হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3541)


3541 - عن أبي سعيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرُّوا عليه بجنازة فقام.

وقال عمرو: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرتْ به جنازة فقام.

صحيح: رواه النسائيّ (1919) عن عمرو بن عليّ قال: حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا زكريا، عن الشعبي قال: قال أبو سعيد.

ح وأخبرنا إبراهيم بن يعقوب بن إسحاق، قال: حَدَّثَنَا أبو زيد سعيد بن الربيع، قال: حَدَّثَنَا شعبة، عن عبد الله بن أبي السفر، قال: سمعت الشعبيّ يحدث عن أبي سعيد فذكره. وإسناده صحيح.

قوله: وقال عمرو يعني به شيخه وهو عمرو بن عليّ، وهو أبو حفص الفلاس الصيرفيّ، والنسائي روي هذا الحديث من شيخين أحدهما عمرو بن عليّ، والثاني: إبراهيم بن يعقوب بن إسحاق، وإسنادهما يختلف، ويلتقيان على الشعبي.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা নেওয়া হচ্ছিল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন।

আর আমর বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা যাচ্ছিল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3542)


3542 - عن زيد بن ثابت: أنهم كانوا جلوسًا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فطلعت جنازة، فقام رسول الله، صلى الله عليه وسلم، وقام من معه، فلم يزالوا قيامًا حتي نفذت.

صحيح: رواه النسائيّ (1920) عن أيوب بن محمد الوزَّان، قال: حَدَّثَنَا مروان، قال: حَدَّثَنَا عثمان بن حكيم، قال: أخبرني خارجة بن زيد بن ثابت، عن عمه يزيد بن ثابت فذكره.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، عثمان بن حكيم هو ابن عباد بن حنيف الأنصاري الأوسي أبو سهل المدني من رجال مسلم.

مروان هو ابن معاوية بن الحارث بن أسماء الفزاري من رجال الجماعة إِلَّا أنه كان يدلس أسماء الشيوخ، وقد صرَّح هنا، فانتفت عنه تهمةُ التدليس.




যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সঙ্গে বসেছিলেন। এমন সময় একটি জানাযা অতিক্রম করল। তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়িয়ে গেলেন এবং তাঁর সাথে যারা ছিলেন তারাও দাঁড়িয়ে গেলেন। জানাযাটি পার হয়ে না যাওয়া পর্যন্ত তাঁরা সকলেই দাঁড়িয়ে রইলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3543)


3543 - عن أبي هريرة وأبي سعيد قالا: ما رأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم شهد جنازة قط فجلس حتّى توضع.

حسن: رواه النسائيّ (1918) عن يوسف بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا حجَّاج، عن ابن جريج، عن ابن عجلان، عن سعيد، عن أبي هريرة وأبي سعيد، فذكراه.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عجلان فإنه حسن الحديث، ولحديثه أصل ثابت من قول وفعل.




আবু হুরায়রা ও আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেন, আমরা কখনও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এমন দেখিনি যে তিনি কোনো জানাযায় উপস্থিত হয়েছেন এবং লাশ (মাটিতে) নামানো না হওয়া পর্যন্ত বসে পড়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3544)


3544 - عن جابر بن عبد الله قال: مرَّت جنازة فقام لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقمنا معه، فقلنا: يا رسول الله! إنها يهودية، فقال:"إن الموتَ فَزَعٌ، فإذا رأيتُم الجنازة فقوموا".

متفق عليه: رواه مسلم في الجنائز (960) من طرق، عن إسماعيل ابن علية، عن هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبيد الله بن مِقْسَم، عن جابر بن عبد الله فذكره واللّفظ لمسلم.

وأمّا البخاريّ فأخرجه في الجنائز (1311) عن معاذ بن فضالة، حَدَّثَنَا هشام بإسناده ولم يذكر فيه"إن الموت فزع" ولكن رواه البيهقيّ من طريق أبي قلابة الرقاشيّ، عن معاذ بن فضالة شيخ البخاريّ فذكر فيه الزيادة المذكورة، فإما أن يكون البخاريّ قد اختصر الحديث، أو أنه هكذا سمع من شيخه بدون زيادة. ولعل شيخه روي مرة كما سمع البخاريّ، وأخرى بزيادة فروى عنه أبو قلابة.

ورواه مسلم من وجه آخر عن أبي الزُّبير أنه سمع جابرا يقول: قام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه لجنازة يهودي حتّى توارتْ.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একটি জানাযা যাচ্ছিল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সম্মানে দাঁড়িয়ে গেলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এটি তো এক ইয়াহুদি (বা ইয়াহুদি মহিলার) জানাযা। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই মৃত্যু একটি ভীতি (বা আতঙ্কের ব্যাপার)। সুতরাং যখন তোমরা কোনো জানাযা দেখবে, তখন তোমরা দাঁড়িয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3545)


3545 - عن عبد الرحمن بن أبي ليلى قال: كان سهل بن حُنيف وقيس بن سعد قاعدَين بالقادسية، فمروا عليهما بجنازة فقاما، فقيل لهما: إنها من أهل الأرض -أي من أهل الذِّمة- فقالا: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرَّتْ به جنازة فقام، فقيل له: إنها جنازة يهوديّ، فقال:"أليست نفسًا؟".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1312)، ومسلم في الجنائز (961) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن ابن أبي ليلى فذكره.

واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريبة منه، وليس فيه تفسير قوله: إنها من أهل الأرض".




সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি এবং) কায়স ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ক্বাদেসিয়াতে বসা ছিলেন। তখন তাঁদের পাশ দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করলে তাঁরা দু'জন দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন তাঁদেরকে বলা হলো: এটি তো ভূমির অধিবাসীদের—অর্থাৎ যিম্মিদের—জানাযা। তাঁরা উভয়ে বললেন: নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করেছিল, তখন তিনি দাঁড়িয়েছিলেন। তখন তাঁকে বলা হয়েছিল: এটি তো একজন ইহুদীর জানাযা। তিনি বললেন: "সে কি একজন আত্মা (প্রাণ) নয়?"









আল-জামি` আল-কামিল (3546)


3546 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرتْ به جنازة يهوديّ، فقام، فقيل له: يا رسول الله! إنها جنازة يهودي؟ فقال:"إن للموت فَزَعًا".

