হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3108)


3108 - عن سعيد بن جبير قال: كنت مع ابن عمر حين أصابه سنان الرمح في أَخمصِ قدمه، فلزقتْ قدمه بالرِّكاب، فنزلتُ فنزعتُها -وذلك بمنى-، فبلغ الحجاجَ فجعلَ
يعودُه، فقال الحجاج: لو نعلم من أصابك؟ فقال ابن عمر: أنت أصبتني. قال: كيف؟ قال: حملت السِّلاحَ في يوم لم يكن يُحمل فيه، وأدخلت السلاحَ الحرمَ، ولم يكن السلاحُ يُدخل الحرمَ.

صحيح: رواه البخاري في العيدين (966) عن زكريا بن يحي أبي السُّكين، قال: حدثنا المحاربي، قال: حدثنا محمد بن سوقة، عن سعيد بن جبير فذكره.

ورواه أيضًا (967) عن أحمد بن يعقوب، قال: حدثني إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، عن أبيه قال: دخل الحجاج على ابن عمر، وأنا عنده فقال: كيف هو؟ فقال: صالح. فقال: من أصابك؟ قال: أصابني من أمر بحملٍ السلاح في يومٍ لا يحل فيه حملُه. يعني: الحجاجُ.

قوله:"أخمص قدمه" بإسكان الخاء وفتح الميم - باطن القدم وما رق من أسفلها. وقيل: هو خصر باطنها الذي لا يُصيب الأرض عند المشي.

وأما ما جاء من ذكر السودان أنَّهم كانوا يلعبون بالدَّرق والحِراب يوم عيد فالظاهر أنَّ ذلك كان بعد رجوعه صلى الله عليه وسلم من المصلَّي؛ لأنَّه كان يخرج أوَّلَ النهار فيصلِّي، ثم يرجع، ولذا كَرِه أهل العلم حمل السلاح يوم عيد إلا أن يخاف العدو.

و"الحراب" بكسر الحاء - جمع حربة،"والدرق" جمع درقة وهي الترس.

وأما ما رُوي عن ابن عباس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُلْبس السِّلاحُ في بلاد الإسلام في العيدين إلَّا أن يكون بحضرة العدو. فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (1314) عن عبد القدوس بن محمد، قال: حدثنا نائل بن نَجِيح قال: حدثنا إسماعيل بن زياد، عن ابن جُريج، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.

ونائل بن نجيح وهو: أبو سهل البصري، أو البغدادي، وشيخه إسماعيل بن زياد الكوفي، قاضي الموصل ضعيفان بل كذَّبوا إسماعيل بن زياد وتركوه.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবায়ের বলেন, আমি ইবনে উমারের সাথে ছিলাম যখন একটি বর্শার ফলক তাঁর পায়ের তলার নরম অংশে আঘাত করে, ফলে তাঁর পা রেকাবের সাথে আটকে যায়। আমি (ঘোড়া থেকে) নেমে সেটি খুলে দেই—আর এই ঘটনাটি মিনাতে ঘটেছিল। সংবাদটি হাজ্জাজের কাছে পৌঁছালে সে তাঁকে দেখতে আসতে শুরু করল। হাজ্জাজ বলল: আহা, যদি জানতে পারতাম কে আপনাকে আঘাত করেছে? ইবনে উমার বললেন: তুমিই আমাকে আঘাত করেছ। সে বলল: কীভাবে? তিনি বললেন: তুমি এমন দিনে অস্ত্র বহন করিয়েছ যেদিন অস্ত্র বহন করা হতো না এবং তুমি হারামের মধ্যে অস্ত্র প্রবেশ করিয়েছ, অথচ হারামের মধ্যে অস্ত্র প্রবেশ করানো হতো না।









আল-জামি` আল-কামিল (3109)


3109 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نحن الآخرون السابقون يوم القيامة، بيد أنَّهم أوتوا الكتاب من قبلنا، وأُوتيناه من بعدهم، وهذا يومهم الذي فُرض عليهم فاختلفوا فيه، فهدانا الله له، فهم لنا فيه تبعٌ؛ فاليهود غدًا، والنصارى بعد غدٍ".

متفق عليه: رواه البخاري في الأَيمان والنذور (6624)، ومسلم في الجمعة (855/ 21)، كلاهما من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمرٌ، عن همَّام بن منبِّه، قال: هذا ما حدَّثنا أبو هريرة فذكره.

واللفظ لمسلمٍ، أمَّا البخاري؛ فاقتصر على قوله صلى الله عليه وسلم:"نحن الآخرون السابقون يوم القيامة".

ورواه البخاري (876)، ومسلم، كلاهما من طريق أبي الزناد، أنَّ عبد الرحمن بن هرمز الأعرج مولى ربيعة بن الحارث حدَّثه، أنَّه سمِع أبا هريرةَ يقول: إنَّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث كاملًا كما هو عند مسلمٍ، إلَّا أنَّ مسلمًا أحال على السابق في هذا الإسنادِ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমরাই হবো কিয়ামতের দিন সর্বশেষ আগমনকারী, তবে [মর্যাদায়] অগ্রগামী। যদিও তাদের আমাদের পূর্বে কিতাব দেওয়া হয়েছে, আর আমাদের কিতাব দেওয়া হয়েছে তাদের পরে। আর এটি তাদের সেই দিন (শুক্রবার) যা তাদের উপর ফরয করা হয়েছিল, কিন্তু তারা তাতে মতভেদ করে। অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে এর জন্য পথ দেখালেন। সুতরাং তারা এই দিনে আমাদের অনুগামী; ইয়াহুদীরা [জুমআহর পরিবর্তে] শনিবার এবং নাসারারা রবিবার [পালন করে]।”









আল-জামি` আল-কামিল (3110)


3110 - عن أبي هريرة وحذيفة قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أضلَّ الله عز وجل عن الجمعة من كان قبلنا؛ فكان لليهود يوم السبت، وكان للنصارى يوم الأحد، فجاء الله بنا فهدانا الله ليوم الجمعة، فجعل الجمعة والسبت، والأحد، وكذلك هم تبع لنا يوم القيامة، نحن الآخرون من أهل الدنيا، والأولون يوم القيامة، المقضيُّ لهم قبل الخلائق". وفي رواية:"المقضيُّ بينهم".

وفي رواية عن حذيفة:"هُدينا إلى الجمعة، وأضلَّ الله عنها من كان قبلنا".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (856) من طرق عن ابن فضيل، عن أبي مالكٍ الأشجعي، عن أبي حازم، عن أبي هريرة.

وعن رِبعي بن حِراش، عن حذيفة، فذكرا الحديثَ.
والرواية الثانية عن حذيفة رواها مسلم أيضًا من وجه آخر عن سعد بن طارق، عن ربعي بن حراش به مثله.

ورواه البزَّار"كشف الأستار" (617) عن يوسف بن موسى، ثنا ابن فضيل، بالإسنادين جميعًا عن أبي هريرة وحذيفة، وفيه:"المغفور لهم قبل الخلائق".




আবু হুরায়রা ও হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা আমাদের পূর্ববর্তীদেরকে জুমু‘আর দিন থেকে পথভ্রষ্ট করে দিয়েছিলেন। ফলে ইয়াহূদীদের জন্য ছিল শনিবার এবং নাসারাদের জন্য ছিল রবিবার। অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে আনলেন এবং আল্লাহ আমাদেরকে জুমু‘আর দিনের জন্য পথ প্রদর্শন করলেন। তাই তিনি (দিনের ধারাবাহিকতা) স্থির করলেন: জুমু‘আ, শনিবার ও রবিবার। আর এভাবেই কিয়ামতের দিনও তারা আমাদের অনুগামী হবে। আমরা দুনিয়াবাসীর মধ্যে সর্বশেষে আগমনকারী, কিন্তু কিয়ামতের দিনে আমরাই প্রথম—যাদের ফায়সালা সৃষ্টির পূর্বে করা হবে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তাদের মাঝে ফায়সালা করা হবে।"

হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমাদেরকে জুমু‘আর দিকে পথ দেখানো হয়েছে, আর আল্লাহ আমাদের পূর্ববর্তীদেরকে তা থেকে পথভ্রষ্ট করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3111)


3111 - عن حفصةَ زوج النبي صلى الله عليه وسلم، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"رواح الجمعة واجب على كل محتلم".

