আল-জামি` আল-কামিল
3088 - عن الهِرْماس بن زياد الباهلي قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب الناس على ناقته العَضْباء يوم الأضحى بمني.
حسن: رواه أبو داود (1954) عن هارون بن عبد الله، حَدَّثَنَا هشام بن عبد الملك، حَدَّثَنَا عكرمة، حَدَّثَنَا الهِرْماس بن زياد فذكره.
ورواه ابن حبَّان (3875) من طريق عكرمة بن عمار قال: حَدَّثَنِي الهِرْماسُ بن زياد الباهلي قال:
أبصرتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبيّ، وأنا مردف وراءه على جمل، وأنا صبي صغير فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب الناس على ناقته العضباء بمنى.
وصحّحه ابن خزيمة (2953) ورواه أيضًا الإمام أحمد (1568) كلّهم من طريق عكرمة بن عمار به.
وإسناده حسن فإنَّ عكرمة بن عمار وإن كان من رجال مسلم فقد تكلَّم فيه غير واحد من الأئمة غير أنَّه حسن الحديث إذا لم يأت بالمنكر.
হিরমাস ইবনে যিয়াদ আল-বাহিলি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কুরবানির দিন মিনায় তাঁর ‘আল-আদ্ববা’ নামক উটনীর উপর আরোহণ করে লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতে দেখেছি।
3089 - عن سلمة بن نُبيط، عن أبيه (يعني نُبيط بن شَريط) وكان قد حج مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: رأيتُ النَّبِيّ يخطب على بعيره.
صحيح: رواه ابن ماجة (1286) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حَدَّثَنَا وكيع، عن سلمة بن نُبيط به مثله.
ورواه الإمام أحمد (18721) عن وكيع به وزاد"يوم عرفة".
وهذا إسناد صحيح، سلمة بن نُبيط بن شريط الأشجعي ثقة، وثَّقه أحمد وأبو داود وكثير من أهل العلم، وكان وكيع يفتخر به ويقول: ثنا سلمة بن نُبيط وكان ثقة.
قلت: وتابع سفيان الثوري وابن المبارك وكيعًا، فرويا عن سلمة بن نُبيط به مثله. ومن طريقهما رواه النسائيّ (3007، 3008).
ولكن رواه أبو داود (1916) من طريق عبد الله بن داود، عن سلمة بن نبيط، عن رجل من الحيّ، عن أبيه نبيط أنه رأى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفة على بعير أحمر يخطب.
فأدخل بين سلمة وأبيه رجلًا، وعبد الله بن داود وهو أبو عبد الرحمن المعروف الخُرَيْبي وإن كان ثقة مأمونًا فلعله وهم فأدخل رجلًا بين سلمة وأبيه.
أو لعل سلمة بن نُبيط نفسه وهم، فأدخل بينه وبين أبيه رجلًا في آخر عمره؛ لأنَّه اختلط كما قبل، فما رواه في حالة اختلاطه لا يعارض ما رواه قبل الاختلاط. والله تعالى أعلم.
وأمّا نُبيط -بالتصغير- ابن شريط فله ولأبيه صحبة.
নুবাইত ইবনু শারীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে হজ করেছিলেন, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তাঁর উটের পিঠে চড়ে খুতবা দিতে দেখেছি।
3090 - عن عمرو بن خارجة قال: إنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خطب على ناقته، وأنا تحت جِرانِها، وهي تَقْصَعُ بجرَّتِها، وإن لُعابَها يسيل بين كتِفيّ، فسمعته يقول:"إن الله عز وجل أعطي كل ذي حق حقَّه، ولا وصية لوارث، والولد للفراش، وللعاهر الحجر".
حسن: رواه الترمذيّ (2121) واللّفظ له، والنسائي (3641، 3642)، وابن ماجة (2712) من طرق عن قتادة، عن شهر بن حَوْشب، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن عمرو بن خارجة فذكر الحديث وسيأتي لفظ الحديث كاملًا في الحج.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: بل هو حسن فقط للكلام في شهر بن حوْشب غير أنَّه حسن الحديث. ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (17664، 17665، 17666).
وقوله:"تقصع بِجَرتها" تقصع بمعني تمضغُ، والجَرَّة بفتح الجيم وكسرها، وتشديد الراء. وهي ما يخرجه البعير من الجوف إلى الفم فيأكله مرة ثانية.
وإنَّما يفعل ذلك إذا كان البعير مطمئنًا، وإذا خاف لم يخرجها.
আমর ইবনে খারিজাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর উটের উপর আরোহণ করে খুতবা দিচ্ছিলেন। আমি উটটির গলার (নিচের অংশে) নিচে ছিলাম। উটটি জাবর কাটছিল এবং তার লালা আমার দুই কাঁধের মাঝখানে ঝরছিল। তখন আমি তাঁকে (রাসূলকে) বলতে শুনলাম: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা প্রত্যেক অধিকারীকে তার অধিকার দান করেছেন। উত্তরাধিকারীর জন্য কোনো অসিয়ত (দান) নেই। সন্তান বিছানার (বৈধ স্বামী-স্ত্রীর) এবং ব্যভিচারীর জন্য পাথর (অর্থাৎ রজম বা চরম শাস্তি)।"
3091 - عن أنس بن مالك قال: إنِّي لتحت ناقة رسول الله صلى الله عليه وسلم يسيل عَلَيَّ لعابُها فسمعته يقول:"إنَّ الله قد أعطى كلَّ ذي حقِّ حقَّه ألا لا وصية لوارث".
صحيح: رواه ابن ماجة (2714) عن هشام بن عمَّار، قال: حَدَّثَنَا محمد بن شُعيب بن شابور، قال: حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن سعيد بن أبي سعيد، أنَّه حدَّثه عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده صحيح كما قال البوصيري.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উষ্ট্রীটির নিচে ছিলাম, আর তার লালা আমার উপরে গড়িয়ে পড়ছিল। তখন আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "নিশ্চয় আল্লাহ প্রত্যেক হকদারকে তার হক (অধিকার) দিয়ে দিয়েছেন। সাবধান! কোনো ওয়ারিশের জন্য কোনো ওসিয়ত (উইল/নছিহত) নেই।"
3092 - عن خالد بن العَدَّاء بن هوذة قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب الناس يوم عرفة على بعير قائم في الركابين.
حسن: رواه أبو داود (1917) عن هناد بن السري وعثمان بن أبي شيبة، قالا: حَدَّثَنَا وكيع، عن عبد المجيد، حَدَّثَنِي العَدَّاء بن خالد بن هوذَة، قال هنَّاد: عن عبد المجيد أبي عمرو، حَدَّثَنِي خالد بن العدَّاء بن هوذَة فذكره.
قال أبو داود: رواه ابن العلاء، عن وكيع كما قال هناد. ثمّ قال: (1918) حَدَّثَنَا عباس بن عبد العظيم، حَدَّثَنَا عثمان بن عمر، حَدَّثَنَا عبد المجيد أبو عمرو، عن العدَّاء بن خالد بمعناه.
قلت: ومن طريق وكيع: رواه الإمام أحمد (20335)، فقال فيه:"العدَّاء بن خالد بن هوذة"
فيبدو أنه انقلب على هناد فجعله"خالد بن العدَّاء بن هوذة" والصواب ما رواه الإمام أحمد وغيره عن وكيع.
والعدَّاء -بفتح أوَّله والتشديد- أسلم مع أبيه خالد بعد حنين. وتأخرت وفاته إلى بعد المائة، وأمّا خالد بن العدَّاء بن هوذة فقال الحافظ في ترجمته في التقريب (1812):"الصواب: العدَّاء بن خالد".
وإسناده حسن لأجل عبد المجيد وهو: عبد المجيد بن أبي يزيد - وهب العقليّ، وثَّقه ابن معين، وذكره ابن حبَّان في الثّقات وهو من رجال السنن.
খালিদ ইবনুল আদ্দা ইবনে হাউযাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে আরাফার দিন উটের উপর আরোহণ করে মানুষের উদ্দেশে খুতবা দিতে দেখেছি। তিনি উটের দুই রেকাবের উপর সোজা দাঁড়িয়ে ছিলেন।
3093 - عن أبي سعيد الخدريّ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم خطب يوم العيد على راحلته.
صحيح: رواه أبو يعلى -المقصد العَليّ- (370) وابن أبي شيبة (2/ 189)، وابن خزيمة (1445) كلّهم من طريق وكيع، ثنا داود بن قيس الفراء، عن عياض بن عبد الله بن أبي سرح، عن أبي سعيد فذكره.
وإسناده صحيح، وأصل هذا الحديث في الصحيحين، وانظر تخريجه في باب الصّلاة قبل الخطبة.
وفيه إبراهيم بن محمد: وهو ابن أبي يحيى الأسلمي من شيوخ الشافعي متروك. وعبد الرحمن ابن عبد القارئ"مقبول" والإسناد مرسل غير متصل.
