হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3448)


3448 - عن أبي بردة قال: أوصى أبو موسى حين حضره الموت فقال: إذا انطلقتم بجنازتي فأسْرِعوا المشيَ، ولا تُتْبعني بمجمر، ولا تجعلوا في لحدي شيئًا يحول
بيني وبين التراب، ولا تجعلوا على قبري بناءً، وأُشهدكم أني برئٌ من كل حالقةٍ، أو سالقةٍ، أو خارقة، قالوا: أو سمعت فيه شيئًا؟ قال: نعم من رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه الإمام أحمد (19547) عن معتمر بن سليمان التيمي، قال: قرأت على الفُضيل بن ميسرة في حديث أبي حريز، أن أبا بردة حدَّثه قال: أوصى أبو موسى فذكره.

ورواه ابن ماجه (1487) وصحَّحه ابن حبان (3150) من طريق المعتمر بن سليمان إلا أن ابن ماجه ذكره مختصرًا.

قال البوصيري في"مصباح الزجاجة":"هذا إسناد حسن. أبو حَريز اسمه: عبد الله بن حسين مختلف فيه".

قلت: وهو كما قال، فإن عبد الله بن الحسين الأزدي قاضي سجستان ضعَّفه يحيي بن سعيد القطان وأحمد بن حنبل وأبو داود وغيرهم، ووثقه أبو زرعة، وقال أبو حاتم:"حسن الحديث، ليس بمنكر الحديث بكتب حديثه". واختلف فيه قول ابن معين، فوثقه مرة، وضعَّفه أخرى، فمن كان هذا حاله يحسن حديثه إذا لم يكن فيه نكارة.

وأما ما رُوي عن يزيد بن أوس قال: دخلت على أبي موسى وهو ثقيل، فذهبتْ امرأتُه لتبكي، أو تَهُمَّ به، فقال لها أبو موسى: أما سمعت ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: بلى. قال: فسكتت، فلما مات أبو موسى قال بزيد: لقيتُ المرأة فقلت لها: ما قولُ أبي موسى لكِ: أما سمعتِ قول رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم سكتِّ؟ قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من حلق، ومن سلق، ومن خرق" ففيه يزيد بن أوس لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 540)، ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي حيث يتابع، وإنه لم يتابع على ذلك فهو ليِّن الحديث، رواه أبو داود (3130)، والنسائي (1866) كلاهما من حديث منصور، عن إبراهيم، عن يزيد بن أوس، فذكره. فجعل يزيد بن أوس هذا الحديث من مسند أبي موسى ومن مسند امرأته جميعًا.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর মৃত্যু আসন্ন হলো, তখন তিনি ওসিয়ত করে বললেন: যখন তোমরা আমার জানাযা নিয়ে যাবে, তখন দ্রুত চলো। আমার সাথে ধুনচি (সুগন্ধি প্রজ্জ্বলক) নিয়ে যেও না। আমার কবরের গর্তে (লাহদ) এমন কিছু রেখো না যা আমার ও মাটির মাঝে অন্তরায় সৃষ্টি করে। আর আমার কবরের উপর কোনো প্রকার স্থাপনা তৈরি করো না। আর আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি সেই সকল মহিলাদের দায়িত্ব থেকে মুক্ত যারা (দুঃখে) মাথা মুণ্ডন করে, উচ্চৈঃস্বরে বিলাপ করে অথবা (কাপড়) ছিঁড়ে ফেলে। লোকেরা জিজ্ঞেস করল: আপনি কি এ বিষয়ে (নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে) কিছু শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে।









আল-জামি` আল-কামিল (3449)


3449 - عن أم سلمة قالت: لما مات أبو سلمة قلت: غريب، وفي أرض غُربة، لأَبكيَنَّه بكاءً يُتَحَدَّثُ عنه، فكنتُ قد تهيَّأتُ للبكاء عليه. إذ أقبلتِ امرأةٌ من الصعيد تريد أن تُسْعدني، فاستقبلها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقال:"أتُريدين أن تُدخلي الشيطان بيتًا أخرجه الله منه؟" مرتين، فكففتُ عن البكاء، فلم أبك.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (922) من طرق، عن سفيان، عن ابن أبي نَجِيح، عن أبيه، عن عبيد بن عُمير قال: قالت أم سلمة فذكرته.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আবূ সালামা ইন্তেকাল করলেন, তখন আমি বললাম: [তিনি] একজন মুসাফির, এবং [তিনি মারা গেছেন] অপরিচিত এক ভূমিতে। আমি তাঁর জন্য এমনভাবে কাঁদব, যা নিয়ে মানুষ আলোচনা করবে। সুতরাং আমি তাঁর জন্য কাঁদতে প্রস্তুত হয়েছিলাম। এমন সময় সাঈদ (নামক স্থান) থেকে একজন মহিলা আসলেন, যিনি আমাকে শোক প্রকাশে সাহায্য করতে চাইছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সামনে আসলেন এবং বললেন: “তুমি কি এমন ঘরে শয়তানকে প্রবেশ করাতে চাও, যেখান থেকে আল্লাহ তাকে বের করে দিয়েছেন?” (কথাটি তিনি) দু'বার বললেন। ফলে আমি কান্না থেকে বিরত হলাম এবং কাঁদলাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (3450)


3450 - عن أنس بن مالك قال: أخذ النبي صلى الله عليه وسلم على النساء حين بايعن أن لا ينُحْنَ. فقلت: يا رسول الله! إن نساءً أسعدتنا في الجاهلية، فنُسعدهن في الإسلام؟ قال صلى الله عليه وسلم:"لا إسعاد في الإسلام، ولا شِغار في الإسلام، ولا عَقْرَ في الإسلام، ولا جلب ولا جنب، ومن انتهب فليس مِنَّا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (13032) عن عبد الرزاق، وهو في مصنفه (6690) عن معمر، عن ثابت، عن أنس فذكر الحديث مثله.

ورواه أبو داود (3222)، والترمذي (1601)، والنسائي (1852) كلهم من طريق عبد الرزاق مقطعًا، وصحَّحه ابن حبان (314




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মহিলাদের থেকে বাইয়াত গ্রহণ করেন, তখন তাদের থেকে এই মর্মে অঙ্গীকার নেন যে, তারা যেন উচ্চস্বরে বিলাপ (নিয়াহা) না করে। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! জাহিলিয়্যাতের যুগে কিছু মহিলা আমাদের (শোক প্রকাশে) সহযোগিতা করেছিল, আমরা কি ইসলামেও তাদের সহযোগিতা করতে পারি না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইসলামে (শোক প্রকাশের কাজে) কোনো সহযোগিতা নেই, ইসলামে শিগার (বিনিময় বিবাহ) নেই, ইসলামে আকর (মৃতের কবরের কাছে পশু জবেহ করা) নেই, ইসলামে জালব ও জানাব (যাকাত সংক্রান্ত দুটি নিষিদ্ধ প্রক্রিয়া) নেই, আর যে লুট করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3451)


3451 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صوتان ملعونان، في الدنيا والآخرة: مزمار عند نعمةٍ، ورنة عند مصيبة".

