আল-জামি` আল-কামিল
4081 - عن رجل من بني يربوع، قال: أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَسَمِعْتُهُ وَهُوَ يُكَلِّمُ النَّاسَ يقُولُ:"يَدُ المُعْطِي العُلْيَا أُمَّك وَأَبَاك وَأُخْتَك وَأَخَاك ثُمَّ أَدْنَاكَ فَأَدْنَاكَ". قَالَ: فقَالَ رَجَلٌ: يَا رَسُولَ الله، هَؤُلاءِ بَنُو ثَعْلَبَةَ الَّذِينَ أَصَابُوا فُلانًا؟ قال: فَقَالَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم:"أَلا لا تَجْنِي نَفْسٌ عَلَى أُخْرَى".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16613) عن يونس، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن الأشعث بن سليم، عن أبيه، عن رجل من بني يربوع، فذكره.
ورواه النسائيّ (4837) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا أبو عوانة، بإسناده مختصرًا.
ورواه أبو داود الطيالسي (1353) ومن طريقه النسائيّ (4835)، والبزّار - كشف الأستار (918) -، عن شعبة، عن أشعث بن أبي الشّعثاء، قال: سمعت الأسود بن هلال يحدّث عن رجل من بني ثعلبة بن يربوع، أنّ أناسًا منهم أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم -وكانوا من بني ثعلبة- أصابوا رجلًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال رجل: يا رسول الله! هؤلاء بنو ثعلبة بن يربوع قتلت: فلانًا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجني نفسٌ على أخري".
وذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الصّدقة فقال:"يد المعطي العليا: أمك، وأباك، وأختك، وأخاك، ثمّ أدناك أدناك". هذا لفظ أبي داود، وأمّا غيرهما فاختصره.
ورواه سفيان، عن الأشعث، عن سليم بإسناده وجعل هذا الرّجل المبهم ثعلبة بن زهدم اليربوعيّ، رواه النسائيّ (4833)، والبيهقي (8/ 345)، والبزّار -كشف الأستار (917) - فذكر الحديث، مثله.
واختلف في ثعلبة بن زهدم، فجزم ابن حبَّان وابن السكن وجماعة ممن صنّفوا في الصّحابة بأنه له صحبة.
وقال الترمذيّ في"تاريخه":"أدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وعامة روايته عن الصّحابة".
وفي الباب عن ابن مسعود مرفوعًا:"اليد العليا أفضل من اليد السفلي، وابدأ بمن تعول أمّك وأباك وأختك وأخاك وأدناك فأدناك".
رواه الطبراني في"الكبير" (10/ 229 - 230) عن علي بن عبد العزيز، ثنا حرمي بن حفص القسمليّ، ثنا زياد بن عبد الرحمن القرشيّ، ثنا عاصم بن بهدلة، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 120):"إسناده حسن".
قلت: وذلك بناء على ذكر ابن حبَّان لبعض رجال الإسناد في" الثّقات"، وإلَّا فزياد بن عبد الرحمن القرشي ذكره البخاريّ في"التاريخ الكبير" (3/ 361) ولم يذكر نسبه"القرشيّ" ولكن ذكره ابن أبي حاتم، ولم يذكر فيه شيئًا من جرح أو تعديل، فهو في عداد المجهولين، وأمّا ابن حبَّان فذكره في"الثقات" (6/ 325) ولم يذكروا من الرواة عنه إِلَّا عبد الواحد بن واصل، وحرمي ابن حفص ثانيه، فيكون في درجة"مقبول" عند الحافظ ابن حجر أي إذا توبع، وإلَّا فلين الحديث.
وفي الباب عن عطية السّعديّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اليد المنطية خير من اليد السفلى".
رواه الإمام أحمد (17983)، والبزّار -كشف الأستار (916) -، والطَّبرانيّ في الكبير (17/
166) كلّهم من طريق عبد الرزّاق -وهو في مصنفه (20055) - عن معمر، عن سماك بن الفضل، عن عروة بن محمد، عن أبيه، عن جده، قال (فذكر الحديث).
و"المنطية" هي المعطية بلغة عطية الصحابيّ، ولذا غيّروه في المصادر الأخرى إلى"المعطية".
وفيه عروة بن محمد، وأبوه مجهولًا الحال، ولم يذكرهما إِلَّا ابن حبَّان على قاعدته في توثيق المجهولين.
قال الحافظ في الأوّل:"مقبول"، وقال في الثاني وهو محمد بن عطية السعدي"صدوق" مع أنه لم يذكر في"التهذيب" إِلَّا توثيق ابن حبَّان، ولكنه ذكر الخلاف في صحبته، ورجّح أن الصحبة لأبيه.
ويؤيد هذا لما رواه الحاكم (4/ 327) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، قال: حَدَّثَنِي عروة بن محمد بن عطية، قال: حَدَّثَنِي أبي، أن أباه أخبره قال: قدمت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في أناس من بني سعد بن بكر، وكنت أصغر القوم فخلّفوني في رحالهم، ثمّ أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقضى من حوائجهم ثمّ قال:"هل بقي منكم من أحد؟". قالوا: نعم غلام معنا خلفناه في رحالنا، فأمرهم أن يبعثوا إليّ، فأتوني فقالوا: أجب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتيته، فلمّا رآني قال:"ما أغناك الله فلا تسأل الناس شيئًا، فإن اليد العليا هي المنطية وإن اليد السّفلي هي المنطاة، وإن مال الله تعالى لمسئول ومنطي". قال: فكلمني رسول الله صلى الله عليه وسلم بلغتنا.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه".
والصّحيح -كما قلت- فيه عروة بن محمد بن عطية وأبوه مجهولان.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"خير الصّدقة ما أبقت غنيّ، واليد العليا خير من اليد السّفليّ، وابدأ بمن تعول".
رواه الطبرانيّ في الكبير (12726) عن عبد الله بن ناجية، ثنا المنذر بن الوليد الجارودي، ثنا أبي، ثنا الحسن بن أبي جعفر، عن محمد بن جحادة، عن أبي صالح، عن ابن عباس، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 98):"فيه الحسن بن أبي جعفر الجفريّ وفيه كلام".