حسن: رواه الإمام أحمد (8527) عن عفّان، حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه هو (7860)، وابن ماجة (1543) كلاهما من وجه آخر عن محمد بن عمرو به، ولم يذكرا أن الجنازة كانت ليهوديّ، وأنما اقتصرا على قوله:"إن للموت فزعًا" وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو فإنه حسن الحديث.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 27) وحسَّن إسناده، وهو ليس على شرطه إِلَّا أن يرى أن القيد بجنازة بأنها كانت لليهودي لم يذكره ابن ماجه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে এক ইহুদির জানাজা যাচ্ছিল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন তাঁকে বলা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! এটা তো এক ইহুদির জানাজা? তিনি বললেন, "মৃত্যুর জন্য অস্থিরতা (বা ভয়) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3547)


3547 - عن أنس أن جنازة مرتْ برسول الله صلى الله عليه وسلم فقام، فقيل: إنها جنازة يهودي،
فقال:"إنّما قمنا للملائكة".

صحيح: رواه النسائيّ (1929) عن إسحاق، قال: أنبأنا النضر، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن قتادة، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح.

إسحاق هو: ابن راهويه الإمام الفقيه ت 238 هـ، وشيخه هو النضر بن شُميل المازني أبو الحسن النحوي ت 203 هـ.

قوله:"قمنا للملائكة" قال السيوطيّ:"لا معارضة إذ يجوز تعدد الأغراض والعلل، فيكون القيام مطلوبًا تعظيمًا لأمر الموت والملائكة جميعًا وغير ذلك".

وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو أنه قال: سأل رجل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! تمر بنا جنازة الكافر، أفنقوم لها؟ قال:"نعم قوموا لها، فإنكم لستم تقومون لها، إنّما تقومون إعظامًا للذي يقبض النفوس" فهو ضعيف.

رواه أحمد (6573) عن أبي عبد الرحمن، حَدَّثَنَا سعيد، حَدَّثَنِي ربيعة بن سيف المعافريّ، عن أبي عبد الرحمن الحُبُليّ، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وأبو عبد الرحمن هو: عبد الله بن يزيد المعافري. ومن هذا الطريق رواه البزّار"كشف الأستار" (836) وصحَّحه ابن حبَّان (3053)، والحاكم (1/ 357) وقال:"صحيح الإسناد"، وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 27):"رواه أحمد والبزّار والطَّبرانيّ في"الكبير" ورجال أحمد ثقات".

قلت: في الإسناد ربيعة بن سيف المعافري قال البخاري: عنده مناكير، وضعَّفه الأزدي والنسائي في سننه (4/ 27).

وأمّا ابن حبَّان فذكره في"الثقات" (6/ 301) وقال:"يخطئ كثيرًا".

ولعله أخطأ في بيان سبب القيام فإنه لم يتابع على ما ذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করল, তখন তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন। তখন বলা হলো: এটি তো এক ইহুদীর জানাযা। তিনি বললেন: "আমরা তো (আসলে) ফেরেশতাদের (সম্মানে) দাঁড়িয়েছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (3548)


3548 - عن عليّ بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقوم في الجنازة، ثمّ جلس، بعد.

وفي رواية: عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ أنه قال: رآني نافع بن جبير، ونحن في جنازةٍ قائمًا، وقد جلس ينتظر أن توضع الجنازة، فقال لي: ما يُقيمك؟ فقلت: أنتظر أن توضع الجنازة لما يحدث أبو سعيد الخدريّ، فقال نافع: فإن مسعود بن الحكم حَدَّثَنِي عن عليّ بن أبي طالب أنه قال: قام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ثمّ قعد.

صحيح: رواه مالك في الجنائز (33) عن يحيى بن سعيد، عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ، عن نافع بن جبير بن مطعم، عن مسعود بن الحكم، عن عليّ بن أبي طالب فذكره.

والرّواية الثانية عند مسلم في الجنائز (962) من طرق عن اللّيث بن سعد، عن يحيى بن سعيد،
عن واقد بن عمرو فذكره.

ورواه من وجه آخر عن شعبة، عن محمد بن المنكدر، قال: سمعتُ مسعود بن الحكم يحدث عن عليّ قال: رأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم قام فقمنا، وقعد فقعدنا. يعني في الجنازة.

وفي رواية للطحاوي في شرحه (1/ 282):"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرنا بالقيام في الجنازة، ثمّ جلس بعد ذلك وأمرنا بالجلوس".

وفي رواية عنده أيضًا من طريق إسماعيل بن مسعود بن الحكم الزرقيّ، عن أبيه قال: شهدت جنازة بالعراق، فرأيت رجالًا قيامًا ينتظرون أن توضع، ورأيت عليّ بن أبي طالب يشير إليهم أن اجلِسُوا، فإن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قد أمرنا بالجلوس بعد القيام. وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن مسعود فإنه"صدوق".

ورواه النسائيّ (1923) من وجه آخر عن أبي معمر قال: كنا عند عَلِيّ فمرت به جنازة فقاموا لها، فقال عَلِيّ: ما هذا؟ قالوا: أمْر أبي موسى، فقال: إنّما قام رسول الله صلى الله عليه وسلم لجنازة يهودية، ولم يَعُدْ بعد ذلك، وإسناده صحيح.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (প্রথমে) জানাযার জন্য দাঁড়াতেন, এরপর তিনি (পরে) বসে পড়েন।

অন্য এক বর্ণনায় ওয়াকিদ ইবনু আমর ইবনু সা'দ ইবনু মু'আয (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একটি জানাযার সাথে ছিলাম। নাফি' ইবনু জুবাইর আমাকে দাঁড়ানো অবস্থায় দেখলেন, যখন তিনি (নাফি') বসে পড়েছিলেন এবং লাশ রাখা পর্যন্ত অপেক্ষা করছিলেন। নাফি' আমাকে বললেন: তুমি দাঁড়িয়ে আছো কেন? আমি বললাম: আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বর্ণনা করেন তার কারণে আমি লাশ রাখা পর্যন্ত অপেক্ষা করছি। তখন নাফি' বললেন: মাসউদ ইবনু হাকাম তো আমাকে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (প্রথমে) দাঁড়িয়েছিলেন, অতঃপর বসে পড়েন।

অন্য একটি সূত্রে শু'বাহ, মুহাম্মাদ ইবনুল মুনকাদির (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন: আমি মাসউদ ইবনুল হাকামকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি দাঁড়িয়েছেন, তখন আমরাও দাঁড়িয়েছি, আর তিনি বসেছেন, তখন আমরাও বসেছি। (অর্থাৎ, জানাযার ক্ষেত্রে)।

ইমাম ত্বাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শারহ (ব্যাখ্যা) গ্রন্থে অন্য বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে জানাযার জন্য দাঁড়ানোর নির্দেশ দিয়েছিলেন, এরপর তিনি এর পরে বসে পড়েন এবং আমাদেরকে বসার নির্দেশ দেন।

