হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3121)


3121 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما طلعت الشّمس ولا غربت على يوم خير من يوم الجمعة، هدانا الله له، وأضلَّ الناس عنه، والناس لنا فيه تبع، فهو لنا، واليهود يوم السبت، والنصارى يوم الأحد، إنَّ فيه ساعةً لا يُوافقها مؤمن يصلي يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه".

صحيح: رواه ابن خزيمة (1726) من طريق ابن أبي ذئب، عن المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে দিনের ওপর সূর্য উদিত হয় না বা অস্ত যায় না, সেই দিনের মধ্যে জুমু'আর দিনের চেয়ে উত্তম কোনো দিন নেই। আল্লাহ আমাদের সেদিনের সন্ধান দিয়েছেন এবং অন্য লোকদেরকে তা থেকে পথভ্রষ্ট করেছেন। আর সকল লোক তাতে আমাদের অনুসারী। এটি আমাদের জন্য। ইয়াহূদীদের জন্য শনিবার এবং নাসারাদের (খ্রিস্টানদের) জন্য রবিবার। নিশ্চয়ই তাতে একটি মুহূর্ত রয়েছে, যখন কোনো মুমিন ব্যক্তি সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3122)


3122 - عن أبي هريرةَ أنَّه قال: خرجتُ إلى الطور، فلقيت كعب الأحبار، فجلستُ معه، فحدَّثني عن التوراة، وحدَّثته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكان فيما حدَّثته أن قلتُ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير يومٍ طلعت عليه الشمس يومُ الجمعةِ، فيه خُلِق آدم، وفيه أُهبِطَ من الجنَّة، وفيه تيبَ عليه، وفيه مات، وفيه تقوم الساعةُ، وما من دابَّةٍ إلَّا وهي مُصيخةٌ يومَ الجمعةِ من حين تصبح حتَّى تطلع الشمس، شفقًا من الساعةِ، إلَّا الجنُّ والإنس. وفيه ساعةٌ لا يصادفها عبدٌ مسلمٌ وهو يُصلِّي يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه".

قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ؟ فقلت: بل في كلِّ جمعةٍ. فقرأ كعب التوراةَ فقال: صدق رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال أبو هريرةَ: فلقيت بَصرة بن أبي بَصرةَ الغِفاري، فقال: مِن أينَ أقبلتَ؟ فقلتُ: من الطور. فقال: لو أدركتك قبل أن تخرج إليه ما خرجتَ؛ سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تُعمل المطي إلَّا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، وإلى مسجد إيلياء، أو بيت المقدس". يشكُّ.

قال أبو هريرة: ثمَّ لقيتُ عبد الله بن سلام فحدَّثته بمجلسي مع كعبٍ الأحبار، وما حدَّثته به في يوم الجمعةِ، فقلت: قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ. قال: قال عبد الله بن سلام: كذب كعبٌ. فقلت: ثمَّ قرأ كعبٌ التوراة فقال: بل هي في كلِّ جمعةٍ. فقال عبد الله بن سلام: صدق كعبٌ. ثمَّ قال عبد الله بن سلام: قد علِمتُ أيَّةَ ساعةٍ هيَ. قال أبو هريرةَ: فقلت له: أخبرني بها ولا تضنَّ علىَّ. فقال عبد الله بن سلام: هي آخر ساعةٍ في يوم الجمعةِ. قال أبو هريرة: فقلت: وكيف تكون آخر ساعة في يوم الجمعة، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصادفها عبد مسلم وهو
يصلِّي". وتلك الساعة ساعة لا يُصلَّي فيها؟ فقال عبد الله بن سلام: أَلم يقل رسول الله صلى الله عليه وسلم: من جلس مجلسًا ينتظر الصلاةَ فهو في صلاةٍ حتَّى يُصلِّي"؟ قال أبو هريرة: فقلتُ: بلى. قال: فهو ذلك.

صحيح: رواه مالك في الجمعة (16) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرةَ، فذكر الحديثَ.

ورواه أبو داود (1046) عن القعنبي، والترمذي (491) عن إسحاق بن موسى الأنصاري، عن مَعن، كلاهما عن مالك.

ورواه النسائي (1430) عن قتيبة، ثنا بكر (يعني بن مضر) عن ابن الهاد.

وإسناده صحيحٌ على شرط الشيخين. وصحّحه ابن حبَّان (2772) والحاكم (1/ 178) فأخرجاه من طريق مالكٍ. وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1727) من وجهٍ آخر عن أبي هريرةَ.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين ولم يُخرجاه".

وقوله في الحديث:"ما من دابة إلَّا وهي مُصيخَةٌ يوم الجمعة". مصيخة: أي مستمعةٌ مصغِية تتوقَّعُ قيامَ الساعة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ‘তূর’ পর্বতের দিকে যাচ্ছিলাম, পথে কা'ব আল-আহবার-এর সাথে আমার সাক্ষাৎ হলো। আমি তাঁর সাথে বসলাম। তিনি আমাকে তাওরাত থেকে কিছু কথা শোনালেন, আর আমি তাঁকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা শুনালাম। আমি তাঁকে যা বলেছিলাম, তার মধ্যে এটাও ছিল যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“যে দিনের উপর সূর্য উদিত হয়, তার মধ্যে সর্বোত্তম দিন হলো জুমু‘আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁকে জান্নাত থেকে নামিয়ে আনা হয়েছিল, এই দিনেই তাঁর তাওবা কবুল করা হয়েছিল, এই দিনেই তিনি ইন্তেকাল করেছেন এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। জুমু‘আর দিন প্রত্যুষ থেকে সূর্যোদয় পর্যন্ত জিন ও মানুষ ব্যতীত এমন কোনো প্রাণী নেই যা কিয়ামত সংঘটিত হওয়ার ভয়ে কান পেতে (শব্দ শুনতে) অপেক্ষা করে না। আর এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যে মুহূর্তে কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কিছু চাইলে আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।”

কা'ব বললেন: এটি কি প্রতি বছর একটি দিন? আমি বললাম: বরং এটি প্রতি জুমু‘আয়। তখন কা'ব তাওরাত পড়লেন এবং বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য বলেছেন।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমার সাক্ষাৎ হলো বাসরা ইবন আবী বাসরা আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কোথা থেকে আসছেন? আমি বললাম: ‘তূর’ পর্বত থেকে। তিনি বললেন: আপনি রওনা হওয়ার আগে যদি আমি আপনার সাথে দেখা করতে পারতাম, তাহলে আপনি সেখানে যেতেন না। আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:

“তিনটি মসজিদ ছাড়া (সাওয়াবের নিয়তে) কোনো বাহন পরিচালনা করা উচিত নয়: মাসজিদুল হারাম, আমার এই মাসজিদ (মাসজিদুন নববী) এবং মাসজিদ ইলীয়া (বা বায়তুল মাকদিস)।” (বর্ণনাকারী) সন্দেহ করেছেন।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং কা'ব আল-আহবার-এর সাথে আমার বৈঠক এবং জুমু‘আর দিনের ব্যাপারে তাঁকে যা বলেছিলাম, সে বিষয়ে জানালাম। আমি বললাম: কা'ব বলেছেন, এটা কি প্রতি বছর একটি দিন? তিনি (আব্দুল্লাহ ইবন সালাম) বললেন: কা'ব মিথ্যা বলেছে। আমি বললাম: এরপর কা'ব তাওরাত পড়লেন এবং বললেন: বরং এটা প্রতি জুমু‘আয়। তখন আব্দুল্লাহ ইবন সালাম বললেন: কা'ব সত্য বলেছে। এরপর আব্দুল্লাহ ইবন সালাম বললেন: আমি জানি, সেই মুহূর্তটি কোনটি। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: আমাকে বলুন, আমার কাছে গোপন করবেন না। আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটা হলো জুমু‘আর দিনের শেষ মুহূর্ত।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: জুমু‘আর শেষ মুহূর্ত কীভাবে হতে পারে? অথচ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় সেই মুহূর্ত পায় না (তবে তার দোয়া কবুল হয়)।” অথচ সেই সময়টি তো সালাত আদায়ের সময় নয়? আব্দুল্লাহ ইবন সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেননি যে: “যে ব্যক্তি সালাতের অপেক্ষায় কোনো মজলিসে বসে থাকে, সালাত আদায় করা পর্যন্ত সে সালাতের মধ্যেই থাকে?” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই বলেছেন। তিনি বললেন: তাহলে এটাই সেই সময়।









আল-জামি` আল-কামিল (3123)


3123 - عن أبي هريرةَ، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تطلع الشمس بيومٍ ولا تغرب بأفضل من يوم الجمعة. وما من دابة إلَّا وهي تفزع ليوم الجمعة إلَّا هذان الثقلان من الجنِّ والإنس. وعلى كلِّ إنسان ملكان يكتبان الأوَّل فالأول: كرجل قدَّم بدنةً، وكرجلٍ قدَّم بقرةً، وكرجلٍ قدَّم شاةً، وكرجلٍ قدَّم طيرًا، وكرجلٍ قدَّم بيضةً، فإذا قعد الإمام طُوِيَت الصحف".

حسنٌ: رواه الإمام أحمد (9896) عن محمد بن جعفر، ثنا شعبة، قال: سمعت العلاء يُحدِّث عن أبيه، عن أبي هريرةَ.

وإسناده حسن من أجل العلاء بن عبد الرحمن؛ فإنه حسن الحديث.

وصحّحه ابن خزيمة (1757) وابن حبَّان (2770) فأخرجاه من هذا الوجه مقتصرين على المقطع الأول والثاني من الحديث فقط.

