হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3101)


3101 - عن أم عطية قالت: كنا نؤمر أن نُخرج يوم العيد، حتى نُخرج البكرَ من خِدرها، حتى نُخرج الحُيَّضَ فيكنَّ خلف الناس، فيكبِّرن بتكبيرهم، ويدعون بدعائهم، ويرجونَ بركةَ ذلك اليوم وطُهْرَتَه.

متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (971)، ومسلم في العيدين (890/ 11) كلاهما من طريق عاصم الأحول، عن حفصة بنت سيرين، عن أمّ عطية فذكرته واللفظ للبخاري.

ولفظ مسلم: الحُيَّض يخرجنَ فيكنَّ خلف الناس، يكبِّرن مع الناس.




উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদেরকে নির্দেশ দেওয়া হতো যে, আমরা যেন ঈদের দিন (ঘরের বাইরে) বের হই। এমনকি কুমারী মেয়েদেরকেও তাদের ঘরের পর্দা থেকে বের করে আনি এবং ঋতুমতী মহিলাদেরকেও বের করে আনি, যাতে তারা মানুষের পেছনে থাকে, এবং তাদের তাকবীরের সাথে তাকবীর বলে ও তাদের দোয়ার সাথে দোয়া করে। আর তারা যেন সেই দিনের বরকত ও পবিত্রতা প্রত্যাশা করে।









আল-জামি` আল-কামিল (3102)


3102 - عن محمد بن أبي بكر الثقفي قال: سألت أنسًا - ونحن غاديان من منى إلى
عرفات- عن التلبية: كيف كنتُم تصنعون مع النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: كان يُلبَي المُلبِّي لا ينكر عليه، ويُكبِّر المُكبِّر فلا يُنكر عليه.

متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (970)، ومسلم في الحج (1285) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن محمد بن أبي بكر الثقفي، فذكره، واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনু আবী বকর আস-সাকাফী বলেন: আমি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম—যখন আমরা মিনা থেকে আরাফাতের দিকে ভোরে যাচ্ছিলাম—তালবিয়াহ সম্পর্কে: আপনারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কীরূপ করতেন? তিনি বললেন: যে ব্যক্তি তালবিয়াহ পাঠ করত, সে তা পাঠ করত, তাকে নিষেধ করা হতো না; আর যে ব্যক্তি তাকবীর পাঠ করত, সে তা পাঠ করত, তাকেও নিষেধ করা হতো না।









আল-জামি` আল-কামিল (3103)


3103 - عن ابن عمر قال: غدونا مع رسول الله من منى إلى عرفات. فمِنَّا المُلَبِّي، ومِنَّا المكبِّر.

وفي رواية: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غداة عرفة، فمِنَّا المكبِّر، ومِنا المُهلِّل، فأما نحن فنكبِّر.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1284) من طرق عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনা থেকে আরাফাতের দিকে রওনা হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তালবিয়া পাঠ করছিল এবং কেউ তাকবীর পাঠ করছিল।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা আরাফাতের সকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তাকবীর পাঠ করছিল এবং কেউ তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) পাঠ করছিল। আর আমরা (বর্ণনাকারীগণ) তখন তাকবীর পাঠ করছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3104)


3104 - عن نُبيشة الهذلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيام التشريق أيام أكل وشرب".

وزاد في رواية:"وذكرٍ للهِ".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1141) من حديث هُشَيم، أخبرنا خالد الحذاء، عن أبي المليح، عن نُبيشة فذكره.

ورواه إسماعيل ابن عُليَّة، عن خالد الرواية الثانية بزيادة"وذكرٍ للهِ".

وفي الحديث استحباب الإكثار من الذكر في هذه الأيام من التكبير وغيره.

و"نُبيشة" بضم النون وفتح الباء وبالشين المعجمة وهو: نُبيشة بن عمرو بن عوف بن سلمة الهُذَلي.

وفي الباب عن علي وعمَّار قالا: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجهر في المكتوبات"ببِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ" وكان يقنت في صلاة الفجر، وكان يُكبِّر من يوم عرفة صلاة الغداة، ويقطعها صلاة العصر آخر أيام التشريق.

رواه الحاكم (1/ 299) من طريق سعيد بن عثمان الخراز، ثنا عبد الرحمن بن سعيد المؤذن، ثنا فطر بن خليفة، عن أبي الطفيل، عن علي وعمار فذكرا الحديث.

قال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد، ولا أعلم في رواته منسوبًا إلى الجرح".

وتعقبه الذهبي فقال:"بل خبرٌ واهٍ، كأنَّه موضوع؛ لأنَّ عبد الرحمن صاحب مناكير، وسعيد إن كان الكريزي فهو ضعيف، وإلا فهو مجهول".

وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد الله قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكبِّر في صلاة الفجر يوم عرفة إلى صلاة العصر من آخر أيَّام التشريق، حين يُسلِّم من المكتوبات.

رواه الدارقطني (2/ 49) من طريق عمرو بن شِمْرٍ، عن جابر، عن أبي جعفر عن علي بن حسين، عن جابر بن عبد الله فذكره.
قال عبد الحق:"في إسناده جابر بن يزيد الجُعفي، وقد اختُلِف عنه".