قلت: وهو كما قال، فإن الحسن بن أبي جعفر الجفري البصريّ ضعيف، وقد ضعَّفه جمهور أهل العلم.
বানী ইয়ারবু' গোত্রের একজন ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং আমি তাঁকে মানুষের সাথে কথা বলতে শুনলাম। তিনি বলছিলেন: "দানকারীর হাত উত্তম (উপরের হাত)। (সাহায্য শুরু করো) তোমার মা, তোমার পিতা, তোমার বোন এবং তোমার ভাই থেকে। এরপর যারা তোমার নিকটবর্তী এবং তাদের নিকটবর্তী।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন একজন লোক বলল: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এরা কি বানু সা'লাবাহ গোত্রের লোক, যারা অমুককে আঘাত করেছে (বা হত্যা করেছে)?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জেনে রাখো! কোনো ব্যক্তি অন্য কোনো ব্যক্তির অপরাধের জন্য দায়ী হবে না।"
4082 - عن أبي سعيد الخدريّ: أنَّ نَاسًا مِن الأَنْصَارِ سَأَلُوا رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَعْطَاهُمْ، ثُمَّ سَأَلُوهُ فَأَعْطَاهُمْ، حتّى نَفِدَ مَا عِنْدَهُ ثمّ قال:"ما يَكُونُ عِنْدِي مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ أَدَّخِرَهُ عَنْكُم، وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ، وَمَن يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللهُ، وَمَنْ يَتَصَبَّرْ يُصَبِّرْهُ اللهُ، وَمَا أُعْطِيَ أَحَدٌ عَطَاءً هُوَ خَيْرٌ وَأَوْسَعُ مِن الصَّبْرِ".
متفق عليه: رواه مالك في الصّدقة (7) عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد اللّيثيّ، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
ورواه البخاريّ في الزّكاة (1469)، ومسلم في الزّكاة (1053) كلاهما من طريق مالك، به.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে চাইলেন। তিনি তাদের দিলেন। এরপর তারা আবার চাইলেন, তিনি তাদের আবার দিলেন। অবশেষে তাঁর কাছে যা কিছু ছিল, তা নিঃশেষ হয়ে গেল। এরপর তিনি বললেন: "আমার কাছে যদি কোনো কল্যাণকর বস্তু থাকে, তবে আমি তা তোমাদের কাছ থেকে লুকিয়ে রাখব না। আর যে লোক পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে লোক অমুখাপেক্ষী হতে চায়, আল্লাহ তাকে অমুখাপেক্ষী করে দেন। আর যে লোক ধৈর্যধারণের চেষ্টা করে, আল্লাহ তাকে ধৈর্যশীল করে তোলেন। আর ধৈর্যের চেয়ে উত্তম ও অধিক প্রশস্ত কোনো দান কাউকে দেওয়া হয়নি।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
4083 - عن أبي سعيد: أَنَّ رجلًا مِن الأَنْصَارِ كَانَتْ بِهِ حَاجَةٌ، فَقَالَ لَهُ أَهْلُهُ: ائْتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَاسْأَلْهُ، فَأَتَاهُ وَهُوَ يَخْطُبُ وَهُوَ يَقُول:"مَنِ اسْتَعَفَّ أَعَفَّهُ اللهُ، وَمَن اسْتَغْنَى أَغْنَاهُ اللهُ، وَمَنْ سَأَلَنَا فَوَجَدْنَا لَهُ أَعْطَيْنَاهُ" قَالَ: فَذَهَبَ وَلَمْ يَسْأَلْ.
صحيح: رواه الإمام أحمد (10989) عن هُشيم، حَدَّثَنَا أبو بشر، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره. وإسناده صحيح. وأبو بشر هو جعفر بن إياس من رجال الشّيخين.
وأبو نضرة هو المنذر بن مالك بن قُطعة -بضم القاف، وفتح المهملة - العَوَقيّ - بفتح المهملة والواو ثمّ قاف -، ثقة من رجال مسلم.
وفي الحديث الآتي ورد ذكر هذا السائل بأنه أبو سعيد الخدريّ نفسه، هو الذي ذهب إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يسأله.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসার ব্যক্তির কোনো প্রয়োজন ছিল। তখন তার পরিবারের লোকেরা তাকে বলল: আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যান এবং তার কাছে (সাহায্য) চান। সে ব্যক্তি তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো, তখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন এবং বলছিলেন: "যে ব্যক্তি (মানুষের কাছে চাওয়া থেকে) পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি অমুখাপেক্ষী হতে চায়, আল্লাহ তাকে অভাবমুক্ত করেন। আর যে ব্যক্তি আমাদের কাছে চায় এবং আমরা তার জন্য কিছু পাই, আমরা তাকে তা প্রদান করি।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে ব্যক্তি চলে গেল এবং কিছু চাইল না।
4084 - عن أبي سعيد الخدريّ: أنّ أهله شكوا إليه الحاجة، فخرج إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ليسأله لهم شيئًا، فوافقه على المنبر، وهو يقول:"أيها الناس، قد آن لكم أن تستغنوا عن المسألة، فإنه من يستعفف يُعِفّه الله، ومن يستغن يُغْنِه الله، والذي نفس محمد بيده! ما رزق عبد شيئًا أوسع من الصبر، ولئن أبيتم إِلَّا أن تسألوني لأعطينكم ما وجدت".
حسن: رواه ابن حبَّان (3399) من طريق اللّيث، عن ابن عجلان، عن سعيد المقبريّ، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو محمد بن عجلان المدني"صدوق". إِلَّا أنه اختلطت عليه أحاديث أبي هريرة.
وله طرق أخرى منها: ما رواه حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا سعيد الخدري، قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أريد أن أسأله، فسمعته يخطب، وهو يقول:"من يستغن يغنه الله، ومن يستعفف يعفّه الله، ومن سألنا أعطيناه". قال: فرجع ولم أسأله، فأنا اليوم أكثر الأنصار مالا. رواه ابن حبَّان (3398).