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (795) عن عمرو بن علي، ثنا أبو عاصم (وهو الضحاك ابن مخلد) ثنا شبيب بن بشر البجلي، قال: سمعت أنس بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل شبيب بن بشر فإنه مختلف فيه. فقال ابن معين: ثقة، وقال أبو حاتم: ليِّن الحديث. وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 359).

وقال: يخطئ كثيرًا، وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 13): وقال:"رواه البزار ورجاله ثقات".




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুটি আওয়াজ রয়েছে যা দুনিয়া ও আখেরাতে অভিশাপগ্রস্ত: (১) আনন্দের সময় বাদ্যযন্ত্রের আওয়াজ (বাঁশির শব্দ), এবং (২) মুসিবতের সময় উচ্চস্বরে বিলাপ।"









আল-জামি` আল-কামিল (3452)


3452 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُصلي الملائكة على نائحة ولا على مرنَّة".

حسن: رواه أحمد (8746)، وأبو يعلى (6137) من طريق سليمان بن داود، وهو الطيالسي (2457) قال: حدثنا عمران، عن قتادة، عن أبي مُراية، عن أبي هريرة فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 13):"رواه أحمد وأبو يعلى، وفيه أبو مرانة ولم أجد من وثَّقه، ولا جرَّحه، وبقية رجاله ثقات".

قلت: لعله خفي على الهيثمي أبو مرانة -هكذا في المجمع، والصواب أبو مُراية كما في مسند أحمد وأبي يعلى، وقد أدخله ابن حبان في"الثقات" (5/ 31) باسمه وهو: عبد الله بن عمرو، وقال فيه:"عبد الله بن عمرو أبو مراية العجلي، يروي عن عمران بن حصين وسلمان، عداده في أهل البصرة، روى عنه قتادة وأسلم العجلي"، ولم يهتد الهيثمي إلى موضعه في"الثقات" وإلا لما قال
ما قال فيه، لأنه يعتمد غالبًا على توثيق ابن حبان.

وإسناده حسن من أجل أبي مراية فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في"الثقات" وهو من رجال التعجيل، قال فيه أبو سعيد:"كان قليل الحديث، أي أنه عرفه، ولم يقل فيه شيئًا".

وقال البوصيري في"الإتحاف" (2704):"رواه أبو داود الطيالسي وأبو يعلى وأحمد بإسناد صحيح".

وعن أبي هريرة أيضًا مرفوعًا:"أيما نائحة ماتتْ قبل أن تتوبَ ألْبَسها الله سِرْبالًا من قَطِران، وأقامها للناس يوم القيامة" إلا أنه ضعيف.

رواه أبو يعلى (5979) عن أبي إبراهيم الترجماني، حدثنا عُبَيس بن ميمون، حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وعُبيس بن ميمون، ويقال: عيسي بن ميمون كما في"تهذيب الكمال" وفروعه، وهو الواسطي، وهو مولى القاسم بن محمد بن أبي بكر الصديق، والراوي عنه.

قال البخاري:"هو أبو عبيدة عُبَيس بن ميمون التيمي، عن يحيى بن أبي كثير وغيره منكر الحديث". وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه غير محفوظ""الميزان" (3/ 27) وقد ضعَّفه يحيي بن معين وأبو حاتم والترمذي والنسائي وغيرهم، وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، يروي عن الثقات أشياء كأنها موضوعات، فاستحق مجانبة حديثه، والاجتناب عن روايته، وترك الاحتجاج بما يروي لما غلب عليه من المناكير""المجروحين" (697)، وبه ضعَّفه البوصيري في"الإتحاف" (2714).

وأما الهيثمي فقال في"مجمع الزوائد" (3/ 13):"رواه أبو يعلى وإسناده حسن" لعله ظن أنه عيسي بن ميمون الجرشي أبو موسى، يعرف بابن داية، فإنه ثقة.

وقال الحافظ ابن حجر:"وقد فرق بينهما ابن معين وابن حبان" فقال ابن حبان في"الثقات" (8/ 489) عن الثاني: مستقيم الحديث". وهذا الذي ظنه الهيثمي فحسَّنه، والصواب أنه عبيس بن ميمون، للقرينة التي ذكرها البخاري، واعتمده البوصيري وضعَّفه. والله تعالى أعلم.




আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফেরেশতাগণ বিলাপকারী নারীর উপর এবং (দুঃখের সুরে) গান গেয়ে ক্রন্দনকারী নারীর উপর সালাত (দোয়া/রহমত) বর্ষণ করেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3453)


3453 - عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الميت يُعذَّب في قبره بما نيح عليه".

وفي رواية:"الميت يعذب ببكاء الحي عليه".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1292) عن عبدان، قال: أخبرني أبي، عن شعبة، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن ابن عمر، عن أبيه فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الجنائز (927/ 17) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة بإسناده مثله.

والرواية الثانية رواها البخاري عن آدم، عن شعبة بإسناده السابق، ورواها مسلم من أوجه عن
محمد بن بشر العبدي، عن عبيدالله بن عمر، قال: حدثنا نافع، عن عبد الله أن حفصة بكت على عمر فقال: مهلًا يا بُنَيَّةُ! ألم تعلَمِي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت يُعذَّب ببكاء أهله عليه" ولمسلم طرق أخرى بمعناه وفي لفظ"المُعوَّل عليه يُعذب".

والمعول: من عوَّل عليه وأعول، وهو البكاء بصوتٍ.

وفي رواية: عن أبي موسى قال: لما أصيب عمر أقبل صُهيب من منزله، حتى دخل على عمر، فقام بحياله يبكي، فقال عمر: على ما تبكي؟ أعليَّ تبكي؟ قال: إي، والله! لعليك أبكي يا أمير المؤمنين! قال: والله لقد علمتَ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من يُبْكي عليه يُعذب" قال: فذكرت ذلك لموسى بن طلحة فقال: كانت عائشة تقول: إنما كان أولئك اليهود.

