হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3648)


3648 - عن البراء بن عازب قال: لما توفي إبراهيم عليه السلام قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن له مرضعًا في الجنة".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1382) عن أبي الوليد، حدثنا شعبة، عن عدي بن ثابت، أنه سمع البراء قال: فذكر الحديث.




বারা' ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন ইবরাহীম (আঃ) মারা গেলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় জান্নাতে তার জন্য একজন দুধমা রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3649)


3649 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل مولود يُولد على الفطرة، فأبواه يُهودانه أو ينصرانه كما تُنَاتَجُ الإبلُ من بهيمةٍ جمعاءَ، هل تُحِسُّ فيها من جَدعَاء؟" قالوا: يا رسول الله! أرأيت الذي يموت وهو صغير؟ قال:"الله أعلم بما كانوا عاملين".

وفي رواية:"من يُولد يُولد على هذه الفطرةِ، فأبواه يهودانه ويُنصرانه كما تنَتِجون الإبلَ، فهل تجدون فيها جَدعاء؟ حتى تكونوا أنتم تجدعونها".

وفي رواية أخري:"كل إنسان تلده أمه علي الفطرة، وأبوه بعد يُهَوِّدانه، ويُنَصِّرانه ويُمَجِّسانه، فإن كانا مُسلِمَين فمسلم، كل إنسان تلده أمه يَلكزه الشيطان في حِضنَه، إلا مريم وابنها".

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (52) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه الشيخان -البخاري في الجنائز (1359)، ومسلم في القدر (2658) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال: فذكر الحديث. وفيه ثم يقول أبو هريرة: {فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ} [الروم: 30]

والرواية الثانية والثالثة عند مسلم من أوجه أخرى عن أبي هريرة.

وقد ورد في بعض الروايات في الصحيح:"حتي يُعبر عنه لسانه".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক নবজাতকই ফিতরাতের (স্বাভাবিক প্রকৃতির) উপর জন্মগ্রহণ করে, অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায় বা খ্রিস্টান বানায়, যেভাবে একটি পূর্ণাঙ্গ পশুর বাচ্চা থেকে উট শাবক জন্ম নেয়। তোমরা কি তার মধ্যে কোনো কানকাটা দেখতে পাও? সাহাবীগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! যে শিশু ছোট অবস্থায় মারা যায় তার ব্যাপারে আপনার কী অভিমত? তিনি বললেন: তারা কী আমল করত, সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: যে জন্ম নেয়, সে এই ফিতরাতের উপরই জন্ম নেয়। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায় বা খ্রিস্টান বানায়, যেমন তোমরা উট জন্ম দাও; তোমরা কি সেগুলোর মধ্যে কানকাটা দেখতে পাও? যতক্ষণ না তোমরা নিজেরাই সেগুলোর কান কেটে ফেলো।

অন্য এক বর্ণনায়: প্রত্যেক মানুষকে তার মা ফিতরাতের উপর জন্ম দেয়। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায়, খ্রিস্টান বানায় অথবা মাজুসি (অগ্নিপূজক) বানায়। যদি তার বাবা-মা মুসলিম হয়, তবে সে মুসলিম হয়। প্রত্যেক মানুষকে তার মা জন্ম দিলে শয়তান তার (পাজরের) পার্শ্বদেশে খোঁচা মারে, তবে মারইয়াম ও তার পুত্র ব্যতীত।

সহীহ-এর কোনো কোনো বর্ণনায় এসেছে: 'যতক্ষণ না তার (শিশুর) ভাষা তা প্রকাশ করে।'









আল-জামি` আল-কামিল (3650)


3650 - عن عائشه قالت: توفي صبي، فقلت: طوبي له، عُصفور من عَصافير الجنة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَوَ لا تدري أن الله خلق الجنة، وخلق النار، فخلق لهذه أهلًا، له ولهذه أهلًا".
وفي رواية: دُعي رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى جنازة صبي من الأنصار، فقلت: يا رسول الله! طوبي لهذا، عصفور من عصافير الجنة، لم يعمل السوء ولم يُدركه، قال:"أَوَ غير ذلك يا عائشة إن الله خلق للجنة أهلًا، خلقهم لها وهم في أَصلاب آبائهم، وخلق للنار أهلًا، خلقهم لها وهم في أَصلاب آبائهم".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2662) عن زهير بن حرب، حدثنا جرير، عن العلاء بن المسيب، عن فُضيل بن عمرو، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أم المؤمنين فذكرت الحديث.

والرواية الثانية عند مسلم أيضًا من وجه آخر عن طلحة بن يحيى، عن عمته عائشة بنت طلحة، بإسنادها.

يقول أهل العلم: إنما أنكر النبي صلى الله عليه وسلم على عائشة الجزم بالجنة لطفل معين، ولا يصح الجزمُ في مخصوص، لأن إيمان الأبوين تحقيقًا غيبٌ، وهو المناطُ عند الله تعالى، قاله السندي في حاشية النسائي، وقال غيره: لعله قال ذلك قبل أن يعلم أن أطفال المسلمين في الجنة كما سبق في كتاب الإيمان.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক শিশু মারা গেল। আমি বললাম: তার জন্য জান্নাতের সুসংবাদ, (সে তো) জান্নাতের চড়ুইপাখিদের মধ্যে একটি চড়ুইপাখি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তুমি কি জান না যে আল্লাহ্ জান্নাত সৃষ্টি করেছেন এবং জাহান্নাম সৃষ্টি করেছেন? অতঃপর তিনি এর (জান্নাতের) জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন এবং এর (জাহান্নামের) জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জনৈক আনসারী শিশুর জানাযায় ডাকা হলো। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এর জন্য সুসংবাদ, জান্নাতের চড়ুইপাখিদের মধ্যে একটি চড়ুইপাখি; সে কোনো মন্দ কাজ করেনি এবং মন্দ কাজ করার বয়সও পায়নি। তিনি বললেন: "হে আয়েশা! এর বাইরেও কি কিছু হতে পারে না? নিশ্চয় আল্লাহ্ জান্নাতের জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, যখন তারা তাদের পিতৃপুরুষদের মেরুদণ্ডে ছিল, তখন থেকেই তাদের এর জন্য সৃষ্টি করেছেন। আর জাহান্নামের জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, যখন তারা তাদের পিতৃপুরুষদের মেরুদণ্ডে ছিল, তখন থেকেই তাদের এর জন্য সৃষ্টি করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3651)


3651 - عن المغيرة بن شعبة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الراكب يسير خلف الجنازة، والماشي يمشي خلفَها وأمامَها، وعن يمينها وعن يسارها قريبًا منها، والسِقطُ يُصَلَّي عليه، ويُدعى لوالديه بالمغفرة والرحمة".

صحيح: رواه أبو داود (3180)، والترمذي (1031)، وابن ماجه (1481، 1507)، والنسائي (1943) كلهم من طرق، عن زياد بن جبير بن حية، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة فذكره.

واللفظ لأبي داود، ولفظ غيره:"الطفلُ يصلى عليه". قال الترمذي:"حسن صحيح".

وصحَّحه ابن حبان (3049)، والحاكم (1/ 355، 363)، وقال:"صحيح على شرط البخاري".

والسِقْط: هو الذي يسقط من بطن أمه قبل تمامه، فإذا أكمل أربعة أشهر يُصَلَّي عليه لأنه تم فيه نفخ الروح، وما كان قبل ذلك لا يُصلَّي عليه، لأنه ليس بميت، وإنما هو علقة، أو مضغة.

قال الترمذي:"والعمل عليه عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم قالوا: يُصلي على الطفل وإن لم يستهل بعد أن يُعلم أنه خلق، وهو قول أحمد وإسحاق".

