হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3668)


3668 - عن عمر بن الخطاب قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُرينا مصارع أهل بدر بالأمس، يقول:"هذا مصرع فلان غدًا إن شاء الله" قال: فوالذي بعثه بالحق ما أخطؤوا الحدود التي حدَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فجعلوا في بئر بعضهم على بعض.

صحيح: رواه مسلم في الجنة (2873) عن إسحاق بن عمر بن سليط الهذلي، حدثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، قال: قال أنس: كنت مع عمر بين مكة والمدينة، فتراءَينا الهلال، وكنت رجلًا حديد البصر فرأيتهُ، وليس أحد يزعم أنه رآه غيري، قال: فجعلتُ أقول لعُمَر: أمَا تراه؟ فجعل لا يراه، قال: يقول عمر: سأراه وأنا مستلق على فراشي، ثم أنشأ يحدثنا عن أهل بدر فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গতকাল (বদরের যুদ্ধের প্রাক্কালে) আমাদেরকে বদরবাসীদের (মুশরিকদের) মৃত্যুর স্থানগুলো দেখাচ্ছিলেন। তিনি বলছিলেন: "ইনশাআল্লাহ, আগামীকাল অমুকের মৃত্যুস্থান হবে এটি।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যাঁর হাতে তাঁকে সত্যসহ প্রেরণ করা হয়েছে, তাঁর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে স্থানগুলো চিহ্নিত করেছিলেন, তারা সেই সীমা থেকে সামান্যতমও বিচ্যুত হয়নি। তিনি বললেন: অতঃপর তাদেরকে এক কূপের মধ্যে একজনকে আরেকজনের ওপর রাখা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3669)


3669 - عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالقتلى أن يُطرحوا في القَليبِ، فطُرحوا فيهِ، إلَّا ما كان من أميَّة بن خلف، فإنَّهُ انتفخَ في دِرعِه فملأها، فذهبوا ليحركوه، فتزايلَ (لحمه) فأقرُّوه وألقَوا عليه ما غيَّبه من التُّراب والحجارة، فذكر الحديث بطوله وسيأتي في موضعه كاملًا.

حسن: رواه الإمام أحمد (26361) عن يعقوب، قال: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة فذكرته، وهو في"سيرة ابن هشام" (1/ 638 - 639) من هذا الوجه، وصحَّحه ابن حبان (7088) والحاكم (3/ 224) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلتُ: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه إن صرَّح فهو حسن الحديث لأنه مدلس، وقد صرَّح هنا بالتحديث فانتفت عنه تهمة التدليس.

والقَليب: البئر، وقوله:"تزايل" أَي تفرَّقَ لحمُهُ.
وكان بالمدينة مقابر خاصة للمشركين، ومقابر خاصة للمسلمين كما هو الظاهر من حديث بشير ابن الخصامية الذي سيأتي في باب كراهية المشي في النعال بين القبور، ويستفاد من حديثه أيضًا أن من السنة الدفنُ في المقبرة العامة للمسلمين، لأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُدفن الموتى في مقبرة البقيع، ولم يثبت أنه أجاز دفن أحد من المسلمين في بيوتهم، بل قوله صلى الله عليه وسلم:"لا تجعلوا بيوتكم مقابر" كما جاء في صحيح مسلم ظاهره يقتضي النهي عن الدفن في البيوت، وأما دفن النبي صلى الله عليه وسلم في حجرته فهو من خصوصياته عليه السلام كما دل عليه حديث أبي بكر الذي سبق، وأما دفن أبي بكر وعمر مع صاحبيه فهو لظروف خاصة، ولا يقاس عليهما غيرهما.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিহতদেরকে কূপে নিক্ষেপ করার নির্দেশ দিলেন। তখন তাদেরকে সেখানে নিক্ষেপ করা হলো, উমাইয়া ইবনে খালাফ ব্যতীত। কারণ সে তার বর্মের ভেতর ফুলে উঠেছিল এবং তা পূর্ণ করে ফেলেছিল। যখন তারা তাকে নাড়াতে গেল, তখন তার গোশত আলগা হয়ে বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ল। ফলে তারা তাকে (সেখানেই) রেখে দিল এবং তার উপর মাটি ও পাথর চাপা দিল যা তাকে ঢেকে দিল। (বর্ণনাকারী) এরপর দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন, যা যথাস্থানে সম্পূর্ণভাবে আসবে।









আল-জামি` আল-কামিল (3670)


3670 - عن علي بن أبي طالب قال: قلت للنبي صلى الله عليه وسلم: إن عمك الشيخ الضال قد مات، قال:"اذهب فوار أباك، ثم لا تحدثَنَّ شيئًا حتى تأتيني" فذهبت فواريتُه وجئتُه، فأمرني فاغتسلت، ودعا لي.