صحيح: أخرجه أبو داود (342) والنسائي (1371) كلاهما من طريق المفضَّل بن فَضالة، عن عَيَّاش بن عبَّاسٍ، عن بكير، عن نافع، عن ابن عمر، عن حفصة، فذكرته. واللفظ للنسائي، ولفظ أبي داود:"على كلِّ محتلمٍ رواح الجمعة، وعلى كلِّ من راح الجمعة الغسلُ".

وإسناده صحيحٌ، صححه ابن خزيمة (1721) وابن حبان (1220) فروياه من طريق المفضل به.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জুমু'আর জন্য গমন প্রত্যেক প্রাপ্তবয়স্কের উপর ওয়াজিব।"









আল-জামি` আল-কামিল (3112)


3112 - عن طارق بن شهاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"الجمعة حقٌّ واجب على كلِّ مسلمٍ في جماعةٍ إلَّا أربعةٌ: عبدٌ مملوكٌ، أو امرأةٌ، أو صبيٌّ، أو مريضٌ".

صحيح: رواه أبو داود (1076) عن عباس بن عبد العظيم، حدَّثني إسحاق بن منصور، حدثنا هُريم، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره.

قال أبو داود: طارق بن شهاب رأى النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يسمع منه شيئًا".

قلت: طارق بن شهاب ثبتت صحبته، وغايته أنَّ بينه وبين النبي صلى الله عليه وسلم صحابي، ويسمَّى هذا مرسل الصحابي، وهو حجَّة عند جماهير أهل العلم.

وقد أخرجه الحاكم (1/ 288) من طريق العباس بن عبد العظيم، فجعل بينه وبين النبي صلى الله عليه وسلم"أبا موسي". وقال:"صحيح على شرط الشيخين، فقد اتفقا جميعًا على الاحتجاج بهريم بن سفيان". ولكن قال البيهقي (1/ 172): ذِكرُ أبي موسى الأشعري فيه ليس بمحفوظ. فقد رواه غير العباس، عن إسحاق دون ذكر أبي موسي".

وأمَّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"الجمعة على كلِّ من سمِع النداءَ". فهو ضعيفٌ؛ رواه أبو داود (1056)، وفيه أبو سلمة بن نبيهٍ، وعبد الله بن هارون، وهما مجهولان.

وكذلك ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله:"خمسةٌ لا جمعة عليهم: المرأة، والمسافر، والعبد، والصبي، وأهل البادية". ضعيفٌ، أخرجه الطبراني"مجمع البحرين" (942) وفيه شيخه أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين، وهو ضعيفٌ، وكذَّبه البعض، وإبراهيم بن حمَّاد بن أبي حازم المديني أيضًا ضعيف.



يقول على أعواد منبره:"لينتهينَّ أقوامٌ عن ودعهم الجمعات أو ليختمنَّ الله على قلوبهم، ثمَّ ليكوننَّ من الغافلين".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (865) عن الحسن بن علي الحلواني، حدَّثنا أبو توبةَ، حدَّثنا معاوية (وهو ابن سلام) عن زيد (يعني أخاه) أنَّه سمع أبا سلام، قال: حدثني الحكم بن ميناء، أنَّ عبد الله بن عُمر وأبا هريرة حدَّثاه، فذكره.

وأخرجه النسائي (1370) من وجه آخر عن زيد بن سلام به، إلَّا أنَّه جعل ابنَ عباسٍ بدل أبي هريرةَ.

ورواه ابن خزيمة (1855) عن موسي بن سهلٍ الرملي - وهو أحد الثقات من أهل الشام - عن أبي توبة به. وفيه: عن أبي هريرة وأبي سعيد قالا: فذكره.

قال البيهقي (3/ 171، 172) - بعد أن أشار إلى هذه الطرق وغيرها -:"رواية معاوية بن سلام عن أخيه زيد بن سلام أولى أن تكون محفوظةً".

تَنبيهٌ: في النسخة المطبوعة من صحيح ابن خزيمة:"موسي بن سهل، ثنا الربيع بن نافعٍ، عن أبي توبة …". وهذا خطأٌ مطبعي؛ لأنَّ الربيعَ بن نافعٍ هو الذي يُكنى بـ"أبي توبةَ". وهو الذي يروي عن معاوية بن سلام بدون واسطةٍ.




তারিক ইবনু শিহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জুমু‘আ প্রত্যেক মুসলমানের উপর জামা‘আতের সাথে (আদায় করা) একটি আবশ্যকীয় ফরয। তবে চারজনের উপর তা (ফরয) নয়: ক্রীতদাস, মহিলা, শিশু এবং রোগী।

তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মিম্বারের উপরে দাঁড়িয়ে বলতেন: “অবশ্যই কতিপয় লোক জুমু‘আর সালাত বর্জন করা থেকে বিরত থাকবে, নতুবা আল্লাহ তাদের অন্তরে মোহর মেরে দেবেন। অতঃপর তারা অবশ্যই গাফেলদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে যাবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3113)


3113 - عن عبد الله بن مسعود، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لقوم يتخلَّفون عن الجمعة:"لقد هممت أن آمر رجلًا يصلي بالناس، ثمَّ أحرِّق على رجال يتخلَّفون عن الجمعةِ بيوتهم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (652) من طريق أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، سمعه منه، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.

وهذا الحديث أول حديث ذكره المجد ابن تيمية في أبواب الجمعة في المنتقى، لكن قال البيهقي في"السنن الكبرى" (3/ 56):"والذي يدل عليه سائر الروايات أنَّه عبَّر بالجمعة عن الجماعة".

ولذا سبق أن ذكرته في جموع أبواب صلاة الجماعة وفضلها.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই কওম সম্পর্কে বললেন, যারা জুমু‘আহর সালাত থেকে অনুপস্থিত থাকে (বা পেছনে থাকে): “আমি সংকল্প করেছিলাম যে, আমি একজন লোককে লোকদের সালাতের ইমামতি করার নির্দেশ দেবো। এরপর যারা জুমু‘আহ থেকে পেছনে থাকে, আমি তাদের ঘরবাড়ি জ্বালিয়ে দেবো।”









আল-জামি` আল-কামিল (3114)


3114 - عن أبي جعد الضمري، -وكانت له صحبة- أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من ترك ثلاثَ جمَعٍ تهاونًا بها طبع الله على قلبه".

حسنٌ: أخرجه أبو داود (1052) والترمذي (500) والنسائي (1369) وابن ماجة (1125) كلهم من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن عبيدة بن سفيان الحضرمي، عن أبي الجعد الضمري قال: فذكر الحديثَ.

وإسناده حسن؛ فيه محمد بن عمرو بن علقمة، حسن الحديث، وحسَّنه الترمذي، وصحَّحه ابن خزيمة (1857) وابن حبان (259) فأخرجاه من طريق وكيع، عن سفيان، عن محمد بن عمرو بن علقمه به نحوه.
وصحَّحة -أيضًا- الحاكم (1/ 280) فقال:"صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه" لكن أبا الجعد هذا وقيل: اسمه: أدرع، وقيل: عمرو، وقيل: جنادة، صحابي قيل: إنَّه قُتل يوم الجمل. له هذا الحديث الواحد، وحديث آخر أخرجه البزار في مسنده. قاله ابن الملقن في"البدر المنير" (1/ 584). ولم يُخرِج له مسلمٌ.