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তাঁর পরিবারের লোকেরা অভাবের অভিযোগ করলে তিনি তাদের জন্য কিছু চাইতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে গেলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বরে পেলেন, যখন তিনি বলছিলেন: “হে লোক সকল! এখন তোমাদের জন্য ভিক্ষা করা হতে মুখাপেক্ষীহীন হওয়ার সময় হয়েছে। কেননা যে ব্যক্তি পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি মুখাপেক্ষীহীন হতে চায়, আল্লাহ তাকে অভাবমুক্ত করে দেন। ঐ সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন! কোনো বান্দাকে এমন কোনো প্রশস্ত রিজিক দেওয়া হয়নি যা ধৈর্য অপেক্ষা উত্তম। আর তোমরা যদি একান্তই না চাও যে, তোমরা শুধু আমার কাছেই চাইবে, তবে আমি যা কিছু পাই তা তোমাদের অবশ্যই দেব।”
4085 - عن حكيم بن حزام، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"اليَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَى، وَابْدَأْ بِمَنْ تَعُولُ، وَخَيْرُ الصَّدَقَةِ عَنْ ظَهْرِ غِنًى، وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِه اللهُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1427) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا وهيب، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن حكيم بن حزام، فذكره.
وعن وُهيب، قال: أخبرنا هشام، عن أبيه، عن أبي هريرة، بهذا.
ورواه مسلم في الزّكاة (1034) من وجه آخر عن حكيم بن حزام، ولم يذكر فيه:"وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللهُ".
হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "উপরের হাত নিচের হাতের চেয়ে উত্তম। আর তুমি তাদের থেকে শুরু করো যাদের ভরণপোষণের দায়িত্ব তোমার উপর। আর উত্তম সাদাকা হলো যা প্রাচুর্য থাকা সত্ত্বেও দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি স্বাবলম্বী হতে চায়, আল্লাহ তাকে স্বাবলম্বী করে দেন।"
4086 - عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال: كان بالكوفة أميرا، قال: فخطب يومًا فقال: إن في إعطاء هذا المال فتنة، وفي إمساكه فتنة، وبذلك قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في خطبته حتّى فرغ، ثمّ نزل.
صحيح: رواه أحمد (20586) قال: حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، قال: سمعت إسحاق بن سويد، قال: سمعت مطرِّف بن عبد الله بن الشخير، يحدث عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وإسناده صحيح، وإسحاق بن سويد وهو العدوي البصري ثقة وثَّقه جمع من الأئمة إِلَّا أن الحافظ ابن حجر قال فيه:"صدوق".
وأمّا ما رُوي عن حكيم بن حزام، قال: جاء مَالٌ مِنَ البَحْرَيْنِ، فَدَعَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم العَبَّاسَ فَحَفَنَ لَهُ، فَقَالَ:"أَزِيدُكَ؟". قَالَ: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قال:"أَزِيدُكُ؟" قال: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قَال:"أَزِيدُكَ؟" قَالَ: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قال:"أَزِيدُكَ؟" قال: نَعَمْ، قال:"أَبْقِ لِمَنْ بَعْدَكَ"، ثُمَّ دَعَانِي فَحَفَنَ لِيّ، فَقُلْتُ: يَا رَسُول اللهِ، خَيْرٌ لِي أَوْ شَرٌّ لِي؟ قال:"لَا بَلْ شَرٌّ لَكَ"، فَرَدَدْتُ عَلَيْهِ مَا أَعْطَانِي، ثُمَّ قُلْتُ: لا وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ! لا أَقْبَلُ مِنْ أَحَدٍ عَطِيَّةً بَعْدَكَ، قَال مُحَمَّدٌ: قَالَ حَكِيمٌ: فَقُلْتُ: يَا رَسُول الله، ادْعُ اللهَ أَنْ يُبَارِكَ لِي، قال:"اللَّهُمَّ بَارِكْ فِي صَفْقَةِ يَدِهِ". فهو ضعيف.
رواه الطبراني في الكبير (3/ 230) عن الحسين بن إسحاق التّستريّ، والعباس بن حمدان الحنفيّ الأصبهانيّ، قالا: ثنا علي بن المنذر، ثنا محمد بن فضيل، عن إسماعيل بن مسلم، عن ابن سيرين، عن حكيم بن حزام، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 97):"وفيه إسماعيل بن مسلم وفيه كلام كثير، وقد قيل فيه: إنه صدوق يهم". وقال أيضًا:"ولحكيم حديث غير هذا في الصَّحيح". وأورده المنذريّ في الترغيب والترهيب (1217) بصيغة التمريض وعزاه للطبراني.
قلت: إسماعيل بن مسلم هو المكي ضعَّفه جمهور أهل العلم، قال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظة إِلَّا أنه يكتب حديثه.
وأمّا حديث حكيم في الصَّحيح الذي أشار إليه الهيثمي فهو ما ذكر في باب"من أخذه بإشراف نفس لم يبارك فيه".
وفي الباب عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استَغْنوا عن النّاس ولو بشوص سواك".
رواه البزّار -كشف الأستار (913) - عن عبد الواحد بن غياث، ثنا عبد العزيز بن مسلم، ثنا الأعمش، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وفيه عنعنة الأعمش، وهو لم يسمع من سعيد بن جبير إِلَّا أربعة أحاديث، كما قال عليّ بن المدينيّ، وهذا ليس منها. انظر: تحفة التحصيل (ص 1
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তিনি (সেই সাহাবী) কূফায় একজন আমীর (শাসক) ছিলেন। তিনি বলেন: একদিন আমি খুতবা দিতে দাঁড়ালাম এবং বললাম: এই (ধন-)সম্পদ (মানুষকে) দান করার মধ্যেও ফিতনা (পরীক্ষা) রয়েছে, আর তা (নিজের কাছে) আটকে রাখার মধ্যেও ফিতনা রয়েছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবার মধ্যে এই বিষয়টি নিয়েই দাঁড়িয়েছিলেন যতক্ষণ না তিনি তা শেষ করেন, অতঃপর তিনি (মিম্বর থেকে) নেমে যান।
4087 - عن معاوية بن أبي سفيان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُلْحِفُوا فِي المَسْأَلَةِ، فَوَاللهِ لا يَسْأَلُنِي أَحَدٌ مِنْكُمْ شيئًا فَتُخْرِجَ لَهُ مَسْأَلَتُهُ مِنِّي شيئًا وَأَنَا لَهُ كَارِهٌ فَيُبَارَكَ لَهُ فِيمَا أَعْطَيْتُهُ".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1038) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا سفيان، عن عمرو، عن وهب بن منبه، عن أخيه همّام، عن معاوية، فذكره.