وتعقَّبه ابن القطَّان قائلًا:"لا يتعيّن للحمل عليه فيه جابر الجعفي، بل لعلّ الجناية من غيره ممن هو أضعف منه، لا يصل إليه إلَّا به ..".

ثم ساق الحديث من طريق الدارقطني ثم قال: وهو كما ترى لا يصل إلى جابر الجعفي إلَّا برواية عمرو بن شِمْر الجعفي أيضًا، وهو أحد الهالكين …".

ونقل تضعيفه عن عدد من الأئمة ثم قال:"فعلي هذا لا ينبغي تعصيب الجناية في هذا الحديث برأس جابر الجعفي؛ فإن عمرو بن شِمْر ما في المسلمين من يقبل حديثه"، بيان الوهم والايهام (3/ 102 - 104).

قلت: ولماذا لا تكون الآفة، من الشّيخ وتلميذه وإن كان التلميذ أضعف من الشيخ.

وأما آثار الصّحابة فهي كثيرة ومتنوعة، وإليكم بعض هذه الآثار.

كان ابن عمر وأبو هريرة يخرجان إلى السوق في أيام العشر يكبِّران، ويُكَبِّر الناس بتكبيرهما، ذكره البخاري (2/ 457) معلقًا بصيغة الجزم، قال الحافظ: لم أره موصولًا عنهما.

وكان ابن عمر يُكبّر في قبَّتِه بمنى، فيسمعه أهل المسجد فيكبّرون، ويكبِّر أهل الأسواق، حتى ترتج مِنىّ تكبيرًا.

وكان ابن عمر يُكبِّر بمنى تلك الأيام، خلف الصلاة، وعلى فراشه، وفي فُسطاطه، ومجلسه، وممشاه تلك الأيام جميعًا.

وكانت ميمونة تُكبر يوم النحر، وكنَّ النساء يكبِّرنَ خلف أبان بن عثمان وعمر بن عبد العزيز ليالي التشريق مع الرجال في المسجد.

هذه الآثار كلّها ذكرها البخاريّ معلّقًا بصيغة الجزم.

وروى البيهقي (3/ 279) أن ابن عمر كان يرفع صوته بالتكبير حتى يأتي المصلَّي، ويُكبِّر حتى يأتي الإمامُ.

قال البيهقي:"هذا هو الصحيح موقوف، وقد رُوي من وجهين ضعيفين مرفوعًا" ثم قال:"أما أمثلهما فهو ما رواه … ابن خزيمة، ثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب، ثنا عمي، ثنا عبد الله بن عمر، عن نافع، عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخرج في العيدين مع الفضل بن عباس وعبد الله والعباس وعلي وجعفر والحسن والحسين وأسامة بن زيد وزيد بن حارثة وأيمن ابن أم أيمن رضي الله عنهم رافعًا صوته بالتهليل والتكبير، فيأخذ طريق الحذّائين حتى يأتي المصلى، وإذا فرغ رجع على الحذّائين حتى يأتي منزله".

وأما أضعفهما فهو ما رواه عن الحاكم (1/ 297، 298) من طريق موسي بن محمد بن عطاء، ثنا الوليد بن محمد، ثنا الزهري، أخبرني سالم بن عبد الله أن عبد الله بن عمر أخبره أن رسول الله
- صلى الله عليه وسلم كان يُكبّر يوم الفطر من حين يخرج من بيته حتى يأتي المصلي".

قال الحاكم:"هذا حديث غريب الإسناد والمتن، غير أن الشيخين لم يحتجا بالوليد بن محمد الموقري، ولا بموسي بن عطا البلقاوي. وهذه سنة تداولها أئمة أهل الحديث، وصحت به الرواية عن عبد الله بن عمر وغيره من الصّحابة". وقال الذهبي معقبا عليه: هما متروكان.

وقال البيهقيّ: موسي بن محمد بن عطاء منكر الحديث ضعيف. والوليد بن محمد المقريّ ضعيف، لا يحتج برواية أمثالهما. والحديث المحفوظ عن ابن عمر من قوله" انتهى.

قلت: وفي الطريق الأولي الذي هو أمثلهما كما قال البيهقي؛ عبد الله بن عمر -المكبر- وهو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب العمري المدني ضعيف باتفاق أهل العلم، فلا يصح هذا الحديث مرفوعًا بوجه من الوجوه؛ فإن الصّحيح أنه موقوف على عبد الله بن عمر، وقد ثبت عن غير واحد من الصّحابة أنهم كانوا يكبرون.

وعن مالك، عن يحيى بن سعيد أنه بلغه أنَّ عمر بن الخطاب خرج الغدَ من يوم النحر حين ارتفع النهار شيئًا. فكبَّر، فكبَّر الناس بتكبيره، ثم خرج الثانية من يومه ذلك بعد ارتفاع النهار. فكبَّر، فكبِّر الناس بتكبيره، ثم خرج الثالثة، حين زاغتِ الشمس فكبَّر، فكبَّر الناسُ بتكبيره حتى يتصل التكبيرُ ويبلُغَ البيتَ. فيُعلم أنَّ عمر قد خرج يرمِي.