قال النوويّ في"الخلاصة" (2961): ضيف غير متصل، ولم يثبت في تكرير الخطبة شيء، والمعتمد فيه القياس على الجمعةِ".
قلت: وسيأتي في كتاب الجمعة أن الخطيب يخطب خطبتين، ويفصل بينها بالجلوس ومنه الحديث الصَّحيح عن جابر بن سمرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخطب قائمًا، ثمّ يجلسَ ثمّ يقوم فيخطب قائمًا، فمن نَبَّأَك أنَّه كان يخطب جالسًا فقد كذّب، والله! صلَّيت معه أكثر من ألفي صلاة.
رواه مسلم (862/ 35) ووهم من ظنَّ أنَّ جابرًا في حديث ابن ماجة هو: ابن سمرة، فقد أخطأ، وبناء عليه عزاه إلى مسلم، وأصحاب السنن، والصواب أنَّه: جابر بن عبد الله انفرد ابن ماجه بإخراجه، وأمّا حديث جابر بن سمرة فرواه مسلم وأصحاب السنن كما سيأتي.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ঈদের দিন তাঁর আরোহণের পশুর উপর আরোহিত অবস্থায় খুতবা প্রদান করেছিলেন।
3094 - عن جابر بن عبد الله قال: قام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم الفطر فصَلَّى، فبدأ بالصلاة، ثمّ الخطبة، فلمّا فرغ نزل فأتي النساء فذكَّرهُنَّ وهو يتوكَّأُ على يد بلال، وبلالُ باسط ثوبه يُلْقي فيه النساء الصدقةَ.
قلت لعطاء: زكاةَ يوم الفطر؟ قال: لا، ولكن صدقةً يتصدقنَ حينئذٍ، تُلْقي فَتَخَها ويُلقين.
قلت: أتُرى حقًّا على الإمام ذلك، ويذكرهُنَّ؟ قال: إنَّه لحق عليهم، وما لهم لا يفعلونه؟
وفي رواية: شهدتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الصّلاةَ يوم العيد. فبدأ بالصلاة قبل الخطبة بغير أذان ولا إقامة، ثمّ قام متوكئًا على بلال. فأمر بتقوى الله. وحثَّ على طاعته، ووعظ الناس، وذكَّرهم، ثمّ مضى حتّى أتى النساء فوعظهُنَّ وذكَّرهن فقال:"تصدقْنَ، فإن أكثر كن حَطَبُ جهنّم" فقامت امرأة من سِطَةِ النساء، سَفْعاءُ الخدَّين فقالت: لِم يا رسول الله؟ قال:"لأَنكنَّ تُكثِرنَ الشَّكَاةَ، وتكفرنَ العشير" قال: فجعلنَ يتصدقْنَ من حُلِيِّهِنَّ يُلْقِينَ في ثوب بلال من أقْرِطَتِهنَّ وخواتمهنَّ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العيدين (978)، ومسلم في العيدين (885) كلاهما من طريق عبد الرزّاق، قال: حَدَّثَنَا ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، عن جابر بن عبد الله فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.
والرّواية الثانية رواها مسلم من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر بن عبد الله فذكره، ورواه أيضًا النسائيّ (1575) من هذا الوجه وفيه:"فقالت: امرأة من سَفِلَةِ النساء سَفْعاء الخدين".
وقوله:"سِطة النساء" يقال: هذه امرأة من سِطة النساء: أي من أوساطهن حسبًا ونسبًا.
و"سَفْعاء" من السُفْعة - وهي سواد في اللون.
و"الشَكاة" بفتح الشين - الشكوى.
و"العَشير" الزوج، فعيل من العِشْرة، وكفره: جَحْدُهُنَّ حقَّه. يريد أنَّهن يْكْثِرن شكوى أزواجهن إلى الناس ويجحدنَ إحسانهم إليهن.
و"أَقْرِطَتُهُنَّ" من القُرط، وهو من حُلِيِّ الأذنين، وجمعه أقرِطة في القِلَّة.
و"فتخها" وفي رواية"فتختها" الفتخةُ: حلقة يلبسُها النساء في أصابع أرجلهن وأيديهن لا فَصَّ لها. و"سَفِلَةِ النساء" بفتح السين وكسر الفاء، الساقطة من الناس.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতরের দিন দাঁড়ালেন এবং সালাত আদায় করলেন। তিনি সালাত দিয়ে শুরু করলেন, এরপর খুতবা দিলেন। যখন তিনি খুতবা শেষ করলেন, তখন নেমে এলেন এবং মহিলাদের কাছে গেলেন, তিনি তাদের উপদেশ দিলেন। এ সময় তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতের ওপর ভর করে ছিলেন, আর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড় মেলে ধরেছিলেন, যাতে মহিলারা সাদকা রাখছিলেন।
আমি (রাবী) আতাকে জিজ্ঞাসা করলাম: এটা কি ঈদুল ফিতরের যাকাত? তিনি বললেন: না, বরং সেই মুহূর্তে তাঁরা যে সাদকা করেন, এটাই তা। তাঁরা তাঁদের পায়ের আংটি (ফাতাখা) এবং অন্যান্য জিনিস ফেলছিলেন।
আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কি মনে করেন যে, ইমামের জন্য এটি করা এবং তাদের (মহিলাদের) উপদেশ দেওয়া কর্তব্য? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এটা তাদের ওপর কর্তব্য। কেন তারা এটা করবে না?
এবং অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ঈদের সালাতে উপস্থিত ছিলাম। তিনি আযান ও ইকামত ছাড়াই খুতবার পূর্বে সালাত দিয়ে শুরু করলেন। অতঃপর তিনি বিলালের ওপর ভর করে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহ্র তাকওয়ার নির্দেশ দিলেন, তাঁর আনুগত্যের প্রতি উৎসাহিত করলেন, এবং মানুষকে উপদেশ দিলেন ও স্মরণ করিয়ে দিলেন। এরপর তিনি চলতে থাকলেন এবং মহিলাদের কাছে এসে তাদের উপদেশ দিলেন ও স্মরণ করিয়ে দিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা সাদকা করো, কারণ তোমাদের অধিকাংশই জাহান্নামের ইন্ধন হবে।" তখন মহিলাদের মধ্য থেকে এক সম্ভ্রান্ত (অথবা মধ্যম শ্রেণির) মহিলা, যার দু'গালে কিছুটা কালচে ভাব ছিল, দাঁড়িয়ে বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ, কেন? তিনি বললেন: "কারণ তোমরা বেশি অভিযোগ করো এবং স্বামীর (আশীরের) প্রতি অকৃতজ্ঞতা দেখাও।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তাঁরা তাঁদের অলঙ্কার থেকে সাদকা করতে লাগলেন। তাঁরা তাঁদের কানের দুল ও আংটি বিলালের কাপড়ে ছুঁড়ে মারছিলেন।
3095 - عن ابن عباس. قال: شَهِدْتُ صلاة الفِطْر مع نبي الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر وعُثْمان. فكُلُّهُم يُصَلِّيها قبل الخطبة. ثمّ يخطبُ، قال فنزل نبي الله صلى الله عليه وسلم كأنِّي أنظرُ إليه حين يُجَلِّس الرِّجال بيده. ثمّ أقبَلَ يَشُقُّهُمْ. حَتَّى جاء النساء ومعه بلالٌ، فقال: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَى أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا} [الممتحنة: 12] فتلا هذه الآية حتّى فرغ منها، ثمّ قال حين فرغ منها:"أنْتُنَّ على ذلك؟" فقالت امْرَأةٌ واحدةٌ لم يُجبْه غيرُها منهنَّ: نَعَمْ. با نبي الله لا يُدْرَي حينئذٍ من هي. قال:"فَتَصَدَّقْنَ" فَبَسَطَ بلالٌ ثوبَهُ، ثمّ قال: هَلُمَّ! فِدّى لَكُنَّ أبي وأمّي! فَجَعَلْنَ يُلْقِينَ الفَتَخَ والخواتِمَ في ثوب بلال.
وفي رواية يقول: أشهدُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم لصَلَّى قَبْلَ الخُطْبَة، قال: ثُمّ خَطَبَ. فرأى أنَّه لم يُسْمِع النساء. فأتاهُنَّ فَذَكَّرَهُنَّ. وَوَعَظَهُنَّ. وَأَمَرَهُنَّ بالصَّدَقَةِ. وبِلالٌ قائلٌ بثوبه. فجعلت المرأَةُ تُلْقي الخاتم والخُرْصَ والشيء.
متفق عليه: رواه مسلم في العيدين (884) من طريق عبد الرزّاق وهو في"المصنف" (5632) قال: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني الحسن بن مسلم، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
والرّواية الثانية رواها من طريق سفيان بن عيينة، حَدَّثَنَا أيوب قال: سمعت عطاء قال: سمعت ابن عباس يقول فذكره.
