আল-জামি` আল-কামিল
3308 - عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يؤتى بالشهيد يوم القيامة، فيُنْصَب للحساب، ثمَّ يُؤتى بالمتصدِّق، فيُنصَب للحساب، ثمَّ يُؤتى بأهل البلاء، فلا يُنصب لهم ميزان، ولا يُنصب لهم ديوان، فيُصبُّ عليهم الأجر صبًّا، حتَّى إنَّ أهل العافية يتمنَّون أنَّ أجسادهم قرضت بالمقاريض من حُسن ثواب الله لهم".
حسن: رواه الطبراني في"الكبير" وفيه مُجَّاعة بن الزبير، وثَّقه أحمد وضعَّفه الدارقطني، قاله الهيثمي في"المجمع" (2/ 305).
قلت: إن سلم الإسناد من العلل الأخرى، ولم يكن فيه سوى الكلام في مُجاَّعة؛ فالحديث حسن، ومُجَّاعة بن الزبير هو الأزدي البصري، يُكنى أبا عُبيدة، قال فيه الإمام أحمد:"ليس به بأس في نفسه"."بحر الدم" (957). وذكره ابن عدي في"الكامل" (6/ 2420) وقال:"وهو ممن يُحتمل ويُكتب حديثه". وقال فيه شعبة:"كان صوَّامًا قوَّامًا". فمثله يحسَّن حديثه.
وأمَّا ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"يودُّ أهل العافية يوم القيامة حين يُعطى أهل البلاء الثوابَ لو أنَّ جلودهم كانت قُرِضت في الدنيا بالمقاريض"، فهو ضعيف، رواه الترمذي (2402) عن محمد ابن حميد الرازي، ويوسف بن موسى القطان البغدادي، قالا: حدَّثنا عبد الرحمن بن مِغراء أبو زهير، عن الأعمش، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكر مثله.
قال الترمذي:"حديث غريب، لا نعرفه بهذا الإسناد إلَّا من هذا الوجه. وقد روى بعضهم هذا
الحديث عن الأعمش، عن طلحة بن مصرف، عن مسروق قوله، شيئًا من هذا".
قلت: عبد الرحمن بن مغراء، أبو زهير الكوفي، قال فيه علي بن المديني:"ليس بشيءٍ، كان يروي عن الأعمش ستمائة حديث، تركناه، لم يكن بذاك". وقال ابن عدي:"وهو كما قال علي، إنَّما أنكرت على أبي زهير هذا أحاديث يرويها عن الأعمش، لا يُتابعه عليها الثقات، وله عن غير الأعمش، وهو من جملة الضعفاء الذين يُكتب حديثهم". وقال الساجي:"من أهل الصدق، فيه ضعف". ووثَّقه الخليلي، وذكره ابن حبان في"الثقات". والخلاصة أنَّه ضعيف في الأعمش، وروايته هنا عن الأعمش، ولذا أدخله ابن الجوزي في"الموضوعات".
أمَّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صدع رأسه في سبيل الله فاحتسب؛ غُفر له ما كان قبل ذلك من ذنب".
فهو ضعيف؛ رواه البزار (767 - كشف) من طريق عبد الرحمن بن زياد الأفريقي، عن عبد الله ابن يزيد، عن عبد الله بن عمرو، فذكر مثله.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 302):"وإسناده حسن".
قلت: ليس بحسن، بل ضعيف؛ لأن مداره على عبد الرحمن بن زياد الأفريقي، وهو ضعيف في حفظه عند جماهير أهل العلم.
وأورد الهيثمي في"المجمع" (2/ 302) عن عبد الله بن عمر، وعزاه إلى الطبراني في"الكبير" وقال:"إسناده حسن".
قلت: لعل هذا وهم من الهيثمي؛ فإنَّ أكثر المخرِّجين جعلوا هذا الحديث من مسند عبد الله بن عمرو من الطريق الذي ذكرته. والله أعلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের দিন শহীদকে আনা হবে এবং তাকে হিসাবের জন্য দাঁড় করানো হবে। এরপর দানশীল ব্যক্তিকে আনা হবে এবং তাকেও হিসাবের জন্য দাঁড় করানো হবে। এরপর বিপদগ্রস্তদের (আহলুল বালা) আনা হবে। তাদের জন্য কোনো (আমলের) পাল্লা স্থাপন করা হবে না এবং কোনো আমলনামাও স্থাপন করা হবে না। বরং তাদের উপর এত বেশি পরিমাণে প্রতিদান ঢেলে দেওয়া হবে যে, আল্লাহ তাআলার পক্ষ থেকে প্রদত্ত উত্তম সওয়াবের কারণে সুস্থ-স্বাভাবিক জীবনযাপনকারীরা (আহলুল আফিয়া) আকাঙ্ক্ষা করবে যে, দুনিয়াতে কাঁচি দিয়ে যদি তাদের শরীরও টুকরো টুকরো করে কাটা হতো।"
3309 - عن عطاء بن أبي رباح قال: قال لي ابن عباس: ألا أُريك امرأةً من أهل الجنَّة؟ قلت: بلى. قال: هذه المرأة السوداء، أتت النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: إنِّي أُصرع، وإنِّي أتكشَّف، فادع الله لي، قال:"إن شئتِ صبرتِ ولك الجنَّة، وإن شئت دعوتُ الله أن يُعافيكِ". فقالت: أصبر. فقالت: إنِّي أتكشَّف، فادع الله أن لا أتكشَّف، فدعا لها.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5652) ومسلم في البر والصلة (2576) كلاهما من طريق عمران أبي بكر، قال: حدثني عطاء بن أبي رباح، فذكره.
وأخرجه البخاري من طريق أخرى، قال: حدَّثنا محمد (هو ابن سلام) أخبرنا مخلد، عن ابن جريج، أخبرني عطاء، أنَّه رأى أم زُفر، تلك المرأة الطويلة السوداء على سِتر الكعبة. هذا هو الصحيح أنَّ هذه المرأة الحبشية السوداء الطويلة تُكنى بأمِّ زُفَر، هكذا رواه الثقات عن عطاء، ورواه
عمر بن قيس، عن عطاء، فصحَّفها، فقال: عن أم فريع، قالت: أتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: إنِّي امرأة أُغْلب على عقلي، فقال:"ما شئتِ، إن شئتِ دعوتُ الله لك، وإن شئتِ تصبرين وقد وجبت لك الجنَّة". فقالت له: أصبر.