قال مالك: الأمر عندنا أنَّ التكبير في أيَّام التشريق دُبر الصلاة. وأوَّلُ ذلك تكبير الإمام والناسُ معه. دُبرَ صلاة الظهر من يوم النحر، وآخر ذَلك تكبير الإمام والناس معه دُبر صلاة الصبح من آخر أيَّامِ التشريق ثم يقطعُ التكبير"الموطأ" (1/ 404).

وكان علي بن أبي طالب -رضى الله عنه- يكبر بعد صلاة الفجر يوم عرفة إلى صلاة العصر من أيام التشريق، ويكبر بعد العصر. رواه ابن أبي شيبة وغيره.

وأخرج الدارقطني في سننه عن ابن عمر وأبي سعيد وزيد بن ثابت وعثمان بن عفان بأسانيد عدة أنَّهم كانوا يكبرون بعد الظهر من يوم النحر إلى الظهر من آخر أيام التشريق.

وأما ابن مسعود فكان يُكبِّر من صلاة الفجر يوم عرفة، إلى صلاة العصر من يوم النحر، وكان يقول: الله أكبر الله أكبر، لا إله إلا الله، والله أكبر الله أكبر، ولله الحمد.




নুবাইশাহ আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আইয়ামে তাশরীক (কুরবানীর পরের দিনগুলো) হলো পানাহার ও উপভোগের দিন।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "এবং আল্লাহর স্মরণের দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3105)


3105 - عن عائشة أنَّ أبا بكر دخل عليها، وعندها جاريتان في أيام مِني تُدَفِّفَانِ وتضربان -والنبي صلى الله عليه وسلم متغَشٍّ بثوبه- فانتهرها أبو بكر، فكشف النبي صلى الله عليه وسلم عن وجهه فقال:"دعهما يا أبا بكر! فإنَّها أيامُ عيدٍ وتلك الأيام أيام منًى.

متفق عليه: رواه البخاري في العيدين (987)، ومسلم في العيدين (892/ 17) كلاهما من
طريق ابن شهاب، حدَّثه عروة، عن عائشة واللفظ للبخاري. ولفظ مسلم قريب منه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন মিনার দিনগুলিতে তাঁর কাছে দু’টি বালিকা ‘দুফ’ বাজাচ্ছিল এবং ছন্দ দিচ্ছিল— আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চাদর দ্বারা নিজেকে আবৃত করে ছিলেন— আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ধমকালেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চেহারা থেকে চাদর সরিয়ে বললেন, "হে আবূ বকর! তাদের ছেড়ে দাও। কেননা এগুলো ঈদের দিন এবং এই দিনগুলো মিনার দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3106)


3106 - عن عائشة قالت: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي جاريتان تُغنّيان بغِناء بُعاث، فاضطجع على الفراش، وحوَّل وجهه. ودخل أبو بكر فانتهرني وقال: مزمارة الشيطان عند النبي صلى الله عليه وسلم فأقبل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"دعهما" فلمَّا غَفَلَ غمزتُهما، وخرجتا، وكان يوم عيد يلعب السودان بالدَّرَقِ والحِرابِ، فإمَّا سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم وإمَّا قال:"تشتهين تنظرين؟" فقلت: نعم. فأقامني وراءَهُ خدِّي على خده، وهو يقول:"دونكم يا بني أرْفِدة" حتى إذا ملَلْتُ قال:"حسبُكِ" قلت: نعم. قال:"فاذهبي".

متفق عليه: البخاري في العيدين (949، 950)، ومسلم في العيدين (892/ 19) كلاهما من طريق ابن وهب، قال: أخبرنا عمرو، أن محمد بن عبد الرحمن حدَّثه عن عروة، عن عائشة فذكرته واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري قريب منه.

وفي رواية لهما: جاريتان من جواري الأنصار تُغنيان بما تناولت الأنصار يومَ بُعاث، وليستا بمغنيتين، وفيها قال النبي صلى الله عليه وسلم: يا أبا بكر! إن لكل قوم عيدًا، وهذا عيدنا"، البخاري (952)، ومسلم (892/ 16) كلاهما من حديث أبي أسامة عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.

وقوله:"بُعاث" بضم الموحدة وبعدها مهملة، وآخرها مثلثة. هو موضع من المدينة على ليلتين، وقيل غير ذلك.