حسن: رواه أبو داود (3217)، والنسائي (2006)، وابن الجارود (550)، وأحمد (1093) كلّهم من حديث أبي إسحاق، عن ناجية بن كعب، عن علي بن أبي طالب فذكره.

وإسناده حسن من أجل ناجية بن كعب فهو مختلف فيه، فقد سئل يحيى بن معين عنه فقال:"صالح"، وقال أبو حاتم:"شيخ"، وقال العجلي:"كوفي ثقة"، وجعله الحافظ في درجة"ثقة" وأرى أنه لا يرتقي عن درجة"صدوق" وتكلم فيه ابن المديني فقال:"مجهول". وأورده الحافظ ابن حجر في"الفتح" (7/ 195) وسكت عنه (إلا أنه عزاه إلى ابن خزيمة أيضًا، وهذا سهو منه، فإنه لم يعزه إليه في"إتحاف المهرة" (14776) فتنبه).

ونقل البيهقي (1/ 304) عن ابن المديني قال: لم نجد هذا الحديث إلا عند أهل الكوفة، وقال البيهقي: وفي إسناده بعض الشيء. رواه أبو إسحاق عن ناجية، ولا نعلم أحدا روي عن ناجية غير أبي إسحاق، قال الإمام أحمد: وقد رُوي من وجه آخر ضعيف عن علي هكذا. انتهى.

قلت: لعل الإمام أحمد يشير إلى ما رواه في مسنده (807) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدثنا الحسن بن يزيد الأصم، قال: سمعت السُدي إسماعيل يذكره عن أبي عبد الرحمن السُلمي، عن علي قال فذكره، وزاد في آخر الحديث:"فدعا لي بدعوة ما يسرني أن لي بها حمرَ النعم وسودها قال: وكان علي إذا غسل الميت اغتسل" وهذا الإسناد فيه شيء من الضعف.

ورواه ابن الإمام أحمد في"زوائد المسند" (1074) من وجه آخر عن الحسن بن يزيد الأصم بإسناده مثله، والإسناد الثاني هذا يقوي الإسناد الأول الذي من طريق ناجية بن كعب، والله أعلم.

وقد قال الحافظ في"التلخيص" بعد أن عزاه للمخرجين من طريق أبي إسحاق:"ومدار كلام البيهقي على أنه ضعيف، ولا يتبين وجه ضعفه، وقال الرافعي: إنه حديث ثابت مشهور، قال ذلك في أماليه".
قلت: هذا الحديث وإن كان من جهة النّقل فيه مقال، ولكن الحديث يدل على قصة وقعت بدون شك، فإن لم يفعل علي بن أبي طالب بأبيه هذا فماذا كان يجب عليه عمله بعد موته؟ ! وأمّا كونه غسّل أبا طالب قبل دفنه فلم يثبت هذا لا في حديث صحيح ولا ضعيف، وإنّما فيه أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمره أن يغتسل بعد دفنه تنظيفًا؛ لأنّ الاغتسال إنّما شرع من غسل الميت، ولم يشرع من دفنه، ولذا لم يقلْ أحدٌ بالاغتسال من الدَّفن.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললাম: আপনার পথভ্রষ্ট বৃদ্ধ চাচা মারা গেছেন। তিনি বললেন, "যাও, তোমার পিতাকে দাফন করো। এরপর আমার কাছে আসার আগে আর কিছু করো না।" অতঃপর আমি গেলাম এবং তাঁকে দাফন করে তাঁর কাছে ফিরে আসলাম। তখন তিনি আমাকে গোসল করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর আমি গোসল করলাম এবং তিনি আমার জন্য দু'আ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3671)


3671 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كسر عظْم الميت ككسْره حيًّا".

صحيح: رواه أبو داود (3207)، وابن ماجه (1616) كلاهما من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، قال: حدثنا سعد بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.

وقد تابع الدراوردي كل من ابن نمير عند أحمد (24308)، ومحاضر بن المورّع عند ابن الجارود (551)، وابن جريج -مع التحديث- عند الدارقطني (3413) كلهم عن سعد بن سعيد بإسناده، مثله.

وسعد بن سعيد هو أخو يحيى بن سعيد، تُكلّم فيه من ناحية حفظه والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"له أحاديث صالحة، تقرب من الاستقامة لا أرى بحديثه بأسًا بمقدار ما يرويه".

وقد تابعه على رفعه كل من:

يحيى بن سعيد أخوه ومن طريقه رواه ابن حبان (3167)، والبيهقي (4/ 58). وأبو الرجال: وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي الرجال، ومن طريقه رواه أحمد (24739).

