করেন। তিনি এর পূর্বে বা পরে কোনো সালাত আদায় করেননি। অতঃপর তিনি মহিলাদের কাছে এলেন, তাঁর সাথে বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তিনি তাদেরকে সাদাকা করার নির্দেশ দিলেন। ফলে তারা (তা দান করতে) শুরু করলেন। মহিলারা তাদের কানের ছোট রিং (খুরস) এবং সুগন্ধিযুক্ত গলার হার (সিখাব) ছুঁড়ে দিতে লাগলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3064)


3064 - عن أبي سعيد الخدري أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخرج يوم العيد، فيُصلِّي ركعتين، ثمَّ يخطب فيأمر بالصدقة، فيكون أكثرُ من يتصدق النساء، فإن كانت له حاجة، أو أراد أن يبعث بعثًا تكلَّم وإلَّا رجع.

صحيح: رواه النسائي (1579) عن عمرو بن علي قال: حدثنا يحيى (وهو ابن سعيد القطان) قال: حدثنا داود بن قيس، قال: حدثني عياض (وهو ابن عبد الله بن أبي سرح) عن أبي سعيد فذكره ورواه عبد الرزاق (5634) وعنه الإمام أحمد (11507) وعن يحيى بن سعيد (11508) قال عبد الرزاق: بالخاتم والقُرط والشيء فذكر معناه.

ورواه ابن ماجه (1288) عن أبي كريب قال: حدثنا أبو أسامة قال: حدثنا داود بن قيس وفيه:
كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخرج يوم العيد، فيصلي بالناس ركعتين، ثمّ يُسلم فيقفُ على رجليه، فيستقبل الناسَ وهم جلوس، فيقول:"تصدَّقوا تصدقوا" فأكثر من يتصدق النساءُ بالقُرْط والخاتَم والشيء، فإن كانت له حاجة يُريد أن يبعث بعثًا يذكره لهم، وإلَّا انصرف.

وأصل حديث أبي سعيد في الصَّحيحين وغيرهما وسيأتي في باب"الصّلاة قبل الخطبة".




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন বের হতেন। তিনি দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন। এরপর তিনি খুতবা দিতেন এবং সাদকা করার নির্দেশ দিতেন। তখন অধিকাংশ মহিলা সাদকা করতো। যদি তাঁর কোনো প্রয়োজন থাকতো, অথবা তিনি কোনো সেনাবাহিনী পাঠাতে চাইতেন, তবে সে বিষয়ে কথা বলতেন, অন্যথায় ফিরে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3065)


3065 - عن عمر بن الخطّاب قال: صلاة الأضحى ركعتان، وصلاة الفطر ركعتان، وصلاة المسافر ركعتان، وصلاة الجمعة ركعتان، تمام ليس بقصْر على لسان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه ابن ماجة (1064) عن محمد بن عبد الله بن نُمَير، ثنا محمد بن بشرٍ، قال: أنبأنا يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن زُبَيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن عمر، فذكره.

ورواه ابن خزيمة (1425) من طريق محمد بن بشر، بإسناده.

يزيد بن أبي زياد بن أبي الجعد الأشجعي الكوفيّ، وثَّقه ابن معين، والعجليّ، وقال أبو حاتم:"ما بحديثه بأس". ولكنَّه خالفه سفيان، فرواه عن زبيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمر. ومن هذا الطريق رواه النسائي (1420، 1566) والإمام أحمد (357) وابن حبَّان (2783).

وهذا منقطع، لأنَّ عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يُدرك عمر كما قال ابن المديني ويحيي بن معين وشعبة وغيرهم، وقد قيل: يُحتمل سماعه منه؛ لأنَّه وُلد في خلافة الصديق، أو قبله، وقد رجَّح أبو حاتم الرواية المنقطعة، كما في"العلل" (1/ 138)، لأنَّ سفيان أحفظ من يزيد بن زياد.

وقال غيره: زيادة الثقة مقبولة. والله أعلم.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ঈদুল আযহার সালাত দুই রাকাত, ঈদুল ফিতরের সালাত দুই রাকাত, মুসাফিরের সালাত দুই রাকাত এবং জুমুআর সালাত দুই রাকাত। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষ্যে (নির্দেশিত) এইগুলো কসর নয়, বরং পূর্ণ (সালাত)।









আল-জামি` আল-কামিল (3066)


3066 - عن ابن عمر أنَّه خرج يوم عيد فلم يُصَلِّ قبلها ولا بعدها، وذكر أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فعله.

حسن: رواه الترمذيّ (538) عن أبي عمار الحسين بن حُريث، حَدَّثَنَا وكيع، عن أبان بن عبد الله البجليّ، عن أبي بكر بن حفص، وهو ابن عمر بن سعد بن وقَّاص، عن ابن عمر فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (5212)، والحاكم (1/ 295)، والبيهقي (3/ 302)، وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: هو حسن لأجل الكلام في أبان بن عبد الله البجلي فإنه وإن كان من رجال الجماعة، فقد تكلَّم فيه ابن حبَّان فقال: ممن فحش خطؤه وانفرد بالمناكير.