ورواه أيضًا من وجه آخر عن سفيان، عن عمرو بن دينار، حَدَّثَنِي وهب بن منبه -ودخلتُ عليه في داره بصنعاء فأطعمني من جَوْزَة في داره- عن أخيه منبه، قال: سمعت معاوية بن أبي سفيان يقول (فذكره).
والإلحاف: الإلحاح، يقال: قد ألحف السائلُ في مسألته إذا ألحَّ، وهو أن يلازم المسؤول حتّى يعطيه.
মুআবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যাঞ্চার (চাওয়ার) ক্ষেত্রে অতিশয় পীড়াপীড়ি করো না। আল্লাহর কসম, তোমাদের কেউ আমার কাছে এমন কিছু চায় না, যা আমি অপছন্দ করা সত্ত্বেও তার চাওয়া আমার কাছ থেকে বের করে নেয় (অর্থাৎ অনিচ্ছাকৃতভাবে দিতে বাধ্য হই)। ফলে আমি তাকে যা প্রদান করি, তাতে তার জন্য কোনো বরকত (কল্যাণ) হয় না।"
4088 - عن رجل من بني أسد أنه قال: نَزَلْتُ أَنَا وَأَهْلِي بِبَقِيع الْغَرْقَدِ فَقَالَ لِي أَهْلِي اذْهَبْ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَاسْأَلْهُ لَنَا شَيْئًا نَأْكُلُهُ، وَجَعَلُوَا يَذْكُرُونَ مِنْ حَاجَتِهِمْ فَذَهَبْتُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَوَجَدْتُ عِنْدَهُ رَجُلا يَسْأَلُهُ وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُول:"لا أَجِدُ مَا أُعْطِيكَ"، فَتَوَلَّى الرَّجُلُ عَنْهُ وَهُوَ مُغْضَبٌ وَهُوَ يَقُولُ: لَعَمْرِي إِنَّكَ لَتُعْطِي مَنْ شِئْتَ. فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّهُ لَيَغْضَبُ عَلَيَّ أَنْ لا أَجِدَ مَا أُعْطِيهِ! مَنْ سَأَلَ مِنْكُمْ وَلَهُ أُوقِيَّةٌ أَوْ عَدْلُهَا فَقَدْ سَأَلَ إِلْحَافًا".
قَالَ الأَسَدِيُّ: فَقُلْتُ: لَلَقْحَةٌ لَنَا خَيْرٌ مِنْ أُوقِيَّةٍ.
قَالَ: فَرَجَعْتُ ولَمْ أَسْأَلْهُ فَقُدِمَ عَلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم بَعْدَ ذَلِكَ بِشَعِيرٍ وَزَبِيبٍ فَقَسَمَ لَنَا مِنْهُ حَتَّى أَغْنَانا اللهُ عز وجل.
صحيح: رواه مالك في الصّدقة (11) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن رجل من بني
أسد، فذكره.
ورواه أبو داود (1627)، والنسائي (2579) كلاهما من طريق مالك، بإسناده، مثله. ورواه أحمد (16411) من وجه آخر عن سفيان، عن زيد بن أسلم، مختصرًا.
আসাদ গোত্রের জনৈক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ও আমার পরিবার বাকী আল-গারকাদে অবস্থান করছিলাম। তখন আমার পরিবারের লোকেরা আমাকে বলল, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যান এবং আমাদের জন্য এমন কিছু চেয়ে আনুন যা আমরা খেতে পারি। তারা তাদের অভাবের কথা বারবার বলছিল।
আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং দেখলাম তাঁর কাছে এক ব্যক্তি কিছু চাইছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলছিলেন, "আমার কাছে এমন কিছু নেই যা আমি তোমাকে দিতে পারি।" লোকটি তখন ক্রোধান্বিত অবস্থায় রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে ফিরে গেল এবং বলতে লাগল: আমার জীবনের শপথ! আপনি যাকে চান তাকেই দেন।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সে আমার উপর রাগ করছে কারণ আমি তাকে দেয়ার মতো কিছু পেলাম না! তোমাদের মধ্যে কেউ যদি এমন অবস্থায় কিছু চায় যখন তার কাছে এক উকিয়া পরিমাণ সম্পদ বা তার সমমূল্যের সম্পদ রয়েছে, তবে সে যাচনা করে অতিরিক্ত পীড়াপীড়ি করল।"
আসাদী (বানু আসাদের লোকটি) বললেন, আমি (মনে মনে) বললাম, আমাদের একটি দুগ্ধবতী উটনী আছে যা এক উকিয়ার চেয়েও উত্তম।
তিনি বললেন, এরপর আমি ফিরে আসলাম এবং তাঁর কাছে কিছু চাইলাম না। এর কিছুদিন পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বার্লি ও কিশমিশ এলো। তিনি তা থেকে আমাদের মাঝে ভাগ করে দিলেন, ফলে আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্ল আমাদেরকে অভাবমুক্ত করে দিলেন।
4089 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"منْ سألَ وله قيمة أوقية، فقد أَلْحَفَ".
حسن: رواه أبو داود (1628)، والنسائي (2599) كلاهما عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن أبي الرجال، عن عمارة بن غزية، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدريّ، عن أبيه أبي سعيد، فذكر الحديث، واللّفظ لأبي داود.