তাঁর কাছে অন্য একটি বর্ণনায় ইসমাঈল ইবনু মাসউদ ইবনুল হাকাম আয-যুরাকীর সূত্রে তার পিতার কাছ থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: আমি ইরাকে একটি জানাযায় উপস্থিত ছিলাম। আমি দেখলাম লোকেরা দাঁড়িয়ে আছে, তারা (জানাযার খাটিয়া) নামানো পর্যন্ত অপেক্ষা করছে। আর আমি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি তাদের প্রতি ইশারা করে বলছেন: তোমরা বসে যাও। কারণ, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে দাঁড়ানোর পরে বসে যেতে নির্দেশ দিয়েছেন।

ইমাম নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) অন্য সূত্রে আবূ মা'মার (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমরা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন তাঁর পাশ দিয়ে একটি জানাযা নিয়ে যাওয়া হলো এবং লোকেরা সেটির জন্য দাঁড়ালো। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটা কী? তারা বলল: আবূ মূসা (আশ'আরী)-এর নির্দেশ। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল একবার এক ইয়াহুদী জানাযার জন্য দাঁড়িয়েছিলেন, এরপর তিনি আর তা করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (3549)


3549 - عن محمد أن جنازة مرتْ بالحسن بن عليّ وابن عباس، فقام الحسن، ولم يقم ابن عباس، فقال الحسن: أليس قد قام رسول الله صلى الله عليه وسلم لجنازة يهودي؟ قال ابن عباس: نعم، ثمّ جلس.

صحيح: رواه النسائيّ (1924) عن قُتَيبة، قال: حَدَّثَنَا حمّاد، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، قال: فذكره.

ورواه الإمام أحمد (1827) عن عبد الرزّاق، عن معمر، عن أيوب به مثله. ومحمد بن سيرين لم يسمع من ابن عباس شيئًا.

وقال عليّ بن المديني: أحاديث محمد بن سيرين عن ابن عباس قال شعبة: إنّما سمعها من عكرمة لقيه أيام المختار، ولم يسمع من ابن عباس شيئًا.

قال أحمد: لم يسمع من ابن عباس يقول كلها: نُبئتُ عن ابن عباس.

قلت: هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد في مسنده (1726) من وجه آخر عن محمد قال: نبئتُ أن جنازة مرت على الحسن بن عليّ فذكره وزاد في آخره:"فلم يُنكر الحسن ما قال ابن عباس".

فعرف من هذا أن بينهما عكرمة، فإذا عرف المبهم وهو ثقة، صحَّ الإسناد في حين أن أحدًا لم ينص على أن محمد بن سيرين لم يسمع من الحسن بن عليّ، واكتفى المزي وغيره ذكره ممن رُوي عنه محمد بن سيرين.

وقد تابعه أبو مجلز فرواه عن ابن عباس والحسن بن عليّ القصة نفسها.

رواه النسائيّ (1926) عن يعقوب بن إبراهيم، عن ابن علية، عن سليمان التيميّ، عن أبي
مجلز فذكره.

وهذا إسناد صحيح إِلَّا أنه مرسل فيما قاله يحيى بن معين حين سئل عنه، ولكنه يقوي الذي قبله، وله أسانيد أخرى عند النسائيّ وغيره إِلَّا أن ما ذكرته وهو أصحها.

وأمّا ما رُوي بأن قيامه صلى الله عليه وسلم كان تأذّيًا بريح اليهودي فهو إما ضعيف، وإما منقطع، ولا يصح منه شيء.



فقه الباب:

قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن الموت فزع" وقوله:"أليست نفسًا" دليل على قيام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم للجنازة، فإن كانت هذه العلة للقيام فهي باقية. فما جاء في حديث عليّ بن أبي طالب بأنه صلى الله عليه وسلم قام ثمّ قعد دليل على استحباب القيام لا الوجوب، فإن حديث عليّ بن أبي طالب لا يكون ناسخًا إن كانت العلة للقيام كما سبق، وقد قيل غير ذلك، والذي ذكرته هو أولي.

وأمّا ما رُوي عن عبادة بن الصَّامت قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوم في الجنازة حتّى توضع في اللحد، فمر به حَبْرٌ من اليهود فقال: هكذا نفعل. فجلس النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقال:"اجلسوا خالفوهم" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3176)، والتِّرمذيّ (1020)، وابن ماجة (1545) كلّهم من طريق أبي أسباط الحارثي (وهو بشر بن رافع) عن عبد الله بن سلمان بن جنادة بن أبي أمية، عن أبيه، عن جده، عن عبادة بن الصَّامت فذكره.

وفيه سلسلة الضعفاء أولهم أبو أسباط الحارثي بشر بن رافع ضعيف، ضعَّفه أحمد والنسائي وأبو حاتم، والبزّار، والدارقطني وغيرهم، وقال البخاريّ: لا يتابع في حديثه.

وشيخه عبد الله بن سليمان بن جنادة"ضعيف" أيضًا، وأبوه سليمان بن جنادة"منكر الحديث" كما قال أبو حاتم والبخاري.

ولو صحَّ هذا الحديث لكان دليلًا لنسخ أحاديث الباب السابق، ولكنه لم يصح. قال الحافظ في"الفتح" (3/ 181):"فلو لم يكن إسناده ضعيفًا لكان حجة في النسخ".




মুহাম্মদ থেকে বর্ণিত যে, একবার হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ দিয়ে একটি জানাযা যাচ্ছিল। তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে গেলেন, কিন্তু ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন না। হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি কোনো ইহুদীর জানাযার জন্য দাঁড়াননি? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, [দাঁড়িয়েছিলেন], এরপর তিনি (ইবনু আব্বাস) বসে পড়লেন।

সহীহ: এটি নাসাঈ (১৯২৪) কুতাইবা থেকে, তিনি হাম্মাদ থেকে, তিনি আইয়ুব থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি এটি উল্লেখ করেছেন।

আর ইমাম আহমাদও (১৮২৭) এটি আব্দুর রাযযাক থেকে, তিনি মা’মার থেকে, তিনি আইয়ুব থেকে একইভাবে বর্ণনা করেছেন। তবে মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে কোনো হাদীস শোনেননি।

আলী ইবনুল মাদীনী বলেন: মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে যে হাদীসগুলো বর্ণনা করেছেন, শু’বাহ বলেছেন যে তিনি তা ‘ইকরিমাহ থেকে শুনেছেন, যার সাথে মুখতারের যুগে তাঁর সাক্ষাৎ হয়েছিল। কিন্তু তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে সরাসরি কিছুই শোনেননি।

আহমাদ বলেন: তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কোনো হাদীস শোনেননি। তিনি (মুহাম্মাদ) সবকয়টি হাদীসের ক্ষেত্রেই বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আমাকে জানানো হয়েছে।