أخرجه الطبراني والخطيب من طريقه. قال الحافظ:"وسنده إلى عمر بن قيس ضعيف أيضًا، وقد شذَّ مع التصحيف في جعله الحديث من رواية عطاء عنها، وإنَّما رواه عطاء عن ابن عباس". انتهى. انظر"الإصابة" (4/ 453).
وقيل: إنَّ اسمها:"سُعيرة" -بالتصغير ضبطها المستغفري، وأخرج من طريق عطاء الخراساني، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، أنَّه قال له: ألا أريك امرأةً من أهل الجنَّة؟ فأراني حبشيةً صفراء عظيمة. هذه شعيرة الأسدية، ثمَّ ذكر قصَّتها. أخرجه أبو موسى من طريق المستغفري، ثمَّ من رواية محمد بن إسحاق بن خزيمة، عن المقدام بن داود، عن علي بن سعيد، عن بشر بن ميمون، عن عطاء الخراساني به. وفيه تفاصيل أخرى.
قال محمد بن إسحاق بن خزيمة: أنا أبرأ إلى الله تعالى عن عهدة هذا الإسناد. انظر أيضًا"الإصابة" (4/ 329).
قوله:"على سِتر الكعبة": أي متعلقة بأستار الكعبة. وقيل: كانت تفعل ذلك إذا خشيت أن يأتيها الصرع. وقد جاء التصريح بهذا في رواية البزار.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (তাঁর ছাত্র) আতা ইবনু আবি রাবাহকে বললেন: আমি কি তোমাকে একজন জান্নাতী নারী দেখাবো না? আতা বললেন: অবশ্যই। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই কালো মহিলাটি। সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বললো: আমি মৃগী রোগে (বা আছরে) আক্রান্ত হই এবং (আক্রান্ত হওয়ার সময়) আমার আবরণ খুলে যায়। তাই আপনি আমার জন্য আল্লাহর কাছে দোয়া করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি চাও, ধৈর্য ধারণ করো, এর বিনিময়ে তোমার জন্য জান্নাত রয়েছে। আর যদি তুমি চাও, আমি আল্লাহর কাছে দোয়া করবো যেন তিনি তোমাকে আরোগ্য দান করেন।" মহিলাটি বললো: আমি ধৈর্য ধারণ করবো। এরপর সে বললো: কিন্তু (আক্রান্ত হলে) আমার আবরণ খুলে যায়, তাই আপনি আল্লাহর কাছে দোয়া করুন যেন আমার আবরণ খুলে না যায়। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য দোয়া করলেন।
3310 - عن أبي هريرة، قال: جاءت امرأة إلى النبي صلى الله عليه وسلم بها لمم، فقالت: يا رسول الله! ادع الله أن يشفيني. قال:"إن شئت دعوت الله أن يشفيك، وإن شئتِ فاصبري ولا حسابَ عليك". قالت: بل أصبر، ولا حسابَ عليَّ.
حسن: رواه الإمام أحمد (9689) عن محمد بن عبيد، قال: حدَّثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وأخرجه البزار (772 - كشف الأستار) من طريق محمد بن عمرو به.
وإسناده حسن، من أجل محمد بن عمرو، وهو الليثي،"صدوق".
وأخرجه ابن حبان في صحيحه (2909) والحاكم (4/ 218) كلاهما من هذا الوجه. قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وعزاه الهيثمي في"المجمع" (2/ 307) إلى البزار، وقال:"رواه البزار وإسناده حسن". وفاته العزو إلى أحمد.
واللمم: طرف من الجنون، يُلِمُّ بالانسان ويَعتريه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক মহিলা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আগমন করল, যার মধ্যে 'লামাম' (এক প্রকার মৃগীরোগ বা পাগলামির প্রভাব) ছিল। অতঃপর সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন তিনি আমাকে আরোগ্য দান করেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি যদি চাও, আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করব যেন তিনি তোমাকে আরোগ্য দেন। আর যদি তুমি চাও, তবে ধৈর্য ধারণ করো, এর বিনিময়ে তোমার কোনো হিসাব (শাস্তি) হবে না।" সে বলল, বরং আমি ধৈর্য ধারণ করব, আর আমার ওপর কোনো হিসাব (শাস্তি) নেই।
3311 - عن أبي أُمامة الباهلي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من عبد يُصرع صرعة من
مرضٍ إلَّا بعثه الله منها طاهرًا".
حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (8/ 115 - 116) من وجهين عن خالد بن يزيد بن صبيح، عن سالم بن عبد الله المحاربي، عن سليمان بن حبيب المحاربي، عن أبي أُمامة، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (23).
وأورده المنذري في"الترغيب" (5164) وقال بعد أن عزاه لابن أبي الدنيا والطبراني في"الكبير":"رواته ثقات، وتبعه الحافظ الهيثمي في"المجمع" (2/ 302) فقال مثله.
وفي الإسناد سالم بن عبد الله المحاربي، قال فيه أبو حاتم الرازي:"صالح الحديث"،"الجرح والتعديل" (4/ 185). وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 407 - 408). ولم يذكر من الرواة عنه في الموضع الأول إلَّا الأوزاعي، وفي الثاني: روى عنه أهلها". فمثله يُحسَّن حديثه.
تنبيه: -نقد نقلنا كلام الهيثمي من"مجمع الزوائد" كما مضى، ولكن نقل المُناوي في"فيض القدير" (5/ 488) عن الهيثمي أنَّه قال:"فيه سالم بن عبد الله البخاري الشامي، لم أجد من ذكره، وبقية رجاله ثقات". فانظر من أين نقل هذا القول؟ .
আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো বান্দা নেই যে অসুস্থতাজনিত কারণে আক্রান্ত হয়, তবে আল্লাহ তাকে সেই অসুস্থতা থেকে পবিত্র করে তোলেন।
3312 - عن أنس بن مالك قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله قال: إذا ابتليتُ عبدي بحبيبتيه فصبر عوضته منهما الجنة". يريد: عينيه.
صحيح: رواه البخاري في المرضى (5653) عن عبد الله بن يوسف، قال: حدثني بن الهاد، عن عمرو مولي المطلب، عن أنسٍ فذكره.
وتابعه أشعث بن جابر، وأبو ظلال بن هلال، عن أنس، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم.