وحارثة بن أبي الرجال ممن ذكره الدارقطني في"العلل" (14/ 408)، والبخاري في"التاريخ الكبير" (1/ 150).

وللدارقطني في"سننه" (3415) إسناد آخر عن زهير بن محمد، عن إسماعيل بن أبي حكيم، عن القاسم، عن عائشة، فذكرته مرفوعًا. وبهذه المتابعات وغيرها صحّ هذا الحديث مرفوعًا.

وأما البخاري فرجّح الوقف كما في"التاريخ الكبير" فلعله بناء على أن الذين رفعوه هم عنده اثنان كما ذكر، وهما: سعد بن سعيد، وحارثة وقال:"وغير مرفوع أكثر". والله تعالى أعلم.

وأما ما رُوي عن أمّ سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كسر عظْم الميت ككسر عظْم الحي في الإثم" فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (1617) عن محمد بن مُعَمَّر، قال: حدثنا محمد بن بكر، قال: حدثنا عبد الله بن زياد، قال: أخبرني أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، عن أمه، عن أم سلمة فذكرته.

قال البوصيري في"الزوائد":"فيه عبد الله بن زياد مجهول، ولعله عبد الله بن زياد بن سمعان المدني أحد المتروكين فإنه في طبقته" ثم ذكر حديث عائشة شاهدًا له.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত ব্যক্তির হাড় ভাঙা জীবিত অবস্থায় তার হাড় ভাঙার মতোই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3672)


3672 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا عَقْر في الإسلام".

قال عبد الرزاق: كانوا يَعْقِرون عند القبر ببقرةٍ أو شاةٍ.

صحيح: رواه أبو داود (3222) عن يحيى بن موسى البلْخِي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره.

والحديث في مصنف عبد الرزاق (6690) مطولًا.

وأما قول عبد الرزاق الذي ذكره أبو داود فلم أجده في مصنفه.

وقوله:"ولا عقر" قال السندي: العَقْر: ضرب قوائم البعير، أو الشاة بالسيف وهو قائم، وكانوا يَعْقِرون الإبل على قبور الموتى - أي ينحرونها ويقولون: صاحب القبر كان يعقر للأضياف، فنكافثه بمثله".

وقال النووي في"المجموع" (5/ 320):"وأما الذبح والعَقْر عند القبر فمذموم لحديث أنس هذا". رواه أبو داود والترمذي وقال:"حسن صحيح".

قلت: العزو إلى الترمذي وهم منه رحمه الله تعالى.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে (কবরের পাশে) পশু যবেহ (আক্বর) করার বিধান নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3673)


3673 - عن عائشة قالت: لما اشتكى النبي صلى الله عليه وسلم ذكرتْ بعض نسائه كنيسةً رأينَها بأرض الحبشة يقال لها مارية، وكانت أم سلمة وأم حبيبة أتتا أرض الحبشة، فذكرتا من حسنها وتصاوير فيها، فرفع رأسه فقال:"أولئك إذا مات منهم الرجل الصالح بنوا على قبره مسجدًا، ثم صوَّروا فيه تلك الصورة، أولئك شِرار الخلق عند الله".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1341)، ومسلم في المساجد (528) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته واللفظ للبخاري.

وبقية أحاديث النهي عن بناء المساجد على القبور انظر في"المساجد".

وقد رُوي عن أبي سعيد"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُبْنى على القبر" إلا أنه منقطع، رواه ابن ماجه (1564) عن محمد بن يحيى قال: حدثنا محمد بن عبد الله الرقاشي، قال: حدثنا وُهيب، قال: حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن القاسم بن مُخيمِرة، عن أبي سعيد فذكره.
القاسم بن مُخيمرة لم يثبثْ سماعُه من أحد من الصحابة، قاله يحيى بن معين وغيره. وقد أشار إليه البوصيري في"الزوائد بقوله":"هذا إسناد رجاله ثقات إلا أنه منقطع، القاسم بن مخيمرة لم يسمع من أبي سعيد".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হলেন, তখন তাঁর কতিপয় স্ত্রী হাবশার ভূমিতে দেখা একটি গির্জার কথা উল্লেখ করলেন, যার নাম ছিল মারিয়া। উম্মু সালামা এবং উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাবশার ভূমিতে গিয়েছিলেন। তখন তাঁরা এর সৌন্দর্য এবং এর ভেতরের ছবিগুলোর কথা বর্ণনা করলেন। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুলে বললেন: "ওরা এমন জাতি, তাদের মধ্যে যখন কোনো সৎকর্মপরায়ণ লোক মারা যেত, তখন তারা তার কবরের উপর মসজিদ নির্মাণ করত, অতঃপর তাতে ঐ সমস্ত ছবি আঁকত (বা স্থাপন করত)। আল্লাহর কাছে এরাই হলো সৃষ্টির মধ্যে নিকৃষ্টতম।"









আল-জামি` আল-কামিল (3674)


3674 - عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُجصَّص القبرُ، وأن يُقْعد عليه، وأن يبُنى عليه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (970) من طرق عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث مثله.

