হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3728)


3728 - عن أنس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سمع صوتًا من قبر فقال:"متى مات هذا؟ قالوا: مات في الجاهليّة، فسُرَّ بذلك وقال:"لولا أن لا تدافنوا لدعوتُ الله أن يُسمعكم عذابَ القبر".

صحيح: رواه النسائيّ (2058) عن سويد بن نصر، قال: حَدَّثَنَا عبد الله، عن حُميد، عن أنس فذكره.

وإسناده صحيح، وقد صحَّحه أيضًا ابن حبَّان (3126)، وأخرجه البيهقيّ في إثبات عذاب القبر (91) كلّهم من طريق حُميد الطّويل، عن أنس فذكر الحديث.

وفي رواية أحمد (12007) عن ابن أبي عديّ، عن حُميد، عن أنس قال: دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حائطًا من حيطان المدينة لبني النجار، فسمع صوتًا من قبر فسأل عنه فذكره.

وكان خروجه لقضاء حاجته كما في رواية الإمام أحمد (12096) بإسناد صحيح.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবর থেকে শব্দ শুনতে পেলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "এই লোকটি কখন মারা গেছে?" তারা বললো, "সে জাহেলিয়াতের যুগে মারা গেছে।" এতে তিনি আনন্দিত হলেন এবং বললেন, "যদি তোমাদেরকে (পরস্পর) দাফন করা বন্ধ করে দেওয়ার ভয় না থাকতো, তবে আমি আল্লাহর কাছে দোয়া করতাম যেন তিনি তোমাদেরকে কবরের আযাব শুনিয়ে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3729)


3729 - عن أنس بن مالك قال: أخبرني بعض من لا أتهمه من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم وبلال يمشيان بالبقيع، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا بلال! ، هل تسمع ما أسمع؟" قال: لا والله! يا رسول الله، ما أسمعه، قال:"ألا تسمع أهل هذه القبور يُعَذَّبون" يعني قبور الجاهليّة.

حسن: رواه الإمام أحمد (13719) عن سُريج، حَدَّثَنَا فُليح، عن هلال بن عليّ، عن أنس بن مالك فذكره. وأخرجه الحاكم في"المستدرك" (1/ 40).

وأورده الهيثمي في"المجمع" وقال:"رجاله رجال الصَّحيح".

وقال البيهقي في إثبات عذاب القبر (96):"هذا إسناد صحيح شاهد لما تقدم".

قلت: إسناده حسن من أجل فُلَيح وهو ابن سليمان، وهو وإن كان من رجال الجماعة إِلَّا أنه مختلف فيه، فضعَّفه ابن معين وعثمان الدَّارمي وأبو حاتم والنسائي وغيرهم.
مشَّاه ابن عدي فقال: له أحاديث صالحة، وقال الدَّارقطنيّ: يختلفون فيه، وليس به بأس، وذكره ابن حبَّان في"الثقات".

والخلاصة أنه يحسن حديثه إذا لم يأت بشيء منكر، وذكر البقيع في هذا الحديث منكر إذ لم يكن فيها قبور الجاهليّة.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এমন কিছু সাহাবী, যাদেরকে আমি অভিযুক্ত করি না (অর্থাৎ নির্ভরযোগ্য), তারা আমাকে জানিয়েছেন যে, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাকী'র মধ্যে হেঁটে যাচ্ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে বিলাল! আমি যা শুনতে পাচ্ছি, তুমি কি তা শুনতে পাচ্ছ?" তিনি (বিলাল) বললেন, "আল্লাহর কসম! হে আল্লাহর রাসূল, আমি তা শুনতে পাচ্ছি না।" তিনি বললেন, "তুমি কি শুনতে পাচ্ছ না যে, এই কবরবাসীদেরকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে?" (অর্থাৎ জাহিলিয়াতের যুগের কবরবাসীদেরকে)।









আল-জামি` আল-কামিল (3730)


3730 - عن وعن أنس قال: بينما نبي الله صلى الله عليه وسلم في نَخْلٍ لنا، نخلٍ لأبي طلحة يتبرز لحاجته، قال: وبلال يمشي وراءَه، يُكرم نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم أن يمشي إلى جنبه، فمر نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم بقبر، فقام حتّى تَمَّ إليه بلال فقال:"ويحك يا بلال، هل تسمع ما أسمعُ؟" قال: ما أسمع شيئًا، قال:"صاحب القبر يُعَذَّب" قال: فسئل عنه فوُجد يهوديًا.

صحيح: رواه الإمام أحمد (12530) عن عبد الصّمد، حَدَّثَنِي أبيّ، حَدَّثَنَا عبد العزيز، عن أنس فذكره. وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 56):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، وعبد العزيز هو: ابن صُهَيب.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের একটি খেজুর বাগানে—আবু তালহার খেজুর বাগানে—প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের জন্য বের হলেন। বর্ণনাকারী বলেন, বিলাল তাঁর পেছনে পেছনে হাঁটছিলেন। তিনি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সম্মান দেখাতেন এই কারণে যে তিনি যেন তাঁর পাশাপাশি না হাঁটেন। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন এবং সেখানে দাঁড়িয়ে গেলেন, যতক্ষণ না বিলাল সেখানে এসে পৌঁছালেন। অতঃপর তিনি বললেন, “আফসোস তোমার জন্য হে বিলাল! তুমি কি শুনতে পাচ্ছো যা আমি শুনছি?” বিলাল বললেন, “আমি কিছুই শুনতে পাচ্ছি না।” তিনি (নবী) বললেন, “কবরের এই লোকটিকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে।” বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তার (কবরের অধিবাসীর) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো এবং জানা গেল যে সে ছিল একজন ইহুদি।









আল-জামি` আল-কামিল (3731)


3731 - عن أم مُبشِّر قالت: دخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا في حائط من حوائط بني النجار، فيه قبور، منهم قد ماتوا في الجاهليّة، فسمعهم وهم يُعَذَّبون، فخرج وهو يقول:"استعيذوا بالله من عذاب القبر" قالت: قلت: يا رسول الله! وإنهم ليعذبون في قبورهم؟ قال:"نعم، عذابًا تسمعه البهائم".

صحيح: رواه الإمام أحمد (27044)، والطَّبرانيّ في"الكبير" (25/ 103)، والبيهقي في إثبات عذاب القبر (108) كلّهم من طريق أبي معاوية قال: حَدَّثَنَا الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، عن أم مبشر فذكرته. وإسناده صحيح، وصحَّحه أيضًا ابن حبَّان (3125).

وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 56):"ورواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح" وفاته العزو إلى الطبرانيّ.