ورواه أيضًا ابن خزيمة (1770) وابن حبَّان (2774) من حديث العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، واقتصرا على المقطع الأخير منه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যেদিন সূর্য উদিত হয় এবং যেদিন অস্ত যায়, জুমু'আর দিনের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কোনো দিন নেই। জিন ও মানুষ—এই দু' প্রকারের ভারী সৃষ্টি ছাড়া প্রতিটি প্রাণীই জুমু'আর দিন নিয়ে ভীত থাকে। আর প্রত্যেক মানুষের ওপর দু'জন ফেরেশতা থাকে, যারা প্রথম আগমনকারীকে লিপিবদ্ধ করে। যেমন: একজন ব্যক্তি একটি উট আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি গরু আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি ছাগল আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো, একজন ব্যক্তি একটি পাখি আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো এবং একজন ব্যক্তি একটি ডিম আল্লাহর পথে উৎসর্গ করলো। অতঃপর যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসার স্থানে বসেন, তখন (পুণ্যের) দফতরসমূহ গুটিয়ে ফেলা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3124)


3124 - عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري، قال: قال لي عبد الله بن عمر: سمعتَ أباك يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في شأن ساعةِ الجمعة؟ قال: قلت: نعم، سمعته يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"هي ما بين أن يجلس الإمام إلى أن تُقضى الصلاةُ".
صحيحٌ: رواه مسلم في الجمعة (853) من طريق ابن وهب، عن مخرمة بن بكير، عن أبيه، عن أبي بردة، فذكره.

وفي الباب ما رُوِي عن سعد بن عُبادة أنَّ رجلًا من الأنصار أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: أخبرنا عن يوم الجمعةِ ماذا فيه من الخير؟ قال:"فيه خمس خِلالٍ: فيه خُلق آدم، وفيه أُهبِط آدم، وفيه توفَّي الله آدم، وفيه ساعةٌ لا يسأل اللهَ عبدٌ فيها شيئًا إلَّا آتاه، ما لم يسأل مأثمًا أو قطيعة رحم، وفيه تقوم الساعة ما من ملكٍ مقرَّبٍ، ولا سماءٍ ولا أرضٍ، ولا جبالٍ، ولا حجرٍ، إلَّا وهو يُشفق من يومِ الجمعةِ".

أخرجه الإمام أحمد (22457) والبزار (3738) من طريق عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن عمرو بن شرحبيل بن سعيد بن سعد بن عبادة، عن أبيه، عن جدِّه، عن سعد بن عُبادة فذكره.

وعمرو بن شرحبيل وأبوه لم يوثِّقهما غير ابن حبَّان؛ فهما مقبولان حيث يتابعان، ولم يُتابعا في هذا الحديث.

أمَّا البزَّار فقال:"وهذا الكلام لا نعلمه يُروي عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم إلَّا من هذا الوجه، وإسناده صالحٌ". وقال الحافظ:"هذا حديثٌ حسنٌ إن كان شرحبيل سمع من جدِّه سعد بن عُبادةَ".

وفي الإسناد علة أخرى: وهي أنَّ عبد الله بن محمد بن عقيل قد خالف في هذا الإسناد؛ لأنَّه رواه كما عند ابن ماجة (1084) والإمام أحمد (15548)، عن عبد الرحمن بن يزيد الأنصاري، عن أبي لبابة بن عبد المنذر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ يوم الجمعة سيِّد الأيام، وأعظمها عند الله، وهو أعظم عند الله من يوم الأضحى، ويوم الفطر، فيه خمس خلالٍ: خلق الله فيه أدم، وأهبط الله فيه آدم إلى الأرض، وفيه توفي الله أدم، وفيه ساعةٌ لا يسأل الله فيها العبد شيئًا إلَّا أعطاه، ما لم يسأل حرامًا، وفيه تقوم الساعة، ما من ملكٍ مقرَّب، ولا سماءٍ ولا أرض، ولا رياح ولا جبال، ولا بحرٍ، إلَّا وهنَّ يُشفقنَ من يوم الجمعة".

فخالف في الإسناد والمتن، ولعلَّ الحافظ ابن حجر يشير إلى هذا بقوله:"سيء الحفظ يصلح حديثه للمتابعات، وأمَّا إذا انفرد؛ فيُحسَّن، وأمَّا إذا خالف؛ فلا يُقبل"."التلخيص" (2/ 108).

وكذلك ما رُوي عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف أنَّه قال: كان أبو هريرة يحدِّثنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه قال:"إنَّ في الجمعة ساعة لا يوافقها مسلمٌ وهو في صلاةٍ يسأل الله خيرًا إلَّا آتاه إياه". قال أبو هريرةَ: وقلَّلَها أبو هريرةَ بيده. قال: فلمَّا توفي أبو هريرة قلت: والله! لو جئتُ أبا سعيد فسألته عن هذه الساعة، أن يكون عنده منها علمٌ، فأتيته، فأجده يقوِّم عراجين، فقلت: يا أبا سعيد، ما هذه العراجين التي أراك تقوِّم؟ قال: هذه عراجين جعل الله لنا فيها بركةً، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُحبُّها ويختصر بها، فكنَّا نُقوِّمُها ونأتيه بها، فرأى بصاقًا في قبلةِ المسجد وفي يده عُرجونٌ من تلك العراجين، فحكَّه وقال:"إذا كان أحدكم في صلاته فلا يبصق أمامه؛ فإنَّ ربَّه أمامه، وليبصق عن يساره، أو تحت قدمه، فإن لم" قال سريج:"فإن لم يجد مَبصقًا ففي ثوبه أو نعله". قال: ثمَّ
هاجت السماء من تلك الليلة، فلمَّا خرج النبي صلى الله عليه وسلم لصلاة العشاء الآخرة برقت برقةٌ، فرأى قتادة بن النعمان، فقال:"ما السُّرى يا قتادهُ؟". قال: علمتُ يا رسولَ الله! أنَّ شاهد الصلاة قليلٌ، فأحببتُ أن أشهدها. قال:"فإذا صلَّيت فاثبت حتَّى أمرَّ بكَ. فلمَّا انصرف أعطاه العرجون، وقال:"خذ هذا فسيُضيءُ لك أمامك عشرًا، وخلفك عشرًا، فإذا دخلتَ البيتَ وتراءيتَ سوادًا في زاوية البيتِ، فاضربه قبل أن يتكلَّم؛ فإنَّه شيطان". قال: ففعل، فنحن نُحبُّ هذه العراجين لذلك. قال: قلتُ يا أبا سعيدٍ! إنَّ أبا هريرةَ حدَّثنا عن الساعة التي في الجمعةِ، فهل عندك منها علمٌ؟ فقال: سألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عنها، فقال:"إنِّي كنتُ قد أُعلِمتُها، ثمَّ أُنسيتُها كما أنسيتُ ليلةَ القدرِ". قالتُ: ثم خرجت من عندِه فدخلتُ على عبد الله بن سلام.

أخرجه أحمد (11624) عن يونس وسُريج، قالا: ثنا فُلَيح، عن سعيد بن الحارث، عن أبي سلمةَ، فذكره.

وأخرجه أيضًا البزَّار (620 - كشف الأستار) من وجه آخر عن فُلَيح به. وزاد فيه بعد قوله:"ثمَّ خرجتُ مِن عنده":"حتَّى أتيت دار رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم"، قال: قلت: هذا رجل قد قرأ التوراة، وصَحِب النبيَّ صلى الله عليه وسلم، قال: فدخل عليه فقلت: أخبرني عن هذه الساعة التي كان النبي صلى الله عليه وسلم يقول فيها ما يقول في الجمعة؟ قال: نعم! خلق الله آدم يوم الجمعة، وأسكنه الجنة يوم الجمعة، وأهبطه إلى الأرض يوم الجمعة، وتوفاه يوم الجمعة، وهو اليوم الذي تقوم فيه الساعة، وهي آخر ساعة من يوم الجمعة. قال: قلت: ألست تعلم أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم يقول: في صلاةٍ؟ قال: ولَستَ تعلم أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"من انتظر صلاة فهو في صلاةٍ".

ففي إسناده فليح بن سليمان، أخرج له الجماعة، لكن تُكُلّم فيه من قبل حفظه؛ فضَّعفه ابن معين، وأبو حاتم، وأبو داود، والنسائي، وأبو زرعة الرازي، ووثَّقه الدارقطني في رواية، وقال في أُخرى:"يختلفون فيه وليس به بأسٌ".

وقال ابن عدي:"ولفُلَيح أحاديث صالحة، ويروي عن سائر الشيوخ من أهل المدينة أحاديث مستقيمة، وغرائب، وقد اعتمده البخاري في صحيحه، وروى عنه الكثير، وهو عندي لا بأس به".

قلت: وقد انفرد فُلَيح برواية هذا الحديث بهذا السياق، وقد جمع فيه عدَّةَ أحاديثَ لبعضها طرق صحيحة وحسنة، وانفرد في هذا السياق بعض الألفاظ، منها: فهذه العراجين جعل الله لنا فيها بركة، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحبها ويتخصَّر بها". ومنها:"إنِّي كنتُ أُعِلمتها ثمَّ أُنسيتُها". وقد صحَّح هذه اللفظة ابن خزيمة (1741) والحاكم (1/ 279، 280) من طريق يونس بن محمد، عن فليح به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

قلت: والإسناد كيفما دار فهو يدور على فُلَيح، وقد سبق ذكر أقوال العلماء فيه.

وكذلك ما رُوي عن أبي سلمة قال: سمعت أبا هريرةَ وأبا سعيد يذكران عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه
قال:"إنَّ في الجمعة ساعةً لا يوافقها عبد وهو يصلِّي يسأل الله فيها شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". قال: وعبد الله بن سلام يذكر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: نعم، هي آخر ساعة. قلت: إنَّما قال: وهو يصلِّي، وليس تلك ساعة صلاةٍ فقال: أو ما سمعت أو ما بلغك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من انتظر الصلاة فهو في صلاةٍ".

فجعل ذكر آخر ساعةٍ من المرفوع عن النبي صلى الله عليه وسلم.

رواه البزار (619 - كشف الأستار) عن الحسن بن الصباح، عن عبد الله بن جعفر، ثنا عبد الله بن عمرو، عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة به.