ورواه أيوب، عن أبي الزبير، عن جابر قال:"نهى عن تقصيص القبور".

وزاد أبو داود (3226) من طريق سليمان بن موسى، عن جابر"وأن يكتب عليه"، ورواه أيضًا ابن ماجه (1563) من طريق حفص بن غياث، عن ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن جابر فذكر الحديث بقوله:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكتب على القبر شيء". وسليمان بن موسى لم يلق جابرًا.

ورواه الحاكم في"المستدرك" (1/ 370) من طريق حفص بن غياث النخعي، ثنا ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر فجمع فيه ألفاظ الحديث جميعًا وهي قوله:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُبنى على القبر، ويُجصص، أو يُقعد عليه، ونهى أن يكتب عليه"، وقال:"على شرط مسلم، وقد خرَّج بإسناده"غير الكتابة"، فإنها لفظة صحيحة غريبة، وكذلك رواه أبو معاوية، عن ابن جريج" انتهى.

ثم رواه من طريقه وقال:"هذه الأسانيد صحيحة، وليس العمل عليها، فإن أئمة المسلمين من الشرق إلى الغرب مكتوب على قبورهم، وهو عمل أخذ به الخلف عن السلف" انتهى.

وردَّه الذهبي قائلًا:"ما قُلْتَ طائلًا، ولا نعلم صحابيًا فعل ذلك، وإنما هو شيء أحدثه بعض التابعين فَمن بعدهم، ولم يبلغهم النهي".

والتجصيص والتقصيص هو: البناء بالجص، وهو القص والقصة، والجصاص والقصاص واحد، فإذا خلط الجص بالرماد فهو الجيار. انظر"المفهم" (2/ 626).

وفي الباب أيضًا عن أم سلمة قالت:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُبْنى على القبر، أو يُجصص".

رواه الإمام أحمد (26555، 26556) من وجهين أولهما: عن حسن، ثنا ابن لهيعة، ثنا يزيد ابن أبي حبيب، عن ناعم مولى أم سلمة فذكرته.

والثاني: عن علي بن إسحاق، حدثنا عبد الله، أخبرنا ابن لهيعة، حدثني يزيد بن حبيب، عن ناعم مولى أم سلمة"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُجَصَّص قبر، وأن يبُنى عليه، أو يُجلس عليه"، قال أبي: ليس فيه"أم سلمة". انتهى.
والوجه الثاني هو الصحيح لأن عبد الله وهو ابن المبارك أحد العبادة الذين سمعوا أبن لهيعة، قبل احتراق كتبه، إلا أنه مرسل كما نقل عبد الله بن أحمد، عن أبيه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কবরকে চুনকাম (প্লাস্টার) করতে, তার উপর বসতে এবং তার উপর কোনো কিছু নির্মাণ করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3675)


3675 - عن ثُمامة بن شفيٍّ قال: كنا مع فَضالة بن عُبيد بأرض الروم برودس، فتوفي صاحب لنا، فأمر فضالة بن عبيد بقبره فسُوِّيَ ثم قال:"سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر بتسويتها".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (968) من طرق، عن أبي علي الهمداني، حدَّثه، أن ثُمامة بن شُفَيِّ حدَّثه قال: فذكره.

ورودِس: جزيرة معروفة في البحر الأبيض المتوسط، جنوب غرب تركيا.




থুমামাহ ইবনে শুফাই থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে রোম দেশের রুদস নামক স্থানে ছিলাম। আমাদের এক সাথী মারা গেলেন। তখন ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কবরকে সমান করে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এগুলো (কবর) সমান করে দেওয়ার নির্দেশ দিতে শুনেছি।”









আল-জামি` আল-কামিল (3676)


3676 - عن أبي الهَيَّاج الأسَدي قال: قال لي عليُّ بن أبي طالب: ألا أبعثُك على ما بَعَثَي عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، أن لا تَدَعَ تمثالًا إلا طمستَه، ولا قبرًا مشرقًا إلا سوَّيته.

وفي رواية: ولا صورةً إلا طمستها.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (969) من طرق عن وكيع، عن سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أبي وائل، عن أبي الهيَّاج فذكره.