ورواه البخاريّ في العيدين (979) فقال: قال ابن جريج، وأخبرني الحسن بن مسلم به مثله. وهو معطوف على الإسناد السابق لحديث جابر بن عبد الله وليس بمعلق، وقد سبق في باب الخطبة بعد العيد (962) مسندًا عن أبي عاصم قال: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني الحسن بن مسلم، عن طاوس، عن ابن عباس فذكر الحديث مختصرًا.
قال ابن عباس: ظنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه لم يُسمع النساء فأتاهن فوعظهن، وقال: تصدقْنَ فذكره.
رواه عبد الرزّاق (5633) عن معمر، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
الفَتَخُ: بفتح الفاء والتاء وآخرها الخاء قال عبد الرزّاق:"خواتيم من عِظام كُنَّ يُلْبَسْنَ في الجاهليّة".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর, উমার ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ঈদুল ফিতরের সালাতে উপস্থিত ছিলাম। তাঁরা সবাই সালাতকে খুতবার আগে আদায় করতেন। এরপর খুতবা দিতেন। তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মিম্বর থেকে) নেমে এলেন। আমার যেন এখনও মনে আছে, তিনি নিজ হাত দ্বারা লোকেদের বসালেন। এরপর তিনি লোকদের ভিড় ঠেলে এগিয়ে গেলেন এবং মহিলাদের কাছে পৌঁছলেন। তাঁর সাথে ছিলেন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। অতঃপর তিনি বললেন: “হে নবী! মুমিন নারীগণ যখন আপনার কাছে এসে বাইয়াত করে যে, তারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না…” [সূরা মুমতাহিনা: ১২]—তিনি এই আয়াতটি শেষ হওয়া পর্যন্ত তিলাওয়াত করলেন। যখন তিনি এটি শেষ করলেন, তখন বললেন: “তোমরা কি এর ওপর দৃঢ় থাকবে?” তখন তাদের মধ্য থেকে একজন মাত্র মহিলা উত্তর দিলেন—অন্য কেউ উত্তর দেননি—“হ্যাঁ, হে আল্লাহর নবী!” (বর্ণনাকারী বলেন) তখন জানা যায়নি যে মহিলাটি কে ছিলেন। তিনি বললেন: “তাহলে তোমরা সাদাকা করো।” তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড় বিছিয়ে দিলেন এবং বললেন: “আসুন! আমার মা-বাবা আপনাদের জন্য উৎসর্গ হোন!” তখন তাঁরা ফাতাখ (আঙুলের রিং) এবং আংটি বিলালের কাপড়ের ওপর ছুঁড়ে মারতে লাগলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে, (ইবনে আব্বাস বলেন) আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবার আগেই সালাত আদায় করেছেন। এরপর তিনি খুতবা দিলেন। তিনি দেখলেন যে, তিনি মহিলাদের কাছে (খুতবা) পৌঁছাতে পারেননি। তাই তিনি তাদের কাছে গেলেন, তাদের উপদেশ দিলেন, নসিহত করলেন এবং সাদাকা করার নির্দেশ দিলেন। বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড় ধরে রেখেছিলেন। তখন মহিলারা আংটি, কানের দুল এবং অন্যান্য জিনিস ছুঁড়ে মারতে লাগলেন।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ধারণা করলেন যে, তিনি মহিলাদের কাছে (খুতবা) পৌঁছাতে পারেননি, তাই তিনি তাদের কাছে গিয়ে নসিহত করলেন এবং বললেন: “সাদাকা করো।” এরপর তিনি ঘটনাটি উল্লেখ করলেন।
3096 - عن جابر بن عبد الله قال: قام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم الفِطر فصَلَّى، فبدأ بالصلاة، ثمّ خطب، فلمّا فرغ نزل فأتى النساء فذكَّرهَّن، وهو يتوكَّأ على يد بلال، وبلال باسط ثوبه يلقى فيه النساء الصدقة.
وفي رواية يقول: شهدتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الصّلاة يوم العيد، فبدأ بالصلاة قبل الخطبة بغير أذان ولا إقامة، ثمّ قام متوكِّئًا على بلال. فأمر بتقوى الله، وحثَّ على طاعته، ووعظ الناس، وذكَّرهم، ثمّ مضى حتّى أتى النساءَ فوعظهنَّ وذكَّرهن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العيدين (978)، ومسلم في العيدين (885) كلاهما من طريق عبد الرزّاق وهو في"المصنف" (5631) قال: حَدَّثَنَا ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، عن جابر فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.
والرّواية الثانية، أخرجها مسلم من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতরের দিন দাঁড়ালেন এবং সালাত আদায় করলেন। তিনি সালাত দিয়েই শুরু করলেন, এরপর খুতবা দিলেন। যখন তিনি খুতবা শেষ করলেন, তিনি নিচে নামলেন এবং মহিলাদের কাছে গেলেন, অতঃপর তাদের উপদেশ দিলেন। এ সময় তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতের উপর ভর দিয়েছিলেন। আর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড় বিছিয়ে রেখেছিলেন, মহিলারা যাতে তাতে সাদাকা (দান) রাখতে পারে।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ঈদের দিনের সালাতে উপস্থিত ছিলাম। তিনি আযান বা ইকামত ছাড়াই খুতবার আগে সালাত শুরু করলেন। এরপর তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওপর ভর দিয়ে দাঁড়ালেন। অতঃপর তিনি আল্লাহভীতির নির্দেশ দিলেন, তাঁর আনুগত্যের প্রতি উৎসাহিত করলেন, এবং মানুষকে ওয়াজ করলেন ও উপদেশ দিলেন। এরপর তিনি চলতে লাগলেন, এমনকি মহিলাদের কাছে গিয়ে তাদের ওয়াজ করলেন ও উপদেশ দিলেন।
3097 - عن البراء بن عازب أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نُووِلَ يوم العيد قوسًا فخطب عليه.
حسن: رواه أبو داود (1145) عن الحسن بن عليّ، حَدَّثَنَا عبد الرزّاق، أخبرنا ابن عُيينة، عن أبي جناب، عن يزيد بن البراء، عن أبيه فذكره.
وأبو جناب هو: يحيى بن أبي حية الكلبي الكوفي مختلف فيه، ضفعَّه ابن سعد ويحيى بن سعيد وغيرهما، وقال أكثر الأئمة:"هو صدوق يُدَلِّس".
قلت: فمثله إذا صرَّح بالتحديث يُقْبل في الاستشهاد ولا يحتج به. فنظرنا فوجدنا أن الحديث رواه البيهقيّ (3/ 300) من وجه آخر عنه قال: حَدَّثَنَا يزيد بن البراء بن عازب، عن البراء بن عازب قال: كنا جلوسًا في المصلَّى يوم أَضْحى، فأتانا رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلم على الناس ثمّ قال:"إنَّ أوَّل مَنْسَكِ يومِكم هذا الصّلاةُ" قال: فتقدم، فصلَّى ركعتين، ثمّ سلَّم، ثمّ استقبل الناس بوجهه، وأُعطِيَ قوسًا، أو عصًا فاتَّكأ عليها، فحمد الله وأثنى عليه. انتهى.
বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমরা ঈদুল আযহার দিন ঈদগাহে বসেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে আসলেন এবং লোকদেরকে সালাম দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমাদের এই দিনের প্রথম কর্তব্য (ইবাদাত) হলো সালাত।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি (সামনে) অগ্রসর হলেন এবং দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন, এরপর সালাম ফিরালেন। অতঃপর তিনি তাঁর চেহারা নিয়ে লোকদের দিকে ফিরলেন। তাঁকে একটি ধনুক অথবা একটি লাঠি দেওয়া হলো, তিনি সেটির উপর ভর করে দাঁড়ালেন এবং আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও তাঁর গুণগান বর্ণনা করলেন।
3098 - عن شُعيب بن رُزَيق الطائفيّ، قال: جلست إلى رجل له صحبة من رسول الله صلى الله عليه وسلم، يقال له: الحكم بن حَزْنٍ الكُلَفيّ، فأنشأ يحدثنا قال: وفدتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم سابع سبعةٍ، أو تاسع تسعةٍ فدخلنا عليه، فقلنا: يا رسول الله! زُرناك فادع الله
لنا بخير، فأمر بنا، أو أمر لنا بشيء من التمر، والشأنُ إذ ذاك دُون، فأقمنا بها أيامًا شهدنا فيها الجمعة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام متوكِّئًا على عصًا، أو قوسٍ، فحمد الله، وأثنى عليه كلمات خفيفات طيبات مباركات، ثمّ قال:"أيُّها الناس! إنَّكم لن تُطيقوا، أو لن تفعلوا كلَّ ما أُمِرتُم به، ولكن سَدِّدُوا وأبشروا".
