হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3708)


3708 - عن * *




৩৭০৮ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3709)


3709 - عن هانئ مولي عثمان قال: كان عثمان بن عفّان إذا وقف على قَبْرٍ يبكي حتّى يَبُلَّ لحيتُه، فقيل له: تذكر الجنّة والنار ولا تبكي، وتبكي من هذا؟ قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن القبر أولُ منازل الآخرة، فإن نجا منه مما بعده أيسر منه، وإن لم ينجُ منه مما بعده أشد منه" قال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما رأيت منظرًا قط إِلَّا والقبر أفظع منه.

حسن: رواه الترمذيّ (2308)، وابن ماجة (4267) كلاهما من حديث يحيى بن معين، قال: حَدَّثَنَا هشام بن يوسف، عن عبد الله بن بَحير، عن هانئ مولي عثمان قال: فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن غريب لا نعرفه إِلَّا من حديث هشام بن يوسف".

وأخرجه الحاكم (1/ 371) وقد صحَّح الإسناد مثله قبله. وتعقبه الذّهبيّ فقال:"ابن بَحير ليس بالعمدة، ومنهم من يقويه، وهانئ روى عنه جماعة، ولا ذكر له في الكتب الستة".

قلت: عبد الله بن بحير هو ابن رَيْسان -بفتح الراء وسكون الياء- المرادي أبو وائل القاص اليماني الصنعانيّ، قال يحيى بن معين: ثقة.

وقال عليّ بن المديني: سمعت هشام بن يوسف - وسئل عن عبد الله بن بَحير القاص الذي روي عن هانئ مولي عثمان فقال:"كان يُتقن ما سمع". وذكره ابن حبَّان في"الثقات" (8/ 331).

وقال في"المجروحين": أبو وائل القاص اسمه عبد الله بن بَحير الصنعانيّ، وليس هو عبد الله بن بحير بن رَيسان ذاك ثقة، وهذا يروي عن عروة بن محمد وعبد الرحمن بن يزيد الصنعاني العجائب كأنّها معلولة، لا يجوز الاحتجاج به. فجعل ابن حبَّان رجلين أحدهما ثقة، والآخر ضعيف، والراوي هنا عبد الله بن بحير بن رَيسان هو الثقة.

وأمّا هانئ مولي عثمان فهو أبو سعيد البربري قال فيه النسائيّ: ليس به بأس، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وقال الذهبي في"الكاشف":"وُثق".

فهو حسن الحديث، وقد روى له أبو داود والتِّرمذي وابن ماجه، وقد أشار إلى هذا الذهبي.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد مرفوعًا:"إنَّما القبر روضة من رياض الجنّة، أو حفرة من حُفَر النار" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2460) عن محمد بن أحمد -وهو ابن مدُّويه، حَدَّثَنَا القاسم بن الحكم العُرني، حَدَّثَنَا عبيد الله بن الوليد الوصَّافي، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره في سيأتي أطول سيأتي في موضعه.

قال الترمذي: حديث غريب لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه.

قلت: فيه عطية وهو ابن سعد العوفي ضعَّفه النسائيّ، وقال أبو داود: ليس بالذي يعتمد عليه، وفي"التقريب":"صدوق يخطئ كثيرًا كان شيعيًا مدلسًا".

والراوي عنه عبيد الله بن الوليد الوصافي، أهلُ العلم مطبقون على تضعيفه.

وكذلك لا يصح ما رواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (61) من طريق محمد بن إسحاق الصنعاني، ثنا محمد بن عمر الواقدي، أن سلمة بن أخي عمر، عن عمر بن شَبَّة بن أبي كثير الأشجعي، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:"القبر حفرة من حفر جهم، أو روضة من رياض الجنّة" والواقدي متروك.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة، فجلس إلى قبر منها فقال:"ما يأتي على هذا القبر من يوم إِلَّا وهو ينادي بصوت ذلق طلق يا ابن آدم: كيف نَسيتني؟ ألم تعلم أني بيتُ الوحدة، وبيتُ الغربة، وبيتُ الوحشة، وبيتُ الدود، وبيتُ الضِّيق، إِلَّا من وسَّعني الله عليه" ثمّ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"القبر إما روضة من رياض الجنّة، أو حفرة من حفر النار" رواه الطبرانيّ في"الأوسط".

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 46):"وفيه محمد بن أيوب بن سويد وهو ضعيف".

قلت: بل هو رُوي عن أبيه، عن الأوزاعي الأشياء الموضوعة، وكان أبو زرعة يقول: رأيت هذا الشّيخ أدخل في كتاب أبيه أشياء موضوعة بخط طريّ، وكان يحدث بها، انظر:"المجروحين". (1001).




হানী' মাওলা উসমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কোনো কবরের পাশে দাঁড়াতেন, তখন এত কাঁদতেন যে, তাঁর দাড়ি ভিজে যেত। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি জান্নাত ও জাহান্নামের কথা স্মরণ করে কাঁদেন না, অথচ (শুধু) এই কবরের জন্য কাঁদছেন? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'নিশ্চয় কবর হলো আখেরাতের প্রথম মনযিল। যদি কেউ এর থেকে মুক্তি (সফলতা) পায়, তবে এর পরবর্তী ধাপগুলো তার জন্য সহজ হবে। আর যদি এর থেকে মুক্তি না পায়, তবে এর পরবর্তী ধাপগুলো তার জন্য আরও কঠিন হবে।' তিনি (উসমান) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: 'আমি এমন কোনো দৃশ্য দেখিনি, যা কবরের দৃশ্যের চেয়েও ভয়াবহ নয়।'









আল-জামি` আল-কামিল (3710)


3710 - عن أنس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ العبد إذا وضع في قبره وتولَّى عنه أصحابه حتّى إنه ليسمع قرع نعالهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1338)، ومسلم في صفة الجنّة (2870/ 71) كلاهما من حديث يزيد بن زُريع، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك فذكره ولفظهما سواء.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় বান্দাকে যখন তার কবরে রাখা হয় এবং তার সঙ্গীরা তার কাছ থেকে ফিরে যায়, তখন সে তাদের জুতার আওয়াজও শুনতে পায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3711)


3711 - عن البراء بن عازب قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة رجل من الأنصار، فانتهينا إلى القبر، ولم يُلْحدُ فجلس رسول الله صلى الله عليه وسلم وجلسنا حوله كأنما على رؤوسنا الطير، وفي يده عُود ينكتُ به في الأرض، فرفع رأسه فقال:"استعيذوا بالله من عذاب القبر مرتين أو ثلاثًا" زاد في حديث جرير ههنا وقال:
"وإنه ليسمع خفْقَ نعالهم إذا ولَّوا مدبرين حين يقال له: يا هذا من ربَّك؟ وما دينك؟ ومن نبيك؟".