ويدل على هذا حديث ابن مسعود مرفوعًا:"إن خلق أحدكم يجمع في بطن أمه، أربعين يومًا، ثم يكون علقة مثل ذلك، ثم يكون مضغة مثل ذلك، ثم يبعث ملكًا … ينفخ فيه الروح" متفق عليه، مضي بكامله في كتاب الإيمان.

قلت: وللشافعي قولان، القول الثاني: لا يُصلَّي على الطفل حتى يستهل، ولعله احتج بحديث جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطفل لا يُصلَّي عليه، ولا يرث، ولا يورث حتي يستهل".

رواه الترمذي (1032)، وابن ماجه (1508) كلاهما من طريق أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث قد اضطرب الناس فيه، فرواه بعضهم عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعًا، وروى أشعث بن سوار وغير واحد، عن أبي الزبير، عن جابر موقوفًا، وروى محمد بن إسحاق، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر موقوفًا، وكأن هذا أصح من الحديث المرفوع". انتهى.

وقال ابن القطان:"هو من رواية أبي الزبير، عن جابر معنعنًا من غير رواية الليث عنه، وهو علة، ومع ذلك فهو من رواية إسماعيل بن مسلم المكي، عن أبي الزبير، وهو ضعيف جدًّا".

قلت: ورواه أيضًا ابن حبان (6032) والحاكم (4/ 348، 349) كلاهما من حديث إسحاق الأزرق، ثنا سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استهل الصبي صلي عليه وورث".

انظر للمزيد:"نصب الراية" (2/ 277).

والخلاصة في حديث جابر أنه كثير الاضطراب كما قال الترمذي.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আরোহী জানাযার পেছনে পেছনে চলবে, আর পদাতিক ব্যক্তি তার (জানাযার) পেছনে, সামনে, এবং তার ডানপাশে ও বামপাশে তার নিকটবর্তী হয়ে হাঁটবে। আর 'সিক্বত' (অপূর্ণাঙ্গ মৃত শিশু) এর জন্য জানাযার সালাত আদায় করা হবে এবং তার পিতা-মাতার জন্য মাগফিরাত ও দয়ার (রহমতের) দু’আ করা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3652)


3652 - عن إسماعيل السدي قال: سألت أنس بن مالك قلت: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم على ابنه إبراهيم؟ قال: لا أدري، رحمةُ الله على إبراهيم، لو عاش كان صديقًا بينًّا، قال: قلت: كيف أنصرف إذا صليتُ، عن يميني أو عن يساري؟ قال: أما أنا فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينصرف عن يمينه.

حسن: رواه الإمام أحمد (13985) عن عفان، حدثنا أبو عوانة، عن إسماعيل السدي به مثله.

وإسماعيل السدي هو: ابن عبد الرحمن بن أبي كريمة السُدِّي، أبو محمد الكوفي من رجال مسلم، وقد روى مسلم في الصلاة (708) الحديث المذكور عن قتيبة بن سعيد، حدثنا أبو عوانة، عن السُدي قال: سألت أنسًا كيف أنصرفُ إذا صليتُ؟ عن يميني أو عن يساري؟ قال: أما أنا فأكثر ما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينصرف عن يمينه. انتهي.

ولم يذكر فيه سؤاله عن الصلاة على إبراهيم عليه السلام.

وقول أنس:"لا أدري" يحتمل أنه نفي علمه به لأنه قد يكون بعيدا عن المسجد لقضاء حاجة من حاجات رسول الله صلى الله عليه وسلم لأنه خادمه. وقد رُوي في الصلاة عليه أحاديث مسندة ومرسلة.

فأما المسندة: فمنها: ما روي عن البراء بن عازب قال:"صلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم على ابنه إبراهيم، ومات وهو ابن ستة عشر شهرًا وقال: إن له في الجنة من تُتِم رَضاعَه، وهو صديق".

رواه الإمام أحمد (18497) عن أسود بن عامر، حدثنا إسرائيل، عن جابر، عن عامر، عن البراء فذكره. وإسناده ضعيف، لأجل جابر وهو: ابن يزيد الجعفي.
وعامر هو: الشعبي، وقد رُوي عنه مرسلًا بدون ذكر البراء.

ومنها: ما رُوي عن عبد الله بن عباس قال: لما مات إبراهيم بن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"إن له مرضعًا في الجنة، ولو عاش لكان صديقًا نبيًّا، ولو عاش لعتقت أخوالُه القبطُ، وما استرقَّ قِبطي".

رواه ابن ماجه (1511) عن عبد القدوس بن محمد، قال: حدثنا داود بن شَبيب الباهلي، قال: حدثنا إبراهيم بن عثمان، قال: حدثنا الحكم بن عيينة، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا، فيه إبراهيم بن عثمان وهو: أبو شيبة الكوفي قاضي واسط متروك الحديث. ومنها ما رُوي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على ابنه إبراهيم، فكبر عليه أربعا.

رواه أبو يعلي (3660) وفيه محمد بن عبيد الله الفزاري العرزمي ضعيف باتفاق أهل العلم، وشيخه عطاء بن عجلان متروك أيضا.

ومنها ما رُوي عن أبي سعيد الخدري عند البزار"كشف الأستار" (806) وهي كلها معلولة.

وأما المرسلة فمنها ما رواه أبو داود (3188) بإسناده عن البهي، قال: لما مات إبراهيم بن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم في المقاعد.

قال المنذري:"والبهي هو: عبد الله بن يسار مولي مصعب بن الزبير، تابعي يُعد في الكوفيين.

والمقاعد -أي كان منتهيًا إلى موضع يسمى مقاعد بقرب المسجد الشريف، اتخذ للقعود فيه للحوائج والوضوء". انتهى كلام المنذري.

ومنها ما رُوي عن عطاء قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على ابنه إبراهيم وهو ابن سبعين ليلة، وهذا مرسل أيضًا، رواه أبو داود.

وقد أورد الحافظ الزيلعي في"نصب الراية": (2/ 280) هذه الآثار، وهي وإن كان لا يصح منها شيء ولكن يشد بعضها بعضا، وقد ذكر الخطابي مرسل عطاء في صلاته صلى الله عليه وسلم عليه ثم قال:"هذا أولى الأمرين، وإن كان حديث عائشة أحسن اتصالا".

وممن ذهب إلى تقوية هذه الآثار البيهقي (4/ 9) وابن القيم في"زاد المعاد"، وفي"تحفة المودود" بناء على أصل استحباب الصلاة على الأطفال، وبالله التوفيق.

وأما حديث عائشة الذي أشار إليه الخطابي فهو ما روي عنها، قالت: مات إبراهيم بن النبي صلى الله عليه وسلم، وهو ابن ثمانية عشر شهرًا، فلم يُصل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم.

رواه أبو داود (3187) عن محمد بن يحيى بن فارس، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.

ورواه الإمام أحمد (26305) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد به مثله.

قلت: ظاهر إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق إلا أن فيه علة خفية، وهي تفرده،
والجمهور على عدم قبول تفرده في الأحكام. ولذا قال الإمام أحمد: هذا حديث منكر جدا، ووَهَّي ابن إسحاق. كذا ذكره ابن القيم في زاده (1/ 514).

وقال ابن عبد البر في"الاستيعاب":"هذا غير صحيح والله أعلم؛ لأن الجمهور قد أجمعوا على الصلاة على الأطفال إذا أستهلوا وراثة وعملا مستفيضا عن السلف والخلف، ولا أعلم أحدا جاء عنه غير هذا إلا عن سمرة بن جندب".

وممن ذهبوا إلى ترك الصلاة عليه علَّلوه بعلل:

منها: شُغل النبي صلى الله عليه وسلم بصلاة الكسوف.