والرواية الثانية رواها من طريق يحيى (وهو القطان) عن سفيان بإسناده.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুল হাইয়্যাজ আল-আসাদী বলেন, তিনি আমাকে বললেন: আমি কি তোমাকে সেই কাজের জন্য প্রেরণ করব না, যার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে প্রেরণ করেছিলেন? (তা হলো,) তুমি কোনো প্রতিমা বা মূর্তি ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা নিশ্চিহ্ন করে দাও এবং কোনো উঁচু কবর ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা সমান করে দাও।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: এবং কোনো ছবি বা চিত্র ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা নিশ্চিহ্ন করে দাও।









আল-জামি` আল-কামিল (3677)


3677 - عن معاوية قال: إن تسوية القبور من السنة، وقد رفعت اليهود والنصارى فلا تُشبهوا بهما.

صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" (19/ 352) عن الحسين بن إسحاق التستري، ثنا وهب بن بقية، أنا خالد بن عبد الله، عن عمران بن حدير، عن أبي مجلز، أن معاوية قال: فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 352): رجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال.




মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই কবরকে সমতল করা সুন্নাতের অংশ। ইহুদি ও নাসারারা (খ্রিস্টানরা) সেগুলোকে উঁচু করেছে, সুতরাং তোমরা তাদের অনুকরণ করো না।









আল-জামি` আল-কামিল (3678)


3678 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأن يجلس أحدكم على جَمْرة فَتحْرِق ثيابُه، فتخلص إلى جلده، خير له من أن يجلس على قبر".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (971) من طرق عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وأما ما رُوي عنه بلفظ:"من جلس على قبر يتغوط، أو يبول فكأنما جلس على جمرة" فهو ضعيف فيه محمد بن أبي حُميد قال فيه البخاري:"منكر الحديث"، وضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي وغيرهم، ومن طريقه أخرجه أبو داود الطيالسي، والطحاوي وأحمد بن منيع وغيرهم،
انظر:"المطالب العالية" (838).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি জ্বলন্ত অঙ্গারের উপর বসে ফলে তার পোশাক পুড়ে যায়, এমনকি তা তার চামড়া পর্যন্ত পৌঁছে যায়, তবুও তা তার জন্য কবরের উপর বসা অপেক্ষা উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (3679)


3679 - عن أبي مرثَدٍ الغَنَوي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجلسوا على القبور، ولا تُصلوا إليها".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (972) من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن جابر (وهو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر) عن بُسر بن عبيدالله، عن واثلة بن الأسقع، عن أبي مرثد الغنوي فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن ابن المبارك، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر وأدخل بين بسر بن عبد الله وبين واثلة بن الأسقع"أبا إدريس الخولاني".

قال البخاري: هذا خطأ أخطأ فيه ابن المبارك، وزاد فيه"عن أبي إدريس الخولاني" وإنما هو بُسر بن عبيد الله، عن واثلة. هكذا روى غير واحد عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، وليس فيه"عن أبي إدريس"وبسر بن عبد الله، قد سمع من واثلة بن الأسقع، هذا ما نقله الترمذي (1051) عن البخاري.

قلت: عبد الله بن المبارك حافظ ثقة، فلعل عبد الرحمن بن يزيد بن جابر نفسه روى من وجهين، فإنه سمع أولًا عن بسر بن عبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن واثلة بن الأسقع، ثم سمع عن واثلة بن الأسقع بدون واسطة أبي إدريس الخولاني، فسمع منه عبد الله بن المبارك من أحد هذه الوجوه وهي بالواسطة فروى عنه، وسمع غيره من عبد الرحمن بن يزيد بن جابر عن بسر بن عبيد الله، عن واثلة بن الأسقع بدون واسطة"أبي إدريس الخولاني" ومن هؤلاء الوليد بن مسلم عند مسلم، وعيسى بن يونس عند أبي داود (3229) وفيه التصريح من بسر بن عبيدالله بأنه سمع من واثلة بن الأسقع.

وقوله:"لا تُصلوا إليها" أي لا تتخذوها قبلة، لأن ذلك يُؤدي إلى تعظيم من فيها، ومن ثم عبادته، وقد صرَّح كثير من أهل العلم أن الصلاة إلى القبر محرم لظاهر النهي.




আবু মারছাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা কবরের উপর বসো না এবং কবরের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3680)


3680 - عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجصص القبر، وأن يُقْعَدَ عليه، وأن يبنى عليه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (970) من طرق، عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث وسبق قبل أبواب.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কবর যেন চুনকাম করা না হয়, তার উপর যেন বসা না হয় এবং তার উপর যেন কোনো স্থাপনা নির্মাণ করা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3681)


3681 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأن أمشي على جمرةٍ أو سيفٍ، أو أخصف نعلي برجلي، أحب إلي من أن أمشي على قبر مسلم، وما أبالي أوسط القبور قضيت حاجتي، أو وسط السوق".