قلت: إنه لم يأتِ هنا بما ينكر عليه، وهو"صدوق في نفسه".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঈদের দিন বের হলেন এবং ঈদের সালাতের পূর্বে বা পরে কোনো সালাত আদায় করলেন না। আর তিনি উল্লেখ করেন যে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরূপই করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3067)


3067 - عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جدِّه أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يُصلِّ قبلها ولا بعدها في عيد.
حسن: رواه ابن حبَّان (1292) عن علي بن محمد قال: حَدَّثَنَا وكيع، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وإسناده حسن للكلام في عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي غير أنه حسن الحديث. انظر تفصيل ذلك في باب تكبيرات العيدين.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন এর (ঈদের সালাতের) আগে কিংবা পরে কোনো সালাত আদায় করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (3068)


3068 - عن أبي سعيد الخدريّ قال:"كان رسول الله لا يُصَلِّي قبل العيد شيئًا، فإذا رجع إلى منزله صلَّى ركعتين".

حسن: رواه ابن ماجة (1293)، وأحمد (11226)، وابن خزيمة (1469)، والحاكم (1/ 297) كلّهم من حديث عبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن عطاء ابن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عَقيل فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.

قال الحاكم:"هذه سنة عزيزة بإسناد صحيح".

وحسَّنه الحافظ في"الفتح" (2/ 476) وقال أيضًا:"والحاصل أنَّ صلاة العيد لم يثبت لها سنة قبلها ولا بعدها خلافًا لمن قاسها على الجمعة" انتهى.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের আগে কোনো সালাত আদায় করতেন না। অতঃপর যখন তিনি তাঁর বাড়িতে ফিরতেন, তখন দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3069)


3069 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُكبِّر في الفِطر والأضحى: في الأوّلى سبع تكبيرات، وفي الثانية خمس تكبيرات.

حسن: رواه أبو داود (1149) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

وابن لهيعة فيه كلام معروف لسوء حفظه واختلاطه، لكن رواية قُتَيبة بن سعيد عنه مستقيمة، ورواه عنه أيضًا عبد الله بن وهب، وهو قديم السماع منه.

قال عبد الغني بن سعيد الأزدي: إذا روى العبادلة عن ابن لهيعة فهو صحيح، وهم: ابن المبارك وابن وهب والمقرئ كذا في"تهذيب التهذيب".

فقد روى أبو داود (1150) عن ابن السرح، أخبرنا ابن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن خالد بن يزيد، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كبَّر في الفِطر والأضحى سبعًا وخمسًا سوي تكبيرتَيْ الرّكوع.

ورواه ابن ماجة (1280) عن حرملة بن يحيى، حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني ابن لهيعة، عن خالد بن يزيد وعُقيل، عن ابن شهاب به مثله. فجمع بين خالد وعُقيل وهما من شيوخ ابن لهيعة
فتارة يروي عن هذا، وتارةً عن هذا وكله صحيح. وإليه أشار محمد بن يحيى الذهلي قائلًا: هذا هو المحفوظ؛ لأنَّ ابن وهب قديم السماع من ابن لهيعة. انظر"السنن الكبري" (3/ 287).

وأمّا ما نقله الترمذيّ في"العلل الكبير" (1/ 288، 289) عن البخاريّ بأنَّه ضعَّفه وقال: لا أعلمه رواه غير ابن لهيعة. وقال أيضًا الحاكم (1/ 298):"تفرّد به عبد الله بن لهيعة، وقد استشهد به مسلم في موضعين".

فهو كلام متّجه، لأنَّ مداره على ابن لهيعة، ولكن في رأي جمهور أهل العلم أن تفرده لا يضر ما دام روى عنه أحد العبادلة وهم قديم السماع منه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহাতে (সালাতে) তাকবীর দিতেন: প্রথম রাকা‘আতে সাতটি তাকবীর এবং দ্বিতীয় রাকা‘আতে পাঁচটি তাকবীর।









আল-জামি` আল-কামিল (3070)


3070 - عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"التكبير في الفطر سبعٌ في الأوّلى، وخمسٌ في الآخرة، والقراءة بعدهما كلتيهما".

حسن: رواه أبو داود (1151) عن مسدد، حَدَّثَنَا المعتمر، قال: سمعتُ عبد الله بن عبد الرحمن الطائفيّ، يحدِّث عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.

ومن طريقه رواه الدَّارقطنيّ (2/ 48)، والبيهقي (3/ 285).

وإسناده حسن لأجل الكلام في عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي غير أنه حسن الحديث، وقد وثَّقه ابن معين في رواية، وفي رواية قال: صويلح، وفي رواية: ضعيف، وضعَّفه أيضًا النسائيّ ووثَّقه العجليّ، وقال البخاريّ: مقارب الحديث. وصحَّح هذا الحديث فيما نقله الترمذيّ في"العلل الكبير" (1/ 288) ونقل الحافظ ابن حجر في التلخيص: تصحيحه عن الإمام أحمد.