ومنها: أنه استغني بفضيلة نبوة النبي صلى الله عليه وسلم عن الصلاة عليه، كما استغنى الشهداء بفضيلة الشهادة.

ومنها: أنه لا يصلي نبي على نبي، وقد جاء في الأخبار: أنه لو عاش لكان نبيًا إلا أنه لا يصح كما سيأتي.

ومنها: أنه لم يصل عليه بنفسه، وصلى عليه غيره.

ذكر هذه العلل الحافظ الزيلعي، ووصفها بأنها: علل ضعيفة. يعني أنها لا تضاهي أدلة القائلين بجواز الصلاة على إبراهيم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইসমাঈল আস-সুদ্দী বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর পুত্র ইবরাহীমের উপর সালাত (জানাজার সালাত) আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: আমি জানি না। ইবরাহীমের উপর আল্লাহর রহমত হোক! যদি সে জীবিত থাকত, তবে সে স্পষ্টতই সিদ্দীক (সত্যবাদী) হতো। বর্ণনাকারী বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম: আমি সালাত শেষ করে কিভাবে ফিরবো—ডান দিকে, নাকি বাম দিকে? তিনি বললেন: আমি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডান দিকে ফিরতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3653)


3653 - عن ابن عباس قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أولاد المشركين فقال:"الله إذ خلقهم أعلمُ بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1383)، ومسلم في القدر (2660) كلاهما من طريق أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মুশরিকদের সন্তান-সন্ততি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "আল্লাহ যখন তাদেরকে সৃষ্টি করেছেন, তখন তারা কী করবে সে সম্পর্কে তিনিই সর্বাধিক অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3654)


3654 - عن أبي هريرة يقول: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن ذَراري المشركين فقال:"الله أعلم بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1384)، ومسلم في القدر (2659) كلاهما عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن ابن شهاب الزهري قال: أخبرني عطاء بن يزيد الليثي، أنه سمع أبا هريرة فذكر الحديث. ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুশরিকদের (অপ্রাপ্তবয়স্ক) সন্তান-সন্ততি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “তারা কী কাজ করবে, সে সম্পর্কে আল্লাহই ভালো জানেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (3655)


3655 - عن أبي بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الغلام الذي قتله الخَضِرُ طُبع كافرًا، ولو عاش لأَرهقَ أبويه طغيانًا وكفرًا".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2661) عن عبد الله بن مسلمة، حدثنا معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن رَقبة بن مسقلة، عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن أبي بن كعب فذكره.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খিদর (আঃ) যে ছেলেটিকে হত্যা করেছিলেন, সে প্রকৃতিগতভাবে কাফির রূপে সৃষ্টি হয়েছিল, আর যদি সে বেঁচে থাকত, তবে সে তার বাবা-মাকে সীমালঙ্ঘন ও কুফরীর মাধ্যমে অতিষ্ঠ করে দিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3656)


3656 - عن أنس قال: كان غلام يهودي يخدم النبي صلى الله عليه وسلم فمرض، فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يعودُه، فقعد عند رأسه فقال له:"أسلم" فنظر إلى أبيه وهو عنده فقال له: أطع أبا القاسم صلى الله عليه وسلم، فأسلم، فخرج النبي صلى الله عليه وسلم وهو يقول:"الحمد لله الذي أنقذه من النار".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1356) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد (وهو ابن زيد) عن ثابت، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ইয়াহুদী বালক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করত। সে অসুস্থ হলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে গেলেন। তিনি তার মাথার কাছে বসলেন এবং তাকে বললেন: "ইসলাম গ্রহণ করো।" তখন সে তার পিতার দিকে তাকালো, যিনি তার কাছেই ছিলেন। (পিতা) তাকে বললেন: "আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনুগত্য করো।" (এই কথা শুনে) সে ইসলাম গ্রহণ করল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে এই কথা বলতে বলতে বের হলেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3657)


3657 - عن * *




৩৬৫৭ - এর সূত্রে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3658)


3658 - عن أبي هريرة قال: أُرسل ملك الموت إلى موسى عليه السلام، فلما جاءه صكَّه، فرجع إلي ربه فقال: أرسلتني إلي عبد ل يريد الموت ،فرد الله عليه عينه، وقال: ارجع فقُل له يضع يَده على متن ثور، فله بكل ما غطَّت به يدُه بكل شعرة سنة، قال: أي رب! ثم ماذا؟ قال: ثم الموت، قال: فالآن. فسأل الله أن يُدنِيه من الأرض المقدسة رميةً بحجرٍ. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلو كنتُ ثم، لأريتُكم قبره إلى جانب الطريق عند الكثيب الأحمر".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1339)، ومسلم في الفضائل (2373) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره. ولم يذكرا فيه الرفَع إلى النبي صلى الله عليه وسلم ولكن ساقه البخاري في أحاديث الأنبياء من هذا الوجه ثم قال: وعن معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وكذلك ساقه مسلم.

اختلف أهل العلم من نقل الميت من بلد إلى بلد، فاستحب الشافعي إن كان نقله إلى الأرض الفاضلة كمكة وغيرها، وكره إن لم يكن الغرض منه الدفن في البقاع الفاضلة.

رُوي أن سعد بن أبي وقاص، وسعيد بن زيد بن عمرو بن نُفيل ماتا بالعقيق فحُملا إلى المدينة، ودُفنا بها، وحُمل أسامة بن زيد من الجرف، وحمل عبد الرحمن بن أبي بكر من الحُبشي -أحد جبال مكة على مسافة ستة أميال- إلى مكة ودفن بها، وحمُل قتلى أُحد ليدفنوا بالبقيع فنادى مناد"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمركم أن تدفنوا القتلى في مضاجعهم" قال جابر: فرددناهم.

ولكن إن ترتب على ذلك تأخير دفنهم، وتعرضهم لهتك حرمتهم فيحرم ذلك، أو يكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মালাকুল মাওত (মৃত্যুর ফেরেশতা)-কে মূসা (আঃ)-এর নিকট পাঠানো হলো। যখন তিনি তাঁর নিকট আসলেন, মূসা (আঃ) তাঁকে আঘাত করলেন (বা চড় মারলেন)। অতঃপর তিনি তাঁর প্রতিপালকের নিকট ফিরে গেলেন এবং বললেন: আপনি আমাকে এমন এক বান্দার নিকট পাঠিয়েছেন, যে মরতে চায় না। আল্লাহ তাঁর চোখ ফিরিয়ে দিলেন (বা ঠিক করে দিলেন), এবং বললেন: ফিরে যাও এবং তাকে বলো, সে যেন তার হাত একটি ষাঁড়ের পিঠের উপর রাখে। তার হাত ষাঁড়ের পিঠের যতগুলো লোমকে আবৃত করবে, তার প্রতিটি লোমের বিনিময়ে সে এক বছর করে জীবন পাবে। মূসা (আঃ) বললেন: হে আমার রব! তারপর কী? আল্লাহ বললেন: তারপর মৃত্যু। মূসা (আঃ) বললেন: তাহলে এখনই (মৃত্যু দিন)। এরপর তিনি আল্লাহর কাছে চাইলেন যেন তাঁকে পবিত্র ভূমি (বায়তুল মাকদিস)-এর কাছাকাছি, এক ঢিল ছোঁড়ার দূরত্বে, স্থানান্তরিত করা হয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “আমি যদি সেখানে উপস্থিত থাকতাম, তাহলে অবশ্যই পথের পাশে লাল বালিয়াড়ির নিকটে তাঁর কবর তোমাদেরকে দেখিয়ে দিতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (3659)


3659 - عن عقبة بن عامر الجهني قال:"ثلاث ساعات كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهانا أن نصلي فيهن، أو نَقبر فيهن موتانا: حين تطلع الشمس بازغة حتى ترتفع، وحين يقوم قائم الظهيرة حتى تميل الشمس، وحين تَضيَّفُ الشمسُ للغروب حتى تغربَ".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (831) عن يحيى بن يحيى، حدثنا عبد الله بن وهب، عن موسى بن علي، عن أبيه، قال: سمعتُ عقبة بن عامر الجهني يقول: فذكر الحديث.
وزاد البيهقي في"السنن الكبرى" (4/ 32): قيل لعقبة: أيُدفن بالليل؟ قال: نعم، قد دُفن أبوبكر بالليل. قال الترمذي: (1030):"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم يكرهون الصلاة على الجنازة في هذه الساعات، وقال ابن المبارك: معنى هذا الحديث: أن نَقبُر فيهن موتانا -يعني الصلاة على الجنازة، وكره الصلاة على الجنازة عند طلوع الشمس وعند غروبها، وإذا انتصف النهار حتى تزول الشمس، وهو قول أحمد وإسحاق، وقال الشافعي: لا بأس في الصلاة على الجنازة في الساعات التي تكره فيهن الصلاة" انتهى.