أمَّا ما رواه أبو يعلى (4222 - الأثري) من وجه آخر عن سعيد بن سُليم الضبي، حدثنا أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … وفيه: وقلت: يا رسول الله! وإن كانت واحدة؟ قال:"وإن كانت واحدة". فهذه زيادة منكرة، سعيد بن سليم ضعيف جدًّا. قال فيه الأزدي:"متروك". وذكره الحافظ ابن حجر في"المطالب العالية" وقال:"هذه زيادة منكرة، سعيد ضعيف". وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 310) وقال:"رواه أبو يعلى، وفيه سعد بن سُليم الضبي، ضعَّفه الأزدي، وذكره ابن حبان في"الثقات، وقال:"يخطئ".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বলেছেন: যখন আমি আমার বান্দাকে তার প্রিয় দুটি বস্তুর মাধ্যমে পরীক্ষা করি, আর সে ধৈর্য ধারণ করে, তখন আমি তাকে সে দুটির বদলে জান্নাত দান করি।" (এখানে প্রিয় দুটি বস্তু বলতে তার দু'টি চোখ উদ্দেশ্য।)
3313 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"يقول الله عز وجل: من أذهبت حبيبتيه فصبر واحتسب لم أرض له ثوابًا دون الجنَّة".
صحيح: رواه الترمذي (2401) عن محمود بن غيلان، حدَّثنا عبد الرزاق، أخبرنا سفيان، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: وهو كما قال. وأخرجه الإمام أحمد أيضًا في"المسند": (7597) عن عبد الرزاق من هذا الوجه.
وأخرجه ابن حبَّان في صحيحه (2932) من حديث سهيل بن أبي صالح، والدارمي (2797) من حديث جرير بن عبد الحميد، كلاهما عن الأعمش، إلَّا أنَّهما لم يرفعاه إلى الله عز وجل، وإنَّما جعلاه مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقط.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেন, "আমি যার দু’টি প্রিয় জিনিস (অর্থাৎ তার দু’চোখ) নিয়ে নেই, আর সে ধৈর্য ধারণ করে এবং সাওয়াবের প্রত্যাশা করে, জান্নাত ছাড়া অন্য কোনো প্রতিদানে আমি তার জন্য সন্তুষ্ট হই না।"
3314 - عن أبي أُمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"يقول الله سبحانه: ابن آدم! إنْ صبرتَ واحتسبتَ عند الصدمة الأولى لم أرض ثوابًا دون الجنَّة".
حسن: رواه ابن ماجه (1597) عن هشام بن عمار، قال: حدَّثنا إسماعيل بن عياش، قال: حدَّثنا ثابت بن عجلان، عن القاسم، عن أبي أُمامة، فذكر الحديثَ.
ورواه الإمام أحمد (22228) عن إبراهيم بن مهدي، عن إسماعيل بن عياش، بإسناده، وزاد فيه:"إذا أخذتُ كريمتيك فصبرتَ".
وإسناده حسن؛ من أجل إسماعيل بن عياش، وهو أبو عتبة الحمصي، في حفظه لين، إلَّا أنَّه صدوق إذا روى عن أهل بلده. وهذا من روايته عن أهل بلده؛ فإنَّ شيخه ثابت بن عجلان الأنصاري، أبا عبد الله، حمصي نزل أرمينية، وهو"صدوق" أيضًا كما قال الحافظ في التقريب.
وشيخه القاسم بن عبد الرحمن شامي أيضًا. وإبراهيم بن مهدي الراوي عن إسماعيل بن عياش هو المصيصي، بغدادي الأصل، وثَّقه أبو حاتم، وذكره ابن حبَّان في"الثقات"، فهو في أقل أحواله لا ينزل عن درجة"صدوق"، غير أنَّ الحافظ جعله في درجة"مقبول"، أي حيث يتابع، وقد تابعه هشام بن عمار في هذا الحديث، وعنه رواه ابن ماجه وهو"صدوق" أيضًا، وقد وثَّقه ابن معين، والعجلي، وغيرهما.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলা বলেন: হে আদম সন্তান! যদি তুমি প্রাথমিক আঘাতের (বিপদের) সময় ধৈর্য ধারণ করো এবং সওয়াবের (পুণ্যের) আশা রাখো, তবে আমি জান্নাত ব্যতীত অন্য কোনো পুরস্কারে সন্তুষ্ট হব না।"
3315 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يقول الله تعالى: إذا أخذتُ كريمتي عبدي فصبر واحتسب لم أرض له ثوابًا دون الجنة".
صحيح: رواه أبو يعلى (2365) والطبراني في"الكبير" (12/ 54) كلاهما من حديث يعقوب ابن ماهان، حدثنا هشيم، قال: أبو بشر أخبرني، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر مثله.
وصححه ابن حبان (2930) فرواه عن أبي يعلى، عن يعقوب بن ماهان.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 308): رواه أبو يعلى والطبراني في الكبير و"الأوسط"، ورجال أبي يعلى ثقات".
قلت: وهو كما قال، إلَّا أنَّ يعقوب بن ماهان"صدوق"، لكنه توبع؛ فقد رواه الطبراني في
"الأوسط" (1179 - مجمع البحرين) من وجه آخر عن الوليد بن صالح النخاس، ثنا هشيم به مثله.
والوليد بن صالح النخاس -بالنون والخاء- الضبي، ثقة من رجال الشيخين. وبهذا صحَّ الإسناد.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা বলেন: যখন আমি আমার বান্দার দুটি প্রিয় বস্তু (দুটি চোখ) ছিনিয়ে নিই, আর সে ধৈর্য ধারণ করে এবং আল্লাহর কাছে এর প্রতিদান প্রত্যাশা করে, তখন আমি তার জন্য জান্নাত ছাড়া অন্য কোনো পুরস্কারে সন্তুষ্ট হই না।
3316 - عن العرباض بن سارية، عن النبي صلى الله عليه وسلم، عن ربِّه، قال:"إذا سلبت من عبدي
كريمتيه، وهو بهما ضنين، لم أرض له ثوابًا دون الجنَّة إذا حمدني عليهما".
حسن: رواه ابن حبَّان في"الصحيح" (2931) عن يحيى بن محمد بن عمرو -بالفُسطاط- قال: حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن العلاء، قال: حدَّثنا عمرو بن الحارث، قال: حدّثنا عبد الله بن سالم، عن الزبيدي، قال: حدَّثنا لقمان بن عامر، عن سويد بن جبلة، عن العرباض بن سارية، فذكر مثله.