وقال في الفتوحات الربانية (4/ 241):"حسن صحيح".

وقال النوويّ في"المجموع" (5/ 21):"صحيح، رواه أبو داود وغيره بأسانيد حسنة".

ثمّ قال أبو داود: ورواه وكيع وابن المبارك، قالا: سبْعًا وخمسًا.

قلت: حديث وكيع روى عنه الإمام أحمد (688) عن عبد الله بن عبد الرحمن سمعه من عمرو ابن شعيب، عن أبيه، عن جده، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كبَّر في عيدٍ ثنتي عشرة تكبيرة، سبْعًا في الأوّلى، وخمسًا في الآخرة، ولم يُصَلِّ قبلها ولا بعدها.

وحديث ابن المبارك رواه ابن ماجة (1278) عن محمد بن العلاء، عن ابن المبارك، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن يعلى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كبَّر في صلاة العيد سبْعًا وخمسًا.

وكذلك رواه أبو نُعَيم، عن عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي قال: سمعت عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر في العيد يوم الفطر سبعًا في الأولى، وفي الآخرة خمسًا سوي تكبيرة الإحرام. رواه الدَّارقطني من طريقه، فجعل وكيع وابن المبارك وأبو نعيم من فعل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لا من قوله، وهذا هو الأرجح وهو الذي صحَّحه البخاريّ.
وفيه ردٌّ على ما رواه سليمان بن حيَّان، عن أبي يعلى الطائفي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُكبِّر في الفطر في الأوّلى سبعا، ثمّ يقرأ ثمّ يكبر، ثمّ يقوم، فيكبر أربعًا، ثمّ يقرأ، ثمّ يركع، رواه أبو داود (1152) عن أبي توبة الربيع بن نافع، عن سليمان بن حيان به.

فجعل في الثانية أربعًا.

وسليمان بن حيان -أبو خالد- وإن كان من رجال الشّيخين إِلَّا أنَّه كان يخطئ كما في التقريب. وهذا من خطئه. وإليه يشير البيهقيّ (3/ 285، 286) عقب روايته عن أبي داود، عن مسدد، ثنا المعتمر، عن عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي قال: وكذلك رواه ابن المبارك ووكيع وأبو عاصم وعثمان بن عمر وأبو نعيم، عن عبد الله. وفي كل ذلك دلالة على خطأ رواية سليمان بن حيان، عن عبد الله الطائفي في هذا الحديث سبْعًا في الأوّلى، وأربعًا في الثانية".

وفي الباب عن ابن عباس عند الدَّارقطنيّ (2/ 66)، والحاكم (1/ 326) وفيه محمد بن عبد العزيز يرويه عن أبيه، ومحمد هذا ترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 7) فقال:"سألت أبي عنه فقال: هم ثلاثة إخوة: محمد بن عبد العزيز، وعبد الله بن عبد العزيز، وعمران بن عبد العزيز، وهم ضعفاء الحديث، ليس لهم حديث مستقيم".

وقال الحافظ في"اللسان":"قال البخاريّ: محمد بن عبد العزيز بن عمر بن عبد الرحمن بن عوف منكر الحديث، ويقال: بمشورته جُلِد مالكٌ الإمامُ.

وقال النسائيّ: متروك، وقال الدَّارقطنيّ: ضعيف.

وأمّا الحاكم فصحَّحه، ورده الذّهبيّ فقال:"عبد العزيز ضُعِّف"، يعني محمد وأبوه كلاهما ضعيفان.

وعن عمرو بن عوف، رواه الترمذيّ (536)، وابن ماجة (1279) كلاهما من حديث كثير بن عبد الله بن عمرو بن عوف، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كبَّر في العيدين في الأوّلى سبْعًا قبل القراءة، وفي الآخر خَمسًا قبل القراءة.

قال الترمذيّ:"حسن، وهو أحسن شيء رُوي في هذا الباب عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم".

وقال الترمذيّ:"سألت البخاريّ عن هذا الباب فقال:"ليس في الباب شيء أصح من هذا، وبه أقول، وحديث عبد الله بن عبد الرحمن الطائفي أيضًا صحيح، والطائفي مقارب الحديث" انتهى.

وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1438) فرواه من هذا الوجه والحق أنَّه ضعيف جدًّا، فإن كثير بن عبد الله تكلم الناس فيه كلامًا شديدًا حتى قال الشافعي رحمه الله تعالى:"هو ركن من أركان الكذب".

وقال النووي في"المجموع" (5/ 21) بعد أن ذكر كلام البخاريّ:"وهذا الذي قاله فيه نظر، لأنَّ كثير بن عبد الله ضعيف، ضعَّفه الجمهور".

وقال الحافظ في"التلخيص":"وكثير ضعيف، وقد أنكر جماعة تحسينه على الترمذي".

