হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3561)


3561 - عن الصنابحي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تزال أمتي، أو هذه الأمة في مسكة من دينها ما لم يكلوا الجنائز إلى أهلها".

صحيح: رواه الحاكم (1/ 370) من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا وكيع، عن الصلت بن بهرام، عن الحارث بن وهب، عن الصنابحي قال: فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، إن كان الصنابحي هذا عبد الله، فإن كان عبد الرحمن بن عسيلة الصنابحي، فإنه مختلف في سماعه من النبي صلى الله عليه وسلم".

قلت: الصلت بن بهرام له ترجمة في لسان الميزان، وهو ثقة، ولم يؤخذ عليه إلا الإرجاء.




আস-সুনাবিহী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মত, অথবা এই উম্মত তাদের দ্বীনের দৃঢ়তা ধরে রাখবে, যতক্ষণ না তারা জানাযার বিষয়গুলো তার হকদারদের হাতে সোপর্দ করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3562)


3562 - عن أبي هريرة، عن النبي -صلي الله عليه وسلم- قال:"أسرعوا بالجنازة، فإن تك صالحة فخير ما تقدموها إليه، وإن يك سوى ذلك فشرٌ تضعونه عن رقابكم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1315)، ومسلم في الجنائز (944) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، قال: حفظناه من الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكر الحديث. ورواه مالك في الجنائز (56) عن نافع، عن أبي هريرة فذكره.

وأما ما رُوي عنه قال: كنت مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم- في جنازة فكنت إذا مشيتُ سبقني فأهرول، فإذا هرولتُ سبقتُه، فالتفتُّ إلى رجل جنبي فقلت: تُطْوى له الأرضُ وخليل إبراهيم. ففيه رجلٌ مجهولٌ.

رواه إسحاق بن راهويه في مسنده (139) عن النضر بن شميل، وأحمد (7506، 7929) عن يزيد، كلاهما عن عبد الله بن عون، حدثني أبو محمد عبد الرحمن بن عبيد، عن أبي هريرة فذكره.

وأبو محمد عبد الرحمن بن عبيد، لم يرو عنه إلا عبد الله بن عون بن أرطبان، ولم يوثقه أحد فهو في عداد المجهولين، إلا أن ابن حبان ذكره في"الثقات" (6/ 94) على قاعدته.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা জানাযা নিয়ে দ্রুত চলো। কারণ, যদি সে সৎ হয়ে থাকে, তবে তোমরা তাকে উত্তম কিছুর দিকে দ্রুত পৌঁছিয়ে দাও। আর যদি সে এর ব্যতিক্রম হয়, তবে তোমরা একটি অনিষ্টকে তোমাদের কাঁধ থেকে নামিয়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3563)


3563 - عن أبي سعيد الخدري قال: كان النبي -صلي الله عليه وسلم- يقول:"إذا وضعت الجنازةُ فاحتملها الرجال على أعناقهم، فإن كانت صالحةً قالت: قدِّموني، وإن كانت غير صالحة قالت لأهلها: يا ويلَها، أَين يذهبون بها؟ يسمع صوتها كل شيء إلا الإنسان، ولو سمع الإنسان لصَعِق".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1316) عن عبد الله بن يوسف، حدثنا الليث، حدثنا سعيد، عن أبيه، أنه سمع أبا سعيد الخدري فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "যখন জানাযা রাখা হয় এবং লোকেরা কাঁধে করে তা বহন করে, তখন যদি তা (মৃতদেহ) সৎ হয়, তবে সে বলতে থাকে: আমাকে দ্রুত সামনে নিয়ে যাও! আর যদি তা অসৎ হয়, তবে সে তার পরিবারবর্গকে বলতে থাকে: হায় আফসোস! তারা আমাকে কোথায় নিয়ে যাচ্ছে? মানুষ ছাড়া সব কিছুই তার আওয়াজ শুনতে পায়। আর মানুষ যদি সেই আওয়াজ শুনত, তবে বেহুঁশ হয়ে যেত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3564)


3564 - عن عيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه قال: شهدتُ جنازة عبد الرحمن بن سمرة،
وخرج زياد يمشي بين يدي السرير، فجعل رجال من أهل عبد الرحمن ومواليهم يستقبلون السرير، ويمشون على أعقابهم ويقولون رُويدًا رُويدًا بارك الله فيكم فكانوا يدبون دَبيبًا حتى إذا كنا في بعض طريق المربد لحقنا أبو بكرة على بغلة، فلما رأى الذي يصنعون حمل عليهم ببغلته، وأهوى إليهم بالسوط وقال: خلُّوا فوالذي أكرم وجه أبي القاسم صلى الله عليه وسلم لقد رأيتنا مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم- وإنا لنكاد نرملُ بها رَمَلًا فانبسط القوم.

حسن: رواه أبو داود (3183) من طريق خالد بن الحارث، وعيسى بن يونس، والنسائي (1912) من طريق خالد وحده، عن عيينة بن عبد الرحمن به فذكره، واللفظ للنسائي، واختصره أبو داود.

ورواه الإمام أحمد (20400) عن يحيى بن سعيد، عن عيينة به مثله.

كل هؤلاء قالوا في حديثهم:"عبد الرحمن بن سمرة" ورواه أبو داود (3182) من وجه آخر عن شعبة، عن عيينة بن عبد الرحمن فقال في حديثه"عثمان بن أبي العاص" قال البخاري: هذا وهم، والصواب: عبد الرحمن بن سمرة.

قلت: وهو الصواب، وكذلك أخرجه أيضًا ابن حبان في صحيحه (3043)، والحاكم (3/ 446) من وجهين آخرين عن عيينة بن عبد الرحمن.

وعبد الرحمن بن سمرة هو ابن حبيب بن عبد شمس صحابي، افتح سجستان، ثم سكن البصرة، ومات بها سنة خمسين، صلي عليه زياد، ومشى في جنازته، هكذا قاله مصعب بن عبد الله الزبيري، رواه الحاكم (3/ 444) من طريق إبراهيم بن إسحاق الحربي، عنه.

ثم رواه النسائي (1913)، والحاكم (1/ 355) كلاهما من طريق هشيم، عن عيينة بن عبد الرحمن، واقتصرا على قول أبي بكرة: لقد رأيتُنا مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم-، وإنا لنكاد نرمُل بها رملًا. قال الحاكم: صحيح الإسناد. وصحَّحه ابن حبان (3044) ورواه من هذا الوجه.

وعيينة بن عبد الرحمن هو ابن جَوْشن الغطفاني"صدوق" وأبوه عبد الرحمن بن جوشن"ثقة" كما في التقريب.

والمِربد: بكسر الميم وفتح الباء -موضع بالبصرة.

وأما ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"إذا مات أحدكم فلا تحبسوه، وأسرعوا به إلى قبره، وليقرأ عند رأسه بفاتحة الكتاب، وعند رجليه بخاتمة البقرة في قبره" فهو ضعيف. رواه الطبراني في"الكبير" (12/ 444) عن أبي شُعيب الحراني، ثنا يحيى بن عبد الله البابلتي، ثنا أيوب بن نهيك قال: سمعتُ عطاء بن أبي رباح يقول: سمعت ابن عمر فذكر الحديث.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 44): ورواه الطبراني في"الكبير"، وفيه يحيي بن عبد الله البابلتي
ضعيف".