وإسناده حسن؛ فإنَّ عمرو بن الحارث -وهو ابن الضحاك الزبيدي- وسويد بن جبلة الفزاري، لم يوثقهما إلَّا ابن حبان، وقال الحافظ في الأول:"مقبول"، أي: حيث يتابع، وقد توبع، فقد رواه البزار (771 - كشف الأستار) عن الحسين بن مهدي، ثنا عبد القدوس بن الحجاج، عن أبي بكر بن أبي مريم، عن حبيب بن عبيد، عن العرباض بن سارية، فذكر مثله، دون قوله"إذا حمدني عليهما". قال البزار:"لا نعلمه عن العرباض بأحسن من هذا الإسناد".
قلت: الإسناد الأول أحسن من هذا؛ لأنَّ أبا بكر بن أبي مريم في إسناد البزار ضعيف، كما في"التقريب"، وبه أعلَّه الهيثمي في"المجمع" (2/ 308).
وأمَّا ما رُوي عن بريدة، وزيد بن أرقم، ففيهما جابر الجعفي، وفيه كلام كثير، رواه البزار (769، 770 - كشف الأستار).
وكذلك لا بصح ما رُوي عن عائشة بنت قدامة بن مظعون مرفوعًا:"عزيز على الله عز وجل أن يأخذ كريمتي مسلم ثمَّ يدخله النار".
قال يونس:"يعني عينيه".
رواه الإمام أحمد (27063) والطبراني في"الكبير" (24/ 856) كلاهما من طريق عبد الرحمن ابن عثمان، قال: حدثني أبي، عن أمه عائشة بنت قدامة، فذكرته.
وعبد الرحمن بن عثمان هو ابن إبراهيم بن محمد بن حاطب، من رجال"تعجيل المنفعة" قال أبو حاتم:"يهولني كثرة ما يُسنِد". وذكر الذهبي في"الميزان، أنَّ أبا حاتم ضعَّفه. وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (2/ 308)، وأمَّا الحافظ ابن حبَّان؛ فذكره في كتابه"الثقات" (8/ 372) ولم يذكر من روي عنه سوى سعيد بن سليمان الواسطي.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي ظلال القسملي، أنَّه دخل على أنس بن مالك، فقال له:"يا أبا ظلال! متى أُصيب بصرك؟ قال: لا أعقله. قال: ألا أحدثك حديثًا حدثنا به رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن جبريل عليه السلام، عن ربِّه تبارك وتعالى، قال:"إنَّ الله قال: يا جبريل! ما ثواب عبدي إذا
أخذت كريمتيه إلَّا النظر إلى وجهي، والجوار في داري". ولقد رأيتُ أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يكون حوله يريدون أن تذهب أبصارهم".
رواه الطبراني في"الأوسط" (8850) عن مقدام بن داود، قال: حدَّثنا أسد بن موسي، قال: حدثنا أشرس بن الربيع أبو شيبان الهذلي، قال: حدَّثنا أبو ظلال القسملي، فذكر مثله.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديثَ عن أشرس إلَّا أسد بن موسي".
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 309):"فيه أشرس بن الربيع، لم أجد من ذكره، وأبو ظلال ضئفه أبو داود، والنسائي، وابن عدي، ووثقه ابن حبان".
قلت: أشرس بن الربيع ترجمه البخاري في"التاريخ الكبير" (2/ 42) وابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (2/ 322) وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 80) وذكر جماعة من الرواة عنه.
أمَّا أبو ظلال؛ فجاء ذكره في حديث أنس في أوَّل الباب، إلَّا أنَّ البخاري قال فيه:"أبو ظلال ابن هلال، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وتعقَّبه الحافظ في"الفتح" (10/ 117) فقال: أبو ظلال -بكسر الظاء المعجمة، والتخفيف- واسمه هلال. والذي وقع في الأصل: أبو ظلال بن هلال.
صوابه: إما أبو ظلال هلال بحذف"ابن". وإما أبو ظلال بن أبي هلال بزيادة"أبي". واختلف في اسم أبيه، فقيل: ميمون، وقيل: سويد، وقيل: يزيد، وقيل: زيد، وهو ضعيف عند الجميع، إلَّا أنَّ البخاري قال: إنَّه"مقارب الحديث". وليس له في صحيحه غير هذه المتابعة. وذكر المزي في ترجمته أنَّ ابن حبان ذكره في"الثقات"، وليس بجيد؛ لأنَّ ابن حبَّان إنَّما ذكره في"الضعفاء" (1146) فقال:"لا يجوز الاحتجاج به، وإنَّما ذكر في"الثقات" (5/ 504) هلال بن أبي هلال آخر، روى عنه يحيى المتوكِّل. وقد فرق البخاري بينهما، ولهم شيخ ثالث، يقال له: هلال بن أبي هلالي، تابعي أيضًا روى عنه ابنه محمد، وهو أصلح حالًا في الحديث منهما". انتهى.
والخلاصة: أنَّ حديث أبي ظلال ضعيف.
وفي الباب عن ابن مسعود، وابن عمر، وغيرهما وهي كلها ضعيفة.
ইরবাদ ইবনু সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রবের পক্ষ থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (আল্লাহ) বলেন: যখন আমি আমার বান্দার দুটি প্রিয় জিনিস (অর্থাৎ চোখ) কেড়ে নেই, আর সে (বান্দা) সেগুলোর প্রতি যত্নশীল ছিল, এরপরও যদি সে এর জন্য আমার প্রশংসা করে, তবে আমি তার জন্য জান্নাতের চেয়ে কম কোনো সওয়াবে সন্তুষ্ট হই না।
3317 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الرجل لتكون له عند الله المنزلة فما يبلغها بعمل، فما يزال الله يبتليه بما يكره حتَّى يُبلِّغه إيَّاها".
حسن: رواه أبو يعلى (6069) عن أبي كريب، حدَّثنا يونس بن بكير، حدَّثنا يحيى بن أيوب، حدَّثنا أبو زرعة، حدَّثنا أبو هريرة، فذكره.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 292) وقال:"رواه أبو يعلى وفي رواية له:"يكون له عند الله المنزلة الرفيعة"، ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال، فقد رواه ابن حبَّان في الصحيحه (2908) عن محمد بن العلاء بن كريب (وهو أبو كريب الكوفي المشهور بكنيته)، والحاكم (1/ 344) من طريق أحمد بن عبد الجبار - كلاهما عن يونس بن بكير بإسناده مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه". ولكن رده الذهبي فقال:"يحيي وأحمد ضعيفان، وليس يونس بحجَّة".