حسن: رواه أبو داود (1096) عن سعيد بن منصور، ثنا شهاب بن خراش، حَدَّثَنِي شعيب بن رُزَيق الطائفي فذكره.
قال أبو عليّ: سمعتُ أبا داود قال: ثَبَّتني في شيء منه بعض أصحابنا.
وإسناده حسن لأجل شهاب بن خراش وشيخه شُعيب بن رُزيق فهما في مرتبة"صدوق".
والحديث أخرجه الإمام أحمد (17856)، وابن خزيمة (1452)، والبيهقي (3/ 206) كلّهم من طرق عن شهاب بن خراش به نحوه.
قال الحافظ في"التلخيص":"إسناده حسن، فيه شهاب بن خراش، وقد اختلف فيه، والأكثر وثَّقوه، وقد صحَّحه ابن السكن وابن خزيمة". انتهى.
ويشهد له مرسل عطاء. قال ابن جريج: قلت لعطاء: أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوم إذا خطب على عصا، قال: نعم، وكان يعتمد عليها اعتمادًا، رواه البيهقي.
হাকাম ইবনু হাযন আল-কুলাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা শুরু করলেন যে, আমি সাতজনের মধ্যে সপ্তম ব্যক্তি হিসেবে, অথবা নয়জনের মধ্যে নবম ব্যক্তি হিসেবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রতিনিধি দল নিয়ে এসেছিলাম। আমরা তাঁর কাছে প্রবেশ করে বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে দেখতে এসেছি, তাই আমাদের জন্য আল্লাহর কাছে কল্যাণের জন্য দু’আ করুন।’ তখন তিনি আমাদের জন্য খেজুরের ব্যবস্থা করলেন, অথবা আমাদের খেজুর দেওয়ার আদেশ দিলেন। সেসময় পরিস্থিতি (সম্পদের দিক দিয়ে) নিম্নমানের ছিল। আমরা সেখানে কয়েকদিন অবস্থান করলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুমুআর সালাত আদায় করলাম। তিনি লাঠি বা ধনুকের উপর ভর করে দাঁড়ালেন (খুতবার জন্য), অতঃপর হালকা, সুন্দর ও বরকতময় কিছু কথা বলে আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন। এরপর তিনি বললেন: “হে লোকসকল! তোমাদের উপর যা কিছুর আদেশ করা হয়েছে, তোমরা তার সবটুকু সহ্য করতে পারবে না, অথবা তার সবটুকু করতে পারবে না। কিন্তু তোমরা মধ্যমপন্থা অবলম্বন করো এবং সুসংবাদ দাও।”
3099 - عن عطاء بن أبي رباح قال: صلى بنا ابن الزُّبير في يوم عيد في يوم جمعة أول النهار، ثمّ رُحنا إلى الجمعة فلم يخرج إلينا، فصلَّينا، وُحدانًا، وكان ابن عباس بالطائف، فلمّا قدم ذكرنا ذلك له، فقال: أصاب السنة.
صحيح: رُوي هذا بثلاثة أسانيد وكلها صحيحة.
الأوّلى: ما رواه أبو داود (1071) عن محمد بن طريف البجليّ، حَدَّثَنَا أسباط، عن الأعمش، عن عطاء بن أبي رباح فذكره، وإسناده صحيح.
والثانية: ما رواه أبو داود أيضًا (1072) عن يحيي بن خلف، حَدَّثَنَا أبو عاصم، عن ابن جريج، قال: قال عطاء: اجتمع يوم جمعة ويوم فطر على عهد ابن الزُّبير، فقال: عيدان اجتمعا في يوم واحد، فجمعهما جميعًا، فصلاهما ركعتين بكرة، ولم يزِدْ عليهما حتَّى صلَّى العصر.
وهذا إسناده أيضًا صحيح إِلَّا أن ابن جريج مدلِّس ولم يُصرّح بالتحديث ولكن جاء عنه أنه قال: إذا قلت: قال عطاء، فأنا سمعته منه، وإن لم أقل. سمعتُ.
فقوله قال: يحمل على التحديث.
والثالثة: ما رواه النسائيّ (1592) عن محمد بن بشار، قال: حَدَّثَنَا يحيى، قال: حَدَّثَنَا عبد
الحميد بن جعفر، قال: حَدَّثَنِي وهب بن كيسان قال: اجتمع عيدان على عهد ابن الزُّبير، فأخَّر الخروج حتّى تعالى النهار، ثمّ خرج فخطب، فأطال الخطبة، ثمّ نزل فصلَّى، ولم يُصلِّ للناس يومئذ الجمعة، فذُكِر ذلك لابن عبَّاسٍ فقال: أصاب السنة.
وهذا إسناده أيضًا صحيح.
ومن هذا الوجه أخرجه ابن خزيمة (1465) وقال: قول ابن عباس: أصاب ابن الزُّبير السنة، يحتمل أن يكون أراد سنة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وجائز أن يكون أراد سنة أبي بكر، أو عمر، أو عثمان، أو عليّ، ولا إخالُهُ أنه أراد به: أصاب السنة في تقديمه الخطبة قبل صلاة العيد، لأن هذا الفعل خلاف سنة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر، وإنما أراد تركَه أن يجمعَ بهم بعد ما قد صلَّى بهم صلاة العيد فقط، دون تقديم الخطبة قبل العيد". انتهى.
وأمّا ما رُوي عن إياس بن أبي رمْلَة الشّاميّ قال: شهدتُ معاوية بن أبي سفيان وهو يسأل زيد ابن أرقم قال: أَشِهدتَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عيدين اجتمعا في يوم؟ قال: نعم، قال: فكيف صنع؟ قال: صلَّى العيد ثمّ رخص في الجمعة، فقال:"من شاء أن يُصَلِّي فليصلّ".
رواه أبو داود (1070)، والنسائي (1591)، وابن ماجة (1310)، والإمام أحمد (19318) كلّهم من هذا الوجه إِلَّا أن النسائيّ لم يذكر من شاء أن يُصَلِّي فليصل".
وإسناده ضعيف لجهالة إياس بن أبي رملة الشاميّ، ومع هذا صحَّحه الحاكم في المستدرك (1/ 288) وقال الذّهبيّ في"الميزان" بعد أن أشار إلى هذا الحديث: قال ابن المنذر: لا يثبت هذا الحديث، فإن إياسًا مجهول. انتهى.
إِلَّا أنَّ الحافظ نقل في التلخيص عن ابن معين تصحيحه، فلعلَّه صحَّحه لكثرة شواهده، والله أعلم.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"قد اجتمع في يومكم هذا عيدان، فمن شاء أجزأه من الجمعة، وإنَّا مُجمِّعون".
رواه أبو داود (1073)، وابن ماجة (1311)، والحاكم (1/ 288، 289)، والبيهقي (3/ 318) كلّهم من طريق بقية بن الوليد، عن شعبة، عن المغيرة الضبيّ، عن عبد العزيز بن رفيع، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وبقية بن الوليد وإن كان مدلِّسًا إِلَّا أنَّه صرَّح بالتحديث في بعض الرّوايات ولكن علة هذا الحديث أن عبد الرزّاق (5728) رواه عن الثوريّ، عن عبد العزيز بن رُفَيع، عن أبي صالح مرسلًا.
وصحَّح الإمام أحمد والدارقطني وغيرهما إرساله.
وكذلك قال البيهقيّ: رواه سفيان الثوري عن عبد العزيز فأرسله.
ثمّ قال: ورُوي عن سفيان بن عيينة، عن عبد العزيز موصولًا مقيَّدًا بأهل العوالي، وفي إسناده ضَعْف. ورُوِي ذلك عن عمر بن عبد العزيز، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مقيَّدًا بأهل العالية إِلَّا أنَّه منقطع" انتهى.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر قال: اجتمع عيدان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلي بالناس ثم قال:"من شاء أن يأتي الجمعة فليأتها، ومن شاء أن يتخلف فليتخلف". رواه ابن ماجه (1213) عن جبارة بن المُغَلِّس، قال: حدثنا مندل بن علي، عن عبد العزيز بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
وجبارة بن المُغَلِّس وشيخه مندل بن علي ضعيفان.
فمن نظر إلى كثرة الشواهد قال: إنَّ الحديثَ له أصلٌ، وقد عُمِل به بعد النبي صلى الله عليه وسلم.
وقد ثبت في صحيح البخاري كتاب الأضاحي (5572) قال أبو عبيد مولي ابن أزهر: شهدتُ العيدَ يوم الأضحى مع عثمان بن عفان، وكان ذلك يوم الجمعة، فصلى قبل الخطبة، ثم خطب فقال: يا أيها الناس! إنَّ هذا يومٌ قد اجتمع لكم فيه عيدان، فمن أحبَّ أن ينتظر الجمعة من أهل العوالي فلينتظر، ومن أحب أن يرجع فقد أذنتُ له. انتهى.
