আল-জামি` আল-কামিল
368 - عن نعيم بن همَّار أنّ رجلًا سأل النبيَّ صلى الله عليه وسلم: أيُّ الشّهداء أفضل؟ قال:"الذين إن يُلْقَوا في الصّف لا يلفتون وجوهَهُم حتى يُقْتَلوا، أو يَتَلَبَّطُون، في الغرف العُلى من الجنّة، ويضحك إليهم ربُّك، وإذا ضحك ربُّك إلى عبد في الدنيا فلا حساب عليه".
حسن: رواه الإمام أحمد (22476)، وأبو يعلى (6855)، وابن أبي عاصم في الجهاد (228)، والبيهقي في الأسماء والصفات (986)، والآجريّ في الشريعة (650) كلّهم من طرق عن إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعيد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن نعيم بن همّار، فذكره.
وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن الشاميين من أهل بلده، وهذا منها فإنّ بحير -بفتح الباء وكسر المهملة- ابن سعيد هو أبو خالد حمصيّ، ولكن قال البخاريّ في التاريخ الكبير (8/ 95) بعد أن روى من هذا الطريق:"وقال محمد بن المثنى، عن عبد الوهّاب، نا برد -وهو ابن سنان- عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن قيس الجذاميّ، عن نعيم بن همّار الغطَفانيّ (فذكر الحديث)".
فأدخل بين كثير بن مرة، وبين نعيم بن همّار"قيس الجذاميّ". وقد أثبت البخاريّ سماع كثير ابن مرة من نعيم بن همّار وهو ممن سمع من النبيّ صلى الله عليه وسلم، فيكون كثير بن مرة روى هذا الحديث من وجهين كلاهما صحيحان.
নু'আইম ইবনে হাম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করল: কোন্ শহীদ উত্তম? তিনি বললেন: "তারা হলো তারা, যাদেরকে যখন (যুদ্ধের) কাতারসমূহে নিক্ষেপ করা হয়, তখন তারা নিহত না হওয়া পর্যন্ত অথবা রক্তাক্ত হয়ে মাটিতে লুটিয়ে না পড়া পর্যন্ত তাদের মুখ ফেরায় না। তারা জান্নাতের সর্বোচ্চ কক্ষগুলোতে থাকবে এবং তোমার রব তাদের প্রতি হাসবেন। আর তোমার রব যখন দুনিয়াতে কোনো বান্দার প্রতি হাসেন, তখন তার উপর (আখিরাতে) কোনো হিসাব (বিচার) থাকে না।"
369 - عن أبي رزين قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ضحِك ربُّنا عز وجل من قنوط عباده، وقرب غِيَرِه". فقال أبو رزين: أو يضحك الرّب عز وجل؟ قال:"نعم". فقال: لن نعدم من ربٍّ يضحكُ خيرًا". .
حسن: رواه الإمام أحمد (16187)، وأبو داود الطيالسيّ (1092)، والآجريّ في الشريعة (638، 639)، وابن أبي عاصم في السنة (554)، والبيهقي في الأسماء والصفات (987) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن يعلى بن عطاء، عن وكيع بن حدس، عن عمّه أبي رزين، فذكره.
وحسّن إسناده شيخ الإسلام ابن تيميّة في"العقيدة الواسطية" (ص 109 - بشرح الشيخ الفوزان).
قلت: إسناده حسن من أجل وكيع بن حُدس وهو"مقبول" أي حيث يتابع، وقد تُوبع على اللّفظ، وأبو رزين هو لقيط بن صبرة، وقيل: ابن عامر - العقيليّ، وسيأتي حديثه كاملًا في باب رؤية المؤمنين ربَّهم يوم القيامة.
وروي مثل هذا عن عائشة. رواه ابن خزيمة في التوحيد (461) من طريق سلم بن سالم البلخي، عن خارجة بن مصعب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عائشة، فذكرت مثله.
وسلم بن سالم البلخيّ وشيخه خارجة بن مصعب ضعيفان.
قوله:"من قنوط عباده" قال السّنديّ: القنوط هو اليأس، ولعلّ المراد هنا الحاجة والفقر، أي يرضى عليهم، ويقبل عليهم بالإحسان إذا نظر إلى فقرهم وفاقتهم وذُلّهم، وإلّا فالقنوط من رحمة اللَّه تعالى بوجب الغضب لا الرّضا، قال تعالى: {لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ} [سورة الزمر: 53].
وقوله:"وقرب غِيَره" بكسر المعجمة، وفتح الياء، بمعني تغير الحال، وهو اسم من قولك: غيَّرت الشيء فتغيّر، وضميره لجنس العبد، والمراد تغير حاله من القوة إلى الضّعف، من الحياة إلى الموت. وهذه الأحوال مما تجلب الرحمة لا محالة من الشاهد، فكيف لا يكون أسبابًا عادية لجلبها من أرحم الراحمين.
وقوله:"لن نعدم" من عدمه -لعلمه- إذا فقده، يريد أنّ الرّب تعالى إذا كان من صفاته الضّحك فلا تفقد خيره، بل كلما احتجنا إلى خيره وجدناه، فإنا إذا أظهرنا الفاقة لديه يضحك فيعطي.
আবু রযীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমাদের মহামহিম রব তাঁর বানন্দাদের নিরাশ হওয়া এবং তাদের অবস্থার পরিবর্তন নিকটবর্তী হওয়ার কারণে হেসে দেন।” তখন আবূ রযীন বললেন: "মহামহিম রব কি হাসেন?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হ্যাঁ।” তখন তিনি (আবূ রযীন) বললেন: "যে রব হাসেন, তাঁর কাছ থেকে আমরা কল্যাণের অভাব বোধ করব না।"
370 - عن علي بن ربيعة قال: أردفني عليٌّ رضوان اللَّه عليه خلفه، ثم خرج إلى ظهر الكوفة، ثم رفع رأسه إلى السماء، فقال: {لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ} [سورة الأنبياء: 87] فاغفر لي. قال: ثم التفت إليَّ فضحك، فقال: ألا تسألني ممّ ضحكتُ؟ قال: قلتُ: مم ضحكتَ يا أمير المؤمنين؟ قال: أردفني رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم خلفه، ثم خرج بي إلى حرّة المدينة، ثم رفع رأسه إلى السماء، فقال: {لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ}، فاغفر لي" ثم التفتَ
إليَّ فضحك. فقال:"ألا تسألني ممّ ضحكتُ؟". قال: قلتُ: مم ضحكتّ يا رسولَ اللَّه؟ قال:"ضحكتُ من ضَحِك ربّي وتعجُّبه من عبده؛ أنه يعلمُ أنّه لا يغفر الذّنوب غيره".