قلت: يحيى هذا هو ابن أيوب بن أبي زرعة البجلي، وثَّقه أبو داود، والبزار، وقال ابن معين:"ليس به بأس". فمثله يحسن حديثه، ولا يُضعَّف، وإن كان ابن معين قد ضعَّفه في رواية عنه؛ ولذا قال فيه الحافظ:"لا بأس به".
وأحمد بن عبد الجبار (وهو العُطاردي) وإن كان ضعيفًا؛ فقد قال فيه الدارقطني:"لا بأس به، على أنَّه لم ينفرد كما رأيتَ.
وأمَّا يونس بن بكير (وهو الشيباني) فهو وإن لم يكن حجَّة، فإنَّه لا ينزل عن مرتبة الحسن؛ وقد قال الذهبي نفسه في"الميزان" في ترجمته:"أحد أئمة الأثر والسير". ثمَّ قال: وقد أخرج مسلم ليونس في الشواهد، لا في الأصول، وكذلك ذكره البخاري مستشهدًا به، وهو حسن الحديث".
واكتفى الحافظ في"التقريب" بقوله:"يخطئ". والله أعلم.
وفي الباب ما رُوي عن محمد بن خالد السلمي، عن أبيه، عن جدِّه -وكانت له صحبة من رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ العبد إذا سبقت له من الله منزلة لم يبلغها بعمله؛ ابتلاه الله في جسده، أو في ماله، أو في ولده، ثمَّ صبَّره على ذلك حتَّى يُبَلِّغه المنزلة التي سبقت له من الله تعالي".
رواه أبو داود (3090) من طريقين، عن أبي المليح، عن محمد بن خالد بإسناده، فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (22338) وابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (39) والطبراني في"الكبير" و"الأوسط" كما في"الترغيب" (4/ 283) وقال:"ومحمد بن خالد لم يرو عنه غير أبي المليح الرقي، ولم يرو عن خالد إلَّا ابنه محمد".
وقال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (2/ 292):"رواه الطبراني في الكبير" و"الأوسط"، وأحمد، وفيه قصة، ومحمد بن خالد وأبوه لم أعرفهماء. فهذا يعني أنَّ محمدًا وأباه مجهولان.
وكذا قال الحافظ في"التقريب".
وهو محمد بن خالد بن اللَّجْلاج السلمي، قال الحافظ في ترجمة خالد بن اللجلاج:"أخرج له أبو داود، ولم يُسمِّ أباه، لكن سمَّاه ابن منده".
قلت: وكذلك سمَّاه أبو نعيم الأصبهاني في"معرفة الصحابة" (5/ 2426) بأنَّه:"اللجلاج بن حكيم السلمي". وأخرج حديثه هذا، وقال الذهبي في"الميزان" في ترجمة محمد بن خالد، عن
أبيه، عن جدِّه أبي خالد السلمي:"لا يُدري من هؤلاء، روى عنه أبو المليح الرقي".
والقصة التي أشار إليها الهيثمي هي أنَّ جدّه خرج زائرًا لرجل من إخوانه فبلغه أنه شاكي قبل أن يدخل عليه، فدخل عليه فقال:"أتيتك زائرًا، وأتيتك عائدًا، ومبشِّرًا. قال: كيف جمعت هذا كله؟ قال: خرجت وأنا أُريد زيارتك فبلغني شكايتك فكانت عيادة، وأُبشِّرك بشيءٍ سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وفي الباب أيضًا عن عائشة مرفوعًا:"إذا كثرت ذنوب العبد، ولم يكن له ما يكفرها من العمل، ابتلاه الله عز وجل بالحزن ليكفرها عنه".
رواه الإمام أحمد (25236)، والبزار (3260 - كشف) كلاهما من طريق حسين بن علي، عن زائدة، عن ليث، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.
وليث هو ابن أبي سليم، وهو ضعيف.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তির জন্য আল্লাহর নিকট একটি বিশেষ মর্যাদা নির্ধারিত থাকে, কিন্তু সে তার আমলের মাধ্যমে সেখানে পৌঁছাতে পারে না। তাই আল্লাহ তাকে অপছন্দনীয় বিষয়সমূহ দ্বারা পরীক্ষা করতে থাকেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তাকে সেই মর্যাদায় পৌঁছে দেন।"
3318 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يرد الله منه خيرًا يُصب منه".
صحيح: رواه مالك في العين (7) عن محمد بن عبد الله بن أبي صعصعة، أنَّه قال: سمعت أبا الحُباب سعيد بن يسار يقول: سمعت أبا هريرة يقول، فذكر الحديثَ.
ومن طريقه رواه البخاري في المرضى (5145).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে (বিপদ-মুসিবত দ্বারা) পরীক্ষা করেন।
3319 - عن محمود بن لبيد، قال: إنَّ رسول الله قال:"إنَّ الله إذا أحبَّ قومًا ابتلاهم، فمن صبر فله الصبرُ، ومن جزع فله الجزعُ".
حسن: رواه الإمام أحمد (23623، 23633، 23641) من طرق عن عمرو بن أبي عمرو، عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن أبي عمرو، وهو مولى المطلب، فإنَّه مختلف فيه غير أنَّه حسن الحديث، وقد روى له الجماعة.
وأورده المنذري في"الترغيب" (5116) وقال: رواه أحمد، ورواته ثقات، ومحمود بن لبيد رأى النبي صلى الله عليه وسلم، واختلف في سماعه".
قلت: محمود بن لبيد من صغار الصحابة، وجل روايته عن الصحابة، ولذا ذكره ابن حبان في ثقات التابعين، وقال:"يروي المراسيل"، ثمَّ قال: وذكرته في الصحابة لأنَّ له رؤية". ورجَّح ابن حجر كونه من الصّحابة، فذكره في القسم الأول من الإصابة، وقال في"التقريب":"صحابي صغير، وجلّ روايته عن الصّحابة، مات سنة ستٍّ وتسعين".