فرأى من الجائز أن يتخلَّف عن صلاة الجمعة إذا اجتمع العيدان في يوم واحد. انظر كلام أهل العلم في"المنة الكبرى"
من ابن المبارك. وقد زاد ذكرَ السائبِ فوجب أن تُقبل زيادته".
قلت: وهو كما قال، ولكن ليس سفيان وحده خالفه كما ذكره البيهقي، وإنما خالفه أيضًا هشام ابن يوسف الصنعاني ذكره أبو زرعة في علل ابن أبي حاتم (1/ 180)، ورواه عبد الرزاق في مصنفه (5670)، عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء قال: بلغني أن النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
قال: فكان عطاء يقول: ليس على الناس حضور الخطبة يومئذ. انتهى.
فإذا نظرنا إلى هذه الأسانيد قلنا: إنَّ قواعد الحديث تَقضي أن نحكم على حديث الفضل بن موسى بأنَّه شاذٌّ، ومرسل عطاء هو المحفوظ. والله تعالى أعلم.
আতা ইবনু আবী রাবাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক ঈদের দিনে, যা জুমু'আর দিন ছিল, দিনের প্রথম ভাগে আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর আমরা জুমু'আর জন্য গেলাম, কিন্তু তিনি আমাদের কাছে বের হলেন না। ফলে আমরা একাকী সালাত আদায় করলাম। (তখন) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তায়েফে ছিলেন। যখন তিনি (মক্কায়) এলেন, আমরা বিষয়টি তাকে জানালাম। তিনি বললেন: সে সুন্নাতকে সঠিকভাবেই গ্রহণ করেছে (বা সুন্নাত অনুসারে কাজ করেছে)।
সহীহ (বিশুদ্ধ): এটি তিনটি সনদ (বর্ণনা পরম্পরা)-এর মাধ্যমে বর্ণিত হয়েছে এবং সবগুলোই সহীহ।
প্রথমত: যা আবূ দাঊদ (১০৭১) মুহাম্মাদ ইবনু ত্বরীফ আল-বাজালী সূত্রে, তিনি আসবাত্ব সূত্রে, তিনি আ'মাশ সূত্রে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ।
দ্বিতীয়ত: যা আবূ দাঊদও (১০৭২) ইয়াহইয়া ইবনু খালাফ সূত্রে, তিনি আবূ আসিম সূত্রে, তিনি ইবনু জুরাইজ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ইবনু যুবাইরের যুগে এক জুমু'আহ এবং ফিতর (ঈদের দিন) একত্রিত হয়েছিল। তিনি বললেন: একই দিনে দুটি ঈদ একত্রিত হয়েছে। তিনি উভয় সালাতকে একত্রিত করলেন এবং ভোরের দিকে দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন এবং আসর সালাত আদায় করার পূর্ব পর্যন্ত এর উপর আর বৃদ্ধি করেননি।
এর সনদও সহীহ। তবে ইবনু জুরাইজ একজন মুদাল্লিস এবং তিনি (হাদীস শোনার বিষয়ে) স্পষ্ট ঘোষণা দেননি। কিন্তু তাঁর থেকে এসেছে যে তিনি বলেছেন: যখন আমি বলি, ‘আতা বলেছেন’, তখন আমি তা তাঁর কাছ থেকে সরাসরি শুনেছি, যদিও আমি ‘শুনেছি’ শব্দটি ব্যবহার না করি। সুতরাং, তাঁর বক্তব্য ‘বলেছেন’ তা হাদীস শ্রবণের উপরই গণ্য হবে।
তৃতীয়ত: যা ইমাম নাসায়ী (১৫৯২) মুহাম্মাদ ইবনু বাশশার সূত্রে, তিনি ইয়াহইয়া সূত্রে, তিনি আবদুল হামিদ ইবনু জা'ফর সূত্রে, তিনি ওয়াহব ইবনু কাইসান সূত্রে বর্ণনা করেছেন। ওয়াহব ইবনু কাইসান বলেন: ইবনু যুবাইরের যুগে দুটি ঈদ একত্রিত হয়েছিল। তিনি দিনের মধ্যভাগ পর্যন্ত (সালাতের জন্য) বের হওয়া বিলম্ব করলেন, তারপর বের হয়ে খুৎবা দিলেন। তিনি খুৎবা দীর্ঘ করলেন, অতঃপর নেমে এসে সালাত আদায় করলেন। তিনি সেই দিন লোকদের নিয়ে জুমু'আর সালাত আদায় করলেন না। যখন ইবনু আব্বাসকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে জানানো হলো, তিনি বললেন: তিনি সুন্নাতকে সঠিকভাবেই গ্রহণ করেছেন।
এর সনদও সহীহ।
এই সূত্রেই ইবনু খুযাইমাহ (১৪৬৫) হাদীসটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ইবনু আব্বাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বক্তব্য, "ইবনু যুবাইর সুন্নাতকে সঠিকভাবেই গ্রহণ করেছেন," এর ব্যাখ্যা হতে পারে যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতকে বুঝিয়েছেন। অথবা বৈধভাবে আবূ বকর, উমার, উসমান বা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সুন্নাতকেও বুঝাতে পারেন। আমি মনে করি না যে এর দ্বারা তিনি ঈদের সালাতের আগে খুৎবা দেওয়ার ক্ষেত্রে সুন্নাতকে বুঝিয়েছেন; কারণ এই কাজটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সুন্নাতের পরিপন্থী। বরং তিনি কেবল ঈদের সালাত আদায় করার পরে তাদের নিয়ে জুমু'আ না পড়ার বিষয়টিকে বুঝিয়েছেন, ঈদের আগে খুৎবা দেওয়ার বিষয়টি নয়। সমাপ্ত।
আর যা ইয়াস ইবনু আবী রামলাহ আশ-শামী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুআবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ানের সাথে উপস্থিত ছিলাম, যখন তিনি যায়দ ইবনু আরকামকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একই দিনে দুটি ঈদ একত্রিত হতে দেখেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তিনি কীভাবে করলেন? তিনি বললেন: তিনি ঈদের সালাত আদায় করলেন, এরপর জুমু'আর বিষয়ে শিথিলতা প্রদান করে বললেন: "যে সালাত আদায় করতে চায়, সে যেন সালাত আদায় করে।"
এটি আবূ দাঊদ (১০৭০), নাসায়ী (১৫৯১), ইবনু মাজাহ (১৩১০) এবং ইমাম আহমাদ (১৯৩১৮) এই সূত্রেই বর্ণনা করেছেন। তবে নাসায়ী "যে সালাত আদায় করতে চায়, সে যেন সালাত আদায় করে" বাক্যটি উল্লেখ করেননি।
এই হাদীসের সনদ দুর্বল, কেননা ইয়াস ইবনু আবী রামলাহ আশ-শামী একজন অজ্ঞাত (মাজহূল) বর্ণনাকারী। এই দুর্বলতা সত্ত্বেও হাকিম মুস্তাদরাক (১/২৮৮)-এ এটিকে সহীহ বলেছেন। যাহাবী তাঁর ‘আল-মীযান’-এ এই হাদীসের দিকে ইঙ্গিত করার পর বলেছেন: ইবনু মুনযির বলেছেন: এই হাদীসটি প্রমাণিত নয়, কারণ ইয়াস একজন মাজহূল। সমাপ্ত।
তবে হাফিয ইবনু মাঈন থেকে তাঁর ‘আত-তালখীস’-এ এই হাদীস সহীহ হওয়ার বর্ণনা উদ্ধৃত করেছেন। সম্ভবত তিনি (ইমাম ইবনু মাঈন) এর বহু শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) থাকার কারণে এটিকে সহীহ বলেছেন। আল্লাহই সর্বজ্ঞাত।
অনুরূপভাবে, যা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে বর্ণিত: "তোমাদের আজকের এই দিনে দুটি ঈদ একত্রিত হয়েছে। সুতরাং যে চায় তার জন্য এটি জুমু'আর পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে। তবে আমরা জুমু'আর সালাত আদায় করব।"
এটি আবূ দাঊদ (১০৭৩), ইবনু মাজাহ (১৩১১), হাকিম (১/২৮৮, ২৮৯) এবং বাইহাকী (৩/৩১৮) বর্ণনা করেছেন। সকলেই বাক্বিয়্যাহ ইবনু ওয়ালীদ সূত্রে, তিনি শু’বাহ সূত্রে, তিনি মুগীরাহ আদ-দ্বাব্বী সূত্রে, তিনি আবদুল আযীয ইবনু রুফাই’ সূত্রে, তিনি আবূ সালিহ সূত্রে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
বাক্বিয়্যাহ ইবনু ওয়ালীদ যদিও মুদাল্লিস, তবে কোনো কোনো বর্ণনায় তিনি সুস্পষ্টভাবে হাদীস শ্রবণের কথা বলেছেন। কিন্তু এই হাদীসের দুর্বলতার কারণ হলো, আবদুর রাযযাক (৫৭২৮) এটি সাওরী সূত্রে, তিনি আবদুল আযীয ইবনু রুফাই’ সূত্রে, তিনি আবূ সালিহ সূত্রে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