وممن ذهب إلى كراهية الصلاة في الأوقات المكروهة ابن عمر وعطاء والنخعي والأوزاعي وسفيان الثوري وأصحاب الرأي وغيرهم.

قال الخطابي:"قول الجماعة أولى لموافقته الحديث".

وأما الصلاة على الجنازة بعد صلاة الصبح وبعد صلاة العصر فلا حرج في ذلك كما روي مالك في الجنائز (21) عن نافع، أن عبد الله بن عمر قال:"يُصلَّي على الجنازة بعد العصر وبعد الصبح إذا صُلّيتا لوقتهما".

وروي أيضًا عن محمد بن أبي حَرملةَ مولي عبد الرحمن بن أبي سفيان بن حُويطب، أن زينب بنت أبي سلمة تُوفِّيت، وطارق أمير المدينة، فأُتي بجنازتها بعد صلاة الصبح، فوُضِعت بالبقيع. قال: وكان طارق يُغلِّس بالصبح.

قال ابن أبي حَرملةَ: فسمعتُ عبد الله بن عمر يقول لأهلها: إما أن تُصلُّوا على جنازتكم الآن، وإما أن تتركوها حتى ترتفعَ الشمسُ، وبوَّب عليه مالك بقول: الصلاة على الجنازة بعد الصبح إلى الإسفار، وبعد العصر إلى الإصفرار.




উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তিনটি সময় আছে, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে সেগুলোর মধ্যে সালাত আদায় করতে অথবা আমাদের মৃতদের দাফন করতে নিষেধ করতেন: যখন সূর্য উদিত হতে শুরু করে, যতক্ষণ না তা ভালোভাবে উপরে উঠে যায়; এবং যখন মধ্যাহ্নে ঠিক দুপুরের সময় হয়, যতক্ষণ না সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে যায়; এবং যখন সূর্য অস্ত যাওয়ার জন্য ঝুঁকে পড়ে, যতক্ষণ না তা সম্পূর্ণভাবে অস্ত যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (3660)


3660 - عن ابن عباس قال: صلى النبي صلى الله عليه وسلم على رجل بعد ما دُفِن بليلة، قام هو وأصحابُه، وكان سأل عنه فقال:"من هذا؟" فقالوا: فلان، دُفن البارحة، فصلوا عليه.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1340) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن الشيباني، عن الشعبي، عن ابن عباس فذكره.

وفيه دليل لمن يقول بجواز الدفن بالليل، لأن النبي صلى الله عليه وسلم لم ينكر دفنهم إياه بالليل، بل أنكر عليهم عدم إعلامهم بأمره، وقد صح أن دُفن أبو بكر ليلًا، ودَفَن علي بن أبي طالب فاطمةَ ليلًا، ولم يُنقل إنكار أحد من الصحابة على الدفن بالليل بل ثبت أن النبي صلى الله عليه وسلم أيضا دفن في الليل، وسيأتي تفصيل ذلك في السيرة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির জানাযার সালাত আদায় করলেন তাকে দাফন করার এক রাত পরে। তিনি এবং তাঁর সাহাবীগণ দাঁড়িয়ে গেলেন। তিনি ঐ ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন: "ইনি কে?" তারা বলল: ইনি অমুক, যাকে গত রাতে দাফন করা হয়েছে। অতঃপর তিনি তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3661)


3661 - عن جابر بن عبد الله قال: رأى ناس نارًا في المقبرة، فأتوها، فإذا رسول الله -صلى الله عليه وسلم
في القبر، وإذا يقول:"ناولوني صاحبكم" فإذا هو الرجل الذي كان يرفع صوته بالذكر.

حسن: رواه أبو داود (3164) عن محمد بن حاتم بن بزيغ، حدثنا أبو نعيم، عن محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، أخبرني جابر بن عبد الله، أو سمعت جابر بن عبد الله قال: فذكره.

وأخرجه الحاكم (1/ 368) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال: فإن في الإسناد محمد بن مسلم: وهو ابن سوسن الطائفيّ، وقيل سويس، روى عنه مسلم متابعة، والبخاري تعليقًا، إلا أنه مختلف فيه، فضعَّفه الإمام أحمد، ومشاه الآخرون، فوثَّقه ابن معين وأبو داود والعجلي وغيرهم، وذكره ابن حبان في"الثقات" إلا أنه قال:"يخطئ".

والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق يخطئ" ولم يظهر لنا خطؤه في هذا الحديث، بل له شواهد تقويه، منها ما مضى، ومنها ما رواه ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل قبًرا ليلًا فأُسرِج له سراج، فأخذه من القبلة وقال:"رحمك الله إن كنت لأوَّاها تلاءً للقرآن" وكبَّر عليه أربعًا.

رواه الترمذي (1057)، وابن ماجه (1520) كلاهما من طريق يحيى بن اليمان، عن المنهال ابن خليفة، عن الحجاج بن أرطاة، عن عطاء، عن ابن عباس فذكر الحديث واللفظ للترمذي، وأما ابن ماجه فاختصره.

وهذا إسناد ضعيف من أجل المنهال بن خليفة فإنه"ضعيف" كما في"التقريب"، والحجاج بن أرطاة"مدلس" وقد عنعن، وضعَّفه أيضًا البيهقي (4/ 55)، وأما الترمذي فقال:"حديث حسن" وقال:"رخص أكثر أهل العلم في الدفن بالليل".

قلت: وعليه يدل عمل الصحابة، فأبو بكر دفن ليلًا، وعلي بن أبي طالب دفن فاطمةَ ليلًا، وممن دفن ليلًا: عثمان وعائشة وابن مسعود، ورخص فيه عقبة بن عامر وابن المسيب وعطاء والثوري والشافعي وإسحاق، وكرهه الحسن وأحمد في إحدى الروايتين، والآثار في جواز الدفن بالليل أكثر.

قال الحافظ ابن القيم رحمه الله في"تهذيب السنن" (4/ 308 - 309) بعد أن نقل هذه الآثار وغيرها:"والآثار في جواز الدفن بالليل أكثر" وقال:"قيل: وحديث النهي محمول على الكراهة والتأديب، والذي ينبغي أن يقال في ذلك -والله أعلم- إنه متى كان الدفن ليلًا لا يفوت به شيء من حقوق الميت والصلاة عليه، فلا بأس به، وعليه تدل أحاديث الجواز، وإن كان يفوت بذلك حقوقه، والصلاة عليه، وتمام القيام عليه نهي عن ذلك، وعليه يدل الزجر، وبالله التوفيق".