قال في أبي داود: فقلت: ناقتي الياقوتة هي خير من أوقية.
قال هشام: خير من أربعين درهمًا، فرجعتُ فلم أسأله.
زاد هشام في حديثه: وكانت الأوقية على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم أربعين درهمًا.
وهشام هو ابن عمار شيخ أبي داود، قد قرنه بقتيبة بن سعيد في رواية عنه.
وأمّا النسائيّ فجاء فيه: سرحتني أمي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتيته فقعدتُ فاستقبلني وقال:"من استغنى أغناه الله عز وجل، ومن استعفّ أعفّه الله عز وجل، ومن استكفي كفاه الله عز وجل، ومن سأل وله قيمة أوقية فقد ألحف".
فقلت: ناقتي الياقوتة خير من أوقية، فرجعتُ ولم أسأله.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الرجال، وقد وثَّقه أحمد والدارقطنيّ، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وقال أبو حاتم: صالح.
ومن هذا الوجه أخرجه ابن خزيمة (2447)، وابن حبَّان (3390)، والإمام أحمد (1104) كلّهم مختصرًا.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এক উকিয়্যার মূল্যের অধিকারী হওয়া সত্ত্বেও (মানুষের কাছে) চায়, সে (চাওয়ার ক্ষেত্রে) অতিরিক্ত চাপ সৃষ্টি করে।"
(আবূ দাঊদের বর্ণনায় এসেছে) আমি (আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ছেলে) বললাম, আমার উটনী ‘ইয়া-কূতাহ’ এক উকিয়্যার চেয়ে উত্তম। হিশাম (রাবী) বলেন, (তা) চল্লিশ দিরহামের চেয়ে উত্তম। তখন আমি ফিরে গেলাম এবং তাঁর কাছে কিছু চাইলাম না। হিশাম তাঁর হাদীসে আরো বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক উকিয়্যা চল্লিশ দিরহামের সমান ছিল।
আর নাসায়ীর বর্ণনায় এসেছে: আমার মা আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে এসে বসলাম। তিনি আমার দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "যে ব্যক্তি মানুষের কাছে চাওয়া থেকে বিরত থাকে, আল্লাহ তা‘আলা তাকে ধনী করে দেন। যে ব্যক্তি সতীত্ব রক্ষা করতে চায়, আল্লাহ তা‘আলা তাকে সতীত্ব দান করেন। আর যে ব্যক্তি অন্যের মুখাপেক্ষী না হতে চায়, আল্লাহ তা‘আলা তাকে যথেষ্ট করে দেন। আর যে ব্যক্তি এমন অবস্থায় মানুষের কাছে চায় যে তার কাছে এক উকিয়্যার মূল্য রয়েছে, তবে সে (চাওয়ার ক্ষেত্রে) অতিরিক্ত চাপ সৃষ্টি করল।" আমি বললাম, আমার উটনী ‘ইয়া-কূতাহ’ এক উকিয়্যার চেয়ে উত্তম। তখন আমি ফিরে গেলাম এবং তাঁর কাছে কিছু চাইলাম না।
4090 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ سَأَلَ وَلَهُ أَرْبَعُونَ دِرْهَمًا فَهُوَ المُلْحِفُ".
حسن: رواه النسائيّ (2595) عن أحمد بن سليمان، قال: أخبرنا يحيى بن آدم، عن سفيان ابن عيينة، عن داود بن شابور، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (2448)، ورواه من وجه آخر عن سفيان بإسناده وزاد في آخر الحديث:"وهو مثل سفّ المسألة" يعني الرّمل.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি চল্লিশ দিরহামের মালিক হওয়া সত্ত্বেও ভিক্ষা করে, সে হল অতিরিক্ত যাচনাকারী।"
4091 - عن رَجُل مِنْ مُزَيْنَة أَنَّهُ قَالَتْ لَهُ أُمُّهُ: أَلا تَنْطَلِقُ فَتَسْأَلَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كما يَسْأَلُهُ النَّاسُ، فَانْطَلَقْتُ أَسْأَلُهُ فَوَجَدْتُهُ قَائِمًا يَخْطُبُ وَهُوَ يَقُولُ:"مَن اسْتَعَفَّ أَعَفَّهُ اللهُ، وَمَن
اسْتَغْنَى أَغْنَاهُ اللهُ، وَمَنْ سَأَلَ النَّاسَ وَلَهُ عِدْلُ خَمْسِ أَوَاقٍ فَقَدْ سَأَلَ إِلْحَافًا".
فَقُلْتُ بَيْنِي وَبَيْنَ نَفْسِي: لَنَاقَةٌ لَهُ هِيَ خَيْرٌ مِنْ خَمْسِ أَوَاقٍ وَلِغُلامِهِ نَاقَةٌ أُخْرى هِيَ خَيْرٌ مِنْ خَمْسِ أَوَاقٍ فَرَجَعْتُ وَلَمْ أَسْأَلْهُ.
حسن: رواه الإمام أحمد (17237) عن أبي بكر الحنفيّ، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد بن جعفر، عن أبيه، عن رجل من مزينة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الحميد بن جعفر، وهو وإن كان من رجال الصَّحيح فقد تكلم فيه بعض أهل العلم غير أنه حسن الحديث.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 95):"رواه أحمد، ورجاله رجال الصَّحيح".
قلت: وهو كما قال؛ فإنّ رجاله رجال مسلم غير أبي بكر الحنفيّ وهو عبد الكبير بن عبد المجيد بن عبيد الله البصريّ من رجال الشّيخين.
মুযাইনা গোত্রের জনৈক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, তার মা তাঁকে বললেন: “তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাও না এবং মানুষেরা যেভাবে তাঁকে জিজ্ঞেস করে, সেভাবে তুমিও জিজ্ঞেস করো না?”