قلت: وفيه أيضًا شيخه أيوب بن نَهيك ضعَّفه أبو حاتم وغيره، وقال الأزدي: متروك، وقال أبو زرعة: هو منكر الحديث، وذكره ابن حبان في ثقاته وقال: يخطئ، ترجمه الحافظ في"اللسان".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن طلحة بن البراء في مرضه الذي أتاه النبي -صلي الله عليه وسلم- يعود فقال:"إني لا أرى طلحة إلا قد حدث فيه الموت، فآذنوني به وعَجِّلوا، فإنه لا ينبغي لجيفة مسلم أن تحبس بين ظهراني أهله".

رواه أبو داود (3159) عن عبد الرحيم بن مطرف الرواسي أبي سفيان وأحمد بن جناب، قالا: حدثنا عبي، قال أبو داود: وهو ابن يونس عن سعيد بن عثمان البلوي، عن عزرة، وقال عبد الرحيم: عروة بن سعيد الأنصاري، عن أبيه، عن الحصين بن وحْوَح أن طلحة بن البراء مرض فذكر الحديث.

وفيه عروة أو عزرة"مجهول" كما قال الحافظ في التقريب، والراوي عنه سعيد بن عثمان البلوي، لم يرو عنه سوى عيسى بن يونس، ولم يوثقه أحد فهو"مجهول" أيضًا إلا أن الحافظ قال فيه:"مقبول" تبعًا لذكره ابن حبان في"الثقات" ولكن هو أيضًا لم يذكر من الرواة عنه سوى عيسى ابن يونس

والحصين بن وَحْوَح -بفتح أوله، وسكون الحاء- الأنصاري الأوسي صحابي له حديث واحد هو هذا.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن علي بن أبي طالب أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- قال له:"يا علي! ثلاث لا تُؤخِّرها: الصلاة إذا أَتتْ، والجنازةُ إذا حضرتْ، والأيّمُ إذا وجدت لها كفؤًا".

رواه الترمذي (1075)، وابن ماجه (1486) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن عبد الله الجهني، عن محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، فذكره واللفظ للترمذي، وأما ابن ماجه فإنه اقتصر على قوله"لا تؤخروا الجنازة إذا حضرت".

قال الترمذي:"حديث غريب، وما أرى إسناده بمتصل".

قلت: وفيه سعيد بن عبد الله الجهني مجهول.




আবদুর রহমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবদুর রহমান ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযায় উপস্থিত ছিলাম। যিয়াদ খাটের (খাটুলির) সামনে সামনে হাঁটছিলেন। তখন আবদুর রহমানের পরিবার-পরিজন ও তাদের গোলামদের মধ্য থেকে কিছু লোক খাটের দিকে মুখ করে পেছনের দিকে হেঁটে আসছিল এবং বলছিল: আস্তে! আস্তে! আল্লাহ আপনাদের বরকত দিন! তারা খুব ধীরে ধীরে চলছিলেন। যখন আমরা মিরবাদ-এর রাস্তার কিছু অংশে পৌঁছলাম, তখন আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি খচ্চরের পিঠে চড়ে আমাদের সাথে এসে মিলিত হলেন। যখন তিনি তাদের এ কাজ দেখলেন, তখন তিনি তার খচ্চর নিয়ে তাদের ওপর চড়াও হলেন, চাবুক দিয়ে তাদের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন: রাস্তা ছাড়ো! সেই সত্তার কসম, যিনি আবুল কাসিম (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখমণ্ডলকে সম্মানিত করেছেন! আমি নিশ্চিতভাবে দেখেছি যে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, আর আমরা জানাযা নিয়ে প্রায় দ্রুতবেগে দৌড়ে যাচ্ছিলাম (রামালা - দ্রুত গতিতে হাঁটা)। তখন লোকজন দ্রুত গতিতে চলতে শুরু করল।









আল-জামি` আল-কামিল (3565)


3565 - عن المغيرة بن شعبة أن النبي -صلي الله عليه وسلم- قال:"الراكب يسير خلف الجنازة، والماشي يمشي خلْفها وأمامَها، وعن يمينها وعن يسارها قريبًا منها، والسِقْطُ يُصَلَّي عليه، ويُدْعى لوالديه بالمغفرة والرحمة".
صحيح: رواه أبو داود (3180)، والترمذي (1031)، وابن ماجه (1481، 1507)، والنسائي (1943) كلهم من طرق عن زياد بن جبير بن حية، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة فذكره، واللفظ لأبي داود.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: وهو كما قال، وقد صحَّحه ابن حبان (3049)، والحاكم (1/ 355، 363) وقال:"صحيح على شرط البخاري".

إلا أن الدارقطني أدخله في"العلل" (7/ 134 - 135) فقال:"ورواه يونس بن عبيد، عن زياد ابن جبير، واختلف عنه، فرفعه عبد الله بن بكر المزني، عن يونس. ورواه قبيصة عن الثوري، عن يونس، فشك في رفعه. ووقفه الباقون عن يونس إلا أن ابن علية وعنبسة بن عبد الواحد، قالا: عن يونس؛ وأهل زياد يرفعونه. قال يونس: وأما أنا فلا أحفظ رفعه" انتهى.

قلت: اليقين لا يزول بالشك، ثم أهل زياد أعلم من غيرهم. قال يونس: وأحسب أن أهل زياد أخبروني أنه رفعه إلى النبي -صلي الله عليه وسلم-.

هكذا ذكره أبو داود في"سننه" وعنه البيهقي (4/ 8).

ثم رواه البيهقي عن شيخه الحاكم، أنبأ أحمد بن سليمان بن الحسن الفقيه، ثنا الحسن بن مكرم، ثنا روح بن عبادة، ثنا سعيد بن عبيد الله بن جبير بن حية، قال: حدثني عمي زياد بن جبير ابن حية، قال: حدثني أبي جبير بن حية الثقفي، أنه سمع المغيرة بن شعبة يقول: فذكر الحديث.

والخلاصة: الحديث صحيح مرفوعًا، ولا يضرّ من شكَّ في رفعه.

ولكن الأفضل هو المشي إن كانت المقبرة في مسافة قصيرة لأنه لم يثبت في الأخبار الصحيحة أن النبي -صلي الله عليه وسلم- ركب ذاهبًا إلى المقبرة.

وأما ما رُوي عن جابر بن سمرة قال:"رأيتُ رسول الله -صلي الله عليه وسلم- خرج مع جنازة ثابت بن الدحداح على فرس أغَرَّ مُحَجَّلٍ يُخِبُّه ليس عليه سَرْج، معه الناس وهم حوله، قال: فنزل رسولُ الله -صلي الله عليه وسلم- فصلَّى عليه، ثم جلس حتى فُرغ منه، ثم قال: فقعد على فرسه، ثم انطلق يسير حولَه الرجالُ" فهو ضعيف جدا. رواه عبد الله في زياداته على مسند أبيه (20944) عن أبي القاسم الزهري عبد الله بن سعد، قال أبي وعمِّي قالا: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عمر بن موسي بن الوجيه، عن سماك بن حرب، عن جابر بن سمرة فذكر الحديث.

وعمر بن موسي بن الوجيه ضعيف جدًّا، قال ابن حبان:"كان ممن يروي المناكير عن المشاهير، فلما كثر في روايته عن الثقات ما لا يُشبه حديث الأثبات خرج عن حد العدالة، فاستحق الترك""المجروحين" (637).

وتكلم فيه الحافظ في"التعجيل" كلامًا شديدًا، لأن الصحيح الثابت كما يأتي أنه رجع راكبًا.
وروي عن عبد الله بن عمر قال: رأيتُ النبي -صلي الله عليه وسلم- وأبا بكر وعمر يمشون أمام الجنازة.

رواه أبو داود (3179)، والترمذي (1007)، والنسائي (1944)، وابن ماجه (1482) كلهم من طرق عن سفيان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه فذكره.