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিছু লোক কবরস্থানে আগুন দেখতে পেল। তারা সেদিকে এগিয়ে গেল। হঠাৎ তারা দেখল যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মধ্যে (অবস্থান করছেন)। তিনি তখন বলছিলেন: ‘তোমাদের এই সাথীটিকে আমার হাতে দাও।’ দেখা গেল, তিনি হলেন সেই ব্যক্তি যিনি উচ্চস্বরে যিকির করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3662)


3662 - عن أبي الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يحدث أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فذكر رجلًا من أصحابه قُبض، فكفِّن في كفن غير طائل، وقُبر ليلًا، فزجر النبي صلى الله عليه وسلم أن
يُقبر الرجلُ بالليل حتى يصلي عليه، إلا أن يضطر إنسان إلى ذلك، وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا كفَّن أحدكم أخاه فليُحسِن كفَنَه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (943) من طرق عن حجاج بن محمد قال: قال ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، فذكره.

وقيل في هذا الحديث إن النهي كان لترك النبي صلى الله عليه وسلم الصلاة عليه، ولم ينه عن مجرد الدفن بالليل، أو لقلة المصلين، أو لإساءة الكفن، أو عن المجموع، فكل ذلك ممكن.

وأما ما رُوي عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تدفنوا موتاكم بالليل" فهو ضعيف، رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (2/ 427) وقال: فيه محمد بن عمران بن أبي ليلى قال البخاري: منكر الحديث. انتهي.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিচ্ছিলেন। তিনি তাঁর সাহাবীদের মধ্যে এমন একজন ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন যিনি ইন্তেকাল করেছেন, তাঁকে নিম্নমানের কাফনে কাফন দেওয়া হয়েছিল এবং তাঁকে রাতেই দাফন করা হয়েছিল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে কোনো ব্যক্তিকে দাফন করতে নিষেধ করলেন, যতক্ষণ না তাঁর জানাযার সালাত আদায় করা হয়। তবে কেউ যদি এর জন্য বাধ্য হয় (তবে ভিন্ন কথা)। এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমাদের কেউ তার ভাইকে কাফন দেবে, তখন সে যেন উত্তম রূপে কাফন দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3663)


3663 - عن أبي إسحاق قال: أوصى الحارث أن يُصَلِّي عليه عبد الله بن زيد، فصلى عليه، ثم أدخله القبر من قبل رجلي القبر. وقال:"هذا من السنة".

صحيح: رواه أبو داود (3211) عن عبيدالله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق فذكره.

ورواه البيهقي (4/ 54) من طريق أبي داود وقال:"هذا إسناد صحيح، وقد قال: هذا من السنة فصار كالمسند، وروينا هذا القول عن ابن عمر وأنس بن مالك". انتهى كلامه.

قلت: وأما أثر أنس بن مالك فهو ما رواه محمد بن سيرين قال: كنت مع أنس في جنازة، فأمر بالميت، فُسُلّ من قبل رجل القبر، رواه الإمام أحمد (4081) عن عبد الأعلى، حدثنا خالد، عن محمد بن سيرين فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 43):"رواه أحمد ورجاله ثقات".

قلت: وهو كما قال، خالد هو: ابن مهران الحذاء.

وهذا هو الصحيح بأن الميت بوضع رأسه عند رجل القبر، ثم يُسَلّ سلا، وهو المعروف عن جمهور الصحابة، وهو عمل المهاجرين والأنصار بمكة والمدينة، كذلك رواه الشافعي في الأم، وغيرُه من العلماء عن أهل مكة والمدينة من الصحابة، ومن بعدهم، وهم بأمور رسول الله صلى الله عليه وسلم أعلم من غيرهم، قاله النووي في"المجموع" (5/ 294).

واستشهد البيهقي بحديث عمران بن موسى بأن النبي صلى الله عليه وسلم سُلّ من قبل رأسه، وكذلك من حديث ابن عباس مثله.

قال البيهقي: قال الشافعي: أنبأنا بعض أصحابنا عن أبي الزناد وربيعة وأبي النضر: لا
اختلاف بينهم في ذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سُل من قبل رأسه، وأبو بكر وعمر".

قال البيهقي:"هذا هو المشهور فيما بين أهل الحجاز".

ولكن تعقبه ابن التركماني فقال: حديث عمران بن موسى فيه أمران، أحدهما: أنه معضل من جهة عمران هذا. الثاني: أن الشافعي رواه عن مسلم الزنجي وغيره، ومسلم ضعَّفه النسائي، وقال أبو زرعة والبخاري:"منكر الحديث"، وقال ابن المديني:"ليس بشيء"، والغير الذي قرنه الشافعي بالزنجي"مجهول"، وحديث ابن عباس قال فيه الشافعي:"أنبأنا الثقة" -قال ابن التركماني: مشهور عند أهل هذا الشأن أن قولهم:"أخبرنا الثقة" ليس بتوثيق، وفيه عمر بن عطاء ضعَّفه يحيي والنسائي، قال مرة:"ليس بشيء". انتهى.

وقال أبو حنيفة:"يوضع عرضا من ناحية القبلة، ثم يدخل معترضًا"، ورُوي فيه حديث ابن عباس وهو ضعيف، انظر باب الدفن في الليل، وحديث بريدة قال: أدخل النبي صلى الله عليه وسلم من قبل القبلة، وأُلحد له لحدًا، ونصب عليه اللبن نصبًا، رواه البيهقي (4/ 54 - 55) من طريق يحيي بن عبد الحميد، ثنا أبو بردة في منزله، ثنا علقمة بن مرثد، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.

قال البيهقي: أبو بردة هو: عمرو بن يزيد التميمي الكوفي، وهو ضعيف في الحديث، ضعَّفه يحيى بن معين وغيره.




আবু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল-হারিস (মৃত্যুর আগে) অসিয়ত করেছিলেন যে আব্দুল্লাহ ইবনে যায়িদ যেন তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন। অতঃপর তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে যায়িদ) তাঁর উপর সালাত পড়ালেন। এরপর মৃতদেহটিকে কবরের পায়ের দিক থেকে প্রবেশ করানো হলো। আর তিনি বললেন, "এটি সুন্নাহর অংশ।"









আল-জামি` আল-কামিল (3664)


3664 - عن أنس قال: شهدنا بنتَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس على القبر، فرأيت عينيه تدمعان، فقال:"هل فيكم من أحد لم يقارف الليلة؟" فقال أبو طلحة: أنا، قال:"فأنزل في قبرها" فنزل في قبرها فقبرها.

قال ابن المبارك: قال فليح: أُراه يعني الذنب. قال أبو عبد الله (البخاري) {لِيَقْتَرِفُوا} أي ليكتسبوا.

صحيع: رواه البخاري في الجنائز (1342) عن محمد بن سِنان، حدثنا فليح بن سليمان، حدثنا هلال بن علي، عن أنس فذكره، ومن طريق فليح رواه الإمام أحمد (12275).

وقد ثبت في الروايات الصحيحة أن بنت النبي صلى الله عليه وسلم هي أم كلثوم، زوج عثمان، وتنحي عثمان عن النزول في القبر، لأنه جامع بعض جواريه في تلك الليلة.

وأما ما رواه حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، أن رقية لما ماتت قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل القبر رجل قارف أهلَه" فلم يدخل عثمان بن عفان القبر، فسماها أنها رقية بنت النبي صلى الله عليه وسلم فهو وهم منه، ومن هذا الوجه أخرجه الإمام أحمد (13398)، والحاكم (4/ 47) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: الصواب أن فيه وهما وقع من حماد بن سلمة، فإن رقية بنت النبي صلى الله عليه وسلم ماتتْ، والنبي صلى الله عليه وسلم -
ببدر لم يشهدها، كما قال البخاري وغيره، فالصحيح أن التي ماتت هي أم كلثوم كما ثبت في الروايات التاريخية.