وأمّا ما نقله الترمذيّ عن البخاريّ فتعقبه ابن القطان قائلًا: وهذا ليس بصريح في التصحيح،
فقوله: هو أصح شيءٍ في الباب، يعني أشبه ما في الباب، وأقل ضعفًا. وقوله: وبه أقول: يحتمل أن يكون من كلام الترمذيّ، أي أنَّ أقول، إن هذا الحديث أشبه ما في الباب. وكذا قوله: وحديث الطائفي صحيح، يحتمل أن يكون من كلام الترمذيّ، وقد عُهِد منه تصحيح حديث عمرو بن شعيب، فظهر من ذلك أنَّ قول البخاري: أصح شيءٍ؛ ليس معناه صحيحًا، ثمّ تكلم على كثير بن عبد الله ونقل كلام أهل العلم في تضعيفه. انتهى.

قلت: كلام ابن القطان متجه، لأن البخاريّ لا يصحح حديث كثير بن عبد الله، إِلَّا أنه يرى أن حديث عمرو بن شعيب هو أصح ما في الباب، يعني غيره أضعف منه ولذا اعتمده أهل الحديث فجعلوا التكبير في الأوّلى سبعًا وفي الثانية خمسًا.

قلت: وفي الباب أحاديث أخرى منها حديث سعد المؤذن، وجابر بن عبد الله وابن عمر وغيرهم وكلها ضعيفة، والتي ذكرتها أصحّها.

وبه قال جماعة من الصّحابة والتابعين.

روي مالك في العيدين (9) عن نافع مولى عبد الله بن عمر، أنه قال: شهدتُ الأضحى والفِطر مع أبي هريرة، فكبَّر في الركعة الأوّلى سبع تكبيرات قبل القراءة. وفي الآخِرة خمس تكبيرات قبل القراءة.

قال مالك: وهو الأمر عندنا.

وقال الإمام أحمد: وبهذا آخذ"مسائل أحمد لابنه" (2/ 428).

وقال الترمذيّ: وهو قول أهل المدينة، وبه يقول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق، ورُوي عن عبد الله بن مسعود أنَّه قال في التكبير في العيدين: تسع تكبيرات. في الركعة الأوّلى خمسًا قبل القراءة. وفي الركعة الثانية يدا بالقراءة ثمّ يُكبِّر أربعًا مع تكبيرة الركوع، وقد رُوي عن غير واحد من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحو هذا. وهو قول أهل الكوفة وبه يقول سفيان الثوري". انتهى.

وأمّا ما رواه أبو عائشة -جليسٌ لأبي هريرة- أنَّ سعيد بن العاص سأل أبا موسى الأشعري وحذيفة بن اليمان: كيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكبِّر في الأضحى والفِطر؟ فقال أبو موسى. كان يُكبِّر أربعًا تكبيرةُ على الجنائز، فقال حذيفة: صدق، فقال أبو موسى: كذلك كنت أكبِّر في البصرة حيث كنت عليهم، وقال أبو عائشة: وأنا حاضر لسعيد بن العاص. فهو ضعيف.

رواه أبو داود (1153) عن محمد بن العلاء وابن أبي الزّناد، المعني قريب، قالا: حَدَّثَنَا زيد - يعني ابن حبَّان- عن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، قال: أخبرني أبو عائشة فذكره.

أبو عائشة غير معروف. ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" يعني عند المتابعة، ولم يتابع، فهو"لين الحديث" وأخرجه البيهقيّ (3/ 289، 290) من طريق أبي داود وقال:"قد خولف راوي هذا الحديث في موضعين، أحدهما: في رفعه، والآخر في جواب أبي موسى، والمشهور في هذه القصة أنهم أسندوا أمرهم إلى ابن مسعود، فأفتاه ابن مسعود بذلك، ولم يسنده إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم،
كذلك رواه أبو إسحاق السبيعي عن عبد الله بن موسى، أو ابن أبي موسى أنَّ سعيد بن العاص أرسل إلى ابن مسعود وحذيفة، وأبي موسى، فسألهم عن التكبير في العبد، فأسندوا أمرهم إلى ابن مسعود فقال: تكبَّر أربعًا قبل القراءة، ثمّ تقرأ، فإذا فرغت كبَّرت، فركعت، ثمّ تقوم في الثانية فتقرأ، فإذا فرغت كبَّرت أربعًا. وعبد الرحمن هو: ابن ثابت بن ثوبان ضعَّفه يحيى بن معين قال: كان رجلًا صالحًا" انتهى.

وأعلَّ ابن الجوزي في"التحقيق" لعبد الرحمن بن ثوبان قال قال ابن معين: ضعيف، وقال أحمد: لم يكن بالقويّ، وأحاديثه مناكير، قال: وليس يُروي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في تكبير العيدين حديث صحيح. انتهى.

وقال في"التنقيح" عبد الرحمن بن ثوبان وثَّقه غير واحد، وقال ابن معين: ليس به بأس، ولكن أبو عائشة، قال ابن حزم فيه: مجهول.