আমি (আলবানী) বলি: ইমাম আহমাদ তাঁর মুসনাদে (১৭২৬) অন্য সূত্রেও এটি বর্ণনা করেছেন, মুহাম্মাদ বলেছেন: আমাকে জানানো হয়েছে যে, হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ দিয়ে একটি জানাযা যাচ্ছিল, এরপর তিনি ঘটনাটি উল্লেখ করেন এবং এর শেষে যোগ করেন: “তখন ইবনু আব্বাস যা বললেন, হাসান তা অস্বীকার করেননি।”

এ থেকে জানা যায় যে, এই দুজনের (মুহাম্মাদ ও ইবনু আব্বাস) মাঝে ‘ইকরিমাহ ছিলেন। আর যদি এই অনুল্লিখিত বর্ণনাকারী (মুবহাম) বিশ্বস্ত বলে প্রমাণিত হয়, তবে সনদটি সহীহ গণ্য হয়। যদিও কেউ সুস্পষ্টভাবে বলেননি যে, মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে শোনেননি। আর আল-মিয্‌যী এবং অন্যান্যরা যাদের থেকে মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন বর্ণনা করেছেন, তাদের উল্লেখ করেই ক্ষান্ত হয়েছেন।

আবূ মিজলাযও তাঁর (মুহাম্মাদের) অনুসরণ করেছেন। তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একই ঘটনা বর্ণনা করেছেন।

নাসাঈ (১৯২৬) এটি ইব্রাহীম ইবনু ইয়াকূব থেকে, তিনি ইবনু ‘উলাইয়াহ থেকে, তিনি সুলাইমান আত-তাইমী থেকে, তিনি আবূ মিজলায থেকে বর্ণনা করেছেন।

এই সনদটি সহীহ; তবে ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন-কে এটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি এটিকে মুরসাল (মুকতাঈ) বলেছেন। তবে এটি এর পূর্বের বর্ণনাটিকে শক্তিশালী করে। নাসাঈ এবং অন্যদের কাছে এর আরও সনদ রয়েছে, কিন্তু আমি যা উল্লেখ করেছি, সেটাই এর মধ্যে সবচেয়ে সহীহ।

আর যা বর্ণনা করা হয় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দাঁড়ানোর কারণ ছিল ইহুদীর লাশের দুর্গন্ধে কষ্ট পাওয়া—তা দুর্বল অথবা মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন)। এগুলোর মধ্যে কোনো কিছুই সহীহ নয়।

**এই অনুচ্ছেদের ফিকহ:**

নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর বাণী: “নিশ্চয় মৃত্যু এক ভীতিকর বিষয়” এবং তাঁর বাণী: “এটা কি একটি আত্মা নয়?”—এগুলো জানাযার জন্য নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দাঁড়ানোর প্রমাণ। যদি দাঁড়ানোর কারণ এটিই হয়, তবে তা এখনও বহাল থাকবে। আর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে যা এসেছে যে, তিনি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দাঁড়িয়েছিলেন, অতঃপর বসে পড়েছিলেন—তা দাঁড়ানোর আবশ্যকতা নয়, বরং মুস্তাহাব হওয়ার প্রমাণ। কেননা, দাঁড়ানোর কারণ যদি পূর্বে বর্ণিত মতো হয়, তবে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি নাসিখ (রহিতকারী) হতে পারে না। অবশ্য অন্য কথাও বলা হয়েছে, তবে আমি যা উল্লেখ করেছি, সেটাই অধিকতর সঠিক।

আর যা উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম জানাযার জন্য ততক্ষণ পর্যন্ত দাঁড়াতেন, যতক্ষণ না তা লাহাদ (কবর)-এ রাখা হতো। অতঃপর তাঁর পাশ দিয়ে একজন ইহুদী পাদ্রী অতিক্রম করছিল এবং সে বলল: আমরা এভাবেই করে থাকি। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বসে পড়লেন এবং বললেন: “তোমরা বসো, তাদের বিরোধিতা করো।” – এ হাদীসটি দুর্বল।

এটি আবূ দাঊদ (৩১৭৬), তিরমিযী (১০২০) এবং ইবনু মাজাহ (১৫৪৫) বর্ণনা করেছেন। সবাই আবূ আসবাত আল-হারিসী (তিনি বিশর ইবনু রাফি’)-এর সূত্রে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু সুলায়মান ইবনু জুনাদাহ ইবনু আবী উমাইয়্যাহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে, তিনি উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

এই সূত্রে একাধিক দুর্বল রাবী রয়েছে। তাদের মধ্যে প্রথমজন আবূ আসবাত আল-হারিসী বিশর ইবনু রাফি’ দুর্বল। তাঁকে আহমাদ, নাসাঈ, আবূ হাতিম, বাযযার, দারাকুতনী এবং অন্যান্যরা দুর্বল বলেছেন। আর বুখারী বলেন: তাঁর হাদীসের কোনো অনুসারী নেই।

তাঁর শায়খ আব্দুল্লাহ ইবনু সুলায়মান ইবনু জুনাদাহও “দুর্বল”। আর তাঁর পিতা সুলায়মান ইবনু জুনাদাহ “মুনকারুল হাদীস” (অস্বীকার্য হাদীসের বর্ণনাকারী), যেমনটি আবূ হাতিম এবং বুখারী বলেছেন।

যদি এই হাদীসটি সহীহ হতো, তবে তা পূর্ববর্তী অনুচ্ছেদের হাদীসগুলোকে রহিত করার প্রমাণ হতো। কিন্তু এটি সহীহ নয়। হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-ফাতহ’ (৩/১৮১)-এ বলেছেন: “যদি এর সনদ দুর্বল না হতো, তবে তা নসখের (রহিত করার) প্রমাণ হিসেবে গণ্য হতো।”









আল-জামি` আল-কামিল (3550)


3550 - عن البراء بن عازب قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة رجل من الأنصار، فانتهينا إلى القبر، ولم يُلحد بعد، فجلس النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مستقبل القبلة، وجلسنا معه.

حسن: رواه أبو داود (3212)، والنسائي (2001)، وابن ماجة (1549) كلّهم من طريق المنهال بن عمرو، عن زاذان، عن البراء فذكر الحديث واللّفظ لأبي داود، وزاد ابن ماجة:"كأن على رؤوسنا الطير".
وإسناده حسن لأجل المنهال بن عمرو، فإنه حسن الحديث.