حسن: رواه ابن خزيمة في التوحيد (465)، والآجري في الشريعة (64)، والطبراني في الدّعاء (777)، والبيهقي في الأسماء والصفات (980) كلّهم من طرق عن إسماعيل بن عبد الملك، عن علي بن ربيعة، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن عبد الملك وهو ابن أبي الصُّفير -بالمهملة والفاء- تكلّم فيه أبو حاتم، وأبو داود، والنسائي، ومشّاه البخاريّ وابن معين وابن عدي وغيرهم.
ثم هو لم ينفرد به، فقد تابعه المنهال بن عمرو، ومن طريقه أخرجه الحاكم (2/ 98) نحوه، وقال: صحيح على شرط مسلم.
قلت: المنهال بن عمرو هو الأسديّ مولاهم الكوفي، من رجال البخاريّ، كما رمز له الحافظ في التقريب ولم يرمز لمسلم.
ومن متابعاته أيضًا ما رواه أبو إسحاق السبيعي، ومن طريقه أخرجه أبو داود (2602)، والترمذي (3446)، والإمام أحمد (753)، والآجري في الشريعة (645)، والبيهقي في الأسماء والصفات (981)، وصحّحه ابن حبان (2697)، والحاكم (2/ 99) كلهم من طرق عن أبي إسحاق، عن علي بن ربيعة، فذكر نحوه. قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: أبو إسحاق مدلس، وقد دلّس في هذا الإسناد كما بين ذلك الدّارقطني في"علله" (4/ 61) قائلًا:"أبو إسحاق لم يسمع هذا الحديث من علي بن ربيعة، بين ذلك ما رواه عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة، قال: قلت لأبي إسحاق: سمعته من علي بن ربيعة؟ فقال: حدثني يونس بن خباب، عن رجل، عنه. وروى هذا الحديث شعيب بن صفوان، عن يونس بن خباب، عن شقيق ابن عقبة الأسدي، عن علي بن ربيعة. ورواه المنهال بن عمرو وإسماعيل بن عبد الملك بن أبي الصغير، عن علي بن ربيعة. فهو من رواية أبي إسحاق مرسلًا، وأحسنها إسنادًا حديث المنهال بن عمرو، عن علي بن ربيعة" انتهى قول الدارقطنيّ.
قال الآجريّ بعد سرده أحاديث الضحك:"هذه السن كلّها نؤمن بها، ولا نقول فيها كيف، والذين نقلوا هذه السنن هم الذين نقلوا إلى السن في الطهارة وفي الصلاة والزكاة والصيام والحج والجهاد وسائر الأحكام من الحلال والحرام، فقبلها العلماء منهم أحسن قبول. ولا يَرُدُّ هذه السنن إلا من يذهب فذهب المعتزلة، فمن عارض فيها أو ردّها أو قال: كيف؟ فاتهموه واحذروه"."الشّريعة" (3/ 1068).
আলী ইবনু রাবী'আহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে তাঁর পিছনে সওয়ার করলেন। অতঃপর তিনি কুফার দিকে গেলেন। এরপর তিনি আকাশের দিকে মাথা তুলে বললেন: "লা ইলাহা ইল্লা আনতা সুবহানাকা ইন্নি কুনতু মিনায যালিমীন" (আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, আপনি পবিত্র, নিশ্চয়ই আমি যালিমদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম) [সূরা আল-আম্বিয়া: ৮৭]। অতএব, আপনি আমাকে ক্ষমা করুন।
তিনি বললেন: এরপর তিনি (আলী রাঃ) আমার দিকে ফিরে হাসলেন এবং বললেন: আমি কেন হাসলাম, তুমি কি তা আমাকে জিজ্ঞেস করবে না? আমি বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন, আপনি কেন হাসলেন?
তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর পিছনে সওয়ার করলেন। অতঃপর তিনি আমাকে নিয়ে মদীনার হাররার (পাথুরে ভূমি) দিকে গেলেন। এরপর তিনি আকাশের দিকে মাথা তুলে বললেন: "লা ইলাহা ইল্লা আনতা সুবহানাকা ইন্নি কুনতু মিনায যালিমীন"। অতএব, আপনি আমাকে ক্ষমা করুন।
এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে ফিরে হাসলেন। অতঃপর বললেন: আমি কেন হাসলাম, তুমি কি তা আমাকে জিজ্ঞেস করবে না? আমি (আলী রাঃ) বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কেন হাসলেন?