وقال ابن القطان:"لا أعرف حاله" انظر"نصب الراية" (2/ 215).

قال البيهقيّ بعد أن روى حديث ابن مسعود من قوله:"والمرفوع أولى مع عمل الناس".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ঈদুল ফিতরের তাকবীর হলো প্রথম (রাকআতে) সাতটি এবং শেষ (রাকআতে) পাঁচটি, আর কিরাআত (তিলাওয়াত) হবে উভয় রাকআতেই এগুলোর পরে।









আল-জামি` আল-কামিল (3071)


3071 - عن أن عمر بن الخطّاب سأل أبا واقد الليثي: ما كان يقرأ به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في الأضحى والفِطر؟ فقال: كان يقرأ فيهما بـ {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ} و {اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ} اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانْشَقَّ الْقَمَرُ} ..

صحيح: رواه مالك في العيدين (8) عن ضمرة بن سعيد المازنيّ، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، أن عمر بن الخطّاب سأل أبا واقد فذكره.

ورواه مسلم في العيدين (891) من طريق مالك به، مثله.

ولكن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة لم يدرك عمر بن الخطّاب، ولذا أورد مسلم عقبه رواية أخرى عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي واقد الليثي قال: سألني عمر بن الخطّاب عمَّا قرأ به رسول الله صلى الله عليه وسلم في يوم العيد؟ فقلت: بـ {اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ}، و. {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ}.

قال النوويّ:"الرواية الثانية متصلة، فإنه أدرك أبا واقد بلا شك، وسمعه بلا خلاف، فلا عَتَبَ على مسلم حينئذ في روايته، فإنه صحيح متصل".




আবু ওয়াকিদ আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঈদুল আযহা ও ঈদুল ফিতরের সালাতে কী তিলাওয়াত করতেন? তিনি বললেন: তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দুই সালাতে {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ} (ক্বাফ ওয়াল কুরআনিল মাজিদ) এবং {اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانْشَقَّ الْقَمَرُ} (ইক্বতারাবাতিস সা‘আতু ওয়ান শাক্কাল ক্বামার) তিলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3072)


3072 - عن النعمان بن بشير قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في العيدين وفي الجمعة بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}. قال: وإذا اجتمع العيدُ والجمعةُ في يوم واحدٍ يقرأ بهما أيضًا في الصَّلاتين.

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (878) من طرق عن جرير، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر،
عن أبيه، عن حبيب بن سالم مولى النعمان بن بشير، عن النعمان بن بشير فذكره.




নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ঈদ এবং জুমআর সালাতে 'সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ'লা' (সূরা আলা) এবং 'হাল আতাকা হাদীসুল গাশিয়াহ' (সূরা গাশিয়াহ) পাঠ করতেন। তিনি (নু'মান ইবনে বশীর) আরও বলেন, যখন একই দিনে ঈদ এবং জুমআ একত্রিত হতো, তখনও তিনি উভয় সালাতেই এই সূরা দু'টি পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3073)


3073 - عن سمرة بن جندب أنَّ رسولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في العيدين {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}.

صحيح: رواه الإمام أحمد (20080) عن محمد بن جعفر، أخبرنا شعبةُ، وحجاجُ قال: حَدَّثَنِي شعبةُ، قال: سمعت معبد بن خالد، يحدِّث عن زيد بن عُقْبة، عن سمرة بن جندب فذكره.

وإسناده صحيح. وحجاج هو: ابن محمد المصِّيصي الأعور، ورواه الطبرانيّ في الكبير (6773، 6777، 6778) من طرق عن زيد بن عقبة به مثله.

وسيأتي في كتاب الجمعة أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الجمعة بهاتين السورتين. رواه أبو داود وغيره.




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ঈদে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ’লা} এবং {হাল আতা-কা হাদীসুল গা-শিয়াহ} তেলাওয়াত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3074)


3074 - عن جابر بن سمرة قال: صلَّيْتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم العيدين غير مرَّةٍ ولا مرتين بغير أذان ولا إقامة.

صحيح: رواه مسلم في العيدين (887) من طرق عن أبي الأحوص، عن سماك، عن جابر بن سمرة فذكره.




জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একবার বা দুইবারের চেয়েও বেশি দুই ঈদের সালাত আদায় করেছি আযান ও ইকামত ছাড়াই।









আল-জামি` আল-কামিল (3075)


3075 - عن ابن عباس وجابر بن عبد الله الأنصاري قالا: لم يكن يُؤَذَّن يوم الفِطر، ولا يوم الأضحى.

متفق عليه: رواه مسلم في العيد (886) من طريق عبد الرزّاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عطاء، عن ابن عباس وعن جابر بن عبد الله فذكراه.

قال ابن جريج: ثمّ سألتُه بعد حين عن ذلك: فأخبرنيّ، قال: أخبرني جابر بن عبد الله الأنصاري: أَنْ لا أذان للصلاة يوم الفِطر حين يخرج الإمام، ولا بعد ما يخرج، ولا إقامة، ولا نِداءَ. ولا شيء، ولا نداء يومئذ ولا إقامة.