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক আনসার সাহাবীর জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, অথচ তখনো কবর প্রস্তুত করা হয়নি। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিবলামুখী হয়ে বসলেন, আর আমরাও তাঁর সাথে বসলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3551)


3551 - عن البراء قال: أمرنا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بسبع، ونهانا عن سبع: أمرنا باتباع الجنائز، وعيادة المريض، وإجابة الداعيّ، ونصر المظلوم، وإبرار القسم، ورد السّلام، وتشميت العاطس، ونهانا عن: آنية الفضة، وخاتم الذهب، والحرير، والديباج، والقَسِّي، والاستبرق.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1239) عن أبي الوليد، حَدَّثَنَا شعبة، عن الأشعث قال: سمعتُ معاوية بن سويد بن مُقرّن، عن البراء فذكره.

ورواه مسلم من أوجه أخرى (2066) عن أشعث، قال: حَدَّثَنِي معاوية بن سُويد قال: دخلتُ على البراء بن عازب فسمعتُه يقول: فذكر الحديث وفيه"إفشاء السّلام" بدلًا من"رد السّلام".

ورواه أيضًا من طريق شعبة كما رواه البخاريّ إِلَّا أن فيه"نهانا عن خاتم الذهب أو حَلْقة الذهب".




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাতটি কাজের আদেশ দিয়েছেন এবং সাতটি কাজ থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাদের আদেশ দিয়েছেন: জানাযার অনুসরণ করা, রোগীর সেবা-শুশ্রূষা করা, আমন্ত্রণকারীর ডাকে সাড়া দেওয়া, মজলুমকে সাহায্য করা, কসম পূর্ণ করা, সালামের উত্তর দেওয়া এবং হাঁচিদাতার জন্য দু‘আ করা। আর তিনি নিষেধ করেছেন: রূপার পাত্র, সোনার আংটি, রেশম (বস্ত্র), দিবাজ (ঘন রেশমি বস্ত্র), কাসসী (রেশম মিশ্রিত বস্ত্র) এবং ইসতিবরাক (মোটা রেশমি বস্ত্র) ব্যবহার করতে।









আল-জামি` আল-কামিল (3552)


3552 - عن أبي هريرة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"حق المسلم على المسلم خمس: رد السّلام، وعيادة المريض، واتباع الجنائز، وإجابة الدّعوة، وتشميت العاطس".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1240)، ومسلم في كتاب السّلام (2162) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: أخبرني سعيد بن المسيب، أن أبا هريرة قال: فذكره.

ورواه مسلم من طريق آخر عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة وفيه"حق المسلم على المسلم ست" والسادس وإذا استنصحك فانصح له، وفيه بدلًا من رد السّلام"إذا لقيته فسلم عليه".

ورواه البخاريّ في"الأدب المفرد" (519) من وجه ثالث من طريق عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة وفيه"ثلاث كلهن حق على كل مسلم فذكر من الثلاثة:"عيادة المريض، وشهود الجنازة، وتشميت العاطس إذا حمد الله عز وجل".

ولكن رواه ابن ماجة (1435) من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر فيه الخمس مثل حديث الزهري. وهذا أصح لموافقته للزهري. فلعل عمر بن أبي سلمة اختصره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “এক মুসলিমের উপর অন্য মুসলিমের পাঁচটি অধিকার রয়েছে: সালামের উত্তর দেওয়া, অসুস্থকে দেখতে যাওয়া, জানাযার অনুসরণ করা, দাওয়াত কবুল করা এবং হাঁচিদাতার জন্য শুভ কামনা করা।”









আল-জামি` আল-কামিল (3553)


3553 - عن أبي هريرة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من تبع جنازةً فله قيراط من الأجر".

فقال ابن عمر: أكثر علينا أبو هريرة، فبعث إلى عائشة فسألها فصدَّقت أبا هريرة، فقال ابن عمر: لقد فرطنا في قراريط كثيرةٍ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1323)، ومسلم في الجنائز (945/ 55) كلاهما من حديث جرير بن حازم، حَدَّثَنَا نافع يقول: حُدِّث ابن عمر أن أبا هريرة يقول: فذكر الحديث
مرفوعًا عند مسلم، وأمّا البخاريّ فجعله من قول أبي هريرة، ولكنه قال: فصدَّقت -يعني عائشة- أبا هريرة وقالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি কোনো জানাজার অনুসরণ করে, তার জন্য এক কিরাত পরিমাণ সাওয়াব রয়েছে।” তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আবূ হুরায়রা আমাদের জন্য অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন। এরপর তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ হুরায়রার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথাকে সমর্থন করলেন। অতঃপর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা তো বহু কিরাত (সাওয়াব) নষ্ট করে ফেলেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3554)


3554 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شهد الجنازة حتّى يُصلى عليها فله قيراط، ومن شهدها حتّى تُدفن فله قيراطان".

قيل: وما القيراطان؟ قال:"مثل الجبلين العظيمين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1325)، ومسلم في الجنائز (945) كلاهما من حديث يونس، عن ابن شهاب، قال: حَدَّثَنِي عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، أن أبا هريرة قال: فذكر الحديث ولفظهما سواء.

وفي رواية عند مسلم من وجه آخر:"أصغرها مثل أُحد". وفي رواية عنده عن أبي حازم قال: قلت: يا أبا هريرة! وما القيراط؟ قال:"مثل أُحد".

وسيأتي في حديث ثوبان: سُئل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن القيراط، فقال:"مثل أحد" فتبين من هذا أن القائل هو النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأنه مرفوع.

قال ابن شهاب: قال سالم بن عبد الله بن عمر: وكان ابن عمر يُصَلِّي عليها ثمّ ينصرف. فلمّا بلغه حديث أبي هريرة قال: لقد ضيَّعنا قراريط كثيرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জানাযায় উপস্থিত হয় এবং সালাত সম্পন্ন হওয়া পর্যন্ত থাকে, তার জন্য এক ক্বীরাত (পুরস্কার) রয়েছে। আর যে ব্যক্তি জানাযায় উপস্থিত হয় এবং দাফন সম্পন্ন হওয়া পর্যন্ত থাকে, তার জন্য দুই ক্বীরাত (পুরস্কার) রয়েছে।"

জিজ্ঞেস করা হলো: "দুই ক্বীরাত কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দুইটি বিশাল পর্বতের সমান।"

ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সালিম ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু উমর বলেছেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার সালাত আদায় করে ফিরে যেতেন। এরপর যখন তাঁর কাছে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীস পৌঁছালো, তখন তিনি বললেন: "আমরা তো অনেক ক্বীরাত নষ্ট করেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (3555)


3555 - عن أبي هريرة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من اتبع جنازة مسلم إيمانًا واحتسابًا، وكان معه حتّى يصلى عليها، ويفرغ من دفْنِها فإنه يرجع من الأجر بقيراطين، كل قيراط مثل أحد، ومن صلى عليها ثمّ رجع قبل أن تدفن فإنه يرجع بقيراط".