قال الترمذي:"حديث عمر حديث حسن صحيح، وقد كره قوم من أهل العلم البكاء على الميت. قالوا: الميت يُعذَّب ببكاء أهله عليه. وذهبوا إلى هذا الحديث. وقال ابن المبارك: أرجو إن كان ينهاهم في حياته أن لا يكون عليه من ذلك شيء".




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত ব্যক্তিকে তার কবরে আযাব দেওয়া হয়, তার ওপর (জীবিতরা) বিলাপ করার কারণে।"

আরেক বর্ণনায় আছে: "মৃত ব্যক্তিকে তার জন্য জীবিতদের কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।"

(সহীহ বুখারী ও মুসলিম কর্তৃক বর্ণিত)

হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি বর্ণনা থেকে জানা যায় যে, তিনি উমরের (মৃত্যুতে) কাঁদছিলেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমার কন্যা, থামো! তুমি কি জানো না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।"

মুসলিমের অন্য একটি শব্দে এসেছে: "যার জন্য বিলাপ করা হয়, তাকে আযাব দেওয়া হয়।" আর 'মুআওয়্যাল' (বিলাপ) হচ্ছে উচ্চস্বরে ক্রন্দন করা।

আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আরেক বর্ণনায় আছে, যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আহত হলেন, তখন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার ঘর থেকে আসলেন এবং উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে গিয়ে তার সামনে দাঁড়িয়ে কাঁদতে লাগলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কীসে কাঁদছো? তুমি কি আমার জন্য কাঁদছো? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ! আমি আপনার জন্যই কাঁদছি, হে আমীরুল মুমিনীন! উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, তুমি অবশ্যই জানো যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার জন্য কান্নাকাটি করা হয়, তাকে আযাব দেওয়া হয়।" রাবী বলেন, আমি বিষয়টি মূসা ইবনু তালহার নিকট জানালে তিনি বলেন: ‘আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আসলে তারা ছিল ইহুদিরা (যাদের জন্য কান্নাকাটির কারণে আযাব হয়েছিল)।

ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি 'হাসান সহীহ'। একদল জ্ঞানান্বেষী লোক মৃতের জন্য কাঁদা অপছন্দ করেছেন। তারা বলেছেন: মৃতের ওপর তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব হয়। তারা এই হাদীসের উপর আমল করেছেন। ইবনু মুবারক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: আমি আশা করি, যদি সে (মৃত ব্যক্তি) জীবদ্দশায় তাদের কান্নাকাটি করতে নিষেধ করে থাকেন, তবে এর জন্য তার উপর কোনো আযাব হবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (3454)


3454 - عن المغيرة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن كذبًا عليَّ ليس ككذب على أحد، من كذب عليَّ متعمدًا فليتبوأ مقعده من النار" سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"من نيح عليه يُعذبْ بما نيح عليه".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1291) عن أبي نعيم، حدثنا سعيد بن عبيد، عن علي ابن ربيعة، عن المغيرة فذكر الحديث.

ورواه مسلم متفرقًا -الجزء الأول من الحديث في المقدمة (4) والجزء الثاني في الجنائز (933) من طرق، عن سعيد بن عبيد الطائي بإسناده وزاد في أول الحديث: أوَّل من نيح عليه بالكوفة قرظَةُ ابن كعب. فقال المغيرة بن شعبة: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من نيح عليه فإنه يُعذَّب بما نيح عليه يوم القيامة".

وفي الترمذي (1000) جاء الحديث مفصلًا -من طريق سعيد بن عبيد الطائي، عن علي بن ربيعة الأسدي قال: مات رجل من الأنصار يقال له قَرظة بن كعب، فنيح عليه. فجاء المغيرةُ بن شُعبة فصعد المنبر، فحمد الله وأثنى عليه وقال: ما بال النَوح في الإسلام! أما إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من نيحَ عليه عُذَّب بما نيح عليه" وقال:"غريب حسن صحيح".

ومحمل هذا الحديث على ما إذا كان النَوحُ من وصية الميت وسنته، كما كانت الجاهلية تفعل، قال طَرفَةُ:

إذا متُّ فانْعِيني بما أنا أهله … وشُقِّي عليَّ الجيبَ يابْنَة معبد

ذكره القرطبي في"المفهم" (2/ 582).




মুগীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আমার উপর মিথ্যা আরোপ করা অন্য কারও উপর মিথ্যা আরোপ করার মতো নয়। যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করে, সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়।" আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আরও বলতে শুনেছি: "যার জন্য মাতম করা হয় (নুওয়াহা করা হয়), তাকে এর কারণে শাস্তি দেওয়া হয়, যা তার জন্য করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3455)


3455 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله:"الميت يعذَّب ببكاء أهله عليه".

صحيح: رواه ابن حبان في صحيحه (3135) عن أبي يعلى، حدثنا العباس بن الوليد النرسي، حدثنا يحيى القطان، حدثنا عبيدالله بن عمر، أخبرني نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث، وإسناده صحيح.

ورواه الطبراني (12/ 272، 344) من أوجه، عن ابن عمر مثله.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাইয়্যিতকে তার পরিবারের কান্নাকাটির কারণে আযাব দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3456)


3456 - عن محمد بن سيرين قال: ذكر عند عمران بن حصين: الميتُ يعذب ببكاء الحي، فقال عمران: قاله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه النسائي (1849) عن محمود بن غيلان، قال: حدثنا أبو داود، قال: حدثنا شعبة، عن عبد الله بن صبيح، قال: سمعت محمد بن سيرين يقول فذكره.

والحديث في مسند أبي داود الطيالسي (895) ومن طريقه أخرجه ابن حبان في صحيحه (3134)، ورواه الإمام أحمد (19918)، والطبراني (18/ 440) كلاهما من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة بإسناده وفيه: ذكروا عند عمران بن حصين:"الميت يعذَّب بكاء الحي" فقالوا: كيف يعذب الميت ببكاء الحي؟ فقال عمران: قد قاله صلى الله عليه وسلم.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن صبيح فإنه حسن الحديث.

وأما ما رُوي عن الحسن، عن عمران بن حصين قال: الميت يعذب بنياحة أهله عليه، فقال له رجل: أرأيت رجلًا مات بخراسان وناح عليه أهله هنا أكان يُعذَّب بنياحة أهله؟ قال: صدق رسول الله صلى الله عليه وسلم وكذبت أنت. فيه انقطاع. رواه النسائي (1854) من طريقه، والحسن لم يسمع من عمران ابن حصين على القول المشهور، وقيل: إنه قد سمع منه.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কাছে যখন উল্লেখ করা হলো যে, মৃতের উপর জীবিতদের কান্নার কারণে আযাব হয়, তখন ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথা বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3457)


3457 - عن موسى بن أبي موسى الأشعري، عن أبيه، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الميت يُعذبَّ ببكاء الحيّ إذا قالوا: وا عضداهُ، وا كاسِياهْ، وا ناصِراهْ، وا جبلاهْ ونحو هذا، يُتعتع ويقال: أنت كذلك؟ أنت كذلك".