وإسناده صحيح، ولكن رجَّح أكثر المحدثين رواية الإرسال منهم ابن المبارك وأحمد والبخاري والنسائي وغيرهم.

قال الترمذي: حديث ابن عمر هكذا رواه ابن جريج وزياد بن سعد وغير واحد عن الزهري، عن سالم، عن أبيه نحو حديث ابن عيينة، وروي معمر ويونس بن يزيد ومالك وغير واحد من الحفاظ عن الزهري أن النبي -صلي الله عليه وسلم-كان يمشي أمام الجنائز، قال الزهري: وأخبرني سالم أن أباه كان يمشي أمام الجنازة، وأهل الحديث كلهم يرون أن الحديث المرسل في ذلك أصح.

قال الترمذي:"سمعت يحيى بن موسى بقول: قال عبد الرزاق، قال ابن المبارك: حديث الزهري في هذا مرسل، أصح من حديث ابن عيينة".

قال ابن المبارك: وأرى ابن جريج أخذ عن ابن عيينة.

قال الترمذي: وروى همام بن يحيى هذا الحديث، عن زياد بن سعد ومنصور وبكر وسفيان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، وإنما هو سفيان بن عيينة روى عنه همام" انتهى.

وهكذا أكَّد أيضًا النسائي فقال: سفيان ومنصور وزياد وبكر هو ابن وائل كلهم ذكروا أنهم سمعوا الزهري يحدث أن سالمًا أخبره أن أباه أخبره، أنه رأى النبي -صلي الله عليه وسلم- وأبا بكر وعمر وعثمان يمشون بين يدي الجنازة، بكر وحده لم يذكر عثمان. قال النسائي: هذا خطأ، والصواب مرسل.

ولكن روي ابن حبان في صحيحه (3047) ما يؤكد باتصال هذا الحديث عن الحسن بن سفيان، حدثنا يعقوب بن سفيان الفارسي، قال: حدثنا الحميدي، قال: حدثنا سفيان قال: حدثنا الزهري غير مرة أشهد لك عليه، قال: أخبرني سالم بن عبد الله، عن أبيه قال: رأيت رسول الله -صلي الله عليه وسلم- وأبا بكر وعمر يمشون أمام الجنازة فقيل لسفيان: فيه (وعثمان؟ ) قال: لا أحفظه، فقيل له: فإن بعض الناس لا يقوله إلا عن سالم، فقال: حدثناه الزهري غير مرة أشهد لك عليه، وقيل له: فإن ابن جريج يقول كما تقوله، ويزيد فيه"عثمان" فقال سفيان: لم أسمعه، وذكر عثمان انتهي.

ثم رواه (3048) من وجه آخر موافقًا لرواية سفيان عن محمد بن عبيد الله بن الفضل الكلاعي بحمص، قال: أخبرنا عمرو بن عثمان بن سعيد، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا شُعيب بن أبي حمزة، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر بن الخطاب كان يمشي بين يدي الجنازة قال: وإن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- كان يمشي بين يديها وأبا بكر وعمر وعثمان.

قال الزهري: وكذلك السنة. انتهى.

قال البيهقي (4/ 24) بعد أن ذكر اختلاف الرواة على الزهري:"ومن وصله، واستقر على
وصله، ولم يختلف عليه فيه وهو سفيان بن عيينة حجة ثقة".

ففي قول البيهقي إشارة إلى أن الذي وصله ولم يختلف عليه هو ابن عينة وحده، والباقون قد اختلف عليهم، ثم نصّ أهل العلم أن ابن عيينة أخطأ فيه، ودخل عليه الوهم كما قال النسائي في"الكبري" (1/ 632).

لأن معمرًا ويونس ومالكا رووه عن الزهري مرسلًا.

ونقل النسائي عن ابن المبارك أنه قال:"الحفاظ عن ابن شهاب ثلاثة: مالك ومعمر وابن عيينة. فإذا اجتمع اثنان على قول أخذنا به وتركنا قول الآخر".

قال النسائي:"وذكر ابن المبارك هذا الكلام عن أهل الحديث" انتهي.

وفي الباب عن أنس بن مالك أن النبي -صلي الله عليه وسلم- وأبا بكر وعمر وعثمان كانوا يمشون أمام الجنازة.

رواه الترمذي (1010)، وابن ماجه (1483) كلاهما من طريق محمد بن بكر البرساني، قال: أنبأنا يونس بن يزيد الأيلي، عن الزهري، عن أنس بن مالك فذكره.

قال الترمذي:"سألت محمدًا -يعني البخاري- عن هذا الحديث فقال: هذا حديث خطأٌ، أخطأ فيه محمد بن بكر، وإنما يُروى هذا الحديث عن يونس، عن الزهري، أن النبي -صلي الله عليه وسلم- وأبا بكر وعمر كانوا يمشون أمام الجنازة، قال الزهري: وأخبرني سالم، أن أباه كان يمشي أمام الجنازة، قال محمد -البخاري-: هذا أصح"، والله تعالى أعلم بالصواب.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن مسعود قال: سألنا نبينا صلى الله عليه وسلم عن المشي مع الجنازة، فقال:"ما دون الخَبَب إن يكن خيرًا يُعَجَّلُ إليه، وإن يكن غير ذلك فبعدًا لأهل النار، والجنازة متبوعة ولا تَتْبَعْ، ليس معها من يُقَدّمها".

رواه أبو داود (3184)، والترمذي (1011)، وابن ماجه (1484) كلهم من طرق عن يحيي بن عبد الله التيمي، عن أبي ماجدة -أو- ماجد، عن ابن مسعود فذكره. واللفظ لأبي داود، ولفظ الترمذي قريب منه، وأما ابن ماجه فاختصر على قوله:"الجنازة متبوعة، وليست بتابعة، ليس معها من تقدمها".

قال أبو داود:"وهو ضعيف هو يحيى بن عبد الله، وهو يحيي الجابر، قال أبو داود: وهذا كوفي، وأبو ماجدة بصري، قال أبو داود: أبو ماجدة هذا لا يعرف" انتهى.

وقال الترمذي:"هذا حديث لا يُعرف من حديث عبد الله بن مسعود إلا من هذا الوجه، قال: سمعت محمد بن إسماعيل يُضَعِّف حديث أبي ماجد هذا، وقال محمد: قال الحميدي: قال ابن عيينة: قيل ليحيى: من أبو ماجد هذا؟ قال: طائر طار فحدثنا" انتهى.

وقد قال غير واحد من أهل العلم: إن أبا ماجد هذا رجل مجهول.

ومعنى طائر طار -أي رجل مجهول لا نعبأ به.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আরোহী ব্যক্তি জানাযার পেছনে পেছনে চলবে, আর পদাতিক ব্যক্তি তার পেছনে, সামনে, ডান ও বাম দিকে, তার কাছাকাছি হয়ে হাঁটতে পারে। আর সিকত (অপূর্ণাঙ্গ মৃত শিশু)-এর উপর সালাত আদায় করা হবে, এবং তার পিতামাতার জন্য ক্ষমা ও দয়ার দু’আ করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3566)


3566 - عن جابر بن سمرة قال: أتي النبي -صلي الله عليه وسلم- بفرس مُعْرَوْرًى فركبه حين انصرف من جِنازة ابن الدحْداح ونحن نمشي حوله.

وفي رواية: صلَّى رسولُ الله -صلي الله عليه وسلم- على ابن الدحْداح، ثم أُتي بفرس عُرْي فعقله رجل فركبه، فجعل يتوقَّص به، ونحن نَتَّبِعه نَسْعي خلفه، قال: فقال رجل من القوم: إن النبيّ -صلي الله عليه وسلم- قال:"كم من عِذْقٍ معلقٍ (أو مُدَلّي) في الجنة لابن الدحْداح". أو قال شعبة:"لأبي الدحْداح".