صحيح: رواه البخاريّ في الإيمان (47) عن أحمد بن عبد الله بن عليّ المنجوفي قال: حَدَّثَنَا رَوح، قال: حَدَّثَنَا عوف، عن الحسن ومحمد، عن أبي هريرة فذكره. وتابعه عثمان المؤذن قال: حَدَّثَنَا عوف، عن محمد، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحوه. انتهى.

والحسن هو: ابن أبي الحسن البصريّ، وسماعه عن أبي هريرة مختلف فيه، والصواب أنه لم يسمع منه، وهو كثير الإرسال ولذا كان اعتماد البخاريّ على رواية محمد، وهو: ابن سيرين، ويكون الحسن متابعًا له.

وعوف هو: ابن أبي جميلة، وكنيته: أبو سهل.

وعثمان المؤذن هو: ابن الهيثم من شيوخ البخاري.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সওয়াবের (আল্লাহর সন্তুষ্টির) আশায় কোনো মুসলমানের জানাজার অনুসরণ করবে এবং তার সাথে থাকবে জানাজার সালাত আদায় করা ও দাফন শেষ হওয়া পর্যন্ত, সে ব্যক্তি সওয়াবের দুটি 'ক্বীরাত' নিয়ে ফিরে আসবে। প্রতিটি 'ক্বীরাত' উহুদ পর্বতের মতো হবে। আর যে ব্যক্তি জানাজার সালাত আদায় করে দাফনের পূর্বে ফিরে আসবে, সে এক 'ক্বীরাত' সওয়াব নিয়ে ফিরে আসবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3556)


3556 - عن سعد بن أبي وقَّاص، أنه كان قاعدًا عند عبد الله بن عمر، إذ طَلَع خبَّاب صاحب المقْصورة، فقال: يا عبد الله بن عمر! ألا تسمع ما يقول أبو هريرة، إنه
سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: لمن خرج مع جنازة من بيتها وصلى عليها، ثمّ تَبِعَها حتّى تُدْفَن كان له قيراطان من الأجر، كلُّ قيراطٍ مثلُ أُحُد، ومن صَلَّى عليها ثمّ رجع كان له من الأجر مثل أُحُد" فأرسل ابنُ عمر خَبَّابًا إلى عائشة يسألُها عن قول أبي هريرة، ثمّ يرجعُ إليه فيخبرُه ما قالَت، وأخذ ابن عمر قبضةً من حصْباء المسجدِ يُقَلِّبُها في يده، حتّى رجعَ إليه الرسولُ فقالَ: قالتْ عائشةُ: صَدَقَ أبو هريرة، فضرب ابنُ عمرَ بالحَصَى الذي كان في يده الأرضَ ثمّ قال: لقد فرَّطْنَا في قَراريطَ كثيرة.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (945/ 56) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا عبد الله بن يزيد، حَدَّثَنِي حيوة، حَدَّثَنِي أبو صخر، عن يزيد بن عبد الله بن قُسيط، أنه حدَّثه أن داود بن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص حدَّثه عن أبيه، أنه كان قاعدًا فذكره.

وخبَّاب هو مولي فاطمة بنت عتبة بن ربيعة، ذكره الحافظ ابن حجر وغيره من الصّحابة.

وقوله:"المقصورة" أي: الذي اتخذ الحجرة المحصنة بالحيطان من حجر. والمراد هنا مقصورة المسجد.




সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট বসা ছিলেন। এমন সময় মাকসূরার (হুজরার) অধিকারী খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে আগমন করলেন। তিনি বললেন: হে আব্দুল্লাহ ইবনু উমার! আপনি কি শোনেননি আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কী বলছেন? তিনি বলছেন যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো জানাযার সাথে তার ঘর থেকে বের হয়, অতঃপর তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করে এবং তাকে দাফন সম্পন্ন হওয়া পর্যন্ত অনুসরণ করে, তার জন্য দুই ক্বীরাত পরিমাণ সওয়াব রয়েছে। প্রত্যেক ক্বীরাত উহুদ পাহাড়ের মতো।" আর "যে ব্যক্তি তার উপর সালাত আদায় করে অতঃপর ফিরে আসে, তার জন্য উহুদ পাহাড়ের সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে।" অতঃপর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এই বলে পাঠালেন যে, তিনি যেন আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেন এবং ফিরে এসে তাঁকে জানান আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কী বলেছেন। ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের কিছু নুড়ি পাথর হাতে নিয়ে উল্টাতে থাকলেন, যতক্ষণ না সেই প্রেরিত ব্যক্তি (খাব্বাব) ফিরে এসে বললেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, "আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সত্য বলেছেন।" তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাতে থাকা নুড়ি পাথরগুলো মাটিতে ছুঁড়ে মারলেন এবং বললেন: "আমরা তো অনেক ক্বীরাতের (সওয়াবের) ক্ষেত্রে শিথিলতা প্রদর্শন করেছি!"









আল-জামি` আল-কামিল (3557)


3557 - عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صلَّى على جنازة فله قيراط، فإن شَهِد دَفْنِها فله قيراطان، والقيراط مثل أُحُد".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (946) من طرق، عن قتادة، عن سالم بن أبي الجعد، عن معدان بن أبي طلحة اليعمريّ، عن ثوبان فذكره.

وفي رواية عنده: سئل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن القيراط، فقال:"مثل أُحُد".




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো জানাযার সালাত আদায় করে, তার জন্য এক কীরাত। আর যে ব্যক্তি তার দাফনেও উপস্থিত থাকে, তার জন্য দুই কীরাত। আর এক কীরাত হলো উহুদ পাহাড়ের সমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (3558)


3558 - عن ابن عمر: أنه مَرَّ بأبي هريرة وهو يُحدِّثُ عن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من تبع جنازة فصلَّى عليها، فله قيراطٌ، فإن شَهد دفنها، فله قيراطان، القيراط أعظمُ من أُحُدٍ"، فقال له ابنُ عمر: أبا هريرة! انظُرْ ما تُحَدِّثُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم! ! فقام إليه أبو هريرة، حتّى انطلق به إلى عائشة، فقال لها: يا أمّ المؤمنين! أُنشدكِ بالله، أسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"مَن تَبِعَ جِنازَةً فصلَّى عليها، فله قيراطٌ، فإن شهد دَفْنَها، فله قيراطَان"؟ ، فقالت: اللَّهُمَّ! نعم، فقال أبو هريرة: إنه لم يكن يَشْغَلُنِي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم غَرْس الوَدِيّ، ولا صفقٌ بالأسواق، إني إنّما كنت أطلبٌ من رسول الله صلى الله عليه وسلم كلمةً يُعلِّمنيها، وأكْلَةً يُطْعِمُنيها، فقال له ابنُ عمر: أنت يا أبا هريرة! كنت ألزمنا لرسول الله صلى الله عليه وسلم، وأعلمنا بحديثه.