حسن: رواه أبو داود (4753) عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا جرير، ح وحدثنا هناد بن السري، قال: حَدَّثَنَا معاوية، وهذا لفظ هناد -عن الأعمش، عن المنهال، عن زاذان، عن البراء ابن عازب فذكره في حديث طويل. والحديث في زهد هناد بن السري (339) من هذا الوجه.

وإسناده حسن من أجل المنهال وهو ابن عمرو، فإنه"صدوق".




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সঙ্গে জনৈক আনসারী ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, কিন্তু তখনো কবর খনন (বা লাহাদ) করা হয়নি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বসে গেলেন এবং আমরাও তাঁর চারপাশে বসে গেলাম। (আমরা এমন নীরব ছিলাম যে) মনে হচ্ছিল যেন আমাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে। তাঁর হাতে একটি লাঠি ছিল, যা দিয়ে তিনি মাটিতে আঘাত করছিলেন (খোঁটা দিচ্ছিলেন)। অতঃপর তিনি মাথা তুলে বললেন: "তোমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে দু'বার অথবা তিনবার আশ্রয় প্রার্থনা করো।" তিনি আরও বললেন: "নিশ্চয়ই সে (মৃত ব্যক্তি) তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায় যখন তারা পিছন ফিরে চলে যায়। তখন তাকে বলা হয়: 'হে ব্যক্তি, তোমার রব কে? তোমার দীন কী? আর তোমার নবী কে?'"









আল-জামি` আল-কামিল (3712)


3712 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الميت يسمع خفق نعالهم إذا ولَّوا عنه" يعني مدبرين.

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (873) عن محمد بن عبد الله المخرميّ، ثنا وكيع بن الجراح، ثنا سفيان - يعني الثوريّ، عن السُدِّي، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل السدي وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كُريمة -بضم الكاف- الكوفي الأعور الكبير، مختلف فيه فكذَّبه الجوزجاني (أظن لتشيعه) ووثَّقه الإمام أحمد والعجلي، وقال النسائي:"صالح"، وقال ابن عدي:"له أحاديث يرويها عن عدة شيوخ، وهو عندي مستقيم الحديث صدوق، لا بأس به"، وأخرج له مسلم، والخلاصة أنه"صدوق يهم، رمي بالتشيع".

وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (3/ 54) وأرجو أنه لم يهم في هذا الحديث لشواهده.

وبمعناه رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"إذا دُفن الميت سمع خفق نعالهم إذا ولوا عنه منصرفين". رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 87) عن أبي الزنباع روح بن الفرح، ثنا يحيى بن سليمان الجعفي، ثنا محمد بن فُضيل، ثنا مسلم الضبي، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 54):"رجاله ثقات".

قلت: وهو وهم عنه، فإن مسلمًا الضبي وهو ابن كيسان ضعيف باتفاق أهل العلم.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي سعيد أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت يعرف من يحمله، ومن يغسله، ومن يدليه في قبره".

رواه أحمد (10997) عن أبي عامر، حَدَّثَنَا عبد الملك بن حسن الحارثي، حَدَّثَنَا سعيد بن عمرو بن سُلَيم، قال: سمعت رجلًا منا -قال عبد الملك: نسيت اسمه، ولكن اسمه معاوية أو ابن معاوية- يحدث عن أبي سعيد الخدري، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. فقال ابن عمر وهو في المجلس: ممن سمعت هذا؟ قال: عن أبي سعيد. فانطلق ابن عمر إلى أبي سعيد فقال: يا أبا سعيد، ممن سمعت هذا؟ قال: من النَّبِي صلى الله عليه وسلم.

وإسناده ضعيف لإبهام الراوي عن أبي سعيد، وإن كان هو معاوية أو ابن معاوية فلا يعرف من
هو هذا؟ قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 20):"فيه رجل لم أجد من ترجمه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় মৃত ব্যক্তি তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায় যখন তারা তার নিকট থেকে চলে যায় (অর্থাৎ প্রস্থান করে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (3713)


3713 - عن أبي طلحة أن نبي الله صلى الله عليه وسلم أمر يوم بدر بأربعة وعشرين رجلًا من صناديد قريش فقُذِفوا في طَوي من أطواء بدر خَبيث مُخبث، وكان إذا ظهر على قوم أقام بالعرصة ثلاث ليال، فلمّا كان ببدر اليوم الثالث أمر براحلته فشُد عليها رحلُها، ثمّ مشى، واتبعه أصحابُه وقالوا: ما نرى ينطلق إِلَّا لبعض حاجته، حتّى قام على شفة الركي، فجعل يُناديهم بأسمائهم وأسماء آبائهم: يا فلان بن فلان، ويا فلان بن فلان، أيسركم أنكم أطعتم الله ورسولَه؟ فإنا قد وجدنا ما وعدنا ربنا حقًا، فهل وجدتم ما وعد ربكم حقًا.

قال: فقال عمر: يا رسول الله! ما تُكلم من أجساد لا أرواح لها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي نفس محمد بيده ما أنتم بأسمع لما أقول منهم".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976)، ومسلم في الجنّة (2875) كلاهما من حديث رَوح بن عُبادة، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك، عن أبي طلحة فذكر الحديث واللفظ للبخاري.