وقال ابن جريج: أخبرني عطاء أن ابن عباس أرسل إلى ابن الزُّبير أوَّلَ ما بُويع له: أنه لم يكن يؤذِّن للصلاة يوم الفطر، فلا تُؤْذِّنْ لها. قال: فلم يؤذِّن لها ابن الزُّبير يومَه. وأرسل إليه مع ذلك: إنّما الخطبة بعد الصّلاة. وإنَّ ذلك قد كان يُفعل، قال: فصلَّي ابن الزُّبير قبل الخطبة. وعلَّقه البخاريّ (959، 960).

ورواه البخاريّ في العيدين (960) من وجه آخر عن ابن جريج، ولم يذكر القصة.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস ও জাবির ইবনে আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা দুজন বলেছেন: ঈদুল ফিতরের দিন এবং ঈদুল আযহার দিন আযান দেওয়া হতো না।

ইবনু জুরাইজ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এরপর আমি কিছুদিন পর তাঁকে (আতা'কে) এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তখন তিনি আমাকে খবর দিলেন, তিনি বলেন: জাবির ইবনে আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে খবর দিয়েছেন যে, ঈদুল ফিতরের দিন যখন ইমাম (সালাতের জন্য) বের হন, তখন নামাজের জন্য কোনো আযান নেই, ইমাম বের হওয়ার পরেও নেই, কোনো ইকামাহ নেই, কোনো আহ্বান নেই। সেদিন কোনো কিছু নেই, কোনো আহ্বান বা ইকামাহ নেই।

ইবনু জুরাইজ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আতা (রাহিমাহুল্লাহ) আমাকে আরও খবর দিয়েছেন যে, যখন ইবনুয যুবাইরের হাতে প্রথম বাইআত গ্রহণ করা হলো, তখন আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে খবর পাঠালেন যে, ঈদুল ফিতরের দিন নামাজের জন্য আযান দেওয়া হতো না। সুতরাং তুমিও এর জন্য আযান দিও না। তিনি বলেন: ফলে ইবনুয যুবাইর সেদিন এর জন্য আযান দেননি। এর সাথে তিনি (ইবনু আব্বাস) আরও খবর পাঠালেন যে, খুতবা অবশ্যই হবে সালাতের পরে। আর এটিই ছিল প্রচলিত নিয়ম। তিনি বলেন: ফলে ইবনুয যুবাইর খুতবার আগে সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3076)


3076 - عن ابن عباس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى العيد بلا أذان ولا إقامة، وأبا بكر وعمر، أو عثمان، شك يحيي.

صحيح: رواه أبو داود (1147)، وابن ماجة (1274) كلاهما من طريق يحيي بن سعيد، عن ابن
جريج، عن الحسن بن مسلم، عن طاوس، عن ابن عباس إِلَّا أنَّ ابن ماجة لم يذكر"شك يحيي".

ورواه مسلم في العيدين (884) عن محمد بن رافع وعبد بن حُميد كلاهما عن عبد الرزّاق قال: أخبرنا ابن جريج به مطوَّلًا إِلَّا أنه لم يذكر فيه"بلا أذان ولا إقامة" وسيأتي الحديث بتمامه في باب الصّلاة قبل الخطبة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আযান ও ইকামত ছাড়া ঈদের সালাত আদায় করেছেন। আর আবূ বকর, উমার এবং উসমানও (তা আদায় করেছেন)। (বর্ণনাকারী) ইয়াহইয়া (উসমানের নাম নিয়ে) সন্দেহ পোষণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3077)


3077 - عن ابن عمر قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم في يوم عيد، فَصلَّي بغير أذان ولا إقامة.

حسن: رواه النسائيّ في الكبرى (1775) عن الحسن بن قزعة، قال: أخبرنا حصين بن نُمير، عن الفضل بن عطية، قال: حَدَّثَنَا سالم بن عبد الله، عن أبيه فذكره.

وفي الإسناد الحسن بن قزعة صدوق وحصين بن نُمير"لا بأس به، ورمي بالنصب" وشيخه الفضل بن عطية"صدوق بهم".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন বের হলেন এবং আযান ও ইকামাত ছাড়াই সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3078)


3078 - عن ابن عمر أنَّ رسول الله كان يُصَلِّي في الأضحى والفِطر، ثمّ يخطب بعد الصّلاة.

وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمر رضي الله عنهما يُصَلّون العيدين قبل الخطبة.