صحيح: رواه الإمام أحمد (4453) عن هُشيم، عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن
الجرشيّ، عن ابن عمر فذكره.

وصرَّحَ هُشيم في رواية عبد الرزّاق (6270).

ورواه الحاكم (3/ 510 - 511) من هذا الطريق وصحَّحه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এই হাদীস বর্ণনা করছিলেন যে, তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো জানাযার অনুসরণ করে এবং তাতে সালাত আদায় করে, তার জন্য রয়েছে এক কীরাত নেকি। আর যদি সে তার দাফন পর্যন্ত উপস্থিত থাকে, তবে তার জন্য রয়েছে দুই কীরাত। এক কীরাত উহুদ পর্বতের চেয়েও বিশাল।"

তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আবু হুরায়রা! আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে কী হাদীস বর্ণনা করছেন, তা ভালোভাবে দেখুন!! তখন আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে গেলেন এবং তাঁকে নিয়ে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। এরপর তিনি (আবু হুরায়রা) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: হে উম্মুল মুমিনীন! আমি আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন যে: "যে ব্যক্তি কোনো জানাযার অনুসরণ করে এবং তাতে সালাত আদায় করে, তার জন্য রয়েছে এক কীরাত, আর যদি সে তার দাফন পর্যন্ত উপস্থিত থাকে, তবে তার জন্য রয়েছে দুই কীরাত?"

তিনি (আয়েশা) বললেন: হে আল্লাহ! হ্যাঁ (আমি শুনেছি)।

তখন আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমাকে তো খেজুরের চারা রোপণ করা অথবা বাজারে কেনা-বেচা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে (হাদীস শোনা) থেকে বিরত রাখতো না। আমি তো কেবল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এমন একটি বাণী চাইতাম, যা তিনি আমাকে শিক্ষা দেন, অথবা এমন একটি খাবার চাইতাম, যা তিনি আমাকে খাওয়ান।

তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আবু হুরায়রা! আপনিই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সবচেয়ে বেশি সহচর ছিলেন এবং তাঁর হাদীস সম্পর্কে আমাদের মধ্যে সর্বাধিক জ্ঞানী ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3559)


3559 - عن أبي سعيد الخدريّ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من جاء إلى جنازة فمشي معها من أهلها حتّى يُصلَّى عليها فله قيراط، ومن انتظر حتّى تُدفن، أو يُفرغ منها فله قيراطان مثل أُحد".

حسن: رواه الإمام أحمد (11218) عن سليمان بن داود، حَدَّثَنَا وُهيب، عن عمرو بن يحيى الأنصاري.

وأبو سلمة، حَدَّثَنَا سليمان بن بلال، عن عمرو بن يحيى، عن محمد بن يوسف بن عبد الله بن سلّام، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.

ومحمد بن يوسف بن عبد الله بن سلّام الإسرائيلي لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبَّان في"ثقاته" ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، وقد تابعه عطية العوفيّ، عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا:"من صلى على جنازة وشيَّعها كان له قيراطان، ومن صلى عليها، ولم يُشَيِّعها كان له قيراط، والقيراط مثل أحد" رواه الإمام أحمد (11152)، والبزّار"كشف الأستار" (824) كلاهما عن طريق فُضيل بن مرزوق، عن عطية، بإسناده مثله. وعطية العوفيّ، وصف بسوء حفظه، فإذا توبع عرفنا أنه لم يخطئ، وبهذا صَحَّ قول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 29):"ورواه البزّار وأحمد وأبو يعلى وإسناده حسن".

وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن عمر مرفوعًا:"من تبع جنازة حتّى يُصَلِّي عليها فإن له قيراطًا" فسئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن القيراط، فقال:"مثل أحد" ففيه علة خفية.

رواه الإمام أحمد (4650) عن يحيى، عن إسماعيل، حَدَّثَنِي سالم أبو عبد الله، عن ابن عمر فذكره ورجاله ثقات إِلَّا أن الإسناد معلول، لأنه من المعروف أن ابن عمر كان ينكر على أبي هريرة حتّى سأل عائشة عنه فصدَّقته كما مضى وأقام شعبة هذا الإسناد فجعله من مسند أبي هريرة كما رواه الإمام أحمد (9904) عن محمد بن جعفر، عنه، عن عبد الملك بن عمير، قال: سمعت سالمًا البرَّاد أبا عبد الله قال: سمعت أبا هريرة قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من تبع جنازة فصلى عليها - أو قال: من صلى عليها -شك شعبة- فله قيراط، فإن شهد دفنها فله قيراطان، القيراط مثل أحد" وقد نبَّه على هذه العلة الخفية البخاريّ في"التاريخ الكبير" (2/ 274) بعد أن روى الحديث من مسند أبي هريرة من طريق عبد الملك بن عمير، ثمّ قال: وقال ابن أبي خالد (وهو إسماعيل كما في مسند الإمام أحمد) سمع سالمًا أبا عبد الله البراد، سمع ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله .. وهذا لا يصح، لأن الزهري قال: عن سالم، أن ابن عمر أنكر على أبي هريرة حتّى سأل عائشة، قال لنا المقري: حَدَّثَنَا حيوة، سمع أبا صخر، سمع يزيد بن قسيط، سمع داود بن عامر بن سعد، سمع
ابن عمر خبابًا صاحب المقصورة، وذكر عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله، فأنكر ابن عمر حتّى أرسل إلى عائشة فصدقت أبا هريرة. انتهى.

وقال الحافظ ابن حجر في"أطراف المسند" (3/ 397) بعد أن أورد كلام البخاريّ:"وقد راج هذا السند على الحافظ الضياء، فأخرج هذا الحديث في المختارة" وهو معلول كما تري"، انتهى.

وأمّا كون ابن عمر بدأ يحدث بهذا الحديث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو لم يسمع منه، فإن كان مرسل الصحابي فهو مقبول، ولكن هذا يحتاج إلى معرفة التاريخ، ليكون إنكاره على أبي هريرة منسوخًا، والذي يغلب على الظن أن سالمًا أبا عبد الله البراد وهو إن كان ثقة قد غلط فيه فجعله مرة من مسند أبي هريرة، فأصاب لكثرة من تابعوه على ذلك، وأخرى من مسند ابن عمر فوهم لأنه لم يتابع على ذلك، والله تعالى أعلم بالصواب.

ورُوي عن عبد الله بن مغفل مرفوعًا ولفظه:"من تبع جنازة حتّى يُصلى عليها فله قيراط، ومن انتظرها حتّى يفرغ منها فله قيراطان".