আবু জাদ আদ-দামরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অবহেলা করে তিনটি জুমআর সালাত ত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3115)


3115 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ترك الجمعةَ ثلاثًا من غير ضرورةٍ طبع الله على قلبه".

حسنٌ: رواه ابن ماجة (1126) من طريق زهير وابن أبي ذئبٍ، كلاهما عن أَسِيد بن أبي أَسيد، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وهذا إسناد حسن، وصحّحه ابن خزيمة (1856) والبوصيري.

وأخرجه أحمد (22558) من طريق عبد العزيز بن محمد (وهو الدراوردي) عن أَسيد، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه.

والصّحيح: عن عبد الله بن أبي قتادة، عن جابر كما رواه زهير وابن أبي ذئب، وهو الذي رجَّحه أبو حاتم في العلل لابنه (1/ 396)، فقال:"ابن أبي ذئبٍ أحفظ مِن الدراوردي، وكأنَّه أشبه، وكأنَّ الدراوردي لزم الطريقَ". أي لزم جادة الطريق، وهو:"ابن أبي قتادة، عن أبيه". فوهِم؛ لأنَّ الصواب أنَّ ابن أبي قتادة إنَّما روى هذا عن جابر، لا عن أبيه. والله أعلم.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো প্রয়োজন ছাড়া তিনবার জুমুআ ত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3116)


3116 - عن أبي عبسٍ عبد الرحمن بن جبرٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ترك الجمعة ثلاث مرَّاتٍ تهاونًا بها طبع الله على قلبه".

حسن: رواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (5/ 2976): حدثنا أبو بكر بن مالكٍ (وهو القطيعي)، ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، ثنا الوليد بن مسلم، قال: سمعت يزيد بن أبي مريم، قال: لحقني عباية بن رافع، وأنا رائح إلى الجمعة ماشيًا، وهو راكبٌ فقال: أَبشر! فإنِّي سمعت أبا عبسٍ يقول: فذكر الحديث.

وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم ثقات، غير القطيعي، واسمه: أحمد بن جعفر بن حَمْدان بن مالك بن شبيب بن عبد الله، أبو بكر القطيعي، راوية"المسند" عن عبد الله بن الإمام أحمد، كان أسند أهل زمانه، وقد تُكُلِّم فيه، غير أنَّه لا ينزل عن درجة"صدوق". قال أبو عبد الله الذهبي:"صدوق في نفسه مقبولٌ، تغيَّر قليلًا"."الميزان" (1/ 87). وانظر للمزيد:"تاريخ بغداد" (5/ 116 - 118).

أمَّا يزيد بن أبي مريم؛ فقد قال فيه الحافظ:"لا بأس به". ولكن الأولى أن يقال فيه:"ثقة"؛ فقد وثَّقه الأئمة، منهم: ابن معين وأبو حاتم، والبخاري، ودحيم، والعجلي. وأخرج له البخاري في الصحيح. وقال أبو زرعة:"ليس به بأسٌ". وقال الدارقطني:"ليس بذاك". فقول الجماعة
أولى بالتقديم؛ لذا قال الذهبي في"الكاشف":"ثقة".

وأبو عبْس: -بإسكان الموحَّدة-، وقيل: أبو عيسى -بالياء-، والأوَّل أصحُّ، وهو الأنصاري المدني، شهِد بدرًا، ومات سنة 34 هـ.




আবু আবস আবদুর রহমান ইবনু জাবর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি অবহেলা করে তিনবার জুমু'আর নামাজ পরিত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3117)


3117 - عن عقبة بن عامرٍ الجهني، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هلاك أمتي في الكتاب واللبن". قالوا: يا رسول الله! ما الكتاب واللبن؟ قال:"يتعلَّمون القرآن فيتأولونه على غير ما أنزله الله، ويُحبُّون اللبن فيدعون الجماعات والجُمَع ويبدون".

حسن: رواه أحمد (17415) وأبو يعلى (المقصد العلي- 369) كلاهما من طريق أبي عبد الرحمن (وهو عبد الله بن يزيد المقرئ)، عن ابن لهيعة - قال أحمد: عن أبي قبيل، وقال أبو يعلي: حدثني أبو قبيل (يحيي بن هانئ المعافري) قال: سمعت عقبة بن عامر. قال الإمام أحمد: قال ابن لهيعة: وحدثنيه يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر الجهني، فذكره.

وإسناده حسن، من أجل ابن لهيعة، وهو صدوق تغيَّر بعد احتراق كتبه، ولكن رواية العبادلة عنه قبل احتراق كتبه، ومنهم عبد الله بن يزيد المقرئ.




উকবাহ ইবনে আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের ধ্বংস বা বিনাশ কিতাব (কুরআন) এবং দুধের মধ্যে নিহিত।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কিতাব ও দুধ বলতে কী বোঝানো হয়েছে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা কুরআন শিক্ষা করবে, কিন্তু আল্লাহ যে উদ্দেশ্যে তা নাযিল করেছেন, তার বিপরীত ব্যাখ্যা করবে। আর তারা দুধকে এতো বেশি ভালোবাসবে যে (পশু পালনে ব্যস্ত হয়ে), তারা জামাআতের সালাত ও জুমআর সালাত ত্যাগ করবে এবং তারা (লোকালয় ছেড়ে মরুর দিকে) চলে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3118)


3118 - عن محمد بن عبد الرحمن، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قال: لا أعلمه إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"من سمع الأذان ثلاث جمعات ثم لم يحضر كُتب من المنافقين".

صحيح: رواه عبد الرزاق (5165) عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، فذكره. وإسناده صحيح.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, “যে ব্যক্তি পরপর তিন জুমুআর আযান শোনার পরও (সালাতে) উপস্থিত হয় না, তাকে মুনাফিকদের অন্তর্ভুক্ত বলে লিপিবদ্ধ করা হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3119)


3119 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر يوم الجمعة فقال:"فيها ساعة لا يوافقها عبدٌ مسلمٌ وهو قائمٌ يصلِّي، يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". وأشار رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده يُقلِّلها.

متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (15) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في الجمعة (935) عن عبد الله بن مسلمة، ومسلم في الجمعة (852) عن يحيي ابن يحيي كلاهما عن مالكٍ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিনের কথা আলোচনা করলেন, অতঃপর বললেন: "এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যখন কোনো মুসলিম বান্দা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দান করেন।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দিয়ে ইশারা করে বুঝালেন যে সময়টি খুব অল্প।









আল-জামি` আল-কামিল (3120)


3120 - عن أبي هريرة قال، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير يومٍ طلعت عليه الشمس يوم الجمعة، فيه خُلق آدم، وفيه أُدخل الجنة، وفيه أُخرج منها".

صحيح: رواه مسلم (854) عن حرملة، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب،
أخبرني عبد الرحمن الأعرج، أنَّه سمع أبا هريرة، فذكره.

ورواه من وجهٍ آخر عن الأعرج. وزاد فيه: ولا تقوم الساعة إلَّا يوم الجمعة".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সূর্য উদিত হয়েছে এমন দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুমু‘আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁকে জান্নাতে প্রবেশ করানো হয়েছিল এবং এই দিনেই তাঁকে তা থেকে বের করে দেওয়া হয়েছিল। আর কিয়ামত জুমু‘আর দিন ছাড়া হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3121)


3121 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما طلعت الشّمس ولا غربت على يوم خير من يوم الجمعة، هدانا الله له، وأضلَّ الناس عنه، والناس لنا فيه تبع، فهو لنا، واليهود يوم السبت، والنصارى يوم الأحد، إنَّ فيه ساعةً لا يُوافقها مؤمن يصلي يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه".