فالظاهر أنَّ هذا وهمٌ من بعض رواته، فإنَّ رواته بين ثقة وصدوق، لكن وصف شيخ البزار، وعبد الله بن جعفر، وكذا عبيدالله بن عمرو، وُصِف كلٌّ منهم بشيءٍ من الوهم، وإنَّما صحَّ هذا من قول عبد الله بن سلام كما سبق.

قال الهيثمي:"حديث أبي هريرة في الصحيح، وحديث ابن سلام لم أره مرفوعًا عند أحد منهم".

قلت: والذي يظهر أن عبد الله بن سلام كان يروي على وجهين، فمرة يرويه مرفوعًا، وأخرى موقوفًا، كما يدل عليه الحديث الذي بعد حديث جابر.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ বুরদাহ ইবনু আবূ মূসা আল-আশআরী বলেন, আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি আপনার পিতাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে জুমুআর মুহূর্ত (সاعة) সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনেছেন? আমি বললাম: হ্যাঁ, আমি তাকে বলতে শুনেছি, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ঐ মুহূর্তটি হলো ইমাম (মিম্বারে) বসার পর থেকে সালাত শেষ হওয়া পর্যন্ত।"

অন্য এক বর্ণনায় সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করলেন: জুমুআর দিনে কী কী ভালো বিষয় রয়েছে সে সম্পর্কে আমাদের অবহিত করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এতে পাঁচটি বৈশিষ্ট্য রয়েছে: এতে আদমকে সৃষ্টি করা হয়, এতে আদমকে (জান্নাত থেকে) অবতরণ করানো হয়, এতে আল্লাহ আদমকে মৃত্যু দেন, এতে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে যখন কোনো বান্দা আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চাইলে আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দেন, যদি না সে কোনো পাপ অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার বিষয়ে প্রার্থনা করে, এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। কোনো নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতা, আকাশ, পৃথিবী, পর্বতমালা বা পাথর এমন নেই যা জুমুআর দিন সম্পর্কে শঙ্কিত নয়।"

আরেকটি বর্ণনায় আবূ লুবাবাহ ইবনু আব্দুল মুনযির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জুমুআর দিন দিবসসমূহের সর্দার, আর এটি আল্লাহর কাছে সর্বাধিক মর্যাদাপূর্ণ। এটি আল্লাহর কাছে ঈদুল আযহা ও ঈদুল ফিতরের দিনের চেয়েও শ্রেষ্ঠ। এতে পাঁচটি বৈশিষ্ট্য রয়েছে: আল্লাহ এতে আদমকে সৃষ্টি করেছেন, আল্লাহ এতে আদমকে পৃথিবীতে অবতরণ করিয়েছেন, এতে আল্লাহ আদমকে মৃত্যু দিয়েছেন, এতে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে যখন কোনো বানু আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চাইলে আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দেন, যদি না সে কোনো হারাম বিষয়ে প্রার্থনা করে, এবং এতেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। কোনো নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতা, আকাশ, পৃথিবী, বাতাস, পর্বতমালা বা সাগর এমন নেই যা জুমুআর দিন সম্পর্কে শঙ্কিত নয়।"

আবু সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন যে, তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই জুমুআর দিনে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে, যদি কোনো মুসলিম ঐ সময় সালাতে থাকা অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কল্যাণ কামনা করে, তবে আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার হাত দিয়ে ইঙ্গিত করে সে সময়টিকে কম বলে দেখাতেন।

(বর্ণনায় আরও এসেছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার) মসজিদের ক্বিবলার দিকে থুথু দেখতে পেলেন। তখন তাঁর হাতে খেজুরের ডাল ছিল। তিনি তা দিয়ে থুথুটি মুছে ফেললেন এবং বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন সালাতে থাকে, তখন সে যেন সামনে থুথু না ফেলে; কেননা তার প্রতিপালক তার সামনে থাকেন। সে যেন তার বাম দিকে অথবা তার পায়ের নিচে থুথু ফেলে।" সুরাইজ বলেন: "যদি থুথু ফেলার জায়গা না পায়, তবে তার কাপড়ে অথবা জুতার মধ্যে (ফেলবে)।"

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, আবূ সালামাহ বললেন): আমি আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই মুহূর্তটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমাকে তা জানানো হয়েছিল, কিন্তু পরে কদরের রাতের মতো আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে।"

(পরে আবূ সালামাহ) আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, (সেই মুহূর্তটি হলো) জুমুআর দিনের শেষ মুহূর্ত। আমি বললাম: আপনি কি জানেন না যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সে সালাতে থাকা অবস্থায় (এই মুহূর্ত পায়)? কিন্তু সেই মুহূর্ত তো সালাতের সময় নয়। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন না যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের জন্য অপেক্ষা করে, সে সালাতেই থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3125)


3125 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوا الساعة التي ترجى في يوم الجمعة بعد العصر إلى غيبوبة الشمس".

حسن: رواه الترمذي (489) عن عبد الله بن الصباح الهاشمي البصري، قال: حدثنا عبيد الله ابن عبد المجيد الحنفي، قال: حدّثنا محمد بن أبي حميد، قال: حدّثنا موسي بن وردان، عن أنس، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وقد روي هذا الحديث عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، ومحمد بن أبي حميد يضعف، ضعفه بعض أهل العلم من قبل حفظه، ويقال له: حماد بن أبي حميد، ويقال: هو أبو إبراهيم الأنصاري، وهو منكر الحديث". انتهى.

قلت: محمد بن أبي حميد ضعيف باتفاق أهل العلم، ولكن قال ابن عدي: وهو مع ضعفه يكتب حديثه أي: للاعتبار. فقد وجدت له متابعا وهو ابن لهيعة، عن موسي بن وردان. أخرجه الطبراني في الأوسط (136) من طريقه. وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكنه لم يتهم، ولذا يقبل في المتابعة، وبهذا صار الحديث حسنا.

وأما موسي بن وردان فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف في الإسناد، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা জুমুআর দিনে সেই সময়টিকে তালাশ করো, যখন দোয়া কবুল হওয়ার আশা করা হয়—যা আসরের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3126)


3126 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يوم الجمعة اثنتا عشرة -يريد: ساعة-، لا يوجد مسلمٌ يسأل الله عز وجل شيئًا إلَّا آتاه الله عز وجل، فالتمسوها
آخر ساعةٍ بعد العصرِ".

حسن: رواه أبو داود (1048) والنسائي (1389) كلاهما من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن الجلاح -مولي عبد العزيز-، أنَّ أبا سلمة حدَّثه، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الجلاح؛ فهو صدوق.

وصحّحه الحاكم (1/ 279) على شرط مسلم، وقال:"فقد احتجَّ بالجلاح بن كثير، ولم يخرجاه".

وروي بمعناه عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن في الجمعة ساعة لا يوافقها عبد مسلم يسأل الله عز وجل فيها خيرًا إلا أعطاه إياه، وهي بعد العصر".

رواه أحمد (7677) عن عبد الرزاق -وهو في المصنف (5584) -، أخبرنا ابن جريج، حدثني العباس حديثا، عن محمد بن مسلمة الأنصاري، عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة، فذكراه.

والحديث أيضًا أخرجه العقيلي (4/ 140) من طريق عبد الرزاق، وقال: حدثني آدم بن موسي، قال: سمعت البخاري قال: محمد بن مسلمة الأنصاري، عن أبي سعيد وأبي هريرة في ساعة الجمعة لا يتابع عليه.

وقال العقيلي:"والرواية في فضل الساعة التي في يوم الجمعة ثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، وأما التوقيت فالرواية فيها أيه، كذا -أظنه"لينة"- كما سيأتي. ثم قال: والعباس رجل مجهول لا يعرف، ومحمد بن مسلمة أيضًا مجهول. وأمَّا العصر فالرواية فيه لينة" انتهي.

كذا قال، مع أن التوقيت بالعصر فالرواية فيه أيضًا ثابتة، كما أن التوقيت ما بين أن يجلس الإمام إلى أن تقضى الصلاة ثابتة، وقد نقل الزهري في الموضع المشار إليه سابقًا عن بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم أن الساعة التي ترجى بعد العصر إلى أن تغرب الشمس، وبه يقول أحمد وإسحاق. وقال أحمد:"أكثر الأحاديث في الساعة التي تُرجى فيها إجابة الدعوة أنَّها بعد صلاة العصر، وترجي بعد زوال الشمس". انتهي.

ورُوي عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال:"الساعة التي تُذكر يوم الجمعة ما بين صلاة العصر إلى غروب الشمس". وكان سعيد بن جبير إذا صلى العصر لم يكلِّم أحدًا حتَّى تغرب الشمس، قال الحافظ ابن القيم:"وهذا قول أكثر السلف، وعليه أكثر الأحاديث"."زاد المعاد" (1/ 394).




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জুমু'আর দিনে বারোটি মুহূর্ত (অর্থাৎ ঘণ্টা) রয়েছে। এমন কোনো মুসলিম পাওয়া যায় না যে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে কিছু চাইবে, আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে তা দান করবেন না। সুতরাং তোমরা তা আসরের পরের শেষ মুহূর্তে অনুসন্ধান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3127)


3127 - عن عبد الله بن سلام، قال: قلت ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ: إنَّا لنجد في كتاب الله في يوم الجمعة ساعة لا يوافقها عبدٌ مؤمن يصلِّي يسأل الله فيها شيئًا إلَّا قضي له حاجته.

قال عبد الله: فأشار إلىَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أو بعض ساعة". فقلت: صدقت، أو بعض ساعة. قلتُ: أي ساعة هي؟ قال:"هي آخر ساعات النهار". قلت: إنَّها ليست ساعة صلاة. قال:"بلى. إنَّ العبد المؤمن إذا صلَّى ثمَّ جلس، لا يحبسه إلَّا
الصلاة فهو في الصلاة".