তখন আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করার জন্য গেলাম এবং তাঁকে দাঁড়িয়ে খুতবা দিতে দেখলাম। তিনি বলছিলেন: “যে ব্যক্তি (মানুষের কাছে চাওয়া থেকে) পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি (আল্লাহর নিকট) অভাবমুক্ত থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে অভাবমুক্ত করে দেন। আর যে ব্যক্তি মানুষের কাছে এমন অবস্থায় চায় যে, তার কাছে পাঁচ উকিয়ার সমপরিমাণ সম্পদ আছে, সে জোর করে অতিরিক্ত চেয়েছে।”
অতঃপর আমি মনে মনে বললাম: “তার (আমার) একটি উটনী আছে, যা পাঁচ উকিয়ার চেয়েও উত্তম এবং তার (আমার) গোলামেরও একটি উটনী আছে, যা পাঁচ উকিয়ার চেয়েও উত্তম।” ফলে আমি ফিরে আসলাম এবং তাঁকে কিছু জিজ্ঞেস করলাম না।
4092 - عن ابن عمر يرفع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُلْحِفوا بالمسألة، فإنه من يستخرج منا بها شيئًا لا يُبارك له فيه".
صحيح: رواه أبو يعلي (5628) عن عبيد الله بن عمر القواريريّ، حَدَّثَنَا حمّاد، عن عمرو - قال حمّاد وليث، عن عمرو، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 95):"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصَّحيح".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা (কারও কাছে) অতিমাত্রায় পীড়াপীড়ি করে কিছু চেয়ে নিও না। কারণ, যে ব্যক্তি এর মাধ্যমে আমাদের কাছ থেকে কিছু চেয়ে নেয়, তার জন্য তাতে কোনো বরকত দেওয়া হয় না।"
4093 - عن عمر بن الخطّاب، قال: قَدْ كَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يُعْطِينِي العَطَاءَ فَأقُولُ: أَعْطِهِ أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنِّي، حَتَّى أَعْطَانِي مَرَّةً مَالا فَقُلْتُ: أَعْطِهِ أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنِّي، فَقَالَ رَسُول الله صلى الله عليه وسلم:"خُذُهُ وَمَا جَاءَكَ مِنْ هَذَا الْمَالِ وَأَنْتَ غَيْرُ مُشْرِفٍ وَلا سَائِلٍ فَخُذْهُ، وَمَا لا فَلا تُتْبِعْهُ نَفْسَكَ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1473)، ومسلم في الزّكاة (1045) كلاهما من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، قال: سمعت عمر بن الخطّاب، فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে কোনো দান দিলে আমি বলতাম: 'এটা আমার চেয়েও বেশি অভাবী কাউকে দিন।' এমনকি একবার তিনি আমাকে কিছু মাল (সম্পদ) দিলেন। আমি বললাম: 'এটা আমার চেয়েও বেশি অভাবী কাউকে দিন।' তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: 'এটা নাও। এই সম্পদ থেকে যা তোমার কাছে আসবে, এমতাবস্থায় যে তুমি এর প্রতি আকাঙ্ক্ষী নও এবং যা তুমি চেয়ে নাওনি—তা তুমি গ্রহণ করো। আর যা এমন নয়, তার পেছনে নিজেকে লাগিয়ো না (বা নিজেকে ধাবিত করো না)।'
4094 - عن ابن عمر، قال: إنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُعْطِي عُمَرَ بْنَ الخَطَّابِ رضي الله عنه العَطَاءَ فَيَقُولُ لَهُ عُمَرُ: أَعْطِه يا رَسُولَ اللهِ! أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنِّي. فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"خُذْهُ فَتَمَوَّلْهُ أَوْ تَصَدَّقْ بِهِ، وَمَا جَاءَكَ مِنْ هَذَا الْمَالِ وَأَنْتَ غَيْرُ مُشْرِفٍ وَلا سَائِلٍ فَخُذْهُ، وَمَا لا فَلا تُتْبعْهُ نَفْسَكَ".
قَالَ سَالِمٌ: فَمِنْ أَجْلِ ذَلِكَ كَانَ ابْنُ عُمَرَ لا يَسْأَلُ أَحَدًا شَيْئًا، وَلا يَرُدُّ شَيْئًا أُعْطِيَهُ.
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1045: 111) عن أبي الطاهر، عن ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب، عن سائم، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে অনুদান দিতেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বলতেন: হে আল্লাহর রাসূল! এটি আমার চেয়েও অধিক অভাবগ্রস্ত ব্যক্তিকে দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি এটি গ্রহণ করো এবং এর মালিক হও অথবা সাদকা করে দাও। আর এই সম্পদের যে অংশ তোমার কাছে আসে এমন অবস্থায় যে, তুমি এর প্রতি লোভী নও এবং কারো কাছে চাওনি, তবে তা গ্রহণ করো। আর যা এমন নয়, তার পিছনে নিজের মনকে ধাবিত করো না।" সালিম বলেছেন: এই কারণেই ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কারো কাছে কিছু চাইতেন না, আর তাঁকে কিছু দেওয়া হলে তিনি তা প্রত্যাখ্যানও করতেন না।
4095 - عن حكيم بن حزام، قال: سَأَلْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَعْطَانِي، ثُمَّ سَأَلْتُهُ فَأَعْطَانِي، ثُمَّ سَأَلْتُهُ فَأَعْطَانِي، ثُمَّ قَالَ:"يَا حَكِيمُ! إِنَّ هَذَا المَالَ خَضِرَةٌ حُلْوَةٌ، فَمَنْ أَخَذَهُ بِسَخَاوَةِ نَفْس بُورِك له فيه، وَمَنْ أَخَذَهُ بِإِشْرَافِ نَفْسٍ لَمْ يُبَارَكْ لَهُ فِيهِ، كَالَّذِي يَأْكُلُ وَلا يَشْبَعُ، الْيَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَى".