فقول الهيثمي في"المجمع" (3/ 43):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح" لا يستلزم صحة الحديث فتنبه، وكذلك لا يصح ما رُوي عن عامر (وهو الشعبي) قال: غسَّل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عليٌّ والفضل وأسامة بن زيد، وهم أدخلوه قبره.

قال: وحدثني مرحَّب، أو أبو مرحَّب، أنهم أدخلوا معهم عبد الرحمن بن عوف، فلما فرغ علي قال: إنما يلي الرجل أهلُه، فهو مرسل. رواه أبو داود (3209) عن أحمد بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر فذكره.

وفي رواية أخرى عن محمد بن الصباح، أخبرنا سفيان، عن ابن أبي خالد، عن الشعبي، عن أبي مرحَّب، أن عبد الرحمن بن عوف نزل في قبر النبي صلى الله عليه وسلم قال: كأني أنظر إليهم أربعة.

ومرحَّب أو أبو مرحَّب مختلف في صحبته كما قال الحافظ في التقريب.

وجاء في أثر صحيح عن عبد الرحمن بن أبزى، أن عمر بن الخطاب كبَّر علي زينب بنت جحش أربعًا، ثم أرسل إلى أزواج النبي صلى الله عليه وسلم من يدخل هذه قبرها؟ ، قلن: من كان يدخل عليها في حياتها.

وفي رواية: وكان عمر يعجبه أن يدخلها، فلما قلن ما قلن: قال: صدقن، رواه البيهقي (4/ 53) من طريق شعبة، عن إسماعيل بن خالد، عن الشعبي، عن عبد الرحمن بن أبزي فذكره.

وفي حديث أنس دليل على أن الرجال يتولون دفن المرأة ولو كانوا أجنبيين عند الحاجة، والأولى أن يتولى ذلك أولياؤها.

وفيه دليل أيضًا أن الذي لم يجامع أهله تلك الليلة أولى بالدفن من الذي جامع أهله ولو كان أجنبيا؛ فإن بعيد العهد عن الملاذ يكون بعيد التفكير في الشهوات.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কন্যার দাফনে উপস্থিত ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের পাশে বসেছিলেন। আমি দেখলাম তাঁর দুই চোখ অশ্রুসজল। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমাদের মধ্যে এমন কেউ কি আছে, যে আজ রাতে (স্ত্রীর সাথে) মিলিত হয়নি?" আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি আছি। তিনি বললেন, "তবে তুমিই তার কবরে নামো।" অতঃপর তিনি তাঁর কবরে নামলেন এবং তাঁকে দাফন করলেন।

ইবনু মুবারক বলেছেন, ফুলাইহ বলেছেন: আমি মনে করি তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাপ বুঝিয়েছেন। আবূ আব্দুল্লাহ (আল-বুখারী) বলেছেন: {لِيَقْتَرِفُوا} এর অর্থ হলো— তারা যেন উপার্জন করে।

সহীহ: এটি বুখারী (জানায়েয, ১৩৪২) বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সিনান থেকে, তিনি ফুলাইহ ইবনু সুলাইমান থেকে, তিনি হিলাল ইবনু আলী থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর ফুলাইহের সূত্রে এটি ইমাম আহমাদও বর্ণনা করেছেন (১২২৭৫)।

সহীহ রেওয়ায়াতসমূহে প্রমাণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই কন্যা ছিলেন উম্মু কুলসুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরে নামা থেকে বিরত ছিলেন, কারণ তিনি সেই রাতে তাঁর কোনো এক দাসীর সাথে সহবাস করেছিলেন।

কিন্তু হাম্মাদ ইবনু সালামাহ যে রিওয়ায়াত সাবিত, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, যখন রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয়েছে, সে যেন কবরে প্রবেশ না করে।" ফলে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরে প্রবেশ করেননি— এই বর্ণনায় রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করা হাম্মাদ ইবনু সালামাহর পক্ষ থেকে একটি ভ্রম। এই সূত্রেই ইমাম আহমাদ (১৩৩৯৮) ও হাকিম (৪/৪৭) এটি সংকলন করে বলেছেন: "এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।"

আমি (গ্রন্থকার) বলি: সঠিক হলো— এতে হাম্মাদ ইবনু সালামাহর পক্ষ থেকে একটি ভ্রম ঘটেছে। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন মারা যান যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরে ছিলেন এবং তিনি (তাঁর দাফনে) উপস্থিত ছিলেন না, যেমনটি বুখারী ও অন্যান্যরা বলেছেন। তাই সঠিক হলো, যিনি মারা গিয়েছিলেন তিনি উম্মু কুলসুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যেমনটি ঐতিহাসিক রিওয়ায়াতসমূহে প্রমাণিত।

অতএব হাইছামী 'আল-মাজমা' (৩/৪৩)-এ যে বলেছেন: "এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন এবং এর রাবীগণ সহীহর রাবী", তা হাদীসটির বিশুদ্ধতা প্রমাণ করে না, এ বিষয়ে মনোযোগ দিন। অনুরূপভাবে, আমের (যিনি শা'বী)-এর পক্ষ থেকে বর্ণিত রিওয়ায়াতটিও সহীহ নয় যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আলী, ফাদল এবং উসামাহ ইবনু যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গোসল করিয়েছিলেন এবং তাঁরাই তাঁকে তাঁর কবরে প্রবেশ করিয়েছিলেন।

তিনি (আমের) বলেন: আমাকে মারহাব বা আবূ মারহাব হাদীস শুনিয়েছেন যে, তাঁরা তাঁদের সাথে আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও কবরে প্রবেশ করিয়েছিলেন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাজ শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন: কোনো ব্যক্তির দাফনের কাজ তার পরিবারের লোকেরাই করবে। এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)। এটি আবূ দাউদ (৩২০৯) আহমাদ ইবনু ইউনুস থেকে, তিনি যুহাইর থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু আবী খালিদ থেকে, তিনি আমের থেকে বর্ণনা করেছেন।

অন্য একটি রিওয়ায়াতে মুহাম্মাদ ইবনু আস-সাব্বাহ থেকে, তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি ইবনু আবী খালিদ থেকে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি আবূ মারহাব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরে নেমেছিলেন। তিনি (আবূ মারহাব) বলেন: আমি যেন তাঁদের চারজনকে দেখতে পাচ্ছি। মারহাব বা আবূ মারহাবের সাহাবী হওয়া নিয়ে হাফিয ইবনু হাজার 'আত-তাক্বরীব'-এ মতপার্থক্য থাকার কথা বলেছেন।

আব্দুর রহমান ইবনু আবযা থেকে একটি সহীহ বর্ণনায় এসেছে যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাইনাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযার সালাতে চার তাকবীর দিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের কাছে এই বলে লোক পাঠালেন: "কে তাঁকে কবরে প্রবেশ করাবে?" তাঁরা বললেন: "যারা তাঁর জীবদ্দশায় তাঁর কাছে প্রবেশ করত।" অন্য এক রিওয়ায়াতে এসেছে: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে (কবরে) প্রবেশ করানো পছন্দ করতেন, কিন্তু যখন তাঁরা এই কথা বললেন, তখন তিনি বললেন: "তাঁরা সত্য বলেছেন।" এটি বাইহাকী (৪/৫৩) শু'বাহর সূত্রে, তিনি ইসমাঈল ইবনু খালিদ থেকে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবযা থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসে প্রমাণ রয়েছে যে, প্রয়োজনের সময় পুরুষরা মহিলাদের দাফন করতে পারে, যদিও তারা মাহরাম না হয়। তবে উত্তম হলো, তার অভিভাবকরা এই কাজটি সম্পন্ন করবে।

এতে আরো প্রমাণ রয়েছে যে, যে ব্যক্তি সেই রাতে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয়নি, সে তার দাফনের জন্য অধিক হকদার, যদিও সে মাহরাম না হয়ে থাকে; কারণ যে ব্যক্তি আনন্দ থেকে দূরে থাকে, সে শাহওয়াত (কামনা) নিয়ে চিন্তা করা থেকেও দূরে থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (3665)


3665 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا وضع الميت في القبر قال:"بسم الله، وعلى سنة رسول الله".