قال: أَسيد: فقلتُ سبحان الله إن الله يقول: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164] قال: ويحك! أحدثك أنّ أبا موسى حدثني عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فترى أن أبا موسي كذَب على النبي صلى الله عليه وسلم؟ أو ترى أنّي كذبتُ على أبي موسى؟ .

حسن: رواه ابن ماجه (1594) عن يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي، قال: حدثنا أسيد بن أبي أَسِيد، عن موسى بن أبي موسى الأشعري به فذكره.

وفيه شيخ ابن ماجه قال فيه الحافظ في التقريب:"صدوق ربما وهم".

قلت: ولكنه توبع، فقد رواه الإمام أحمد (19716) عن أبي عامر (وهو عبد الملك بن عمرو العقدي) قال: ثنا زهير، عن أَسيد بن أبي أَسيد بإسناده فذكره. وصحَّحه الحاكم (2/ 471) ورواه
من طريق أبي عامر العقدي.

ورواه الترمذي (1003) من وجه آخر عن أسيد بن أبي أسيد واختصر على قوله:"ما من ميت يموت فيقوم باكية فيقول: وا جبلاه! وا سيداه! أو نحو ذلك، إلا وُكل به ملكان يلهزانه! أهكذا كنت؟".

وقال:"حسن غريب".

قلت: وهو كما قال، فإن مداره على أسيد بن أبي أسيد البراد وهو"صدوق".




আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জীবিতদের কান্নার কারণে মৃত ব্যক্তিকে আযাব দেওয়া হয়, যখন তারা বলে: 'হায় আমার বাহুবল! হায় আমার আশ্রয়দাতা! হায় আমার সাহায্যকারী! হায় আমার পর্বত (শক্তিশালী)!'- এবং এর অনুরূপ কথা। তাকে ধাক্কা দেওয়া হয় এবং বলা হয়: 'তুমি কি এরূপ ছিলে? তুমি কি এরূপ ছিলে?'"

বর্ণনাকারী উসাইদ বললেন, আমি (অন্য বর্ণনাকারীকে) বললাম: সুবহানাল্লাহ! নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা বলেন: "কেউ অন্য কারো বোঝা বহন করবে না।" [সূরা আন'আম: ১৬৪] তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: তোমার জন্য আফসোস! আমি তোমাকে আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত হাদীস বলছি, আর তুমি কি মনে করো আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর মিথ্যা আরোপ করেছেন? অথবা তুমি কি মনে করো আমি আবূ মূসার ওপর মিথ্যা আরোপ করেছি?









আল-জামি` আল-কামিল (3458)


3458 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الميت يعذَّبُ بما نيح عليه".

صحيح: رواه الإمام أحمد (20110)، والطبراني في"الكبير" (6896) كلاهما من حديث عبد الصمد، حدثنا عمر بن إبراهيم، حدثنا قتادة، عن الحسن، عن سمرة فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وأما سماع الحسن من سمرة فالصحيح الذي عليه جمهور أهل العلم أنه سمع منه مطلقًا، أعني حديث العقيقة وغيره.




সمرة ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মৃত ব্যক্তিকে তার জন্য কৃত বিলাপের কারণে শাস্তি দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3459)


3459 - عن عمرة بنت عبد الرحمن أنها أخبرت، أنها سمعت عائشة أم المؤمنين تقول: - وذكر لها أن عبد الله بن عمر يقول: إن الميت ليعذبُ ببكاء أهله، فقالت عائشة: يغفر الله لأبي عبد الرحمن، أما إنه لم يكذب. ولكنه نسيَ، أو أخطأ، إنما مر النبي صلى الله عليه وسلم بيهودية يبكي عليها أَهلُها فقال:"إنكم لتبكون عليها، وإنها لتُعذب في قبرها".

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (37) عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن عمرة بنت عبد الرحمن فذكرته.

ورواه البخاري في الجنائز (1289)، ومسلم في الجنائز (932/ 27) كلاهما من طريق مالك ابن أنس إلا أن البخاري اختصره.

وفي رواية: مر النبي صلى الله عليه وسلم برجل يهودي فقال:"إن الميت ليعذّب وإن أهله ليبكون عليه".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে (আয়িশাকে) স্মরণ করিয়ে দেওয়া হলো যে, আবদুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে শাস্তি দেওয়া হয়। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আবূ আবদুর রাহমানকে (আবদুল্লাহ ইবনু উমারকে) ক্ষমা করুন। তিনি মিথ্যা বলেননি, তবে তিনি ভুলে গেছেন অথবা ভুল করেছেন। আসলে ঘটনা হলো, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এক ইহুদী নারীর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যার জন্য তার পরিবার কাঁদছিল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা অবশ্যই তার জন্য কাঁদছো, কিন্তু তাকে তার কবরে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একজন ইহুদী ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, যদিও তার পরিবার তার জন্য কাঁদছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3460)


3460 - عن عروة بن الزبير قال: ذُكر عند عائشة أن ابن عمر رفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الميت يُعذَّب في قبره ببكاء أهله" فقالت: إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنه ليعذب بخطيئته وذنبه، وإن أهله ليكون عليه الآن".

وقالت: وذلك مثل قوله: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على القَلِيب، وفيه قتلى بدرٍ من المشركين، فقال لهم ما قال:"إنهم ليسمعون ما أقول" إنما قال:"إنهم الآن ليعلمون أن ما كنتُ أقول لهم حق" ثم قرأت: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [سورة النمل: 80].
{وَمَا أَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ} [سورة فاطر: 22] يقول: حين تبوؤا مقاعدهم من النار.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3978، 3979)، ومسلم في الجنائز (932) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট এই আলোচনা হলো যে, ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে এই মর্মে হাদীস বর্ণনা করেছেন: "নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে কবরে শাস্তি দেওয়া হয়।"

তখন তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো শুধু এই কথাই বলেছেন: "নিশ্চয়ই সে তার নিজের ভুল ও পাপের কারণে শাস্তিপ্রাপ্ত হয়, আর এই সময় তার পরিবার পরিজন তার উপরে কান্নাকাটি করতে থাকে।"