উম্মু মুবাশশির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন যখন আমি বনু নাজ্জারের একটি বাগানে ছিলাম, সেখানে কিছু কবর ছিল। তাদের মধ্যে কেউ কেউ জাহিলিয়্যাতের যুগে মারা গিয়েছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের শুনতে পেলেন, যখন তাদেরকে আযাব দেওয়া হচ্ছিল। অতঃপর তিনি বের হয়ে আসলেন এবং বলতে লাগলেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে কবরের আযাব থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো।" উম্মু মুবাশশির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তারা কি সত্যিই তাদের কবরে আযাবপ্রাপ্ত হচ্ছে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, এমন আযাব, যা চতুষ্পদ জন্তুরা শুনতে পায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3732)


3732 - عن جابر بن عبد الله قال: دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يومًا نخلًا لبني النجَّار، فسمع أصوات رجال من بني النجار ماتوا في الجاهليّة، يُعَذَّبون في قبورهم، فخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فزعًا، فأمر أصحابه أن يتعوذوا من عذاب القبر.

حسن: رواه أحمد (14152) عن عبد الرزّاق - وهو في مصنفه (6742) قال: أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزُّبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره. وإسناده حسن من أجل أبي الزُّبير.

ورواه البزّار"كشف الأستار" (871) من وجه آخر عن موسى بن عقبة، عن أبي الزُّبير بإسناده مثله، ورواه الطبرانيّ في"الأوسط" (4625) من وجه آخر عن أسامة بن زيد، عن أبي الزُّبير بإسناده، وزاد فيه:"يعذبون في القبور في النميمة".

قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن أسامة بن زيد إِلَّا ابن لهيعة.
قلت: وبه علَّله أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 55) فقال:"رواه أحمد والبزّار، والطَّبراني في"الأوسط"، ورجال أحمد رجال الصَّحيح، وفي إسناد الطبرانيّ ابن لهيعة، وفيه كلام". وقد توبع في أصل الحديث.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু নাজ্জার গোত্রের একটি খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি বনু নাজ্জারের কিছু লোকের কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন যারা জাহিলিয়াতের যুগে মারা গিয়েছিল, তাদেরকে তাদের কবরে শাস্তি দেওয়া হচ্ছিল। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভীত ও আতঙ্কিত অবস্থায় বের হলেন, অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীগণকে কবরের আযাব থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করার নির্দেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3733)


3733 - عن ابن عباس قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبرين، فقال:"أما إنهما لَيُعذَّبان، وما يُعذَّبان في كبير، أمَّا أحدهما فكان يمشي بالنميمة، وأمّا الآخر فكان لا يستتر من بوله". قال: فدعا بعسيب رطْبٍ فشقَّه باثنين، ثمّ غرس على هذا واحدًا، وعلى هذا واحدًا، ثمّ قال:"لعلّه يُخفَّف عنهما ما لم ييبسا".

وفي رواية:"وكان الآخر لا يستنُزه عن البول، أو من البول".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (218)، وفي الجنائز (1361)، ومسلم في الطهارة (292) كلاهما من طريق الأعمش، قال: سمعت مجاهدًا يحدّث عن طاوس، عن ابن عباس … فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم، وفي لفظ البخاريّ: ثم أخذ جريدة رطبة … وفيه أيضًا: قالوا: يا رسول الله! لم صنعت هذا؟ فقال:"لعله أن يخفف عنهما ما لم ييبسا".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তাদের উভয়কেই শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, আর তাদের শাস্তি এমন কোনো বড় পাপের জন্য হচ্ছে না [যা পরিহার করা কঠিন]। তাদের একজনের ব্যাপারে হলো, সে চোগলখুরি করে বেড়াতো। আর অন্যজন তার প্রস্রাব থেকে নিজেকে আড়াল করত না (অর্থাৎ প্রস্রাবের ছিটা থেকে পবিত্রতা অর্জন করত না)।" ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর তিনি একটি তাজা খেজুরের ডাল চাইলেন এবং সেটিকে দু'ভাগে বিভক্ত করলেন। তারপর এর একটি এক কবরে এবং অন্যটি আরেক কবরে গেঁথে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "আশা করা যায়, যতক্ষণ পর্যন্ত ডাল দুটি শুকিয়ে না যাবে, ততক্ষণ পর্যন্ত তাদের শাস্তি লাঘব করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3734)


3734 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني مررت بقبرين يعذبان، فأحببت بشفاعتي أن يُرَفَّه عنهما ما دام الغصنان رطبين".

صحيح: رواه مسلم في الزهد والرقائق (3012) قال: حَدَّثَنَا هارون بن معروف ومحمد بن عباد، قالا: حَدَّثَنَا حاتم بن إسماعيل، عن يعقوب بن مجاهد أبي حزرة، عن عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت، عن جابر بن عبد الله في حديث طويل. وسيأتي كاملًا في موضعه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি এমন দুটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম যাদেরকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছিল। আমি আমার সুপারিশের মাধ্যমে চাইলাম যে, যতক্ষণ ডাল দুটি সতেজ (ভিজা) থাকে, ততক্ষণ যেন তাদের শাস্তি লাঘব করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3735)


3735 - عن أبي بكرة قال: بينما أنا أُماشي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو آخذ بيدي، ورجل عن يساره، فإذا نحن بقبرين أمامنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنهما ليعذَّبان، وما يعذَّبان في كبير، وبلي، فأيكم يأتيني بجريدة؟" فاستبقنا، فسبقتُه، فأتيتُه بجريدة، فكسرها نصفين، فألقى على ذا القبر قطعة، وعلى ذا القبر قطعة، وقال:"إنه يُهوَّنُ عليهما ما كانتا رطْبتَين، وما يُعدَّبان إِلَّا في البول والغيبة".

حسن: رواه الإمام أحمد (20373) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، والبزَّار (3636)، من طريق مسلم بن إبراهيم، كلاهما -أعني أبا سعيد ومسلم بن إبراهيم- عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مرَار، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة .. فذكر الحديث، وهذا إسناد حسن متصل؛ إن بحر بن مرَّار سمع عن جده عبد الرحمن بن أبي بكرة.
وبحر بن مَرَّار تكلم فيه القطان فقال فيه: إنَّه خولط. إِلَّا أنَّ ابن عدي بعد أن أخرج الحديث المذكور وغيره من رواياته قال: ولا أعرف له حديثًا منكرًا فأذكره، ولم أر أحدًا من المتقدِّمين ممَّن تكلَّم في الرجال ضعَّفه إِلَّا يحيى القطَّان، ذكر أنَّه خولط، ومقدار ما له من الحديث لم أر فيه حديثًا منكرًا".

