হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3761)


3761 - عن المقدام بن معد يكرب، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"للشهيد عند الله ست خصال: …" وذكر منها:"ويُجار من عذاب القبر".

حسن: رواه ابن ماجه (2799) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، قال: حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معد يكرب فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجْل إسماعيل بن عياش فإنه حسن الحديث إذا روى عن أهل بلده الشاميين، وبَحير بن سعد منهم من حمص، ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (17182)، وتابعه بقية بن الوليد فرواه عن بحير بن سعد بإسناده مثله رواه الترمذي (1663) وقال:"حسن صحيح غريب".

قلت: وفيه بقية بن الوليد وهو مدلس لكنْ تقبل عنعنتُه عن بحير بن سعد كما قال ابن عبد الهادي في تعليقه على علل ابن أبي حاتم. .

وللحديث أسانيد أخرى من حديث إسماعيل بن عياش فإنه جعله مرة من مسند ابن معد يكرب،
وأخرى من مسند عبادة بن الصامت رواه الإمام أحمد (17183) عن الحكم بن نافع، حدثنا ابن عياش، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن عبادة بن الصامت، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

فلعله سمع هذا الحديث من شيخه بَحير بن سعد من وجهين، لأنَّه حمصي وسماعه من أهل بلده صحيح، فلا اضطراب في الإسناد.




মিকদাম ইবনে মা'দিকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আল্লাহর কাছে শহীদের জন্য ছয়টি বিশেষ মর্যাদা রয়েছে। ...’ তিনি এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন: ‘তাকে কবরের আযাব থেকে মুক্তি দেওয়া হবে।’









আল-জামি` আল-কামিল (3762)


3762 - عن قيس الجذامي -رجل كانت له صحبة- قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يُعطى الشهيد ست خصال عند أول قطرةٍ من دمه: يُكَفَّر عنه كلُّ خطيئةٍ، ويُرَى مقعَده من الجنة، ويُزَوَّج من الحُور العِين، ويُؤْمَن من الفَزَعِ الأكبر، ومن عذاب القبر، ويُحَلَّى حُلَّة الإيمان".

حسن: رواه الإمام أحمد (17783) عن زيد بن يحي الدمشقي، قال: حدثنا ابن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن قيس الجُذامي فذكره.

ورجال إسناده ثقات غير ابن ثوبان وهو: عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان الشامي اختلف فيه قول ابن معين فقال مرة: هو ضعيف وأبوه ثقة، وأخرى قال: ليس به بأس، وقال: ابن ثوبان أصله من خراسان، نزل الشام، ولم يذكروه إلَّا بخير، وترجمه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1591 - 1993) وقال:"وقد كتبت حديثه عن ابن جوصاء وأبي عروبة من جميعهما، ويبلغ أحاديث صالحة، وكان رجلًا صالحًا، ويكتب حديثُه على ضعفه".

ولكن خالفه سفيان فرواه عن برد بن سنان عن مكحول وأوقفه عليه، أخرجه ابن أبي شيبة (5/ 307) عن وكيع، عن سفيان.

وبرد بن سنان هو أبو العلاء الدمشقي وثَّقه ابن معين وغيره، وضعَّفه علي بن المديني، وعلى ترجيح الوقف، فإن له حكم الرفع، فإن إثبات العذاب والثواب ونهيه لا يقال بالرأي في حين رواه أبو نعيم في"معرفة الصحابة" (5723) من وجه آخر عن أبي توبة الربيع بن نافع، ثنا الهيثم بن حُميد، عن زيد بن واقد، عن كثير بن مرة به مرفوعًا وفيه:"ويجار من عذاب القبر".

والهيثم بن حميد هو الغساني وثَّقه ابن معين وأبو داود، وقال النسائي:"ليس به بأس". وهذه متابعة قوية لحديث عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان.

وقيس الجذامي هو: ابن زيد بن جبار، وفي"الإصابة": ابن جبار، الجذامي، جمهور أهل العلم أثبتوا أن له صحبة، إلَّا ابن أبي حاتم فإنه نفي ذلك، والصواب ما قاله الجمهور، وقد أورد الحافظ في"الإصابة" قصة وفدِه على النبي صلى الله عليه وسلم والدعاء له.




কায়েস আল-জুযামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: শহিদকে তার রক্তের প্রথম ফোঁটা ঝরার সঙ্গে সঙ্গে ছয়টি বিশেষ মর্যাদা দেওয়া হয়: তার সমস্ত গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়, জান্নাতে তার অবস্থান তাকে দেখানো হয়, তাকে ডাগর চোখের হুরদের সাথে বিবাহ দেওয়া হয়, তাকে মহা আতঙ্ক (ফাযা আল-আকবার) এবং কবরের আযাব থেকে নিরাপদ রাখা হয়, আর তাকে ঈমানের অলঙ্কারে ভূষিত করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3763)


3763 - عن عبد الله بن يسار قال: كنتُ جالسًا، وسليمانُ بن صُرد وخالد بن عرفُطة فذكروا أن رجلًا توفِّيَ، مات ببطْنِه فإذاهما يشتهيان أن يكونا شهداءَ جنازته، فقال أحدهما للآخر: ألم يَقُل رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يقتله بَطْنُه فلن يُعذَّب في قبره" فقال الآخر: بلي.

صحيح: رواه النسائي (2052) عن محمد بن عبد الأعلى، قال: حدثنا خالد، عن شُعبة، قال: أخبرني جامع بن شَدَّاد، قال: سمعت عبد الله بن يسار فذكره، وإسناده صحيح، وقد صحَّحه أيضًا ابن حبان (2933) وأخرجه الإمام أحمد (18310) كلاهما من حديث شعبة، ورواه الترمذي (1064) من وجه آخر عن أبي إسحاق السبيعي، قال: قال سليمان بن صُرد الخالد بن عرفُطة (أو خالد لسليمان) فذكره، وقال:"حسن غريب من هذا الوجه، وقد رُوي من غير هذا الوجه".