তিনি (আয়িশা) আরও বললেন: এটা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই উক্তির মতোই, যখন তিনি কূপের ধারে দাঁড়ালেন, যেখানে বদরের মুশরিকদের মৃতদেহ ফেলা হয়েছিল। অতঃপর তিনি তাদের লক্ষ্য করে যা বলার বললেন। কিন্তু (ইবনু উমার যা বর্ণনা করেছেন,) 'নিশ্চয়ই তারা আমি যা বলছি তা শুনতে পাচ্ছে' – এমনটি নয়। বরং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তারা এখন জানতে পারছে যে, আমি তাদের কাছে যা বলতাম তা সত্য।"

অতঃপর তিনি এই আয়াত পড়লেন: "নিশ্চয়ই আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারেন না।" (সূরা নামল: ৮০)। "আর যারা কবরের মধ্যে আছে আপনি তাদেরও শোনানোর নন।" (সূরা ফাতির: ২২)। (এই আয়াতের অর্থ হলো) যখন তারা জাহান্নামের মধ্যে তাদের স্থান গ্রহণ করল (তখন তাদের জ্ঞান হলো)।









আল-জামি` আল-কামিল (3461)


3461 - عن عروة قال: ذُكر عند عائشة قول ابن عمر: الميت يُعَذّبُ ببكاء أهله عليه، فقالت: رحم الله أبا عبد الرحمن، سمع شيئًا فلم يحفظه، إنما مرت على رسول الله صلى الله عليه وسلم جنازة يهودي، وهم يبكون عليه، فقال:"أنتم تبكون وإنه ليعذَّبُ".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (931) من طرق، عن حماد بن زيد، عن هشام بن عروة، عن أبيه فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তাঁর (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে ইবনে উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কথাটি উল্লেখ করা হলো যে, মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে শাস্তি দেওয়া হয়। তিনি বললেন: আল্লাহ আবূ আব্দুর রাহমানকে (ইবনে উমারকে) রহম করুন। তিনি কিছু শুনেছিলেন, কিন্তু তা সঠিকভাবে মনে রাখতে পারেননি। ঘটনা হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে এক ইয়াহুদীর জানাযা যাচ্ছিল এবং তারা (ইয়াহুদীর পরিবার) তার জন্য কাঁদছিল। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কাঁদছো, অথচ তাকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3462)


3462 - عن عبد الله بن عبيدالله بن أبي مليكة قال: تُوُفِّيَتْ ابنةٌ لعثمانَ بمكة وجئنا لنشهدَها، وحضرها ابن عمر وابن عباس رضي الله عنهما، وإني لجالسٌ بينَهما - أو قال: جَلستُ إلى أحَدِهما، ثم جاء الآخَرُ فجلسَ إلى جَنبي- فقال عبد الله بن عمر رضي الله عنهما لعمرو بن عثمان: ألا تنهي عنِ البكاء؟ فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الميِّتَ ليُعذَّبُ ببكاء أهله عليه".

فقال ابن عباس: قد كان عمرُ يقول بعضَ ذلك، ثم حدَّثَ قال: صدرتُ مع عمر من مكة، حتى إذا كنا بالبَيْداء إذا هو بركب تحت ظِلِّ سَمُرةٍ، فقال: اذهَبْ فانظر من هؤلاء الركبُ. قال: فنظرتُ فإذا صُهَيبٌ، فأخبرتُه، فقال: ادْعُهُ لي، فرجعتُ إلى صُهَيب قلتُ: ارتَحِلْ فالحقْ بأمير المؤمنين. فلما أصيبَ عمرُ دخلَ صُهيبٌ يَبكي يقولُ: وا أخاهُ وا صاحباهُ. فقال عمرُ: يا صُهيبُ أتبكي عليَّ وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الميِّت يُعذَّبُ ببعضِ بُكاء أهلِه عليه".

قال ابن عباس: فلما ماتَ عمرُ ذكرتُ ذلك لعائشة فقالت: رحم الله عمر، والله! ما حدَّث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن الله ليُعذب المؤمن ببكاء أهله عليه، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: إن الله ليزيد الكافر عذابًا ببكاء أهله عليه، وقالت: حسبُكم القرآن {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164] قال ابن عباس عند ذلك: والله {هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَى} [النجم: 43] قال ابن مليكة: والله! ما قال ابن عمر شيئًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1286، 1287، 1288)، ومسلم في الجنائز (928) كلاهما من طريق ابن جريج، قال: أخبرني عبد الله بن أبي مليكة فذكر الحديث بمثله واللفظ للبخاري.




আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মক্কায় উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এক কন্যা মারা গেলেন এবং আমরা তার জানাযায় উপস্থিত হলাম। সেখানে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। আমি তাঁদের দুজনের মাঝখানে বসেছিলাম— অথবা তিনি (রাবী) বলেছেন: আমি তাঁদের একজনের পাশে বসলাম, এরপর অন্যজন এসে আমার পাশে বসলেন— তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমর ইবনু উসমানকে বললেন: আপনি কি (লোকদের) কান্নার বিষয়ে নিষেধ করবেন না? কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই মাইয়্যেতকে তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।"

তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ কথা বলতেন। এরপর তিনি (ইবনু আব্বাস) বর্ণনা করে বললেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে মক্কা থেকে রওনা হলাম। যখন আমরা বায়দা নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তিনি একটি বাবলা গাছের ছায়ায় একদল আরোহীকে দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: যাও, দেখ এই আরোহীরা কারা? রাবী বলেন: আমি দেখলাম যে, তিনি হচ্ছেন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি তাঁকে (উমরকে) জানালাম। তিনি বললেন: তাকে আমার কাছে ডেকে নিয়ে এসো। আমি সুহাইবের কাছে ফিরে এসে বললাম: রওনা হোন এবং আমীরুল মু'মিনীন-এর সঙ্গে মিলিত হোন।

এরপর যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আঘাতপ্রাপ্ত হলেন, তখন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাঁদতে কাঁদতে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: হায় আমার ভাই! হায় আমার সাথী! তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে সুহাইব! তুমি কি আমার জন্য কাঁদছ? অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই মাইয়্যেতকে তার পরিবারের কারো কারো কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।"

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন, তখন আমি এ বিষয়টি (এই হাদিসটি) আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহ উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর রহম করুন! আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কথা কখনো বলেননি যে, আল্লাহ মু'মিনকে তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব দেন। বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ কাফির ব্যক্তির উপর তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব আরও বাড়িয়ে দেন। তিনি (আইশা) বললেন: তোমাদের জন্য তো কুরআনই যথেষ্ট: "কেউ অপরের বোঝার ভার বহন করবে না।" [সূরা আন‘আম: ১৬৪]

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: আল্লাহর কসম! তিনিই (আল্লাহই) হাসালেন এবং তিনিই কাঁদান। [সূরা নাজম: ৪৩] ইবনু মুলাইকা বললেন: আল্লাহর কসম! ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোনো জবাব দেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (3463)


3463 - عن عبد الله بن أبي مليكة قال: كنتُ إلى جنب ابن عمر، ونحن ننتظر جنازةَ أم أبان بنت عثمان، وعنده عمرو بن عثمان، فجاء ابن عباس يقودُه قائد، فأُراه أخبره بمكان ابن عمر، فجاء حتى جلس إلى جَنْبي، فكنت بينهما، فإذا صوت من الدار، فقال ابن عمر -كأنه يَعرِض على عمرو أن يقوم ينهاهم- سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الميت ليُعذب ببكاء أهله".

قال: فأرسلها عبد الله مرسلة.

فقال ابن عباس: كنا مع أمير المؤمنين عمر بن الخطاب، حتى إذا كنا بالبيداء، إذا هو برجل نازل في شجرة، فقال لي: اذهب فاعلم لي من ذاك الرجل، فذهبتُ فإذا هو صهيب فرجعت إليه، فقلت: إنك أمرتني أن أعلم لك من ذاك، وإنه صهيب، قال: مره فليلحق بنا، فقلت: إن معه أهله، قال: وإن كان معه أهله (وربما قال أيوب: مره فليلحق بنا)، فلما قدمنا لم يلبث أمير المؤمنين أن أصيب، فجاء صهيب يقول: وا أخاه! وا صاحباه! فقال عمر: ألم تعلم، أو لم تسمع (قال أيوب: أو قال: أو لم تعلم أو لم تسمع) أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت ليعذب ببعض بكاء أهله".

قال: فأما عبد الله فأرسلها مرسلة، وأما عمر فقال: ببعض.

فقمتُ فدخلت على عائشة، فحدثتُها بما قال ابن عمر، فقالت: لا، والله! ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم قط"إنَّ الميت يعذَّب ببكاء أحد"، ولكنه قال:"إن الكافر يزيده الله ببكاء أهله عذابًا، وإن الله لهو أضحك وأبكى، ولا تزرُ وازرَةٌ وزر أخرى".

قال أيوب: قال ابن أبي مليكة: حدثني القاسم بن محمد قال: لما بلغ عائشة قول عمر وابن عمر قالت: إنكم لتحدثوني عن غير كاذِبين ولا مُكذَّبين. ولكن السمع يُخطئُ.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (928) عن داود بن رُشيد، حدثنا إسماعيل ابن عُلية، حدثنا أيوب، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره.

قوله: فأرسله عبد الله مرسلة -معناه أن ابن عمر أطلق في روايته تعذيب الميت ببكاء الحي، ولم يُقيد بيهودي، كما قيدتُه عائشة، ولا بوصية كما قيده آخرون، ولا قال ببعض بكاء أهله كما رواه أبوه عمر بن الخطاب.

لقد ثبت بأَسانيد صحيحة عن عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله، والمغيرة بن شعبة، وعمران بن
حصين، وغيرهم أن الميت يعذب ببكاء أهله، وهل هذه الأحاديث الصّحيحة مخالفة لقوله تعالى: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} كما فهمت عائشة رضي الله عنها، وخصصت بأن ذلك كان لأجل عذاب اليهود، والأظهر أن تخطيئة هؤلاء الصحابة جميعًا لا يصح، لأنهم هكذا سمعوا من النبي صلى الله عليه وسلم ورواه عنهم الثقات الضابطون، لا مطعن في صدقهم وحفظهم. لذا يجب تفسير هذه الأحاديث وتأويلها حيث لا تخالف الآية الكريمة.

ومن هذه التأويلات: إن الناس في الجاهلية، كانوا يتفاخرون بالنياحة عليه عند موتهم، فكانوا يوصون بذلك نساءهم وزوجاتهم، فلما حرِّمت النياحةُ وجب عليهم أن يمنعوا من ذلك، فلما لم يمنعوا، وقد نيح عليهم حسب العادات الجاهلية فكان ذلك سببًا لعذابهم، فمن تفطن لذلك منع منها مثل عمر بن الخطاب - ومن لم يتفطن ولم يمنع، وقد نيح عليه عُذِّب.

قال الخطابي رحمه الله: قد يحتمل أن يكون الأمر في هذا على ما ذهبت إليه عائشة لأنها قد روت (أن ذلك إنما كان في شأن يهودي) والخبر المفسر أولى من المجمل ثم احتجت بالآية، وقد يحتمل أن يكون ما رواه ابن عمر صحيحًا من غير أن يكون فيه خلاف الآية، وذلك أنهم كانوا يوصون أهليهم بالبكاء والنوح عليهم، وكان ذلك مشهورًا من مذاهبهم وهو موجود في أشعارهم كقول القائل وهو طرفة:

إذا مت فانعيني بما أنا أهله … وشقي عليّ الجيب يا ابنة معبد

وكقول لبيد:

فقوما فقولا بالذي تعلمانه … ولا تخمشا وجهًا ولا تحلفا الشعر

وقولا هو المرء الذي لا صديقه … أضاع ولا خان الأمين ولا غدر

إلى الحول ثم اسم السلام عليكما … ومن يبك حولًا كاملًا فقد اعتذر

ومثل هذا كثير في أشعارهم، وإذا كان كذلك فالميت إنما تلزمه العقوبة في ذلك بما تقدم من أمره إياهم بذلك وقت حياته، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سَنَّ سنة حسنة فله أجرها وأجر من عمل بها، ومن سَنَّ سنة سيئة فعليه وزرها ووزر من عمل بها"، وقولها (وهل ابن عمر) معناه: ذهب وهله إلى ذلك، يقال: وهل الرجل ووهم بمعنى واحد، كل ذلك بفتح الهاء، فإذا قلت وهل بكسر الهاء كان معناه فزع، وفيه وجه آخر ذهب إليه بعض أهل العلم، قال: وتأويله أنه مخصوص في بعض الأموات الذين وجب عليهم بذنوب اقترفوها، وجرى من قضاء الله سبحانه فيهم أن يكون عذابهم وقت البكاء عليهم، ويكون كقولهم مطرنا بنوء كذا، أي عند نوء كذا، كذلك قوله:"إن الميت يعذب ببكاء أهله" أي عند بكائهم عليه لاستحقاقه ذلك بذنبه، ويكون ذلك حالًا لا سببًا،
لأنا لو جعلناه سببًا لكان مخالفًا للقرآن وهو قوله: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164]، والله أعلم. انتهي.

وعلى هذا فحمل عائشة على عذاب اليهود أمر نسبي، فعذابهم لعدم إيمانهم بالله ورسوله، وعذاب المسلمين لعدم منعهم من النياحة بعد الموت.

وقد أطال الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن في الدفاع عن الأحاديث التي رواها عمر وابنه وغيرهما، وقال: ومحال أن يكون هؤلاء كلهم وهموا في الحديث، ثم أجاب عن شبهة عائشة مثل إجابة الخطابي وزاد عليه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশে ছিলাম। আমরা উম্মে আবান বিনত উসমানের জানাযার জন্য অপেক্ষা করছিলাম। তাঁর (ইবনু উমারের) কাছে আমর ইবনু উসমান উপস্থিত ছিলেন। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, তাঁর হাত ধরে একজন পথপ্রদর্শক তাঁকে নিয়ে আসছিলেন। আমার মনে হয়, সে ব্যক্তি তাঁকে ইবনু উমারের স্থান সম্পর্কে জানিয়েছিল। অতঃপর তিনি এসে আমার পাশে বসলেন, ফলে আমি ছিলাম তাঁদের দুজনের মাঝে। হঠাৎ ঘর থেকে একটি কান্নার আওয়াজ এল। তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন—যেন তিনি আমর ইবনু উসমানকে ইঙ্গিত করছিলেন যেন তিনি উঠে গিয়ে তাদেরকে নিষেধ করেন—আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।”

(আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা বলেন) আব্দুল্লাহ (ইবনু উমার) এই হাদীসটি কোনো প্রকার শর্ত আরোপ ছাড়াই সাধারণভাবে বর্ণনা করেছেন।

তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা আমীরুল মু'মিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। যখন আমরা বাইদা নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তিনি একটি গাছের নিচে অবতরণকারী এক ব্যক্তিকে দেখতে পেলেন। তিনি আমাকে বললেন: যাও, ঐ লোকটি কে জেনে আসো। আমি গেলাম এবং দেখলাম তিনি হলেন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে এসে বললাম: আপনি আমাকে যাঁর পরিচয় জানতে বলেছিলেন, তিনি হলেন সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাকে বলো, সে যেন আমাদের সাথে যোগ দেয়। আমি বললাম: তার সাথে তো তার পরিবারও রয়েছে। তিনি বললেন: যদি তার সাথে তার পরিবারও থাকে তবুও (আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) সম্ভবত বলেছেন: তাকে বলো, সে যেন আমাদের সাথে যোগ দেয়)। যখন আমরা (মদীনায়) পৌঁছলাম, এর কিছুদিন পরই আমীরুল মু'মিনীন (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) আঘাতপ্রাপ্ত হলেন। সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে কান্নাকাটি করে বলতে লাগলেন: ওহ! আমার ভাই! ওহ! আমার সাথী! তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি জানো না, কিংবা তুমি কি শোনোনি—(আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: অথবা তিনি বলেছেন: তুমি কি জানো না কিংবা তুমি কি শোনোনি) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কিছুটা কারণে আযাব দেওয়া হয়।”

(বর্ণনাকারী) বলেন: আব্দুল্লাহ (ইবনু উমার) (এই হাদীসটি) সাধারণভাবে বর্ণনা করেছেন, আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: ‘কিছুটা কারণে’ (ببعض)।

তারপর আমি (আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা) উঠলাম এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে তাঁকে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা জানালাম। তিনি বললেন: না, আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কখনো বলেননি যে, "নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে কারো কান্নার কারণে আযাব দেওয়া হয়।" বরং তিনি বলেছেন: "নিশ্চয়ই কাফিরের উপর তার পরিবারের কান্নার কারণে আল্লাহ আযাব বাড়িয়ে দেন। আর নিশ্চয়ই আল্লাহই হাসিয়েছেন এবং কাঁদিয়েছেন। আর কোনো বহনকারী অপরের বোঝা বহন করবে না।"

আইয়ুব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু আবী মুলাইকা বলেছেন: আমাকে কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন যে, যখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য পৌঁছালো, তখন তিনি বললেন: তোমরা আমাকে এমন ব্যক্তিদের পক্ষ থেকে বর্ণনা করছো যারা মিথ্যাবাদী নন এবং যাদের মিথ্যা প্রতিপন্নও করা হয়নি। কিন্তু (অনেক সময়) শ্রবণে ভুল হয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (3464)


3464 - عن جابر بن عبد الله قال: جيئ بأبي يوم أحُد قد مُثِّل به حتى وُضع بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد سُجي ثوبًا، فذهبت أريد أن أكشف عنه، فنهاني قومي، ثم ذهب أكشف عنه فنهاني قومي، فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم فرُفع، فسمع صوت صائحة فقال:"من هذه؟" فقالوا: ابنة عمرو -أو أخت عمرو- قال:"فلم؟ تبكي أو لا تبكي، فما زالت الملائكة تُظله بأجنحتها حتى رُفع".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1293)، ومسلم في فضائل الصحابة (2471) كلاهما من حديث سفيان، حدثنا ابن المنكدر، قال: سمعت جابر بن عبد الله فذكره ولفظهما سواء.

وقوله:"تبكي أو لا تبكي" للتخيير، ومعناه أنه مكرم بصنيع الملائكة، وتزاحمهم عليه لصعودهم بروحه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উহুদ যুদ্ধের দিন আমার পিতাকে আনা হলো, তার অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল। তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে রাখা হলো এবং একটি কাপড় দিয়ে ঢেকে দেওয়া হয়েছিল। আমি তার (মুখ) উন্মোচন করতে যেতে চাইলাম, কিন্তু আমার লোকেরা আমাকে বারণ করল। আমি আবার তার (মুখ) উন্মোচন করতে যেতে চাইলাম, কিন্তু আমার লোকেরা আমাকে বারণ করল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তাকে) তুলে নিতে নির্দেশ দিলেন। তিনি এক ক্রন্দনকারিণীর শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “এ কে?” লোকেরা বলল, ‘ইনি আমরের কন্যা’ – অথবা তারা বলল, ‘আমরের বোন।’ তিনি বললেন, “কেন? সে কাঁদুক বা না কাঁদুক, ফেরেশতাগণ তাদের ডানা দিয়ে তাকে ছায়া দিতে থাকল যতক্ষণ না তাকে তুলে নেওয়া হলো।”









আল-জামি` আল-কামিল (3465)


3465 - عن أسامة بن زيد قال: أرسلت ابنةُ النبي صلى الله عليه وسلم إليه إن ابنًا لي قُبض، فَأتِنا، فأرسل يُقرئ السلام، ويقول:"إن الله ما أخذ، وله ما أعطى، وكل عنده بأجل مسمي، فلتصبر ولتحتسب" فأرسلتْ إليه قسم عليه ليأْتِينَّها، فقام ومعه سعد بن عبادة، ومعاذ بن جبل، وأبي بن كعب، وزيد بن ثابت، ورجال، فرفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم الصبي، ونفسُه تتقَعْقَع، -قال: حسبته أنه قال: كأنها شنٌ، ففاضت عيناه، فقال سعد: يا رسول الله! ما هذا؟ فقال:"هذه رحمة جعلها الله في قلوب عباده، وإنما يرحم الله من عباده الرحماءَ".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1284)، ومسلم في الجنائز (923) كلاهما من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن أبي عثمان النهدي، عن أسامة بن زيد فذكره، واللفظ للبخاري،
ولفظ مسلم قريب منه.

وبعد الرجوع إلى كتب التاريخ والسير تبين لي أن المُرسلة ابنة النبي صلى الله عليه وسلم هي فاطمة، والصبي هو: محسن بن علي بن أبي طالب، لأن أهل العلم بالأخبار اتفقوا على أنه مات صغيرًا في حياة النبي صلى الله عليه وسلم.

وقيل إن المرسلة ابنة النبي صلى الله عليه وسلم هي زينب، ولكن بشكل على هذا، اسم الصبي الذي مات، وزينب لم تلد إلا علي بن أبي العاص بن الربيع، وهو قد ناهز الحلم يوم الفتح، وأمامة التي عاشت بعد النبي صلى الله عليه وسلم وتزوجها علي بن أبي طالب بعد وفاة فاطمة.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কন্যা তাঁর কাছে লোক মারফত খবর পাঠালেন যে, আমার এক সন্তানের মৃত্যু হয়েছে, তাই আপনি আমাদের কাছে আসুন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন লোক মারফত সালাম পাঠিয়ে জানালেন, "যা কিছু আল্লাহ নিয়ে গেছেন তা তাঁরই, আর যা কিছু তিনি দিয়েছেন তাও তাঁরই। সবকিছুই তাঁর কাছে একটি নির্দিষ্ট সময়ের জন্য নির্ধারিত। অতএব, তুমি ধৈর্য ধারণ করো এবং আল্লাহর কাছে এর প্রতিদান আশা করো (ইহতিসাব করো)।" কন্যা পুনরায় লোক পাঠালেন এবং তাঁকে কসম দিলেন যে, তিনি যেন অবশ্যই আসেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠে দাঁড়ালেন। তাঁর সঙ্গে ছিলেন সা‘দ ইবনে উবাদা, মু‘আয ইবনে জাবাল, উবাই ইবনে কা‘ব, যায়েদ ইবনে সাবেত এবং আরও কয়েকজন লোক। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে শিশুটিকে তুলে দেওয়া হলো, তখন তার শ্বাস-প্রশ্বাস (মৃত্যু যন্ত্রণায়) আটকে যাচ্ছিল। বর্ণনাকারী বলেন, আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: এটি যেন পুরানো মশকের মতো শব্দ করছিল। তখন তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) চোখ থেকে অশ্রু গড়িয়ে পড়ল। সা‘দ (ইবনু উবাদা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! এটি কী?' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'এটি হলো সেই রহমত, যা আল্লাহ তাঁর বান্দাদের হৃদয়ে রেখেছেন। আর আল্লাহ তাঁর দয়ালু বান্দাদেরকেই দয়া করেন।'









আল-জামি` আল-কামিল (3466)


3466 - عن عبد الله بن عمر قال: اشتكى سعد بن عبادة شكوى له، فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يَعُوده مع عبد الرحمن بن عوف وسعد بن أبي وقَّاص وعبد الله بن مسعود، فلما دخل عليه فوجده في غاشية أهله فقال:"قد قضى؟" قالوا: لا يا رسول الله! فبكى النبي صلى الله عليه وسلم، فلما رأى القومُ بكاءَ النبي صلى الله عليه وسلم بكوا. فقال:"ألا تسمعون؟ إن الله لا يعذب بدمع العين، وبحزن القلب، ولكن يُعَذِّب بهذا -وأشار إلى لسانه- أو يرحم، وإن الميت يعذب ببكاء أهله عليه".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1304)، ومسلم في الجنائز (924) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، عن سعيد بن الحارث الأنصاري، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث، ولفظهما سواء.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একবার অসুস্থ হয়ে পড়েন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে আবদুর রহমান ইবনে আওফ, সা'দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস এবং আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে তাঁকে দেখতে গেলেন। যখন তিনি তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন দেখলেন যে তিনি তাঁর পরিবারের সদস্যদের ভিড়ে আছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তিনি কি ইন্তেকাল করেছেন?" তারা বললো: "না, ইয়া রাসূলাল্লাহ!" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেঁদে ফেললেন। যখন উপস্থিত লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কান্না দেখলেন, তখন তারাও কাঁদতে শুরু করলো। তিনি বললেন: "তোমরা কি শোনো না? নিশ্চয় আল্লাহ চোখের জলের কারণে এবং অন্তরের দুঃখের কারণে শাস্তি দেন না। বরং তিনি এর দ্বারা শাস্তি দেন— (এই বলে তিনি তাঁর জিহ্বার দিকে ইঙ্গিত করলেন)— অথবা দয়া করেন। আর নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে শাস্তি দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3467)


3467 - عن عائشة قالت: لما جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم قتلُ ابن حارثة وجعفر وابن رواحة جلس، يُعرف فيه الحزنُ، وأنا أنظر من صائر الباب شَقِ الباب.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1299)، ومسلم في الجنائز (935) كلاهما عن محمد ابن المثنى، حدثنا عبد الوهاب، قال: سمعتُ يحيي، قال: أخبرتْني عمرة قالت: سمعت عائشة فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ইবনু হারিসা, জা‘ফর এবং ইবনু রাওয়াহার শহীদ হওয়ার খবর এলো, তখন তিনি বসে পড়লেন। তাঁর চেহারায় বিষাদের চিহ্ন স্পষ্ট বোঝা যাচ্ছিল। আর আমি দরজার ফাঁক দিয়ে তাকাচ্ছিলাম।