وهذا هو الصواب؛ فحديثه هذا لا بأس به في الشواهد.

ولا يُعكِّر على هذا الاختلافُ عليه، أعني به ما رواه ابن ماجه (349) من طريق وكيعٍ، وأبو داود الطيالسي في مسنده (908) كلاهما عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مَرَّار، عن جد أبيه أبي بكرة، ففيه انقطاع؛ لأنَّ بحرًا لم يسمع من أبي بكرة، ولذا صوَّب الدَّارقطنيّ في"العلل" (7/ 156) الرواية الموصولة وقال أبو حاتم: هي أصح:"العلل" (1/ 370).




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: একবার আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হেঁটে যাচ্ছিলাম। তিনি আমার হাত ধরে রেখেছিলেন এবং তাঁর বামপাশে একজন লোক ছিল। এমন সময় আমরা আমাদের সামনে দুটি কবরের নিকট পৌঁছলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয়ই তাদের দুজনকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, আর তাদের বড় কোনো (গুরুত্বপূর্ণ) অপরাধের জন্য শাস্তি দেওয়া হচ্ছে না। তবে, হ্যাঁ (তাদের অপরাধ গুরুতর), তোমাদের মধ্যে কে আমাকে একটি তাজা ডাল এনে দিতে পারবে?” আমরা (ডাল আনার জন্য) দৌঁড়ালাম। আমি তাঁকে অতিক্রম করে গেলাম এবং তাঁর কাছে একটি তাজা ডাল নিয়ে আসলাম। তিনি সেটিকে দু’ভাগে ভাঙলেন এবং এই কবরের ওপর এক টুকরা আর ঐ কবরের ওপর আরেক টুকরা রাখলেন। তিনি বললেন: “যতক্ষণ পর্যন্ত এ দুটি ডাল সতেজ থাকবে, ততক্ষণ তাদের শাস্তি কিছুটা হালকা করা হবে। আর তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে মূলত পেশাব (থেকে পবিত্র না থাকা) এবং গীবতের (পরনিন্দা) কারণে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3736)


3736 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ عامة عذاب القبر من البول فتنزهوا من البول".

حسن: رواه البزّار"كشف الأستار" (243)، والطَّبراني في"الكبير" (11/ 84)، والحاكم (1/ 183 - 184) كلهم من طريق إسرائيل، عن أبي يحيى، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: فذكره.

وأبو يحيى القَتَّات مختلف فيه، والغالب عليه الضعف، ووثَّقه يحيى بن معين في رواية، وقد تابعه العوام بن حوشب عن مجاهد.

رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 79) من طريق العوام بن حوشب، عن مجاهد، عن ابن عباس به مثله.

والعوام بن حوشب وثَّقه أحمد وابن معين وأبو زرعة وغيرهم.

ولم يحكم عليه الحاكم بشيء، بل ذكره شاهدا لحديث أبي هريرة وهو الآتي:




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কবরের অধিকাংশ শাস্তি প্রস্রাবের কারণে হয়। সুতরাং তোমরা প্রস্রাব থেকে পবিত্রতা অর্জন করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3737)


3737 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكثر عذاب القبر من البول".

صحيح: رواه ابن ماجه (348) عن أبي بكر بن أبي شيبة - وهو في مصنفه (1/ 122) قال: حَدَّثَنَا عفّان، قال: حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ورواه الدَّارقطنيّ (1/ 128) وقال:"صحيح"، والحاكم (1/ 183) وقال:"صحيح على شرط الشّيخين ولا أعرف له علة"، وأورده البوصيري في"زوائد ابن ماجه" وقال:"هذا إسناد صحيح رجاله عن آخرهم محتج بهم في الصحيحين" وحكى الترمذيّ في"العلل" عن البخاري أنه قال:"هذا حديث صحيح".

وسئل أبو حاتم عن هذا الحديث فقال:"هذا حديث باطل مرفوعًا"."العلل" (1081). يعني الباطل هو الرفع، والصحيحُ أنه موقوف، ذكره الدَّارقطنيّ في"العلل" (1518) رواية أبي عوانة هذه ثمّ قال:"وخالفه ابنُ فضيل فوقفه، ويشبه أن يكون الموقوف أصحُّ".
قلت: هذه من الصناعة الحديثية، وأمّا من فقه الحديث فالصحيح أنه مرفوع؛ لأن مثل هذا الحكم لا يمكن صدوره إِلَّا من الشارع، فمن نظر إلى صناعة الحديث رجّح الوقفَ، ومن نظر إلى فقه الحديث رجّح الرفعَ، وكان الإمام البخاريّ رحمه الله سبّاقًا في اختيار هذا المنهج، ولذا حكم على كثير من الأحاديث بالرفع مع أن الصناعة الحديثية تُرَجِّجُ جانب الوقف كما هو ظاهر من صنيع الإمام الدَّارقطنيّ في"الإلزامات والتتبع"، والنسائي في"السنن الكبرى والصغري".

وهذا مما تميّز به البخاريّ رحمه الله عن غيره، ثمّ نهج هذا المنهج من جاء بعده مثل الحاكم والنووي وابن كثير والحافظ ابن حجر وغيرهم.

وهذا مثال لاختلاف أنظار العلماء، وليس فيه ردُّ أحدٍ على أحدٍ، إنّما هو راجعٌ إلى أصولهم وضوابطهم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কবরের অধিকাংশ শাস্তি পেশাবের কারণে হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3738)


3738 - عن أبي هريرة، قال: كنا نمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فمررنا على قبرين، فقام، فقمنا معه، فجعل لونه يتغير حتّى رعد كُمُّ قميصه، فقلنا: ما لك يا نبي الله؟ قال:"ما تسمعون ما أسمع؟" قلنا: وما ذاك يا نبي الله؟ قال:"هذان رجلان يُعذَّبان في قبورهما عذابًا شديدًا في ذنب هين" قلنا: مِمَّ ذلك يا نبيَّ الله؟ قال:"كان أحدهما لا يستنزه من البول، وكان الآخر يؤذي الناس بلسانه، ويمشي بينهم بالنميمة" فدعا بجريدتين من جرائد النخل، فجعل في كل قبر واحدة، قلنا: وهل ينفعهما ذلك يا رسول الله؟ قال:"نعم يخفف عنهما ما داما رَطْبَتَيْن".