صحيح: رواه ابن خزيمة (1726) من طريق ابن أبي ذئب، عن المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে দিনের ওপর সূর্য উদিত হয় না বা অস্ত যায় না, সেই দিনের মধ্যে জুমু'আর দিনের চেয়ে উত্তম কোনো দিন নেই। আল্লাহ আমাদের সেদিনের সন্ধান দিয়েছেন এবং অন্য লোকদেরকে তা থেকে পথভ্রষ্ট করেছেন। আর সকল লোক তাতে আমাদের অনুসারী। এটি আমাদের জন্য। ইয়াহূদীদের জন্য শনিবার এবং নাসারাদের (খ্রিস্টানদের) জন্য রবিবার। নিশ্চয়ই তাতে একটি মুহূর্ত রয়েছে, যখন কোনো মুমিন ব্যক্তি সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3122)


3122 - عن أبي هريرةَ أنَّه قال: خرجتُ إلى الطور، فلقيت كعب الأحبار، فجلستُ معه، فحدَّثني عن التوراة، وحدَّثته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكان فيما حدَّثته أن قلتُ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير يومٍ طلعت عليه الشمس يومُ الجمعةِ، فيه خُلِق آدم، وفيه أُهبِطَ من الجنَّة، وفيه تيبَ عليه، وفيه مات، وفيه تقوم الساعةُ، وما من دابَّةٍ إلَّا وهي مُصيخةٌ يومَ الجمعةِ من حين تصبح حتَّى تطلع الشمس، شفقًا من الساعةِ، إلَّا الجنُّ والإنس. وفيه ساعةٌ لا يصادفها عبدٌ مسلمٌ وهو يُصلِّي يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه".

قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ؟ فقلت: بل في كلِّ جمعةٍ. فقرأ كعب التوراةَ فقال: صدق رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال أبو هريرةَ: فلقيت بَصرة بن أبي بَصرةَ الغِفاري، فقال: مِن أينَ أقبلتَ؟ فقلتُ: من الطور. فقال: لو أدركتك قبل أن تخرج إليه ما خرجتَ؛ سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تُعمل المطي إلَّا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، وإلى مسجد إيلياء، أو بيت المقدس". يشكُّ.

قال أبو هريرة: ثمَّ لقيتُ عبد الله بن سلام فحدَّثته بمجلسي مع كعبٍ الأحبار، وما حدَّثته به في يوم الجمعةِ، فقلت: قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ. قال: قال عبد الله بن سلام: كذب كعبٌ. فقلت: ثمَّ قرأ كعبٌ التوراة فقال: بل هي في كلِّ جمعةٍ. فقال عبد الله بن سلام: صدق كعبٌ. ثمَّ قال عبد الله بن سلام: قد علِمتُ أيَّةَ ساعةٍ هيَ. قال أبو هريرةَ: فقلت له: أخبرني بها ولا تضنَّ علىَّ. فقال عبد الله بن سلام: هي آخر ساعةٍ في يوم الجمعةِ. قال أبو هريرة: فقلت: وكيف تكون آخر ساعة في يوم الجمعة، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصادفها عبد مسلم وهو
يصلِّي". وتلك الساعة ساعة لا يُصلَّي فيها؟ فقال عبد الله بن سلام: أَلم يقل رسول الله صلى الله عليه وسلم: من جلس مجلسًا ينتظر الصلاةَ فهو في صلاةٍ حتَّى يُصلِّي"؟ قال أبو هريرة: فقلتُ: بلى. قال: فهو ذلك.

صحيح: رواه مالك في الجمعة (16) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرةَ، فذكر الحديثَ.

ورواه أبو داود (1046) عن القعنبي، والترمذي (491) عن إسحاق بن موسى الأنصاري، عن مَعن، كلاهما عن مالك.

ورواه النسائي (1430) عن قتيبة، ثنا بكر (يعني بن مضر) عن ابن الهاد.

وإسناده صحيحٌ على شرط الشيخين. وصحّحه ابن حبَّان (2772) والحاكم (1/ 178) فأخرجاه من طريق مالكٍ. وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1727) من وجهٍ آخر عن أبي هريرةَ.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين ولم يُخرجاه".

وقوله في الحديث:"ما من دابة إلَّا وهي مُصيخَةٌ يوم الجمعة". مصيخة: أي مستمعةٌ مصغِية تتوقَّعُ قيامَ الساعة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ‘তূর’ পর্বতের দিকে যাচ্ছিলাম, পথে কা'ব আল-আহবার-এর সাথে আমার সাক্ষাৎ হলো। আমি তাঁর সাথে বসলাম। তিনি আমাকে তাওরাত থেকে কিছু কথা শোনালেন, আর আমি তাঁকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা শুনালাম। আমি তাঁকে যা বলেছিলাম, তার মধ্যে এটাও ছিল যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“যে দিনের উপর সূর্য উদিত হয়, তার মধ্যে সর্বোত্তম দিন হলো জুমু‘আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁকে জান্নাত থেকে নামিয়ে আনা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁর তাওবা কবুল করা হয়েছিল, এই দিনেই তিনি ইন্তেকাল করেছেন এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। জুমু‘আর দিন প্রত্যুষ থেকে সূর্যোদয় পর্যন্ত জিন ও মানুষ ব্যতীত এমন কোনো প্রাণী নেই যা কিয়ামত সংঘটিত হওয়ার ভয়ে কান পেতে (শব্দ শুনতে) অপেক্ষা করে না। আর এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যে মুহূর্তে কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কিছু চাইলে আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।”

কা'ব বললেন: এটি কি প্রতি বছর একটি দিন? আমি বললাম: বরং এটি প্রতি জুমু‘আয়। তখন কা'ব তাওরাত পড়লেন এবং বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য বলেছেন।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমার সাক্ষাৎ হলো বাসরা ইবন আবী বাসরা আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কোথা থেকে আসছেন? আমি বললাম: ‘তূর’ পর্বত থেকে। তিনি বললেন: আপনি রওনা হওয়ার আগে যদি আমি আপনার সাথে দেখা করতে পারতাম, তাহলে আপনি সেখানে যেতেন না। আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:

“তিনটি মসজিদ ছাড়া (সাওয়াবের নিয়তে) কোনো বাহন পরিচালনা করা উচিত নয়: মাসজিদুল হারাম, আমার এই মাসজিদ (মাসজিদুন নববী) এবং মাসজিদ ইলীয়া (বা বায়তুল মাকদিস)।” (বর্ণনাকারী) সন্দেহ করেছেন।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং কা'ব আল-আহবার-এর সাথে আমার বৈঠক এবং জুমু‘আর দিনের ব্যাপারে তাঁকে যা বলেছিলাম, সে বিষয়ে জানালাম। আমি বললাম: কা'ব বলেছেন, এটা কি প্রতি বছর একটি দিন? তিনি (আব্দুল্লাহ ইবন সালাম) বললেন: কা'ব মিথ্যা বলেছে। আমি বললাম: এরপর কা'ব তাওরাত পড়লেন এবং বললেন: বরং এটা প্রতি জুমু‘আয়। তখন আব্দুল্লাহ ইবন সালাম বললেন: কা'ব সত্য বলেছে। এরপর আব্দুল্লাহ ইবন সালাম বললেন: আমি জানি, সেই মুহূর্তটি কোনটি। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: আমাকে বলুন, আমার কাছে গোপন করবেন না। আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটা হলো জুমু‘আর দিনের শেষ মুহূর্ত।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: জুমু‘আর শেষ মুহূর্ত কীভাবে হতে পারে? অথচ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় সেই মুহূর্ত পায় না (তবে তার দোয়া কবুল হয়)।” অথচ সেই সময়টি তো সালাত আদায়ের সময় নয়? আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেননি যে: “যে ব্যক্তি সালাতের অপেক্ষায় কোনো মজলিসে বসে থাকে, সালাত আদায় করা পর্যন্ত সে সালাতের মধ্যেই থাকে?” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই বলেছেন। তিনি বললেন: তাহলে এটাই সেই সময়।









আল-জামি` আল-কামিল (3123)


3123 - عن أبي هريرةَ، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تطلع الشمس بيومٍ ولا تغرب بأفضل من يوم الجمعة. وما من دابة إلَّا وهي تفزع ليوم الجمعة إلَّا هذان الثقلان من الجنِّ والإنس. وعلى كلِّ إنسان ملكان يكتبان الأوَّل فالأول: كرجل قدَّم بدنةً، وكرجلٍ قدَّم بقرةً، وكرجلٍ قدَّم شاةً، وكرجلٍ قدَّم طيرًا، وكرجلٍ قدَّم بيضةً، فإذا قعد الإمام طُوِيَت الصحف".