صحيح: رواه ابن ماجه (1567) عن محمد بن إسماعيل بن سمرة، قال: حدثنا المحاربي، عن الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير مرثد بن عبد الله اليزني، عن عقبة بن
عامر فذكره. وإسناده صحيح.

قال البوصيري في"زوائد ابن ماجه":"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات" ثم ذكر من شواهده حديث أبي هريرة وحديث أبي مرثد.

وأما ما رُوي عن عمرو بن حزم، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تقعدوا على القبور" ففيه رجل مجهول.

رواه النسائي (2045) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن شُعيب، قال: حدثنا الليث، قال: حدثنا خالد، عن ابن أبي هلال، عن أبي بكر بن حزم، عن النضر بن عبد الله السلمي، عن عمرو بن حزم فذكره.

والنضر بن عبد الله السَلمي قال فيه الحافظ:"مجهول" والحديث في أطراف مسند الإمام أحمد (5/ 131) من هذا الوجه (لأنه سقط من المسند المطبوع) وله طرق أخرى بلفظ: رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم متكئًا على قبر فقال:"لا تؤذِ صاحب هذا القبر" في بعض طرقه ابن لهيعة وفيه كلام معروف.

وفي أحاديث الباب دليل على تحريم الجلوس على قبر المسلم ووطئه، ولكن قال مالك رحمه الله تعالى في الموطأ (1/ 233):"إنه بلغه أن علي بن أبي طالب كان يتوشَّدُ القبور، ويضطجعُ عليها، قال مالك: وإنما نُهي عن القعود على القبور، فيما نُرى للمذاهب" أي يريد قضاء الإنسان حاجته، إلا أن هذا التأويل يرده حديث عقبة بن عامر فإنه سوَّى بين قضاء الحاجة بين القبور، أو وسط السوق - يعني أنه كما يجب الاستحياء من الأحياء، يجب الاستحياء من الأموات فلا يقضي حاجته بين القبور.




উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি যদি কোনো জ্বলন্ত কয়লা বা তরবারির উপর দিয়ে হেঁটে যাই, অথবা আমার জুতো আমার পা দিয়ে মেরামত করি, তা আমার কাছে একজন মুসলিমের কবরের উপর দিয়ে হেঁটে যাওয়ার চেয়ে অধিক প্রিয়। আর আমি কোনো পরোয়া করি না যে কবরস্থানের মাঝে আমার প্রয়োজন (প্রস্রাব-পায়খানা) পূর্ণ করি, নাকি বাজারের মাঝে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3682)


3682 - عن بشير بن الخصاصية -وكان اسمه في الجاهلية زحم بن معبد، فهاجر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما اسمك؟" قال: زحم، قال:"بل أنت بشير"- قال: بينما أنا أمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ بقبور المشركين فقال:"لقد سبق هؤلاء خيرًا كثيرًا" ثلاثًا، ثم مر بقبور المسلمين فقال:"لقد أدرك هؤلاء خيرًا كثيرًا" وحانت من رسول الله صلى الله عليه وسلم نظرة فإذا رجل يمشي في القبور عليه نعلان فقال:"يا صاحب السَّبْتّيِتينِ ويحك ألْقِ سَبْتّيتيك" فنظر الرجل، فلما عرف رسول الله صلى الله عليه وسلم خَلعهما فرمى بهما.

حسن: رواه أبو داود (3230)، والنسائي (2048)، وابن ماجه (1568) كلهم من طريق الأسود ابن شيان، عن خالد بن سمير، عن بشير بن نَهِيك، عن بشير بن الخصاصية فذكره ولفظهم قريب.

وإسناده حسن لأجل خالد بن سُمير فإنه حسن الحديث، وثَّقه النسائي والعجلي وغيرهما.

وأخرجه أيضًا ابن حبان (3170)، والحاكم (1/ 373)، والإمام أحمد (20787) كلهم من هذا الوجه، قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ونقل الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (4/ 34 - 35) عن الإمام أحمد قال: إسناده جيّد، أذهب إليه إلّا من علّة. ونقل ابنه عبد الله في مسائل أبيه: قال: ورأيته إذا أراد أن يخرج إلى الجنازة لبس خفيه، وكان يأمر بخلع النِّعال في المقابر، وقال: حديث بشير بن الخصاصية، حديث النبيّ صلى الله عليه وسلم.

قال: ورأيت أبي في جنازة ينظر إلى رجل من الجيران وعليه نعلاه يمشي في المقابر نظرًا كأنّه منكر عليه.