ইমাম আহমাদ, দারাকুতনী এবং অন্যান্যরা এর মুরসাল হওয়াকে সহীহ বলেছেন।
অনুরূপভাবে বাইহাকী বলেছেন: সুফিয়ান সাওরী এটি আবদুল আযীয সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি এটিকে মুরসাল করেছেন। এরপর তিনি বলেন: সুফিয়ান ইবনু উয়ায়নাহ থেকে এটি আবদুল আযীয সূত্রে মুত্তাসিল (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণিত, যা আলিয়াহ-এর অধিবাসীদের সাথে সম্পর্কিত। তবে এর সনদে দুর্বলতা রয়েছে। অনুরূপভাবে উমার ইবনু আবদুল আযীয থেকেও এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, যা আলিয়াহ-এর অধিবাসীদের সাথে সম্পর্কিত, তবে এটি মুনকাতি' (বিচ্ছিন্ন)। সমাপ্ত।
অনুরূপভাবে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যা সহীহ নয়। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দুটি ঈদ একত্রিত হয়েছিল। তিনি লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন, তারপর বললেন: "যে ব্যক্তি জুমু'আর জন্য আসতে চায়, সে যেন আসে; আর যে পিছনে থাকতে চায়, সে যেন পিছনে থাকে।" এটি ইবনু মাজাহ (১২১৩) জুব্বারাহ ইবনু মুগাল্লিস সূত্রে, তিনি মান্দাল ইবনু আলী সূত্রে, তিনি আবদুল আযীয ইবনু উমার সূত্রে, তিনি নাফি' সূত্রে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
জুব্বারাহ ইবনু মুগাল্লিস এবং তার শাইখ মান্দাল ইবনু আলী উভয়েই দুর্বল বর্ণনাকারী।
সুতরাং যে ব্যক্তি শাহিদসমূহের (সমর্থক বর্ণনা) আধিক্যের দিকে তাকায়, সে বলে যে এই হাদীসের মূল রয়েছে এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে এর উপর আমল করা হয়েছে।
আর সহীহ বুখারী, কিতাবুল আদ্বাহী (৫৫৭২)-তে আবূ উবাইদ (ইবনু আযহারের আযাদকৃত গোলাম) থেকে সাব্যস্ত হয়েছে, তিনি বলেন: আমি ঈদুল আযহার দিনে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ঈদগাহে উপস্থিত ছিলাম, সেদিন ছিল জুমু'আর দিন। তিনি খুৎবার আগে সালাত আদায় করলেন, তারপর খুৎবা দিলেন এবং বললেন: হে লোকসকল! আজকের এই দিনে তোমাদের জন্য দুটি ঈদ একত্রিত হয়েছে। সুতরাং যারা আলিয়াহর অধিবাসী (মদিনার উপরিভাগের বাসিন্দা) এবং জুমু'আর অপেক্ষা করতে চায়, তারা অপেক্ষা করুক। আর যে ফিরে যেতে চায়, আমি তাকে অনুমতি দিলাম। সমাপ্ত।
অতএব, তিনি বৈধ মনে করতেন যে, যখন একই দিনে দুটি ঈদ একত্রিত হবে, তখন জুমু'আর সালাত থেকে পিছিয়ে থাকা যেতে পারে। ইবনুল মুবারকের ‘আল-মিন্না আল-কুবরা’-তে আলিমদের আলোচনা দেখুন। তিনি সায়িবের উল্লেখ যোগ করেছেন, সুতরাং তাঁর এই সংযোজন গ্রহণ করা আবশ্যক।
আমি (আলবানী) বলি: বিষয়টি তেমনই যেমন তিনি (ইবনু খুযাইমাহ) বলেছেন। তবে বাইহাকী যেমন উল্লেখ করেছেন, কেবল সুফিয়ান একাই তাঁর বিরোধিতা করেননি, বরং হিশাম ইবনু ইউসুফ আস-সান’আনীও তাঁর বিরোধিতা করেছেন। আবূ যুর’আহ এটি ‘ইলাল ইবনু আবী হাতিম’ (১/১৮০)-এ উল্লেখ করেছেন। আর আবদুর রাযযাক তাঁর মুসান্নাফ (৫৬৭০)-এ ইবনু জুরাইজ সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যিনি বলেছেন: আতা আমাকে খবর দিয়েছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এরপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
আতা বলতেন: সেই দিন লোকদের জন্য খুৎবাতে উপস্থিত থাকা আবশ্যক নয়। সমাপ্ত।
সুতরাং, আমরা যদি এই সনদগুলোর দিকে তাকাই, তবে আমরা বলব: হাদীসের মূলনীতি দাবি করে যে ফাদ্বল ইবনু মূসার হাদীসকে শা'য (বিরুদ্ধাচারী) হিসেবে গণ্য করব এবং আতার মুরসাল বর্ণনাটিই হলো মাহফূয (সংরক্ষিত)। আল্লাহ তা’আলাই সর্বজ্ঞাত।
3100 - عن البراء بن عازب قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يخطب فقال: إنَّ أَوَّلَ ما نبدأ من يومنا هذا أن نُصلي ثم نرجع فننحرَ، فمن فعل فقد أصاب سُنَّتنا".
صحيح: رواه البخاري في العيدين (951) عن حجاج، قال: حدثنا شعبة، قال: أخبرني زُبيد، قال: سمعت الشعبي، عن البراء فذكره، وسيأتي بأطول منه في كتاب الأُضحية.
وأما تهاني العيد وهو قول بعضهم لبعض: تقبل الله منَّا ومنك، فمنها ما رواه محمد بن زياد قال: كنت مع أبي أمامة الباهلي وغيره من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فكانوا إذا رجعوا يقول بعضهم لبعض: تقبل الله منَّا ومنك، قال الإمام أحمد: إسناده جيد، ذكره ابن التركماني في الجوهر النقي" (3/ 320).
ومنها ما رواه جبير بن نفير قال: كان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا التقوا يوم العيد يقول بعضهم لبعض: تقبل الله منَّا ومنك.
قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (2/ 446):"رُوِيناه في"المحامليات" بإسناد حسن".
وروى البيهقي (3/ 319) من طريق أدهم مولي عمر بن عبد العزيز، قال: كنَّا نقول لعمر بن عبد العزيز في العيدين: تقبل الله منَّا ومنك يا أمير المؤمنين. فيردُّ علينا. ولا ينكر ذلك علينا …".
وأما ما رُوي عن واثلة بن الأسقع مرفوعًا؛ فلا يصح.
رواه ابن عدي في الكامل (6/ 2276) عن محمد بن الضحاك بن عمرو بن أبي عاصم النبيل قال: ثنا عبد العزيز بن معاوية، ثنا محمد بن إبراهيم الشامي، ثنا بقية، عن ثور، عن خالد بن معدان، عن واثلة بن الأسقع قال: لقيت النبي صلى الله عليه وسلم في يوم عيدٍ، فقلت: يا رسول الله! تقبل الله منا ومنك. فقال: نعم تقبل الله منَّا ومنك". قال ابن عدي:"وهذا منكر، لا أعلم يرويه عن بقية غير محمد بن إبراهيم هذا، وعامة أحاديثه غير محفوظة". انتهي.
قلت: محمد بن إبراهيم هذا هو: ابن العلاء الدمشقي الشامي قال فيه الدارقطني: كذاب. وقال
ابن حبان: يضع الحديث لا تحل الرواية عنه إلا عند الاعتبار. وقال أبو نعيم: روي موضوعات.
ورواه البيهقي (3/ 319) من طريق ابن عدي. وقال:"قد رأيته بإسناد آخر عن بقية موقوفًا غير مرفوع، لا أراه محفوظًا".
قلت: وهو ما رواه الطبراني في"المعجم الكبير" (22/ 52، 53) من طريق أبي همام الوليد بن شجاع، ثنا بقية بن الوليد، حدثني حبيب بن عمر الأنصاري، أخبرني أبي قال: لقيتُ واثلة يوم عيد. فقلت: تقبل الله منا ومنك. فقال: نعم، تقبل الله منا ومنك.
نقل الذهبي في"الميزان" و"المغني" و"ديوان الضعفاء" عن الدارقطني أنه قال:"حبيب بن عمر مجهول".
وكذلك لا يصح ما رُوي في كراهية ذلك وهو ما رواه نعيم بن حماد، ثنا عبد الخالق بن زيد بن واقد الدمشقي، عن أبيه، عن مكحول، عن عبادة بن الصامت قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن قول الناس في العيدين: تقبل الله منا ومنكم، قال:"ذلك فعل أهل الكتابين وكرهه.