صحيح: رواه ابن حبَّان (824) قال: أخبرنا أبو عروبة، قال: حَدَّثَنَا محمد بن وهب بن أبي كريمة، قال: حَدَّثَنَا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، قال: حَدَّثَنِي زيد بن أبي أُنَيْسة، عن المنهال بن عمرو، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ورجاله ثقات، أبو عروبة هو الحسين بن محمد بن معشر الحراني حافظ مترجَم في"تذكرة الحفاظ" (2/ 774) وأبو عبد الرحيم هو: خالد بن يزيد، ويقال: ابن أبي يزيد الأموي مولاهم الحرانيّ، ثقة من رجال مسلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাঁটছিলাম, তখন আমরা দুটি কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলাম। তিনি দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। এরপর তাঁর (নবীর) চেহারার রং পরিবর্তিত হতে লাগল, এমনকি তাঁর জামার আস্তিন কাঁপতে শুরু করল। আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! আপনার কী হয়েছে? তিনি বললেন: "তোমরা কি শুনতে পাচ্ছ না যা আমি শুনতে পাচ্ছি?" আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! সেটা কী? তিনি বললেন: "এই দুজন লোককে তাদের কবরে কঠিন শাস্তি দেওয়া হচ্ছে সামান্য একটি গুনাহের কারণে।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! কীসের জন্য? তিনি বললেন: "তাদের একজন পেশাবের ছিটা থেকে পবিত্র থাকত না, আর অন্যজন মানুষের সাথে জিহ্বা দ্বারা কষ্ট দিত এবং তাদের মাঝে চোগলখুরি করে বেড়াত।" এরপর তিনি খেজুর গাছের দুটি ডাল চাইলেন এবং প্রত্যেক কবরে একটি করে গেঁথে দিলেন। আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি তাদের কোনো উপকারে আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, যতদিন এগুলো তাজা থাকবে, ততদিন তাদের আযাব হালকা করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3739)


3739 - عن أبي هريرة قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبر فقال:"ائتوني بجريدتين" فجعل إحداهما عند رأسه، والأخرى عند رجليه، فقيل: يا نبي الله! أينفعُه ذلك؟ قال:"لن يزال يُخفَّف عنه بعض عذاب القبر ما كان فيهما نُدوٌّ".

صحيح: رواه أحمد (9686) عن محمد بن عبيد، عن يزيد -يعني ابن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البيهقي في إثبات عذاب القبر (136) من طريق ابن أبي شيبة، ثنا محمد بن عبيد بإسناده، وإسناده صحيح.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 57):"رواه أحمد، ورجاله رجال الصَّحيح".

قلت: وهو كما قال .. ولا يخالف هذا ما سبق من مرور النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على قبرين لتعدد القصة.

وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إن عذاب القبر من ثلاثة: من الغيبة والنميمة والبول، وإياكم ذلك" فالصحيح أنه موقوف من رواية أبي عروبة، عن قتادة من قوله: قاله الحافظ البيهقي في إثبات عذاب القبر (262) وقال:"وقد روينا معناه في الأحاديث الثابتة فيما تقدم".




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "আমার নিকট দুটি খেজুরের ডাল নিয়ে আসো।" অতঃপর তিনি একটি (ডাল) কবরের মাথার দিকে এবং অন্যটি পায়ের দিকে গেঁথে দিলেন। তখন বলা হলো: হে আল্লাহর নবী! এটা কি তাকে কোনো উপকার দেবে? তিনি বললেন, "যতক্ষণ এই ডাল দুটিতে সতেজতা বা আর্দ্রতা অবশিষ্ট থাকবে, ততক্ষণ তার কবরের আযাব কিছুটা হালকা করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3740)


3740 - عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عام خيبر، فلم نغنم ذهبًا ولا ورقًا، إِلَّا الأموال، الثياب والمتاع، قال، فأهدي رفاعة بن زيد لرسول الله صلى الله عليه وسلم غلامًا أسود، يقالُ له: مِدْعَمٌ، فوجَّهَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى وادي القُرَى، حَتَّى إذا كُنَّا بوادي القُرَى، بينما مِدْعَمٌ يَحُطُّ رحلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، إذ جاءه سهم عائرٌ، فأصابه فقتله، فقال الناس، هنيئًا له الجنّة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلا، والذي نفسي بيده، إن الشملة التي أخذ يوم خيبر من المغانم لم تُصبها المقاسم، لتشتعل عليه نارًا" قال: فلمّا سمع الناس ذلك، جاء رجل بشراكٍ أو شراكَين إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"شراك أو شراكان من نار".

متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (25) عن ثور بن زيد الديليّ، عن أبي الغيث سالم مولي ابن مطيع، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاريّ في المغازي (4234)، ومسلم في الإيمان (183) كلاهما من طريق مالك به مثله. وأمّا ما رُوي عن أبي رافع قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلى العصر ربما ذهب إلى بني عبد الأشهل، فيتحدث معهم حتّى ينحدر للمغرب، قال: فقال أبو رافع: فبينا رسول الله صلى الله عليه وسلم مسرعًا إلى المغرب، إذ مرَّ بالبقيع، فقال:"أُفّ لك، أُفٍّ لك"، مرَّتين، فكبر في ذرعي وتأخرتُ، وظننت أنه يريدني، فقال: ما لك؟ ! امشِ"، قال: قلتُ: أحدثتُ حدثًا يا رسول الله. قال: وما ذاك؟" قلتُ: أقَّفْتَ بيّ، قال:"لا، ولكن هذا قبرُ فلان، بعثتُهُ ساعيًا على بني فلان، فغَلَّ نَمِرَةٌ، فدُرِّعَ الآن مِثْلَها من نار" ففيه من لم يوثَّق.

رواه النسائيّ (862، 863)، والإمام أحمد (27192)، وابن خزيمة (2337)، والبيهقي في إثبات عذاب القبر (149) كلّهم من طرق، عن ابن جريج، عن منبوذ رجل من آل أبي رافع، عن الفضل بن عبيد الله بن أبي رافع، عن أبي رافع فذكره.

وفي إسناده منبوذ لم يؤثر توثيقه من أحد، وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول". أي إذا توبع.