قلت: لعله يشير بذلك إلى الوجه الذي أخرجه النسائي وغيره كما هو عند البيهقي في"إثبات عذاب القبر"




আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সুলাইমান ইবনে সুরদ ও খালিদ ইবনে উরফুতার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে বসেছিলাম। তখন তারা আলোচনা করলেন যে, এক ব্যক্তি পেটের পীড়ায় মারা গিয়েছেন। তারা দু'জনই আকাঙ্ক্ষা করলেন যে, তারা যেন তার জানাজায় উপস্থিত থাকতে পারতেন। তাদের মধ্যে একজন অন্যজনকে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেননি যে: "যাকে তার পেটের রোগ মেরে ফেলে, তাকে তার কবরে শাস্তি দেওয়া হবে না?" অপরজন বললেন: হ্যাঁ।









আল-জামি` আল-কামিল (3764)


3764 - عن عبد الله بن عمْرو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلمٍ يموتُ في ليلة الجمعة إلَّا بُرِئَ من فتنة القبر".

حسن: رواه أحمد (7050) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدثنا بقية، حدثني معاوية بن سعيد التجيبي، سمعت أبا قبيل المصري يقول: سمعت عبد الله بن عمرو بن العاص فذكر الحديث.

وفي هذا الإسناد صرَّح بقية بالتحديث كما صرَّح في بقية الإسناد بالسماع، فزالت منه تهمة التدليس. وهذا إسناد حسن، فإنَّ أبا قَبيل المصري هو حي بن هانئ قال فيه أحمد وابن معين وأبو زرعة:"ثقة"، وقال أبو حاتم:"صالح الحديث".

ورواه الإمام أحمد أيضا (6646) عن سُريج، حدثنا بقية، عن معاوية بن سعيد، عن أبي قبيل، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.

ورواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (172) من طريق الليث بن سعد، حدثني خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، أن أبا عبد الرحمن الحبلي أخبره أن أبنًا لعياض بن عُقبة توفِّيَ يوم الجمعة، فاشتد وجده عليه، فقال له رجل من الصدف: يا أبا يحيي ألَا أُبِشِّرك بشيْءٍ سمعته من عبد الله بن عمْرو بن العاص، سمعته يقول: فذكره.

ورجل من الصدف هو سنان بن عبد الرحمن الصدفي كما جاء في رواية أخرى عنده (174) من
طريق ابن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن سنان بن عبد الرحمن الصدفي، أن عبد الله بن عمْرو بن العاص كان يقول:"من توفي يوم الجمعة أو ليلة الجمعة وُقِيَ الفتان"، إلَّا أنه لم يرفعه، وحكمه الرفع، لأن فيه الإخبار عن الغيبيات، وابن وهب كان سماعه من ابن لهيعة قبل اختلاطه.

أما ما رواه الترمذي (1074) عن محمد بن بشار، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، وأبو عامر العقدي، قالا: حدثنا هشام بن سعد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، عن عبد الله بن عمْرو مرفوعًا: : ما من مسلم يموت يوم الجمعة أو ليلة الجمعة إلَّا وقاه الله فتنة القبر" ففيه انقطاع، فإن ربيعة بن سيف لم يسمع من عبد الله بن عمْرو، وقد أكَّدَ بذلك الترمذي نفسه فقال:"حسن غريب" وقال: هذا حديث ليس إسناده بمتصل، ربيعة بن سيف إنَّما يروي عن أبي عبد الرحمن الحُبلي، عن عبد الله بن عمْرو، ولَا نعرِفُ لربيعة سماعًا من عبد الله بن عمْرو"، هكذا في نسخة فؤاد عبد الباقي، وفي نسخة أخرى قال:"غريب" فقط وهو الصحيح، لأن الحسن والانقطاع لا يجتمعان.

وللحديث طرق أخرى غير أنَّ ما ذكرته هو أصحها.

وفي الباب حديثان ضعيفان:

أحدهما: حديث أنس بن مالك رواه أبو يعلى (4099) وفي سنده يزيد الرقاشي وهو ضعيف.

والثاني: حديث جابر بن عبد الله، أخرجه أبو نعيم في"الحلية" (3/ 155)، وفيه عمر بن موسى ذاهب الحديث، قال أبو نعيم:"غريب من حديث جابر، تفرد به عمر بن موسى وهو مدني فيه لين".

انظر للمزيد"كتاب الجمعة".




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে কোনো মুসলিম জুমআর রাতে ইন্তিকাল করে, সে অবশ্যই কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে মুক্তি পায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3765)


3765 - عن سلمان قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"رباط يوم وليلة خير من صيام شهر وقيامه، وإن مات جرى عليه عملُه الذي كان يعمله، وأجري عليه رزقُه، وأمن الفُتَّان".

صحيح: رواه مسلم في كتاب الإمارة (1913) عن عبد الله بن عبد الرحمن بن بهرام الدارمي، حدثنا أبو الوليد الطيالسي، حدثنا الليث (يعني ابن سعد) عن أيوب بن موسى، عن مكحول، عن شرحبيل بن السِّمْط، عن سلمان فذكره.

وقوله:"الفُتَّان" بضم الفاء، جمع فاتن، ويحمل على أنواع من الفتن بعد الإقبار من ضغطة القبر، والسُؤال والتعذيب في القبر.

وضبط بعضهم بفتح الفاء، وهو الذي يفتن المقبور بالسؤال فيعذبه.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এক দিন ও এক রাতের সীমান্ত পাহারা এক মাস সিয়াম (রোজা) পালন ও রাত জেগে ইবাদত করার চেয়েও উত্তম। যদি সে (সীমান্ত প্রহরী) মারা যায়, তবে তার আমল যা সে করত, তা তার জন্য জারী থাকবে, তার রিযক তার জন্য জারী করা হবে, এবং সে কবরের ফিতনা সৃষ্টিকারীদের (পরীক্ষক ও আযাব) থেকে নিরাপদ থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3766)


3766 - عن فَضالة بن عبيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل الميت يُختم على عمله إلا
المرابطُ، فإنه ينمو له عملُه إلى يوم القيامة، ويُؤَمَّنُ من فُتَّانِ القبر".