وفي رواية: أن النبيّ -صلي الله عليه وسلم- اتبع جنازة أبي الدحْداح ماشيًا، ورجع على فرس.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (965) من طرق عن وكيع، عن مالك بن مِغْولٍ، عن سماك بن حربٍ، عن جابر بن سمرة، قال فذكر الحديث.

والرواية الثانية أيضًا عنده من وجه آخر عن محمد بن جعفر، عن شعبة عن سماك به مثله.

والرواية الثالثة عند الترمذي (1014) من وجه آخر عن أبي قتيبة، عن الجرَّاح، عن سماك به مثله. قال الترمذي:"حسن صحيح".

وقوله:"بفرس مُعْرَوْرًى" وفي لفظ"بفرس عُريٍ" أي لا سرج عليه، يقال: فرس عُري، وقيل أعراء، وقد اعروري فرسه: إذا ركبه عُريا، ولا يقال: رجل عُري، ولكن عُريان.

قال القرطبي: ورواية من روي"بفرس معرور" لا وجه لها.

وقوله:"يتوقص" يتثني ويقارب الخطو.

وقوله:"كم من عِذْقٍ معلق في الجنة لابن الدحْداح" العِذق بالكسر -العرجون، وبالفتح: النخلة. والدحْداح: الرجل القصير دون الربعة.

وقال شعبة: أبو الدحداح، وقال غيره: ابن الدحداح، وإنما قال النبي -صلي الله عليه وسلم- له ذلك القول لقصة جرتْ، وهي: أن يتيمًا خاصم أبا لُبابة في نخلةٍ فبكى الغلام، فقال له النبي -صلي الله عليه وسلم-:"أعطه إياها، ولك بها عِذْق في الجنة" قال: لا. فسمع ذلك ابن الدحْداح فاشتراها من أبي لبابة بحديقة له، ثم قال للنبي -صلي الله عليه وسلم-: ألي بها إن أعطيتُ اليتيم إياها عِذْق في الجنة؟ قال:"نعْم" فلما قبل ذلك قال له النبي -صلي الله عليه وسلم- هذا الكلام. ورُوي غير ذلك. انظر"المفهم" (2/ 623).




জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি জিনবিহীন ঘোড়া আনা হলো। ইবনুদ্ দাহদাহর জানাযা থেকে ফেরার সময় তিনি তাতে আরোহণ করলেন এবং আমরা তাঁর আশেপাশে হাঁটছিলাম।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইবনুদ্ দাহদাহর জানাযার সালাত আদায় করলেন। এরপর তাঁর নিকট একটি জিনবিহীন ঘোড়া আনা হলো। এক ব্যক্তি সেটিকে ধরে রাখল এবং তিনি তাতে আরোহণ করলেন। ঘোড়াটি দ্রুত পা ফেলে চলতে লাগল, আর আমরা তার অনুসরণ করে দৌড়ে যাচ্ছিলাম। বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকজনের মধ্যে একজন বলল: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইবনুদ্ দাহদাহর জন্য জান্নাতে কতই না খেজুরের কাঁদি (ঝুলন্ত বা লটকে থাকা অবস্থায়) রয়েছে!" অথবা শু'বাহ বলেছেন: "আবূদ্ দাহদাহর জন্য।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূদ্ দাহদাহর জানাযার সাথে হেঁটে গেলেন, আর ফিরলেন একটি ঘোড়ার পিঠে চড়ে।









আল-জামি` আল-কামিল (3567)


3567 - عن ثوبان أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- أتي بداية وهو مع الجنازة فأبى أن يركبها، فلما انصرف أتي بدابة فركب، فقيل له: فقال:"إن الملائكة كانت تمشي فلم أكن لأركب وهم يمشون، فلما ذهبوا ركبت".
صحيح: رواه أبو داود (3177) عن يحيى بن موسي البلخي، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن ثوبان فذكره.

وأخرجه الحاكم (1/ 355) وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال الشوكاني في"النيل" (3/ 19):"رجال إسناده رجال الصحيح.

وأما ما رُوي عنه أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- رأي ناسًا ركبانا على دوابهم في جنازة فقال:"ألا تستحيون أن الملائكة يمشون على أقدامهم، وأنتم رُكبان" فهو ضعيف. رواه الترمذي (1012)، وابن ماجه (1480) كلاهما من طريق أبي بكر بن أبي مريم، عن راشد بن سعد، عن ثوبان فذكره.

قال الترمذي: حديث ثوبان قد رُوي عنه موقوفًا، قال محمد -يعني البخاري-: الموقوف منه أصح".

قلت: وفيه أبو بكر بن أبي مريم وهو: أبو بكر بن عبد الله بن أبي مريم الغساني وقد ينسب إلى جده، ضعيف، ضعَّفه أبو داود وأحمد وأبو حاتم والنسائي والدارقطني وغيرهم.




থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি আরোহণের জন্তু আনা হলো, যখন তিনি একটি জানাযার সাথে ছিলেন। কিন্তু তিনি তাতে আরোহণ করতে অস্বীকার করলেন। অতঃপর যখন তিনি (জানাযা সম্পন্ন করে) ফিরে এলেন, তখন তাঁকে একটি জন্তু এনে দেওয়া হলো, আর তিনি আরোহণ করলেন। তখন তাঁকে কারণ জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন, “নিশ্চয় ফেরেশতাগণ হেঁটে যাচ্ছিলেন। সুতরাং তারা হেঁটে যাচ্ছেন এমন অবস্থায় আমি আরোহণ করতে পারি না। যখন তারা চলে গেলেন, আমি আরোহণ করলাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (3568)


3568 - عن أم عطية قالت: نُهينا عن اتباع الجنائز، ولم يُعزم علينا.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1278)، ومسلم في الجنائز (938) كلاهما من طريق حفصة بنت سيرين أم الهُذيل، عن أم عطية ولفظهما سواء.

وفي غير الصحيحين:"نهانا رسول الله -صلي الله عليه وسلم-".

وقوله:"ولم يُعزم علينا" أي لم يؤكد علينا في المنع كما أكدَّ علينا في غيره من المنهيات، ففيه إشارة إلى كراهة اتباع الجنائز من غير تحريم.

وقد روي في أحاديث غير ثابتة:"ليس لهن في ذلك اجر".

رواه الطبراني في الدعاء (2161) وابن حبان في"الثقات" (6/ 493) من حديث عائشة. وفي معناه أحاديث أخرى، وكلها ضعيفة.




উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের জানাজার অনুসরণ (জানাযার সাথে যাওয়া) থেকে নিষেধ করা হয়েছিল, কিন্তু তা আমাদের উপর কঠোরভাবে অপরিহার্য করা হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (3569)


3569 - عن أبي حازم قال: شهدتُ حسينًا رضي الله عنه حين مات الحسن رضي الله عنه وهو يرفع في قفا سعيد بن العاص، وهو يقول: تقدم، فلولا أنها السنة ما قدمتك، وسعيد أمير على المدينة يومئذ.

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (2/ 148) من طريق عبد الرزاق وهو في"مصنفه" (6369)، والبزار (1345) من طريق وكيع، كلاهما عن سفيان الثوري، عن سالم بن أبي حفصة، عن أبي حازم قال: فذكره.