صحيح: رواه أبو داود (3213)، والنسائي في الكبرى (10927) وصحَّحه ابن حبان (3110)، والحاكم (1/ 366) كلهم من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن أبي الصديق وهو الناجي، عن ابن عمر فذكره، واللفظ لأبي داود.

وأخرجه الإمام أحمد (4812) عن يزيد (وهو ابن هارون) عن همام بن يحيى بإسناده.

وإسناده صحيح، وأبو الصديق هو بكر بن عمرو وهو ثقة، ولفظ ابن حبان وأحمد:"إذا وضعتم موتاكم في اللحد فقولوا: بسم الله، وعلى سنة رسول الله"، وعند أحمد:"وعلى ملة رسول الله".
ورواه الترمذي (1046)، وابن ماجه (1550) كلاهما من طريق أبي خالد الأحمر، عن الحجاج، عن نافع، عن ابن عمر ولفظه:"باسم الله وبالله وعلى ملة رسول الله"، وفي رواية"على سنة رسول الله".

وقال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه، وقد رُوي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه أبو الصديق الناجي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وقد رُوي عن أبي الصديق الناجي، عن ابن عمر موقوفًا أيضًا" انتهى.

قلت: ما صح منه لا يُعلل بما لم يَصح، ولذا قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، وهمام بن يحيي ثبت مأمون إذا أسند مثل هذا الحديث لا يُعلل بأحد إذا أوقفه شعبة" انتهى.

وفي الباب ما رُوي عن البياضي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"الميت إذا وضع في قبره فليقل الذين يضعونه حين يوضع في اللحد: باسم الله، وبالله، وعلى ملة رسول الله صلى الله عليه وسلم".

وفيه أبو حازم مولى الغفارين -واسمه التمار، ذكره ابن حبان في"الثقات"، ولم يوثقه أحد، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع، ولم أجد من تابعه.

ورواه الحاكم (1/ 366) من حديث الليث بن سعد، حدثني ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي حازم مولى الغفاريين، قال: حدثني البياضي فذكره.

قال الحاكم:"حديث البياضي وهو مشهور في الصحابة شاهد لحديث همام عن قتادة مسندًا".

قلت: كون حديث البياضي شاهدًا لحديث ابن عمر فلا بأس به، لأنه ليس فيه متهم.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد الرحمن بن العلاء بن اللَّجاج، عن أبيه قال: قال لي أبي: يا بني! إذا أنا مُتُّ فألحدني، فإذا وضعتني في لحدي فقل:"بسم الله، وعلى ملة رسول الله، ثم شُنَّ عليَّ الثري شَنَّا، ثم اقرا عند رأسي بفاتحة البقرة وخاتمها"، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك، رواه الطبراني في"الكبير" (19/ 321) بإسناده عن عبد الرحمن بن العلاء فذكره، وأورده الحافظ في"التلخيص" (2/ 130) وسكت عليه.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 44) وقال:"رجاله موثقون".

قلت: قال ذلك تبعًا لابن حبان فإنه ذكر عبد الرحمن بن العلاء في"الثقات" ولم يسبق له توثيق من أحد، ولم يذكر المزي من الرواة عنه سوى مبشر بن إسماعيل الحلبي، وأكَّد ذلك الذهبي في"الميزان" فهو مجهول.

وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي إذا توبع، ولم يتابع على روايته فهو ليّن الحديث.



عليه من قبل رأسه ثلاثًا.

رواه ابن ماجه (1565) حدثنا العباس بن الوليد الدمشقي، قال: حدثني يحيى بن صالح، قال: حدثنا سلمة بن كلثوم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وهو منكر أنه لم يذكر هذا الحديث بهذا اللفظ إلا سلمة بن كلثوم عن الأوزاعي، وسلمة بن كلثوم وصف بأنه كان يهم كثيًرا.

وقد نقل ابن أبي حاتم عن أبيه بأنه حديث باطل، وقال الدارقطني في"علله" (9/ 322):"زاد فيه ألفاظًا لم يأت بها غيره، وهي قوله:"أتى النبي صلى الله عليه وسلم على القبر حثا عليه ثلاثًا ..". أي أنه تفرد به وخالف كثيًرا من الرواة؛ لأنّ أصل حديث أبي هريرة في الدعاء على الجنازة"اللهم! اغفر لحينا وميتنا …" رواه جماعة كثيرون، ولم يذكر أحدٌ هذه اللفظة إلا سلمة بن كلثوم، وهو ممن لا يقبل تفرده.

وأما ما رُوي عن أبي أمامة قال: لما وُضِعت أم كلثوم ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم في القبر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: {مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى} [طه: 55] قال: ثم لا أدري أقال:"بسم الله وفي سبيل الله، وعلى ملة رسول الله" أم لا؟ فلما بُني عليها لحدُها طفق يطرح لهم الجبوب ويقول:"سُدُّوا خلال اللَّبن" ثم قال:"أما إن هذا ليس بشيء، ولكنَّه يُطيِّب بنفس الحيّ" فهو ضعيف جدا.

رواه الإمام أحمد (22187) عن علي بن إسحاق، أخبرنا عبد الله -يعني ابن المبارك، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن عبيدالله بن زحر، عن علي بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.

وفيه عبيدالله بن زحر وشيخه علي بن يزيد وهو ابن أبي هلال الألهاني ضعيفان.

وأخرجه الحاكم (2/ 379) وعنه البيهقي (3/ 409) من طريق يحيي بن أيوب به مثله.

وقال البيهقي:"وهذا إسناد ضعيف". وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من حثا على مسلم، أو مسلمة احتسابًا كتب له بكل ثراة حسنة"، رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (2/ 428) وفيه الهيثم بن رُزيق المالكي وهو مجهول ولا يتابع عليه.

وفي الباب أيضًا عن عامر بن ربيعة وجعفر بن محمد، عن أبيه وغيرهما وهي كلها معلولة. انظر:"المنة الكبري" (3/ 82 - 83).

وقد صحّ عن بعض الصحابة حثو التراب على القبر بعد دفن الميت منهم: علي وابن عباس وأبي أمامة وغيرهم؛ ولذا رأي أهل العلم أنه لا يكره ذلك.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো মৃত ব্যক্তিকে কবরে রাখতেন, তখন তিনি বলতেন: "বিসমিল্লাহ, ওয়া আলা সুন্নাতি রাসূলিল্লাহ।" (আল্লাহর নামে, এবং আল্লাহর রাসূলের সুন্নাতের ওপর [স্থাপন করছি])









আল-জামি` আল-কামিল (3666)


3666 - عن عثمان بن عفان قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا فرغ من دفن الميت، وقف عليه
فقال:"استغفروا لأخيكم، وسَلُوا له التثبيتَ، فإنه الآن يُسأل".

حسن: أخرجه أبو داود (3221) عن إبراهيم بن موسي الرازي، حدثنا هشام، عن عبد الله بن بَحير، عن هانئ مولي عثمان، عن عثمان بن عفان فذكره.

ورواه البيهقي في إثبات عذاب القبر (50) من وجه آخر عن هشام بن يوسف بإسناده مثله. وعبد الله بن بحير -بفتح الموحدة، وكسر المهملة- ابن رَيسان أبو وائل القاص وثَّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 331).