وقال: رأيت أبي إذا أراد أن يدخل المقابر خلع نعليه، وربما رأيته أن يذهب إلى الجنازة، ربما لبس خفيه أكثر ذلك وينزع نعليه. انظر مسائل الإمام أحمد (679 - 681).

وقوله: السبتية -نسبة إلى السِبت، وهو جلود البقر المدبوغة بالقرظ يتخذ منها النعال، لأنه سُبِتَ شعرها أي- حُلق وأزيل.




বশীর ইবনুল খাসাসিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (জাহেলী যুগে তাঁর নাম ছিল যুহাম ইবনু মা‘বাদ। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হিজরত করে আসলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “তোমার নাম কী?” সে বলল, যুহাম। তিনি বললেন, “না, বরং তুমি বশীর।”) তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হেঁটে যাচ্ছিলাম। তিনি মুশরিকদের কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, “এরা বহু কল্যাণ থেকে বঞ্চিত হয়েছে।” — কথাটি তিনি তিনবার বললেন। এরপর তিনি মুসলিমদের কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, “এরা তো বহু কল্যাণ লাভ করেছে।” এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দৃষ্টি পড়ল যে, এক ব্যক্তি কবরের মধ্য দিয়ে জুতা পরে হেঁটে যাচ্ছে। তিনি বললেন, “ওহে সাব্তিয়া জুতা পরিধানকারী! তোমার জন্য আফসোস! তোমার সাব্তিয়া জুতা জোড়া খুলে ফেলো।” লোকটি তাকাল। যখন সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চিনতে পারল, তখন সে জুতা জোড়া খুলে ছুঁড়ে ফেলল।









আল-জামি` আল-কামিল (3683)


3683 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن العبد إذا وضع في قبره، وتولى عنه أصحابه إنه يسمع قرعَ نعالهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1374)، ومسلم في كتاب الجنة (2870) كلاهما من حديث سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك في حديث طويل - انظر جموع إثبات عذاب القبر.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় বান্দাকে যখন তার কবরে রাখা হয় এবং তার সঙ্গীরা তার থেকে চলে যায়, তখনও সে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3684)


3684 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت يسمع حِس النعال إذا ولَّوا عنه الناس مدبرين، ثم يُجلس ويوضع كفنُه في عنقه، ثم يسأل".

حسن: رواه البغوي في"شرح السنة" (5/ 413) بإسناده عن ابن عدي، نا عبد الله بن سعيد، نا أسد بن موسى، نا عنبسة بن سعيد بن كثير، قال: حدثني جدي، عن أبي هريرة فذكره.

قال الشيخ:"كثير جد عنبسة: هو كثير بن عبيد رضيع عائشة مولى أبي بكر".

وإسناده حسن، كثير بن عبيد التيمي روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في"الثقات"، ولا يوجد فيه جرح، وليس في حديثه ما يُنكر عليه، فيُحسّن حديثُه إذا كان لحديثه أصلٌ ثابت، وهذا منه.

قال الشّيخ: قوله:"إن الميت بسمع حِسّ النعال" فيه دليل على جواز المشي في النعال بحضرة القبور، وبين ظهرانيها".

وقال أيضًا:"والعامة على أن لا كراهة فيه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তি তার থেকে লোকেরা পিঠ ফিরিয়ে চলে গেলে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়। এরপর তাকে বসানো হয় এবং তার কাফন তার গলায় রাখা হয়। অতঃপর তাকে প্রশ্ন করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3685)


3685 - عن هشام بن عامر قال: شُكي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الجراحات يوم أُحد فقال:
"احفروا وأوسعوا وأحسنوا وادفنوا الاثنين والثلاثة في قبر واحد، وقدِّموا أكثرهم قرآنا".

قال: فمات أبي فقُدم بين يدي رجلين.

وفي رواية: قتل أبي يوم أُحد فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"احفِروا وأوسِعوا وأحسنوا وادفنِوا الاثنين والثلاثة في القبر، وقدِّموا أكثرهم قرآنا"، فكان أبي ثالث ثلاثةِ، وكان أكثرهم قرآنّا فقُدِّم.

صحيح: رواه الترمذي (1713)، وابن ماجه (1560) كلاهما عن أزهر بن مروان، قال: حدثنا عبد الوارث بن سعيد، قال: حدثنا أيوب، عن حُميد بن هلال، عن أبي الدهماء، عن هشام ابن عامر فذكره، واللفظ للترمذي. ولفظ ابن ماجه مختصر.

ورواه النسائي (2017) من وجه آخر عن عبد الوارث، والحديث أخرجه أحمد (16262) من طريق أيوب بإسناده والرواية الثانية عند النسائي.