وصحَّحه الحاكم (3/ 171) ورواه من طريق عبيد الله بن موسى، عن سفيان بإسناده وزاد فيه قول أبي هريرة: أَتُنَفِّسُون على ابن نبيكم صلى الله عليه وسلم بتربة تدفنونه فيها، وقد سمعت رسول الله -صلي الله عليه وسلم- يقول:"من أحبهما فقد أحبني ومن أبغضهما فقد أبغضني"، وقال:"صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في سالم بن أبي حفصة العجلي الكوفي فقال فيه النسائي: ليس بثقة، وقال ابن سعد: كان يتشيع تشيعًا شديدًا، وبالغ فيه ابن حبان فقال:"كان يقلب الأخبار، ويهم في الروايات""المجروحين" (1/ 343).

لكن مشاه الآخرون منهم الإمام أحمد فقال: سالم بن أبي حفصة كان شيعيًا، ما أظن به بأسًا في الحديث، وهو قليل الحديث، وعن يحيي بن معين روايات، منها: أنه ثقة، ومنها: ليس به بأس كان مغليًا في الشيعة، ومنها: شيعي، وقال ابن عدي: له أحاديث وعامة ما يرويه في فضائل أهل البيت، وهو من الغالين في منشيعي أهل الكوفة، وإنما عيب عليه الغلو فيه، وأما أحاديثه فأرجو أنه لا بأس به، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 31):"رواه الطبراني في الكبير والبزار، ورجاله موثقون".

والخلاصة أنه صدوق في نفسه، وكذا قال الحافظ أيضًا في"التقريب" وزاد: ."إلا أنه شيعي غال" فأقل أحواله أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه من فضائل أهل البيت ما لا يتابع عليه، ثم إني وجدت له متابعًا عند البيهقي (4/ 29) فإنه رواه من طريق سفيان عن أبي الجحَّاف، عن إسماعيل بن رجاء الزبيدي، قال: أخبرني من شهد الحسين بن علي حين مات الحسن .. فذكره، وإسماعيل بن رجاء"ثقة" كما قال الحافظ، إلا أنه لم يسم من أخبره، فلعله نسي اسمه فأيهمه، وسمَّاه سالم بن أبي حفصة.

وأبو الجحَّاف هو داود بن عوف التميمي"صدوق شيعي ربما أخطأ".
ويستفاد من الحديث أنه اجتمع الولي والوالي فيقدم الوالي أو من ينوب عنه لأداء صلاة الجنازة، وبه يقول جمهور أهل العلم منهم مالك وأبو حنيفة وأحمد وإسحاق، وهو قول الشافعي في القديم، يقول ابن المنذر:"وهو قول أكثر أهل العلم قال: وبه أقول" انظر:"المجموع" للنووي (5/




আবূ হাযিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রত্যক্ষ করেছিলাম, যখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করেন। তখন তিনি (হুসাইন) সাঈদ ইবনু আস-এর ঘাড়ে হাত রাখছিলেন এবং বলছিলেন: আপনি সামনে অগ্রসর হোন। যদি এটি (আমীরের ইমামতি করার) সুন্নাহ না হতো, তবে আমি আপনাকে আমার সামনে রাখতাম না। আর সেদিন সাঈদ ছিলেন মদীনার আমীর (শাসক)।









আল-জামি` আল-কামিল (3570)


3570 - عن عطاء بن دينار الهذلي أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- قال:"ثلاثة لا تقبل منهم صلاة، ولا تصعد إلى السماء، ولا تجاوز رؤوسهم: رجل أم قوما وهم له كارهون، ورجل صلى على جنازة ولم يؤمر، وامرأة دعاها زوجها من الليل، فأبت عليه". وهذا مرسل، وعن أنس يرفعه مثله.

حسن: من حديث أنس: رواه ابن خزيمة (1518) عن عيسي بن إبراهيم، حدثنا ابن وهب، عن ابن لهيعة وسعيد بن أبي أيوب، عن عطاء بن دينار الهذلي، فذكره.

ثم رواه (1519) عن عيسي بن إبراهيم، حدثنا ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عمرو بن الوليد، عن أنس بن مالك يرفعه مثل هذا، (أي: مثل رواية الهذلي).

ثم قال ابن خزيمة:"أمليت الجزء الأول، وهو مرسل؛ لأن حديث أنس الذي بعده حدثناه عيسى في عقبه يعني بمثله، لولا هذا لما كنت أخرجت الخبر المرسل في هذا الكتاب".

قلت: حديث أنس الموصول إسناده حسن؛ فإن عمرو بن الوليد ذكره ابن حبان في الثقات، والفسوي في ثقات أهل مصر، فمثله يحسن حديثه، ولذا قال الحافظ في التقريب:"صدوق".

وقوله:"ولم يؤمر" أي: من ولي الأمر، أو من أولياء الميت إذا لم يكن للناس إمام راتب.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন শ্রেণির লোকের সালাত (নামাজ) কবুল করা হয় না, তা আসমানে আরোহণ করে না এবং তাদের মাথা অতিক্রম করে না: এক ব্যক্তি, যে কোনো সম্প্রদায়ের ইমামতি করে অথচ তারা তাকে অপছন্দ করে; আর এক ব্যক্তি, যে জানাযার সালাত আদায় করে অথচ তাকে (সেটির জন্য) আদেশ করা হয়নি; এবং যে স্ত্রীকে তার স্বামী রাতে ডাকে, কিন্তু সে তাকে প্রত্যাখ্যান করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3571)


3571 - عن سمرة بن جندب قال: صليت وراء النبي -صلي الله عليه وسلم- على امرأة ماتت في نِفاسِها، فقام عليها وَسَطَها.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1332) عن عمران بن ميسرة، حدّثنا عبد الوارث، حدثنا حسين، عن ابن بُريدة، حدثنا سمرة بن جندب فذكره، ورواه عن مسدد، عن يزيد بن زريع، عن حسين (وهو ابن ذكوان، بأن المرأة ماتت في نفاسها (1331)، ورواه مسلم في الجنائز (964) عن يحيى بن يحيى التميمي، أخبرنا عبد الوارث بن سعيد بإسناده، وسمَّي المرأة بأنها أم كعب، ماتت وهي نُفَسَاء.




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে এক মহিলার জানাযার সালাত আদায় করলাম, যিনি তার নিফাস অবস্থায় মারা গিয়েছিলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কোমরের বরাবর (মাঝখানে) দাঁড়িয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3572)


3572 - عن أبي غالب قال: صلَّيتُ مع أنس بن مالك على جنازة رجل، فقام حيال رأسه، ثم جاءوا بجنازة امرأة من قريش فقالوا: يا أبا حمزة! صَلِّ عليها، فقام حيال وسط السرير، فقال له العلاءُ بن زياد: هكذا رأيت رسول الله -صلي الله عليه وسلم- قام على الجنازة مقامك منها، ومن الرجل مقامك منه؟ قال: نعم، فلما فرغ قال: احفظوا.

صحيح: رواه الترمذي (1034)، وابن ماجه (1494) كلاهما من طريق سعيد بن عامر، عن همام، عن أبي غالب فذكره.

ورواه أبو داود (3194) من وجه آخر عن عبد الوارث، عن نافع أبي غالب، قال: كنت في سكة المربد، فمرت جنازة معها ناس كثير، قالوا: جنازة عبد الله بن عمير، فتبعتها، فإذا أنا برجل عليه كساء رقيق علي بُريذينتِه، وعلى رأسه خرقةٌ تَقِيه من الشمس فقلت: من هذا الدِهقان؟ قالوا: هذا أنس بن مالك، فلما وُضعت الجنازة قام أنس، فصلَّى عليها، وأنا خلفه لا يحول بيني وبينه شيء، فقام عند رأسه، فكبَّر أربع تكبيرات، لم يُطل ولم يُسرع، ثم ذهب يقعد، فقالوا: يا أبا حمزة! المرأة الأنصارية فقربوها، وعليها نعش أخضر، فقام عند عجيزتها، فصلَّى عليها نحو صلاته على الرجل، ثم جلس، فقال العلاء بن زياد: فذكر كما مضى. وفيه زيادةُ غزوتِه مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم- حنينًا، وقصة نذر رجل …

ورواه أحمد (12180) عن وكيع قال: حدثني همام، عن غالب -هكذا قال وكيع: غالب- وإنما هو أبو غالب عن أنس فذكر الحديث كما مضى.