ولم يذكر مسلم لفظ الحديث وإنما أحال على لفظ حديث أنس بن مالك الآتي.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, আল্লাহ্‌র নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের দিন কুরাইশ নেতাদের চব্বিশ জন লোককে কূপের মধ্যে নিক্ষেপ করার নির্দেশ দিলেন। বদরের কূপগুলোর মধ্যে একটি নোংরা ও দুর্গন্ধময় কূপে তাদের নিক্ষেপ করা হলো। আর তিনি যখন কোনো জাতির উপর বিজয় লাভ করতেন, তখন তিনি ময়দানে তিন রাত অবস্থান করতেন। যখন বদরে তৃতীয় দিন হলো, তখন তিনি তাঁর বাহন প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন এবং সেটির পিঠে সওয়ার বসানো হলো। অতঃপর তিনি হেঁটে চললেন এবং তাঁর সাহাবাগণ তাঁকে অনুসরণ করলেন। তাঁরা বলাবলি করতে লাগলেন: আমরা তো মনে করি না যে, তিনি তাঁর কোনো ব্যক্তিগত প্রয়োজন ছাড়া অন্য কোনো কারণে চলেছেন। অবশেষে তিনি কূয়ার কিনারে এসে দাঁড়ালেন এবং তাদেরকে তাদের নাম ধরে ও তাদের পিতার নাম ধরে ডাকতে লাগলেন: হে অমুকের পুত্র অমুক! হে অমুকের পুত্র অমুক! তোমাদের কি ভালো লাগতো যদি তোমরা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করতে? আমরা তো আমাদের রবের পক্ষ থেকে আমাদের প্রতিশ্রুত ফল সত্য পেয়েছি, তোমরা কি তোমাদের রবের পক্ষ থেকে প্রতিশ্রুত ফল সত্য পেয়েছো?

আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আপনি এমন দেহগুলোর সাথে কথা বলছেন, যার মধ্যে কোনো রূহ (আত্মা) নেই। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সেই সত্তার শপথ, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, আমি যা বলছি তা তাদের চেয়ে তোমরা বেশি শুনতে পাচ্ছ না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3714)


3714 - عن ابن عمر قال: اطلع النَّبِي صلى الله عليه وسلم على أهل القّليب فقال:"وجدتم ما وعد ربّكم حقًّا" فقيل له: تدعو أمواتا؟ فقال:"ما أنتم بأسمع منهم، ولكن لا يجيبون".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1370) عن عليّ بن عبد الله، حَدَّثَنَا يعقوب بن إبراهيم، حَدَّثَنِي أبي، عن صالح، حَدَّثَنِي نافع، عن ابن عمر فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ক্বালিবের (গণকবরের) লোকদের দিকে ঝুঁকে দেখলেন এবং বললেন: "তোমাদের প্রতিপালক তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য পেয়েছ?" তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি মৃতদেরকে ডাকছেন? তিনি বললেন: "তোমরা তাদের চেয়ে বেশি শুনতে পাও না, কিন্তু তারা উত্তর দিতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3715)


3715 - عن عمر بن الخطّاب قال: ثم أمر النَّبِي صلى الله عليه وسلم فطرحوا في بئر، فانطلق إليهم فقال:"يا فلان بن فلان، يا فلان بن فلان، هل وجدتم ما وعدكم الله ورسوله حقًّا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني الله حقًّا" قلت: يا رسول الله! كيف تكلم أجسادا لا أرواح فيها؟ قال:"ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، غير أنهم لا يستطيعون أن يردوا علي شيئًا".

صحيح: رواه مسلم في الجنّة (2873) من طرق، عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس ابن مالك، عن عمر بن الخطّاب فذكره في قصة مصارع أهل بدر.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নির্দেশ দিলেন, ফলে তাদেরকে (বদর যুদ্ধে নিহত কাফিরদের) একটি কূপে নিক্ষেপ করা হলো। অতঃপর তিনি তাদের কাছে গেলেন এবং বললেন: “হে অমুকের পুত্র অমুক! হে অমুকের পুত্র অমুক! আল্লাহ ও তাঁর রাসূল তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য বলে পেয়েছো? আমি তো আল্লাহ আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছেন, তা সত্য বলে পেয়েছি।” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কীভাবে এমন দেহের সাথে কথা বলছেন, যার মধ্যে আত্মা নেই? তিনি বললেন: “আমি যা বলছি, তোমরা তাদের চেয়ে বেশি শ্রবণকারী নও, তবে তারা আমাকে কোনো কিছুর জবাব দিতে সক্ষম নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3716)


3716 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك قتلى بدر ثلاثًا ثم أتاهم فقام عليهم
فناداهم فقال:"يا أبا جهل بن هشام، يا أمية بن خلف، يا عتبة بن ربيعة، يا شيبة ابن ربيعة، أليس قد وجدتم ما وعد ربّكم حقًا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني ربي حقًا"، فسمع عمر قول النَّبِي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله! كيف يسمعوا، وأنَّى يُجيبوا وقد جيَّفوا؟ قال النَّبِي صلى الله عليه وسلم: والذي نفسي بيده ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، ولكنهم لا يقدرون أن يجيبوا" ثم أمر بهم فسُحبوا فأُلقوا في قليب بدرٍ.

صحيح: رواه مسلم في الجنة (2874) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس ابن مالك فذكره.

وأما ما رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على أهل القَليب فقال: يا أهل القَليب! هل وجدتم ما وعد ربكم حقًا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني ربي حقًّا"، قالوا: يا رسول الله هل يسمعون؟ قال: ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، لكنهم اليوم لا يجيبون" فهو ضعيف.

رواه الطبرانيّ في"الكبير" (10/ 198) من طريق أشعث بن سوار، عن أبي إسحاق، عن عمرو ابن ميمون، عن عبد الله فذكره. وأشعث بن سوار الكندي وإن كان رواه مسلم في المتابعات فالأكثر على تضعيفه، ولذا أطلق عليه الحافظ في"التقريب" لفظ"ضعيف" وتناقض في"الفتح" (7/ 303) فقال:"وللطبراني من حديث ابن مسعود مثله بإسناد صحيح".

وقول الحافظ الهيثمي في"المجمع" (6/ 91):"ورجاله رجال الصحيح" صحيح، لأن أشعث ابن سوار من رجال مسلم كما سبق.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن سيدان، عن أبيه، قال: أشرف النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على أهل القَليب، فقال:"يا أهل القليب! هل وجدتم ما وعد ربّكم حقًا؟" فقالوا: يا رسول الله! وهل يسمعون؟ قال:"يسمعون كما تسمعون، ولكن لا يجيبون" رواه الطبراني في"الكبير" (7/ 197).

قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 91):"وعبد الله بن سِيدَان مجهول".