صحيح: رواه أبو داود (2500)، والترمذي (1621) كلاهما من طريق أبي هانئ الخولاني، عن عمرو بن مالك، عن فَضالة بن عبيد فذكره، واللفظ لأبي داود، ولفظ الترمذي قريب منه.

وقال:"حسن صحيح".

ومن هذا الوجه أخرجه ابن حبان في صحيحه (4674) والحاكم (2/ 79) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: إسناده صحيح إلا أنه ليس على شرط مسلم، فإن عمرو بن مالك وهو الهمداني أبو علي الجنبي لم يخرج له مسلم، وإنما أخرج له أصحاب السنن.




ফাযালা ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক মৃতের আমলের সমাপ্তি ঘটে যায়, কিন্তু যে সীমান্ত প্রহরায় নিযুক্ত থাকে (আল-মুরাবিত), তার আমল কিয়ামত পর্যন্ত বাড়তে থাকে এবং সে কবরের ফিতনাকারী ফেরেশতাদের পরীক্ষা থেকে নিরাপদ থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3767)


3767 - عن عقبة بن عامر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كل ميت يُختم على عمله، إلا المرابط في سبيل الله، فإنه يُجرى له أجر عملِه حتى يُبْعث، ويؤمن من فُتَّان القبر".

حسن: رواه أحمد (17359) عن عبد الله بن يزيد، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا مِشْرح قال: سمعت عقبة بن عامر فذكره.

قال الإمام أحمد: حدثنا قتيبة، قال فيه:"ويؤمن من فُتَّان القبر".

وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أن عبد الله بن يزيد وهو المقرئ سمع منه قبل اختلاطه، ورواية العبادلة عنه مستقيمة.

وإسناده حسن من أجله، ومن أجل مِشْرح، وهو ابن هاعان المعافري، أبو مصعب المصري، قال فيه يحيى بن معين:"ثقة" وقال عثمان:"دراج ويشرح ليسا بكل ذاك، وهما صدوقان".

وقال ابن عدي في"الكامل" (1/ 2460):"ولمشرح عن عقبة غير ما ذكرتُ، يروي عنه ابن لهيعة وغيره من شيوخ مصر، وأرجو أنه لا بأس به".




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক মৃত ব্যক্তির আমলের পরিসমাপ্তি ঘটে যায়, তবে আল্লাহর পথে সীমান্ত রক্ষী (মুরাবিত) ব্যতীত। কারণ, তার আমলের সওয়াব চলতে থাকে যতক্ষণ না তাকে পুনরুত্থিত করা হয়, এবং সে কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে নিরাপদ থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3768)


3768 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من مات مرابطًا في سبيل الله أَجرى عليه أجْرَ عمله الصالح الذي كان يعمل، وأُجْري عليه رزقُه، وأُمِن من الفُتَّان، وبعثه الله يوم القيامة آمنًا من الفَزَع".

حسن: رواه ابن ماجه (2767) عن يونس بن عبد الأعلى، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني الليث، عن زُهرة بن معبد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه والد زهرة وهو معبد بن عبد الله التيمي لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 433) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، وقد توبع فيما رواه الإمام أحمد (9244) عن موسى بن داود، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن موسي بن وردان، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه:
من مات مرابطًا وُقِي فتنة القبر، وأُومن من الفزع الأكبر، وغُدي عليه، وريح برزقِه من الجنة، وكتب له أجرُ المرابط إلى يوم القيامة" وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، ولكن تبين من متابعته بأنه لم يختلط في هذا الحديث.

وأما ما رواه ابن أبي عاصم في كتاب الجهاد (297)، والطبراني في"الأوسط" (9308) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه: من مات مرابطًا أُجري عليه رزقه من الجنة، ونما له عملُه إلى يوم القيامة، ووُقي فُتَّان القبر".

ففيه عبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيفٌ، ضعَّفه الإمام أحمد والنسائي وأبو زرعة، وقال ابن حبان في المجروحين:"كان يقلب الأخبار، وهو لا يعلم".

وبقية الأحاديث في ذكر الرباط وفضله ستأتي في"كتاب الجهاد".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে প্রহরায় (ইসলামের সীমান্তে পাহারা দেওয়া অবস্থায়) থাকা অবস্থায় মারা যায়, তার আমলকৃত নেক কাজের প্রতিদান অব্যাহতভাবে চালু রাখা হয়, এবং তার রিযিকও চালু রাখা হয়, তাকে কবরের ফিতনা থেকে নিরাপত্তা দেওয়া হয়, আর কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাকে মহাভয় (আতঙ্ক) থেকে মুক্ত অবস্থায় উত্থিত করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3769)


3769 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت إذا وُضع في قبره إنه ليسمع خَفْقَ نعالهم حين يولون عنه فإن كان مؤمنًا كانت الصلاة عند رأسه، وكان الصيام عن يمينه، وكانت الزكاة عن يساره، وكان فعل الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف والإحسان إلى الناس عند رجليه، فيؤتي من قبل رأسه فتقول الصلاة: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى عن يمينه فيقول الصيام: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى عن يساره فتقول الزكاة: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى من قبل رجليه فيقول فعل الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف إلى الناس: ما قبلي مدخل، وذكر الحديث بطوله.