قَالَ حَكِيمٌ: فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ، والَّذِي بَعَثَكَ بِالْحَقِّ لا أَرْزَأُ أَحَدًا بَعْدَكَ شَيْئًا حَتَّى أُفَارِقَ الدُّنْيَا. فَكَانَ أَبُو بَكْرٍ رضي الله عنه يَدْعُو حَكِيمًا إِلَى الْعَطَاءِ فَيَأبَى أَنْ يَقْبَلَهُ مِنْهُ، ثُمَّ إِنَّ عُمَرَ رضي الله عنه دَعَاهُ لِيُعْطِيَهُ فَأَبَى أَنْ يَقْبَلَ مِنْهُ شيئًا. فَقَالَ عُمَرُ: إِنِّي أُشْهِدُكُم يَا مَعْشرَ المُسْلِمِينَ عَلَى حَكِيمٍ أَنِّي أَعْرِضُ عَلَيْهِ حَقَّهُ مِنْ هَذَا الْفَيْءِ فَيَأْبَى أَنْ يَأْخُذَهُ فَلَمْ يَرْزَأْ حَكِيمٌ أَحَدًا مِن النَّاسِ بَعْدَ رَسُولِ اللهِ حَتَّى تُوُفِّيَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1472)، ومسلم في الزّكاة (1035) كلاهما من طريق الزّهريّ، عن عروة بن الزُّبير وسعيد بن المسيب، عن حكيم بن حزام، فذكر الحديث. اللّفظ للبخاريّ. وأمّا مسلم فرواه مختصرًا.
وقوله:"فمن أخذه بسخاوة نفس" أي بانشراح من غير شره ولا إلحاح.
وفي رواية مسلم:"فمن أخذه بطيب نفس".
وقوله:"بإشراف نفس" هو أن تتطلّع النّفس إليه وتطمعها.
وقوله:"لا أرزأ" أي لا أنقصُ مالَه بالطّلب منه.
হাকীম ইবনু হিজাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে কিছু চাইলাম, তিনি আমাকে দিলেন। আবার চাইলাম, তিনি আমাকে দিলেন। আবার চাইলাম, তিনি আমাকে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে হাকীম! এই সম্পদ হলো সবুজ ও সুমিষ্ট। সুতরাং যে ব্যক্তি উদার মন নিয়ে তা গ্রহণ করে, তাতে তার জন্য বরকত দান করা হয়। আর যে ব্যক্তি লোভী মন নিয়ে তা গ্রহণ করে, তাতে তার জন্য বরকত দেওয়া হয় না। সে ঐ ব্যক্তির মতো, যে খায় কিন্তু তৃপ্ত হয় না। উপরের হাত (দানকারীর হাত) নিচের হাত (গ্রহণকারীর হাত) থেকে উত্তম।"
হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন! আপনার পরে আমি আর কারো কাছ থেকে মৃত্যু পর্যন্ত কিছু চাইব না (বা কারো সম্পদ নষ্ট করে কিছু নেব না)।"
অতঃপর (নবীজীর ইন্তিকালের পর) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দান গ্রহণ করার জন্য ডাকতেন, কিন্তু তিনি তা নিতে অস্বীকার করতেন। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দান করার জন্য ডাকলেন, কিন্তু তিনি তাঁর কাছ থেকেও কিছু গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন, "হে মুসলিম জনতা! আমি তোমাদেরকে হাকীমের ব্যাপারে সাক্ষী রাখছি যে, আমি তাকে এই গণীমতের সম্পদ থেকে তার প্রাপ্য দিতে চাই, কিন্তু সে তা নিতে অস্বীকার করছে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পর হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কারো কাছ থেকে কিছুই গ্রহণ করেননি, যতক্ষণ না তিনি ইন্তিকাল করেন।
4096 - عن خالد بن عدي الجهنيّ، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"مَنْ بَلَغَهُ مَعْرُوفٌ عَنْ أَخِيهِ مِنْ غَيْرِ مَسْأَلَةٍ وَلَا إِشْرَافِ نَفْسٍ فَلْيَقْبَلْهُ وَلا يَرُدَّهُ فَإِنَّمَا هُوَ رِزْقٌ سَاقَهُ اللهُ عز وجل إِلَيْهِ".
صحيح: رواه أحمد (17936)، وأبو يعلى (925)، والطَّبرانيّ (4124) كلّهم من طريق عبد الله ابن يزيد المقرئ، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي أيوب، حَدَّثَنِي أبو الأسود، عن بكير بن عبد الله، عن بر ابن سعيد، عن خالد بن عدي، فذكره.
وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (3404)، والحاكم (2/ 62) كلاهما من هذا الوجه.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وأبو الأسود هو: محمد بن عبد الرحمن بن نوفل الأسديّ من رجال الجماعة.
খালিদ ইবনে আদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তির কাছে তার কোনো ভাইয়ের পক্ষ থেকে এমন কোনো অনুগ্রহ বা উপকার পৌঁছে, যা সে প্রার্থনা করেনি এবং তার মনও তা পাওয়ার আকাঙ্ক্ষা করেনি, তবে সে যেন তা গ্রহণ করে এবং প্রত্যাখ্যান না করে। কেননা তা হচ্ছে সেই রিযিক যা মহান আল্লাহ্ তার জন্য পাঠিয়েছেন।”
4097 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مَنْ آتاهُ اللهُ مِنْ هَذَا الْمَالِ شَيْئًا مِنْ غَيْرِ أَنْ يَسْأَلَهُ فَلْيَقْبَلْهُ فَإنَّمَا هُوَ رزْقٌ سَاقَهُ اللهُ عز وجل إليه".
صحيح: رواه الإمام أحمد من ثلاثة طرق: منها يزيد (7921). ومنها عفّان (8294). ومنها بهز (10358) كلّهم عن همّام بن يحيى، عن قتادة، عن عبد الملك، عن أبي هريرة، فذكره.
ورجاله ثقات غير عبد الملك هذا لم ينسبه، وكذا نصّ الحافظ في إتحاف المهرة (15/ 323) بأنه لم يُنسب.
ثمّ بعد البحث والتّتبع تبيّن أنه عبد الملك بن مالك المراغيّ يكنى أبا أيوب، هكذا سمّاه وكناه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (43) في حديث أبي هريرة:"إذا قاتل أحدكم فليجتنب الوجه، فإنّ الله خلق آدم على صورته".