قلت: وهو كما قال، وقد جهَّله ابن عدي واللالكائي وغيرهما، وقال البخاريّ:"لا يتابع في حديثه". وله الترجمة في"الكامل" و"الميزان" وهو عبد الله بن سِيدان المطرودِي.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের নিহতদের (লাশ) তিন দিন পর্যন্ত রেখে দিলেন। অতঃপর তিনি তাদের কাছে আসলেন এবং তাদের সামনে দাঁড়িয়ে তাদের ডাকলেন এবং বললেন: "হে আবূ জাহল ইবনু হিশাম! হে উমাইয়া ইবনু খালফ! হে উতবা ইবনু রাবি'আহ! হে শায়বাহ ইবনু রাবি'আহ! তোমাদের রব তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তা কি তোমরা সত্য পাওনি? নিশ্চয় আমিও আমার রব আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছেন, তা সত্য পেয়েছি।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা শুনলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তারা কিভাবে শুনতে পাবে এবং কিভাবেই বা জবাব দেবে, অথচ তারা তো পচে গলে গিয়েছে?" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তোমরা আমার কথা তাদের চেয়ে বেশি শোনো না, তবে তারা জবাব দিতে সক্ষম নয়।" অতঃপর তিনি তাদের বিষয়ে আদেশ দিলেন। তখন তাদের টেনে নিয়ে গিয়ে বদরের কূপে নিক্ষেপ করা হলো।

[দ্রষ্টব্য: এই বর্ণনাটি সহীহ। এটি মুসলিম তার জান্নাত অধ্যায়ে (২৮৭৪) হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি সাবিত আল-বুনানী, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন। নিচে অন্যান্য দুর্বল বর্ণনা ও তার বিশ্লেষণ রয়েছে।]









আল-জামি` আল-কামিল (3717)


3717 - عن عروة بن الزبير قال: ذكر عند عائشة أن ابن عمر برفع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن الميت يُعذَّب في قبره ببكاء أهله عليه" فقالت: وَهِل، إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنه لَيُعذَّب بخطيئته وذنبه، وإن أهله ليكون عليه الآن" وذلك مثل قوله: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على القليب يوم بدر، وفيه قتلي بدر من المشركين فقال لهم ما قال:"إنهم يسمعون ما أقول" وقد وَهِل، إنّما قال:"إنَّهم الآن ليعلمون أن ما كنت أقول لهم
حق" ثمّ قرأت: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [النمل: 80] {وَمَا أَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ} [فاطر: 22] يقول: حين تبؤوا مقاعدهم من النار.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (3978)، ومسلم في الجنائز (932) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه فذكره.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরুয়াহ ইবনুয-যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো যে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন: ‘নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে কবরে শাস্তি দেওয়া হয়।’ তখন তিনি (আয়েশা) বললেন: তিনি ভুল করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এতটুকুই বলেছিলেন: ‘নিশ্চয়ই তাকে (কাফিরকে) তার পাপ ও অপরাধের কারণে শাস্তি দেওয়া হয়, আর এই সময় তার পরিবার তার জন্য কাঁদছে।’ আর এটা তার (ইবনু উমরের) সেই বক্তব্যের মতো, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধের দিন ক্বালিবের (কূয়ার) পাশে দাঁড়িয়েছিলেন, যেখানে মুশরিকদের মধ্য থেকে নিহতদের লাশ ছিল। তখন তিনি তাদেরকে কিছু কথা বলেছিলেন (যেমনটি ইবনু উমর বর্ণনা করেন): ‘নিশ্চয়ই তারা আমি যা বলছি তা শুনতে পাচ্ছে।’ কিন্তু তিনি ভুল করেছেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এতটুকুই বলেছিলেন: ‘নিশ্চয়ই তারা এখন জানতে পারছে যে, আমি তাদের কাছে যা বলতাম তা সত্য ছিল।’ এরপর তিনি এই আয়াতগুলো পাঠ করলেন: **“নিশ্চয়ই আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারবেন না।”** (সূরা নমল: ৮০) এবং **“আর আপনি কবরে শায়িতদেরকে শোনাতে সক্ষম নন।”** (সূরা ফাতির: ২২)। তিনি (আয়েশা) বললেন: (এই আয়াতগুলো তখন প্রযোজ্য) যখন তারা জাহান্নামের মধ্যে তাদের স্থান তৈরি করে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3718)


3718 - عن ابن عمر قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على القليب يوم بدر فقال:"يا فلان يا فلان! هل وجدتم ما وعدكم ربّكم حقًّا؟ أما والله! إنهم الآن يسمعون كلامي" قال يحيى: فقالت عائشة: غفر الله لأبي عبد الرحمن، إنه وَهِل، إنّما قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"والله! إنهم ليعلمون الآن أن الذي كنت أقول لهم حق" وإن الله تعالى يقول: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [النمل: 80] {وَمَا أَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ} [فاطر: 22].

حسن: رواه الإمام أحمد (4864) عن يزيد، أخبرنا محمد - يعني ابن عمرو، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، أنه حدثهم عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو فإنه حسن الحديث.



فقه الحديث:

إن ما فهمتْه عائشة المخالفة بين الآية والحديث هو الذي فهمه أيضًا بعض الصّحابة، لأنهم تعجبوا من قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"يا فلان بن فلان، يا فلان بن فلان -وجيّفوا- قد وجدتم ما وعدكم ربكم حقًّا؟" فأجاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بأنهم يسمعون الآن. وهذا الحديث يدل على أنه حصل خرق العادة في هذه الحالة.

ولذا ثبت رجوع عائشة إلى قول هؤلاء لما رواه ابن إسحاق في المغازي من رواية يونس بن بكير بإسناد جيد عن عائشة مثل حديث أبي طلحة وفيه:"ما أنتم بأسمع لما أقول منهم" أخرجه أحمد بإسناد حسن كما قال الحافظ في"الفتح" (7/ 304).

قلت: وأما ما رواه الإمام أحمد (2572) فهو من طريق هُشيم، قال: أخبرنا مغيرة، عن إبراهيم، عن عائشة أنها قالت: لما أمر النَّبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر بأولئك الرهْطِ، فأُلقوا في الطوِيّ: عتبة وأبو جهل وأصحابه، وقف عليهم فقال:"جزاكم الله شرًّا من قوم نبي، ما كان أسوأَ الطرْدِ وأشد التكذيب" قالوا: يا رسول الله! كيف تكلم قومًا قد جيَّفوا؟ فقال:"ما أنتم بأفهم لقولي منهم، أو لهم أفهم لقولي منكم".

وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 90):"رواه أحمد، ورجاله ثقات إِلَّا أن إبراهيم لم يسمع من عائشة، ولكنه دخل عليها" والله تعالى أعلم.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের দিন কূপের (ক্বালিবের) কাছে দাঁড়িয়ে বললেন: "হে অমুক, হে অমুক! তোমাদের রব তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য বলে পেয়েছো? আল্লাহর কসম! তারা এখন আমার কথা শুনতে পাচ্ছে।" ইয়াহইয়া বলেন, তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আবু আবদির রহমানের (ইবনে উমারের) ভুল ক্ষমা করুন, তিনি ভুল করেছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শুধু এতটুকুই বলেছিলেন: "আল্লাহর কসম! আমি তাদের কাছে যা বলতাম, তারা এখন তা সত্য বলে জানতে পারছে।" কেননা আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "নিশ্চয়ই আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারবেন না" [সূরা নামল: ৮০], "আর আপনি কবরবাসীদেরকে শোনাতে পারবেন না।" [সূরা ফাতির: ২২]।









আল-জামি` আল-কামিল (3719)


3719 - عن أبي أيوب قال: خرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقد وجبتْ الشّمس فسمع صوتًا فقال:"يهود تُعذبُ في قبورها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1375)، ومسلم في صفة الجنّة والنار (2869) كلاهما من حديث شعبة، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، عن البراء بن عازب، عن أبي أيوب فذكر الحديث. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه وفيه:"خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ما غربت الشّمس".

وقوله:"وجبت الشمس" أي سقطت، والمراد غروبها.




আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন যখন সূর্য অস্তমিত হয়েছিল। তখন তিনি একটি শব্দ শুনতে পেলেন এবং বললেন: "ইহুদীদেরকে তাদের কবরসমূহে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3720)


3720 - عن أسماء بنت أبي بكر رضي الله عنهما أنها قالت: أتيتُ عائشة رضي الله عنها، زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، حين خسفتِ الشّمس، فإذا الناس قيام يصلُّون، وإذا هي قائمة تصَلِّي، فقلتُ: ما للناس؟ فأشارتْ بيدها إلى السماء، وقالت: سبحان الله، فقلت: آيَةٌ؟ فأشارت: أي نعم، قالتْ: فقُمْتُ حتى تجلَّاني الغَشْيُ، فجعلتُ أصُبُّ فوق رأسي الماء، فلمّا انصرف رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حمدَ الله وأثنى عليه، ثم قال:"ما من شيء كنتُ لم أرَه إِلَّا قد رأيتُه في مقامي هذا، حتّى الجنَّة والنار، ولقد أوحيَ إليَّ أَنَّكُمْ تُفْتَون في القُبُور مِثْل -أو قريبًا من- فِتْنَةٍ الدَّجَّال"، لا أدري أيَّتَهُما قالتْ أسماء،"يُؤتَي أحدُكم فيقال له: ما عِلْمُكَ بهذا الرّجُلِ؟ فأمَّا المؤمنُ، أو المُوقِنُ"، لا أدري أيَّ ذلك قالت أسماءُ،"فيقول: محمدٌ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، جاءنا بالبينات والهُدى، فأجبنا وآمنَّا واتبعنَا، فيقال له: نمْ صالحًا، فقد علمنا إن كنت
لموقِنًا، وأمّا المنافق، أو المرتاب"، لا أدري أيتهما قالت أسماء -"فيقول: لا أدري، سمعتُ الناس يقولون شيْئًا فقلتُه".

متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (4) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر فذكرته.

ورواه البخاري في الوضوء (184) وفي الكسوف (1053) من طريقين عن مالك بإسناده.

ورواه الشيخان - البخاري في العلم (86)، ومسلم في الكسوف (905) من وجهين آخرين عن هشام بإسناده نحوه.




আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন সূর্যগ্রহণ হলো, তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন দেখি লোকেরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছে এবং তিনিও দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। আমি বললাম, লোকদের কী হয়েছে? তিনি হাত দিয়ে আকাশের দিকে ইঙ্গিত করলেন এবং বললেন, সুবহানাল্লাহ! আমি বললাম, (এটি কি) কোনো নিদর্শন? তিনি ইশারায় বললেন, হ্যাঁ। তিনি (আসমা) বলেন, আমি সালাতে দাঁড়ালাম, এমনকি আমি দুর্বলতা অনুভব করতে লাগলাম। তখন আমি আমার মাথার ওপর পানি ঢালতে শুরু করলাম।

যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: “এমন কোনো জিনিস নেই যা আমি এর আগে দেখিনি, কিন্তু আমি আমার এই সালাতের স্থানে দাঁড়িয়ে তা দেখেছি, এমনকি জান্নাত ও জাহান্নামও। আর আমার নিকট ওহী প্রেরণ করা হয়েছে যে, তোমাদেরকে কবরের মধ্যে দাজ্জালের ফিতনার মতোই – অথবা তার কাছাকাছি – ফিতনার সম্মুখীন করা হবে।” (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন)।

“তোমাদের প্রত্যেকের কাছে (ফিরিশতা) এসে জিজ্ঞেস করবে: এই লোক সম্পর্কে তোমার জ্ঞান কী? তখন মু'মিন বা ইয়াকীনকারী (দৃঢ় বিশ্বাসী) ব্যক্তি – (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন) – সে বলবে: ইনি হলেন মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি আমাদের নিকট স্পষ্ট নিদর্শনাবলী ও হিদায়াত নিয়ে এসেছিলেন। অতঃপর আমরা সাড়া দিয়েছি, ঈমান এনেছি এবং তাঁর অনুসরণ করেছি। তখন তাকে বলা হবে: তুমি শান্তিতে ঘুমিয়ে থাকো। আমরা জানতাম যে তুমি অবশ্যই ইয়াকীনকারী (দৃঢ় বিশ্বাসী) ছিলে। আর মুনাফিক বা সন্দেহ পোষণকারী ব্যক্তি – (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন) – সে বলবে: আমি জানি না, আমি লোকদেরকে কিছু বলতে শুনেছিলাম, তাই আমিও তাই বলেছিলাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (3721)


3721 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم خطيبًا فذكر فتنة القبر التي يفتتِن فيها المرأ، فلمّا ذكر ذلك ضَجَّ المسلمون ضجَّةً.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1373) عن يحيى بن سليمان، حَدَّثَنَا ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزُّبير، أنه سمع أسماء بنت أبي بكر فذكرته.