رواه البيهقي وقال: عبد الخالق بن زيد منكر الحديث. قاله البخاري.
وقال الحافظ ابن حجر:"إسناده ضعيف".
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুতবা দিতে শুনেছি। তিনি বলেন: "আমাদের এই দিনের প্রথম কাজ হলো আমরা সালাত (নামাজ) আদায় করব, এরপর ফিরে আসব এবং কুরবানি (নাহর) করব। যে ব্যক্তি এমনটি করল, সে আমাদের সুন্নাতকে সঠিকভাবে পালন করল।"
3101 - عن أم عطية قالت: كنا نؤمر أن نُخرج يوم العيد، حتى نُخرج البكرَ من خِدرها، حتى نُخرج الحُيَّضَ فيكنَّ خلف الناس، فيكبِّرن بتكبيرهم، ويدعون بدعائهم، ويرجونَ بركةَ ذلك اليوم وطُهْرَتَه.
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (971)، ومسلم في العيدين (890/ 11) كلاهما من طريق عاصم الأحول، عن حفصة بنت سيرين، عن أمّ عطية فذكرته واللفظ للبخاري.
ولفظ مسلم: الحُيَّض يخرجنَ فيكنَّ خلف الناس، يكبِّرن مع الناس.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদেরকে নির্দেশ দেওয়া হতো যে, আমরা যেন ঈদের দিন (ঘরের বাইরে) বের হই। এমনকি কুমারী মেয়েদেরকেও তাদের ঘরের পর্দা থেকে বের করে আনি এবং ঋতুমতী মহিলাদেরকেও বের করে আনি, যাতে তারা মানুষের পেছনে থাকে, এবং তাদের তাকবীরের সাথে তাকবীর বলে ও তাদের দোয়ার সাথে দোয়া করে। আর তারা যেন সেই দিনের বরকত ও পবিত্রতা প্রত্যাশা করে।
3102 - عن محمد بن أبي بكر الثقفي قال: سألت أنسًا - ونحن غاديان من منى إلى
عرفات- عن التلبية: كيف كنتُم تصنعون مع النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: كان يُلبَي المُلبِّي لا ينكر عليه، ويُكبِّر المُكبِّر فلا يُنكر عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (970)، ومسلم في الحج (1285) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن محمد بن أبي بكر الثقفي، فذكره، واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনু আবী বকর আস-সাকাফী বলেন: আমি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম—যখন আমরা মিনা থেকে আরাফাতের দিকে ভোরে যাচ্ছিলাম—তালবিয়াহ সম্পর্কে: আপনারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কীরূপ করতেন? তিনি বললেন: যে ব্যক্তি তালবিয়াহ পাঠ করত, সে তা পাঠ করত, তাকে নিষেধ করা হতো না; আর যে ব্যক্তি তাকবীর পাঠ করত, সে তা পাঠ করত, তাকেও নিষেধ করা হতো না।
3103 - عن ابن عمر قال: غدونا مع رسول الله من منى إلى عرفات. فمِنَّا المُلَبِّي، ومِنَّا المكبِّر.
وفي رواية: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غداة عرفة، فمِنَّا المكبِّر، ومِنا المُهلِّل، فأما نحن فنكبِّر.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1284) من طرق عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনা থেকে আরাফাতের দিকে রওনা হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তালবিয়া পাঠ করছিল এবং কেউ তাকবীর পাঠ করছিল।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা আরাফাতের সকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তাকবীর পাঠ করছিল এবং কেউ তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) পাঠ করছিল। আর আমরা (বর্ণনাকারীগণ) তখন তাকবীর পাঠ করছিলাম।
3104 - عن نُبيشة الهذلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيام التشريق أيام أكل وشرب".
وزاد في رواية:"وذكرٍ للهِ".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1141) من حديث هُشَيم، أخبرنا خالد الحذاء، عن أبي المليح، عن نُبيشة فذكره.
ورواه إسماعيل ابن عُليَّة، عن خالد الرواية الثانية بزيادة"وذكرٍ للهِ".
وفي الحديث استحباب الإكثار من الذكر في هذه الأيام من التكبير وغيره.
و"نُبيشة" بضم النون وفتح الباء وبالشين المعجمة وهو: نُبيشة بن عمرو بن عوف بن سلمة الهُذَلي.
وفي الباب عن علي وعمَّار قالا: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجهر في المكتوبات"ببِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ" وكان يقنت في صلاة الفجر، وكان يُكبِّر من يوم عرفة صلاة الغداة، ويقطعها صلاة العصر آخر أيام التشريق.
رواه الحاكم (1/ 299) من طريق سعيد بن عثمان الخراز، ثنا عبد الرحمن بن سعيد المؤذن، ثنا فطر بن خليفة، عن أبي الطفيل، عن علي وعمار فذكرا الحديث.
قال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد، ولا أعلم في رواته منسوبًا إلى الجرح".
وتعقبه الذهبي فقال:"بل خبرٌ واهٍ، كأنَّه موضوع؛ لأنَّ عبد الرحمن صاحب مناكير، وسعيد إن كان الكريزي فهو ضعيف، وإلا فهو مجهول".
وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد الله قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكبِّر في صلاة الفجر يوم عرفة إلى صلاة العصر من آخر أيَّام التشريق، حين يُسلِّم من المكتوبات.
رواه الدارقطني (2/ 49) من طريق عمرو بن شِمْرٍ، عن جابر، عن أبي جعفر عن علي بن حسين، عن جابر بن عبد الله فذكره.
قال عبد الحق:"في إسناده جابر بن يزيد الجُعفي، وقد اختُلِف عنه".
وتعقَّبه ابن القطَّان قائلًا:"لا يتعيّن للحمل عليه فيه جابر الجعفي، بل لعلّ الجناية من غيره ممن هو أضعف منه، لا يصل إليه إلَّا به ..".
ثم ساق الحديث من طريق الدارقطني ثم قال: وهو كما ترى لا يصل إلى جابر الجعفي إلَّا برواية عمرو بن شِمْر الجعفي أيضًا، وهو أحد الهالكين …".
ونقل تضعيفه عن عدد من الأئمة ثم قال:"فعلي هذا لا ينبغي تعصيب الجناية في هذا الحديث برأس جابر الجعفي؛ فإن عمرو بن شِمْر ما في المسلمين من يقبل حديثه"، بيان الوهم والايهام (3/ 102 - 104).
قلت: ولماذا لا تكون الآفة، من الشّيخ وتلميذه وإن كان التلميذ أضعف من الشيخ.
وأما آثار الصّحابة فهي كثيرة ومتنوعة، وإليكم بعض هذه الآثار.
كان ابن عمر وأبو هريرة يخرجان إلى السوق في أيام العشر يكبِّران، ويُكَبِّر الناس بتكبيرهما، ذكره البخاري (2/ 457) معلقًا بصيغة الجزم، قال الحافظ: لم أره موصولًا عنهما.
وكان ابن عمر يُكبّر في قبَّتِه بمنى، فيسمعه أهل المسجد فيكبّرون، ويكبِّر أهل الأسواق، حتى ترتج مِنىّ تكبيرًا.
وكان ابن عمر يُكبِّر بمنى تلك الأيام، خلف الصلاة، وعلى فراشه، وفي فُسطاطه، ومجلسه، وممشاه تلك الأيام جميعًا.
وكانت ميمونة تُكبر يوم النحر، وكنَّ النساء يكبِّرنَ خلف أبان بن عثمان وعمر بن عبد العزيز ليالي التشريق مع الرجال في المسجد.
هذه الآثار كلّها ذكرها البخاريّ معلّقًا بصيغة الجزم.
وروى البيهقي (3/ 279) أن ابن عمر كان يرفع صوته بالتكبير حتى يأتي المصلَّي، ويُكبِّر حتى يأتي الإمامُ.
قال البيهقي:"هذا هو الصحيح موقوف، وقد رُوي من وجهين ضعيفين مرفوعًا" ثم قال:"أما أمثلهما فهو ما رواه … ابن خزيمة، ثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، ثنا عمي، ثنا عبد الله بن عمر، عن نافع، عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخرج في العيدين مع الفضل بن عباس وعبد الله والعباس وعلي وجعفر والحسن والحسين وأسامة بن زيد وزيد بن حارثة وأيمن ابن أم أيمن رضي الله عنهم رافعًا صوته بالتهليل والتكبير، فيأخذ طريق الحذّائين حتى يأتي المصلى، وإذا فرغ رجع على الحذّائين حتى يأتي منزله".
وأما أضعفهما فهو ما رواه عن الحاكم (1/ 297، 298) من طريق موسي بن محمد بن عطاء، ثنا الوليد بن محمد، ثنا الزهري، أخبرني سالم بن عبد الله أن عبد الله بن عمر أخبره أن رسول الله
- صلى الله عليه وسلم كان يُكبّر يوم الفطر من حين يخرج من بيته حتى يأتي المصلي".