মাহমুদ ইবনে লবীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ যখন কোনো সম্প্রদায়কে ভালোবাসেন, তখন তাদেরকে পরীক্ষায় ফেলেন। অতএব, যে ব্যক্তি ধৈর্য ধারণ করে, তার জন্য রয়েছে ধৈর্য; আর যে ব্যক্তি অস্থিরতা দেখায়, তার জন্য রয়েছে অস্থিরতা।"
3320 - عن عبد الله بن مغفل قال: إنَّ رجلًا لقي امرأةً كانت بغيًّا في الجاهلية، فجعل
يلاعبها، حتَّى بسط يده إليها، فقالت المرأة: مه! فإنَّ الله عز وجل قد ذهب بالشرك. وقال عفَّان مرَّةً: ذهب بالجاهلية، وجاءنا بالإسلام، فولَّي الرجل، فأصاب وجهه الحائط، فشجَّه، ثمَّ أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فأخبره فقال: أنت عبد أراد الله بك خيرًا، إذا أراد الله عز وجل بعبد خيرًا عجَّل له عقوبة ذنبه، وإذا أراد بعبدٍ شرًّا أمسك عليه بذنبه، حتى يوافي به يوم القيامة كأنه عَيْرٌ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16806) عن عفان، قال: حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، عن يونس، عن الحسن، عن عبد الله بن مغفل، فذكر مثله.
وصحّحه ابن حبان (2911) والحاكم (1/ 349، 4/ 376 - 377) كلاهما من هذا الوجه. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وأورده الهيثمي في"المجمع" (10/ 191) وقال:"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد رجال الصحيح، وكذلك أحد إسنادي الطبراني".
وإسناده صحيح، وفيه الحسن بن أبي الحسن البصري الإمام، وهو مدلس، وقد عنعن، إلَّا أنَّ الإمام أحمد صرَّح بأنَّه سمع من عبد الله بن مغفَّل، وأنس بن مالك، وابن عمر، فلعلَّ هذا ممَّا سمع منه. ثم إن ابن حبان قد أخرجه في صحيحه، وهذا مما يطمئن في صحة سماعه عنه كما ذكره في المقدمة في مسألة المدلسين.
وفي الباب عن أنس مرفوعًا:"عِظَم الجزاء مع عظم البلاء، وإنَّ الله إذا أحبَّ قومًا ابتلاهم، فمن رضي فله الرضا، ومن سخط فله السخط".
رواه الترمذي (2396)، وابن ماجه 4031)، كلاهما من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سعد بن سنان، عن أنس، فذكر مثله، ولفظهما سواء.
وساق الترمذي بالاسناد نفسه لفظًا آخر مرفوعًا، وهو:"إذا أراد الله بعبده الخير عجَّل له العقوبة في الدنيا، وإذا أراد الله بعبده الشرَّ أمسك عنه بذنبه حتَّى يوافي به يوم القيامة". وقال:"حسن غريب من هذا الوجه".
قلت: بل هو ضعيف جدًّا؛ فإنَّ سعد بن سنان الكندي ضعيف، ضعفه أحمد، والنسائي، والدارقطني، والجوزجاني، والذهبي، والجماهير، وأمَّا الحافظ؛ فليِّن القول فيه، فقال:"صدوق له أفراد".
ولعلَّ قوله:"له أفراد" إشارة إلى قول الإمام أحمد:"روي خمسة عشر حديثًا منكرةً كلها، ما أعرف منها واحدًا".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم، أنَّه قال لأصحابه:"إذا مرضتم فلا تتمنَّوا العافية، فإنَّ المرض خيرٌ للمؤمن من الصحة، والمرض هدية الله عز وجل للعباد".
رواه الجوزقاني في"الأباطيل" (429). وقال:"هذا حديث منكر، وفي إسناده من المجهولين غير واحد".
ونقله عنه الحافظ في اللسان (3/
আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি এমন একজন মহিলার সাথে দেখা করল যে জাহিলিয়াতের যুগে ব্যভিচারিণী ছিল। সে তার সাথে হাসি-ঠাট্টা শুরু করল এবং এক পর্যায়ে তার দিকে হাত বাড়িয়ে দিল। তখন মহিলাটি বলল: থামো! নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল শিরককে দূর করেছেন। (আফ্ফান একবার বলেছেন: আল্লাহ জাহিলিয়াত দূর করেছেন এবং আমাদের নিকট ইসলাম এনেছেন।) লোকটি তখন ফিরে গেল এবং (তাড়াহুড়োয়) তার মুখে দেওয়ালে আঘাত লাগল, ফলে তার মাথা ফেটে গেল। এরপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে ঘটনাটি জানাল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি এমন একজন বান্দা যার জন্য আল্লাহ কল্যাণ চেয়েছেন। যখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল কোনো বান্দার কল্যাণ চান, তখন তার পাপের শাস্তি দুনিয়াতেই দ্রুত দিয়ে দেন। আর যখন কোনো বান্দার প্রতি তিনি মন্দ কিছু চান, তখন তিনি তার পাপের শাস্তি ধরে রাখেন, যাতে কিয়ামতের দিন তাকে (পাপের বোঝার কারণে) একটি উটপাখির (বা গাধার) মতো উপস্থিত হতে হয়।
3321 - عن صُهَيبٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عجبًا لأمر المؤمن، إنَّ أمره كلَّه خير، وليس ذاك لأحدٍ إِلَّا للمؤمن؛ إن أصابته سرَّاءُ شكر فكان خيرًا له، وإن أصابته ضرَّاء صبر فكان خيرًا له".
صحيح: رواه مسلم في الزهد والرقائق (2999) عن هدَّاب بن خالد الأزديّ، وشيبان بن فرُّوخ، كلاهما عن سليمان بن مغيرة، حَدَّثَنَا ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صُهَيب، فذكره. وخرَّجه البيهقيّ (3/ 375) من طريق أحمد بن النضر بن عبد الوهَّاب، عن شيبان بن فرُّوخ، بإسناده، وزاد في آخره:"فكلُّ قضاء الله للمسلمين خيرٌ".
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুমিনের বিষয়টি সত্যিই আশ্চর্যজনক। তার প্রতিটি কাজই তার জন্য কল্যাণকর। মুমিন ছাড়া অন্য কারো জন্য এটি প্রযোজ্য নয়। যদি তার উপর কোনো সুখ-শান্তি আসে, তখন সে শুকরিয়া আদায় করে। ফলে তা তার জন্য কল্যাণকর হয়। আর যদি তার উপর কোনো দুঃখ-কষ্ট আসে, তখন সে ধৈর্য ধারণ করে। ফলে তাও তার জন্য কল্যাণকর হয়।"
3322 - عن سعد بن أبي وقَّاص، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عجبت من قضاء الله للمؤمن؛ إن أصابه خير حمد ربه وشكر، وإن أصابته مصيبة حمد ربه وصبر، المؤمن يؤجر في كلِّ شيءٍ حتّى في اللقمة يرفعها إلى في امرأته".