আসমা বিন্ত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে খুৎবা দিচ্ছিলেন। তিনি তখন কবরের সেই ফিতনা সম্পর্কে আলোচনা করলেন, যাতে মানুষকে পরীক্ষা করা হবে। যখন তিনি এই আলোচনা করলেন, তখন মুসলমানগণ (ভয়ে) উচ্চস্বরে চিৎকার করে উঠলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3722)


3722 - عن أنس بن مالك أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لولا أن لا تدافَنُوا لدعوتُ الله أن يُسمعكم من عذاب القبر".

صحيح: رواه مسلم في كتاب الجنة (2868) من طرق عن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن قتادة، عن أنس فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি এমন না হতো যে তোমরা (ভয়ে) মৃতদের দাফন করা বন্ধ করে দেবে, তবে আমি আল্লাহর কাছে দুআ করতাম যেন তিনি তোমাদেরকে কবরের শাস্তি শোনান।"









আল-জামি` আল-কামিল (3723)


3723 - عن عائشة قالت: دخل عليَّ عجوزان من عُجْز يهود المدينة فقالتا لي: إن أهل القبور يعذَّبون في قبورهم، فكذبتُهما، ولم أُنْعِم أن أُصدقهما، فخرجتا، ودخل عليَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقلت له: يا رسول الله! إن عجوزين وذكرتُ له، فقال:"صدقَتَا إنهم يعذبون عذبًا تسمعه البهائم كلُّها" فما رأيتُه بعد في صلاة إِلَّا تعوَّذَ من عذاب القبر.

متفق عليه: رواه البخاري في الدّعوات (6366)، ومسلم في المساجد (586/ 125) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনার ইহুদিদের মধ্য থেকে দুজন বৃদ্ধা আমার নিকট আগমন করল এবং তারা আমাকে বলল: কবরে অবশ্যই কবরবাসীদেরকে শাস্তি দেওয়া হয়। আমি তাদের কথা মিথ্যা মনে করলাম এবং তাদের কথা সত্য বলে মেনে নিতে পারলাম না। এরপর তারা দুজন চলে গেল। অতঃপর আমার নিকট নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন। আমি তাঁকে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! দুজন বৃদ্ধা... (এই বলে আমি তাদের কথা তাঁর কাছে উল্লেখ করলাম)। তখন তিনি বললেন: "তারা দুজনেই সত্য বলেছে। অবশ্যই তাদেরকে এমনভাবে শাস্তি দেওয়া হয় যা সমস্ত প্রাণী শুনতে পায়।" এরপর থেকে আমি তাঁকে যখনই নামায পড়তে দেখেছি, তিনি অবশ্যই কবরের আযাব থেকে আল্লাহর নিকট পানাহ চাইতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3724)


3724 - عن عائشة قالت: دخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي امرأة من اليهود وهي تقول: هل شعرت أنكم تُفْتنون في القبور، قالت: فارتاع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"إنما تُفْتَنُ يهود" قالت عائشة: فلبثنا ليالي، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هل شعرتِ أنه أُوحي إليَّ أنكم تُفْتَنون في القبور؟" قالت عائشة: فسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد يستعيذُ من عذاب القبر.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (584) من طرق عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، قال:
حَدَّثَنِي عروة بن الزُّبير، أن عائشة قالت فذكرته.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট প্রবেশ করলেন, তখন আমার কাছে একজন ইয়াহুদী মহিলা উপস্থিত ছিল। সে বলছিল, "তোমরা কি অবগত আছো যে তোমাদের কবরের মধ্যে পরীক্ষা করা হবে?" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিচলিত হলেন এবং বললেন, "কেবলমাত্র ইয়াহুদীদেরই পরীক্ষা করা হয়।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর আমরা কয়েক রাত কাটালাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি জানো যে, আমার নিকট এই মর্মে ওহী নাযিল হয়েছে যে, তোমাদেরকেও (মুসলমানদের) কবরের মধ্যে পরীক্ষা করা হবে?" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কবরের আযাব থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় চাইতে শুনতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3725)


3725 - عن عائشة أن يهودية كانت تخدمها، فلا تصنع عائشة إليها شيئًا من المعروف إِلَّا قالَتْ لها اليهودية: وقاكِ الله عذابَ القبر. قالت: فدخل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عليَّ، فقلتُ: يا رسولَ الله! ، هل للقبر عذابٌ قبلَ يوم القيامة؟ قال:"لا، وَعَمَّ ذاكِ؟" قالت: هذه اليهودية لا نصنعُ إليها من المعروف شيئًا إِلَّا قالت: وقاكِ الله عذابَ القبر، قال:"كذَبَتْ يهُودُ، وهم عَلى الله عز وجل أكذبُ، لا عذاب دون يَوْمِ القيامة قالت: ثم مكثَ بعد ذاك ما شاء الله أن يمكث، فخرج ذاتَ يوم نصفَ النهار مشتملًا بثوبه، محمَّرة عيناه، وهو ينادي بأعلى صوته:"أيُّها الناسُ! ، أظَلَّتْكُمُ الفِتَنُ كقطِعِ الليل المُظْلِم، أيُّها الناسُ، لو تعلمونَ ما أعلمُ، بكَيْتُم كثيرًا، وضحِكْتُمْ قليلًا، أَيُّها النَّاسُ! ، اسْتَعِيذُوا بالله من عذاب القبر، فإنَّ عذاب القَبْر حَقٌّ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (24520) عن هاشم، قال: حَدَّثَنَا إسحاق بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا سعيد، عن عائشة فذكرته.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 54 - 55) وقال:"هو في الصَّحيح باختصار .. رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، إسحاق بن سعيد هو: ابن عمرو بن العاص بن سعيد بن العاص الأموي الكوفيّ، وأبوه سعيد بن عمرو المدني ثمّ الدّمشقي من رجال الشيخين، ولا منافاة بين هذا الحديث وبين الأحاديث السابقة، فإنه صلى الله عليه وسلم أنكر عذاب القبر أولًا، ثمّ أعلم به، فأَعلم به أصحابه.