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি হেসেছি আমার রবের হাসির কারণে এবং বান্দার প্রতি তাঁর বিস্ময়ের কারণে; যেহেতু সে (বান্দা) জানে যে, তিনি (আল্লাহ) ছাড়া আর কেউ গুনাহ ক্ষমা করতে পারে না।
371 - عن وعن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عجب اللَّه من قوم يدخلون الجنّة في السّلاسل".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد (3010) عن محمد بن بشار، حدّثنا غندر، حدثنا شعبة، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي رواية عن أبي هريرة قال: {كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ} [سورة آل عمران: 110] قال: خير الناس للناس، تأتون بهم في السلاسل في أعناقهم حتى يدخلوا في الإسلام". رواه البخاري (4557).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা এমন এক জাতির ব্যাপারে খুশি হন (বা আশ্চর্য হন) যারা শিকল পরিহিত অবস্থায় জান্নাতে প্রবেশ করবে।
অন্য এক বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: [আল্লাহর বাণী] {তোমরা মানবজাতির জন্য শ্রেষ্ঠ উম্মত যাদেরকে তাদের জন্য বের করা হয়েছে} (সূরাহ আলে ইমরান: ১১০), এই আয়াত সম্পর্কে তিনি বলেন: তারা মানুষের জন্য শ্রেষ্ঠ মানুষ। তোমরা তাদের (অমুসলিমদের) গলায় শিকল পরিয়ে নিয়ে আসবে, যতক্ষণ না তারা ইসলামে প্রবেশ করে।
372 - عن أبي هريرة، قال: أتى رجلٌ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، أصابني الجهْد، فأرسل إلى نسائه فلم يجدْ عندهنّ شيئًا، فقال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا رجلٌ يضيف هذه اللّيلة، يرحمه اللَّه". فقام رجلٌ من الأنصار فقال: أنا يا رسول اللَّه، فذهب إلى أهله فقال لامرأته: ضيفُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا تدَّخريه شيئًا. قالتْ: واللَّهِ ما عندي إلّا قوتُ الصِّبْية، قال: فإذا أراد الصِّبية العشاء فنوِّميهم وتعالَيْ فأطفيءِ السّراج، ونطوي بطوننا اللّيلة، ففعلتْ، ثم غدا الرّجلُ على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"لقد عجب اللَّهُ عز وجل أو ضحك من فلان وفلانة". فأنزل اللَّه عز وجل: {وَيُؤْثِرُونَ عَلَى أَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ} [سورة الحشر: 9].
متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3798)، وفي التفسير (4889)، ومسلم في كتاب الأشربة (2054) كلاهما من حديث فضيل بن غزوان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি বড় কষ্টে আছি (ক্ষুধার্ত)। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের কাছে লোক পাঠালেন, কিন্তু তাদের কাছে কিছু পাওয়া গেল না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এমন কি কোনো লোক নেই, যে এই রাতে তাকে মেহমানদারী করবে? আল্লাহ তাকে রহমত করুন।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি (করব)। অতঃপর সে তার স্ত্রীর কাছে গেল এবং তাকে বলল: ইনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মেহমান। কোনো কিছু গোপন (সঞ্চয়) করে রেখো না। স্ত্রী বললেন: আল্লাহর কসম! আমার কাছে বাচ্চাদের খাবার ছাড়া আর কিছুই নেই। লোকটি বলল: বাচ্চারা যখন রাতের খাবার খেতে চাইবে, তখন তাদেরকে ঘুম পাড়িয়ে দিও। আর তুমি এসো এবং বাতি নিভিয়ে দিও। আর আমরা এই রাত উপোস থাকব। সে (স্ত্রী) তাই করল। অতঃপর পরদিন সকালে লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলে তিনি বললেন: "আল্লাহ তা‘আলা অমুক পুরুষ এবং অমুক নারীর কর্মে বিস্মিত (বা হেসেছেন)।" তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: "তারা নিজেরা অভাবগ্রস্ত হলেও অন্যদেরকে নিজেদের ওপর প্রাধান্য দেয়।" (সূরা আল-হাশর: ৯)।
373 - عن عقبة بن عامر قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يعجبُ ربُّك عز وجل من راعي غنم في رأس شظيئة بجبل يؤذّن للصلاة ويصلي. فيقول اللَّه عز وجل: انظروا إلى عبدي هذا يؤذّن ويقيم للصّلاة يخاف مني، قد غفرتُ لعبدي وأدخلته الجنة".
صحيح: رواه أبو داود (1203)، والنسائي (665) كلاهما من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، أنّ أبا عُشَّانة المعافريّ حدّثه عن عقبة بن عامر، فذكره.
وصحّحه ابن حبان (1660)، وأخرجه من هذا الوجه.
وأخرجه الإمام أحمد (17443) من وجهين - ومن وجه هذا، ومن طريق ابن لهيعة، حدّثنا أبو عشانة (17312، 17442). وابن لهيعة فيه كلام، ولكنه توبع في الإسناد الأوّل.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তোমাদের রব্ব আযযা ওয়া জাল (মহা প্রতাপশালী ও মহিমান্বিত) সেই মেষপালককে দেখে প্রীত হন যে পাহাড়ের চূড়ায় বা পর্বতের ফাটলের কাছে মেষ চরাচ্ছে, অতঃপর সে সালাতের জন্য আযান দেয় এবং সালাত আদায় করে। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: তোমরা আমার এই বান্দার দিকে তাকাও! সে আমার ভয়ে সালাতের জন্য আযান দেয় ও ইকামাত দেয়। আমি আমার বান্দাকে ক্ষমা করে দিয়েছি এবং তাকে জান্নাতে প্রবেশ করিয়েছি।”
374 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه ليعجبُ من الشّاب ليست
له صبْوَة".
حسن: رواه الإمام أحمد (17371)، والطبراني في الكبير (17/ رقم 853) كلاهما من طريق قتيبة بن سعيد، حدثنا ابن لهيعة، عن أبي عشانة، عن عقبة بن عامر، فذكره.
ورواه ابن أبي عاصم في السنة (571)، وأبو يعلى (1749)، والبيهقيّ في الأسماء والصفات (993) كلهم من طرق أخرى عن ابن لهيعة بإسناده مثله.
وأبو عشّانة اسمه حيُّ بن يؤمن وهو ثقة.
وقتيبة بن سعيد يقال: إنّه كتب أحاديث ابن لهيعة من كتاب عبد اللَّه بن وهب، وهو ممن سمع منه قبل اختلاطه واحتراق كتبه، ولذا حسَّن بعض أهل العلم هذا الطريق منهم الهيثمي في"المجمع" (1/ 270)، والطرق الأخرى تقوي ما رواه قتيبة بن سعيد، وقد رُوي موقوفًا وفيه رجل ضعيف.