حسن: رواه ابن حبان (3113)، والحاكم (1/ 379 - 381)، والبيهقي في"إثبات عذاب القبر" (154) كلهم من طرق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث بطوله، وسبق قبل أبواب.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو، وهو حسن الحديث.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয়ই যখন মৃত ব্যক্তিকে তার কবরে রাখা হয়, তখন সে তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায়, যখন তারা তার কাছ থেকে ফিরে যায়। যদি সে মুমিন হয়, তখন সালাত তার মাথার কাছে থাকে, সিয়াম তার ডান দিকে থাকে, যাকাত তার বাম দিকে থাকে এবং সাদাকাহ, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা, নেক কাজ ও মানুষের প্রতি অনুগ্রহস্বরূপ অন্যান্য ভালো কাজগুলো তার পায়ের কাছে থাকে। অতঃপর তার মাথার দিক থেকে (ফেরেশতারা) আসে, তখন সালাত বলে: আমার দিক থেকে (আযাবের) প্রবেশের কোনো পথ নেই। তারপর তার ডান দিক থেকে আসে, তখন সিয়াম বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই। অতঃপর তার বাম দিক থেকে আসে, তখন যাকাত বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই। অতঃপর তার পায়ের দিক থেকে আসে, তখন সাদাকাহ, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা ও মানুষের প্রতি নেক কাজগুলো বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (3770)


3770 - عن أبي هريرة، أحسبه رفعه قال:"إن المؤمن ينزل به الموت ويعاين ما يعاين، فود لو خرجت -يعني: نفسه- والله يحب لقاءه، وإن المؤمن يصعد بروحه إلى السماء، فتأتيه أرواح المؤمنين، فيستخبرونه عن معارفهم من أهل الأرض، فإذا قال: تركت فلانا في الدنيا أعجبهم ذلك، وإذا قال: إن فلانا قد مات، قالوا: ما
جيء به إلينا، وإن المؤمن يجلس في قبره فيسأل: من ربه؟ فيقول: ربي الله. فيقول: من نبيك؟ فيقول: نبي محمد صلى الله عليه وسلم. قال: ما دينك؟ قال: ديني الإسلام. فيفتح له باب في قبره، فيقول أو يقال: انظر إلى مجلسك. ثم يرى القبر فكأنما كانت رقدة، وإذا كان عدوا لله نزل به الموت، وعاين ما عاين فإنه لا يحب أن تخرج روحه أبدا، والله يبغض لقاءه، فإذا جلس في قبره أو أجلس يقال له: من ربك؟ فيقول: لا أدري. فيقال: لا دريت، فيفتح له باب من جهنم، ثم يضرب ضربة تسمع كل دابة إلا الثقلين، ثم يقال له: نم كما ينام المنهوش". فقلت لأبي هريرة: ما المنهوش؟ قال: الذي تنهشه الدواب والحيات ثم"يضيق عليه قبره".

حسن: رواه البزار في مسنده (9760) وعبد الله بن أحمد في السنة (1447) كلاهما من حديث الوليد بن القاسم، نا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبزار.

وإسناده حسن من أجل يزيد بن كيسان، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وأما قول البزار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة إلا الوليد بن القاسم"، فهو ليس كذلك بل رواه أيضا يحيى بن سعيد، عن يزيد بن كيسان، ومن طريقه رواه عبد الله بن أحمد في السنة (1446).

وأما ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"إن أعمالكم تعرض على أقاربكم وعشائركم من الأموات، فإن كان خيرًا استبشروا به، وإن كان غير ذلك قالوا: اللَّهم! لا تمتهم حتى تهديَهم كما هديتنا، ففيه رجل لم يسم.

رواه الإمام أحمد (12683) عن عبد الرزاق، أخبرنا سفيان، عمن سمع أنس بن مالك فذكره، وإسناده ضعيف لإبهام الواسطة بين سفيان وأنس، ولم أقف على إسناد آخر ذكر فيه هذه الواسطة. وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي أيوب الأنصاري مرفوعا:"إن نفس المؤمن إذا قُبضتْ تلقَّاها أهل الرحمة من عباد الله، كما تَلَقَّون البشيرَ من أهل الدنيا فيقولون: انظروا صاحبكم يستريح، فإنه في كَرْبٍ شديد. ثم يسألونه: ما فعل فلان؟ وما فعلت فلانة، هل تزوجتْ؟ فإذا سألوه عن الرجل قد مات قبله فيقول: هَيْهات، قد مات ذاك قبلي، فيقولون: إنا لله وإنا إليه راجعون، ذُهب به إلى أمهِ الهاوية، بئستِ الأُم، وبئستِ المربيةُ، وقال: إن أعمالكم تُعرض على أقاربكم وعشائركم من أهل الآخرة، فإن كان خيرًا فرحوا واستبشروا وقالوا: اللَّهم! هذا فضلُك ورحمتك، فأَتْمِم نعمتَك عليه، وأَمِتْه عليها، ويُعرض عليهم عملُ المسيء فيقولون: اللَّهم! أَلْهِمه عملًا صالحًا تَرضى به، وتُقربه إليك".

رواه الطبراني في"الأوسط" (148) عن أحمد بن يحيي بن خالد بن حيَّان، قال: حدثنا محمد ابن سفيان الحضرمي، قال: حدثنا مَسْلمةُ بن علي، عن زيد بن واقد وهشام بن الغاز، عن
مكحول، عن عبد الرحمن بن سلامة، عن أبي رُهْم السباعي، عن أبي أيوب الأنصاري فذكره.

قال الطبراني:"لا يروي هذا الحديث عن مكحول إلا زيد بن واقد وهشام بن الغاز، تفرد بهما مسلمة بن علي".

وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 327) وقال:"رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط" وفيه مسلمة بن علي وهو ضعيف".