حسن: رواه ابن ماجة (1139) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقي، ثنا ابن أبي فُديك، عن الضحاك بن عثمان، عن أبي النضر، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن سلام، فذكره.

وإسناده حسن؛ من أجل الضحاك بن عثمان لأنه صدوق، وبقية رجاله ثقات. قال البوصيري: هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات على شرط الصحيح".

ورواه أحمد (23781) عن عبد الله بن الحارث، عن الضحاك به مثله. وفيه: قال أبو النضر: قال أبو سلمة: سألته: أية ساعة هي؟ قال: (أي عبد الله بن سلام) آخر ساعات النَّهار. فقلت: إنها ليست بساعة صلاة. فقال: بلى إنَّ العبد المسلم في صلاة إذا صلَّى ثم قعد في مصلاه لا يحبسه إلَّا انتظار الصلاة". انتهي.

وفي الباب ما رُوي عن أنس بن مالكٍ، قال: عُرضت الجمعة على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجاء جبريل في كفِّه كالمرآة البيضاء، في وسطها كالنُكْتة السوداء، فقال:"ما هذه يا جبريل؟". قال:"هذه الجمعة، يَعرِضها عليك ربُّك لتكون لك عيدًا، ولِقومِك من بعدك، ولكم فيها خيرٌ، تكون أنت الأوَّل، ويكون اليهود والنصارى من بعدك، وبها ساعةٌ لا يدعو أحَدٌ ربَّه بخيرٍ هو له قَسْمٌ إلَّا أعطاه، أو يتعوَّذ مِن شرٍّ إلَّا دفع عنه ما هو أعظم منه، ونحن ندعوه في الآخرة يوم المزيدِ، وذلك أنَّ ربَّك اتَّخذ في الجنَّة واديًا أَفْيَحَ مِن مسكٍ أبيض، فإذا كان يوم الجمعة نزل من عِلِّيين فجلس على كرسيِّه، وحفَّ الكرسيَّ بمنابر من ذهبٍ، مكلَّلة بالجواهر، وجاء الصدِّيقون والشهداء وجلسوا عليها، وجاء أهل الغُرف من غرفهم حتَّى يجلسوا على الكثيبِ، وهو كثيب أبيض من مسك أذْفَر، ثمَّ يتجلَّى لهم فيقول: أنا الذي صدقتكم وعدي، وأتممت عليكم نعمتي، وهذا محلُّ كرامتي، فسلوني، فيسألونه الرضا، فيقول: رضاي أَحلَّكم داري، وأنالكم كرامتي، فسلوني، فيسألونه الرضا، ثَّم يفتح لهم ما لم تَره عينٌ، ولم يخطر على قلب بشرٍ، إلى مقدار مُنصرَفهم من الجمعة، وهي زبرجدة خضراء، أو ياقوتة حمراء، متدلِّية فيها ثمارُها وخدمها، فليس هم في الجنة بأشوق منهم إلى يوم الجمعة، ليزدادوا نظرًا إلى ربَّهم عز وجل وكرامته، وكذلك وهي يوم المزيدِ".

رواه الطبراني في"الأوسط" (2150): عن أحمد بن زُهَير، قال: ثنا محمد بن عثمان بن كَرامة، ثنا خالد بن مَخلَد القطواني، ثنا عبد السلام بن حفص، عن أبي عِمران الجَوني، عن أنسٍ، فذكر الحديثَ.

قال الطبراني:"لم يروه عن أبي عِمران إلَّا عبد السلام، تفرَّدَ به خالد".

قلتُ: وهو كما قال، وخالد هذا هو ابن مخلد القطواني، وهو وإن كان من رجال الشيخين إلَّا أنَّه وُصِف بأنَّ له أحاديث مناكير، وكان متشيعًا، وفي متنه غرابة.

ورواه أبو يعلي (4228) عن شيبان بن فروخ، ثنا الصعق بن حزن، ثنا علي بن الحكم البناني،
عن أنس فذكر نحوه.

قال الحافظ عن هذا الإسناد بعد أن ساق للحديث أسانيد الأخرى:"هذا أجود من الأول".

وأورده الذّهبي في"العلو" (1/ 351 - 365) من عدّة طرق لا يسلم منها شيء، ثم قال:"هذه طرق يعضِّد بعضها بعضًا، رزقنا الله وإياكم لذَّة النظر إلى وجهه الكريم".

وأورده الحافظ ابن القيم في"الزاد" (1/ 367 - 371) من أوجهٍ أُخرى كثيرةٍ أيضًا، ولا يصح منها شيءٌ، وذكر له شاهدًا من حديث حذيفة، وفيه عبد الله بن عرادة الشيباني، قال فيه البخاري:"منكر الحديث". وضعَّفه غير واحد من أهل العلم.

وأمَّا ما رواه الإمام أحمد (8102): عن هاشم، ثنا الفرج بن فضالة، ثنا علي بن أبي طلحة، عن أبي هريرة قال: قيل للنبي صلى الله عليه وسلم: لأيِّ شيءٍ سمِّي يوم الجمعة؟ قال:"لأنَّ فيها طُبعت طينة أبيك آدم، وفيها الصعقة، والبعثة، وفيها البطشة، وفي آخر ثلاث ساعات منها ساعة من دعا الله عز وجل فيها استُجيب له". فهو ضعيف، لضعف الفرج بن فضالة، وعلي بن ابي طلحة لم يُدرك أبا هريرةَ، فهو مع ضعفه منقطعٌ.

وفي الباب أحاديث أخرى، منها: عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ في الجمعة الساعة لا يوافقها مسلم يسأل الله فيها خيرًا إلَّا أعطاه إياه".

رواه البزَّار (666) عن عبد ربِّه بن خالدٍ، ثنا فُضَيل بن سليمان، عن عبد الله بن محمد بن عمر ابن علي، عن أبيه، عن جده عن علي بن أبي طالبٍ، فذكره. وشيخ البار فيه لم يُوثّقه أحدٌ، وذكره ابن حبَّان في"الثقات"، وقد روى عنه جمعٌ منهم البزار وابن ماجة.

وأمّا ما رُوي"أفضل الأيام يوم عرفة وافق يوم الجمعة، وهو أفضل من سبعين حجّة في غير يوم جمعة" فهو لا أصل له، أورده ابن الأثير في"جامع الأصول" (6867). -تحقيق أيمن صالح- وعزاه إلى رزين.

ورزين هو ابن معاوية بن عمار الأندلسيّ السرقسطيّ المتوفى سنة خمس وثلاثين وخمس مائة بمكة، وصفه الذهبي في"سير أعلام النبلاء" (20/ 204) بأنه الإمام المحدِّث الشهير صاحب كتاب"تجريد الصحاح" وكان إمام المالكين بالحرم.

وقال ابن الأثير في"مقدمة جامع الأصول" (1/ 48 - 50): جمع بين كتب البخاري، ومسلم، والموطأ لمالك، وجامع الترمذي، وسنن أبي داود، وسنن أبي عبد الرحمن النسائي رحمة الله عليهم".

وهو الذي بني عليه الحافظ ابن الأثير كتابه"جامع الأصول" ولكن كما يقول الحافظ الذهبي:"أدخل في كتابه زيادات واهية، لو تنزه عنها لأجاد".

وهذا الحديث من هذا القبيل.

وقد حاول أئمة الحديث الوقوف على إسناد هذا الحديث فلم يقفوا عليه.
قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 65) بعد أن بيّن مزية وقفة يوم الجمعة من عشرة وجوه بقوله:"وأما ما استفاض على ألسنة العوام بأنها تعدل اثنتين وسبعين حجة فباطل لا أصل له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا عن أحد من الصحابة والتابعين".

وقال الحافظ في"الفتح" (8/ 371) بعد أن عزاه لرزين في رفعه:"لا أعرف حاله؛ لأنه لم يذكر صحابيه، ولا من خرّجه".

وقال الحافظ ابن ناصر الدين الدمشقي في جزء"فضل يوم عرفة":"حديث وقفة الجمعة يوم عرفة أنها تعدل اثنتين وسبعين حجة حديث باطل لا يصح، وكذلك لا يثبت ما رُوي عن زر بن حبيش أنه أفضل من سبعين حجّة في غير يوم جمعة" نقلًا من الشيخ الألباني رحمه الله تعالى في"السلسلة الضعيفة" (31




আবদুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম—আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উপবিষ্ট ছিলেন—আমরা আল্লাহর কিতাবে দেখতে পাই যে, জুমু'আর দিনে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে, যখন কোনো মুমিন বান্দা সালাত আদায় করা অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, তখন আল্লাহ তার প্রয়োজন অবশ্যই পূরণ করে দেন।

আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে ইশারা করে বললেন: "অথবা মুহূর্তের কিছু অংশ।" তখন আমি বললাম: আপনি সত্য বলেছেন, অথবা মুহূর্তের কিছু অংশ।

আমি বললাম: সেটি কোন মুহূর্ত? তিনি বললেন: "দিনের শেষ মুহূর্তগুলো।"

আমি বললাম: সেটি তো সালাতের সময় নয়।

তিনি বললেন: "অবশ্যই। কোনো মুমিন বান্দা যখন সালাত আদায় করে এবং [এরপর] বসে থাকে, আর সালাত ছাড়া অন্য কিছু তাকে আটকে না রাখে, তবে সে সালাতেই থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3128)


3128 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إنَّ من أفضل أيامكم يوم الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول الله! كيف تُعرض صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنَّ الله عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".

صحيح: رواه أبو داود (1047) والنسائي (1347) وابن ماجة (1636) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره.

وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (1733) وابن حبان (910) والحاكم (1/ 278) فأخرجوه من طريق عبد الرحمن بن يزيد به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه" بل هو على شرطهما عنده، فقد أخرجا لجميع رواته، إلَّا أنَّ البخاري لم يخرج لأبي الأشعث الصنعاني (واسمه: شرحبيل بن آدة) إلَّا تعليقًا، والحاكم لا يُفرِّق بين الإخراج للراوي تعليقًا أو متابعة، أو أصالة.