وقوله:"ليست له صبوة" أي الميل إلى الهوى.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ সেই যুবককে নিয়ে আশ্চর্য হন, যার কোনো মন্দ প্রবৃত্তি বা অন্যায় ঝোঁক নেই।"
375 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"عجب ربُّنا عز وجل من رجل غزا في سبيل اللَّه فانهزم، فعلم ما عليه فرجع حتى أهريق دمُه، فيقول اللَّه عز وجل لملائكته: انظروا إلى عبدي، رجع رغبة فيما عندي، وشفقة مما عندي حتى أهريق دمه". وفي رواية:"عجب ربنا من رجلين، رجل ثار على وطائه ولحافه من بين حبِّه وأهله إلى صلاته. فيقول اللَّه جلَّ وعلا لملائكته: انظروا إلى عبدي ثار عن فراشه ووطائه من بين حِبّه وأهله إلى صلاته رغبة فيما عندي، وشفقة مما عندي، ورجل غزا في سبيل اللَّه". فذكر الحديث.
صحيح: رواه أبو داود (2536) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، أخبرنا عطاء بن السائب، عن مرة الهمدانيّ، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكر مثله.
ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم (2/ 112)، وقال:"صحيح الإسناد"
والرواية الثانية رواها الإمام أحمد (3949)، وابن أبي عاصم في السنة (569)، وصحّحه ابن حبان (2557، 2558).
كلّهم من طرق عن حماد بن سلمة بإسناده، مثله.
وإسناده صحيح عطاء بن السائب ثقة وثقه الأئمة إلا أنه اختلط في آخر عمره ولكن حماد بن سلمة سمع منه قبل اختلاطه.
وأمّا ما ذكره الدّارقطني في"العلل" (5/ 266 - 267): رفعه حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، ووقفه خالد بن عبد اللَّه عن عطاء" فلا يضر هذا الوقفُ لأن حماد بن سلمة ممن سمع من عطاء بن السّائب قبل الاختلاط، فتكون روايته أرجح من رواية خالد بن عبد اللَّه. وقد تابع على
رفعه أبو إسحاق عن مرة، عن عبد اللَّه. رواه قيس بن الربيع، عن أبي إسحاق كما قال الدارقطنيّ إلا أنه قال: تفرّد يحيى الحمّاني عن قيس".
قلت: يحيى الحمّانيّ هو ابن عبد الحميد بن عبد الرحمن الحمّاني -بكسر المهملة، وتشديد الميم- قال فيه أبو داود: كان حافظًا، وضعفه النسائي، واتّهموه بسرقة الحديث وهو من رجال مسلم، فلعلّ هذا ممّا حفظه عن شيخه قيس بن الربيع وهذا يقوّي من رفع الحديث وإن كان الدارقطني يصحّح وقفه.
وفي الباب أحاديث لا تصح.
منها: ما رُوي عن عبد اللَّه بن عمر، أنه قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه ليعجب من الصلاة في الجميع".
رواه الإمام أحمد (5112) عن يونس بن محمد، ثنا مرثد - يعني ابن عامر الهُنائيّ، حدّثني أبو عمرو النّدبي، حدّثني عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
وفيه مرثد بن عامر الهنائيّ من رجال"التعجيل" روى عنه عددٌ، منهم: يونس بن محمد، ومسدّد، وقتية، وآخرون، وذكره ابنُ حبان في"الثقات" (7/ 500)، ولكن قال الإمام أحمد:"لا أعرفه" أي حاله.
وشيخه أبو عمرو النَّدبيّ -بفتح النون والدّال بعدها موحّدة- واسمه: بشر بن حرب الأزديّ، قال فيه الحافظ:"صدوق فيه لين".
والحق أنه ضعيف، فقد ضعّفه جمهور أهل العلم منهم: الإمام أحمد، وابن سعد، وابن عدي، وأبو داود، والعجلي، وابن حبان، والحاكم وغيرهم.
تنبيه: هذا الحديث روي عن عبد اللَّه بن عمر، ولكن بعض المخرجين جعلوه من حديث عمر بن الخطاب وهو خطأ فتنبّه لذلك.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমাদের প্রতিপালক পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহ এমন ব্যক্তির প্রতি বিস্ময় প্রকাশ করেন, যে আল্লাহর পথে জিহাদ করল, কিন্তু পরাজিত হয়ে গেল। অতঃপর সে তার ওপর অর্পিত দায়িত্ব সম্পর্কে অবগত হয়ে (পুনরায়) ফিরে আসল এবং শেষ পর্যন্ত তার রক্ত ঝরল (শাহাদাত বরণ করল)। তখন মহান আল্লাহ তাঁর ফেরেশতাদেরকে বলেন: 'তোমরা আমার বান্দার প্রতি লক্ষ্য করো! সে আমার কাছে যা আছে, তার প্রতি আগ্রহ এবং আমার কাছে যা আছে, তার থেকে ভয় পাওয়ার কারণে ফিরে এসেছে, যতক্ষণ না তার রক্ত ঝরেছে।'
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমাদের প্রতিপালক দু'জন ব্যক্তির প্রতি বিস্ময় প্রকাশ করেন। একজন ব্যক্তি— যে তার প্রিয়জন ও পরিবারের মাঝে আরামদায়ক বিছানা ও লেপ ছেড়ে নামাযের জন্য উঠে দাঁড়ায়। তখন মহিমান্বিত আল্লাহ তাঁর ফেরেশতাদেরকে বলেন: 'তোমরা আমার বান্দার প্রতি লক্ষ্য করো! সে আমার কাছে যা আছে, তার প্রতি আগ্রহ ও আমার কাছে যা আছে, তার থেকে ভয়ের কারণে তার প্রিয়জন ও পরিবারের মাঝে তার শয্যা ও বিছানা ছেড়ে নামাযের জন্য উঠে দাঁড়িয়েছে।' আর (দ্বিতীয় ব্যক্তি হল) 'এমন ব্যক্তি যে আল্লাহর পথে জিহাদ করেছে।' অতঃপর (রাবী) বাকী হাদীস উল্লেখ করেন।