قلت: وهو كما قال، فإن مسلمة بن علي هو الخشني من أهل الشام قال فيه ابن حبان:"كان ممن يقلب الأسانيد، ويروي عن الثقات ما ليس من أحاديثهم توهمًا، فلما فحش ذلك منه بطل الاحتاج به""المجروحين" (1076).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় যখন মুমিন ব্যক্তির নিকট মৃত্যু আসে এবং সে যা দেখবে তা দেখতে পায়, তখন সে আকাঙ্ক্ষা করে যে, তার রূহ (জান) যেন বের হয়ে যায়। আর আল্লাহ তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করা পছন্দ করেন। আর নিশ্চয় মুমিন ব্যক্তির রূহ আসমানের দিকে আরোহণ করে। তখন মুমিনদের রূহসমূহ তার নিকট আসে এবং তারা দুনিয়াবাসী তাদের পরিচিতজনদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে থাকে। যখন সে বলে যে, আমি অমুককে দুনিয়াতে রেখে এসেছি, তখন তারা আনন্দিত হয়। আর যখন সে বলে যে, অমুক ব্যক্তি মারা গেছে, তখন তারা বলে, তাকে তো আমাদের নিকট আনা হয়নি। আর মুমিনকে তার কবরে বসানো হয় এবং তাকে প্রশ্ন করা হয়: তোমার রব কে? সে বলে: আমার রব আল্লাহ। তাকে জিজ্ঞাসা করা হয়: তোমার নবী কে? সে বলে: আমার নবী মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম। তাকে বলা হয়: তোমার দীন কী? সে বলে: আমার দীন ইসলাম। তখন তার কবরে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং সে দেখে অথবা তাকে বলা হয়: তোমার স্থানটি দেখ। এরপর সে কবরকে দেখে মনে করে যেন এটি ছিল একটি ঘুম (মাত্র)। আর যখন সে আল্লাহর শত্রু হয়, তখন তার নিকট মৃত্যু আসে এবং সে যা দেখবে তা দেখতে পায়। সে কখনো চায় না যে তার রূহ বের হয়ে যাক। আর আল্লাহ তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করাকে ঘৃণা করেন। অতঃপর যখন তাকে তার কবরে বসানো হয় বা বসানো হয়, তখন তাকে বলা হয়: তোমার রব কে? সে বলে: আমি জানি না। তখন বলা হয়: তুমি জানলে না। অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। এরপর তাকে এমন জোরে আঘাত করা হয় যে, মানুষ ও জিন ব্যতীত সমস্ত প্রাণী সেই শব্দ শুনতে পায়। তারপর তাকে বলা হয়: তুমি ঘুমাও, যেমন ‘আল-মানহুশ’ ঘুমায়। আমি (রাবী) আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: ‘আল-মানহুশ’ কী? তিনি বললেন: যাকে হিংস্র প্রাণী ও সাপেরা দংশন করে। এরপর তার জন্য তার কবর সংকীর্ণ করে দেওয়া হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3771)


3771 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل الميت القبر، مُثِّلتْ له الشّمس عند غروبها، فيقول: دعوني أصلي".

حسن: رواه ابن ماجه (4272) عن إسماعيل بن حفصٍ الأُبلّي، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

وصحَّحه ابن حِبّان (3116) ورواه من هذا الوجه.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن حفص قال فيه النسائي:"أرجو أن لا يكون به بأس"، وذكره ابن حبان في"الثقات".

وأبو بكر بن عياش وهو الأسدي الكوفي الحناط المقريء مختلف فيه، والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"أبو بكر بن عياش هذا كوفي مشهور، وهو يروي عن أجلة الناس، وحديثه فيه كثرة، وقد روى عنه من الكبار جماعة، وحديثه مسندُه ومقطوعه يكثر، وهو من مشهوري مشايخ الكوفة، ومن المختصين بالرواية عن جملة مشايخهم، وهو من قُراء أهل الكوفة، وعن عاصم أخذ القراءة، وعليه قرأ، وهو في رواياته عن كل من روى عنه لا بأس به، وذلك أني لم أجد له حديثًا منكرًا إذا روى عنه ثقة إلا أن يروي عنه ضعيف"، انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মৃত ব্যক্তি কবরে প্রবেশ করে, তখন তার সামনে সূর্যকে অস্ত যাওয়ার সময়কার রূপ দেখানো হয়। তখন সে বলে: 'আমাকে ছেড়ে দাও, আমি সালাত (নামাজ) আদায় করি।'"









আল-জামি` আল-কামিল (3772)


3772 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل المؤمن قبره فأتاه ملكان فانتهراه فيقوم يهب كما يهب النائم فيسألانه: من ربك؟ وما دينك؟ ومن نبيك؟ فيقول: الله ربي، والإسلام ديني، ومحمد نبيي، فيقولان له: صدقت كذلك كنت، فيقال: أفرشوه من الجنة، وألبسوه من الجنة، فيقول: دعوني حتى آتي أهلي، فيقولان: اسكن".
حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (866) عن يوسف بن يعقوب الصفار، ثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (238)، ورواه أحمد (14547) عن شاذان قال: حدثنا أبو بكر بن عياش به مختصرًا.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي بكر بن عياش غير أنه حسن الحديث كما سبق من كلام ابن عدي فيه.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো মু'মিন তার কবরে প্রবেশ করে, তখন তার কাছে দু'জন ফিরিশতা আসে এবং তারা তাকে ধমক দেয়। তখন সে জেগে ওঠা ঘুমন্ত ব্যক্তির মতো চমকে উঠে দাঁড়ায়। তারা তাকে জিজ্ঞাসা করে: তোমার রব কে? তোমার দ্বীন কী? এবং তোমার নবী কে? সে বলে: আল্লাহ আমার রব, ইসলাম আমার দ্বীন, এবং মুহাম্মাদ আমার নবী। তখন তারা দু'জন তাকে বলে: তুমি সত্য বলেছ, তুমি তেমনই ছিলে। অতঃপর বলা হয়: তার জন্য জান্নাতের বিছানা বিছিয়ে দাও এবং জান্নাতের পোশাক পরিয়ে দাও। সে তখন বলে: আমাকে যেতে দাও, যেন আমি আমার পরিবারের কাছে পৌঁছাতে পারি। তখন তারা দু'জন বলে: শান্ত হও।