وصحّحه النووي في"الأذكار" (97).

وقد أُعلَّ هذا الحديث بما لا يقدح في صحَّه. انظر:"جلاء الأفهام" (66، 67).

وقوله:"وفيه الصعقة": أي الغشي والموت.

وفي الباب عن أبي أُمامة مرفوعًا:"أكثروا علىَّ الصلاة في كل يوم جمعةٍ؛ فإنَّ صلاة أمَّتي تُعرض عليَّ في كلِّ يوم جمعة، فمن كان أكثرهم عليَّ صلاة كان أقربهم منَّي منزلة".

رواه البيهقي (3/ 249) عن علي بن أحمد بن عبدان، أنبأنا أحمد بن عبيد، ثنا الحسين بن
سعيد، ثنا إبراهيم بن الحجاج، ثنا حماد بن سلمة، عن برد بن سنان، عن مكحول الشامي، عن أبي أمامة، فذكره.

وبرد بن سنان هو الشامي، لا السمرقندي، وثَّقه يحيى بن معين، والنسائي، وقال أبو زرعة:"لا بأس به". ولكن تكلَّم فيه ابن المديني إلَّا أنَّه لا ينزل عن درجة"صدوق" كما في"التقريب".

ولكن فيه علَّة أخرى، وهي الانقطاع؛ فإنَّ مكحولًا لم يسمع من أبي أمامة شيئًا؛ ولذا حكم عليه أكثر أهل العلم بالانقطاع؛ إلَّا أنَّ المنذريّ قال:"رواه البيهقي بإسناد حسن، إلَّا أنَّ مكحولًا قيل: لم يسمع من أبي أمامة". كذا قال في"الترغيب" (2600). وهو الصواب. انظر"المراسيل" (212) لابن أبي حاتم.

وعن أنسٍ مرفوعًا:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّه أتاني جبريل آنفًا من ربِّه عز وجل فقال: ما على الأرض من مسلم يصلي عليك مرة واحدة إلَّا صلَّيتُ أنا وملائكتي عليه عشرًا".

وفي رواية:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّ صلاتكم تُعرض عليَّ".

الرواية الأولى رواه الطبراني من طريق أبي ظلالٍ، عن أنسٍ."جلاء الأفهام" (73). قال المنذري في"الترغيب" (2585):"رواه الطبراني عن أبي ظلال، وأبو ظلال وُثِّق، ولا يضرُّ في المتابعات".

قلت: وأبو ظلال هو هلال بن ميمون القسملي، مشهور بكنيته، جمهور أهل العلم على تضعيفه، وفي"التقريب":"ضعيف".

وأما ابن حبان؛ فذكره في"الثقات" (5/ 504).

والرواية الثانية من طريق جبارة بن مُغلِّس، حدّثنا أبو إسحاق خازم، عن يزيد الرقاشي، عن أنس، فذكره. ومن طريقه رواه ابن عدي في الكامل (3/ 944). وفيه سلسلة الضعفاء، وهم: جُبارة بن مُغلِّس، وشيخه أبو إسحاق خازم، وشيخه يزيد الرقاشي.

وعن أبي الدرداء مرفوعًا:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّه مشهود؛ تشهده الملائكة، وإنَّ أحدًا لن يُصلِّي عليَّ إلَّا عُرضت عليَّ صلاته حتَّى يفرغ منها". قال: قلت: وبعد الموت؟ قال:"وبعد الموت، إنَّ الله حرَّم على الأرض أن تأكلَ أجساد الأنبياء فنبيُّ الله حيٌّ يرزق".

رواه ابن ماجة (1637) عن عمرو بن سوَّاد المصري، قال: حدّثنا عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أيمن، عن عبادة بن نُسَي، عن أبي الدرداء، فذكره.

أورده المنذري في"الترغيب" (2599)، وقال:"رواه ابن ماجة بإسنادٍ جيد".

قلت: ليس بجيِّد، قال البوصيري في"الزوائد":"هذا إسناد رجاله ثقات إلَّا أنَّه منقطع في موضعين؛ عبادة بن نُسي روايته عن أبي الدرداء مرسلةٌ، قاله العلائي. وزيد بن أيمن عن عبادة بن نُسي مرسلة. قاله البخاري".

وقال العراقي:"إسناده لا يصح".
وعن أبي مسعود الأنصاري، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعًا:"أكثروا علىَّ الصلاة في يوم الجمعة، فإنَّه ليس أحد يصلي عليَّ يوم الجمعة إلَّا عُرضت عليَّ صلاته".

رواه الحاكم (2/ 421) عن أبي بكر بن إسحاق الفقيه، أنبأنا أحمد بن علي الأبار، ثنا أحمد ابن عبد الرحمن بن بكار الدمشقي، ثنا الوليد بن مسلم، حدثني أبو رافع، عن سعيد المقبري، عن أبي مسعود الأنصاري، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد؛ فإنَّ أبا رافع هذا هو إسماعيل بن رافع". وتعقبه الذهبي فقال:"ضعَّفوه".

قلت: إسماعيل بن رافع هذا جمهور أهل العلم، منهم الإمام أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، والدارقطني، والعجلي، وابن حبان، وغيرهم مطبقون على تضعيفه.

وفي الباب أحاديث أُخرى وكلُّها معلولة، إلَّا أنَّ مجموعها تدلُّ على أثر له أصلًا.

معنى الحديث: هذا الحديث لا يفهم منه، ولا يستدل به على حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم حياةً حقيقية؛ وإنَّما يدل على أنَّ من صلَّى عليه من أُمَّته تبلغه، وتُعرض عليه؛ لأنَّ الله ملائكةً سيَّاحين في الأرض، يبلغونه سلام أمَّته؛ لأنَّه لم يثبت في شيء من الحديث أنَّه يسمع صوت المصلِّي عليه والمسلم بنفسه؛ إنَّما فيه أنَّ ذلك يُعرض عليه، ويبلغه، سواء صلَّى عليه وسلَّم في مسجده، أو مدينته، أو مكان آخر. انظر للمزيد"الصارم المنكي" لابن عبد الهادي (14




আওস ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিঃসন্দেহে তোমাদের দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুম্মার দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এই দিনেই তাঁকে উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে (মৃত্যু হয়েছে), এই দিনেই (শিঙ্গায়) ফুঁক দেওয়া হবে এবং এই দিনেই (মানুষ) বেহুঁশ হয়ে যাবে (বা মৃত্যুর সম্মুখীন হবে)। অতএব, এই দিনে তোমরা আমার প্রতি বেশি করে সালাত (দরূদ) পাঠ করো, কারণ তোমাদের সালাত আমার কাছে পেশ করা হয়।" (রাবী বলেন:) সাহাবাগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কিভাবে আমাদের সালাত আপনার কাছে পেশ করা হবে, অথচ আপনি তো জীর্ণ হয়ে যাবেন?" (অর্থাৎ, আপনি তো মিশে যাবেন?) তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা নবীদের দেহ মাটির জন্য হারাম করে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3129)


3129 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"الصلاة -وفي رواية: الصلوات- الخمس، والجمعة إلى الجمعة كفارة لما بينهنَّ ما لم تُغشَ الكبائر".

وزاد في رواية:"ورمضان إلى رمضان مكفِّرات".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (233) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، أخبرني العلاء بن عبد الرحمن -مولى الحُرَقة- عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وستأتي بقية الأحاديث في جامع آداب يوم الجمعة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচ ওয়াক্ত সালাত – এবং অন্য এক বর্ণনায়: সালাতসমূহ – এবং এক জুমু‘আহ থেকে পরবর্তী জুমু‘আহ এর মধ্যবর্তী সময়ের জন্য কাফ্ফারা (গুনাহ মোচনকারী), যতক্ষণ পর্যন্ত সে কবীরা গুনাহে লিপ্ত না হয়।”
আর এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: “আর এক রমযান থেকে অপর রমযান পর্যন্তও (গুনাহ মোচনকারী)।”









আল-জামি` আল-কামিল (3130)


3130 - عن سلمان الفارسي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتدري ما يوم الجمعة؟". قلت: الله ورسوله أعلم. ثمَّ قال:"أتدري ما يوم الجمعة؟". قلت: نعم -قال: لا أدري زعم سأله الرابعة أم لا-، قال: قلت: هو اليوم الذي جُمِع فيه أبوه، أو أبوكم، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألا أحدِّثك عن يوم الجمعة؟ ! لا يتطهَّر رجل مسلمٌ ثمَّ يمشي إلى المسجد، ثمَّ يُنصت حتَّى يقضي الإمام صلاته إلَّا كان كفَّارةً لما بينها وبين الجمعة التي بعدها ما اجتنبت المَقْتَلة".
حسنٌ: رواه أحمد (23729) والطبراني في"الكبير" (6089)، كلاهما من طريق إبراهيم، عن علقمة، عن قَرْثَع الضبي، عن سلمان.

وإسناده حسن؛ من أجل قُرْثَع الضبي؛ فإنَّه"صدوق" كما في"التقريب".

وصحَّحه ابن خزيمة (1732) والحاكم (1/ 277) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد، واحتجَّ الشيخان بجميع رواته غير قَرْثَع، سمعت أبا علي يقول: أردت أن أجمع مسانيد قَرْثَع الضبي؛ فإنَّه من زهاد التابعين، فلم يسند تمام العشرة". انتهي.

ولكن قال ابن حبان في"المجروحين" (2/ 211) عن قَرْثَع:"روي أحاديثَ يسيرةً خالف فيها الأثبات، لم تظهر عدالته فيُسلك به مَسلك العدول حتَّى يُحتَجَّ بما انفرد، ولكن عندي: يستحقُّ مجانبة ما انفرد من الروايات؛ لمخالفته الأثبات".

قلت: ليس في حديثه هذا ما يخالف الثقات من الرواة عن سلمان، بل لحديثه هذا شواهد تشهد له.