وكذا الفضل بن عبيد الله بن أبي رافع المدني رُوي عن أبيه، وعن جده، ولكن لم يوثقة غير ابن
حبَّان ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা খায়বার যুদ্ধের বছর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম। আমরা সোনা বা রূপা কোনো কিছুই গণীমত হিসেবে পেলাম না, শুধুমাত্র কিছু সম্পদ, কাপড় ও সামগ্রী ব্যতীত। তিনি বলেন, এরপর রিফা'আহ ইবনু যায়দ রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট মিদ'আম নামক এক কালো গোলাম হাদিয়া দিলেন। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ওয়াদী আল-ক্বুরা-এর দিকে পাঠালেন। আমরা যখন ওয়াদী আল-ক্বুরায় পৌঁছলাম, এমন সময় যখন মিদ'আম রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাওদা নামাচ্ছিল, তখন একটি লক্ষ্যভ্রষ্ট তীর এসে তার গায়ে লাগল এবং তাকে হত্যা করল। তখন লোকেরা বলল, জান্নাত তার জন্য মুবারক হোক! রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কখনোই নয়! যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! খায়বারের দিন গণীমতের সম্পদ থেকে বন্টনের পূর্বে সে যে চাদরটি আত্মসাৎ করেছিল, তা অবশ্যই তার উপর আগুন হয়ে জ্বলবে।" বর্ণনাকারী বলেন, লোকেরা যখন এ কথা শুনল, তখন এক ব্যক্তি এক বা দু'টি জুতার ফিতা নিয়ে রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এক বা দুটি জুতার ফিতা হলেও তা জাহান্নামের আগুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3741)


3741 - عن عائشة، عن النَّبِي صلى الله عليه وسلم قال:"للقبر ضغطةٌ لو نجا منها أحد لنجا منها سعد ابن معاذ".

صحيح: رواه ابن حبَّان في صحيحه (3112) عن عمر بن محمد الهمدانيّ، حَدَّثَنَا بُنْدار، عن عبد الملك بن الصباح، حَدَّثَنَا شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن نافع، عن صفية، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح، بُندار هو: محمد بن بشار.

ونافع هو: مولي ابن معمر.

وصفية هي: بنت أبي عبيد الثقفية زوج ابن عمر، وهي أخت المختار بن أبي عبيد، وثَّقها العجلي وابن حبَّان، واعتمد الحافظ على توثيق العجلي في"التقريب" وهي من رواه مسلم والسنن ما عدا الترمذي.

هكذا رواه أيضًا البيهقيّ في إثبات عذاب القبر من طريق عبد الملك بن الصباح (120) ومن طريق آدم بن أبي إياس (119)، والطحاوي في مشكله من طريق عبد الرحمن بن زياد (274) كلّهم من حديث شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن نافع، عن صفية، عن عائشة، أو عن امرأة ابن عمر، عن عائشة.

وأبهم محمد بن جعفر وهو غندر الراوي عن عائشة فقال: عن إنسان عن عائشة رواه الإمام أحمد (24663) عنه عن شعبة بإسناده.

فلا يضر هذا الإبهام بعد أن عرفناه، ولذا قال الحافظ الهيثمي في"المجمع"، (3/ 46):"رواه أحمد عن نافع، عن عائشة، وعن نافع عن إنسان، عن عائشة، وكلا الطريقين رجالهما رجال الصحيح". وقال العراقي في"المغني" (4/ 487):"رواه أحمد بإسناد جيد".

وكذلك لا يُعَلُّ بما رواه يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن نافع، عن عائشة، هكذا رواه عنه الإمام أحمد (24283) وابنه عبد الله في"السنة" (1412) عن أبيه عنه، والطحاوي في مشكله (273) عن إبراهيم بن مرزوق، حَدَّثَنَا وهب بن جرير، حَدَّثَنَا شعبة بإسناده.

قال الطحاوي:"هكذا حَدَّثَنَا ابن مرزوق بغير إدخال منه بين نافع وبين أم المؤمنين أحدًا" لأن من ذكره حجة على من لم يذكره.

وكذلك لا يضر ما رواه أبو حذيفة عن سفيان، عن سعد، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ولو أن أحدًا نجا من عذاب القبر لنجا منه سعد" ثمّ قال بأصابعه الثلاثة يجمعها كأنه يقللها، ثمّ قال:"لقد ضُغِط ثمّ عوفي"، رواه الطحاويّ في مشكله (276)، والبيهقي في"إثبات عذاب القبر" (121)، ، وأبو نعيم في"الحلية" (3/ 173 - 174) كلّهم من طرق، عن أبي حذيفة بإسناده.
قال أبو نعيم: كذا رواه أبو حذيفة، عن الثوري، عن سعد، ورواه غندر (وهو محمد بن جعفر) وغيره عن شعبة، عن سعد، عن نافع، عن إنسان، عن عائشة مثله" انتهى.

وقال الطحاويّ: خالف سفيانُ بن سعيد شعبةَ في إسناد هذا الحديث عن سعد فذكر الإسناد.

قلت: لعل الوهم من أبي حذيفة وهو موسي بن مسعود النهديّ، وصفه الحاكم أبو عبد الله بكثير الوهم وسيء الحفظ، وقال الحافظ في التقريب: صدوق سيء الحفظ، وكان يُصحف" فلعله تصحف عليه ابن عمر مكان عائشة، ولذا صدَّره البيهقيّ بقوله: وقيل عن نافع عن ابن عمر.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কবরের একটি চাপ (সংকোচন) রয়েছে। যদি কেউ তা থেকে বাঁচতে পারত, তবে সা’দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তা থেকে রক্ষা পেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3742)


3742 - عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"هذا الذي تحرك له العرش، وفُتِحتْ له أبوابُ السماء، وشهِده سبعون ألْفًا من الملائكة، لقد ضُمَّ ضمةُ ثمّ فُرِّج عنه".

صحيح: رواه النسائي (2055) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: حَدَّثَنَا عمرو بن محمد العَنْقريّ، قال: حَدَّثَنَا ابن إدريس، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وأخرجه البيهقي في إثبات عذاب القبر (122) من وجه آخر، عن محمد بن إدريس بإسناده مثله وقال: تابعه عمرو بن محمد القرشي، عن ابن إدريس.

وإسناده صحيح، ومحمد بن إدريس هو الإمام الشافعي المطلبي.

وأمّا ما رواه الحاكم وصحّحه (3/ 206) من طريق عطاء بن السائب، عن مجاهد، عن ابن عمر مرفوعًا وزاد فيه:"ضُم سعد في القبر ضمةً، فدعوت الله أن يكشف عنه" ففيه عطاء بن السائب مختلط، وقد زاد فيه الدعاء، وبه أعلّه الحافظ ابن كثير في"البداية والنهاية" (4/ 128).

وللحديث طرق أخرى والذي ذكرته هو أصحها.