আল-জামি` আল-কামিল (3773)


3773 - عن أبي الزبير أنه سأل جابر بن عبد الله، عن فتَّانَي القَبْر، فقال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن هذه الأُمَّة تُبتلى في قُبورِها، فإذا أُدْخِلَ المُؤْمِنُ قَبْرَه، وتَوَلَّى عنه أصحابُه، جاء مَلَكٌ شديدُ الانتهار، فيقولُ له: ما كُنْتَ تقولُ في هذا الرَّجل؟ فيقولُ المُؤمِنُ: أقولُ: إنَّه رسولُ الله وعَبْدُه، فيقولُ له المَلَكُ: انظُرْ إلى مَقْعَدِكَ الذي كان لك في النار، قد أنجاكَ الله منه، وأبدَلَكَ بمَقْعَدِكَ الذي تَرَي من النار، مَقْعَدَكَ الذي تَرَى من الجنة، فيراهُما كِلاهُما، فيقولُ المُؤْمِنُ: دَعُوني أُبَشِّرْ أهلي، فيُقالُ له: اسْكُنْ، وأمَّا المُنافِقُ، فيُقْعَدُ إذا تَوَلَّى عنه أهله، فيقال له: ما كُنْت تقولُ في هذا الرجل؟ فيقولُ: لا أدري، أقولُ ما يقولُ الناسُ، فيقال له: لا دَرَيْتَ، هذا مَقْعَدُكَ الذي كان لك من الجنة، قد أُبْدِلْتَ مكانَه مَقْعدَكَ من النار".

قال جابر: فسمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يُبْعَثُ كُلُّ عَبْدٍ في القبرِ على ما مات، المؤمنُ على إيمانِه، والمنافقُ على نفاقِه".

صحيح: رواه عبد الرزاق (6744، 6746) عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أحمد (14722)، والطبراني في"الأوسط" (9072) والبيهقي في"إثبات عذاب القبر" (239) كلهم من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير أنه سأل جابرا فذكره، واللفظ لأحمد. وابن لهيعة فيه كلام معروف ولكنه توبع.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু যুবাইর তাঁকে কবরের প্রশ্নকারী ফেরেশতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:

"নিশ্চয়ই এই উম্মতকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো মু’মিনকে তার কবরে প্রবেশ করানো হয় এবং তার সাথীরা তাকে ত্যাগ করে চলে যায়, তখন একজন কঠোর প্রকৃতির ধমকদাতা ফেরেশতা এসে তাকে বলেন: এই ব্যক্তি (নবী) সম্পর্কে তুমি কী বলতে?" মু’মিন তখন বলবে: "আমি বলি, তিনি আল্লাহর রাসূল এবং তাঁর বান্দা।" তখন ফেরেশতা তাকে বলবেন: "তোমার সেই স্থানটির দিকে তাকাও যা তোমার জন্য জাহান্নামে ছিল। আল্লাহ তোমাকে তা থেকে মুক্তি দিয়েছেন এবং জাহান্নামের যে স্থানটি তুমি দেখছ, তার পরিবর্তে জান্নাতের এই স্থানটি দিয়েছেন, যা তুমি দেখতে পাচ্ছ।" সে তখন উভয় স্থানই দেখতে পাবে। মু’মিন বলবে: "আমাকে আমার পরিবারকে সুসংবাদ দিতে দাও।" তখন তাকে বলা হবে: "শান্ত হও।"

আর যখন মুনাফিককে তার পরিবারের লোকেরা চলে যাওয়ার পর বসানো হবে, তখন তাকে জিজ্ঞেস করা হবে: "এই ব্যক্তি সম্পর্কে তুমি কী বলতে?" সে বলবে: "আমি জানি না। লোকেরা যা বলত, আমিও তাই বলতাম।" তখন তাকে বলা হবে: "তুমি জানলে না! তোমার জন্য জান্নাতে যে স্থানটি নির্ধারিত ছিল, তার পরিবর্তে এটিই তোমার জাহান্নামের স্থান।"

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আরও বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক বান্দাকেই কবরে তার মৃত্যুর অবস্থার উপর ভিত্তি করে পুনরুত্থিত করা হবে; মু’মিনকে তার ঈমানের উপর এবং মুনাফিককে তার নিফাকের (কপটতার) উপর।"









আল-জামি` আল-কামিল (3774)


3774 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بين النفختين أربعون" قالوا: يا أبا هريرة! أربعون يومًا؟ قال: أبيتُ، قال: أربعون سنة؟ قال: أبيت. قال: أربعون شهرًا؟ قال: أبيت."ويَبلى كل شيء من الإنسان إلا عجْب ذنبه، فيه يُرَكَّبُ الخلق".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4814)، ومسلم في الفتن (2955) كلاهما من حديث الأعمش، قال: سمعت أبا صالح، قال: سمعت أبا هريرة فذكر الحديث. واللفظ للبخاري.
وزاد مسلم في أول الحديث:"ثم يُنْزل الله من السماء ماءً فينبتون كما ينبتُ البقلُ، وليس من الإنسان شيء إلا يبلى إلا عظمًا واحدًا وهو عجْبُ الذَنَب".

وفي رواية عنده من حديث همام بن منبة:"إن في الإنسان عَظْمًا لا تأكله الأرض أبدًا، فيه يُركَّب يوم القيامة" قالوا: أي عظم هو؟ يا رسول الله؟ قال:"عجْبُ الذَنَب".

قال البيهقي:"وكأن أبا هريرة لم يحفظ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم ما أراد بالأربعين، وأهل التفسير يقولون: هي أربعون سنة"،"إثبات عذاب القبر" (2422).