376 - عن الحارث بن سويد قال: حدّثنا عبد اللَّه -يعني ابن مسعود- حديثين أحدهما عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، والآخر عن نفسه، قال (يعني ابن مسعود): إنّ المؤمن يري ذنوبه كأنه قاعد تحت جبل يخاف أن يقع عليه، وإنّ الفاجر يرى ذنوبه كذباب مرّ على أنفه فقال به هكذا، - قال أبو شهاب بيده فوق أنفه. ثم قال (يعني ابن مسعود عن النبيّ):"للَّهُ أفرحُ بتوبة عبده المؤمن من رجل نزل منزلًا وبه مَهْلكةٌ، ومعه راحلته عليها طعامه وشرابه، فوضع رأسه فنام نومة، فاستيقظ وقد ذهبتْ راحلتُه، حتى اشتدّ عليه الحرُّ والعطش أو ما شاء اللَّه، قال: أرجعُ إلى مكاني، فرجع فنام
نومة، ثم رفع رأسه فإذا راحلته عنده".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الدّعوات (6308)، ومسلم في التوبة (2744) كلاهما من حديث الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن الحارث بن سويد، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم بنحوه.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দুটি হাদীস বর্ণনা করেছেন। একটি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এবং অন্যটি তাঁর নিজের থেকে। তিনি (ইবনে মাসঊদ) বলেন: নিশ্চয়ই মু'মিন ব্যক্তি তার গুনাহগুলোকে এমন দেখে যেন সে একটি পাহাড়ের নিচে বসে আছে, আর সে ভয় করছে যে হয়তো পাহাড়টি তার ওপর ধসে পড়বে। আর পাপাচারী তার গুনাহগুলোকে এমন দেখে, যেন তা একটি মাছি যা তার নাকের ওপর দিয়ে চলে গেল। এরপর সে তার হাত দ্বারা নাকে এভাবে ইশারা করলো (আবু শিহাব (বর্ণনাকারী) তার হাত দ্বারা নাকের উপরে ইশারা করে দেখালেন)।
অতঃপর তিনি (ইবনে মাসঊদ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে) বর্ণনা করে বলেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা তাঁর মু'মিন বান্দার তাওবার কারণে ওই ব্যক্তির চেয়েও অধিক খুশি হন, যে ব্যক্তি এমন এক বিপদসংকুল স্থানে অবতরণ করলো যেখানে ধ্বংস নিশ্চিত। তার সাথে তার বাহন রয়েছে, যার ওপর তার খাবার ও পানীয় রাখা। সে মাথা রাখলো এবং ঘুমিয়ে গেল। যখন সে জাগলো, তখন দেখলো তার বাহনটি চলে গেছে। এভাবে তার ওপর প্রচণ্ড গরম ও তৃষ্ণা চেপে বসলো—বা আল্লাহ যা চাইলেন। সে বললো: আমি আমার আগের স্থানেই ফিরে যাই। সে ফিরে গেল এবং ঘুমিয়ে পড়লো। অতঃপর যখন সে মাথা তুললো, তখন দেখলো তার বাহনটি তার পাশেই দাঁড়িয়ে আছে।"
377 - عن أنس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"للَّهُ أفرحُ بتوبة عبده من أحدكم سقط على بعيره، وقد أضلّه في أرض فلاة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الدّعوات (6309)، ومسلم في التوية (2747) كلاهما من حديث هُدبة ابن خالد -ويقال: هدّاب- عن همّام بن يحيى، حدّثنا قتادة، عن أنس، فذكر مثله، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم:"للَّهُ أشدّ فرحًا بتوبة عبده من أحدكم إذا استيقظ على بعيره قد أضلّه بأرض فلاة".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবার কারণে তোমাদের ঐ ব্যক্তিটির চেয়েও বেশি আনন্দিত হন, যে তার উটটিকে কোনো জনমানবহীন প্রান্তরে হারিয়ে ফেলার পর সেটিকে ফিরে পায়।
378 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"للَّهُ أشدُّ فرحًا بتوبة عبده حين يتوبُ إليه من أحدكم كان على راحلته بأرض فلاة، فانفلتتْ منه، وعليها طعامُه وشرابه، فأيس منها، فأتى شجرة فاضطجع في ظلّها قد أيس من راحلته، فبينا هو كذلك إذا هو بها قائمة عنده، فأخذ بخطامها، ثم قال من شدّة الفرح: اللهم أنت عبدي وأنا ربّك! أخطأ من شدّة الفرح".
صحيح: رواه مسلم في التوية (2747) من طرق عن عمر بن يونس، حدّثنا عكرمة بن عمّار، حدّثنا إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، حدّثنا أنس بن مالك -وهو عمّه- قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা তার বান্দার তওবার কারণে তোমাদের কারো চেয়েও বেশি খুশি হন— (উদাহরণস্বরূপ) সেই ব্যক্তির চেয়ে, যে কোনো নির্জন প্রান্তরে তার বাহনের উপর ছিল, যার উপর তার খাবার ও পানীয় ছিল। অতঃপর তা তার কাছ থেকে পালিয়ে গেল এবং সে নিরাশ হয়ে গেল। সে একটি গাছের নিচে এসে শুয়ে পড়ল, যখন সে বাহন ফিরে পাওয়ার আশা সম্পূর্ণরূপে ছেড়ে দিয়েছিল। সে যখন এই অবস্থায় ছিল, হঠাৎ দেখল বাহনটি তার সামনে দাঁড়িয়ে আছে। সে সেটির লাগাম ধরে ফেলল এবং প্রচণ্ড আনন্দের আতিশয্যে বলে উঠল: 'হে আল্লাহ! তুমি আমার বান্দা আর আমি তোমার রব!' সে আনন্দের আতিশয্যে ভুল করে ফেলেছিল।
379 - عن وعن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"للَّهُ أشدُّ فرحًا بتوبة أحدكم من أحد بضالّته إذا وجدها".