حسنٌ: رواه الإمام أحمد (9896) عن محمد بن جعفر، ثنا شعبة، قال: سمعت العلاء يُحدِّث عن أبيه، عن أبي هريرةَ.

وإسناده حسن من أجل العلاء بن عبد الرحمن؛ فإنه حسن الحديث.

وصحّحه ابن خزيمة (1757) وابن حبَّان (2770) فأخرجاه من هذا الوجه مقتصرين على المقطع الأول والثاني من الحديث فقط.

ورواه أيضًا ابن خزيمة (1770) وابن حبَّان (2774) من حديث العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، واقتصرا على المقطع الأخير منه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যেদিন সূর্য উদিত হয় এবং যেদিন অস্ত যায়, জুমু'আর দিনের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কোনো দিন নেই। জিন ও মানুষ—এই দু' প্রকারের ভারী সৃষ্টি ছাড়া প্রতিটি প্রাণীই জুমু'আর দিন নিয়ে ভীত থাকে। আর প্রত্যেক মানুষের ওপর দু'জন ফেরেশতা থাকে, যারা প্রথম আগমনকারীকে লিপিবদ্ধ করে। যেমন: একজন ব্যক্তি একটি উট আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি গরু আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি ছাগল আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি পাখি আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো এবং একজন ব্যক্তি একটি ডিম আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো। অতঃপর যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসার স্থানে বসেন, তখন (পুণ্যের) দফতরসমূহ গুটিয়ে ফেলা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3124)


3124 - عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري، قال: قال لي عبد الله بن عمر: سمعتَ أباك يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في شأن ساعةِ الجمعة؟ قال: قلت: نعم، سمعته يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"هي ما بين أن يجلس الإمام إلى أن تُقضى الصلاةُ".
صحيحٌ: رواه مسلم في الجمعة (853) من طريق ابن وهب، عن مخرمة بن بكير، عن أبيه، عن أبي بردة، فذكره.

وفي الباب ما رُوِي عن سعد بن عُبادة أنَّ رجلًا من الأنصار أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: أخبرنا عن يوم الجمعةِ ماذا فيه من الخير؟ قال:"فيه خمس خِلالٍ: فيه خُلق آدم، وفيه أُهبِط آدم، وفيه توفَّي الله آدم، وفيه ساعةٌ لا يسأل اللهَ عبدٌ فيها شيئًا إلَّا آتاه، ما لم يسأل مأثمًا أو قطيعة رحم، وفيه تقوم الساعة ما من ملكٍ مقرَّبٍ، ولا سماءٍ ولا أرضٍ، ولا جبالٍ، ولا حجرٍ، إلَّا وهو يُشفق من يومِ الجمعةِ".

أخرجه الإمام أحمد (22457) والبزار (3738) من طريق عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن عمرو بن شرحبيل بن سعيد بن سعد بن عبادة، عن أبيه، عن جدِّه، عن سعد بن عُبادة فذكره.

وعمرو بن شرحبيل وأبوه لم يوثِّقهما غير ابن حبَّان؛ فهما مقبولان حيث يتابعان، ولم يُتابعا في هذا الحديث.

أمَّا البزَّار فقال:"وهذا الكلام لا نعلمه يُروي عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم إلَّا من هذا الوجه، وإسناده صالحٌ". وقال الحافظ:"هذا حديثٌ حسنٌ إن كان شرحبيل سمع من جدِّه سعد بن عُبادةَ".

وفي الإسناد علة أخرى: وهي أنَّ عبد الله بن محمد بن عقيل قد خالف في هذا الإسناد؛ لأنَّه رواه كما عند ابن ماجة (1084) والإمام أحمد (15548)، عن عبد الرحمن بن يزيد الأنصاري، عن أبي لبابة بن عبد المنذر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ يوم الجمعة سيِّد الأيام، وأعظمها عند الله، وهو أعظم عند الله من يوم الأضحى، ويوم الفطر، فيه خمس خلالٍ: خلق الله فيه أدم، وأهبط الله فيه آدم إلى الأرض، وفيه توفي الله أدم، وفيه ساعةٌ لا يسأل الله فيها العبد شيئًا إلَّا أعطاه، ما لم يسأل حرامًا، وفيه تقوم الساعة، ما من ملكٍ مقرَّب، ولا سماءٍ ولا أرض، ولا رياح ولا جبال، ولا بحرٍ، إلَّا وهنَّ يُشفقنَ من يوم الجمعة".

فخالف في الإسناد والمتن، ولعلَّ الحافظ ابن حجر يشير إلى هذا بقوله:"سيء الحفظ يصلح حديثه للمتابعات، وأمَّا إذا انفرد؛ فيُحسَّن، وأمَّا إذا خالف؛ فلا يُقبل"."التلخيص" (2/ 108).

وكذلك ما رُوي عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف أنَّه قال: كان أبو هريرة يحدِّثنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه قال:"إنَّ في الجمعة ساعة لا يوافقها مسلمٌ وهو في صلاةٍ يسأل الله خيرًا إلَّا آتاه إياه". قال أبو هريرةَ: وقلَّلَها أبو هريرةَ بيده. قال: فلمَّا توفي أبو هريرة قلت: والله! لو جئتُ أبا سعيد فسألته عن هذه الساعة، أن يكون عنده منها علمٌ، فأتيته، فأجده يقوِّم عراجين، فقلت: يا أبا سعيد، ما هذه العراجين التي أراك تقوِّم؟ قال: هذه عراجين جعل الله لنا فيها بركةً، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُحبُّها ويختصر بها، فكنَّا نُقوِّمُها ونأتيه بها، فرأى بصاقًا في قبلةِ المسجد وفي يده عُرجونٌ من تلك العراجين، فحكَّه وقال:"إذا كان أحدكم في صلاته فلا يبصق أمامه؛ فإنَّ ربَّه أمامه، وليبصق عن يساره، أو تحت قدمه، فإن لم" قال سريج:"فإن لم يجد مَبصقًا ففي ثوبه أو نعله". قال: ثمَّ
هاجت السماء من تلك الليلة، فلمَّا خرج النبي صلى الله عليه وسلم لصلاة العشاء الآخرة برقت برقةٌ، فرأى قتادة بن النعمان، فقال:"ما السُّرى يا قتادهُ؟". قال: علمتُ يا رسولَ الله! أنَّ شاهد الصلاة قليلٌ، فأحببتُ أن أشهدها. قال:"فإذا صلَّيت فاثبت حتَّى أمرَّ بكَ. فلمَّا انصرف أعطاه العرجون، وقال:"خذ هذا فسيُضيءُ لك أمامك عشرًا، وخلفك عشرًا، فإذا دخلتَ البيتَ وتراءيتَ سوادًا في زاوية البيتِ، فاضربه قبل أن يتكلَّم؛ فإنَّه شيطان". قال: ففعل، فنحن نُحبُّ هذه العراجين لذلك. قال: قلتُ يا أبا سعيدٍ! إنَّ أبا هريرةَ حدَّثنا عن الساعة التي في الجمعةِ، فهل عندك منها علمٌ؟ فقال: سألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عنها، فقال:"إنِّي كنتُ قد أُعلِمتُها، ثمَّ أُنسيتُها كما أنسيتُ ليلةَ القدرِ". قالتُ: ثم خرجت من عندِه فدخلتُ على عبد الله بن سلام.