حسن: رواه الإمام أحمد (1487)، عن عبد الرحمن بن مهديّ، وعبد الرزّاق، قالا: أخبرنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن العَيْزار بن حريث، عن عمر بن سعد، عن أبيه، فذكر مثله.
وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعيّ، مدلِّس ومختلط، لكن روى عنه شعبة كما عند الإمام أحمد (1531) والبزّار - (3166 - كشف الأستار)، ومسند الشاشي (132)، وابن أبي الدُّنيا في"المرض والكفارات" (224). وقد كفانا شعبةُ تدليسَ أبي إسحاق. وتابع بدر بن عثمان أبا إسحاق، في رواية عند الشاشي (129)، وإسناده حسن من أجل الكلام في عمر بن سعد بن أبي وقَّاص المدني؛ لأنَّ الناس مقتوه لكونه أميرًا على الجيش الذين قتلوا الحسين بن علي، غير أنَّه"صدوق"، كما قال الحافظ في"التقريب". ووهم من ذكره في الصّحابة.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি মু'মিনের জন্য আল্লাহর ফায়সালার (বিধানের) ওপর বিস্মিত হই; যদি তার কোনো কল্যাণ হয়, সে তার রবের প্রশংসা করে এবং কৃতজ্ঞতা জ্ঞাপন করে। আর যদি তার ওপর কোনো বিপদ নেমে আসে, সে তার রবের প্রশংসা করে এবং ধৈর্যধারণ করে। মু'মিন প্রতিটি জিনিসের জন্যই প্রতিদান লাভ করে, এমনকি সেই লোকমার জন্যও যা সে তার স্ত্রীর মুখে তুলে দেয়।"
3323 - عن أنس، قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"عجبتُ للمؤمن! إنَّ الله لم يقض له قضاء إِلَّا كان خيرًا له".
حسن: رواه الإمام أحمد (12160) عن يحيى (هو ابن سعيد) عن سفيان، قال: حَدَّثَنِي القاسم ابن شريح، عن ثعلبة، قال: سمعت أنسًا يقول، فذكره.
والقاسم"شيخ" كما قال أبو حاتم في"الجرح والتعديل" (7/ 111)، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات".
وقد توبع؛ فرواه أبو يعلى (4217، 4218) والقضاعي في مسند الشهاب (596) من طرق، عن الحسن بن عبيد الله (هو ابن عروة النخعي)، ثقة فاضل، وقد تحرف في بعض المصادر إلى الحسين بن عبيد الله.
وكذلك تابعه أيضًا عاصم الأحول، عن ثعلبة بن عاصم، ومن طريقه رواه عبد الله بن الإمام أحمد في زياداته في"المسند" (20283)، وابن حبَّان (728) كلاهما من طرق، عن نوح بن حبيب، قال: حَدَّثَنَا حفص بن غياث، عن عاصم الأحول، بإسناده نحوه.
وثعلبة بن عاصم هو أبو بحر مولي أنس، قال أبو حاتم:"صالح". وذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وروى عنه جمع، وهو حسن الحديث.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আমি মুমিনের বিষয়ে আশ্চর্যবোধ করি! আল্লাহ তার জন্য যে ফয়সালাই করেন না কেন, তা তার জন্য কল্যাণকরই হয়।"
3324 - عن كعب بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمن كمثل الخامة من الزرع، تُفيئها الرياح، تصرعها مرة، وتعدلها حتَّى يأتيه أجله، ومثل المنافق مثل الأرزة المُجذية التي لا يُصيبها شيءٌ حتَّى يكون انجعافها مرَّة واحدة".
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5643)، ومسلم في صفات المنافقين (2810)، كلاهما من حديث سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه، فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ قريب منه.
قوله:"الخامة" هي الطاقة الطرية اللينة. قال الخليل:"الخامة: الزرع أول من ينبت على ساق واحد".
وقوله:"تُفيئها" أي تُميلها.
وقوله:"الأرزة" قال الخطّابي:"الأرزة -مفتوحة الراء-: واحدة الأَرز، وهو شجر الصنوبر فيما يُقال". وقال غيره:"هو شجر معتدل صلب، لا يُحرِّكه هبوب الريح".
وقوله:"انجعافها" أي: انقلاعها.
ومعنى الحديث كما قال المهلب:"أنَّ المؤمن حيث جاء أمر الله انطاع له، فإن وقع له خير فرح به وشكر، وإن وقع له مكروه صبر ورجا فيه الخير والأجر، فإذا اندفع عنه اعتدل شاكرًا. والكافر لا يتفقده الله باختباره، بل يحصل له التيسير في الدُّنيا، ليتعسَّر عليه الحال في المعاد، حتّى إذا أراد الله إهلاكهـ قصمه، فيكون موته أشد عذَابًا عليه، وأكثر ألمًا في خروج نفسه".
وقال غيره:"المعنى أنَّ المؤمن يتلقى الأعراض الواقعة عليه لضعف حظه من الدُّنيا، فهو كأوائل الزرع، شديد الميلان لضعف ساقه، والكافر بخلاف ذلك، وهذا في الغالب من حال الاثنين. انظر"الفتح" (10/ 107).
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মুমিনের উদাহরণ হলো ফসলের নরম কচি ডগার মতো, বাতাস যাকে ঝুঁকাতে থাকে; একবার তাকে ভূপাতিত করে আবার তাকে সোজা করে দেয়—এভাবে তার মৃত্যু আসা পর্যন্ত চলতে থাকে। আর মুনাফিকের উদাহরণ হলো আরজা (শক্ত সিডার) গাছের মতো, যাকে কোনো কিছুই স্পর্শ করে না, যতক্ষণ না সে একবারে উপড়ে পড়ে যায়।”
3325 - عن أبي هريرة، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المؤمن كمثل الخامة من الزرع، من حيث أتتها الريح كفأتها، فإذا اعتدلت تكفَّأ بالبلاء. والفاجر كالأرزة صمَّاء معتدلة، حتّى يقصمها الله إذا شاء".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المرضى (5644) ومسلم في صفات المنافقين (2809) كلاهما من وجهين مختلفين، عن أبي هريرة، واللّفظ للبخاريّ.
ولفظ مسلم:"مثل المؤمن كمثل الزرع. لا تزال الريح تُميله. ولا يزال المؤمن يصيبه البلاءُ. ومثل المنافق كمثل شجرة الأرز، لا تهتزُّ حتَّى تُستحصد".