قال الخطابي: يوم بُعاث يوم مشهور من أيام العرب كانت فيه مقتلة عظيمة للأوس والخزرج، وبقيت الحرب قائمة مائة وعشرين سنة إلى الإسلام على ما ذكره ابن إسحاق وغيره، وقيل غير ذلك. انظر:"الفتح" (2/ 441).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট প্রবেশ করলেন, তখন আমার কাছে দুটি বালিকা বু'আস যুদ্ধের গান গাইছিল। তিনি বিছানায় শুয়ে পড়লেন এবং চেহারা ঘুরিয়ে নিলেন। ইতোমধ্যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন এবং আমাকে ধমক দিয়ে বললেন: নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে শয়তানের বাদ্য? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার (আবূ বকরের) দিকে ফিরে বললেন: "তাদেরকে গাইতে দাও।" যখন তিনি অন্যমনস্ক হলেন, আমি তাদের দু'জনকে ইশারা করলাম এবং তারা বেরিয়ে গেল।

সেদিন ছিল ঈদের দিন, আর হাবশী লোকেরা ঢাল ও বল্লম নিয়ে খেলা করছিল। হয় আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলাম, নতুবা তিনি নিজেই বললেন: "তুমি কি দেখতে চাও?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি আমাকে তার পিছনে দাঁড় করিয়ে দিলেন—আমার গাল ছিল তার গালের উপর—আর তিনি বলছিলেন: "হে বানী আরফিদা, চালিয়ে যাও।" অবশেষে যখন আমি ক্লান্ত হয়ে পড়লাম, তখন তিনি বললেন: "তোমার যথেষ্ট হয়েছে কি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে যাও।"

অন্য এক বর্ণনায় (যা আনসারদের দাসী সংক্রান্ত) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন: "হে আবূ বকর! প্রত্যেক জাতিরই উৎসবের দিন আছে, আর এটা হলো আমাদের উৎসবের দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3107)


3107 - عن أبي هريرة قال: بينما الحبشة يلْعبون عند رسول الله صلى الله عليه وسلم بِحرابهم، إذ دخل عمر بن الخطاب، فأهْوى إلى الحَصْباء يَحْصِبهم بها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دَعْهم يا عمر".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2901)، ومسلم في العيدين (893) كلاهما من طريق معمر، عن الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره، ولفظهما سواء. وفي رواية"في المسجد".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এমন সময় আবিসিনিয়ার (হাবশার) লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাদের বর্শা নিয়ে খেলা করছিল, যখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে প্রবেশ করলেন। তিনি কাঁকর হাতে নিলেন যাতে তাদের দিকে ছুঁড়ে মারতে পারেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে উমার, তাদের ছেড়ে দাও।"

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, খেলাটি 'মসজিদে' হচ্ছিল।)









আল-জামি` আল-কামিল (3108)


3108 - عن سعيد بن جبير قال: كنت مع ابن عمر حين أصابه سنان الرمح في أَخمصِ قدمه، فلزقتْ قدمه بالرِّكاب، فنزلتُ فنزعتُها -وذلك بمنى-، فبلغ الحجاجَ فجعلَ
يعودُه، فقال الحجاج: لو نعلم من أصابك؟ فقال ابن عمر: أنت أصبتني. قال: كيف؟ قال: حملت السِّلاحَ في يوم لم يكن يُحمل فيه، وأدخلت السلاحَ الحرمَ، ولم يكن السلاحُ يُدخل الحرمَ.

صحيح: رواه البخاري في العيدين (966) عن زكريا بن يحي أبي السُّكين، قال: حدثنا المحاربي، قال: حدثنا محمد بن سوقة، عن سعيد بن جبير فذكره.

ورواه أيضًا (967) عن أحمد بن يعقوب، قال: حدثني إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، عن أبيه قال: دخل الحجاج على ابن عمر، وأنا عنده فقال: كيف هو؟ فقال: صالح. فقال: من أصابك؟ قال: أصابني من أمر بحملٍ السلاح في يومٍ لا يحل فيه حملُه. يعني: الحجاجُ.

قوله:"أخمص قدمه" بإسكان الخاء وفتح الميم - باطن القدم وما رق من أسفلها. وقيل: هو خصر باطنها الذي لا يُصيب الأرض عند المشي.

وأما ما جاء من ذكر السودان أنَّهم كانوا يلعبون بالدَّرق والحِراب يوم عيد فالظاهر أنَّ ذلك كان بعد رجوعه صلى الله عليه وسلم من المصلَّي؛ لأنَّه كان يخرج أوَّلَ النهار فيصلِّي، ثم يرجع، ولذا كَرِه أهل العلم حمل السلاح يوم عيد إلا أن يخاف العدو.

و"الحراب" بكسر الحاء - جمع حربة،"والدرق" جمع درقة وهي الترس.

وأما ما رُوي عن ابن عباس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُلْبس السِّلاحُ في بلاد الإسلام في العيدين إلَّا أن يكون بحضرة العدو. فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (1314) عن عبد القدوس بن محمد، قال: حدثنا نائل بن نَجِيح قال: حدثنا إسماعيل بن زياد، عن ابن جُريج، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.