صحيح: رواه مسلم في التوبة (2675) عن عبد اللَّه بن مسلمة القعنبيّ، حدثنا المغيرة (يعني ابن عبد الرحمن الحزاميّ)، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه من وجه آخر عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قال اللَّه عز وجل: أنا عند ظنّ عبدي بي، وأنا معه حيث يذكرني، واللَّهِ للَّهُ أفرحُ بتوبة عبده من أحدكم يجد ضالّته بالفلاة، ومن تقرّب إليَّ شبرًا، تقرب إليه ذراعًا، ومن تقرب إليَّ ذراعًا، تقرّبتُ إليه باعًا، وإذا أقبل إليّ يمشي أقبلتُ إليه أهرولُ".
وهذا الثاني أخرجه أيضًا البخاريّ في التوحيد (7405) من طريق أبي صالح إلّا أنّه لم يذكر فيه:"للَّهُ أفرح بتوبة عبده من أحدكم يجد ضالّته بالفلاة".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ তার হারানো বস্তু খুঁজে পেলে যেমন আনন্দিত হয়, আল্লাহ তোমাদের কারো তওবায় তার চেয়েও বেশি আনন্দিত হন।"
তিনি (আবু হুরায়রা রাঃ) আরও বর্ণনা করেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: "আমি আমার বান্দার ধারণা অনুসারে তার কাছে থাকি। আর সে যখন আমাকে স্মরণ করে, আমি তার সাথে থাকি। আল্লাহর কসম! তোমাদের কেউ মরুভূমিতে তার হারানো জিনিস খুঁজে পেলে যেমন খুশি হয়, আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবায় তার চেয়েও বেশি খুশি হন। যে আমার দিকে এক বিঘত পরিমাণ অগ্রসর হয়, আমি তার দিকে এক হাত পরিমাণ অগ্রসর হই। আর যে আমার দিকে এক হাত পরিমাণ অগ্রসর হয়, আমি তার দিকে এক বাহু পরিমাণ অগ্রসর হই। আর যদি সে আমার দিকে হেঁটে আসে, তবে আমি দ্রুতগতিতে (দৌড়ে) তার দিকে যাই।"
380 - عن النعمان بن بشير قال:"للَّهُ أشدُّ فرحًا بتوبة عبده من رجل حمل زاده ومزاده على بعير، ثم سار حتى كان بفلاة من الأرض فأدركتْه القائلة، فنزل تحت
شجرة، فغلبتْه عينه وانسلّ بعيره، فاستيقظ فسعي شرقًا فلم يرَ شيئًا، ثم سعى شرقًا ثانيا لم يرَ شيئًا، ثم سعى شرقًا ثالثًا فلم يرَ شيئًا، فأقبل حتى أتى مكانه الذي قال فيه، فبينما هو قاعد إذ جاءه بعيره يمشي حتى وضع خطامه في يده. فاللَّهُ أشدُّ فرحًا بتوبة العبد من هذا حين وجد بعيره على حاله".
صحيح: رواه مسلم في التوبة (2745) عن عبيد اللَّه بن معاذ العنبريّ، حدثنا أبي، حدثنا أبو يونس، عن سماك، قال: خطب النعمان فقال (فذكره).
قال سماك:"فزعم الشعبيُّ أنّ النّعمان رفع هذا الحديث إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأما أنا فلم أسمعه".
নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবায় সেই ব্যক্তির চেয়েও অধিক আনন্দিত হন, যে ব্যক্তি তার খাদ্য ও পানীয়ের পাত্র একটি উটের উপর চাপিয়ে যাত্রা করেছিল। এরপর সে চলতে চলতে এক জনশূন্য প্রান্তরে পৌঁছাল। তাকে দুপুরের গরম পেয়ে বসল। সে একটি গাছের নিচে নামল। তার চোখ ঘুম কেড়ে নিল এবং তার উটটি পালিয়ে গেল। সে জেগে উঠে পূর্ব দিকে দৌঁড়াল, কিন্তু কিছুই দেখতে পেল না। এরপর সে দ্বিতীয়বার পূর্ব দিকে দৌঁড়াল, কিছু দেখতে পেল না। এরপর সে তৃতীয়বার পূর্ব দিকে দৌঁড়াল, কিছু দেখতে পেল না। অতঃপর সে ফিরে এল এবং যে স্থানে সে বিশ্রাম করছিল, সেখানে ফিরে গেল। এরপর সে বসে থাকাকালে হঠাৎ দেখল, তার উটটি হেঁটে আসছে এবং তার লাগামটি তার হাতে এসে রাখল। এই অবস্থায় তার উট ফিরে পাওয়ায় সে যতখানি আনন্দিত হয়েছিল, বান্দার তওবায় আল্লাহ এর চেয়েও অধিক আনন্দিত হন।
381 - عن البراء بن عازب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كيف تقولون بفرح رجل انفلتتْ منه راحلتُه تجر زمامها بأرض قَفْر ليس بها طعام ولا شراب، وعليها له طعام وشراب، فطلبها حتّى شقّ عليه، مرت بجذْل شجرة فتعلّق زمامُها فوجدها متعلقةً به؟". قلنا: شديدًا يا رسول اللَّه. فقال:"أما واللَّه للَّهُ أشدُّ فرحًا بتوبة عبده من الرجل براحلته".
صحيح: رواه مسلم في التوبة (2746) من طرق عن عبيد اللَّه بن زياد بن لقيط، عن إياد، عن البراء بن عازب، فذكره.
বারা' ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা এমন এক ব্যক্তির আনন্দ সম্পর্কে কী বলো, যার উটনি লাগামসহ একটি জনশূন্য প্রান্তরে তার কাছ থেকে পালিয়ে গেল, যেখানে কোনো খাবার বা পানীয় নেই, অথচ সেই উটনির উপরই তার খাবার ও পানীয় ছিল? সে সেটির সন্ধান করতে লাগল, এমনকি বিষয়টি তার জন্য অত্যন্ত কষ্টকর হয়ে গেল। অবশেষে সেটি একটি গাছের গুঁড়ির পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় তার লাগাম তাতে আটকে গেল এবং লোকটি উটনিটিকে সেখানে আটকে থাকা অবস্থায় খুঁজে পেল।" আমরা বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! (তার আনন্দ) হবে প্রচণ্ড। তখন তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! সেই লোকটির তার উটনি ফিরে পাওয়ার আনন্দের চেয়ে আল্লাহ তাঁর বান্দার তওবায় আরও বেশি আনন্দিত হন।"
382 - عن أبي واقد اللّيثيّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بينما هو جالسٌ في المسجد والنّاس معه، إذْ أقبل نفرٌ ثلاثة، فأقبل اثنان إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وذهب واحد، فلما وقفا على مجلس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سلّما، فأما أحدهما فرأى فرجة في الحلقة فجلس فيها، وأمّا الآخر فجلس خلفهم، وأمّا الثالث فأدبر ذاهبَا، فلما فرغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ألا أخبركم عن النّفر الثّلاثة؟ أمّا أحدهم فأَوى إلى اللَّه فآواه اللَّه، وأمّا الآخر فاستحيا فاستحيا اللَّه منه، وأما الآخر فأعرض فأعرض اللَّه عنه".