وفي الحديث إشارة إلى قوله تعالى: {وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ} [الزمر: 68]. قالوا في قوله تعالى: {إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ} هم جبريل، وميكائيل، وإسرافيل، وملك الموت، ثم يأمر ملك الموت أن يقبض روح ميكائيل، ثم روح جبريل، ثم روح إسرافيل، ثم يأمر ملك الموت فيموت، ثم يلبث الخلق بعد النفخة الأولى في البرزح أربعين سنة، ثم تكون النفخة الأخرى، فيُحبي الله إسرافيل فيأمره أن ينفخ الثانية فذلك قوله تعالى: {ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ} أي على أرجلهم ينظرون إلى البعث الذي كذبوا به في الدنيا. وقيل: غير ذلك.

وقالوا أيضًا: إن أرواح الكفار كانوا يعرضون على منازلهم من النار طرفي النهار، فلما كان بين النفختين رفع عنهم العذاب، فرقدت تلك الأرواح بين النفختين، فلما بعثوا في النفخة الأخرى، وعاينوا يوم القيامة ما كانوا يكذبون به في الدنيا من البعث والحساب بعثوا بالويل فقالوا: {يَاوَيْلَنَا مَنْ بَعَثَنَا مِنْ مَرْقَدِنَا} [يس: 52] قالت لهم الملائكة: {هَذَا مَا وَعَدَ الرَّحْمَنُ} على ألسنة الرسل، بأنه يبعثكم بعد الموت، فكذبتم به {وَصَدَقَ الْمُرْسَلُونَ} بأن البعث حق. وذلك أنهم ظنوا لما رفع عنهم العذاب أربعين سنة، إن الله لا يعذبهم، ولكن لما نُفخ النفخة الثانية {فَإِذَا هُمْ مِنَ الْأَجْدَاثِ إِلَى رَبِّهِمْ يَنْسِلُونَ (51) قَالُوا يَاوَيْلَنَا مَنْ بَعَثَنَا مِنْ مَرْقَدِنَا} [يس: 51، 52] أي من منامنا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই ফুঁকের (সিংগায় ফুঁক) মাঝে ব্যবধান হলো চল্লিশ।" [বর্ণনাকারী বলেন] উপস্থিত লোকেরা জিজ্ঞেস করলেন, "হে আবূ হুরায়রা! চল্লিশ দিন?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।" তাঁরা বললেন, "চল্লিশ বছর?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।" তাঁরা বললেন, "চল্লিশ মাস?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।"

"মানুষের সবকিছুই পচে গলে নিশ্চিহ্ন হয়ে যাবে, কেবল তার মেরুদণ্ডের শেষ অংশ বা ককসিক হাড় (আ’জবুয যানা’ব) ছাড়া। এর মাধ্যমেই (কেয়ামতের দিন) সৃষ্টিকুলকে আবার জোড়া লাগানো হবে।"

(অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে:) এরপর আল্লাহ আকাশ থেকে পানি বর্ষণ করবেন, ফলে তারা অঙ্কুরিত হবে, যেভাবে শাক-সবজি জন্ম নেয়। মানুষের সবকিছুই পচে যায়, একটিমাত্র হাড় ছাড়া, আর তা হলো আ’জবুয যানা’ব।









আল-জামি` আল-কামিল (3775)


3775 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل ابن آدم تأكله الأرض إلا عَجْبَ الذَّنَب، منه خُلق، وفيه يُركَّبُ".

صحيح: رواه مالك في الجنائز (48) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث. ورواه مسلم في الفتن (2955/ 142) من وجه آخر عن المغيرة الحزامي، عن أبي الزناد بإسناده مثله.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের সবকিছুই মাটি খেয়ে ফেলে (ধ্বংস করে দেয়), কিন্তু 'আযবুয যামাব' (মেরুদণ্ডের সর্বনিম্ন অংশ বা কক্্িগ্স) ব্যতীত। তা থেকেই তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এবং তার মধ্যেই (কেয়ামতের দিন) তাকে পুনরায় যুক্ত করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3776)


3776 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يأكل التراب كل شيء من الإنسان إلا عجْب ذَنَبِه" قيل: مثل ما هو يا رسول الله؟ قال:"مثل حبة خردل، منه تنبتُون".
ابن لهيعة، عن دَرَّاج أبي السمح، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد به.

دراج أبو السمع مختلف فيه، والجمهور على تضعيفه وخاصة في روايته عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد كما قال أبو داود، ولكن قال ابن عدي: عامة الأحاديث التي أمليتُها عن دراج مما لا يتابع عليه، ولم يذكر هذا الحديث فيما أنكره، وقال:"أرجو أن أحاديثه بعد هذه التي أنكرت عليه، لا بأس بها". وأما ابن لهيعة فقد توبع عند ابن حبان في صحيحه (3140)، والحاكم (4/ 609).




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাটি মানুষের সব কিছু খেয়ে ফেলে, কিন্তু তার 'আজব আয-যানাব' (মেরুদণ্ডের শেষ অংশ) ছাড়া।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! তা দেখতে কেমন?" তিনি বললেন: "তা সরিষার বীজের মতো। তা থেকেই তোমাদেরকে পুনরায় উঠানো হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3777)


3777 - عن * *




৩ ৭৭৭ - ... থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (3778)


3778 - عن بريدة بن الحُصَيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نهيتكم عن زيارة القبور فزورها، ونهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فأمسكوا ما بدا لكم، ونهيتكم عن النبيذ إلا في سقاء فاشرَبُوا في الأسقية كلها، ولا تشربوا مسكرًا".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (977) من طرق، عن محمد بن فُضيل، عن أبي سنان (وهو ضرار بن مرة) عن محارب بن دثار، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكر الحديث. ورواه النسائي (2032) من وجه آخر، وفيه:"ولا تقولوا هُجرا""هُجر" - بضم الهاء، أي لا تقولوا ما لا ينبغي من الكلام، فإنه ينافي المطلوب الذي هو التذكير.

ورواه الترمذي (1054) وفيه:"فقد أُذن لمحمد في زيارة قبر أمه فزورها فإنها تذكر الآخرة".