ونائل بن نجيح وهو: أبو سهل البصري، أو البغدادي، وشيخه إسماعيل بن زياد الكوفي، قاضي الموصل ضعيفان بل كذَّبوا إسماعيل بن زياد وتركوه.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবায়ের বলেন, আমি ইবনে উমারের সাথে ছিলাম যখন একটি বর্শার ফলক তাঁর পায়ের তলার নরম অংশে আঘাত করে, ফলে তাঁর পা রেকাবের সাথে আটকে যায়। আমি (ঘোড়া থেকে) নেমে সেটি খুলে দেই—আর এই ঘটনাটি মিনাতে ঘটেছিল। সংবাদটি হাজ্জাজের কাছে পৌঁছালে সে তাঁকে দেখতে আসতে শুরু করল। হাজ্জাজ বলল: আহা, যদি জানতে পারতাম কে আপনাকে আঘাত করেছে? ইবনে উমার বললেন: তুমিই আমাকে আঘাত করেছ। সে বলল: কীভাবে? তিনি বললেন: তুমি এমন দিনে অস্ত্র বহন করিয়েছ যেদিন অস্ত্র বহন করা হতো না এবং তুমি হারামের মধ্যে অস্ত্র প্রবেশ করিয়েছ, অথচ হারামের মধ্যে অস্ত্র প্রবেশ করানো হতো না।









আল-জামি` আল-কামিল (3109)


3109 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نحن الآخرون السابقون يوم القيامة، بيد أنَّهم أوتوا الكتاب من قبلنا، وأُوتيناه من بعدهم، وهذا يومهم الذي فُرض عليهم فاختلفوا فيه، فهدانا الله له، فهم لنا فيه تبعٌ؛ فاليهود غدًا، والنصارى بعد غدٍ".

متفق عليه: رواه البخاري في الأَيمان والنذور (6624)، ومسلم في الجمعة (855/ 21)، كلاهما من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمرٌ، عن همَّام بن منبِّه، قال: هذا ما حدَّثنا أبو هريرة فذكره.

واللفظ لمسلمٍ، أمَّا البخاري؛ فاقتصر على قوله صلى الله عليه وسلم:"نحن الآخرون السابقون يوم القيامة".

ورواه البخاري (876)، ومسلم، كلاهما من طريق أبي الزناد، أنَّ عبد الرحمن بن هرمز الأعرج مولى ربيعة بن الحارث حدَّثه، أنَّه سمِع أبا هريرةَ يقول: إنَّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث كاملًا كما هو عند مسلمٍ، إلَّا أنَّ مسلمًا أحال على السابق في هذا الإسنادِ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমরাই হবো কিয়ামতের দিন সর্বশেষ আগমনকারী, তবে [মর্যাদায়] অগ্রগামী। যদিও তাদের আমাদের পূর্বে কিতাব দেওয়া হয়েছে, আর আমাদের কিতাব দেওয়া হয়েছে তাদের পরে। আর এটি তাদের সেই দিন (শুক্রবার) যা তাদের উপর ফরয করা হয়েছিল, কিন্তু তারা তাতে মতভেদ করে। অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে এর জন্য পথ দেখালেন। সুতরাং তারা এই দিনে আমাদের অনুগামী; ইয়াহুদীরা [জুমআহর পরিবর্তে] শনিবার এবং নাসারারা রবিবার [পালন করে]।”









আল-জামি` আল-কামিল (3110)


3110 - عن أبي هريرة وحذيفة قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أضلَّ الله عز وجل عن الجمعة من كان قبلنا؛ فكان لليهود يوم السبت، وكان للنصارى يوم الأحد، فجاء الله بنا فهدانا الله ليوم الجمعة، فجعل الجمعة والسبت، والأحد، وكذلك هم تبع لنا يوم القيامة، نحن الآخرون من أهل الدنيا، والأولون يوم القيامة، المقضيُّ لهم قبل الخلائق". وفي رواية:"المقضيُّ بينهم".

وفي رواية عن حذيفة:"هُدينا إلى الجمعة، وأضلَّ الله عنها من كان قبلنا".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (856) من طرق عن ابن فضيل، عن أبي مالكٍ الأشجعي، عن أبي حازم، عن أبي هريرة.

وعن رِبعي بن حِراش، عن حذيفة، فذكرا الحديثَ.
والرواية الثانية عن حذيفة رواها مسلم أيضًا من وجه آخر عن سعد بن طارق، عن ربعي بن حراش به مثله.

ورواه البزَّار"كشف الأستار" (617) عن يوسف بن موسى، ثنا ابن فضيل، بالإسنادين جميعًا عن أبي هريرة وحذيفة، وفيه:"المغفور لهم قبل الخلائق".




আবু হুরায়রা ও হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা আমাদের পূর্ববর্তীদেরকে জুমু‘আর দিন থেকে পথভ্রষ্ট করে দিয়েছিলেন। ফলে ইয়াহূদীদের জন্য ছিল শনিবার এবং নাসারাদের জন্য ছিল রবিবার। অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে আনলেন এবং আল্লাহ আমাদেরকে জুমু‘আর দিনের জন্য পথ প্রদর্শন করলেন। তাই তিনি (দিনের ধারাবাহিকতা) স্থির করলেন: জুমু‘আ, শনিবার ও রবিবার। আর এভাবেই কিয়ামতের দিনও তারা আমাদের অনুগামী হবে। আমরা দুনিয়াবাসীর মধ্যে সর্বশেষে আগমনকারী, কিন্তু কিয়ামতের দিনে আমরাই প্রথম—যাদের ফায়সালা সৃষ্টির পূর্বে করা হবে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তাদের মাঝে ফায়সালা করা হবে।"

হুযায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমাদেরকে জুমু‘আর দিকে পথ দেখানো হয়েছে, আর আল্লাহ আমাদের পূর্ববর্তীদেরকে তা থেকে পথভ্রষ্ট করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3111)


3111 - عن حفصةَ زوج النبي صلى الله عليه وسلم، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"رواح الجمعة واجب على كل محتلم".