أخرجه أحمد (11624) عن يونس وسُريج، قالا: ثنا فُلَيح، عن سعيد بن الحارث، عن أبي سلمةَ، فذكره.

وأخرجه أيضًا البزَّار (620 - كشف الأستار) من وجه آخر عن فُلَيح به. وزاد فيه بعد قوله:"ثمَّ خرجتُ مِن عنده":"حتَّى أتيت دار رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم"، قال: قلت: هذا رجل قد قرأ التوراة، وصَحِب النبيَّ صلى الله عليه وسلم، قال: فدخل عليه فقلت: أخبرني عن هذه الساعة التي كان النبي صلى الله عليه وسلم يقول فيها ما يقول في الجمعة؟ قال: نعم! خلق الله آدم يوم الجمعة، وأسكنه الجنة يوم الجمعة، وأهبطه إلى الأرض يوم الجمعة، وتوفاه يوم الجمعة، وهو اليوم الذي تقوم فيه الساعة، وهي آخر ساعة من يوم الجمعة. قال: قلت: ألست تعلم أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم يقول: في صلاةٍ؟ قال: ولَستَ تعلم أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"من انتظر صلاة فهو في صلاةٍ".

ففي إسناده فليح بن سليمان، أخرج له الجماعة، لكن تُكُلّم فيه من قبل حفظه؛ فضَّعفه ابن معين، وأبو حاتم، وأبو داود، والنسائي، وأبو زرعة الرازي، ووثَّقه الدارقطني في رواية، وقال في أُخرى:"يختلفون فيه وليس به بأسٌ".

وقال ابن عدي:"ولفُلَيح أحاديث صالحة، ويروي عن سائر الشيوخ من أهل المدينة أحاديث مستقيمة، وغرائب، وقد اعتمده البخاري في صحيحه، وروى عنه الكثير، وهو عندي لا بأس به".

قلت: وقد انفرد فُلَيح برواية هذا الحديث بهذا السياق، وقد جمع فيه عدَّةَ أحاديثَ لبعضها طرق صحيحة وحسنة، وانفرد في هذا السياق بعض الألفاظ، منها: فهذه العراجين جعل الله لنا فيها بركة، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحبها ويتخصَّر بها". ومنها:"إنِّي كنتُ أُعِلمتها ثمَّ أُنسيتُها". وقد صحَّح هذه اللفظة ابن خزيمة (1741) والحاكم (1/ 279، 280) من طريق يونس بن محمد، عن فليح به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

قلت: والإسناد كيفما دار فهو يدور على فُلَيح، وقد سبق ذكر أقوال العلماء فيه.

وكذلك ما رُوي عن أبي سلمة قال: سمعت أبا هريرةَ وأبا سعيد يذكران عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه
قال:"إنَّ في الجمعة ساعةً لا يوافقها عبد وهو يصلِّي يسأل الله فيها شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". قال: وعبد الله بن سلام يذكر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: نعم، هي آخر ساعة. قلت: إنَّما قال: وهو يصلِّي، وليس تلك ساعة صلاةٍ فقال: أو ما سمعت أو ما بلغك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من انتظر الصلاة فهو في صلاةٍ".

فجعل ذكر آخر ساعةٍ من المرفوع عن النبي صلى الله عليه وسلم.

رواه البزار (619 - كشف الأستار) عن الحسن بن الصباح، عن عبد الله بن جعفر، ثنا عبد الله بن عمرو، عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة به.

فالظاهر أنَّ هذا وهمٌ من بعض رواته، فإنَّ رواته بين ثقة وصدوق، لكن وصف شيخ البزار، وعبد الله بن جعفر، وكذا عبيدالله بن عمرو، وُصِف كلٌّ منهم بشيءٍ من الوهم، وإنَّما صحَّ هذا من قول عبد الله بن سلام كما سبق.

قال الهيثمي:"حديث أبي هريرة في الصحيح، وحديث ابن سلام لم أره مرفوعًا عند أحد منهم".

قلت: والذي يظهر أن عبد الله بن سلام كان يروي على وجهين، فمرة يرويه مرفوعًا، وأخرى موقوفًا، كما يدل عليه الحديث الذي بعد حديث جابر.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ বুরদাহ ইবনু আবূ মূসা আল-আশআরী বলেন, আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি আপনার পিতাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে জুমুআর মুহূর্ত (সاعة) সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনেছেন? আমি বললাম: হ্যাঁ, আমি তাকে বলতে শুনেছি, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ঐ মুহূর্তটি হলো ইমাম (মিম্বারে) বসার পর থেকে সালাত শেষ হওয়া পর্যন্ত।"

অন্য এক বর্ণনায় সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করলেন: জুমুআর দিনে কী কী ভালো বিষয় রয়েছে সে সম্পর্কে আমাদের অবহিত করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এতে পাঁচটি বৈশিষ্ট্য রয়েছে: এতে আদমকে সৃষ্টি করা হয়, এতে আদমকে (জান্নাত থেকে) অবতরণ করানো হয়, এতে আল্লাহ আদমকে মৃত্যু দেন, এতে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে যখন কোনো বান্দা আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চাইলে আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দেন, যদি না সে কোনো পাপ অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার বিষয়ে প্রার্থনা করে, এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। কোনো নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতা, আকাশ, পৃথিবী, পর্বতমালা বা পাথর এমন নেই যা জুমুআর দিন সম্পর্কে শঙ্কিত নয়।"

আরেকটি বর্ণনায় আবূ লুবাবাহ ইবনু আব্দুল মুনযির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জুমুআর দিন দিবসসমূহের সর্দার, আর এটি আল্লাহর কাছে সর্বাধিক মর্যাদাপূর্ণ। এটি আল্লাহর কাছে ঈদুল আযহা ও ঈদুল ফিতরের দিনের চেয়েও শ্রেষ্ঠ। এতে পাঁচটি বৈশিষ্ট্য রয়েছে: আল্লাহ এতে আদমকে সৃষ্টি করেছেন, আল্লাহ এতে আদমকে পৃথিবীতে অবতরণ করিয়েছেন, এতে আল্লাহ আদমকে মৃত্যু দিয়েছেন, এতে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে যখন কোনো বানু আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চাইলে আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দেন, যদি না সে কোনো হারাম বিষয়ে প্রার্থনা করে, এবং এতেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। কোনো নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতা, আকাশ, পৃথিবী, বাতাস, পর্বতমালা বা সাগর এমন নেই যা জুমুআর দিন সম্পর্কে শঙ্কিত নয়।"

আবু সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন যে, তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই জুমুআর দিনে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে, যদি কোনো মুসলিম ঐ সময় সালাতে থাকা অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কল্যাণ কামনা করে, তবে আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার হাত দিয়ে ইঙ্গিত করে সে সময়টিকে কম বলে দেখাতেন।

(বর্ণনায় আরও এসেছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার) মসজিদের ক্বিবলার দিকে থুথু দেখতে পেলেন। তখন তাঁর হাতে খেজুরের ডাল ছিল। তিনি তা দিয়ে থুথুটি মুছে ফেললেন এবং বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাতে থাকে, তখন সে যেন সামনে থুথু না ফেলে; কেননা তার প্রতিপালক তার সামনে থাকেন। সে যেন তার বাম দিকে অথবা তার পায়ের নিচে থুথু ফেলে।" সুরাইজ বলেন: "যদি থুথু ফেলার জায়গা না পায়, তবে তার কাপড়ে অথবা জুতার মধ্যে (ফেলবে)।"

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, আবূ সালামাহ বললেন): আমি আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই মুহূর্তটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমাকে তা জানানো হয়েছিল, কিন্তু পরে কদরের রাতের মতো আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে।"

(পরে আবূ সালামাহ) আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, (সেই মুহূর্তটি হলো) জুমুআর দিনের শেষ মুহূর্ত। আমি বললাম: আপনি কি জানেন না যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সে সালাতে থাকা অবস্থায় (এই মুহূর্ত পায়)? কিন্তু সেই মুহূর্ত তো সালাতের সময় নয়। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন না যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের জন্য অপেক্ষা করে, সে সালাতেই থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3125)


3125 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوا الساعة التي ترجى في يوم الجمعة بعد العصر إلى غيبوبة الشمس".