متفق عليه: رواه مالك في الموطأ في السلام (4) عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أبي مُرّة -مولي عقيل بن أبي طالب- عن أبي واقد اللّيثيّ، فذكره.
ورواه البخاريّ في العلم (66) عن إسماعيل، ومسلم في السلام (2176) عن قتيبة بن سعيد كلاهما عن مالك.
আবু ওয়াক্বিদ আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মসজিদে বসেছিলেন এবং লোকেরা তাঁর সাথে ছিল, তখন তিনজন লোক এল। তাদের মধ্যে দু’জন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে এল এবং একজন চলে গেল। তারা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মজলিসের কাছে পৌঁছাল, তখন সালাম দিল। তাদের মধ্যে একজন মজলিসে একটি খালি জায়গা দেখতে পেল এবং সেখানে বসে গেল। আর অন্যজন তাদের পিছনে বসল। আর তৃতীয়জন পিঠ দেখিয়ে চলে গেল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তাঁর আলোচনা) শেষ করলেন, তখন বললেন: “আমি কি তোমাদেরকে এই তিনজন লোক সম্পর্কে অবহিত করব না? তাদের মধ্যে একজন আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইল, ফলে আল্লাহ তাকে আশ্রয় দিলেন। অপরজন লজ্জা করল, ফলে আল্লাহও তার প্রতি লজ্জিত হলেন (দয়া করলেন)। আর অন্যজন মুখ ফিরিয়ে নিল, ফলে আল্লাহও তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন (বিমুখ হলেন)।”
383 - عن سلمان الفارسيّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ ربّكم حييٌّ كريم، يستحيي من
عبده إذا رفع يديه إليه أن يردّهما صِفْرًا".
حسن: رواه أبو داود (1488)، والترمذيّ (3556)، وابن ماجه (3865)، وصحّحه ابن حبان (876)، والحاكم (1/ 497) كلّهم من طرق عن جعفر بن ميمون، عن أبي عثمان النّهدي، عن سلمان الفارسيّ، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، ورواه بعضهم ولم يرفعه".
وقال الحافظ في"الفتح" (11/ 143):"سنده جيّد".
قلت: هو حسن إلّا أنه ليس على شرط أحدهما؛ فإنّ جعفر بن ميمون وهو التّميميّ من رجال السنن فقط، ثم هو مختلف فيه وخلاصته كما قال ابن عدي:"لم أرَ أحاديثه منكرة، وأرجو أنه لا بأس به ويكتب حديثه". وهو كما قال ثم أنه لم ينفرد به فقد رواه الطبراني في"الكبير" (6130)، وفي"الدعاء" (202)، والبيهقي في الدّعوات الكبير (181)، وصحّحه ابن حبان (880)، والحاكم (1/ 535) كلّهم من طرق عن محمد بن الزّبرقان، عن سليمان التّيميّ، عن أبي عثمان، عن سلمان مرفوعًا، مثله.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين"، وهو كما قال، فإنّ محمد بن الزّبرقان أبا همام الأهوازيّ من رجال الشيخين غير أنه"صدوق ربما وهم" كما قال الحافظ في التقريب، وهو لا بأس به في المتابعة.
ورواه البغوي في شرح السنة (1385) من وجه آخر عن أبي المعلّى، نا أبو عثمان النّهديّ، قال: سمعت سلمان الفارسيّ يقول: فذكره مرفوعًا، وقال في آخر الحديث:"حتى يضع فيهما خيرًا".
وأمّا قول الترمذيّ:"رواه بعضهم ولم يرفعه" فلا يضر؛ لأنّ من رفعه عنده زيادة علم، وممن لم يرفعه يزيد بن هارون، عن سليمان التيميّ، عن أبي عثمان، عن سلمان من قوله.
ومن هذا الطّريق رواه الإمام أحمد (23714)، والحاكم (1/ 497)، والبيهقيّ في الأسماء والصفات (1013)، وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين". ولكن أكّد الحاكم وصله من جعفر بن ميمون وقال:"وله شاهد بإسناد صحيح من حديث أنس بن مالك". انتهى.
وقال الذهبيّ في"العلو" (109) بعد أن أورد حديث سلمان الفارسيّ:"هذا حديث مشهور، رواه عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أيضًا علي بن أبي طالب، وابن عمر، وأنس وغيرهم". انتهى.
وقوله:"صِفْرًا" بكسر الصاد - أي خاليًا، يقال: بيت صفر عن المتاع أي خالٍ.
সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রব লাজুক (লজ্জাশীল) ও মহিমান্বিত দয়ালু। তাঁর কোনো বান্দা যখন তাঁর দিকে দু'হাত তুলে (দো‘আ করে), তখন সে হাত দু'টিকে শূন্য অবস্থায় ফিরিয়ে দিতে তিনি লজ্জাবোধ করেন।"
384 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه رحيم حييّ كريم يستحيي من عبده أن يرفع إليه يديه، ثم لا يضع فيهما خيرًا".
حسن: رواه الحاكم (1/ 497) عن أبي عبد اللَّه الصفّار، ثنا أبو بكر بن أبي الدّنيا، ثنا بشر بن الوليد القاضي، ثنا عامر بن يساف، عن حفص بن عمر بن عبد اللَّه بن أبي طلحة الأنصاريّ، قال:
حدثني أنس بن مالك، فذكره.