وفي الباب عن ابن مسعود مرفوعًا:"إنَّ الموتى ليعذبون في قبورهم حتّى إن البهائم لتسمع أصواتهم".

رواه الطبراني في"الكبير" (10/ 247) عن محمد بن عثمان بن أبي شيبة، ثنا يعلى بن المنهال السّكوني، ثنا إسحاق بن منصور، ثنا أبو بكر بن عَيَّاش، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله ابن مسعود فذكره. قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 56):"إسناده حسن".

قلت: في الإسناد يعلى بن المنهال لم أعرف من هو؟ وإن كان ممن ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 305) فهو"مجهول" وفي الإسناد أيضًا أبو بكر بن عَيَّاش فإنه كبِر فاختلط عليه.

وأمّا ما رُوي عن عائشة مرفوعًا:"يُرسل على الكافر حيَّتان، واحدة من قبل رأسه، وأُخرى من قِبل رجليه، تُقْرضانه قَرْضًا، كلما فرغتا عادتا إلى يوم القيامة" فهو ضعيف.

رواه أحمد (25189) عن رَوح، حَدَّثَنَا حمّاد، عن عليّ بن زيد، عن أم محمد، عن عائشة فذكرته.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 55) وقال:"رواه أحمد وإسناده حسن".
قلت: ليس بحسن، فإن أم محمد قيل اسمها: أُمينة، وقيل: أمية، وهي زوجة زيد بن جُدعان، تفرّد بالرواية عنها عليّ بن زيد، وهي لا تُعرف، وعلي بن زيد بن جُدعان أهل العلم مطبقون على تضعيفه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে একজন ইহুদী নারী খেদমত করতো। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার প্রতি যখনই কোনো ভালো কাজ করতেন, ইহুদী নারীটি তাকে বলতো: "আল্লাহ আপনাকে কবরের আযাব থেকে রক্ষা করুন।" তিনি (আয়েশা) বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট প্রবেশ করলেন। আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! কিয়ামতের দিনের পূর্বেও কি কবরের আযাব আছে?" তিনি বললেন: "না। আর এ কথা কেন জিজ্ঞাসা করছো?" তিনি (আয়েশা) বললেন: "এই ইহুদী নারীটির প্রতি আমরা যখনই কোনো ভালো কাজ করি, সে কেবলই বলে: আল্লাহ আপনাকে কবরের আযাব থেকে রক্ষা করুন।" তিনি বললেন: "ইহুদিরা মিথ্যা বলেছে, আর তারা মহান আল্লাহর উপর মিথ্যা আরোপের ক্ষেত্রে সবচেয়ে মিথ্যাবাদী। কিয়ামত দিবসের পূর্বে কোনো আযাব নেই।" তিনি (আয়েশা) বলেন, এরপর আল্লাহ যতদিন চাইলেন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ততদিন অবস্থান করলেন। অতঃপর একদিন দুপুরে তিনি তাঁর চাদর জড়ানো অবস্থায় বের হলেন, তাঁর চোখ দুটি লাল হয়ে গিয়েছিল। তিনি উচ্চস্বরে ডেকে বলছিলেন: "হে মানবজাতি! ঘোর অন্ধকার রাতের অংশের মতো ফিতনা তোমাদের গ্রাস করেছে। হে মানবজাতি! আমি যা জানি তোমরা যদি তা জানতে, তবে তোমরা অবশ্যই কম হাসতে এবং বেশি কাঁদতে। হে মানবজাতি! তোমরা আল্লাহর কাছে কবরের আযাব থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো। নিশ্চয়ই কবরের আযাব সত্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (3726)


3726 - عن زيد بن ثابت قال: بينما النَّبِي صلى الله عليه وسلم في حائط لبني النجار على بغلة له، ونحن معه، إذ حادثْ به، فكادتْ تُلقيه، وإذا أَقْبرٌ ستةٌ أو خمسةٌ أو أربعةٌ، (كذا كان يقول الجُريري) فقال:"من يعرف أصحاب هذه الأقبر؟" فقال رجل: أنا. قال:"فمتى مات هؤلاء؟" قال: ماتوا في الإشراك، فقال: إن هذه الأمة تُبلي في قبورها، فلولا أن لا تدافنوا لدعوتُ الله أن يُسمعكم من عذاب القبر الذي أسمع منه" ثمّ أقبل علينا بوجهه فقال:"تعوذُوا بالله من عذاب النّار" قالوا: نعوذ بالله من عذاب النّار، فقال:"تعوذوا بالله من عذاب القبر" قالوا: نعوذ بالله من عذاب القبر، قال:"تعوذوا بالله من الفتن ما ظهر منها وما بطن" قالوا: نعوذ بالله من الفتن، ما ظهر منها وما بطن، قال:"تعوذوا بالله من فتنة الدجال" قالوا: نعوذ بالله من فتنة الدجال.

صحيح: رواه مسلم في كتاب الجنّة (2867) من طرق، عن سعيد الجُريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ، عن زيد بن ثابت.

قال: أبو سعيد: ولم أشهده من النَّبِي صلى الله عليه وسلم، ولكن حَدَّثنيه زيد بن ثابت قال: فذكره.