ورواه البيهقي (4/ 76) من وجه آخر عن زهير، عن زيد، عن محارب بن دثار بإسناده وفيه: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فنزلنا منزلًا، ونحن معه قريبا من ألف راكب فقام فصلى ركعتين، ثم أقبل علينا وعيناه تذرفان، فقام إليه عمر فقداه بالأب والأم وقال له: ما لك يا رسول الله! قال:"إني استأذنت ربي في استغفاري لأمي فلم يأذن لي، فبكيت لها رحمة لها من النار، وإني كنت نهيتكم عن زيارة القبور …" فذكر الحديث.

ورواه أبو داود (3235) من طريق معرف بن واصل، عن محارب بن دثار بإسناده وفيه:"نهيتكم عن زيارة القبور، فزورها فإن في زيارتها تذكرة". ومعرف ثقة.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা তা যিয়ারত করো। আর আমি তোমাদেরকে তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা যতদিন ইচ্ছা জমা করে রাখো। আর আমি তোমাদেরকে মশক ছাড়া অন্য পাত্রে নাবীয (খেজুর ভেজানো পানীয়) পান করতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা সকল পাত্রেই পান করো, তবে তোমরা নেশাযুক্ত (জিনিস) পান করবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (3779)


3779 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استأذنتُ ربي أن أستغفر لأمي فلم يأْذَنْ لي، واستأذنْتُه أن أزورَ قبرها فأذن لي".

وفي رواية قال أبو هريرة: زار النبي صلى الله عليه وسلم قبر أمه، فبكى وأبكى من حوله، فقال:"استأذَنْتُ ربي في أن أستغفر لها فلم يُؤذنْ لي، واستأذنتُه في أن أزور قبرها فَأُذِن لي، فزوروا القبور، فإنها تذكر الموت".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (976) من طرق، عن مروان بن معاوية، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث مثله.

والرواية الثانية رواها محمد بن عبيد، عن يزيد بن كيسان بإسناده مثله.
قال البغوي رحمه الله:"ويقال: كان قبر أمه بالأبواء، فمر به عام الحديبية، ويُروى أنه زار قبر أمه في ألْف مُقنع، أي: في ألْف فارس مُغَطَّى بالسلاح"،"شرح السنة" (5/ 463).

وقوله:"استأذنت ربي أن أستغفر لأمي" يحتمل أن يكون هذا الاستئذان قبل نزول قوله تعالى: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى} [التوبة: 113] ويحتمل أن يكون بعد ذلك، وارتجي خصوصية أمه بذلك.

وفي الحديث جواز زيارة قبر المشركين للموعظة والذكرى بمشاهدة قبرهم، ويؤيد ذلك آخر الحديث:"فزوروا القبور فإنها تذكر الموت وقبر المسلم والمشرك فيه سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি আমার রবের কাছে আমার মায়ের জন্য ক্ষমা চাওয়ার অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাকে অনুমতি দেননি। আর আমি তাঁর কাছে তাঁর কবর যিয়ারত করার অনুমতি চাইলে তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন।”

আরেকটি বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মায়ের কবর যিয়ারত করলেন। ফলে তিনি কাঁদলেন এবং তাঁর চারপাশে যারা ছিল, তাদেরকেও কাঁদালেন। অতঃপর তিনি বললেন: “আমি আমার রবের কাছে তাঁর জন্য (ক্ষমা চাওয়ার) অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু আমাকে অনুমতি দেওয়া হয়নি। আর আমি তাঁর কবর যিয়ারত করার অনুমতি চাইলে আমাকে অনুমতি দেওয়া হলো। সুতরাং তোমরা কবর যিয়ারত করো, কেননা তা মৃত্যুকে স্মরণ করিয়ে দেয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3780)


3780 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني نهيتكم عن زيارة القبور، فزوروها، فإن فيها عِبرةً، ونهيتكم عن النبيذ فاشربوا، ولا أحل مسكرًا، ونهيتكم عن الأضاحي فكلوا".

حسن: رواه أحمد (11329) عن يحيى بن آدم، حدثنا ابن المبارك، عن أُسامة، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن عمه، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

وإسناده حسن لأجل أسامة وهو: ابن زيد الليثي المدني حسن الحديث.

ورواه الحاكم في"المستدرك" (1/ 374) من طريق أسامة بن زيد بإسناده، وقال: صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال، إلا أن أسامة بن زيد تكلم فيه النسائي، فقال:"ليس بالقوي"، ومشاه أبو حاتم، وقال العجلي:"ثقة" والخلاصة فيه كما قال الحافظ:"صدوق يهم"، فلا بأس بالاستشهاد به، لأنه أرجو أنه لم يهم في هذا الحديث.

وعم محمد بن حَبَّان هو: واسع بن حبَّان بن منقذ صحابي ابن صحابي.

ورواه البزار"كشف الأستار" (861) من وجه آخر وفيه:"نهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فكلوا وادخروا، ونهيتكم عن زيارة القبور فزُوروها، ولا تقولوا ما يُسخط الرب، ونهيتكم عن الأوعية فانتبذوا، وكل مسكر حرام".

قال البزار: وعمر ومحمد قد حدَّث كل منهما بأحاديث لم يتابع عليها.

قلت: عمر هو: ابن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب ثقة من رجال الشيخين، وكذلك أبوه محمد وهو من رجال الجماعة.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 85) وقال:"رجاله رجال الصحيح".

فلا يضر عدم المتابعة على أحاديثهما إذا كان في الإسناد من قبلهما ومن بعدهما ثقات.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, তবে এখন তোমরা তা যিয়ারত করো, কারণ এর মধ্যে শিক্ষা রয়েছে। আর আমি তোমাদেরকে নাবীয (খেজুর বা আঙ্গুর ভেজানো পানীয়) পান করতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা পান করো, তবে আমি কোনো নেশাকর জিনিস হালাল করি না। আর আমি তোমাদেরকে কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা খাও।"