قال الترمذي:"حديث أنس هذا حديث حسن، وقد روى غير واحد عن همام مثل هذا، وروي وكيع هذا الحديث عن همام فوهم فيه فقال: عن غالب، عن أنس، والصحيح: عن أبي غالب، وقد روى هذا الحديث عبد الوارث بن سعيد وغير واحد عن أبي غالب مثل رواية همام، واختلفوا في اسم أبي غالب هذا فقال بعضهم: يقال اسمه: نافع، ويقال: رافع.

وقد ذهب بعض أهل العلم إلى هذا، وهو قول أحمد وإسحاق. انتهى.

قلت: أبو غالب هو: الباهلي مولاهم الخياط البصري، قال فيه الحافظ في"التقريب":"ثقة". وقول الحافظ في"الفتح" (3/ 201):"وأشار البخاري إلى تضعيف ما رواه أبو داود والترمذي من طريق أبي غالب، عن أنس بن مالك … لا وجه لتضعيفه".

ولذا تعقبه شيخ الإسلام ابن باز فقال:"إسناده جيد، وهو حجة قائمة على التفرقة بين الرجل والمرأة في الموقف، ودليل على أن السنة الوقوف عند رأس الرجل، ووسط المرأة".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ গালিব বলেন: আমি আনাস ইবনু মালিকের সাথে এক পুরুষের জানাযার সালাত আদায় করলাম। তিনি (আনাস) তখন তার (পুরুষের) মাথার বরাবর দাঁড়ালেন। অতঃপর তারা কুরাইশের এক মহিলার জানাযা নিয়ে আসলো এবং বলল: হে আবূ হামযাহ! আপনি তার ওপর সালাত আদায় করুন। তখন তিনি খাটের মাঝ বরাবর দাঁড়ালেন। তখন আলা ইবনু যিয়াদ তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানাযার ওপর এভাবে দাঁড়াতে দেখেছেন—আপনি মহিলার জন্য যে স্থানে দাঁড়ালেন, এবং পুরুষের জন্য যে স্থানে দাঁড়ালেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। যখন তিনি (সালাত) শেষ করলেন, তখন বললেন: তোমরা এটি মুখস্থ করে রাখো।









আল-জামি` আল-কামিল (3573)


3573 - عن نافع، أن ابن عمر صلى على تسع جنائز جميعًا، فجعل الرجال يلُون
الإمام، والنساء يلين القبلة، فصفَّهن صفًا واحدًا، ووُضعتْ جنازةُ أم كلثوم بنت علي امرأة عمر بن الخطاب وابن لها يقال له: زيد وُضِعا جميعًا، والإمامُ يومئذ سعيد بن العاص، وفي الناس ابن عمر وأبو هريرة وأبو سعيد وأبو قتادة، فوضع الغلامُ مما يلي الإمام، فقال رجل: فأنكرتُ ذلك، فنظرتُ إلى ابن عباس وأبي هريرة وأبي سعيد وأبي قتادة، فقلت: ما هذا؟ قالوا: هي السنة.

صحيح: رواه النسائي (1978) عن محمد بن رافع، قال: أنبأنا عبد الرزاق، وهو في المصنف (6337) قال: أنبأنا ابن جريج، قال: سمعت نافعًا يزعم أن ابن عمر صلَّى على تسع جنائز فذكره.

وإسناده صحيح. وكذا قال الحافظ أيضًا في"التلخيص" (2/ 146).

وقوله:"والإمام يومئذ سعيد بن العاص" يعني: الأمير.

وقولهم:"هي السنة" إشارة إلى حكم الرفع.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একই সাথে নয়টি জানাযার সালাত আদায় করলেন। তিনি পুরুষদের ইমামের নিকটবর্তী করে রাখলেন এবং মহিলাদের কিবলার নিকটবর্তী করে রাখলেন। অতঃপর তিনি সেগুলোকে (জানাযাগুলোকে) এক কাতারে সারিবদ্ধ করলেন। (একবার এমনও হয়েছিল যে,) উম্মু কুলসুম বিনত আলী—যিনি ছিলেন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী—এবং তাঁর পুত্র যায়িদ নামে পরিচিত, তাঁদের জানাযা একসাথে রাখা হলো। সেদিন ইমাম ছিলেন সাঈদ ইবনুল আস। উপস্থিতদের মধ্যে ছিলেন ইবনে উমর, আবূ হুরায়রা, আবূ সাঈদ এবং আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তখন বালকটিকে (যায়িদকে) ইমামের নিকটবর্তী করে রাখা হলো। এক ব্যক্তি বলেন: আমি এটা দেখে আপত্তি জানালাম (বা তা অপছন্দ করলাম)। তখন আমি ইবনে আব্বাস, আবূ হুরায়রা, আবূ সাঈদ ও আবূ কাতাদার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিকে তাকালাম এবং বললাম: এটা কী? তাঁরা বললেন: এটাই হলো সুন্নাহ।









আল-জামি` আল-কামিল (3574)


3574 - عن عمار مولى الحارث بن نوفل، أنه شهد جنازة أم كلثوم وابنها، فجعل الغلام مما يلي الإمام، فأنكرت ذلك، وفي القوم ابن عباس وأبو سعيد الخدري وأبو قتادة وأبو هريرة فقالوا: هذه السنة.

صحيح: رواه أبو داود (3193) عن يزيد بن خالد بن موهب الرملي، حدثنا ابن وهب، عن ابن جريج، عن يحيى بن صبيح قال: حدثني عمار مولى الحارث بن نفيل فذكر الحديث، ورواه النسائي (1977) من وجه آخر عن عمار.

وفي لفظ النسائي:"فقُدِّم الصبي مما يلي القومَ، ووضعتِ المرأةُ وراءَه فصلَّى عليهما" وفيه أيضًا"فسألتهم عن ذلك، فقالوا: السنة".

وإسناده صحيح. وقال البيهقي (4/ 33) بعد أن رواه من طريق أبي داود:"ورواه حماد بن سلمة، عن عمار بن أبي عمار دون كيفية الوضع بنحوه".

وذكر أن الإمام كان ابن عمر، قال:"وكان في القوم الحسن والحسين وأبو هريرة وأبن عمر ونحو من ثمانين من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم".

ورواه الشعبي فذكر كيفية الوضع بنحوه، وذكر أن الإمام كان ابن عمر، ولم يذكر السؤال قال:"وخلفه ابن الحنفية والحسين وابن عباس، وفي رواية: وعبد الله بن جعفر، وروينا في ذلك عن عثمان بن عفان وعلي بن أبي طالب وواثلة بن الأسقع". انتهى.