حسن: رواه الترمذي (489) عن عبد الله بن الصباح الهاشمي البصري، قال: حدثنا عبيد الله ابن عبد المجيد الحنفي، قال: حدّثنا محمد بن أبي حميد، قال: حدّثنا موسي بن وردان، عن أنس، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وقد روي هذا الحديث عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، ومحمد بن أبي حميد يضعف، ضعفه بعض أهل العلم من قبل حفظه، ويقال له: حماد بن أبي حميد، ويقال: هو أبو إبراهيم الأنصاري، وهو منكر الحديث". انتهى.

قلت: محمد بن أبي حميد ضعيف باتفاق أهل العلم، ولكن قال ابن عدي: وهو مع ضعفه يكتب حديثه أي: للاعتبار. فقد وجدت له متابعا وهو ابن لهيعة، عن موسي بن وردان. أخرجه الطبراني في الأوسط (136) من طريقه. وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكنه لم يتهم، ولذا يقبل في المتابعة، وبهذا صار الحديث حسنا.

وأما موسي بن وردان فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف في الإسناد، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা জুমুআর দিনে সেই সময়টিকে তালাশ করো, যখন দোয়া কবুল হওয়ার আশা করা হয়—যা আসরের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3126)


3126 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يوم الجمعة اثنتا عشرة -يريد: ساعة-، لا يوجد مسلمٌ يسأل الله عز وجل شيئًا إلَّا آتاه الله عز وجل، فالتمسوها
آخر ساعةٍ بعد العصرِ".

حسن: رواه أبو داود (1048) والنسائي (1389) كلاهما من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن الجلاح -مولي عبد العزيز-، أنَّ أبا سلمة حدَّثه، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الجلاح؛ فهو صدوق.

وصحّحه الحاكم (1/ 279) على شرط مسلم، وقال:"فقد احتجَّ بالجلاح بن كثير، ولم يخرجاه".

وروي بمعناه عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن في الجمعة ساعة لا يوافقها عبد مسلم يسأل الله عز وجل فيها خيرًا إلا أعطاه إياه، وهي بعد العصر".

رواه أحمد (7677) عن عبد الرزاق -وهو في المصنف (5584) -، أخبرنا ابن جريج، حدثني العباس حديثا، عن محمد بن مسلمة الأنصاري، عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة، فذكراه.

والحديث أيضًا أخرجه العقيلي (4/ 140) من طريق عبد الرزاق، وقال: حدثني آدم بن موسي، قال: سمعت البخاري قال: محمد بن مسلمة الأنصاري، عن أبي سعيد وأبي هريرة في ساعة الجمعة لا يتابع عليه.

وقال العقيلي:"والرواية في فضل الساعة التي في يوم الجمعة ثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، وأما التوقيت فالرواية فيها أيه، كذا -أظنه"لينة"- كما سيأتي. ثم قال: والعباس رجل مجهول لا يعرف، ومحمد بن مسلمة أيضًا مجهول. وأمَّا العصر فالرواية فيه لينة" انتهي.

كذا قال، مع أن التوقيت بالعصر فالرواية فيه أيضًا ثابتة، كما أن التوقيت ما بين أن يجلس الإمام إلى أن تقضى الصلاة ثابتة، وقد نقل الزهري في الموضع المشار إليه سابقًا عن بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم أن الساعة التي ترجى بعد العصر إلى أن تغرب الشمس، وبه يقول أحمد وإسحاق. وقال أحمد:"أكثر الأحاديث في الساعة التي تُرجى فيها إجابة الدعوة أنَّها بعد صلاة العصر، وترجي بعد زوال الشمس". انتهي.

ورُوي عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال:"الساعة التي تُذكر يوم الجمعة ما بين صلاة العصر إلى غروب الشمس". وكان سعيد بن جبير إذا صلى العصر لم يكلِّم أحدًا حتَّى تغرب الشمس، قال الحافظ ابن القيم:"وهذا قول أكثر السلف، وعليه أكثر الأحاديث"."زاد المعاد" (1/ 394).




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জুমু'আর দিনে বারোটি মুহূর্ত (অর্থাৎ ঘণ্টা) রয়েছে। এমন কোনো মুসলিম পাওয়া যায় না যে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে কিছু চাইবে, আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে তা দান করবেন না। সুতরাং তোমরা তা আসরের পরের শেষ মুহূর্তে অনুসন্ধান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3127)


3127 - عن عبد الله بن سلام، قال: قلت ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ: إنَّا لنجد في كتاب الله في يوم الجمعة ساعة لا يوافقها عبدٌ مؤمن يصلِّي يسأل الله فيها شيئًا إلَّا قضي له حاجته.

قال عبد الله: فأشار إلىَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أو بعض ساعة". فقلت: صدقت، أو بعض ساعة. قلتُ: أي ساعة هي؟ قال:"هي آخر ساعات النهار". قلت: إنَّها ليست ساعة صلاة. قال:"بلى. إنَّ العبد المؤمن إذا صلَّى ثمَّ جلس، لا يحبسه إلَّا
الصلاة فهو في الصلاة".

حسن: رواه ابن ماجة (1139) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقي، ثنا ابن أبي فُديك، عن الضحاك بن عثمان، عن أبي النضر، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن سلام، فذكره.

وإسناده حسن؛ من أجل الضحاك بن عثمان لأنه صدوق، وبقية رجاله ثقات. قال البوصيري: هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات على شرط الصحيح".

ورواه أحمد (23781) عن عبد الله بن الحارث، عن الضحاك به مثله. وفيه: قال أبو النضر: قال أبو سلمة: سألته: أية ساعة هي؟ قال: (أي عبد الله بن سلام) آخر ساعات النَّهار. فقلت: إنها ليست بساعة صلاة. فقال: بلى إنَّ العبد المسلم في صلاة إذا صلَّى ثم قعد في مصلاه لا يحبسه إلَّا انتظار الصلاة". انتهي.