قال الترمذي:"حسن صحيح، وروى سفيان الثوري وغيره هذا الحديث، عن أيوب، عن حميد بن هلال، عن هشام بن عامر، وأبو الدهماء اسمه قِرفة بن بُهيس أو بيهس" انتهى.

قلت: والرواية الثانية عند أبي داود (3216)، والنسائي (2010) من طريق سفيان كما قال الترمذي، وعند الإمام أحمد (16251)، وأبي داود (3215) من طريق سليمان بن المغيرة، عن حُميد بن هلال به مثله.

اختلف في سماع حميد بن هلال من هشام بن عامر فقال أبو حاتم كما في"المراسيل" (171):"حُميد بن هلال لم يلق هشام بن عامر، يدخل بينه وبين هشام: أبو قتادة العدوي، ويقول بعضهم: عن أبي الدهماء، والحفاظ لا يدخلون بينهم أحدًا حميد عن هشام، قيل له: فأي ذلك أصح؟

قال: ما رواه حماد بن زيد، عن أيوب، عن حُميد، عن هشام، انتهى.

قلت: الظاهر أن حميدًا سمع من هشام بن عامر كما جاء التصريح به في رواية معمر، عن أيوب، عنه قال: أخبرنا هشام بن عامر فذكر الحديث، رواه الإمام أحمد (16261) عن عبد الرزاق، عن معمر بإسناده، وصرح به أيضا الحافظ ابن حجر في"إتحاف المهرة" (13/ 632) وبهذا صحَّ الإسنادان، وأقر الحافظ أيضا في"التلخيص" (2/ 127) تصحيح الترمذي له.




হিশাম ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের যুদ্ধের দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট (নিহত) আহতদের জখমের বিষয়ে অভিযোগ করা হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা (কবর) খনন করো, প্রশস্ত করো, উত্তম করো এবং দু'জন ও তিনজনকে এক কবরে দাফন করো। আর তাদের মধ্যে যে কুরআনের অধিক হাফিয/অধিক জানতো, তাকে আগে রাখো।" তিনি [হিশাম] বললেন: আমার পিতা ইন্তেকাল করলেন এবং তাকে দু'জন লোকের সামনে (বা আগে) রাখা হলো।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: উহুদের দিনে আমার পিতা শহীদ হলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা (কবর) খনন করো, প্রশস্ত করো, উত্তম করো এবং দু'জন ও তিনজনকে এক কবরে দাফন করো। আর তাদের মধ্যে যে কুরআনের অধিক হাফিয/অধিক জানতো, তাকে আগে রাখো।" অতঃপর আমার পিতা ছিলেন তিনজনের মধ্যে তৃতীয়, আর তিনি তাদের মধ্যে কুরআনের অধিক জানতেন। তাই তাকে আগে রাখা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3686)


3686 - عن رجل من الأنصار قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة، فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على القبر يُوصي الحافر:"أوسع من قبل رجليه، أوسع من قبل رأسه".

وفي رواية:"لرُبَّ عَذْقٍ له في الجنة".

حسن: رواه أبو داود (3332) عن محمد بن العلاء، أخبرنا ابن إدريس، أخبرنا عاصم بن كليب، عن أبيه، عن رجل من الأنصار في حديث طويل سيأتي في موضعه.
وإسناده حسن من أجل عاصم وأبيه كليب فهما"صدوقان".

وقد رواه الإمام أحمد (22509، 23465) مطولًا ومختصرًا من أوجه عن عاصم بن كليب بإسناده.

وصحَّح إسناده الحافظ في"التلخيص" (2/ 127).




জনৈক আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে এক জানাযায় বের হয়েছিলাম। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে কবরের পাশে দাঁড়িয়ে খননকারীকে উপদেশ দিতে দেখলাম: "তাঁর পায়ের দিকটা প্রশস্ত করো, তাঁর মাথার দিকটা প্রশস্ত করো।"

অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: "হতে পারে জান্নাতে তার জন্য খেজুরের কাঁদি আছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3687)


3687 - عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص أن سعد بن أبي وقاص قال في مرضه الذي هلك فيه: أَلْحِدُوا لي لَحْدًا، وانْصِبُوا عليَّ اللَّبِنَ نصْبًا، كما صُنِع برسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (966) عن يحيى بن يحيى، نا عبد الله بن جعفر المِسْوَرِي، عن إسماعيل بن محمد بن سعد، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص فذكره.




সা'দ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর যে রোগে মৃত্যুবরণ করেন, সেই রোগশয্যায় বলেছিলেন: "তোমরা আমার জন্য লাহদ (পাশ্বস্থ) কবর খনন করো এবং আমার উপর কাঁচা ইট খাড়াভাবে স্থাপন করো, যেমনটা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য করা হয়েছিল।"