متفق عليه: الرواية الأولى أخرجها البخاريّ في العيدين (957) عن إبراهيم بن المنذر، قال: حَدَّثَنَا أنس، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

والرّواية الثانية رواها البخاريّ في العيدين (963)، ومسلم في العيدين (888) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা ও ঈদুল ফিতরের সালাত আদায় করতেন, অতঃপর সালাতের পর খুতবা দিতেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খুতবার পূর্বে দুই ঈদের সালাত আদায় করতেন।

[এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। প্রথম বর্ণনাটি বুখারী (৯৫৭) এবং দ্বিতীয় বর্ণনাটি বুখারী (৯৬৩) ও মুসলিম (৮৮৮) বর্ণনা করেছেন।]









আল-জামি` আল-কামিল (3079)


3079 - عن أبي سعيد قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخرجُ يوم الفِطر والأضحى إلى المصلَّى، وأوَّلُ شيء يبدأ به الصّلاةُ، ثمّ ينصرف فيقوم مقابل الناس -والناس جُلُوس على صُفُوفهم- فيعظهم ويوصيهم ويأمرهم، وإن كان يريد أن يقطعَ بعثًا أو يأمرَ بشيء أمرَ به، ثمَّ ينصرفُ، وقال أبو سعيد: فلم يزلِ الناس على ذلك، حتَّى خرجتُ مع مروان، وهو أمير المدينة في أضحًى -أو فطرٍ- فلمّا أتينا المصلَّي إذا مِنْبَرٌ قد بناه كثير بن الصَّلت، فإذا هو يريد أن يرتقيه قبل أن يصلِّي، فجبذت بثوبه، فجبذني وارتفع، فخطب قبل الصّلاة، فقلتُ له: غَيَّرتُم والله! فقال: أبا سعيد! ذهب ما تعلم، فقلت: ما أعلم والله! خيرٌ مما لا أعلم، فقال: إنَّ الناس لم يكونوا يجلسون لنا بعد الصّلاة، فجعلتُها قبل الصّلاة".
وفي رواية قال:"إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخرج يوم الأضحي ويوم الفطر، فيبدأ بالصلاة، فإذا صلَّى صلاته قام فأقبل على الناس وهم جُلُوسُ في مُصلَّاهم، فإن كانت له حاجة ببَعْثٍ ذكره للناس، أو حاجةٌ بغير ذلك أمرهم بها، وكان يقول: تصدَّقوا، تصدَّقوا، تصدَّقوا، فكان أكثرَ مَنْ يتصدَّق النساء، ثمّ انصرف، فلم يزل كذلك حتى كان مروان بن الحكم، فخرجت محاضرًا مروان حتّى أتينا المصلَّى، فإذا كثير بن الصلت قد بني منبرًا من طينٍ ولَبنٍ، فإذا مروان يُنَازِعني يده، كأنَّه يجرُّني نحو المنبر، وأنا أجُرُّه نحو الصّلاة، فلمّا رأيتُ ذلك قلت: أين الابتداء بالصلاة؟ قال: لا، يا أبا سعيد! قد تُرك ما تعلم، قلت: كلَّا، والذي نفسي بيده! لا تأتون بخير مما أعلم -ثلاثَ مرات ثمّ انصرف".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العيدين (956) عن سعيد بن أبي مريم، قال: حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، قال: أخبرني زيد، عن عياض بن عبد الله بن أبي سَرْح، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره وهي الرواية الأوّلى. ورواه مسلم في العيدين (889) من وجه آخر عن داود بن قيس، عن عياض بن عبد الله به وهي الرواية الثانية.

قوله:"إلى المصلى"، هو موضع معروف بالمدينة، بينه وبين باب المسجد ألف ذراع قاله عمر ابن شَبَّة في"أخبار المدينة".

وفي الحديث دليل على استحباب الخروج إلى الصحراء لصلاة العيد، وأنَّ ذلك أفضل من صلاتها في المسجد؛ لمواظبة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على ذلك مع فضل مسجده.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহার দিন ঈদগাহের (মুসাল্লা) দিকে বের হতেন। তিনি সর্বপ্রথম যা শুরু করতেন, তা হলো সালাত (নামাজ)। অতঃপর তিনি ঘুরে দাঁড়াতেন এবং মানুষের মুখোমুখি হতেন—আর লোকেরা তাদের কাতারে বসে থাকত। তিনি তাদের নসীহত করতেন, উপদেশ দিতেন এবং আদেশ করতেন। যদি তিনি কোনো সেনাদলকে কোথাও পাঠাতে চাইতেন বা কোনো বিষয়ে নির্দেশ দিতে চাইতেন, তবে তিনি সে বিষয়ে আদেশ দিতেন। এরপর তিনি চলে যেতেন।

আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মানুষ এই (সুন্নাহসম্মত) পদ্ধতির উপরেই ছিল, যতক্ষণ না আমি মারওয়ানের সাথে বের হলাম—যখন সে মদীনার আমির ছিল—একটি ঈদুল আযহা বা ঈদুল ফিতরের দিনে। যখন আমরা ঈদগাহে পৌঁছলাম, তখন সেখানে একটি মিম্বর দেখতে পেলাম, যা কাসীর ইবনুস সালত নির্মাণ করেছিল। মারওয়ান চাইল যে সালাত আদায়ের আগেই সে সেটিতে আরোহণ করবে। আমি তার কাপড় ধরে টান দিলাম, কিন্তু সে আমাকে টান দিল এবং উঠে গেল। অতঃপর সে সালাতের আগে খুৎবা (ভাষণ) দিল। আমি তাকে বললাম: আল্লাহর কসম, আপনারা পরিবর্তন করে ফেললেন! সে বলল: হে আবু সাঈদ! আপনি যা জানতেন, তা চলে গেছে। আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি যা জানি, তা আপনার অজ্ঞতার চেয়ে উত্তম! সে বলল: (আসলে) লোকেরা সালাতের পরে আমাদের জন্য বসত না, তাই আমি সেটাকে সালাতের আগে করে দিলাম।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা ও ঈদুল ফিতরের দিন বের হতেন এবং সালাত দিয়ে শুরু করতেন। যখন তিনি সালাত শেষ করতেন, তখন দাঁড়িয়ে মানুষের দিকে মুখ করতেন, আর তারা তাদের ঈদগাহে বসা থাকত। যদি তাঁকে কোনো সেনাদল পাঠানোর প্রয়োজন হতো, তবে তিনি সে বিষয়ে মানুষের কাছে উল্লেখ করতেন। অথবা অন্য কোনো কিছুর প্রয়োজন থাকলে তিনি সে বিষয়ে তাদের নির্দেশ দিতেন। আর তিনি বলতেন: তোমরা সাদকা করো, সাদকা করো, সাদকা করো। ফলে মহিলাদের মধ্যে যারা সাদকা করত, তাদের সংখ্যাই বেশি ছিল। অতঃপর তিনি ফিরে যেতেন। এরপর পরিস্থিতি এমনটাই ছিল, যতক্ষণ না মারওয়ান ইবনুল হাকামের সময় এল। আমি মারওয়ানের সাথে বের হলাম, এমনকি আমরা ঈদগাহে পৌঁছলাম। তখন কাসীর ইবনুস সালত মাটি ও ইট দিয়ে একটি মিম্বর নির্মাণ করেছিল। মারওয়ান যেন আমার হাত ধরে টানাটানি করছিল—যেন সে আমাকে মিম্বরের দিকে টানছে, আর আমি তাকে সালাতের দিকে টানছি। যখন আমি এই দৃশ্য দেখলাম, তখন বললাম: সালাত দিয়ে শুরু করা কোথায় গেল? সে বলল: না, হে আবু সাঈদ! আপনি যা জানতেন, তা ছেড়ে দেওয়া হয়েছে। আমি বললাম: কক্ষনো নয়! যার হাতে আমার জীবন, তার কসম! আমি যা জানি, আপনারা তার চেয়ে উত্তম কিছু আনতে পারবেন না! (এই কথা তিনি তিনবার বললেন) এরপর তিনি ফিরে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3080)


3080 - عن طارق بن شهابٍ قال: أوَّل من بدأ بالخطبة يوم العيد قبل الصّلاةِ مروان. فقام إليه رجل، فقال: الصّلاة قبل الخطبةِ! فقال: قد تُرِك ما هنالك فقال أبو سعيد: أمَّا هذا فقد قضى ما عليه. سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من رأى منكم منكرًا فليغيِّره بيده، فإن لم يستطع فبلسانه، فإن لم يستطع فبقلبه، وذلك أضعف الإيمان".

صحيح: أخرجه مسلم في الإيمان (49) من طريق سفيان وشعبة كلاهما عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهابٍ فذكره.

وسياق هذا الحديث يخالف ما قبله فإنَّه صريح في أنَّ أبا سعيد هو الذي أنكر. وقد أجاب النوويّ بأجوبة وأطال فيها. والذي أميل إليه لعل إنكار أبي سعيد وقع بينه وبين مروان، وإنكار الآخر وقع على رؤوس الناس وأقر أبو سعيد إنكار هذا الرّجل، واستدل له بحديث النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، والله تعالى أعلم.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ানই প্রথম ব্যক্তি, যিনি ঈদের দিন সালাতের পূর্বে খুতবা শুরু করেন। তখন এক ব্যক্তি তার কাছে দাঁড়িয়ে বললেন, ‘সালাত খুতবার পূর্বে!’ মারওয়ান বললেন, ‘সেই প্রথা এখন পরিত্যাগ করা হয়েছে।’ তখন আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘এই ব্যক্তি তার উপর যা কর্তব্য ছিল তা পালন করেছে।’ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘তোমাদের মধ্যে যে কেউ কোনো খারাপ কাজ (মুনকার) হতে দেখে, সে যেন তা তার হাত দ্বারা পরিবর্তন করে দেয়। যদি সে এতে সামর্থ্য না রাখে, তবে তার যবান (জিহ্বা) দ্বারা। যদি এতেও সামর্থ্য না রাখে, তবে তার অন্তর (হৃদয়) দ্বারা (ঘৃণা করে)। আর এটিই হলো ঈমানের দুর্বলতম স্তর।’