وفي الباب عن ابن عباس وجابر بن عبد الله وغيرهما ولا يصح منها شيء، انظر أحاديث هؤلاء في"إثبات عذاب القبر" للبيهقي.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই সেই ব্যক্তি, যাঁর জন্য আরশ আন্দোলিত হয়েছিল, আসমানের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়েছিল এবং সত্তর হাজার ফেরেশতা তাঁকে দেখতে উপস্থিত হয়েছিল। নিশ্চয়ই তিনি একবার (কবরের) চাপ অনুভব করেছেন, অতঃপর তা তাঁর থেকে দূর করে দেওয়া হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3743)


3743 - عن أبي أيوب أن صبيا دُفن، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أفلت أحد من ضمة القبر لأفلت هذا الصبي".

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (4/ 143) عن الحسين بن إسحاق التستريّ، ثنا عثمان بن أبي شيبة، ثنا وكيع، عن حمّاد بن سلمة، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن البراء بن عازب، عن أبي أيوب فذكره. قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 47):"رواه الطبراني في"الكبير" ورجاله رجال الصَّحيح".

قلت: وهو كما قال، إِلَّا أن ثمامة بن عبد الله بن أنس وإن كان من رجال الصَّحيح إِلَّا أنه"صدوق".




আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা একটি শিশুকে দাফন করা হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি কবরের চাপ (ধম্মাতুল ক্ববর) থেকে কেউ মুক্তি পেত, তবে এই শিশুটি মুক্তি পেত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3744)


3744 - عن أنس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلَّى على صبيّ، أو صَبية فقال:"لو كان نجا أحد من ضمة القبر لنجا هذا الصبيُّ".
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (3774) عن إبراهيم (وهو ابن هاشم البغوي) قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن الحجاج السامي، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن أنس فذكره. وإسناده حسن.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (3/ 47): ورواه الطبراني في"الأوسط" ورجاله موثقون".

قلت: وهو كما قال، فإن إبراهيم بن الحجاج السامي ثقة، وثَّقه الدَّارقطني وغيره وهو من رجال النسائي، وبقية رجاله ثقات غير ثمامة بن عبد الله بن أنس فإنه"صدوق" كما مضى.

وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك قال: تُوفيت زينبُ بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرجنا معه، فرأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم مهتمًا شديد الحزن، فقلنا لا نكلمه حتّى انتهينا إلى القبر، فإذا هو لم يفرغ من لحده، فقعد رسول الله صلى الله عليه وسلم وجلسنا حوله، فحدث نفسه هنيهة وجعل ينظر إلى السماء، ثم فرغ من القبر، فنزل رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه، فرأيته يزداد حزنًا، ثمّ إنه فرغ، فخرج فرأيته سري عنه وتبسم صلى الله عليه وسلم، فقلنا: يا رسول الله! رأيناك مهتمًا حزينًا لم نستطع أن تكلمك، ثمّ رأيناك سري عنك فلم ذاك؟ قال:"كنت أذكر ضيق القبر وغمه وضعف زينب، فكان ذلك يشق عليّ، فدعوت الله أن يخفف عنها ففعل، ولقد ضغطها ضغطةً سمعها من بين الخافقين إِلَّا الجن والانس" فهو ضعيف.

رواه الطبراني في"الكبير" (1/ 230، 22/ 433) عن محمد بن عبد الله الحضرميّ، ثنا عمران ابن أبي الرطيل، ثنا حبيب بن خالد الأسديّ، عن الأعمش، عن عبد الله بن المغيرة، عن أنس بن مالك فذكره.

وأخرجه أيضًا في"الأوسط" (5806) من وجه آخر عن محمد بن عبد الله الحضرميّ، قال:"حدثنا عثمان بن أبي شيبة، قال: حَدَّثَنَا إسحاق بن سليمان الرازيّ، عن زكريا بن سلام، عن سعيد بن مسروق، عن أنس فذكره مختصرًا، وقال: لم يرو هذا الحديث عن سعيد بن مسروق إِلَّا زكريا بن سلّام، تفرّد به إسحاق بن سليمان".

ومن هذا الوجه الثاني أخرجه أيضًا في"الكبير" (22/ 433 - 434).

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 47) بعد عزوه إلى"الكبير" و"الأوسط":"إسناده ضعيف" ولم يبين سبب ضعفه.

وأخرجه ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 426 - 427)، وفي"الموضوعات" (3/ 541 - 543) من عدة طرق وقال:"هذا حديث لا يصح من جميع طرقه، قال الدَّارقطنيّ:"رواه الأعمش، واختلف عنه، فرواه أبو حمزة السكري، عن الأعمش، عن سليمان بن المغيرة، عن أنس، ورواه سعد بن الصلت، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن أنس، ورواه حبيب بن خالد الأسدي، عن الأعمش، عن عبد الله بن المغيرة، عن أنس، والحديث مضطرب عن الأعمش" انتهى.

وأخرجه الحاكم في"المستدرك" (4/ 46) من طريق سعد بن الصلت بإسناده مختصرًا.
قلت: مع الاضطراب على الأعمش فإن من رواته عنه سعد بن الصلت وحبيب بن خالد الأسدي لا يُحمدان، وأما أبو حمزة السكري وهو محمد بن ميمون فهو ثقة فاضل.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ছেলে শিশু বা মেয়ে শিশুর জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: "যদি কবরের চাপ থেকে কেউ রেহাই পেত, তবে এই শিশুটি রেহাই পেত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3745)


3745 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن المَيِّت إذا وضع في قبره إنه يسمع خفق نعالهم حين يوُلُّون عنه، فإن كان مؤمنًا، كانت الصلاة عند رأسه، وكان الصيام عن يمينه، وكانت الزكاة عن شماله، وكان فعل الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف والإحسان إلى الناس عند رجليه. فيؤتي من قبل رأسه، فتقول الصلاةُ: ما قِبَلي مَدْخل، ثم يؤتى عن يمينه، فيقول الصيام: ما قِبَلِي مدخلٌ، ثم يؤتى عن يساره، فتقول الزكاة: ما قِبَلِي مدخلٌ، ثم يُؤتَى من قِبَلِ رِجْلَيه، فتقول فِعْلُ الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف والإحسان إلى الناس: ما قبلي مدخل، فيقال له: اجْلِسْ فيجلسُ، وقد مُثِّلتْ له الشمس، وقد أُدْنِيَتْ للغروب، فيقال له: أرأيتَكَ هذا الرجل الذي كان فيكم ما تقول فيه، وماذا تشهد به عليه؟ فيقولُ: دعوني حتى أصلي، فيقولون: إنك ستفعلُ، أخبرني عما نسألُكَ عنه، أرأيتك هذا الرجل الذي كان فيكم ما تقولُ فيه، وماذا تشهدُ عليه؟ قال: فيقولُ: محمدٌ أشهدُ أنه رسولُ الله، وأنه جاء بالحق من عند الله، فيقال له على ذلك حييتَ وعلى ذلك مُتَّ، وعلى ذلك تُبْعَثُ إن شاء الله، ثم يُفتحُ له باب من أبواب الجنة، فيقال له: هذا مَقْعَدُك منها، وما أعدَّ اللهُ لك فيها، فيزدادُ غبطةٌ وسرورًا، ثم يُفتحُ له باب من أبواب النار، فيقالُ له: هذا مَقْعَدُك منها وما أعدَّ الله لك فيها لو عَصَيْتَهُ، فيزدادُ غبطةً وسرورًا، ثم يُفسحُ له في قبره سبعون ذراعًا، ويُنوَّر له فيه، ويُعادُ الجسد كما بدأ منه، فتجعل نَسْمَتُهُ في النَّسَم الطيب، وهي طير يعلقُ في شجر الجنة، قال: فذلك قوله تعالى: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ} [إبراهيم: 27].