وفي الباب ما رُوي عن أنس بن مالكٍ، قال: عُرضت الجمعة على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجاء جبريل في كفِّه كالمرآة البيضاء، في وسطها كالنُكْتة السوداء، فقال:"ما هذه يا جبريل؟". قال:"هذه الجمعة، يَعرِضها عليك ربُّك لتكون لك عيدًا، ولِقومِك من بعدك، ولكم فيها خيرٌ، تكون أنت الأوَّل، ويكون اليهود والنصارى من بعدك، وبها ساعةٌ لا يدعو أحَدٌ ربَّه بخيرٍ هو له قَسْمٌ إلَّا أعطاه، أو يتعوَّذ مِن شرٍّ إلَّا دفع عنه ما هو أعظم منه، ونحن ندعوه في الآخرة يوم المزيدِ، وذلك أنَّ ربَّك اتَّخذ في الجنَّة واديًا أَفْيَحَ مِن مسكٍ أبيض، فإذا كان يوم الجمعة نزل من عِلِّيين فجلس على كرسيِّه، وحفَّ الكرسيَّ بمنابر من ذهبٍ، مكلَّلة بالجواهر، وجاء الصدِّيقون والشهداء وجلسوا عليها، وجاء أهل الغُرف من غرفهم حتَّى يجلسوا على الكثيبِ، وهو كثيب أبيض من مسك أذْفَر، ثمَّ يتجلَّى لهم فيقول: أنا الذي صدقتكم وعدي، وأتممت عليكم نعمتي، وهذا محلُّ كرامتي، فسلوني، فيسألونه الرضا، فيقول: رضاي أَحلَّكم داري، وأنالكم كرامتي، فسلوني، فيسألونه الرضا، ثَّم يفتح لهم ما لم تَره عينٌ، ولم يخطر على قلب بشرٍ، إلى مقدار مُنصرَفهم من الجمعة، وهي زبرجدة خضراء، أو ياقوتة حمراء، متدلِّية فيها ثمارُها وخدمها، فليس هم في الجنة بأشوق منهم إلى يوم الجمعة، ليزدادوا نظرًا إلى ربَّهم عز وجل وكرامته، وكذلك وهي يوم المزيدِ".

رواه الطبراني في"الأوسط" (2150): عن أحمد بن زُهَير، قال: ثنا محمد بن عثمان بن كَرامة، ثنا خالد بن مَخلَد القطواني، ثنا عبد السلام بن حفص، عن أبي عِمران الجَوني، عن أنسٍ، فذكر الحديثَ.

قال الطبراني:"لم يروه عن أبي عِمران إلَّا عبد السلام، تفرَّدَ به خالد".

قلتُ: وهو كما قال، وخالد هذا هو ابن مخلد القطواني، وهو وإن كان من رجال الشيخين إلَّا أنَّه وُصِف بأنَّ له أحاديث مناكير، وكان متشيعًا، وفي متنه غرابة.

ورواه أبو يعلي (4228) عن شيبان بن فروخ، ثنا الصعق بن حزن، ثنا علي بن الحكم البناني،
عن أنس فذكر نحوه.

قال الحافظ عن هذا الإسناد بعد أن ساق للحديث أسانيد الأخرى:"هذا أجود من الأول".

وأورده الذّهبي في"العلو" (1/ 351 - 365) من عدّة طرق لا يسلم منها شيء، ثم قال:"هذه طرق يعضِّد بعضها بعضًا، رزقنا الله وإياكم لذَّة النظر إلى وجهه الكريم".

وأورده الحافظ ابن القيم في"الزاد" (1/ 367 - 371) من أوجهٍ أُخرى كثيرةٍ أيضًا، ولا يصح منها شيءٌ، وذكر له شاهدًا من حديث حذيفة، وفيه عبد الله بن عرادة الشيباني، قال فيه البخاري:"منكر الحديث". وضعَّفه غير واحد من أهل العلم.

وأمَّا ما رواه الإمام أحمد (8102): عن هاشم، ثنا الفرج بن فضالة، ثنا علي بن أبي طلحة، عن أبي هريرة قال: قيل للنبي صلى الله عليه وسلم: لأيِّ شيءٍ سمِّي يوم الجمعة؟ قال:"لأنَّ فيها طُبعت طينة أبيك آدم، وفيها الصعقة، والبعثة، وفيها البطشة، وفي آخر ثلاث ساعات منها ساعة من دعا الله عز وجل فيها استُجيب له". فهو ضعيف، لضعف الفرج بن فضالة، وعلي بن ابي طلحة لم يُدرك أبا هريرةَ، فهو مع ضعفه منقطعٌ.

وفي الباب أحاديث أخرى، منها: عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ في الجمعة الساعة لا يوافقها مسلم يسأل الله فيها خيرًا إلَّا أعطاه إياه".

رواه البزَّار (666) عن عبد ربِّه بن خالدٍ، ثنا فُضَيل بن سليمان، عن عبد الله بن محمد بن عمر ابن علي، عن أبيه، عن جده عن علي بن أبي طالبٍ، فذكره. وشيخ البار فيه لم يُوثّقه أحدٌ، وذكره ابن حبَّان في"الثقات"، وقد روى عنه جمعٌ منهم البزار وابن ماجة.

وأمّا ما رُوي"أفضل الأيام يوم عرفة وافق يوم الجمعة، وهو أفضل من سبعين حجّة في غير يوم جمعة" فهو لا أصل له، أورده ابن الأثير في"جامع الأصول" (6867). -تحقيق أيمن صالح- وعزاه إلى رزين.

ورزين هو ابن معاوية بن عمار الأندلسيّ السرقسطيّ المتوفى سنة خمس وثلاثين وخمس مائة بمكة، وصفه الذهبي في"سير أعلام النبلاء" (20/ 204) بأنه الإمام المحدِّث الشهير صاحب كتاب"تجريد الصحاح" وكان إمام المالكين بالحرم.

وقال ابن الأثير في"مقدمة جامع الأصول" (1/ 48 - 50): جمع بين كتب البخاري، ومسلم، والموطأ لمالك، وجامع الترمذي، وسنن أبي داود، وسنن أبي عبد الرحمن النسائي رحمة الله عليهم".

وهو الذي بني عليه الحافظ ابن الأثير كتابه"جامع الأصول" ولكن كما يقول الحافظ الذهبي:"أدخل في كتابه زيادات واهية، لو تنزه عنها لأجاد".

وهذا الحديث من هذا القبيل.

وقد حاول أئمة الحديث الوقوف على إسناد هذا الحديث فلم يقفوا عليه.
قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 65) بعد أن بيّن مزية وقفة يوم الجمعة من عشرة وجوه بقوله:"وأما ما استفاض على ألسنة العوام بأنها تعدل اثنتين وسبعين حجة فباطل لا أصل له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا عن أحد من الصحابة والتابعين".

وقال الحافظ في"الفتح" (8/ 371) بعد أن عزاه لرزين في رفعه:"لا أعرف حاله؛ لأنه لم يذكر صحابيه، ولا من خرّجه".

وقال الحافظ ابن ناصر الدين الدمشقي في جزء"فضل يوم عرفة":"حديث وقفة الجمعة يوم عرفة أنها تعدل اثنتين وسبعين حجة حديث باطل لا يصح، وكذلك لا يثبت ما رُوي عن زر بن حبيش أنه أفضل من سبعين حجّة في غير يوم جمعة" نقلًا من الشيخ الألباني رحمه الله تعالى في"السلسلة الضعيفة" (31




আবদুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম—আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উপবিষ্ট ছিলেন—আমরা আল্লাহর কিতাবে দেখতে পাই যে, জুমু'আর দিনে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে, যখন কোনো মুমিন বান্দা সালাত আদায় করা অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, তখন আল্লাহ তার প্রয়োজন অবশ্যই পূরণ করে দেন।

আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে ইশারা করে বললেন: "অথবা মুহূর্তের কিছু অংশ।" তখন আমি বললাম: আপনি সত্য বলেছেন, অথবা মুহূর্তের কিছু অংশ।

আমি বললাম: সেটি কোন মুহূর্ত? তিনি বললেন: "দিনের শেষ মুহূর্তগুলো।"

আমি বললাম: সেটি তো সালাতের সময় নয়।

তিনি বললেন: "অবশ্যই। কোনো মুমিন বান্দা যখন সালাত আদায় করে এবং [এরপর] বসে থাকে, আর সালাত ছাড়া অন্য কিছু তাকে আটকে না রাখে, তবে সে সালাতেই থাকে।"