আম্মার (মাওলা আল-হারিছ ইবনু নাওফাল) থেকে বর্ণিত, তিনি উম্মু কুলসুম এবং তার পুত্রের জানাযায় উপস্থিত ছিলেন। তখন ছেলেটিকে ইমামের কাছাকাছি রাখা হলো। তিনি তা দেখে আপত্তি জানালেন। তখন উপস্থিত লোকজনের মধ্যে ইবনু আব্বাস, আবূ সাঈদ আল-খুদরী, আবূ ক্বাতাদাহ এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তারা বললেন: এটাই সুন্নাহ (নবীজীর নিয়ম)।

আর নাসাঈ-এর এক বর্ণনায় আছে: "ছেলেটিকে ক্বওমের (মুসল্লীদের) কাছাকাছি রাখা হলো এবং মহিলাকে তার (ছেলেটির) পেছনে রাখা হলো, অতঃপর তিনি উভয়ের উপর সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।" এবং তাতে আরও আছে: "আমি তাদের এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলে তারা বললেন: এটাই সুন্নাহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (3575)


3575 - عن أنس أن النبي -صلي الله عليه وسلم- نهى أن يُصلي على الجنازة بين القبور.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط" -مجمع البحرين (1297) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، عن حسين بن يزيد الطحان، عن حفص بن غياث، عن عاصم الأحوال، عن محمد بن سيرين، عن أنس بن مالك فذكره، وعنه رواه الضياء المقدسي في"المختارة" (2594) ورواه البزار"كشف الأستار" (443) من وجه آخر عن حفص بن غياث، عن الأشعث، عن الحسن، عن أنس أن النبي -صلي الله عليه وسلم- نهي عن الصلاة بين القبور.

ففي هذه الرواية النهي عام عن الصلاة بين القبور، وهذا العام يدخل فيه صلاة الجنازة وأيضًا قد جاء هذا القيد في رواية الطبراني"على الجنائز".

قال الطبراني:"لم يروه عن عاصم إلَّا حفص، تفرد به حسين".

قلت: حسين بن يزيد الطحان قال فيه أبو حاتم:"ليِّن الحديث" وتبعه الذهبي في"الكاشف" وابن حَجر في"التقريب".

وقد روى عنه جمع، منهم أبو داود، ومسلم في خارج"الصحيح" وأبو زرعة الرازي وغيرهم.

وأدخله ابن حبان في"الثقات" (8/ 188) فهو لا ينزل عن مرتبة"صدوق"، ولذا حسَّنه الهيثمي في"المجمع" (3/ 36)، وله متابعات عند البزار"كشف الأستار" (441، 442، 443).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মাঝখানে জানাযার সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3576)


3576 - عن عباد بن عبد الله بن الزبير، يحدث عن عائشة: أنها لما تُوفي سعد بن أبي وقَّاص أَرسل أزواجُ النبي -صلي الله عليه وسلم- أن يمُروا بجنازته في المسجد، فيُصلين عليه. ففعلوا. فوُقِفَ به على حُجَرِهنَّ يُصَلِّين عليه. وأُخْرج به من باب الجنائز الذي كان إلى المقاعِد. فبلَغَهُنَّ أنَّ النَّاسَ عابوا ذلك.

وقالوا: ما كانت الجنائزُ يُدْخَلُ بها المسجدَ. فبلغ ذلك عائشةَ فقالتْ: ما أسرعَ الناسَ إلى أن يَعيُبوا ما لا علم لهم به! عابوا علينا أن يمر بجنازة في المسجد! وما صلي رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على سُهيل ابن بيضاء إلا في جوف المسجد.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (973) من طرق، عن عبد الواحد بن حمزة، عن عباد بن عبد الله ابن الزبير به مثله. وهذه رواية موسى بن عقبة عن عبد الواحد، ورواه غيره عن عبد الواحد مختصرًا.

ورواه الضحاك بن عثمان، عن أبي النضْر، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أن عائشة: لما تُوفي سعد بن أبي وقاص قالت: ادخلوا به المسجد حتى أصلِّي عليه، فأنكر ذلك عليها. فقالت: والله! لقد صلى رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على ابني بيضاء في المسجد: سُهيل وأخيه.

قال مسلم: سُهيل بن دَعْد وهو ابن البيضاء، أمه بيضاء.

قال النووي:"بنو بيضاء ثلاثة إخوة سهل وسُهيل وصفوان، وأمهم بيضاء، اسمها دَعْد،
والبيضاء وصف، وأبوهم وهب بن ربيعة القرشي الفهري، وكان سُهيل قديم الإسلام، هاجر إلى الحبشة، ثم عاد إلى مكة، وهاجر إلى المدينة، وشهد بدرًا وغيرها، توفِّي سنة تسع من الهجرة".

والحديث يدل على جواز الصلاة في المسجد، وبه قال الشافعي وأحمد وبعض أصحاب مالك، ومن الصحابة أبو بكر وعمر وعائشة وأزواج النبي -صلي الله عليه وسلم- وقد صُلِّي على أبي بكر وعمر في المسجد، ولم يُنْكر عليه، فصار كالإجماع.

وكذلك يدل على جواز حضور النساء لصلاة الجنازة إنْ كانتْ تصلي في المسجد، فإنه لم ينكر أحد من الصحابة على فعل أزواج النبي -صلي الله عليه وسلم- فصار كالإجماع.

وأما ما رُويَ عن أبي هريرة مرفوعًا:"من صلَّى على جنازة في المسجد فلا شيء له"، وفي رواية"فلا شيء عليه" فهو ضعيف لأنه من رواية صالح مولى التوأمة، عن أبي هريرة، رواه أبو داود (3191) وابن ماجه (1517) وغيرهما من طريق ابن أبي ذئب، قال: حدثني صالح مولي التوأمة فذكر الحديث.

وصالح مولى التوأمة نغير واختلط في آخره، ولعل اختلاف تفظ الحديث يعود إليه، وفيه دليل واضح على اختلاطه، وإن كان ابن أبي ذئب قد سمع منه قبل الاختلاط، على قول أكثر أهل العلم إلا أن البخاري قال:"سماعه منه أخيرًا، روى عنه مناكير"، ولذا ذهب جمهور أهل العلم إلى تضعيف هذا الحديث منهم الإمام أحمد وابن المنذر وابن عدي والخطابي حتى قال ابن حبان في"الضعفاء" (1/ 366):"وهذا خبر باطل، كيف يخبر المصطفى صلى الله عليه وسلم أن المصلي في الجنازة لا شيء له من الأجر، ثم يصلي هو صلى الله عليه وسلم على سهيل ابن البيضاء في المسجد".

وبعد ضعف حديث أبي هريرة هذا لا يحتاج إلى الجمع بينه وبين حديث عائشة الصحيح، كما فعل العلامة أبو الحسن السندي، لأنه يصار إلى الجمع إذا صحَّ الحديثان -وفي الظاهر- أنهما متعارضان كما هو معروف في علم مصطلح الحديث باسم"مختلف الحديث"، وأما إذا صحَّ أحدهما، وضَعُف الثاني فيصار إلى تقديم الصحيح على الضعيف كما قال به جمهور أهل العلم في هذا الحديث.

وسلك الطحاوي مسلكًا آخر فجعل حديث عائشة منسوخًا، وأجاب عنه البيهقي في"المعرفة" (5/ 320):"ولو كان عند أبي هريرة نسخ ما روته عائشة لذكره يوم صُلّي على أبي بكر في المسجد، أو يوم صُلّي على عمر بن الخطاب في المسجد، ولذكره من أنكر على عائشة أمرها بإدخاله المسجد، أو ذكره أبو هريرة حين روتُ فيه الخبر، وإنَّما أنكره من لم يكن له معرفة بالجواز، فلمَّا روتْ فيه الخبر سكتوا ولم ينكروه، ولا عارضوه بغيره".