صحّحه الحاكم، وتعقّبه الذهبي فقال:"عامر ذو مناكير".
قلت: وهو تبع في ذلك ابن عدي، فإنه قال:"منكر الحديث من الثقات" ثم قال:"ومع ضعفه يكتب حديثه". وهذا هو الصحيح، فقد نقل الحافظ ابن حجر في"لسان الميزان" عن أبي داود أنه قال: ليس به بأس رجل صالح، وقال العجليّ: يكتب حديثه وفيه ضعف، وقال الدوريّ عن ابن معين: ثقة، وذكره ابن حبان في الثقات". انتهى.
فمثله يحسّن حديثه وخاصة في الشواهد وللحديث طرق أخرى إلّا أنها ضعيفة منها ما أخرجه عبد الرزاق (19648)، ومن طريقه البغوي في شرح السنة (1386) عن معمر، عن أبان، عن أنس، فذكر الحديث ولفظه:"إنّ ربّكَم حييُّ كريم يستحيي إذا رفع العبد إليه يده أن يردّهما صِفْرًا حتى يجعل فيهما خيرًا".
وأبان هو ابن أبي عياش فيروز البصريّ، جمهور أهل العلم على تضعيفه بل قال فيه الإمام أحمد والنسائي والدارقطني:"متروك الحديث".
وفي الباب عن جابر بن عبد اللَّه، مثله.
رواه أبو يعلى (1867) عن عبيد اللَّه بن معاذ قال: ذكر أبي، عن يوسف بن محمد بن المنكدر، عن أبيه، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه ابن عدي في"الكامل" (7/ 2613) وقال: قال عبيد اللَّه: ولم أسمعه من أبي.
وقال: سمعت ابن حماد يقول: يوسف بن محمد بن المنكدر متروك الحديث، أظنّه ذكره عن النسائيّ. انتهى
قلت: يوسف بن محمد بن المنكدر هذا أكثر أهل العلم على تضعيفه، وكان أبو زرعة حسن الرأي فيه فقال: صالح، وهو كما قال، ولكنه غفل عن حفظ الحديث فضُعِّف لذلك، كما أنّ في الاسناد انقطاعًا، فإن عبيد اللَّه بن معاذ يقول: لم أسمعه من أبي.
وفي الباب أيضًا عن ابن عمر. رواه الطبرانيّ في الكبير (12/ 423)، وفيه الجارود بن يزيد متهم بالكذب، وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (10/ 169).
وعن علي بن أبي طالب، وفيه يحيى بن عنبسة وهو ضعيف.
ومن طريقه أخرجه الدارقطني في الغرائب والأفراد، إليه عزاه المتقي الهندي في كنز العمال (2/ 87).
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ্ দয়ালু, লজ্জাশীল এবং মহান দাতা। তিনি তাঁর বান্দার সামনে লজ্জিত হন যে, সে তাঁর দিকে তার দু’হাত উঠাবে, অতঃপর তিনি তাতে কোনো কল্যাণ রাখবেন না।
385 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال:"لا أحد أغير من اللَّه، ولذلك حرّم الفواحش ما
ظهر منها وما بطن، ولا شيءَ أحبُّ إليه المدحُ من اللَّه، ولذلك مدح نفسه".
قلت: سمعتَه من عبد اللَّه؟ قال: نعم، قلت: رفعه؟ قال: نعم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4134)، ومسلم في كتاب التوبة (2760: 34) كلاهما من حديث شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه، فذكره، ولفظهما سواء.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ্র চেয়ে অধিক আত্মমর্যাদাশীল (গাইয়ূর) আর কেউ নেই। আর এ কারণেই তিনি প্রকাশ্য ও অপ্রকাশ্য সব ধরনের অশ্লীলতা হারাম করেছেন। আর আল্লাহ্র কাছে প্রশংসার চেয়ে অধিক প্রিয় আর কিছু নেই। এ কারণেই তিনি নিজের প্রশংসা করেছেন। (বর্ণনাকারী) বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি এটি আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ)-এর কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমি বললাম: তিনি কি এটি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম পর্যন্ত) উন্নীত করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
386 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس أحدٌ أحبّ إليه المدح من اللَّه عز وجل، من أجل ذلك مدح نفسه، وليس أحدٌ أغير من اللَّه، من أجل ذلك حرّم الفواحش، وليس أحد أحبّ إليه العذرُ من اللَّه، من أجل ذلك أنزل الكتاب وأرسل الرّسل".
صحيح: رواه مسلم في التوبة (2760: 35) من طرق عن جرير، عن الأعمش، عن مالك بن الحارث، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكر الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লের চেয়ে এমন কেউ নেই যার কাছে প্রশংসা অধিক প্রিয়। এ কারণেই তিনি নিজের প্রশংসা করেছেন। আল্লাহর চেয়ে অধিক আত্মমর্যাদাশীল (গাইয়ূর) আর কেউ নেই। এ কারণেই তিনি অশ্লীল কাজসমূহকে হারাম করেছেন। আর আল্লাহর চেয়ে ক্ষমাপ্রার্থনা (বা ওজর গ্রহণ করা) পছন্দকারী আর কেউ নেই। এ কারণেই তিনি কিতাব নাযিল করেছেন এবং রাসূলদের প্রেরণ করেছেন।"
387 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه يغارُ، وغيرة اللَّه أن يأتي المؤمن ما حرّم اللَّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5223)، ومسلم في كتاب التوبة (2761) كلاهما من طريق يحيى، عن أبي سلمة، أنه سمع أبا هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول، فذكره، واللّفظ للبخاريّ.
وزاد مسلمٌ بعد قوله:"إنّ اللَّه يغار""وإنّ المؤمن يغار".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা ঈর্ষান্বিত হন (গাইরাহ করেন)। আর আল্লাহর ঈর্ষা হলো এই যে, কোনো মু'মিন যেন আল্লাহর নিষিদ্ধ কাজ করে না বসে।"