قال: إن الكافر إذا أُتي من قبل رأسه، لم يوجد شيء، ثم أتي عن يمينه، فلا يوجد شيء، ثم أتي عن شماله، فلا يوجد شيء، ثم أتي من قبل رجلَيْه، فلا يوجد شيء، فيقال له: اجلس، فيجلسُ خائفًا مرعوبًا، فيقال له: أرأيتك هذا الرجل الذي كان فيكم ماذا تقول فيه؟ وماذا تشهد به عليه؟ فيقول: أيُّ رجل؟ فيقال: الذي كان فيكم، فلا يهتدي لاسمِه حتى يقال له: محمد، فيقول: ما أدري سمعتُ الناس
قالوا قولًا، فقلتُ كما قال الناس، فيقال له: على ذلك حييت، وعلى ذلك مُتَّ، وعلى ذلك تُبْعَثُ إن شاء الله، ثم يُفْتَحُ له باب من أبواب النار، فيقال له: هذا مقعدُك من النار، وما أعدَّ الله لك فيها، فيزدادُ حشرةٌ وثُبورًا، ثم يفتح له باب من أبواب الجنة، فيقال له: ذلك مقعدك من الجنة، وما أعدَّ اللهُ لك فيه لو أطعتَه فيزدادُ حَسْرَةً وثبورًا، ثم يُضَيَّقُ عليه قبرُهُ حتى تختلِفَ فيه أضلاعُه، فتلك المعيشةُ الضَّنْكَة التي قال الله: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى} [طه: 124].

حسن: رواه ابن حبان (3113) عن الحسن بن سفيان، قال: حدثنا عبد الواحد بن غياث، قال: حدثنا معتمر بن سليمان، قال: سمعت محمد بن عمرو يحدث عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة بن وقاص الليثي فإنه حسن الحديث.

وأخرجه الحاكم (1/ 379 - 381) من طريق سعيد بن عامر، والبيهقي في إثبات عذاب القبر (79) من طريق عبد الوهاب بن عطاء - كلاهما عن محمد بن عمرو، ثم رواه الحاكم من طريق حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو مختصرًا وقال: حديث سعيد بن عامر أتم، وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال، ومحمد بن عمرو وإن كان من رواة الجماعة إلا أن فيه كلامًا يسيرًا يجعل حديثه حسنًا. وعزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 51 - 52) إلى الطبراني في"الأوسط" وحسن إسناده.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে যখন তার কবরে রাখা হয়, তখন সে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়, যখন তারা তার কাছ থেকে চলে যায়। আর যদি সে মুমিন হয়, তবে সালাত (নামাজ) তার মাথার কাছে থাকে, সিয়াম (রোজা) তার ডান দিকে থাকে, যাকাত তার বাম দিকে থাকে এবং সাদকা, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা, সদাচরণ ও মানুষের প্রতি ইহসান (দয়া) সহ সকল প্রকার নেক আমল তার পায়ের কাছে থাকে।

তখন তার মাথার দিক থেকে (ফেরেশতারা) আসে। সালাত বলে: আমার দিক দিয়ে প্রবেশের কোনো পথ নেই। এরপর তার ডান দিক থেকে আসে। সিয়াম বলে: আমার দিক দিয়ে প্রবেশের কোনো পথ নেই। এরপর তার বাম দিক থেকে আসে। যাকাত বলে: আমার দিক দিয়ে প্রবেশের কোনো পথ নেই। এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়। সাদকা, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা, সদাচরণ ও মানুষের প্রতি ইহসান (দয়া) সহ সকল নেক আমল বলে: আমার দিক দিয়ে প্রবেশের কোনো পথ নেই।

তখন তাকে বলা হয়: বসো। সে বসে যায়। এমন অবস্থায় যে, সূর্য তার সামনে এমনভাবে স্থাপন করা হয় যেন তা ডুবে যাওয়ার জন্য প্রস্তুত। তাকে বলা হয়: তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি ছিল, এই লোকটির ব্যাপারে তুমি কী মনে করো এবং কী সাক্ষ্য দাও? সে বলে: আমাকে ছেড়ে দাও, আমি যেন সালাত আদায় করি। ফেরেশতারা বলে: তুমি তা শীঘ্রই করবে। আমরা তোমাকে যা জিজ্ঞেস করছি সে বিষয়ে আমাদের জানাও। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি ছিল, এই লোকটির ব্যাপারে তুমি কী মনে করো এবং কী সাক্ষ্য দাও? সে বলে: (তিনি হলেন) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তিনি আল্লাহর পক্ষ থেকে সত্য নিয়ে এসেছেন।

তখন তাকে বলা হয়: এই নীতির ওপর তুমি জীবন যাপন করেছ, এর ওপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইনশাআল্লাহ এরই ওপর তুমি পুনরুত্থিত হবে। এরপর তার জন্য জান্নাতের দরজাগুলোর মধ্য থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। তাকে বলা হয়: এটি তোমার অবস্থানস্থল এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত রেখেছেন। এতে তার আনন্দ ও খুশি আরও বেড়ে যায়। এরপর তার জন্য জাহান্নামের দরজাগুলোর মধ্য থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। তাকে বলা হয়: এটি তোমার অবস্থানস্থল এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত রেখেছিলেন, যদি তুমি তাঁর (আল্লাহর) অবাধ্য হতে। এতেও তার আনন্দ ও খুশি আরও বেড়ে যায়।