قوله:"مقتلة": أي ما لم يُصب مقتلة، وهي من الكبائر. وقد ثبت في الأحاديث الصحيحة أنَّ الصغائر تكفر بالصلوات الخمس، والجمعة لمن اجتنب الكبائر.

وأما ما روي عن أبي مالك الأشعريّ مرفوعًا:"الجمعة كفارة لما بينها وبين الجمعة التي قبلها، وزيادة ثلاثة أيام، وذلك بأن الله عز وجل قال: {مَنْ جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا}" فقيه انقطاع وضعف.

رواه الطبراني في"الكبير" (3/ 338) عن هاشم، ثم قال: ثنا محمد، حدثني أبي، حدثني ضمضم، عن شريح، عن أبي مالك، فذكر الحديث.

ومحمد هو ابن إسماعيل بن عياش ضعيف، وقال أبو حاتم:"لم يسمع من أبيه شيئًا" انظر: مجمع الزوائد (2/ 173، 174).

وشريح هو ابن عبيد بن شريح الحضرمي الحمصي، قال ابن أبي حاتم في"المراسيل":"ويروي عن أبي مالك مرسلًا".

وقد قيل لمحمد بن عوف: هل سمع أحدًا من الصحابة؟ قال: ما أظن؛ لأنه لا يقول في شيء من ذلك:"سمعت" وهو ثقة.




সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি কি জানো জুমু'আর দিন কী?” আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। এরপর তিনি আবার বললেন: “তুমি কি জানো জুমু'আর দিন কী?” আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি (সালমান) বললেন: আমি বললাম, এটি সেই দিন যেদিন তার পিতাকে, অথবা তোমাদের পিতাকে (আদমকে) একত্রিত করা হয়েছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি কি তোমাকে জুমু'আর দিন সম্পর্কে বলব না?! যখন কোনো মুসলিম ব্যক্তি পবিত্রতা অর্জন করে, তারপর মসজিদে যায়, অতঃপর ইমাম সালাত শেষ করা পর্যন্ত নীরব থাকে, তখন তা তার এবং পরবর্তী জুমু'আর মধ্যবর্তী সময়ের (গুনাহসমূহের) জন্য কাফ্ফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে গুরুতর পাপ (যেমন নরহত্যা) থেকে বিরত থাকে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3131)


3131 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان يوم الجمعة كان على كل باب من أبواب المسجد ملائكة يكتبون: الأول فالأول، فإذا جلس الإمام طووا الصحف، وجاؤا يستمعون الذكر. ومثل المُهجِّر كمثل الذي يُهدي البدنة، ثمَّ كالذي يُهدي بقرةً، ثمَّ كالذي يُهدي الكبش، ثمَّ كالذي يُهدي الدجاجة، ثمَّ كالذي
يُهدي البيضةَ".

متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (929) ومسلم في الجمعة (850) كلاهما من حديث ابن شهاب، أخبرني أبو عبد الله الأغر، عن أبي هريرة، فذكر الحديثَ. واللفظ لمسلمٍ، ولفظ البخاري قريب منه، وفيه تقديم وتأخير.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন জুমু‘আর দিন হয়, তখন মসজিদের প্রত্যেক দরজায় ফেরেশতারা থাকেন। তাঁরা (আগমনকারীদের) লিখতে থাকেন: প্রথমজন, তারপরের জন (এভাবে)। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসেন, তখন তাঁরা দপ্তরগুলো বন্ধ করে দেন এবং এসে যিক্‌র (খুতবা) শুনতে থাকেন। আর যে ব্যক্তি (প্রথম ভাগে) আসে, তার দৃষ্টান্ত হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি উট কোরবানি করে। এরপর যে ব্যক্তি আসে, সে যেন একটি গাভী কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি মেষ কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি মুরগি কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি ডিম দান করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3132)


3132 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من اغتسل يوم الجمعة غسل الجنابة ثمَّ راح في الساعة الأولى فكأنَّما قرَّب بدنةً، ومن راح في الساعة الثانية فكأنَّما قرَّب بقرةً، ومن راح في الساعة الثالثة فكأنَّما قرَّب كبشًا أقرن، ومن راح في الساعة الرابعة فكأنَّما قرَّب دجاجةً، ومن راح في الساعة الخامسة فكأنَّما قرَّب بيضة، فإذا خرج الإمام حضرت الملائكة يستمعون الذكر".

متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (1) عن سُمَيِّ مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في الجمعة (881) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الجمعة (850) عن قتيبة ابن سعيد، كلاهما عن مالكٍ به مثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমার দিন জানাবাতের গোসলের ন্যায় গোসল করল, এরপর প্রথম মুহূর্তে (মসজিদে) গেল, সে যেন একটি উট কুরবানি করল। আর যে দ্বিতীয় মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি গরু কুরবানি করল। আর যে তৃতীয় মুহূর্তে গেল, সে যেন শিংবিশিষ্ট একটি মেষ (দুম্বা) কুরবানি করল। আর যে চতুর্থ মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি মুরগি কুরবানি করল। আর যে পঞ্চম মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি ডিম কুরবানি করল। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বেরিয়ে আসেন, তখন ফেরেশতারা যিকির (খুতবা) শোনার জন্য উপস্থিত হন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3133)


3133 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"على كل باب من أبواب المسجد ملك يكتب: الأول فالأول (مَثَّلَ الجزور، ثمَّ نزَّلهم حتَّى صغَّر إلى مثل البيضة) فإذا جلس الإمام طُوِيت الصحف، وحضروا الذكرَ".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (850/ 25) عن قتيبة بن سعيد، حدَّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن) عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديثَ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মসজিদের প্রতিটি দরজায় একজন ফেরেশতা থাকেন যিনি (সওয়াব লেখার জন্য) প্রথম আগমনকারীকে, তারপরের আগমনকারীকে লিখতে থাকেন। (প্রথমে আগমনকারীর সওয়াব যেন একটি উট কুরবানী করার সমতুল্য, তারপর ক্রমান্বয়ে তা ছোট হতে হতে ডিম দান করার মতো সওয়াব পর্যন্ত)। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসে পড়েন, তখন খাতাগুলো গুটিয়ে ফেলা হয় এবং তারা (ফেরেশতারা) যিকির (খুতবা) শুনতে উপস্থিত হন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3134)


3134 - عن علقمة، قال: خرجت مع عبد الله إلى الصلاة فوجد ثلاثةً وقد سبقوه، فقال: رابع أربعةٍ وما رابع أربعة ببعيد، إنِّي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الناس يجلسون من الله يوم القيامة على قدر رواحهم إلى الجمعات، الأول، والثاني، والثالث" ثمَّ قال: رابع أربعةٍ وما رابع أربعةٍ ببعيدٍ.

حسنٌ: رواه ابن ماجةَ (1094) عن كثير بن عبيد الحمصي، ثنا عبد المجيد بن عبد العزيز، عن معمر، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، فذكره.

وإسناده حسن؛ من أجل عبد المجيد بن عبد العزيز، فإنَّه"صدوق"، ورُمي بالإرجاء كما في"التقريب". وقد أخرج له مسلم مقرونًا. وحسَّنه الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب".

وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (1/ 364):"هذا إسناد فيه مقال، عبد المجيد هو ابن عبد العزيز بن أبي روَّاد، وإن أخرج له مسلم في صحيحه فإنَّما أخرج له مقرونًا بغيره، فقد كان شديد
الإرجاء، داعيةً إليه، لكن وثقه الجمهور: أحمد، وابن معين، وأبو داود، والنسائي، وليَّنه أبو حاتم، وضعَّفه ابن حبان، وباقي رجال الإسناد ثقات، فالإسناد حسن، ورواه ابن أبي عاصم من هذا الوجه بإسناد حسن، ورواه الطبراني في الكبير، من حديث عبد الله بن مسعود أيضًا".




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলক্বামা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সালাতের জন্য বের হলাম। তিনি দেখলেন, তিনজন লোক তাদের আগেই চলে গেছে। তখন তিনি বললেন: (আমরা হলাম) চারজনের মধ্যে চতুর্থ, আর চারজনের মধ্যে চতুর্থ হওয়াও খুব দূরের নয়। নিশ্চয় আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় কিয়ামতের দিন মানুষ জুম'আর সালাতের জন্য তাদের (মসজিদে) দ্রুত গমনের পরিমাণের উপর ভিত্তি করে আল্লাহর নিকট উপবিষ্ট হবে, (তাঁরা হলো) প্রথম, দ্বিতীয় এবং তৃতীয় (শ্রেণিভুক্ত ব্যক্তিগণ)।” এরপর তিনি বললেন: (আমরা হলাম) চারজনের মধ্যে চতুর্থ, আর চারজনের মধ্যে চতুর্থ হওয়াও খুব দূরের নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3135)


3135 - عن أبي سعيد الخدري، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنَّه قال:"إذا كان يوم الجمعة قعدت الملائكة على أبواب المسجد، فيكتبون الناس من جاء من الناس على منازلهم، فرجل قدَّم جزورًا، ورجل قدَّم بقرةً، ورجل قدَّم شاةً، ورجل قدَّم دجاجةً، ورجلٌ قدَّم عصفورًا، ورجلٌ قدَّم بيضةً. قال: فإذا أذَّن المؤذِّن وجلس الإمام على المنبر، طُوِيت الصحف، ودخلوا المسجد يستمعون الذكر".

حسن: رواه الإمام أحمد (11769) ثنا يعقوب، ثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني العلاء ابن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي سعيد، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، وقد صرَّح بالتحديث، وهو حسن الحديث، وكذلك العلاء بن عبد الرحمن أيضًا لا ينزل حديثه عن درجة الحسن.

وشيخ الإمام أحمد: يعقوب، هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري.