صحيح: أخرجه أبو داود (342) والنسائي (1371) كلاهما من طريق المفضَّل بن فَضالة، عن عَيَّاش بن عبَّاسٍ، عن بكير، عن نافع، عن ابن عمر، عن حفصة، فذكرته. واللفظ للنسائي، ولفظ أبي داود:"على كلِّ محتلمٍ رواح الجمعة، وعلى كلِّ من راح الجمعة الغسلُ".

وإسناده صحيحٌ، صححه ابن خزيمة (1721) وابن حبان (1220) فروياه من طريق المفضل به.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জুমু'আর জন্য গমন প্রত্যেক প্রাপ্তবয়স্কের উপর ওয়াজিব।"









আল-জামি` আল-কামিল (3112)


3112 - عن طارق بن شهاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"الجمعة حقٌّ واجب على كلِّ مسلمٍ في جماعةٍ إلَّا أربعةٌ: عبدٌ مملوكٌ، أو امرأةٌ، أو صبيٌّ، أو مريضٌ".

صحيح: رواه أبو داود (1076) عن عباس بن عبد العظيم، حدَّثني إسحاق بن منصور، حدثنا هُريم، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره.

قال أبو داود: طارق بن شهاب رأى النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يسمع منه شيئًا".

قلت: طارق بن شهاب ثبتت صحبته، وغايته أنَّ بينه وبين النبي صلى الله عليه وسلم صحابي، ويسمَّى هذا مرسل الصحابي، وهو حجَّة عند جماهير أهل العلم.

وقد أخرجه الحاكم (1/ 288) من طريق العباس بن عبد العظيم، فجعل بينه وبين النبي صلى الله عليه وسلم"أبا موسي". وقال:"صحيح على شرط الشيخين، فقد اتفقا جميعًا على الاحتجاج بهريم بن سفيان". ولكن قال البيهقي (1/ 172): ذِكرُ أبي موسى الأشعري فيه ليس بمحفوظ. فقد رواه غير العباس، عن إسحاق دون ذكر أبي موسي".

وأمَّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"الجمعة على كلِّ من سمِع النداءَ". فهو ضعيفٌ؛ رواه أبو داود (1056)، وفيه أبو سلمة بن نبيهٍ، وعبد الله بن هارون، وهما مجهولان.

وكذلك ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله:"خمسةٌ لا جمعة عليهم: المرأة، والمسافر، والعبد، والصبي، وأهل البادية". ضعيفٌ، أخرجه الطبراني"مجمع البحرين" (942) وفيه شيخه أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين، وهو ضعيفٌ، وكذَّبه البعض، وإبراهيم بن حمَّاد بن أبي حازم المديني أيضًا ضعيف.



يقول على أعواد منبره:"لينتهينَّ أقوامٌ عن ودعهم الجمعات أو ليختمنَّ الله على قلوبهم، ثمَّ ليكوننَّ من الغافلين".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (865) عن الحسن بن علي الحلواني، حدَّثنا أبو توبةَ، حدَّثنا معاوية (وهو ابن سلام) عن زيد (يعني أخاه) أنَّه سمع أبا سلام، قال: حدثني الحكم بن ميناء، أنَّ عبد الله بن عُمر وأبا هريرة حدَّثاه، فذكره.

وأخرجه النسائي (1370) من وجه آخر عن زيد بن سلام به، إلَّا أنَّه جعل ابنَ عباسٍ بدل أبي هريرةَ.

ورواه ابن خزيمة (1855) عن موسي بن سهلٍ الرملي - وهو أحد الثقات من أهل الشام - عن أبي توبة به. وفيه: عن أبي هريرة وأبي سعيد قالا: فذكره.

قال البيهقي (3/ 171، 172) - بعد أن أشار إلى هذه الطرق وغيرها -:"رواية معاوية بن سلام عن أخيه زيد بن سلام أولى أن تكون محفوظةً".

تَنبيهٌ: في النسخة المطبوعة من صحيح ابن خزيمة:"موسي بن سهل، ثنا الربيع بن نافعٍ، عن أبي توبة …". وهذا خطأٌ مطبعي؛ لأنَّ الربيعَ بن نافعٍ هو الذي يُكنى بـ"أبي توبةَ". وهو الذي يروي عن معاوية بن سلام بدون واسطةٍ.