এরপর তার কবরকে সত্তর গজ প্রশস্ত করে দেওয়া হয় এবং তাতে তার জন্য আলোকময় করা হয়। তার শরীরকে আগের অবস্থায় ফিরিয়ে দেওয়া হয়। আর তার রূহকে পবিত্র রূহগুলোর সাথে স্থাপন করা হয়— যা জান্নাতের গাছের সাথে ঝুলে থাকা পাখির রূপে থাকে।

তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: এটিই আল্লাহর বাণী: “যারা ঈমান এনেছে তাদেরকে আল্লাহ্ সুপ্রতিষ্ঠিত বাক্যের দ্বারা দুনিয়ার জীবনে ও আখিরাতে সুপ্রতিষ্ঠিত রাখবেন।” [সূরা ইবরাহীম: ২৭]।

তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: নিশ্চয় কাফিরকে যখন তার মাথার দিক থেকে আসা হয়, তখন (আমলের) কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার ডান দিক থেকে আসা হয়, সেখানেও কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার বাম দিক থেকে আসা হয়, সেখানেও কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়, সেখানেও কিছুই পাওয়া যায় না।

তাকে বলা হয়: বসো। সে ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় বসে যায়। তাকে বলা হয়: তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি ছিল, এই লোকটির ব্যাপারে তুমি কী মনে করো এবং কী সাক্ষ্য দাও? সে বলে: কোন লোক? তাকে বলা হয়: যে তোমাদের মধ্যে ছিল। সে তার নাম বলতে পারে না, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। সে তখন বলে: আমি জানি না। আমি মানুষকে কিছু বলতে শুনেছি, তাই মানুষ যা বলেছে, আমিও তাই বলেছি।

তখন তাকে বলা হয়: এই নীতির ওপর তুমি জীবন যাপন করেছ, এর ওপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইনশাআল্লাহ এরই ওপর তুমি পুনরুত্থিত হবে। এরপর তার জন্য জাহান্নামের দরজাগুলোর মধ্য থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। তাকে বলা হয়: এটি জাহান্নামে তোমার অবস্থানস্থল এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত রেখেছেন। এতে তার দুঃখ ও দুর্ভোগ আরও বেড়ে যায়। এরপর তার জন্য জান্নাতের দরজাগুলোর মধ্য থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। তাকে বলা হয়: এটি জান্নাতে তোমার অবস্থানস্থল ছিল এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত রেখেছিলেন, যদি তুমি তাঁর আনুগত্য করতে। এতে তার আফসোস ও দুর্ভোগ আরও বেড়ে যায়।

এরপর তার কবরকে তার জন্য সংকুচিত করে দেওয়া হয়, যার ফলে তার পাজরের হাড়গুলো একটির ভেতরে আরেকটি ঢুকে যায়। এটাই সেই সংকীর্ণ জীবন, যা সম্পর্কে আল্লাহ তাআলা বলেছেন: 'নিশ্চয় তার জন্য থাকবে এক সংকীর্ণ জীবন এবং আমি তাকে কিয়ামতের দিন অন্ধ করে উত্থিত করব।' [সূরা ত্বাহা: ১২৪]”









আল-জামি` আল-কামিল (3746)


3746 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم في قوله تعالى: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا}. قال:

"عذاب القبر".

حسن: رواه ابن حبان (3119) عن أبي خليفة، حدثنا أبو الوليد، حدثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وأخرجه البيهقي في إثبات عذاب القبر (69) من طريق أبي الوليد بإسناده مثله.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة الليثي فإنه حسن الحديث.

وأخرجه الحاكم (1/ 381) من طريق أبي الوليد الطيالي بإسناده.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহান আল্লাহর বাণী: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا} (নিশ্চয়ই তার জন্য থাকবে এক সংকীর্ণ জীবন) সম্পর্কে বলেছেন: “কবরের আযাব।”









আল-জামি` আল-কামিল (3747)


3747 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن المؤمن في قبره لفي روضةٍ خضراء، ويُرْحَبُ له قبرُه سبعون ذراعًا، وينور له كالقمر ليلة البدر، أتدرون فيما أنزلتْ هذه الآية: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى} أتدرون ما المعيشة الضنكة؟" قالوا: الله ورسوله أعلم قال:"عذاب الكافر في قبره والذي نفسي بيده، إنه يسلَّط عليه تسعة وتسعون تِنِّينًا، أتدرون ما التِّنيِّنُ؟ سبعون حيةٌ، لكل حيةٍ سبع رؤوس يلسعونه، ويخدشونه إلى يوم القيامة".
حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (3122) عن عبد الله بن محمد بن سلم، قال: حدثنا حرملة ابن يحيى، قال: حدثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن أبا السمح حدَّثه عن ابن حُجيرة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي السمح، وهو دراج بن سمعان وثَّقه ابن معين والدارمي، وقال أبو داود: أحاديثه مستقيمة، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وتكلم فيه غير واحد من أهل العلم منهم الإمام أحمد والنسائي وأبو حاتم والدارقطني وغيرهم، والخلاصة فيه أنه حسن الحديث، وفي حديثه عن أبي الهيثم ضعفٌ" وهذا ليس من حديثه.

ورواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (80) من طريق عبد الله بن وهب، ورواه البزار"كشف الأستار" (2233) من طريق آخر عن ابن حجيرة، وفيه قال الهيثمي في"المجمع" (7/ 67):"من لم أعرفه".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই মু'মিন ব্যক্তি কবরে একটি সবুজ বাগানে থাকে। তার জন্য তার কবর সত্তর হাত প্রশস্ত করা হয় এবং পূর্ণিমার রাতে চাঁদের মতো আলোকিত করা হয়। তোমরা কি জানো, এই আয়াতটি কী সম্পর্কে নাযিল হয়েছে: 'আর তার জন্য রয়েছে সংকীর্ণ জীবন এবং আমরা তাকে কিয়ামতের দিন অন্ধ করে উত্থিত করব।' (সূরা তাহা: ১২৪) তোমরা কি জানো সংকীর্ণ জীবন (আল-মাঈশাহ আদ-দাঙ্কাহ) কী? তারা বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: তা হলো তার কবরে কাফিরের শাস্তি। যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! নিশ্চয়ই তার উপর নিরানব্বইটি তিন্নীন (মহাপ্রাণী) নিযুক্ত করা হবে। তোমরা কি জানো তিন্নীন কী? সত্তরটি সাপ, প্রত্যেক সাপের সাতটি মাথা; তারা তাকে কিয়ামত পর্যন্ত দংশন করতে থাকবে এবং আঁচড়াতে থাকবে।