قال الهيثمي:"رواه أحمد ورجاله ثقات".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন জুমুআর দিন আসে, তখন ফেরেশতারা মসজিদের দরজাসমূহে বসে যান। অতঃপর তারা আগত লোকদের তাদের (সওয়াবের) স্তর অনুযায়ী লিখে রাখেন। প্রথম ব্যক্তি (যেন) একটি উট কোরবানি করলো, দ্বিতীয় ব্যক্তি একটি গরু কোরবানি করলো, তৃতীয় ব্যক্তি একটি ছাগল কোরবানি করলো, চতুর্থ ব্যক্তি একটি মুরগি কোরবানি করলো, পঞ্চম ব্যক্তি একটি চড়ুই পাখি কোরবানি করলো, এবং ষষ্ঠ ব্যক্তি একটি ডিম কোরবানি করলো। (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর যখন মুয়াজ্জিন আযান দেন এবং ইমাম মিম্বরে বসেন, তখন (ফেরেশতারা) দফতরগুলো গুটিয়ে নেন এবং মসজিদে প্রবেশ করে যিকির (খুতবা) শুনতে থাকেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3136)


3136 - عن أبي أُمامةَ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تقعد الملائكة على أبواب المساجد يوم الجمعة، فيكتبون الأول، والثاني، والثالث، حتَّى إذا خرج الإمام رُفِعت الصحف".

حسن: رواه الإمام أحمد (22242) والطبراني في الكبير (8102) كلاهما من طريق زيد، حدثني حسين، حدثني أبو غالب، حدثني أبو أُمامة، فذكر الحديثَ.

وإسناده حسن من أجل أبي غالب، واسمه: خَزَوَّر، وهو كما قال الذهبي:"صالح الحديث، وصحَّح له الترمذي". وقال الحافظ في"التقريب":"صدوق يخطئ".

قلت: وحديثه هذا ليس بمنكر، بل له شواهد صحيحة ذكرتها في هذا الباب.

وفي رواية لأحمد: (22268):"تقعد الملائكة يوم الجمعة على أبواب المسجد، معهم الصحف، يكتبون الناس، فإذا خرج الإمام طُوِيت الصحف". قلت يا أبا أُمامة! ليس لمن جاء بعد خروج الإمام جمعة؟ قال: بلى، ولكن ليس ممن يُكتب في الصحف.

وفي الباب عن علي بن أبي طالب، رواه أبو داود (1051): عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا عيسي، ثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، قال: حدثني عطاء الخراساني، عن مولى امرأته أمِّ عثمان قال: سمعت عليًّا رضي الله عنه على منبر الكوفة يقول:"إذا كان يوم الجمعة غدت
الشياطين براياتها إلى الأسواق، فيرمون الناس بالترابيث، أو بالربائث، ويثبطونهم عن الجمعة، وتغدو الملائكة فيجلسون على أبواب المساجد، فيكتبون الرجل من ساعة، والرجل من ساعتين، حتى يخرج الإمام، فإذا جلس الرجل مجلسًا يستمكن فيه من الاستماع والنظر، فأنصت ولم يلغُ، كان له كِفلان من أجرٍ، فإن نأي وجلس حيث لا يسمع فأنصت ولم يلغ كان له كِفلٌ من أجرٍ، وإن جلس مجلسًا يستمكن فيه من الاستماع والنظر فلغا ولم يُنصت كان له كفلٌ من وزرٍ، ومن قال يوم الجمعة لصاحبه: صهٍ فقد لغا، ومن لغا فليس له من جمعته تلك شيءٌ". ثمَّ يقول في آخر ذلك: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك.

رواه الإمام أحمد (719) من وجه آخر عن عطاء الخراساني به.

وفيه مولى امرأته وهو"مجهولٌ" كما في"التقريب".

وقوله:"يرمون الناس بالترابيث أو الربائث": من ربَثَه عن حاجته إذا حبسه، والمراد: أي ذكَّروهم الحوائج التي تربُثُهم.

وأمَّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"تُبعث الملائكة على أبواب المسجد يوم الجمعة يكتبون مجيءَ الناس، فإذا خرج الإمام طُوِيت الصحف، ورُفِعت الأقلام، فتقول الملائكة بعضهم لبعض: ما حبس فلانًا؟ فتقول الملائكة: اللهمَّ: إن كان ضالًّا فاهده، وإن كان مريضًا فاشفه، وإن كان عائلًا فاغنه".

رواه ابن خزيمة (1771) والبيهقي (3/ 226) من طريق مطر، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده.

ومطر هو ابن طهمان الوراق، مختلفٌ فيه، فضعَّفه يحيى بن سعيد القطَّان، والإمام أحمد، وابن معين، والنسائي وابن سعد، وأبو داود، والعقيلي، والدارقطني، وقال أبو زرعة وأبو حاتم:"صالح الحديث". وقال البزار:"ليس به بأس". وقال ابن عدي:"وهو مع ضَعفه يُجمع حديثه ويُكتب".

قلت: لعلَّ هذا الحديث ما أخطأ فيه؛ فقد انفرد بروايته هكذا بهذا الإسناد. وقد ورد عدة أحاديث ثابتة في الوعيد الشديد لمن تخلَّف عن الجمعة لا الدعاء لهم.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "জুমু‘আর দিন ফেরেশতাগণ মসজিদের দরজাসমূহে অবস্থান করেন, এবং তারা প্রথম, দ্বিতীয় এবং তৃতীয় ব্যক্তির নাম লিখতে থাকেন। অবশেষে, যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বের হন, তখন সহীফাসমূহ তুলে নেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3137)


3137 - عن أوس بن أوسٍ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من غسَّل يومَ الجمعةِ واغتسلَ، وبكَّر وابتكرَ، ومشي ولم يركب، ودنا من الإمام فاستمع ولم يلغُ، كان له بكلِّ خُطوَةٍ عمل سنةٍ، أجر صيامِها وقيامها".

وفي رواية:"من غسَّل رأسه يومَ الجمعةِ واغتسلَ".

صحيح: رواه أبو داود (345) والترمذي (496) والنسائي (1381) وابن ماجة (1087) كلُّهم
من طريق أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس الثقفي، فذكره.

وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (1767) وابن حبان (27881) والحاكم (1/ 281 - 282) كلهم من طريق أبي الأشعث الصنعاني.

والرواية الثانية رواها أبو داود (346) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن عُبادة بن نُسي، عن أوس الثقفي، فذكره.

وإسناده صحيح، رجاله ثقات، وإن قال الحافظ ابن حجر في سعيد بن أبي هلالٍ إنَّه"صدوق". إلَّا أنَّه ثقة على الأرجح؛ فقد وثَّقه جماهير الأئمَّة، وأخرج له الشيخان في صحيحيهما، وبقية أصحاب السنن.

قال الحاكم -بعد ما ساق أسانيد هذا الحديث-:"قد صحَّ هذا الحديث بهذه الأسانيد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وأظُنَّه لحديثٍ واهٍ، لا يُعلَّ مثل هذه الأسانيد بمثله. ثمَّ ذكر ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من غسَّل واغتسلَ، ودنا وابتكر، واستمع، كان له بكلِّ خطوةٍ يخطوها قيام سنةٍ وصيامها". وهو حديث ضعيفٌ، في إسناده عثمان الشامي، لم يروِ عنه إلَّا ثور بن يزيد، ولم يقل فيه توثيقٌ لأحدٍ.

رواه أحمد (6954)، عن روح، ثنا ثور بن يزيد، عن عثمان الشامي، أنَّه سمع أبا الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

قال الحاكم:"عثمان الشامي مجهول".

وقال البيهقي في"السنن الكبرى" (3/ 227):"الوهم في إسناد هذا الحديث ومتنه من عثمان الشامي هذا، والصحيح رواية الجماعة: عن الأشعث، عن أوس، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم. والله أعلم".



وشهِد جنازةً، وشهد نِكاحًا، وجبت له الجنَّة".

فهو ضعيف؛ رواه الطبراني في"الأوسط" (951 - مجمع البحرين). وفي إسناده محمد بن حفص، وهو ضعيف، وقد انفرد بهذا، قال الطبراني:"لم يروه عن حريز إلَّا محمد". يعني ابن حفص الأوصابي، أو الوصابي.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من زار قبر أبويه، أو أحدهما كلّ جمعة غُفر له، وكتب بَرًّا".

رواه الطبراني في"الأوسط" و"الصغير" -"مجمع البحرين" (1329) - عن محمد بن أحمد ابن النعمان بن شبل البصري، ثنا أبي، حدثني عم أبي محمد بن النعمان بن عبد الرحمن، عن يحيي بن العلاء البجلي، عن عبد الكريم أبي أُميّة، عن مجاهد، عن أبي هريرة، فذكره.

وفيه سلسلة من الضعفاء والمجاهيل؛ محمد بن النعمان، وشيخه يحيي بن العلاء، وشيخه عبد الكريم كلهم ضعفاء، بل قد اتهم يحيى بن العلاء البجليّ.

وقد ضعّفه أيضًا الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 59، 60) ولكن من جهة عبد الكريم أبي أمية فقط، وهو ابن أبي المخارق.



نسخة (أ)، والبيهقي في"شعب الإيمان" (2/ 472).

وقال الذهبي:"وقفه أصح".

ومع وقفه فقد روي بألفاظ مختلفة ذكر بعضها المستغفريّ في فضائل القرآن.

وفي الباب ما رواه ابن مردويه، ومن طريقه الضياء المقدسي في"المختارة" (2/ 50) من حديث عبد الله بن مصعب بن منظور بن زيد بن خالد الجهني من وجهين عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وعن علي بن الحسين، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولفظه:"من قرأ سورة الكهف يوم الجمعة فهو معصوم إلى ثمانية أيام من كل فتة تكون، فإن خرج الدجال عُصم منه".

قال الضياء المقدسي:"عبد الله بن مصعب لم يذكره البخاري ولا ابن أبي حاتم في كتابيهما".

وأورده الحافظ ابن كثير في"التفسيره" (3/ 131) وسكت عليه، فالظاهر -والله أعلم- أنَّه لم يقف أيضًا على ترجمة عبد الله بن مصعب بن منظور فهو مجهول.