وفي رواية - مكان"تميله""تُفيئه".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের উপমা হলো শস্যের কচি ডগার মতো। বাতাস যেদিক থেকেই আসে, তাকে সেদিকেই ঝুঁকিয়ে দেয়। যখন সেটি সোজা হয়ে দাঁড়ায়, তখন মুমিন বিপদাপদের মাধ্যমে ঝুঁকে যায় (পরীক্ষিত হয়)। আর পাপী ব্যক্তি আরয বৃক্ষের মতো, যা সুদৃঢ় ও সোজা হয়ে দাঁড়িয়ে থাকে, যতক্ষণ না আল্লাহ যখন ইচ্ছা করেন, তখন তাকে সমূলে ভেঙে দেন।
3326 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المؤمن كمثل السنبلة تخرُّ مرَّةً وتستقيم مرَّةً، ومثل الكافر مثل الأرزِ، لا يزال مستقيمًا حتَّى يخرَّ ولا يشعر".
حسن: رواه الإمام أحمد (14761) عن موسى وحسن، قالا: حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن أبي الزُّبير، عن جابر، فذكر مثله.
والكلام في ابن لهيعة مشهور، إِلَّا أنَّه روى عنه في بعض طرق هذا الحديث عبد الله بن وهب، وسماعه منه كان قديمًا، وأبو الزُّبير مدلس وقد عنعن، ولكن جاء الحديث من طريق آخر ليس فيه أبو الزبير، وهو ما رواه البزّار (45، 46 - كشف)، والقضاعي في مسند الشهاب (2/ 280، 281) كلاهما من طرق، عن أبي بكر بن عَيَّاش، عن الأعمش، عن عطاء، عن جابر، فذكر نحوه. وبهذه المتابعة يرتقي الإسناد إلى الحسن لغيره. أورده الحافظ في"الفتح" (10/ 106) وعزاه لأحمد، وسكت عليه.
وقوله:"الأرزة"، قيل: هو الصنوبر.
ورُوي مثله عن أُبَي بن كعب، أنَّه دخل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: متى عهدك بأُمِّ مِلدَم؟" وهو حرٌّ بين الجلد واللحم. قال: إنَّ ذلك لوجع ما أصابني قط. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمن مثل الخامة، تحمرُّ مرَّةً وتصفرُّ أخرى". وفيه رجل لم يُسم. رواه الإمام أحمد (21282)، عن سفيان بن عيينة، عن إسماعيل بن أُميَّة، عمَّن حدَّثه، عن أمِّ ولد أُبيِّ بن كعب، عن أُبي بن كعب، فذكر مثله.
و"أمُّ مِلدَم" بوزن منبر، كنية الحمى.
و"الخامة" هي الغضُّ الرطب من النبات.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد الله بن إياس بن أبي فاطمة الضمري، عن أبيه، عن جدِّه في حديث طويل وفي بعض ألفاظه نكارة. رواه الطبراني في"الكبير" (22/ 323) وفيه محمد بن أبي حُميد، وهو ضعيف، ترجمه العقيلي في"الضعفاء" (1613): قال عبد الله بن الإمام أحمد: سمعت
أبي يقول:"محمد بن أبي حميد أحاديثه أحاديث مناكير". وقال في موضع آخر:"ليس هو بقوي في الحديث". وقال البخاريّ:"محمد بن أبي حميد منكر الحديث".
وفي الباب عن أنس بن مالك، وعمار بن ياسر مرفوعًا:"مثل المؤمن مثل السنبلة يميل أحيانًا ويقوم أحيانًا، ومثل الكافر كمثل أرزِّ، يخرُّ ولا يُشعرَ به".
حديث أنس رواه أبو يعلى (3068). وفيه فهد بن حبَّان، وهو ضعيف، كما قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 293).
وحديث عمار بن ياسر رواه الطبرانيّ في"الكبير"، وفيه مهلب بن العلاء، قال الهيثميّ:"لم أجد من ذكره".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মু'মিনের উদাহরণ হলো শস্যের শীষের মতো, যা একবার হেলে পড়ে আবার একবার সোজা হয়ে দাঁড়ায়। আর কাফিরের উদাহরণ হলো আরয (শক্ত) গাছের মতো, যা সর্বদা সোজা হয়ে থাকে, অবশেষে যখন তা পড়ে যায়, তখন সে টেরও পায় না।"
3327 - عن عائشة، أنَّها قالت: وا رأساه! فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ذاك لو كان وأنا حيٌّ فأستغفر لكِ وأدعو لكِ". فقالت عائشة: واثُكلياه! والله إنِّي لأظنُّكَ تُحبُّ موتي، ولو كان ذلك لظَلِلْتَ آخر يومكَ مُعرِّسًا ببعض أزواجك، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"بل أنا وار أساه، لقد هممتُ أو أردتُ أن أُرسِل إلى أبي بكر وابنه، وأعهد: أن يقول القائلون، أو يتمنَّى المتمنُّون، ثمّ قلتُ: يأبى الله ويدفع المؤمنون، أو يدفع الله، ويأبى المؤمنون".
صحيح: رواه البخاريّ في المرضى (5666)، عن يحيى بن يحيى أبي زكريا، أخبرنا سليمان ابن بلال، عن يحيى بن سعيد، قال: سمعت القاسم بن محمد، قال: قالت عائشة، فذكرت مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হায় আমার মাথা! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি এমন হয় (তুমি মারা যাও) আর আমি জীবিত থাকি, তবে আমি তোমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করব এবং তোমার জন্য দু‘আ করব।" তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হায় আমার দুর্ভাগ্য! আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই মনে করি যে আপনি আমার মৃত্যু কামনা করছেন। আর যদি এমনটা হতো, তবে আপনি আপনার দিনের শেষে আপনার অন্য কোনো স্ত্রীর সাথে রাত্রিযাপন করতেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বরং আমিই হায় আমার মাথা! আমি সংকল্প করেছিলাম অথবা চেয়েছিলাম যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর পুত্রকে ডেকে পাঠিয়ে (খেলাফতের) নির্দেশ দিয়ে যাব, যাতে কোনো বক্তা কিছু বলতে না পারে, অথবা কোনো আকাঙ্ক্ষাকারী আকাঙ্ক্ষা পোষণ না করে। এরপর আমি (মনে মনে) বললাম: আল্লাহ অবশ্যই প্রত্যাখ্যান করবেন এবং মুমিনগণও প্রতিরোধ করবেন, অথবা আল্লাহ প্রতিরোধ করবেন এবং মুমিনগণ প্রত্যাখ্যান করবেন।"