তারিক ইবনু শিহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জুমু‘আ প্রত্যেক মুসলমানের উপর জামা‘আতের সাথে (আদায় করা) একটি আবশ্যকীয় ফরয। তবে চারজনের উপর তা (ফরয) নয়: ক্রীতদাস, মহিলা, শিশু এবং রোগী।

তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মিম্বারের উপরে দাঁড়িয়ে বলতেন: “অবশ্যই কতিপয় লোক জুমু‘আর সালাত বর্জন করা থেকে বিরত থাকবে, নতুবা আল্লাহ তাদের অন্তরে মোহর মেরে দেবেন। অতঃপর তারা অবশ্যই গাফেলদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে যাবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3113)


3113 - عن عبد الله بن مسعود، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لقوم يتخلَّفون عن الجمعة:"لقد هممت أن آمر رجلًا يصلي بالناس، ثمَّ أحرِّق على رجال يتخلَّفون عن الجمعةِ بيوتهم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (652) من طريق أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، سمعه منه، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.

وهذا الحديث أول حديث ذكره المجد ابن تيمية في أبواب الجمعة في المنتقى، لكن قال البيهقي في"السنن الكبرى" (3/ 56):"والذي يدل عليه سائر الروايات أنَّه عبَّر بالجمعة عن الجماعة".

ولذا سبق أن ذكرته في جموع أبواب صلاة الجماعة وفضلها.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই কওম সম্পর্কে বললেন, যারা জুমু‘আহর সালাত থেকে অনুপস্থিত থাকে (বা পেছনে থাকে): “আমি সংকল্প করেছিলাম যে, আমি একজন লোককে লোকদের সালাতের ইমামতি করার নির্দেশ দেবো। এরপর যারা জুমু‘আহ থেকে পেছনে থাকে, আমি তাদের ঘরবাড়ি জ্বালিয়ে দেবো।”









আল-জামি` আল-কামিল (3114)


3114 - عن أبي جعد الضمري، -وكانت له صحبة- أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من ترك ثلاثَ جمَعٍ تهاونًا بها طبع الله على قلبه".

حسنٌ: أخرجه أبو داود (1052) والترمذي (500) والنسائي (1369) وابن ماجة (1125) كلهم من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن عبيدة بن سفيان الحضرمي، عن أبي الجعد الضمري قال: فذكر الحديثَ.

وإسناده حسن؛ فيه محمد بن عمرو بن علقمة، حسن الحديث، وحسَّنه الترمذي، وصحَّحه ابن خزيمة (1857) وابن حبان (259) فأخرجاه من طريق وكيع، عن سفيان، عن محمد بن عمرو بن علقمه به نحوه.
وصحَّحة -أيضًا- الحاكم (1/ 280) فقال:"صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه" لكن أبا الجعد هذا وقيل: اسمه: أدرع، وقيل: عمرو، وقيل: جنادة، صحابي قيل: إنَّه قُتل يوم الجمل. له هذا الحديث الواحد، وحديث آخر أخرجه البزار في مسنده. قاله ابن الملقن في"البدر المنير" (1/ 584). ولم يُخرِج له مسلمٌ.




আবু জাদ আদ-দামরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অবহেলা করে তিনটি জুমআর সালাত ত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3115)


3115 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ترك الجمعةَ ثلاثًا من غير ضرورةٍ طبع الله على قلبه".

حسنٌ: رواه ابن ماجة (1126) من طريق زهير وابن أبي ذئبٍ، كلاهما عن أَسِيد بن أبي أَسيد، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وهذا إسناد حسن، وصحّحه ابن خزيمة (1856) والبوصيري.

وأخرجه أحمد (22558) من طريق عبد العزيز بن محمد (وهو الدراوردي) عن أَسيد، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه.

والصّحيح: عن عبد الله بن أبي قتادة، عن جابر كما رواه زهير وابن أبي ذئب، وهو الذي رجَّحه أبو حاتم في العلل لابنه (1/ 396)، فقال:"ابن أبي ذئبٍ أحفظ مِن الدراوردي، وكأنَّه أشبه، وكأنَّ الدراوردي لزم الطريقَ". أي لزم جادة الطريق، وهو:"ابن أبي قتادة، عن أبيه". فوهِم؛ لأنَّ الصواب أنَّ ابن أبي قتادة إنَّما روى هذا عن جابر، لا عن أبيه. والله أعلم.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো প্রয়োজন ছাড়া তিনবার জুমুআ ত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3116)


3116 - عن أبي عبسٍ عبد الرحمن بن جبرٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ترك الجمعة ثلاث مرَّاتٍ تهاونًا بها طبع الله على قلبه".

حسن: رواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (5/ 2976): حدثنا أبو بكر بن مالكٍ (وهو القطيعي)، ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، ثنا الوليد بن مسلم، قال: سمعت يزيد بن أبي مريم، قال: لحقني عباية بن رافع، وأنا رائح إلى الجمعة ماشيًا، وهو راكبٌ فقال: أَبشر! فإنِّي سمعت أبا عبسٍ يقول: فذكر الحديث.

وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم ثقات، غير القطيعي، واسمه: أحمد بن جعفر بن حَمْدان بن مالك بن شبيب بن عبد الله، أبو بكر القطيعي، راوية"المسند" عن عبد الله بن الإمام أحمد، كان أسند أهل زمانه، وقد تُكُلِّم فيه، غير أنَّه لا ينزل عن درجة"صدوق". قال أبو عبد الله الذهبي:"صدوق في نفسه مقبولٌ، تغيَّر قليلًا"."الميزان" (1/ 87). وانظر للمزيد:"تاريخ بغداد" (5/ 116 - 118).