رواه النسائيّ (1941) عن محمد بن عبد الأعلى، قال: حَدَّثَنَا خالد، قال: حَدَّثَنَا أشعث، عن الحسن، عن عبد الله بن مغفل فذكره.

ورواه الإمام أحمد (20575) عن رَوح، عن أشعث بإسناده وفيه: من صلى على جنازة فله قيراط، فإن انتظرها حتّى يَفرغ منها فله قيراطان".

ورواه (16798) من وجه آخر عن مبارك، عن الحسن بإسناده باللفظ الأوّل.

والحسن هو ابن أبي الحسن البصري الإمام المعروف إِلَّا أنه كان كثير التدليس، ولم يُصرح بالتحديث، وإن كان الإمام أحمد يثبت سماعه من عبد الله بن مغفل، ولكن ذكر الذّهبيّ في السير (4/ 588) قاعدة عظيمة فيه وفي مثله فقال:"قال قائل: إنّما أعرض أهل الصَّحيح عن كثير مما يقول فيه الحسن: عن فلان، وإن كان مما قد ثبت لُقيه فيه لفلان المعين، لأن الحسن معروف بالتدليس، يُدلس عن الضعفاء، فيبقى في النفس من ذلك".

وأمّا مبارك وهو ابن فَضالة - بفتح الفاء فهو مدلِّس أيضًا، وقد ضعَّفه النسائيّ، وقال أبو داود:"كان شديد التدليس" غير أنه قد توبع في الإسناد الأوّل.

وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن مسعود:"من اتبع جنازة فليحمل بجوانب السرير كلها، فإنه من السنة، ثمّ إن شاء فليتطوع، وإن شاء فليدع فهو منقطع، رواه ابن ماجة (1478) عن حُميد بن مسعدة، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، عن منصور، عن عبيد بن نسطاس، عن أبي عبيدة قال: قال عبد الله فذكره.

وأبو عبيدة هو: ابن عبد الله بن مسعود لم يسمع من أبيه، ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقيّ (4/ 19 - 20) ولم يُضعِّفه.
وفي معناه أحاديث أخرى عن ثوبان وأنس بن مالك ذكرهما ابن الجوزي في العلل المتناهية (1/ 379) (2/ 415 - 416) وروى ابن أبي شيبة (3/ 283) بإسناد لا بأس به عن أبي الدرداء موقوفًا عليه:"من تمام أجر الجنازة أن يُشيعها من أهلها، وأن يحمل بأركانها الأربع، وأن يحثو في القبر".




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো জানাযার কাছে আসে এবং এর স্বজনদের সাথে জানাযার সালাত সম্পন্ন হওয়া পর্যন্ত চলে, তার জন্য রয়েছে এক কিরাত। আর যে ব্যক্তি অপেক্ষা করে যতক্ষণ না দাফন শেষ হয় বা তা থেকে ফারেগ হওয়া যায়, তার জন্য রয়েছে উহুদ পাহাড়ের সমতুল্য দুই কিরাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3560)


3560 - عن أبي بردة قال: أوصي أبو موسى حين حضره الموت فقال: إذا انطلقتم بجنازتي فأسْرِعوا المشيَ، ولا تُتْبعني بمجمر، ولا تجعلوا في لحدي شيئًا يحول بيني وبين التراب، ولا تجعلوا على قبري بناءً، وأُشهدكم أني برئٌ من كل حالقةٍ، أو سالقةٍ، أو خارقة، قالوا: أو سمعت فيه شيئًا؟ قال: نعم من رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه الإمام أحمد (19547) عن معتمر بن سليمان التيمي، قال: قرأت على الفُضيل بن ميسرة في حديث أبي حريز، أن أبا بردة حدَّثه قال: أوصى أبو موسى فذكره.

ورواه ابن ماجه (1487) وصحَّحه ابن حبان (3150) من طريق المعتمر بن سليمان إلا أن ابن ماجه ذكره مختصرًا.

قال البوصيري في"مصباح الزجاجة":"هذا إسناد حسن. أبو حَريز اسمه: عبد الله بن حسين مختلف فيه".

قلت: وهو كما قال، وقد سبق ذكره في باب تبرؤ النبي صلى الله عليه وسلم من الصالقة.

وأما ما رُوي عن أبي هريرة:"لا تتبع الجنازة بصوت ولا نار" ففي إسناده من لم يسم.

رواه أبو داود (3171) عن هارون بن عبد الله، حدثنا عبد الصمد، ح وحدثنا ابن المثنى، حدثنا أبو داود، قالا: حدثنا حرب -يعني ابن شداد، حدثنا يحيى، حدثني باب بن عُمير، حدثني رجل من أهل المدينة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم"أنه نهى أن يتْبَع الميت صوت أو نار".

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 29):"رواه أبو يعلى، وفيه من لا ذكر له".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر قال:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تُتْبَع جنازة معها رانَّة" رواه ابن ماجه (1583) وفيه أبو يحيى القتات وهو ضعيف، وأورده ابن الجوزي في"الموضوعات"، وبه أعله البوصيري في"مصباح الزجاجة" وقال:"ورواه أبو يعلى الموصلي في مسنده من طريق ليث بن أبي سليم، عن مجاهد فذكره" وليث بن أبي سليم ضعيف.

والخلاصة: إذا نظرنا إلى مجموع هذه الأحاديث يظهر لنا أن لها أصْلًا، وثبت في الآثار الصحيحة أن عددًا من الصحابة كانوا أوصوا بذلك، أوصى عمرو بن العاص كما في صحيح مسلم (121) فقال:"فإذا أنا مُت فلا تَصْحبني نائحةٌ ولا نار".




আবূ বুরদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তিনি ওসিয়ত করে বললেন: যখন তোমরা আমার জানাযা নিয়ে যাবে, তখন দ্রুত গতিতে হেঁটে চলবে। আমার জানাযার সাথে কোনো ধুনুচি (বা আগুন) নিয়ে যাবে না। আর আমার কবরে (লাহাদে) এমন কিছু রাখবে না যা আমার এবং মাটির মধ্যে অন্তরাল সৃষ্টি করে। আর আমার কবরের উপর কোনো নির্মাণ বা স্থাপনা তৈরি করবে না। আর আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রেখে বলছি যে, আমি সকল 'হালিক্বা' (শোকে মাথা মুণ্ডনকারী), 'সালিক্বা' (উচ্চস্বরে চিৎকারকারী) এবং 'খারিক্বা' (শোকে কাপড় ছেঁড়াকারী) নারীদের কাজ থেকে সম্পূর্ণ মুক্ত। তারা জিজ্ঞেস করল: আপনি কি এ বিষয়ে (এই তিনটি কাজ সম্পর্কে) কিছু শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে।