হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3848)


3848 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تؤخذ صدقات أهل البادية على مياههم، وبأفنيتهم".

حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (مجمع البحرين 1360) عن محمد بن العباس المؤدّب، ثنا عبد الله بن صالح العجليّ، ثنا عبد الملك بن محمد بن أبي بكر، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرو، عن عائشة، فذكرته.

ورواه البيهقيّ في"الكبرى" (4/ 110) من وجه آخر عن عبد الله بن صالح إلا أنه نسبه إلى مصر، وهو الجهني، كاتب اللّيث، صدوق كثير الغلط، ثبت في الكتابة، وكانت فيه غفلة.

وفي سند الطبراني: عبد الله بن صالح العجليّ، وهذا ثقة، وكلاهما متقاربان في الطبقات، والله أعلم ما هو الصّحيح.

وقال البيهقيّ بعد أن ذكر لفظ الحديث بكماله:"لفظ حديث عبد الله بن صالح، وفي رواية عبد العزيز:"تؤخذ صدقات المسلمين من أموالهم على مياههم، وأفنيتهم".

قال الطبراني:"لم يروه عن عبد الله بن أبي بكر إلا عبد الملك بن محمد بن أبي بكر، تفرّد به عبد الله بن صالح". انتهى.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বেদুঈন অঞ্চলের লোকদের সাদকা (যাকাত) তাদের জলাধারগুলোতে (পানির উৎসের কাছে) এবং তাদের আঙ্গিনাগুলোতে (বসতবাড়ির কাছে) গ্রহণ করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3849)


3849 - عن أنس بن مالك، قال: غدوتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعبد الله بن أبي طلحة يحنِّكه، فوافيته في يده الميسم يسم إبل الصّدقة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1502)، ومسلم في اللباس (2119: 112) كلاهما من طريق الوليد بن مسلم، حدّثنا أبو عمرو الأوزاعيّ، حدثني إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس، فذكره.

والوسم من وسَمَ يَسِم وسمة إذا أثّر فيه بكي، والميسم: الحديدة التي يكوي بها.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন, আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আবূ তালহাকে তাহনীক করানোর জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সকালে গেলাম, তখন আমি তাঁকে দেখলাম যে তাঁর হাতে ছিল একটি গরম লোহার শলাকা (আল-মায়সাম), যা দিয়ে তিনি সাদকার (যাকাতের) উটকে চিহ্নিত করছিলেন (ব্র্যান্ডিং করছিলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (3850)


3850 - عن أنس قال: دخلتُ على النّبيّ صلى الله عليه وسلم بأخ لي يحنّكُه، وهو في مِرْبدٍ له، فرأيتُه يسم شاةً. حسبته قال: في آذانها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الذّبائح (5542)، ومسلم في اللباس (2119/ 111) كلاهما من حديث شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس، قال (فذكره). واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.

ولكن في رواية مسلم أخرى عن شعبة، قال:"وأكثر علمي أنه قال:"في آذانها".

ورواه الإمام أحمد (12725) من وجه آخر عن شعبة، وفيه قال هشام: أحسبه قال:"في آذانها". قال: ثم قال بعد:"في آذانها" ولم يشك.

وهشام بن زيد هو ابن أنس، روي عن جدّه أنس بن مالك، كما في رواية أحمد.

وكذلك يجوز وسم نعم الجزية كما رواه مالك في الزكاة (44) عن زيد بن أسلم، عن أبيه، أنه قال لعمر: إنّ في الظّهر ناقة عمياء. فقال عمر: أمن نعم الجزية هي أم من نعم الصّدقة؟ قال: فقلت: من نعم الجزية، إنّ عليها وسم الجزية.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার এক ভাইকে তাহনীক করানোর জন্য নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন তিনি তাঁর একটি খোয়াড়ে (বা বকরির খোঁটায়) ছিলেন। তখন আমি তাঁকে একটি বকরির গায়ে দাগ দিতে (চিহ্নিত করতে) দেখলাম। আমার ধারণা, তিনি বললেন: (দাগটি ছিল) সেগুলোর কানে।









আল-জামি` আল-কামিল (3851)


3851 - عن سُفْيَانَ بْنِ عبد الله: أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ بَعَثَهُ مُصَدِّقًا فَكَانَ يَعُدُّ عَلَى النَّاسِ بِالسَّخْلِ. فَقَالُوا: أَتَعُدُّ عَلَيْنَا بِالسَّخْلِ، وَلا تَأْخُذُ مِنْهُ شَيْئًا؟ فَلَمَّا قَدِمَ عَلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ ذَكَرَ لَهُ ذَلِكَ، فَقَالَ عُمَرُ: نَعَمْ تَعُدُّ عَلَيْهِمْ بِالسَّخْلَةِ يَحْمِلُهَا الرَّاعِي وَلا تَأْخُذُهَا، وَلا تَأْخُذُ الأَكُولَةَ وَلا الرُّبَّى وَلا الْمَاخِضَ وَلا فَحْلَ الْغَنَمِ وَتَأْخُذُ الْجَذَعَةَ وَالثَّنِيَّةَ وَذَلِكَ عَدْلٌ بَيْنَ غِذَاءِ الْغَنَمِ وَخِيَارِهِ.

رواه مالك في الزكاة (26) عن ثور بن زيد الدّيليّ، عن ابن لعبد الله بن سفيان الثقفيّ، عن جدّه سفياغن بن عبد الله، أن عمر بن الخطاب بعثه مصدّقًا، فذكره.

قال مالك:"والسّخلة: الصغيرة حين تُنتج. والرُّبّي: التي قد وضعتْ فهي تربّي ولدها.
والماخضُ: هي الحاملُ. والأكولةُ: هي شاةُ اللّحم التي تُسمَّن لتؤكل".

وقال مالك في الرجل تكون له الغنم: لا تجب فيها الصّدقة فتوالد قبل أن يأتيها المصدِّقُ بيوم واحد فتبلغُ ما تجب فيه الصدقة بولادتها.

قال مالك: إذا بلغت الغنم بأولادها ما تجب فيه الصّدقة فعليه فيها الصدقة وذلك أنّ ولادةَ الغنم منها، وذلك مخالفٌ لما أفيد منها باشتراء أو هبة أو ميراث، ومثل ذلك العَرْض لا يبلغُ ثمنه ما تجب فيه الصدقة ثم يبيعه صاحبُه فيبلغ بربحه ما تجب فيه الصدقة فيصدِّقُ ربْحَه مع رأس المال ولو كان ربحُه فائدةً أو ميراثًا لم تجبْ فيه الصّدقة حتى يحولَ عليه الحولُ من يوم أفاده أو ورثه.

قال مالك: فغذا الغنم منها كما ربحُ المال منه غير أنّ ذلك يختلف في وجْهٍ آخرَ أنه إذا كان للرجل من الذّهب أو الورِق ما تجب فيه الزكاة ثم أفاد إليه مالا ترك ماله الذي أفاد فلم يزكِّه مع ماله الأوّل حين يزكّيه حتى يحول على الفائدة الحول من يوم أفادها، ولو كانت لرجل غنم أو بقر أو إبل تجبُ في كل صنف منها الصّدقة ثم أفاد إليها بعيرًا أو بقرة أو شاة صدَّقها مع صنف ما أفاد من ذلك حين يصدّقه إذا كان عنده من ذلك الصّنف الذي أفاد نصاب ماشيةٍ.

قال مالك: وهذا أحسن ما سمعتُ في ذلك.

وبقول عمر بن الخطاب أمير المؤمنين أخذ مالك، وأبو حنيفة وأصحابه.

وقال الشافعي: لا يضمَّن شيئًا من الفوائد إلى غيره ويزكي كلٌّ لحوله إلا ما كان من نتاج الماشية مع النصاب. انظر"الاستذكار" (9/ 181).

وأما الإمام أحمد فعنده قولان. انظر"التحقيق" (3/ 20 - 21).

انظر للمزيد:"الأم" (2/ 16)، و"المجموع" (5/ 370)،"المنة الكبري" (3/ 157 - 158).




সুফিয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদকা (যাকাত) সংগ্রহকারী হিসেবে প্রেরণ করলেন। তিনি লোকদের মেষের বাচ্চাদেরও গণনা করতেন। তারা বলল: আপনি কি আমাদের উপর বাচ্চাগুলো গণনা করছেন, অথচ আপনি এর থেকে কিছুই নিচ্ছেন না? অতঃপর তিনি যখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন, তখন তিনি বিষয়টি তাঁর কাছে উল্লেখ করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, তুমি তাদের উপর সেই মেষশাবকটি গণনা করবে যা রাখাল বহন করে, কিন্তু তুমি সেটি গ্রহণ করবে না। আর তুমি 'আকুলাহ্' (যেটিকে খাওয়ার জন্য মোটাতাজা করা হয়), 'রুব্বা' (যা তার বাচ্চাকে দুধ পান করায়), 'মাখিদ' (গর্ভবতী) এবং পালের মর্দ ছাগল (ফাহল আল-গানাম) গ্রহণ করবে না। আর তুমি জাযআহ্ (এক বছর পূর্ণ হয়েছে এমন মেষ) এবং সানিয়্যাহ্ (দুই দাঁত বিশিষ্ট মেষ) গ্রহণ করবে। আর এটি হলো মেষপালের খাদ্য (বৃদ্ধি) এবং তাদের সর্বোত্তম অংশের মধ্যে একটি ভারসাম্যপূর্ণ ন্যায়বিচার।

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এটি কিতাবুল যাকাত (২৬)-এ সাওর ইবনে যায়দ আদ-দীলী, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে সুফিয়ান আস-সাকাফীর পুত্র থেকে, তিনি তাঁর দাদা সুফিয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণনা করেছেন যে, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদকা সংগ্রহকারী হিসেবে প্রেরণ করেছিলেন। অতঃপর তিনি (উপরের হাদীসটি) বর্ণনা করলেন।

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "সাখলাহ্ (السّخلة) হলো জন্মকালীন ছোট বাচ্চা। রুব্বী (الرُّبّي) হলো যে সবেমাত্র বাচ্চা প্রসব করেছে এবং সে তার বাচ্চাকে প্রতিপালন করছে। মাখিদ (الماخض) হলো গর্ভবতী পশু। আর আকুলাহ্ (الأكولة) হলো সেই মাংসের মেষ, যাকে খাওয়ার জন্য মোটাতাজা করা হয়।"

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) সেই ব্যক্তি সম্পর্কে বলেন যার এমন মেষ থাকে যেগুলোতে সাদকা ওয়াজিব হয় না, কিন্তু সাদকা সংগ্রাহক আসার একদিন আগে সেগুলো বাচ্চা প্রসব করে এবং বাচ্চার কারণে তা (সাদকার) নিসাব পরিমাণে পৌঁছে যায়।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যদি মেষগুলো তাদের বাচ্চা সহ সাদকা ওয়াজিব হওয়ার পরিমাণে পৌঁছে যায়, তবে তার উপর সাদকা ওয়াজিব হবে। এর কারণ হলো, মেষের বাচ্চা মেষ থেকেই জন্ম নেয়। এটি ক্রয়, হেবা (উপহার) বা উত্তরাধিকার সূত্রে প্রাপ্ত সম্পদের থেকে ভিন্ন।

তেমনিভাবে, ব্যবসার মালামাল (আর্দ) যার মূল্য নিসাব পরিমাণে পৌঁছায় না, অতঃপর এর মালিক তা বিক্রি করে এবং লাভের মাধ্যমে তা নিসাব পরিমাণে পৌঁছে যায়। তবে তাকে মূলধনের সাথে লাভেরও সাদকা দিতে হবে। কিন্তু যদি সেই লাভ অর্জিত সম্পদ বা উত্তরাধিকার সূত্রে প্রাপ্ত সম্পদ হতো, তবে যেদিন সে তা লাভ করেছে বা উত্তরাধিকার সূত্রে পেয়েছে, সেদিন থেকে এক বছর পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত সাদকা ওয়াজিব হতো না।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: সুতরাং মেষের বাচ্চা মেষের অংশ, যেমন সম্পদের লাভ সম্পদ থেকে। তবে অন্য একটি দিক থেকে এটি ভিন্নতা রাখে: যখন কোনো ব্যক্তির কাছে যাকাত ওয়াজিব হওয়ার মতো স্বর্ণ বা রৌপ্য থাকে, এরপর সে আরও সম্পদ লাভ করে, তখন সে তার অর্জিত নতুন সম্পদকে প্রথম সম্পদের সাথে যাকাত দিবে না, বরং যেদিন সে তা লাভ করেছে সেদিন থেকে এক বছর পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত নতুন সম্পদের উপর বছর পূর্ণ হবে।

কিন্তু যদি কোনো ব্যক্তির এমন মেষ, গরু বা উট থাকে, যার প্রতিটি প্রকারের উপর সাদকা ওয়াজিব হয়, অতঃপর সে একটি উট, বা একটি গরু বা একটি মেষ লাভ করে, তবে যখন সে সাদকা দিবে, তখন সে তার অর্জিত সেই প্রকারের পশুর সাথে এটি যোগ করবে, যদি তার কাছে ইতোমধ্যেই সেই প্রকারের পশুর নিসাব পরিমাণ বিদ্যমান থাকে।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এ বিষয়ে আমি যা শুনেছি, এটিই তার মধ্যে সর্বোত্তম।

আমীরুল মুমিনীন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই মতকে ইমাম মালিক, আবূ হানীফা এবং তাঁর অনুসারীগণ গ্রহণ করেছেন।

আর ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: কোনো প্রকারের লাভ বা অর্জিত সম্পদকে অন্য সম্পদের সাথে যোগ করা যাবে না, বরং প্রত্যেকটির যাকাত তার নিজ নিজ বছরের হিসাব অনুযায়ী দিতে হবে, তবে নিসাব পরিমাণ পশুর বাচ্চার ক্ষেত্রে ভিন্ন। (দ্রষ্টব্য: আল-ইসতিযকার ৯/১৮১)।

আর ইমাম আহমদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে দুটি অভিমত রয়েছে। (দ্রষ্টব্য: আত-তাহকীক ৩/২০-২১)।

অধিক জানার জন্য দেখুন: আল-উম্ম (২/১৬), আল-মাজমূ' (৫/৩৭০), আল-মিন্নাতুল কুবরা (৩/১৫৭-১৫৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (3852)


3852 - عن أنس، أنّ أبا بكر رضي الله عنه: كتب له هذا الكتاب لما وجهه إلى البحرين:"هذه فريضة الصّدقة، فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين". فذكر الكتاب بطوله وجاء فيه:"وفي الرِّقة ربع العشر، فإن لم تكن إلّا تسعين ومائة فليس فيها شيء إلّا أن يشاء ربُّها".

صحيح: رواه البخاري في الزكاة (1454) عن محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصاريّ، قال: حدثني أبي، قال: حدّثني ثمامة بن عبد الله بن أنس، أن أنسًا حدّثه، فذكر الكتاب بطوله.

والرِّقة -بكسر الراء، وتخفيف القاف-: الفضة الخالصة، سواء كانت مضروبة أو غير مضروبة.

وقوله:"فإن لم تكن إلا تسعين ومائة" يوهم أنها إذا زادت على التسعين ومائة قبل بلوغ المائتين أن فيها صدقة. وليس كذلك. وإنما ذكر التسعين لأنه آخر عقد قبل المائة والحساب إذا جاوز الآحاد كان تركيبه بالعقود كالعشرات والمائتين والألوف. فذكر التسعين ليدل على أن لا صدقة فيما نقص المائتين، ويدل عليه:"ليس فيما دون خمس أواق صدقة". انتهى انظر:"الفتح" (3/ 321).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাকে বাহরাইনে প্রেরণ করেন, তখন তার জন্য এই পত্রটি লিখেছিলেন: "এই হলো সাদাকাহ (যাকাত)-এর ফরয বিধান, যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের ওপর ফরয করেছেন।" এরপর তিনি পুরো চিঠিটি উল্লেখ করেন এবং তাতে এই অংশটুকু ছিল: "আর রিক্কাহ (রূপা)-এর ক্ষেত্রে এক-দশমাংশের এক-চতুর্থাংশ (যাকাত দিতে হবে)। তবে যদি তা একশ’ নব্বইয়ের বেশি না হয়, তবে তাতে কিছু (যাকাত) নেই, যদি না এর মালিক ইচ্ছা করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3853)


3853 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس فيما دون خمس ذود صدقة، وليس فيما دون خمسة أواق صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق صدقة".

متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (1) عن عمرو بن يحيى المازني، عن أبيه، أنه سمع أبا سعيد الخدريّ يقول (فذكر الحديث).

ورواه البخاريّ في الزكاة (1447) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك.

ورواه مسلم في الزكاة (979) من وجه آخر عن عمرو بن يحيي، به.

وقوله:"خمسِ ذَوْدٍ" بإضافة ذود إلى خمس، وقد روي أيضًا بتوين خمس، ويكون ذود بدلا منه. والذَّوْد في اللغة: من الثلاثة إلى العشرة، لا واحد له من لفظه، إنما يقال في الواحد: بعير.

وقوله:"خمس ذودٍ" كقوله: خمسة أبعرة، وخمسة جمالٍ، وخمس نوق، ونحوه.

وقوله:"خمس أواقٍ" بالتنوين، وفي رواية:"أواقي" بإثبات الياء، وكلاهما صحيح.
والأُوقية: بضم الهمزة، وتشديد الياء، وجمعها: أوقي -بتشديد الياء وتخفيفها-، وأواقٍ، بحذف الياء. وأجمع أهل الحديث والفقه وأئمّة اللغة على أنّ الأوقيّة الشّرعيّة أربعون درهمًا، وهي أوقية الحجاز.

قال القاضي عياض: ولا يصح أن تكون الأوقيّة والدّراهم مجهولة في زمن النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يوجب الزّكاة في أعداد منها، ويقع بها البياعات والأنكحة، كما ثبت في الأحاديث الصحيحة.

وقوله:"خمسة أوسق" الأوسق جمع وسق، وفيه لغتان: فتح الواو، وهو المشهور وكسرها. وأصلها في اللغة الحمل. والمراد بالوسْق: ستون صاعًا.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি 'যাওদ' (উট) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই; পাঁচ 'আওক্ব' (উকিয়া পরিমাণ রূপা) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই; এবং পাঁচ 'আওসাক্ব' (শস্য বা ফল) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3854)


3854 - عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ليس فيما دون خمسة أواق من الوَرِق صدقة، وليس فيما دون خمس ذود من الإبل صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من التّمر صدقة".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (980) من طرق، عن ابن وهب، أخبرني عياض بن عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচ উকিয়ার কম রূপার মধ্যে কোনো সাদকা (যাকাত) নেই। আর পাঁচটির কম উটের মধ্যে কোনো সাদকা নেই। আর পাঁচ ওয়াসাকের কম খেজুরের মধ্যে কোনো সাদকা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3855)


3855 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة، ولا فيما دون خمس أواق صدقة، ولا فيما دون خمس ذود صدقة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (9221، 9232) من وجهين عن عبد الله بن المبارك، قال: أخبرنا معمر، قال: حدّثني سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচ ওয়াসাক-এর কম হলে কোনো সাদাকাহ (যাকাত) নেই, পাঁচ উকিয়াহ-এর কম হলে কোনো সাদাকাহ নেই এবং পাঁচটি উটের কম হলে কোনো সাদাকাহ নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (3856)


3856 - عن أبي رافع، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث رجلًا من بني مخزوم على الصّدقة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة، ولا فيما دون خمس ذود صدقة، وليس فيما دون خمس أواق صدقة".

صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" (1/ 295) عن الحسين بن إسحاق التّستريّ، ويحيى بن زكريا السّاجيّ، قالا: ثنا موسي بن عبد الرحمن المسروقي، ثنا أبو أسامة، ثنا شعبة، عن الحكم، عن ابن أبي رافع، عن أبيه، فذكره.

ورجاله ثقات، أبو أسامة هو حماد بن أسامة بن زيد من رجال الجماعة. وابن أبي رافع هو عبيد الله بن أبي رافع المدني مولى النبيّ صلى الله عليه وسلم، كان كاتب عليٍّ، ثقة من رجال الجماعة.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 70) وسكت عليه.




আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানী মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তিকে সাদাকা (যাকাত) আদায়ের জন্য প্রেরণ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পাঁচ 'ওয়াসাক'-এর কম পরিমাণে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, আর পাঁচটির কম উটে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, আর পাঁচ 'উকিয়া'-এর কম পরিমাণেও কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3857)


3857 - عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد عفوتُ عن الخيل والرّقيق، فهاتوا صدقة الرّقة من كل أربعين درهمًا درهمًا، وليس في تسعين ومائة شيء فإذا بلغت مائتين ففيها خمسة دراهم".
حسن: رواه أبو داود (1574)، والترمذيّ (620) من حديث أبي عوانة، والنسائيّ (2478)، وابن ماجه (1790)، والإمام أحمد (711، 984) كلّهم من طرق، عن أبي إسحاق، عن عاصم ابن ضمرة -والحارث في بعض طرقه-، كلاهما عن علي فذكره. وصحّحه ابن خزيمة (2284).

وانظر تخريجه كاملًا في باب زكاة الخيل والرّقيق.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি ঘোড়া ও গোলামদের (যাকাত থেকে) অব্যাহতি দিয়েছি। সুতরাং তোমরা রিক্কাহর (রূপার মুদ্রার) যাকাত দাও, প্রতি চল্লিশ দিরহামে এক দিরহাম। আর একশো নব্বই দিরহামে কোনো যাকাত নেই। কিন্তু যখন তা দুইশোতে পৌঁছাবে, তখন তাতে পাঁচটি দিরহাম আবশ্যক হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3858)


3858 - عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"في كلّ خمس ذود سائمة صدقة".

حسن: رواه الطبراني في"المعجم الأوسط" (مجمع البحرين 1353) عن محمد بن جعفر بن سام، ثنا الزبير بن بكار، ثنا عبد المجيد بن عبد العزيز، عن معمر، عن الزهري، قال: حدثني رجل من بني قشير - قال له بهز بن حكيم- عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 70) بعد أن عزاه إلى"الأوسط":"رجاله موثقون غير شيخ الطبراني محمد بن جعفر بن سام فإني لم أعرفه".

وقال:"معاوية بن حيدة القشيري له حديث رواه أبو داود غير هذا".

قلت: وهو كما قال، فإن حديثه عند أبي داود يختلف عن هذا سيأتي في باب عقوبة مانع الزكاة في الدنيا.

أما شيخ الطبراني محمد بن جعفر بن سام فقد توبع، رواه الخطيب في تاريخه (8/ 467) عن أبي الحسين أحمد بن محمد بن أحمد بن حماد الواعظ، حدّثنا أبو بكر يوسف بن يعقوب بن إسحاق بن البهلول التنوخي -إملاء-، حدّثنا الزبير بن بكّار، بإسناده، فذكره مثله.

وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه فهما صدوقان، إلا أن الدّارقطني علّله فقال:"يرويه عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي رواد، عن معمر، واختلف عنه، حدّث به الزبير بن بكّار، عن عبد المجيد، عن معمر، عن الزّهريّ، عن بهز بن حكيم، ووهم في ذكر الزّهريّ، والصواب عن عبد المجيد، عن معمر، عن بهز بن حكيم، قال: وكذلك رواه محمد بن ميمون الخياط، عن عبد المجيد" انتهى. انظر:"العلل" (7/ 90).

قال الخطيب بعد أن نقل كلام الدارقطني:"وكذلك رواه عبد الله بن المبارك عن معمر، عن بهز" ثم أسنده.

قلت: لا يمنع أن يكون معمر روي عن بهز بن حكيم أحاديث في الزكاة من وجهين: أحدهما: عن الزهري، عنه، كهذا الذي أمامنا.

والثاني: عن بهز بن حكيم بدون واسطة الزهري؛ لحديث أبي داود وغيره في عقوبة مانع الزكاة.

لأنّ الخطيب أثبت أن الزهري روي عن بهز بن حكيم وبين وفاتيهما نحوًا من خمس وثلاثين سنة، فإن الزهري توفي عام (125 هـ)، وبهز بن حكيم توفي عام (160)، فمن الخطأ أن تجعل
أحاديث بهز بن حكيم في الزكاة حديثًا واحدًا. انظر للمزيد: باب عقوبة مانع الزكاة في الدّنيا.




মু'আবিয়া ইবন হাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক পাঁচটি চারণভূমিতে বিচরণকারী উটের উপর সাদাকা (যাকাত) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3859)


3859 - عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ قال: إنّ في كتاب رسول الله وفي كتاب عمر في الصدقة:"أنّ الذهب لا يؤخذ منه شيء حتى يبلغ عشرين دينارًا، فإذا بلغ عشرين دينارًا ففيه نصف دينار. والوَرِق لا يؤخذ منه شيء حتى يبلغ مائتي درهم، فإذا بلغ مائتي درهم ففيها خمسة دراهم".

صحيح: رواه أبو عبيد في كتاب"الأموال" (ص 559) عن يزيد بن هارون، عن حبيب بن أبي حبيب، عن عمرو بن هرم، عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ. وإسناده صحيح.

وعمرو بن هرم هو الأزديّ البصريّ من رجال مسلم، وصورته مرسل؛ فإن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ تابعي، ولكن حكمه حكم الرّفع؛ لأنه وجد كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصّدقات عند آل عمرو بن حزم، وكتاب عمر بن الخطاب عند آل عمر كما قال فيما أخرجه أيضًا أبو عبيد في"الأموال" (ص 497) بالإسناد نفسه عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ أنه قال:"لما استخلف عمر بن عبد العزيز أرسل إلى المدينة يلتمس كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصدقات، وكتاب عمر بن الخطاب قال: فنسخنا له قال: فحدثني عمرو بن هرم: أنه طلب إلى محمد بن عبد الرحمن أن ينسخه ما في ذينك الكتابين، فنسخ له ما في هذا الكتاب من صدقة الإبل والبقر والغنم والذهب والورق، والتمر -أو الثَّمر-، والحب والزبيب". فذكر الحديث بطوله. وليس فيه ذكر نصاب الذهب والورق.

قال أبو عبيد:"ثم ذكر سائر أنواع الصدقة في هذا الحديث، وستأتي في مواضعها إن شاء الله". انتهى.




মুহাম্মদ ইবনু আবদির রহমান আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিতাবে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কিতাবে যাকাত সম্পর্কে রয়েছে: স্বর্ণ থেকে কিছুই নেওয়া হবে না যতক্ষণ না তা বিশ (২০) দীনারে পৌঁছে। যখন তা বিশ (২০) দীনারে পৌঁছবে, তখন তাতে অর্ধ (১/২) দীনার যাকাত ফরয। এবং রূপা থেকে কিছুই নেওয়া হবে না যতক্ষণ না তা দুইশত (২০০) দিরহামে পৌঁছবে। যখন তা দুইশত (২০০) দিরহামে পৌঁছবে, তখন তাতে পাঁচ (৫) দিরহাম যাকাত ফরয।









আল-জামি` আল-কামিল (3860)


3860 - عن علي بن أبي طالب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"فَإِذَا كَانَتْ لَكَ مَائَتَا دِرْهَمٍ وَحَالَ عَلَيْهَا الْحَوْلُ فَفِيهَا خَمْسَةُ دَرَاهِمَ وَلَيْسَ عَلَيْكَ شَيْءٌ يَعْنِي فِي الذَّهَبِ حَتَّى يَكُونَ لَكَ عِشْرُونَ دِينَارًا فَإِذَا كَانَ لَكَ عِشْرُونَ دِينَارًا وَحَالَ عَلَيْهَا الْحَوْلُ فَفِيهَا نِصْفُ دِينَارٍ فَمَا زَادَ فَبِحِسَابِ ذَلِكَ".

حسن: رواه أبو داود (1573) عن سليمان بن داود المهري، أخبرنا ابن وهب، أخبرني جرير ابن حازم -وسمّى آخر-، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، والحارث الأعور، عن علي ابن أبي طالب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن ضمرة وهو صدوق. وقد تابعه الحارث الأعور وفيه كلام معروف. انظر تخريجه بالتفصيل في باب"لا زكاة في مال حتى يحول عليه الحول" وأزيد هنا:
هذا الحديث أخرجه ابن حزم في"المحلي" (6/ 84) وعلّله بالحارث وبغيره، ثم استدرك قائلًا:"ثم استدركنا فرأينا أن حديث جرير بن حازم مسند صحيح، لا يجوز خلافه، وأن الاعتلال فيه بأن عاصم بن ضمرة أو أبا إسحاق، أو جريرًا خلّط في إسناد الحارث بإرسال عاصم -هو الظّن الباطل الذي لا يجوز، وما علينا من مشاركة الحارث لعاصم، ولا لإرسال من أرسله، ولا لشكّ زهير فيه شيء، وجرير ثقة، فالأخذ بما أسنده لازم، وبالله التوفيق"."المحلي" (6/ 91).

وفي الباب أحاديث:

منها: ما رواه ابن ماجه (1791) عن بكر بن خلف ومحمد بن يحيى، قالا: حدثنا عبيد الله بن موسي، قال: أنبأنا إبراهيم بن إسماعيل، عن عبد الله بن واقد، عن ابن عمر، وعائشة:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يأخذ من كلّ عشرين دينارًا فصاعدًا نصف دينار، ومن أربعين دينارًا دينارًا".

وفيه إبراهيم بن إسماعيل وهو ابن مجمع الأنصاريّ أبو إسحاق المدني، أهل العلم مطبقون على تضعيفه. ومن طريقه رواه أيضًا الدارقطني (1896).

ومنها: ما رواه الدارقطني (1902) بإسناده عن ابن أبي ليلى، عن عبد الكريم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).

وجاء فيه:"ولا في أقلّ من عشرين مثقالًا من الذّهب شيء، ولا في أقلّ من مائتي درهم شيء".

وعبد الكريم هو ابن أبي المخارق أبو أمية المعلم البصريّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

والرّاوي عنه ابن أبي ليلى وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى"صدوق، سيء الحفظ جدًّا" كما في"التقريب". وفي الباب أحاديث أخرى وفي كلّها مقال، إلّا أن بعضه يشدّ بعضًا ويقويه، وبه أخذ الجمهور.

قال مالك في"الموطأ":"السنة التي لا خلاف فيها عندنا أن الزكاة تجب في عشرين دينارًا عينًا، كما تجب في مائتي درهم".

وقال الشافعيّ في"الرسالة" (ص 192):"وفرض رسول الله صلى الله عليه وسلم في الورق صدقة، وأخذ المسلمون في الذهب بعد صدقة، إما بخبر عن النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يبلغنا، وإما قياسًا على أن الذهب والورق نقدُ الناس الذي اكتنزوه وأجازوه أثمانًا على ما تبايعوا به في البلدان قبل الإسلام وبعده".

وقال الحنفية كما في"أصول السرخسيّ" (ص 110):"لا خلاف بين أصحابنا المتقدمين والمتأخرين أن قول الواحد من الصحابة حجة فيما لا مدخل للقياس في معرفة الحكم فيه، وذلك نحو المقادير التي لا تعرف بالرأي". وذكر منها زكاة الذّهب.

وخالفهم في ذلك طاوس، والزهريّ، وعطاء، وسليمان بن حرب فقالوا: نصاب الذّهب تقويمه بالفضّة. وقال الحسن البصريّ: نصابه أربعون دينارًا.

والصّواب ما ذهب إليه الجمهور، واتفقوا بعد هذا الخلاف على أنّ نصاب الذهب عشرون
دينارًا، وهو ما يساوي اليوم (85 جرامًا). وأمّا الفضة فيساوي (595 جرامًا).

ومن كان لديه أوراق نقدية فيقدّره بالفضة لأن فيه مصلحة للفقراء.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমার দু’শ দিরহাম হবে এবং তার উপর এক বছর পূর্ণ হবে, তখন তাতে পাঁচ দিরহাম (যাকাত) ফরয হবে। আর তোমার উপর সোনার ক্ষেত্রে কোনো যাকাত নেই, যতক্ষণ না তোমার বিশ দীনার হয়। অতঃপর যখন তোমার বিশ দীনার হবে এবং তার উপর এক বছর পূর্ণ হবে, তখন তাতে অর্ধ দীনার (যাকাত) ফরয হবে। আর যা এর চেয়ে বেশি হবে, তার হিসাবও সেই অনুপাতে হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3861)


3861 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في الرِّكاز الخمس".

متفق عليه: رواه الإمام مالك في الزكاة (9) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب - وعن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الزكاة (1499) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك.

ورواه مسلم في الحدود (1710) من أوجه أخرى عن أبي هريرة.

وانظر الحديث بسياق أتمّ في الدِّيات.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "গুপ্তধনের (রিকাজ) মধ্যে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3862)


3862 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن اللُّقطة فقال:"ما كان في طريق مأتي، أو في قرية عامرة فعرِّفها سنة، فإن جاء صاحبها وإلّا فلك، وما لم يكن في طريق مأتي ولا في قرية عامرة ففيه، وفي الرّكاز الخمس".

حسن: رواه النسائيّ (2494) عن قتيبة، وأبو داود (1712) عن مسدّد، كلاهما عن أبي عوانة، عن عبيد الله بن الأخنس، عن عمرو بن شعيب، بإسناده، فذكره واللّفظ للنسائيّ.

وأمّا أبو داود فذكره مختصرًا ولم يذكر منه موضع الشّاهد.

ولكن رواه عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا اللّيث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه عبد الله بن عمرو بن العاص في سياق أطول، وفيه:"وما كان منها في طريق الميتاء أو القرية الجامعة فعرِّفها سنة، فإن جاء طالبها فادفعها إليه، وإن لم يأت فهي لك، وما كان في الخراب - يعني ففيها وفي الرّكاز الخمس".

ورواه الترمذيّ (1288) عن هذا الوجه مختصرًا، وليس فيه ذكر الشاهد وقال:"حديث حسن".

وصحّحه الحاكم (2/ 65)، ورواه من وجه آخر عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه عبد الله بن عمرو، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في كنز وجده رجل:"إن كنت وجدته في قرية مسكونة، أو في سبيل ميتاء فعرِّفه، وإن كنت وجدته في خربة جاهليّة، أو في قرية غير مسكونة، أو غير سبيل ميتاء ففيه وفي الرّكاز الخمس".

وقال الحاكم:"قد أكثرت في هذا الكتاب الحجج في تصحيح روايات عمرو بن شعيب إذا كان الراوي عنه ثقة، ولا يذكر عنه أحسن من هذه الروايات، وكنتُ أطلب الحجّة الظاهرة في سماع شعيب بن محمد عن عبد الله بن عمرو، فلم أصل إليها إلى هذا الوقت". انتهى.

وهو حسن من أجل عمرو بن شعيب، وفي الإسناد فائدة مهمة وهي سماع شعيب بن محمد عن جدّه
عبد الله بن عمرو بن العاص، وهو المراد إذا لم يسمه، وليس المراد به محمدًا جدّ عمرو بن شعيب.

كما أنّ حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه هذا رُوي بألفاظ مختلفة مطولة ومختصرة، ورواه عنه كثيرون فلا يبعد أن دخل حديث في حديث، وكلّه حسن.

وقوله:"مأتي" كمرمي، وهو طريق مسلوك.

وقوله:"في الركاز الخمس" الرِّكاز: هو الكنز الجاهليّ المدفون في الأرض، وإنما وجب فيه الخمس لكثرة نفعه، وسهولة أخذه. قاله السّندي في حاشية النسائيّ.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লুকতা (কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: যা কোনো প্রচলিত পথে অথবা জনবসতিপূর্ণ গ্রামে পাওয়া যায়, তা এক বছর ধরে ঘোষণা করবে। যদি তার মালিক আসে তবে (তাকে দিয়ে দেবে), অন্যথায় তা তোমার। আর যা প্রচলিত পথে বা জনবসতিপূর্ণ গ্রামে পাওয়া যায় না, তাতে (সাধারণ) নিয়ম প্রযোজ্য এবং রিকায (ভূগর্ভস্থ সম্পদ/গুপ্তধন)-এর ক্ষেত্রে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রযোজ্য।









আল-জামি` আল-কামিল (3863)


3863 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"السائبة -وقال خلف بن الوليد: السائمة - جبار، والجبُّ جبار، والمعدن جبار، وفي الرّكاز الخمس".

قال: قال الشعبي: الركاز: الكنز العادي.

حسن: رواه الإمام أحمد (14810، 14592) من طريقين عن عباد بن عباد، عن مجالد، عن الشعبي، عن جابر فذكره.

ومجالد هو ابن سعيد بن عمير الهمداني مختلف فيه، وكان البخاري حسن الرأي فيه فقال:"صدوق".

وروى عنه حماد بن زيد كما عند البزار"كشف الأستار" (894)، وروايته عنه مستقيمة.

وذكره الهيثميّ في"المجمع" وقال: (3/ 78):"رواه أحمد والبزار والطبراني في"الأوسط"، ورجاله موثقون".

وفي الباب ما روي عن عبد الله بن عمر بن الخطاب قال: أُتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بقطعة من ذهب، كانت أوّل صدقة جاءته من معدن، فقال:"ما هذه؟". فقالوا: صدقة من معدن لنا. فقال:"إنّها ستكون معادن، وسيكون فيها شرّ الخلق".

رواه الطّبرانيّ في"الأوسط" (3556)، و"الصغير" (1/ 153) عن حاتم بن حُميد أبي عدي البغداديّ، حدّثنا يوسف بن موسي القطّان، قال: حدّثنا عاصم بن يوسف اليربوعيّ، قال: حدّثنا سُعير الخمس، عن زيد بن أسلم، عن ابن عمر، فذكره.

قال الطبرانيّ:"لم يرو هذا الحديث عن سُعير إلّا عاصم بن يوسف".

وأخرجه الخطيب في"تاريخه" (8/ 248 - 249) في ترجمة حاتم بن حميد، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا. فهو في عداد المجهولين، وأما الهيثمي فقال في"المجمع" (3/ 78):"رجاله رجال الصحيح" وليس كما قال.

وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك أنه قال:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى خيبر، فدخل صاحب لنا إلى خِرْبةٍ يقضي حاجتَه، فتناول لبنة ليستطيب بها، فانهارتْ عليه تبرًا، فأخذها فأتي بها النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره بذلك فقال:"زنْها" فوزنها فإذا مئتا درهم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"هذا ركاز وفيه الخمس".
فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (12298)، والبزّار -"كشف الأستار" (893)، والبيهقي (4/ 155) كلّهم من طريق أبي عامر، حدّثنا زهير، حدّثني عبد الرحمن بن زيد، عن أبيه، أنّ أنسًا أخبره، فذكره.

قال البزار:"لا نعلمه عن أنس إلا من هذا الوجه، ولا روي زيد عن أنس إلا هذا".

قلت: وإسناده ضعيف من أجل عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، فقد ضعّفه جمهور أهل العلم. قال ابن حبان:"كان يقلب الأخبار وهو لا يعلم".

وبه علّله أيضًا البيهقيّ.

وكذلك لا بصح ما رُوي عن عبادة بن الصامت قال: إنّ من قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنّ المعدن جبار، والبئر جبار، والعجماء جرحها جبار".

والعجماء: البهيمة من الأنعام وغيرها.

والجبار: هو الهدر الذي لا يُغرم.

"وقضى في الرّكاز الخمس".

رواه عبد الله في مسند أبيه (22778) عن أبي كامل الجحدريّ، حدّثنا الفضيل بن سليمان، حدّثنا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصّامت، عن عبادة في أقضية النبيّ صلى الله عليه وسلم ومنها هذا.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن ماجه (2213)، والحاكم (4/ 340) وقال:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".

وهذا وهمٌ منه، فإن إسحاق بن يحيى لم يخرّج له الشيخان وإنما أخرج له ابن ماجه ثم هو"مجهول الحال"، ولم يسمع من عبادة بن الصامت؛ ولذا قال الدّارقطنيّ وغيره:"هذا حديث مرسل، إسحاق بن يحيى لم يسمع من عبادة بن الصّامت".

وفي الباب عَنْ ضُبَاعَةَ بِنْتِ الزُّبَيْرِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ بْنِ هَاشِمٍ أَنَّهَا أَخْبَرَتْهَا قَالَتْ: ذَهَبَ الْمِقْدَادُ لِحَاجَتِهِ بِـ (بَقِيعِ الْخَبْخَبَةِ)، فَإِذَا جُرَذٌ يُخْرِجُ مِنْ جُحْرٍ دِينَارًا، ثُمَّ لَمْ يَزَلْ يُخْرِجُ دِينَارًا دِينَارًا، حَتَّى أَخْرَجَ سَبْعَةَ عَشَرَ دِينَارًا، ثُمَّ أَخْرَجَ خِرْقَةً حَمْرَاءَ -يَعْنِي فِيهَا دِينَارٌ- فَكَانَتْ ثَمَانِيَةَ عَشَرَ دِينَارًا، فَذَهَبَ بِهَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَأَخْبَرَهُ، وَقَالَ لَهُ: خُذْ صَدَقَتَهَا. فَقَالَ لَهُ صلى الله عليه وسلم:"هَلْ هَوَيْتَ إِلَى الْجُحْرِ". قَالَ: لَا. فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"بَارَكَ اللَّهُ لَكَ فِيهَا".

رواه أبو داود (3087) وابن ماجه (2508) من طريقين عن موسى بن يعقوب الزمعي، حدثتني عمتي قريبة بنت عبد الله، أن أمها كريمة بنت المقداد بن عمرو أخبرتها عن ضباعة بنت الزبير فذكرته.

وفي إسناده قريبة بنت عبد الله، تفرد عنها ابن أخيها موسي بن يعقوب، وذكرها الذهبي في
المجهولات من النساء، وقال ابن حجر في"التقريب":"مقبولة" أي عند المتابعة ولم أجد لها متابعا.

وأما موسي بن يعقوب الزمعي فهو حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.

وقوله:"هل أهويت إلى الجحر" أي هل أخذت من الجحر فيكون فيه الخمس؛ لأنه في معنى الركاز.

وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح أيضًا. انظر"مجمع الزوائد".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “বিচরণশীল পশু (আস-সাইবাহ/আস-সাইমাহ) হলো জুব্বার, কূপ (আল-জুব্ব) হলো জুব্বার এবং খনি (আল-মা'দিন) হলো জুব্বার। আর রিকাযের (গুপ্তধনের) ক্ষেত্রে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রযোজ্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (3864)


3864 - عن زينب امرأة عبد الله قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تصدّقن يا معشر النّساء، ولو من حُليّكنّ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1466)، ومسلم في الزّكاة (1000) كلاهما من حديث الأعمش، عن أبي وائل، عن عمرو بن الحارث، عن زينب امرأة عبد الله، فذكرته في حديث طويل، وهو مذكور في موضعه.

قال ابن العربي في شرحه على الترمذيّ (3/ 130 - 131):"ظاهره أنه لا زكاة في الحلي، لقوله للنساء:"تصدّقن ولو من حليّكنّ" ولو كانت الصّدقة فيه واجبة لما ضرب المثل به في صدقة التّطوّع".

قال الترمذيّ بعد إخراج الحديث:"اختلف أهل العلم في ذلك، فرأى بعضُ أهل العلم من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين في الحلي زكاة ما كان منه ذهب وفضة، وبه يقول سفيان الثوريّ، وعبد الله بن المبارك. وقال بعض أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم منهم: ابن عمر، وعائشة، وجابر بن عبد الله، وأنس بن مالك: ليس في الحلي زكاة. هكذا رُوي عن بعض فقهاء التابعين، وبه يقول مالك بن أنس، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق". انتهى.

قلت: أثر ابن عمر، رواه مالك في الموطأ في كتاب الزكاة (11) عن نافع، عنه، أنه كان يحلي بناته وجواريه الذّهب، ثم لا يخرج من حُليهنّ الزّكاة.

وأثر عائشة أخرجه أيضًا مالك (10) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، كانت تلي بنات أخيها يتامى في حجرها لهنّ الحليّ، فلا تخرج من حليهن الزّكاة.

قال مالك بعد إخراج الأثرين:"فأمّا التبر والحلي المكسور الذي يريد أهله إصلاحَه ولبسه، فإنما هو بمنزلة المتاع الذي يكون عند أهله، فليس على أهله فيه زكاة. وقال: ليس في اللّؤلؤ، ولا في المسك، ولا في العنبر زكاة". انتهى.

وأثر جابر بن عبد الله أخرجه الشّافعيّ وعنه البيهقيّ (4/ 138) عن عمرو بن دينار، قال: سمعت رجلًا يسأل جابر بن عبد الله عن الحلي أفيه الزّكاة؟ فقال جابر:"لا، فقال: وإن كان يبلغ ألف دينار؟ فقال: كثير".

وقال علي بن سُليم: سألت أنس بن مالك عن الحلي فقال: ليس فيه زكاة.
وعن أسماء بنت أبي بكر أنها كانت تحلي بناتها الذهب، ولا تزكّيه نحوا من خمسين ألفا. أخرجها البيهقي في"السنن الكبرى" (4/ 138).

قال القاضي أبو الوليد الباجي في شرح الموطأ:"وهذا مذهب ظاهر بين الصّحابة، وأعلم الناس به عائشة رضي الله عنها، فإنّها زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم، ومنْ لا يخفى عليها أمره في ذلك. وكذلك عبد الله بن عمر، فإنّ أخته حفصة كانت زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأمر حليها لا يخفى عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولا يخفى عليها حكمه فيه"."المنتقي" (2/ 107).

وفي معناه ما رُوي عن جابر بن عبد الله مرفوعًا:"ليس في الحلي زكاة" وإسناده ضعيف.

قال البيهقيّ في"المعرفة" (6/ 144):"وما رُوي عن عافية بن أيوب، عن اللّيث، عن أبي الزّبير، عن جابر مرفوعًا:"ليس في الحلي زكاة" فباطل لا أصل له، إنّما يُروى عن جابر من قوله. وعافية بن أيوب مجهول، فمن احتجّ به مرفوعًا كان مغرّرًا بدينه داخلًا فيما نُعيب به المخالفين من الاحتجاج برواية الكذّابين".

قلت: وليس الأمر كما قال البيهقيّ؛ فإنّ عافية بن أيوب ليس بمجهول، وقد سُئل أبو زرعة عن عافية ابن أيوب فقال:"أبو عبيدة عافية بن أيوب هو مصريّ ليس به بأس"."الجرح والتعديل" (7/ 44).

ولكن الحديث ضعيف ليس من أجله، بل من أجل الرّاوي عنه وهو إبراهيم بن أيوب الجوزجانيّ، قال الحافظ في"اللسان":"ذكره أبو العرب في"الضعفاء" ونقل عن أبي الطّاهر أحمد بن محمد بن عثمان المقدسيّ: أنه قال: إبراهيم بن أيوب حورانيّ ضعيف، وكان أبو الطاهر من أهل النّقد والمعرفة بالحديث بمصر".

وللحديث علّة أخرى وهي الوقف وقد أشار إليه ابن عبد الهادي في"التنقيح" (3/ 67) وصوّبه.

وبناءً على هذه الأحاديث والآثار ذهب جمهور أهل العلم إلى أنه لا زكاة في الحلي، وشبّهوها بمتاع البيت؛ لأن الزكاة تجب في الأموال النامية مثل الزراعة والتجارة والمواشي، وأما الحلي فهي مثل الملابس والأحذية والأواني وبقية متاع البيت.

وللشافعي قولان: قال بغداد: -في رواية الحسن بن محمد الزعفراني عنه-"لا زكاة في الحلي إذا استمتع به أهله في عمل مباح".

والقول الثاني: قال:"هذا ما أستخير الله تعالى فيه"، وترك الجواب فيه.

ولم يختلف قول مالك وأصحابه في أنه لا زكاة في الحلي للنساء يلبسنه.

وبه قال من التابعين ومن بعدهم سعيد بن المسيب، والقاسم بن محمد، وعامر الشعبي، ويحيى بن سعيد، وربيعة، وأكثر أهل المدينة.

قال أبو عبيد:"الحلي الذي يكون ربقة ومتاعا فهو كالأثاث، وليس كالرقة التي ورد في السنة يؤخذ ربع العشر فيها". انظر للمزيد:"الاستذكار" (9/ 69 - 70).




যয়নব (আব্দুল্লাহর স্ত্রী) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা (দান) করো, এমনকি তোমাদের অলংকার থেকে হলেও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3865)


3865 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه: أَنَّ امْرَأَةً أَتَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَمَعَهَا ابْنَةٌ لَهَا وَفِي يَدِ ابْنَتِهَا مَسَكَتَانِ غَلِيظَتَانِ مِنْ ذَهَبٍ فَقَالَ لَهَا:"أَتُعْطِينَ زَكَاةَ هَذَا؟". قَالَتْ: لا. قَالَ:"أَيَسُرُّكِ أَنْ يُسَوِّرَكِ اللَّهُ بِهِمَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ سِوَارَيْنِ مِنْ نَارٍ؟ !". قَالَ: فَخَلَعَتْهُمَا فَأَلْقَتْهُمَا إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَقَالَتْ: هُمَا لِلَّهِ عز وجل وَلِرَسُولِهِ.

حسن: رواه أبو داود (1563)، والنسائي (2481) كلاهما من طريق خالد بن الحارث، عن حسين، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن شعيب، وهو حسن الحديث.

وحسّنه أيضًا النّووي في"المجموع" (6/ 33). ورواه أحمد (6667) من طريق حجاج، عن عمرو بن شعيب بإسناده نحوه، والحجاج هو: ابن أرطاة مدلس.

ورواه أيضا الترمذيّ (637) عن قتيبة، حدّثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكر مثله، فإسناده ضعيف.

قال الترمذيّ:"هذا حديث قد رواه المثني بن الصبّاح، عن عمرو بن شعيب نحو هذا. والمثني ابن الصبّاح وابن لهيعة يضعّفان في الحديث. ولا يصح في هذا الباب عن النبيّ صلى الله عليه وسلم شيء".

كذا قال، والمثنى بن الصباح وابن لهيعة توبعا في الإسناد السابق.

ولكن رواه النسائي (2482) عن محمد بن عبد الأعلى، عن المعتمر بن سليمان قال: سمعتُ حسينًا، قال: حدثني عمرو بن شعيب قال: جاءت امرأة ومعها بنت لها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وفي يد ابنتها مسكتان فذكر الحديث نحوه.

وقال: مرسل. إلا أنه رجّح الموصول فقال:"خالد أثبت من المعتمر".

ولكن نقل الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 370)، والمزي في"تحفة الأشراف" أن النسائي قال:"وحديث معتمر أولى بالصواب" يعني المرسل. والظاهر أن هذا هو الصحيح على منهج النسائي.

قلت: إنْ صحَّ قولُ النسائي هذا، فلعل عمرو بن شعيب كان يروي عن وجهين: موصولًا ومرسلًا. والله تعالى أعلم.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং তার সাথে তার একটি কন্যা ছিল। তার কন্যার হাতে স্বর্ণের মোটা দুটি বালা ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "তুমি কি এটার যাকাত দাও?" সে বলল, "না।" তিনি বললেন, "তুমি কি পছন্দ করো যে আল্লাহ কিয়ামতের দিন এর বদলে তোমাকে আগুনের দুটি বালা পরাবেন?!" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে মহিলাটি বালা দুটি খুলে ফেলল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে নিক্ষেপ করল এবং বলল, "এ দুটি আল্লাহ তাআ'লা এবং তাঁর রাসূলের জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (3866)


3866 - عن عبد الله بن شدّاد بن الهاد أنه قال: دَخَلْنَا عَلَى عَائِشَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ: دَخَلَ عَلَيَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرَأَي فِي يَدَيَّ فَتَخَاتٍ مِنْ وَرِقٍ فَقَالَ:"مَا هَذَا يَا عَائِشَةُ؟". فَقُلْتُ: صَنَعْتُهُنَّ أَتَزَيَّنُ لَكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ! قَالَ:"أَتُؤَدِّينَ زَكَاتَهُنَّ؟". قُلْتُ: لا أَوْ مَا شَاءَ اللَّهُ. قَالَ:"هُوَ حَسْبُكِ مِن النَّارِ".

حسن: رواه أبو داود (1565) عن محمد بن إدريس الرّازيّ، حدثنا عمرو بن الرّبيع بن طارق،
حدّثنا يحيى بن أيوب، عن عبيد الله بن أبي جعفر، أن محمّد بن عمرو بن عطاء أخبره، عن عبد الله ابن شدّاد بن الهاد، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في يحيى بن أيوب الغافقي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وأخرجه الحاكم (1/ 389 - 390) من هذا الوجه وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".

والصواب أنه على شرط مسلم، فإن يحيى بن أيوب أخرج له مسلم فقط.

ورواه الدّارقطنيّ (1951) من وجه آخر عن عمرو بن الربيع بن طارق بإسناده وقال: محمد بن عطاء مجهول. هكذا قال: محمد بن عطاء منسوبًا إلى جده، ولم يدر أنه محمد بن عمرو بن عطاء أحد الثقات. قال البيهقي في المعرفة:"وهو محمد بن عمرو بن عطاء، لكنه لما نسب إلى جدّه ظنّ الدّارقطنيّ أنه مجهول، وليس كذلك".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন এবং আমার হাতে তিনি রূপার কয়েকটি আংটি (বা অলংকার) দেখতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “হে আয়েশা! এগুলো কী?” আমি বললাম: “হে আল্লাহর রাসূল! আমি এগুলো আপনার জন্য সজ্জিত হওয়ার উদ্দেশ্যে তৈরি করেছি।” তিনি বললেন: “তুমি কি এগুলোর যাকাত দাও?” আমি বললাম: “না” অথবা (বললেন): “যা আল্লাহ চান।” তিনি বললেন: “জাহান্নামের জন্য এটিই তোমার জন্য যথেষ্ট (কারণ হবে)।”









আল-জামি` আল-কামিল (3867)


3867 - عن أمّ سلمة: كُنْتُ أَلْبَسُ أَوْضَاحًا مِنْ ذَهَبٍ فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! أَكَنْزٌ هُوَ؟ فَقَالَ:"مَا بَلَغَ أَنْ تُؤَدَّي زَكَاتُهُ فَزُكِّيَ فَلَيْسَ بِكَنْزٍ".