ورواه المستغفري في"فضائل القرآن" (817) من حديث أبي هريرة، وابن عباس بأطول منه وفيه إسماعيل بن أبي زياد الشامي. قال الدارقطني: كان يضع الحديث.

وكذلك لا بصح ما رُوي عن ابن عمر، ولفظه:"من قرأ سورة الكهف في يوم الجمعة سطع له نور من تحت قدمه إلى عنان السماء، يضيء له يوم القيامة، وغُفر له ما بين الجمعتين".

أخرجه ابن مردويه في تفسيره، من طريق محمد بن خالد الختلي كما قال ابن عراق في"تنزيه الشريعة" (1/ 302)، والضياء المقدسي في أحكامه (2/ 389، 390)، ومحمد بن خالد الختلي قال ابن الجوزي في"الموضوعات":"كذَّبوه". وقال ابن مندة:"صاحب مناكير". ذكره الذهبي في"الميزان" (3/ 534)، وأورد الحديث المذكور من طريقه.

وأورده الحافظ ابن كثير في تفسيره، وقال:"رواه الحافظ أبو بكر بن مردويه في تفسيره بإسناد له غريب". وهذا الحديث في رفعه نظر، وأحسن أحواله الوقف.

وقال ابن الملقن في"تحفة المحتاج" (1/ 523):"رواه الضياء في أحكامه (2/ 390) من حديث ابن مردويه أحمد بن موسي، بسندٍ فيه من لا أعرفه".

وأما قول المنذري في"الترغيب":"رواه أبو بكر بن مردويه في تفسيره بإسنادٍ لا بأس به" ففيه نظرٌ.

وقد جاء في الصحيح في فضل قراءة فواتح سورة الكهف، وستأتي في فضائل القرآن.

وعن أبي أمامة ولفظه:"من قرأ {حم} الدخان في ليلة الجمعة بنى الله له بها بيتًا في الجنة".

رواه الطبراني في"الكبير" وفيه فضال بن جبير، ضعيف جدًّا. قاله الهيثمي في"المجمع" (2/ 168).

وعن ابن عباس ولفظه:"من قرأ السورة التي يذكر فيها (آل عمران) يوم الجمعة، صلى الله عليه، وملائكته حتَّى يغيب الشمس"."مجمع البحرين" (953). وفيه سلسلة من الضعفاء والمجاهيل.
هذه الأحاديث أوردها الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب"، وقال في بعضها:"إسناد جيد". وفي كلامه هذا نظر.

وكذلك ما رُوي عن عائشة بلفظ:"من قرأ سورة الكهف يوم الجمعة غُفر له ما بينه وبين الجمعة، وزيادة ثلاثة أيام، ومن قرأ الخمس الأواخر منها عند نومه بعثه الله أي الليل شاء". رواه ابن مردويه في تفسيره بإسناد ضعيف جدًّا كما قال ابن عراق في التنزيه الشريعة".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من قرأ حم الدخان في ليلة الجمعة غُفر له" فهو ضعيف.

رواه الترمذي (2889) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفي، حدّثنا زيد بن حباب، عن هشام أبي المقدام، عن الحسن، عن أبي هريرة، فذكره مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وهشام أبو المقدام يضعَّف، ولم يسمع الحسن من أبي هريرة.

هكذا قال أيوب ويونس بن عبيد، وعلي بن زيد".

وأخرجه أيضًا (2888) مطلقًا بدون قيد يوم الجمعة ولفظه:"من قرأ حم الدخان في ليلة، أصبح يستغفر له سبعون ألف ملك". رواه عن سفيان بن وكيع، حدّثنا زيد بن حباب، عن عمر بن أبي خثعم، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب، لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، وعمر بن خثعم يُضعَّف؛ قال محمد: هو منكر الحديث".




আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি জুমুআর দিনে (স্ত্রীকে) গোসল করালো এবং নিজেও গোসল করলো, আর দ্রুত মসজিদে গেল ও প্রথম দিকে পৌঁছল, এবং হেঁটে গেল, কোনো বাহনে আরোহণ করলো না, আর ইমামের কাছাকাছি হলো, মনোযোগ সহকারে শুনল ও অনর্থক কথা বলল না, তার জন্য প্রতি পদক্ষেপে এক বছরের আমলের সওয়াব হবে—তার রোজা ও (রাত জাগা) ইবাদতের সওয়াব।”

অন্য এক বর্ণনায় আছে: “যে ব্যক্তি জুমুআর দিন তার মাথা ধৌত করল ও গোসল করল।”









আল-জামি` আল-কামিল (3138)


3138 - عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"ما من مسلم يموت يوم الجمعة أو ليلة الجمعة إلَّا وقاه الله فتنة القبرِ".

حسن: رواه الترمذي (1074) عن محمد بن بشار، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، وأبو عامر العقدي، قالا: حدّثنا هشام بن سعد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.

قال الترمذي:"حسن غريبٌ، وهذا حديثٌ ليس إسناده بمتصل، ربيعة بن سيف إنَّما يروي عن أبي عبد الرحمن الحُبُلِّي، عن عبد الله بن عمرو، ولا نعرف لربيعة بن سيف سماعًا من عبد الله بن عمرو".

هكذا في نسخة محمد فؤاد عبد الباقي، وفي نسخٍ أخرى:"غريبٌ" فقط. وهو الصحيح؛ لأنَّ الحُسنَ والانقطاع لا يجتمعان.

أمَّا الحديث؛ فله طرق أخرى يتقوى بها، منها ما رواه الإمام أحمد من وجهين:
أحدهما (6646): عن سريج، حدّثنا بقية، عن معاوية بن سعيد، عن أبي قُبَيل، عن عبد الله بن عمرو فذكره. وبقية مدلس وقد عنعن، لكن صرَّح بالتحديث في الوجه الثاني الذي رواه الإمام أحمد (7050) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدّثنا بقية، حدَّثني معاوية بن سعيد التجيبي، سمعت أبا قبيل المصري يقول: سمعت عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكر الحديث.

وقد صرَّح بقية في هذا الإسناد بالتحديث، كما صرح في بقية الإسناد بالسماع، فزالت بذلك تهمة التدليس، وهذا إسناد حسن؛ فإنَّ أبا قَبيلٍ المصري هو حُيي بن هانئ، قال فيه الإمام أحمد وابن معين وأبو زرعة:"ثقة". وقال أبو حاتم:"صالح الحديث".

وللحديث طرق أُخرى غير أنَّ ما ذكرته هو أصحُّها.

وفي الباب حديثان آخران ولكنهما ضعيفان، أحدهما: حديث أنس بن مالكٍ، رواه أبو يعلى (4099 - تحقيق الأثري) عن أبي معمر إسماعيل بن إبراهيم، حدّثنا عبد الله بن جعفر، عن واقد ابن سلامة، عن يزيد الرقاشي، عن أنسٍ، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من مات يوم الجمعة وُقي عذاب القبر".

وواقد بن سلامة وشيخه يزيد الرقاشي (وهو ابن أبان القاص) ضعيفان.

والثاني: حديث جابر بن عبد الله، أخرجه أبو نعيم في الحلية (3/ 155) من حديث عمر بن موسي بن الوجيه، عن محمد بن المنكدر، عن جابر نحوه. قال أبو نعيم:"غريب من حديث جابر ومحمد بن المنكدر، تفرد به عمر بن موسى، وهو مدني، فيه لين". انتهى.

وعمر بن موسى هذا أورده الذهبي في"الميزان" ونقل عن ابن عدي أنَّه قال:"هو ممن يضع الحديثَ متنًا وإسنادًا". وقال أبو حاتم:"ذاهب الحديث، كان يضع الحديث". وتكلَّم فيه أيضًا البخاري والدارقطني. فمثله لا يستشهد به.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি এটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন): "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি জুমআর দিনে অথবা জুমআর রাতে মারা যায়, আল্লাহ তাকে কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে রক্ষা করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3139)


3139 - عن محمد بن عباد بن جعفر، قال: سألت جابر بن عبد الله، وهو يطوف بالبيت: أَنَهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صيام يوم الجمعة؟ قال: نعم، وربِّ هذا البيت! .

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1984)، ومسلم في الصيام (1143) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: أخبرني عبد الحميد بن جُبير بن شيبة، أنّه أخبره محمد بن عباد بن جعفر فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري:"أنهى النبي صلى الله عليه وسلم عن صوم يوم الجمعة؟ قال: نعم".

قال البخاري: زاد غير أبي عاصم:"يعني أن ينفرد بصومه".

قلت: أبو عاصم هو الضحاك بن مخلد النبيل، شيخ البخاري.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনু আব্বাদ ইবনু জা‘ফার বলেন, আমি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করা অবস্থায় জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি জুমু‘আর দিনে সওম (রোযা) পালন করতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এই ঘরের রবের শপথ!









আল-জামি` আল-কামিল (3140)


3140 - عن جويرية بنت الحارث، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوم الجمعة، وهي صائمة،
فقال:"أصمتِ أمس؟" قالت: لا. قال:"أتريدين أن تصومي غدًا؟" قالت: لا. قال:"فأفطري"؟

صحيح: رواه البخاري في الصوم (1986) من طرق عن شعبة، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن جويرية بنت الحارث، فذكرت مثله.

وجويرية بنت الحارث من بني المصطلق أم المؤمنين كان اسمها برّة، فغيّرها النبي صلى الله عليه وسلم.

قال الحافظ في"الفتح" (4/ 234):"وليس لجويرية زوج النبي صلى الله عليه وسلم في البخاري من روايتها سوى هذا الحديث".




জুওয়ায়রিয়াহ বিনতে আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন জুমু'আর দিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর নিকট এলেন, তখন তিনি সাওম (রোযা) অবস্থায় ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি গতকাল সাওম রেখেছিলে?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তুমি কি আগামীকাল সাওম রাখতে চাও?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি সাওম ভেঙ্গে দাও (ইফতার করে নাও)।"