أمَّا يزيد بن أبي مريم؛ فقد قال فيه الحافظ:"لا بأس به". ولكن الأولى أن يقال فيه:"ثقة"؛ فقد وثَّقه الأئمة، منهم: ابن معين وأبو حاتم، والبخاري، ودحيم، والعجلي. وأخرج له البخاري في الصحيح. وقال أبو زرعة:"ليس به بأسٌ". وقال الدارقطني:"ليس بذاك". فقول الجماعة
أولى بالتقديم؛ لذا قال الذهبي في"الكاشف":"ثقة".

وأبو عبْس: -بإسكان الموحَّدة-، وقيل: أبو عيسى -بالياء-، والأوَّل أصحُّ، وهو الأنصاري المدني، شهِد بدرًا، ومات سنة 34 هـ.




আবু আবস আবদুর রহমান ইবনু জাবর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি অবহেলা করে তিনবার জুমু'আর নামাজ পরিত্যাগ করবে, আল্লাহ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3117)


3117 - عن عقبة بن عامرٍ الجهني، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هلاك أمتي في الكتاب واللبن". قالوا: يا رسول الله! ما الكتاب واللبن؟ قال:"يتعلَّمون القرآن فيتأولونه على غير ما أنزله الله، ويُحبُّون اللبن فيدعون الجماعات والجُمَع ويبدون".

حسن: رواه أحمد (17415) وأبو يعلى (المقصد العلي- 369) كلاهما من طريق أبي عبد الرحمن (وهو عبد الله بن يزيد المقرئ)، عن ابن لهيعة - قال أحمد: عن أبي قبيل، وقال أبو يعلي: حدثني أبو قبيل (يحيي بن هانئ المعافري) قال: سمعت عقبة بن عامر. قال الإمام أحمد: قال ابن لهيعة: وحدثنيه يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر الجهني، فذكره.

وإسناده حسن، من أجل ابن لهيعة، وهو صدوق تغيَّر بعد احتراق كتبه، ولكن رواية العبادلة عنه قبل احتراق كتبه، ومنهم عبد الله بن يزيد المقرئ.




উকবাহ ইবনে আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের ধ্বংস বা বিনাশ কিতাব (কুরআন) এবং দুধের মধ্যে নিহিত।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কিতাব ও দুধ বলতে কী বোঝানো হয়েছে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা কুরআন শিক্ষা করবে, কিন্তু আল্লাহ যে উদ্দেশ্যে তা নাযিল করেছেন, তার বিপরীত ব্যাখ্যা করবে। আর তারা দুধকে এতো বেশি ভালোবাসবে যে (পশু পালনে ব্যস্ত হয়ে), তারা জামাআতের সালাত ও জুমআর সালাত ত্যাগ করবে এবং তারা (লোকালয় ছেড়ে মরুর দিকে) চলে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3118)


3118 - عن محمد بن عبد الرحمن، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قال: لا أعلمه إلَّا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"من سمع الأذان ثلاث جمعات ثم لم يحضر كُتب من المنافقين".

صحيح: رواه عبد الرزاق (5165) عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، فذكره. وإسناده صحيح.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, “যে ব্যক্তি পরপর তিন জুমুআর আযান শোনার পরও (সালাতে) উপস্থিত হয় না, তাকে মুনাফিকদের অন্তর্ভুক্ত বলে লিপিবদ্ধ করা হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3119)


3119 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر يوم الجمعة فقال:"فيها ساعة لا يوافقها عبدٌ مسلمٌ وهو قائمٌ يصلِّي، يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". وأشار رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده يُقلِّلها.

متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (15) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في الجمعة (935) عن عبد الله بن مسلمة، ومسلم في الجمعة (852) عن يحيي ابن يحيي كلاهما عن مالكٍ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিনের কথা আলোচনা করলেন, অতঃপর বললেন: "এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যখন কোনো মুসলিম বান্দা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দান করেন।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দিয়ে ইশারা করে বুঝালেন যে সময়টি খুব অল্প।









আল-জামি` আল-কামিল (3120)


3120 - عن أبي هريرة قال، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير يومٍ طلعت عليه الشمس يوم الجمعة، فيه خُلق آدم، وفيه أُدخل الجنة، وفيه أُخرج منها".

صحيح: رواه مسلم (854) عن حرملة، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب،
أخبرني عبد الرحمن الأعرج، أنَّه سمع أبا هريرة، فذكره.

ورواه من وجهٍ آخر عن الأعرج. وزاد فيه: ولا تقوم الساعة إلَّا يوم الجمعة".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সূর্য উদিত হয়েছে এমন দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুমু‘আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁকে জান্নাতে প্রবেশ করানো হয়েছিল এবং এই দিনেই তাঁকে তা থেকে বের করে দেওয়া হয়েছিল। আর কিয়ামত জুমু‘আর দিন ছাড়া হবে না।"