حسن: رواه أبو داود (1564) عن محمد بن عيسي، حدّثنا عتّاب -يعني ابن بشير-، عن ثابت بن عجلان، عن عطاء، عن أمّ سلمة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عتّاب بن بشير غير أنه حسن الحديث وهو من رجال البخاريّ.

ورواه الحاكم (1/ 390) من طريق محمد بن المهاجر، عن ثابت، وقال: صحيح على شرط البخاريّ.

وفي الباب عن أسماء بنت يزيد قالت: دخلتُ أنا وخالتي على النبيّ صلى الله عليه وسلم، وعليها أسورة من ذهب، فقال لنا:"أتعطيان زكاته؟". قالت: فقلنا: لا. قال:"أما تخافان أن يسوِّركُما اللهُ أسورةً من نار؟ أدِّيا زكاته".

رواه الإمام أحمد (27614)، والطبرانيّ في"الكبير" (24/ (431) كلاهما من طريق علي بن عاصم، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن شهر بن حوشب، عن أسماء بنت يزيد، فذكرته.

وإسناده ضعيف؛ لأنّ فيه علي بن عاصم الواسطيّ وشيخه عبد الله بن خثيم، وشيخه شهرب بن حوشب كلّهم ضعفاء.

هذا الحديث عزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 67) لأحمد وقال:"إسناده حسن". وفاته العزو للطبرانيّ، وقوله:"إسناده حسن" فليس بحسن.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن فاطمة بنت قيس أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"في الحلي زكاة". رواه الدّارقطنيّ (1954) عن أبي حمزة ميمون، عن الشعبيّ، عن فاطمة بنت قيس وقال: أبو حمزة هذا ميمون، ضعيف الحديث.

وروى ابن أبي شيبة (3/ 27) عن وكيع، عن مساور الورّاق، عن شعيب بن يسار، قال: كتب عمر بن الخطّاب إلى أبي موسى الأشعريّ:"أنْ مُرْ مَنْ قبلك من نساء المسلمين أن يُزكين حُليهن".
وأخرجه البيهقي (4/ 139) من وجه آخر عن مساور الورّاق، وقال: قال البخاريّ:"مرسل".

وكذا قاله أيضًا الزّيلعيّ في"نصب الراية" (2/ 474) وعزا قول البخاريّ في تاريخه.

وأثر آخر أخرجه عبد الرزاق عن ابن مسعود قال:"في الحلي زكاة".

وأثر آخر أخرجه الدارقطني (1957) عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه أنه كان يكتب إلى خازنه سالم: أن يخرج زكاة حلي بناته كلّ سنة، ورواه ابن أبي شيبة عن وكيع، عن جرير بن حازم، عن عمرو بن شعيب، عن عبد الله بن عمرو أنه كان يأمر نساءه أن يُزكّين حُليّهن.

وقد حكى ابن المنذر عن عمر بن الخطاب، وعبد الله بن مسعود، وعبد الله بن عمرو، وعبد الله ابن عباس الزّكاة في الحليّ.

قال الخطّابي في"معالم السنن شرح أبي داود":"الظاهر من الكتاب يشهد لقول من أوجبها، والأثر يؤيده، ومن أسقطها ذهب إلى النظر، ومعه طرف من الأثر، والاحتياط أداؤها".



الذي نُعدُّ للبيع". فهو ضعيف، فإنّ فيه خبيب بن سليمان مجهول، والرّاوي عنه جعفر بن سعد ليس بقوي كما في التقريب.

وقال الذهبي في"الميزان" (1/ 408) بعد أن نقل كلام أهل العلم في خبيب بن سليمان، وجعفر بن سعد وقال:"وسلمان بن موسى هذا زهريّ من أهل الكوفة ليس بالمشهور، وبكل حال هذا إسناد مظلم لا ينهض بحكم" انتهي.

قلت: فلا يلتفت إلى قول ابن عبد البر:"إسناده حسن".

انظر للمزيد"المنّة الكبري" (3/ 198). وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي ذرّ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"في الإبل صدقتها، وفي الغنم صدقتها، وفي البقر صدقتها، وفي البزّ صدقته".

رواه أحمد (21557) عن محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، عن عمران بن أبي أنس، بلغه عنه، عن مالك بن أوس بن الحدثان النّصريّ، عن أبي ذرّ، فذكره. ومن هذا الوجه أخرجه كلٌّ من الدّارقطنيّ (2/ 102)، والحاكم (1/ 388)، والبيهقي (4/ 147).

ورواه الحاكم أيضًا من طريق سعيد بن سلمة بن أبي الحسام، ثنا عمران بن أبي أنس، عن مالك بن أوس، عن أبي ذرّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"في الإبل صدقتها، وفي الغنم صدقتها، وفي البقر صدقتها، وفي البزِّ أو البرّ صدقته، ومن رفع دنانير ودراهم، أو تبرًا وفضة لا يعدُّها لغريم، ولا ينفقها في سبيل الله فهو كنز يكوى به يوم القيامة".

قال الحاكم:"كلا الإسنادين صحيحان على شرط الشيخين ولم يخرجاه".

كذا قال، وقد أخرج الترمذي في"العلل الكبير" (1/ 307) عن البخاريّ أنه قال:"ابن جريج لم يسمع من عمران بن أبي أنس. يقول: حُدّثتُ عن عمران بن أبي أنس". وقال ابن القطّان:"ابن جريج مدلّس لم يقل: حدّثنا عمران". فالحديث منقطع، وقد تابعه موسي بن عبيدة الرَّبذيّ، ومن طريقه رواه البزّار (3895)، والدارقطني (2/ 100 - 101)، والبيهقيّ (4/ 147)، وموسي بن عبيدة ضعيف.

وسقط هذا في إسناد الحاكم السابق فجعل المتابع لابن جريج سعيد بن سلمة بن أبي الحسام، والصحيح أن بينه وبين عمران بن أبي أنس موسي بن عبدة كما ثبت ذلك في روايات أخرى.

وأما قول الحاكم: صحيح على شرط الشيخين فهذا وهم منه، فإن عمران بن أبي أنس ممن انفرد به مسلم دون البخاري غير أنه ثقة.

وقوله:"البزُّ" بالباء الموحدة والزّاي - وهي الثياب التي هي أمتعة البزاز. ومن قال بالراء المهملة أي"البر" فقد وهم.

وفي الباب آثار عن الصّحابة والتابعين منهم عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله، وأمير المؤمنين عمر بن عبد العزيز كما ذكره مالك في الموطأ كلّهم أمروا بأخذ الزكاة من أموال التجارة ولم نجد
لهم مخالفًا فصار إجماعًا.

قال البيهقي في"الكبري" (4/ 147) بعد أن نقل آثار هؤلاء:"وهذا قول عامة أهل العلم، فالذي رُوي عن ابن عباس أنه قال: لا زكاة في العرض، فقد قال الشافعي في كتاب القديم: إسناد الحديث عن ابن عباس ضعيف، فكان اتباع حديث ابن عمر لصحته والاحتياط في الزّكاة أحبُّ إليَّ والله أعلم".

وقال أيضًا:"وقد حكى ابن المنذر عن عائشة وابن عباس مثل ما رُوينا عن ابن عمر، ولم يحك خلافهم عن أحد، فيحتمل أن يكون معنى قوله:"إن صح لا زكاة في العرض" أي إذا لم يُرد به التّجارة". انظر للمزيد"المنّة الكبري" (3/ 200).




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি স্বর্ণের অলংকার পরিধান করতাম। তখন আমি জিজ্ঞেস করলাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এটা কি (গুপ্তধন হিসেবে গণ্য হয়ে) ‘কানয’ হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যার উপর যাকাত দেওয়া আবশ্যক হয় এবং তার যাকাত আদায় করা হয়, তা ‘কানয’ নয়।