وأما قول الحافظ في"التقريب":"واضطرب فيه كلام ابن حبان" فالصحيح أنه لم يضطرب، لأنه فرق بين عبد الله بن بحير بن رَيسان وبين عبد الله بن بَحير الصنعاني فذكر الأول في"الثقات" كما تقدم، والثاني في"المجروحين" (548) فقال:"وليس هذا عبد الله بن بَحير بن رَيسان ذاك ثقة، وهذا هالك، هذا يروي عن عروة بن محمد بن عطية وعبد الرحمن بن يزيد الصنعاني العجائب التي كأنها معمولة، لا يجوز الاحتجاج به" إلا أنه كنَّى الصنعاني بأبي وائل القاص، وصاحبنا هو الأول، ولكن في الإسناد هانئ مولي عثمان، وهو أبو سعيد البربري قال فيه النسائي: ليس به بأس"، وذكره ابن حبان في"الثقات" فهو حسن الحديث، لا يرتقي إلى درجة"ثقة".

وأخرجه الحاكم في"المستدرك" (1/ 370) من هذا الوجه، وقال:"صحيح على شرط الإسناد". وأمّا التلقين، فقال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 522 - 523):"لم يكن من هديه صلى الله عليه وسلم أن يجلس يقرأ عند القبر، ولا يلقَّن الميِّت كما يفعله النّاسُ اليوم، وأمّا الحديث الذي رواه الطّبراني في"معجمه" [7979] من حديث أبي أمامة مرفوعًا، فلا يصح". وأورده الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2/ 324) وقال:"رواه الطّبراني في"الكبير"، وفيه من لم أعرفه".

أما رفع اليدين مستقبل القبلة عند دفن الميت والدعاء له فلم يثبت، وأما ما روي عن عبد الله بن مسعود قال: والله لكأني أنطبع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، وهو في قبر ذي البجادين، وأبو بكر وعمر، وهو يقول:"أدنيا إلى أخاكما"، فأخذه من قبل القبلة حتى أسنده في لحده، ثم خرج النبي صلى الله عليه وسلم ووليا العمل، فلما فرغ من دفنه استقبل القبلة رافعا يديه يقول:"اللهم! إني أمسيت عنه راضيًا، فارض عنه"، وكان ذلك ليلا ، فواللهّ لقد رأيتني ولقد أسلمت قبله بخمسة وعشرين سنة ولوددت أني مكانه، فهو غريب.

رواه البغوي في"معجم الصحابة" (2/ 323) عن عبد الله بن أبي سعد، نا إسحاق بن إبراهيم الفارسي، قال: ثني جدي سعد بن الصلت، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.

ورواه أبو نعيم في"الحلية" (1/ 122)، وفي"معجم الصحابة" (3/ 1636) من طريق محمد بن عمر بن حفص، ثنا إسحاق بن إبراهيم شاذان بإسناده مثله.

وأخرجه ابن مندة -كما في"الإصابة"- من طريق سعد بن الصلت بإسناده، والغالب أنه من
طريق إسحاق بن إبراهيم والنهشلي، المعروف بشاذان الفارسي، ابن ابنة سعد بن الصلت ترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (2/ 211)، وقال:"هو صدوق".

وسعد بن الصلت هو ابن بُرد بن أسلم القاضي، ترجمه الذهبي في"السير" (9/ 317) ووصفه بأنه الإمام المحدث الفقيه. سأل عنه سفيان الثوري، فقال:"ما فعل سعد؟" قالوا: ولي قضاء شيراز، قال:"دُرة وقع في الحُشّ"، قال الذهبي:"هو صالح الحديث، وما علمت لأحد فيه جرحًا". انتهى.

وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"ربما أغرب".

قلت: لعل هذا الحديث من غرائبه، فإنه تفرد بالرواية عن الأعمش، وهو كثير الرواية. وقد حكم الذهبي أيضًا على حديث رواه سعد بن الصلت، عن عيسي بن عمر بإسناده مرفوعًا:"من حج عن أبويه، ولم يحجا جزي عنهما، وعنه، ونُشرت أرواحهما في السماء، وكتب عند الله برًا".

قال الذهبي:"غريب جدًّا، وعيسي هذا هو الكوفي المقرئ صدوق".

وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، أن عبد الله بن مسعود كان يحدث، قال: قمت من جوف الليل، وأنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، قال: فرأيت شعلة من نار في ناحية العسكر، قال: فاتبعتها أنظر إليها، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبو بكر، وعمر، وإذا عبد الله ذو البجادين المزني قد مات، وإذا هم قد حفروا له، ورسول الله صلى الله عليه وسلم في حفرته، وأبو بكر وعمر يدلّيانه إليه، وهو يقول:"أدنيا إلي أخاكم"، فدلّياه، فلما هيأه لشقِّه قال:"اللهم! إني أمسيت راضيًا عنه، فارض عنه"، قال: يقول عبد الله بن مسعود: ياليتني كنت صاحب الحفرة.

رواه البغوي في"معجم الصحابة"، وأبو نعيم في"الحلية"، وهو في"سيرة ابن هشام" (2/ 527) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، وفيه انقطاع كما أشار إليه ابن حجر في"الإصابة" (2/ 339)، فإن محمد بن إبراهيم الحارث لم يسمع من عبد الله بن مسعود، ثم هو مختلف فيه، فوثقه ابن معين وأبو حاتم والنسائي.

وقال أحمد:"في حديثه شيء، يروي أحاديث مناكير، أو منكرة". ثم ليس فيه محل الشاهد وهو:"استقبل القبلة رافعًا يديه". وعبد الله ذو البجادين سمي به لأنه كان يتيمًا في حجر عمه، وكان محسنًا له، فبلغ عمه أنه أسلم، فنزع منه كل شيء أعطاه، حتي جرّده من ثوبه، فأتى أمه، فقطعت له بجادًا لها اثنتين، فاتزر نصفًا، وارتدى نصفًا، ثم أسلم، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أنت عبد الله ذو البجادين"، فلزم به. هذا عند دفن الميت، أما رفع اليدين للدعاء عند زيارة المقابر فهو صحيح ثابت من حديث عائشة كما هو مذكور في باب الأدعية لأصحاب القبور.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মৃত ব্যক্তির দাফন শেষ করতেন, তখন তিনি (কবরের পাশে) দাঁড়িয়ে বলতেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো এবং তার জন্য দৃঢ়তা (স্থিরতা) কামনা করো, কারণ তাকে এখনই প্রশ্ন করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3667)


3667 - عن قتادة قال: ذكر لنا أنس بن مالك، عن أبي طلحة قال: لما كان يومُ بدرٍ،

وظهر عليهم نبي الله صلى الله عليه وسلم وأمر ببضعة وعشرين رجلًا-وفي رواية: بأربعة وعشرين رجلًا من صناديد قريش، فأُلقوا في طَوِيٍّ من أطواء بدرٍ.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976)، ومسلم في كتاب الجنَّة (2875)، كلاهما من حديث روح بن عبادة، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، فذكره في سياق طويل وسيأتي في المغازي بطوله. وفي رواية: فجروا بأرجلهم.

وقوله:"في طَوِي" بفتح الطاء وكسر الواو، بئر مطوي بالحجارة أو غيرها، وجمعه أطواء كشريف وأشراف.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন বদরের দিন ছিল, আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর বিজয়ী হলেন, তখন তিনি কুরাইশের সর্দারদের মধ্য থেকে বিশের বেশি সংখ্যক লোককে — অন্য বর্ণনায়: চব্বিশজন লোককে — নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তাদের বদরের কূপগুলোর (তাওয়ীগুলোর) একটিতে নিক্ষেপ করা হলো।