যায়দ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু নাজ্জারের একটি বাগানে তাঁর খচ্চরের পিঠে আরোহণ করে ছিলেন এবং আমরা তাঁর সঙ্গে ছিলাম। হঠাৎ সেটি এমনভাবে লাফিয়ে উঠল যে, তাঁকে প্রায় ফেলে দেওয়ার উপক্রম হয়েছিল। সেখানে ছয়টি কিংবা পাঁচটি অথবা চারটি কবর ছিল (জুরাইরী এমন বলতেন)। তিনি বললেন: "এই কবরগুলোর অধিবাসীদের মধ্যে কে জানে?" একজন লোক বললেন: "আমি।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এরা কখন মারা গেছে?" লোকটি বললেন: "তারা মুশরিক অবস্থায় মারা গেছে।" তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই উম্মতের উপর তাদের কবরসমূহে (আযাব) দেওয়া হচ্ছে। যদি তোমরা একে অপরের মৃতদেহ দাফন করা ছেড়ে না দিতে, তবে আমি আল্লাহর কাছে দু‘আ করতাম যেন তোমাদেরকে কবরের সেই আযাব শোনানো হয়, যা আমি শুনতে পাচ্ছি।" অতঃপর তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "তোমরা জাহান্নামের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।" তারা বললেন: "আমরা জাহান্নামের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।" তিনি বললেন: "তোমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।" তারা বললেন: "আমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।" তিনি বললেন: "তোমরা প্রকাশ্য ও গোপন সকল ফিতনা (বিপদ, পরীক্ষা) থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।" তারা বললেন: "আমরা প্রকাশ্য ও গোপন সকল ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।" তিনি বললেন: "তোমরা দাজ্জালের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।" তারা বললেন: "আমরা দাজ্জালের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3727)


3727 - عن أنس بن مالك: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل نخلًا لبني النجار، فسمع صوتًا ففزع، فقال:"من أصحابُ هذه القبور؟" قالوا: يا نبيَّ الله! ، ناسٌ ماتوا في الجاهليّة، قال:"تعوَّذوا بالله من عذاب القبر، وعذاب النّار، وفتنة الدَّجال" قالوا: وما ذاك يا رسول الله؟ قال:"إنَّ هذه الأمة تُبْتَلى في قُبُورِها، فإنَّ المؤمن إذا وُضِعَ في قبره، أتاه مَلَكٌ فَسألَهُ: ما كنت تَعبُدُ؟ فإنِ اللهُ هدَاهُ قال: كنتُ أعبد الله، فيُقالُ له: ما كنتَ تقولُ في هذا الرّجل؟ قال: فيقولُ: هو عبد الله ورسولُه، قال: فما يُسأَلُ عن شيءٍ غيرَها، فيُنْطَلَقُ به إلى بيتٍ كانَ له في النّار، فيُقال له: هذا بَيْتُكَ كانَ في النّار، ولكِنَّ الله عَصَمَكَ ورَحِمَكَ، فأَبدَلَكَ به بيتًا في الجَنَّةِ، فيقولُ: دَعُوني حتَّى أذهبَ فأُبَشِّرَ أَهلِي، فيُقالُ له: اسْكُنْ. وإن الكافرَ إذا وُضِعَ في قَبْره، أتاهُ مَلَكٌ فيقولُ له: ما كنتَ تقولُ في هذا الرّجل؟ فيقولُ: كنتُ أقولُ ما يَقُولُ الناسُ، فيضربه بمطراق من حديد بين أُذُنيه، فيصيح صيحة فيسمعها الخلق غير الثقلين".
صحيح: رواه أحمد (13447) عن عبد الوهّاب، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس فذكره.

ومن هذا الطريق رواه البيهقيّ في إثبات عذاب القبر (19) وأحال إلى رواية أحمد.

ورواه مسلم في صفة الجنّة (2870/ 72) عن عمرو بن زرارة، عن عبد الوهّاب (وهو ابن عطاء) بإسناده مختصرًا ولم يذكر فيه قصة الجاهلية.

وعبد الوهّاب هو: ابن عطاء الخفاف وهو إن كان من رواة مسلم فقد تكلم فيه البخاريّ والنسائي وغيرهما، غير أنه حسن الحديث وقد توبع هنا.

فقد رواه الإمام أحمد (12271) عن روح بن عبادة، حَدَّثَنَا سعيد بإسناده نحوه، وأصل الحديث في البخاريّ (1374) من طريق عبد الأعلى، ومسلم في صفة الجنّة (2870) من طريق يزيد بن زريع وعبد الوهّاب - كلّهم عن سعيد بإسناده كما سيأتي في باب إن المؤمن والكافر يسألان.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বানু নাজ্জারের খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন। সেখানে তিনি একটি শব্দ শুনতে পেয়ে ঘাবড়ে গেলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "এই কবরগুলোর অধিবাসী কারা?" তারা (উপস্থিত লোকেরা) বললেন, হে আল্লাহর নবী! তারা হলো জাহেলিয়াতের যুগে মারা যাওয়া মানুষ। তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে কবরের আযাব, জাহান্নামের আযাব এবং দাজ্জালের ফেতনা থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো।" তারা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তা কী? (অর্থাৎ এর কারণ কী?) তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই উম্মতকে তাদের কবরের মধ্যে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো মু'মিনকে তার কবরে রাখা হয়, তখন তার কাছে এক ফেরেশতা এসে তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'তুমি কার ইবাদত করতে?' যদি আল্লাহ তাকে হেদায়েত দান করেন, তখন সে বলে: 'আমি আল্লাহর ইবাদত করতাম।' অতঃপর তাকে বলা হবে: 'এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে তুমি কী বলতে?' সে তখন বলবে: 'তিনি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।' এরপর তাকে আর অন্য কিছু জিজ্ঞেস করা হয় না। অতঃপর তাকে জাহান্নামের একটি বাড়ির দিকে নিয়ে যাওয়া হয়, যা তার জন্য নির্ধারিত ছিল। তাকে বলা হয়: 'এই হলো তোমার সেই বাড়ি, যা জাহান্নামে ছিল। কিন্তু আল্লাহ তোমাকে রক্ষা করেছেন এবং রহম করেছেন, ফলে এর পরিবর্তে তোমাকে জান্নাতে একটি বাড়ি দেওয়া হয়েছে।' তখন সে বলবে: 'আমাকে ছেড়ে দাও, যেন আমি গিয়ে আমার পরিবার-পরিজনকে সুসংবাদ দিতে পারি।' তখন তাকে বলা হবে: 'স্থির হও (এখানেই থাকো)।' আর যখন কোনো কাফিরকে তার কবরে রাখা হয়, তখন তার কাছে এক ফেরেশতা এসে তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে তুমি কী বলতে?' তখন সে বলবে: 'আমি লোকে যা বলত, তাই বলতাম।' তখন তাকে লোহার এক মুগুর দিয়ে তার দুই কানের মাঝখানে আঘাত করা হবে। ফলে সে এমন বিকট চিৎকার করবে যে, জিন ও মানব ব্যতীত সৃষ্টিজগতের সবাই তা শুনতে পাবে।"