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (3/ 72 - 74).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন সা'দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইন্তেকাল হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ (উম্মাহাতুল মু'মিনীন) লোক পাঠালেন যেন তাঁর জানাযা মসজিদের মধ্যে দিয়ে নিয়ে যাওয়া হয়, যাতে তাঁরা তাঁর উপর জানাযার সালাত আদায় করতে পারেন। তারা তাই করলো। তখন (জানাযা) তাঁদের হুজরার সামনে দাঁড় করানো হলো এবং তাঁরা তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তাঁকে জানাযার দরজা দিয়ে বের করে আনা হলো, যা বসার স্থানগুলোর দিকে ছিল। তখন তাঁদের কাছে খবর পৌঁছল যে, লোকেরা এই কাজের নিন্দা করছে। তারা বলল: জানাযা তো মসজিদে প্রবেশ করানো হতো না। এই খবর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: মানুষেরা না জেনে কোনো কিছুর নিন্দা করতে কতই না দ্রুত! তারা আমাদের নিন্দা করলো যে, মসজিদের মধ্যে দিয়ে জানাযা নেওয়া হলো! অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুহাইল ইবনুল বাইদার জানাযার সালাত মসজিদের অভ্যন্তরেই আদায় করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3577)


3577 - عن ابن عمر أنّ اليهود جاءوا إلى النبي -صلي الله عليه وسلم- برجل منهم وامرأة زنيا، فأمر بهما فَرُجِما قريبًا من موضع الجنائز عند المسجد.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1329) عن إبراهيم بن المنذر، قال: حدثنا أبو ضمرة، حدثنا موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وقوله:"موضع الجنائز عند المسجد" قال الحافظ في"الفتح" (3/ 199):"حكى ابن بطال عن ابن حبيب: أن مصلي الجنائز كان لاصقًا بمسجد النبي -صلي الله عليه وسلم- من ناحية جهة الشرق"، وقال في موضع آخر (12/ 129):"والمصلى المكان الذي كان يُصلي عنده العيد والجنائز، وهو من ناحية بقيع الغرقد".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ইহুদিরা তাদের মধ্যকার এক পুরুষ ও এক নারীকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিল, যারা ব্যভিচার করেছিল। অতঃপর তিনি তাদের দুজনকে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করার নির্দেশ দিলেন। মসজিদের পাশে জানাযার স্থানের নিকটে তাদের রজম করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3578)


3578 - عن أبي هريرة أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- نعى النجاشي في اليوم الذي مات فيه، فخرج إلى المصلي، فصفَّ بهم وكبَّر أربعًا.

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في الجنائز (1245)، ومسلم في الجنائز (951) كلاهما من طريق به مثله.

وبوب البخاري بقوله:"الصلاة على الجنائز بالمصلى والمسجد" وذكر فيه حديث أبي هريرة -الجنائز (1327، 1328) - وحديث عبد الله بن عمر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজাশীর মৃত্যুর দিনেই তাঁর মৃত্যুর খবর ঘোষণা করেছিলেন। অতঃপর তিনি (সাহাবীদেরকে নিয়ে) সালাতের স্থানের (ঈদগাহের) দিকে বের হলেন, সেখানে তাদের নিয়ে কাতারবদ্ধ হলেন এবং চার তাকবীর দিয়ে (জানাযার সালাত) আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3579)


3579 - عن جابر قال: مات رجل، فغَسَّلناه، وكفَّناه، وحَنَّطْناه، ووَضَعْناه لرسول الله -صلي الله عليه وسلم- حيث توضع الجنائز عند مقام جبريل، ثم آذنا رسول الله -صلي الله عليه وسلم- بالصلاة عليه … فذكر الحديث.

حسن: رواه الإمام أحمد (14536)، والحاكم (2/ 58) كلاهما من حديث عبد الله بن محمد ابن عقيل، عن جابر فذكر الحديث بطوله وسيأتي في باب"لا يصلي الإمام على من عليه دين حتي يقضي عنه" كاملًا.

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل.

وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (3/ 39).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি মারা গেল। তখন আমরা তাকে গোসল করালাম, কাফন দিলাম এবং সুগন্ধি মাখালাম। আর তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য রাখলাম, যেখানে জানাযা রাখা হয়—জিবরীল (আঃ)-এর মাকামের কাছে। অতঃপর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করার জন্য খবর দিলাম... এরপর তিনি পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3580)


3580 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي -صلي الله عليه وسلم-:"قد توفي اليومَ رجل صالح من الحبش، فَهَلُمَّ فصلوا عليه" قال: فصففنا، فصلى النبي -صلي الله عليه وسلم- ونحن صفوف.
قال أبو الزبير، عن جابر: كنت في الصف الثاني.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1320)، ومسلم في الجنائز (951) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث، واللفظ للبخاري. ولفظ مسلم مختصر.

وقول أبي الزبير، عن جابر … وصله مسلم من وجه آخر عن أيوب، عن أبي الزبير.

وأخرجه البخاري (1317) من وجه آخر عن قتادة، عن عطاء، عن جابر قال: إن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- صلّى على النجاشي، فكنت في الصف الثاني أو الثالث.

وفي الباب حديثان معللان:

أحدهما: ما رواه مالك بن هبيرة قال: قال رسول الله -صلي الله عليه وسلم-:"ما من مسلم يموت فيصلي عليه ثلاثة صفوف من المسلمين إلا أوجب".

فكان مالك إذا استقل أهل الجنازة جزأهم ثلاثة صفوف.

أخرجه أبو داود (3166)، والترمذي (1028)، وابن ماجه (1490) كلهم من طرق عن محمد ابن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد اليزني، عن مالك بن هبيرة فذكر الحديث، ولفظهم قريب إلا أن الترمذي وابن ماجه لم يذكرا تجزئة، مالك بن هبيرة ثلاثة صفوف.

وأخرجه الحاكم (1/ 362، 363) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

وقال الترمذي: حسن، وأقرّه الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 145).

قلت: محمد بن إسحاق مدلس، وقد عنعن، فلا يرتقي الحديث إلى درجة الحسن حتي بصرح بالسماع، ولو ثبت سماعه في طريق آخر فلا يُقبل تفرده؛ لأنه في الأحكام وليس له أصل ثابت.

والأصل في الصلاة أن يتم الصف الأول فالأول إنْ كان في المسجد، وإذا كانت الصلاة خارج المسجد فلا بأس بتجزئة الصفوف لفعل مالك بن هبيرة، والمراد"بالثلاثة" الوتر في الصفوف.

وثانيهما: ما رواه الطبراني كما في"المجمع" (3/ 432) عن أبي أمامة قال: صلى رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على جنازة، ومعه سبعة نفر فجعل ثلاثة صفًا، واثنين صفًا، واثنين صفًا، فيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف.

وقد سُئل سماحة الشّيخ ابن باز رحمه الله عن حكم تكثير الصّفوف ولو لم تتم؟ فأجاب:"الأصل أن يصفُّوا في صلاة الجنازة كما يصفُّون في الصّلاة المكتوبة، فيكمِّلون الصَّف الأوّل فالأوّل، وأمّا عمل مالك بن هبيرة رضي الله عنه ففي سنده ضعف، وهو مخالف للأحاديث الصّحيحة الدّالة على وجوب إكمال الصّف الأول فالأوّل في الصّلاة"."مجموع فتاواه" (13/ 139).

وكلام الشيخ يُحمل إنْ كانت الصلاة في المسجد.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আজ হাবশার (আবিসিনিয়ার) একজন নেককার ব্যক্তি ইন্তেকাল করেছেন। সুতরাং এসো এবং তার জানাযার সালাত আদায় করো।" তিনি (জাবির) বলেন: এরপর আমরা কাতারবদ্ধ হলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাতারবদ্ধ থাকা অবস্থায় সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।
আবুয যুবাইর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: আমি দ্বিতীয় কাতারে ছিলাম।