قال الحاكم:"هذا حديث غريب الإسناد والمتن، غير أن الشيخين لم يحتجا بالوليد بن محمد الموقري، ولا بموسي بن عطا البلقاوي. وهذه سنة تداولها أئمة أهل الحديث، وصحت به الرواية عن عبد الله بن عمر وغيره من الصّحابة". وقال الذهبي معقبا عليه: هما متروكان.
وقال البيهقيّ: موسي بن محمد بن عطاء منكر الحديث ضعيف. والوليد بن محمد المقريّ ضعيف، لا يحتج برواية أمثالهما. والحديث المحفوظ عن ابن عمر من قوله" انتهى.
قلت: وفي الطريق الأولي الذي هو أمثلهما كما قال البيهقي؛ عبد الله بن عمر -المكبر- وهو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب العمري المدني ضعيف باتفاق أهل العلم، فلا يصح هذا الحديث مرفوعًا بوجه من الوجوه؛ فإن الصّحيح أنه موقوف على عبد الله بن عمر، وقد ثبت عن غير واحد من الصّحابة أنهم كانوا يكبرون.
وعن مالك، عن يحيى بن سعيد أنه بلغه أنَّ عمر بن الخطاب خرج الغدَ من يوم النحر حين ارتفع النهار شيئًا. فكبَّر، فكبَّر الناس بتكبيره، ثم خرج الثانية من يومه ذلك بعد ارتفاع النهار. فكبَّر، فكبِّر الناس بتكبيره، ثم خرج الثالثة، حين زاغتِ الشمس فكبَّر، فكبَّر الناسُ بتكبيره حتى يتصل التكبيرُ ويبلُغَ البيتَ. فيُعلم أنَّ عمر قد خرج يرمِي.
قال مالك: الأمر عندنا أنَّ التكبير في أيَّام التشريق دُبر الصلاة. وأوَّلُ ذلك تكبير الإمام والناسُ معه. دُبرَ صلاة الظهر من يوم النحر، وآخر ذَلك تكبير الإمام والناس معه دُبر صلاة الصبح من آخر أيَّامِ التشريق ثم يقطعُ التكبير"الموطأ" (1/ 404).
وكان علي بن أبي طالب -رضى الله عنه- يكبر بعد صلاة الفجر يوم عرفة إلى صلاة العصر من أيام التشريق، ويكبر بعد العصر. رواه ابن أبي شيبة وغيره.
وأخرج الدارقطني في سننه عن ابن عمر وأبي سعيد وزيد بن ثابت وعثمان بن عفان بأسانيد عدة أنَّهم كانوا يكبرون بعد الظهر من يوم النحر إلى الظهر من آخر أيام التشريق.
وأما ابن مسعود فكان يُكبِّر من صلاة الفجر يوم عرفة، إلى صلاة العصر من يوم النحر، وكان يقول: الله أكبر الله أكبر، لا إله إلا الله، والله أكبر الله أكبر، ولله الحمد.
নুবাইশাহ আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আইয়ামে তাশরীক (কুরবানীর পরের দিনগুলো) হলো পানাহার ও উপভোগের দিন।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "এবং আল্লাহর স্মরণের দিন।"
3105 - عن عائشة أنَّ أبا بكر دخل عليها، وعندها جاريتان في أيام مِني تُدَفِّفَانِ وتضربان -والنبي صلى الله عليه وسلم متغَشٍّ بثوبه- فانتهرها أبو بكر، فكشف النبي صلى الله عليه وسلم عن وجهه فقال:"دعهما يا أبا بكر! فإنَّها أيامُ عيدٍ وتلك الأيام أيام منًى.
متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (987)، ومسلم في العيدين (892/ 17) كلاهما من
طريق ابن شهاب، حدَّثه عروة، عن عائشة واللفظ للبخاري. ولفظ مسلم قريب منه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন মিনার দিনগুলিতে তাঁর কাছে দু’টি বালিকা ‘দুফ’ বাজাচ্ছিল এবং ছন্দ দিচ্ছিল— আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চাদর দ্বারা নিজেকে আবৃত করে ছিলেন— আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ধমকালেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চেহারা থেকে চাদর সরিয়ে বললেন, "হে আবূ বকর! তাদের ছেড়ে দাও। কেননা এগুলো ঈদের দিন এবং এই দিনগুলো মিনার দিন।"
3106 - عن عائشة قالت: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي جاريتان تُغنّيان بغِناء بُعاث، فاضطجع على الفراش، وحوَّل وجهه. ودخل أبو بكر فانتهرني وقال: مزمارة الشيطان عند النبي صلى الله عليه وسلم فأقبل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"دعهما" فلمَّا غَفَلَ غمزتُهما، وخرجتا، وكان يوم عيد يلعب السودان بالدَّرَقِ والحِرابِ، فإمَّا سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم وإمَّا قال:"تشتهين تنظرين؟" فقلت: نعم. فأقامني وراءَهُ خدِّي على خده، وهو يقول:"دونكم يا بني أرْفِدة" حتى إذا ملَلْتُ قال:"حسبُكِ" قلت: نعم. قال:"فاذهبي".
متفق عليه: البخاري في العيدين (949، 950)، ومسلم في العيدين (892/ 19) كلاهما من طريق ابن وهب، قال: أخبرنا عمرو، أن محمد بن عبد الرحمن حدَّثه عن عروة، عن عائشة فذكرته واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري قريب منه.
وفي رواية لهما: جاريتان من جواري الأنصار تُغنيان بما تناولت الأنصار يومَ بُعاث، وليستا بمغنيتين، وفيها قال النبي صلى الله عليه وسلم: يا أبا بكر! إن لكل قوم عيدًا، وهذا عيدنا"، البخاري (952)، ومسلم (892/ 16) كلاهما من حديث أبي أسامة عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.
وقوله:"بُعاث" بضم الموحدة وبعدها مهملة، وآخرها مثلثة. هو موضع من المدينة على ليلتين، وقيل غير ذلك.
قال الخطابي: يوم بُعاث يوم مشهور من أيام العرب كانت فيه مقتلة عظيمة للأوس والخزرج، وبقيت الحرب قائمة مائة وعشرين سنة إلى الإسلام على ما ذكره ابن إسحاق وغيره، وقيل غير ذلك. انظر:"الفتح" (2/ 441).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট প্রবেশ করলেন, তখন আমার কাছে দুটি বালিকা বু'আস যুদ্ধের গান গাইছিল। তিনি বিছানায় শুয়ে পড়লেন এবং চেহারা ঘুরিয়ে নিলেন। ইতোমধ্যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন এবং আমাকে ধমক দিয়ে বললেন: নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে শয়তানের বাদ্য? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার (আবূ বকরের) দিকে ফিরে বললেন: "তাদেরকে গাইতে দাও।" যখন তিনি অন্যমনস্ক হলেন, আমি তাদের দু'জনকে ইশারা করলাম এবং তারা বেরিয়ে গেল।
সেদিন ছিল ঈদের দিন, আর হাবশী লোকেরা ঢাল ও বল্লম নিয়ে খেলা করছিল। হয় আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলাম, নতুবা তিনি নিজেই বললেন: "তুমি কি দেখতে চাও?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি আমাকে তার পিছনে দাঁড় করিয়ে দিলেন—আমার গাল ছিল তার গালের উপর—আর তিনি বলছিলেন: "হে বানী আরফিদা, চালিয়ে যাও।" অবশেষে যখন আমি ক্লান্ত হয়ে পড়লাম, তখন তিনি বললেন: "তোমার যথেষ্ট হয়েছে কি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে যাও।"
অন্য এক বর্ণনায় (যা আনসারদের দাসী সংক্রান্ত) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন: "হে আবূ বকর! প্রত্যেক জাতিরই উৎসবের দিন আছে, আর এটা হলো আমাদের উৎসবের দিন।"
3107 - عن أبي هريرة قال: بينما الحبشة يلْعبون عند رسول الله صلى الله عليه وسلم بِحرابهم، إذ دخل عمر بن الخطاب، فأهْوى إلى الحَصْباء يَحْصِبهم بها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دَعْهم يا عمر".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2901)، ومسلم في العيدين (893) كلاهما من طريق معمر، عن الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره، ولفظهما سواء. وفي رواية"في المسجد".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এমন সময় আবিসিনিয়ার (হাবশার) লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাদের বর্শা নিয়ে খেলা করছিল, যখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে প্রবেশ করলেন। তিনি কাঁকর হাতে নিলেন যাতে তাদের দিকে ছুঁড়ে মারতে পারেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে উমার, তাদের ছেড়ে দাও।"
(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, খেলাটি 'মসজিদে' হচ্ছিল।)