رواه من طريق قتادة، عن أبي أيوب -وهو الأزدي- عبد الملك بن مالك المراغيّ، عن أبي هريرة، فذكره.
إن كان عبد الملك هو أبو أيوب المراغي فهو من رجال الشّيخين، ولكن اختلف في اسمه، فقال المزي: اسمه يحيى بن مالك، ويقال: حبيب بن مالك، وذكر أنه يروي عن أبي هريرة، وعنه قتادة بن دعامة.
قلت: وقد يكون من اسمه أيضًا عبد الملك بن مالك مادام اختلف في اسمه، والله تعالى أعلم.
وقول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 101) يُشعر بأنه عبد الملك أبو أيوب المراغي لأنه قال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصّحيح".
وفي الباب عن عائذ بن عمرو، قال: أحسبه رفعه (القائل هو عبد الصمد بن عبد الوارث شيخ أحمد) قال:"من عرض له شيء من هذ الرزق فليوسع به في رزقه، فإن كان عنه غنيًا فليوجهه إلى من أحوج إليه منه".
رواه الإمام أحمد من طرق - منها عبد الصمد بن عبد الوارث (20642) وقرنه بيونس (20647).
منها عن حسن بن موسي (20648).
ومنها عن وكيع (20649) كلّ هؤلاء عن أبي الأشهب، عن عامر الأحول، عن عائذ بن عمرو، ولفظهم متقارب.
ولكن قال عبد الصمد في روايته عن أبي الأشهب، عن عامر الأحول -شيخ له- عن عائذ بن عمرو، فذكر الحديث.
فقوله:"شيخ له"، وفي"تهذيب التهذيب":"وهو شيخ آخر تابعي، فهل معناه أنه عامر الأحول ليس هو عامر بن عبد الواحد الأحول البصريّ المشهور، فإن كان هو غيره فلعله أدرك عائذ ابن عمرو؛ لأنّ عامر بن عبد الواحد الأحول هذا قال فيه أبو القاسم البغوي في ترجمة عائذ بن عمرو:"روى عنه عامر بن عبد الواحد الأحول، ولا أحسبه أدركهـ".
ولكن قال الحافظ في"التهذيب":"في الجرح والتعديل لابن أبي حاتم، وتاريخ ابن أبي خيثمة ما يبين لك أنه هو، فإنه قال: عامر الأحول هو ابن عبد الواحد بصري، روي عن عائذ بن عمرو، وأبي الصديق، وعمرو بن شعيب، ثمّ ساق كلام الناس فيه وقال ابن أبي خيثمة في تاريخه سمعت أبا زكريا يقول عامر الأحول بصري وهو ابن عبد الواحد فهو كل عامر يروي عنه البصريون ليس غيره" انتهى.
فإذا ثبت أنه عامر بن عبد الواحد الأحول ففيه انقطاع بينه وبين عائذ بن عمرو.
والحديث رواه الطبرانيّ في"الكبير" (18/ 19)، وابن قانع في مُعْجَمُ الصّحابة (2/ 302 - 303)، والبيهقي في"شعب الإيمان" (3554) كلّهم من هذا الوجه.
قال عبد الله بن أحمد: سألت أبي: ما الإشراف؟ قال:"تقول في نفسك: سيبعث إليَّ فلان، سيصلني فلان".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাকে আল্লাহ এই সম্পদ থেকে কিছু প্রদান করেন, অথচ সে তা চায়নি, তবে সে যেন তা গ্রহণ করে। কারণ, এটা তো সেই রিযিক, যা মহান আল্লাহ তার দিকে চালিত করেছেন।"
4098 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لَيْسَ الْمِسْكِينُ بِهَذَا الطَّوَّافِ الَّذِي يَطُوفُ عَلَى النَّاسِ فَتَرُدُّهُ اللُّقْمَةُ وَاللُّقْمَتَانِ والتَّمْرَةُ والتَّمْرَتَانِ". قَالُوا: فَمَا المِسْكِينُ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَالَ:"الَّذِي لا يَجِدُ غِنًى يُغْنِيهِ، وَلا يَفْطُنُ النَّاسُ لَهُ فَيُتَصَدَّقَ عَلَيْهِ، ولا يَقُومُ فَيَسْأَلَ النَّاسَ".
متفق عليه: رواه مالك في كتاب صفة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم (7) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال (فذكره).
ورواه البخاريّ في الزّكاة (1479) عن إسماعيل بن عبد الله، حَدَّثَنِي مالك، بإسناده، ورواه مسلم في الزّكاة (1039) من وجه آخر عن أبي الزّناد، نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মিসকিন (অভাবী) সে ব্যক্তি নয় যে মানুষের দ্বারে দ্বারে ঘোরে, আর এক বা দু’ লোকমা (খাবার) কিংবা একটি বা দুটি খেজুর যাকে ফিরিয়ে দেয় (বা সন্তুষ্ট করে)। সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে মিসকিন কে? তিনি বললেন: সে ব্যক্তি, যে স্বাবলম্বী হওয়ার মতো সম্পদ পায় না, আর মানুষও তার (অভাবের) প্রতি মনোযোগী হয় না যে তাকে সাদাকা দেওয়া হবে, এবং সে (লজ্জায়) দাঁড়িয়ে মানুষের কাছে কিছু চায় না।
4099 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لَيْسَ المِسْكِيُن بِالَّذِي تَرُدُّهُ التَّمْرَةُ وَالتَّمْرَتَانِ وَلا اللُّقْمَةُ وَاللُّقْمَتَانِ إنّما المِسْكِينُ الْمُتَعَفِّفُ اقْرَءُوا إِنْ شِئْتُمْ: {لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا} [سورة البقرة: 273]".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4539) ومسلم في الزّكاة (1039) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، قال حَدَّثَنِي شريك بن أبي نمر، أن عطاء بن يسار وعبد الرحمن بن أبي عمرة الأنصاري قالا: سمعنا أبا هريرة يقول: فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মিসকীন (দরিদ্র) সে নয়, যাকে একটি বা দুটি খেজুর অথবা এক লোকমা বা দুই লোকমা খাদ্য ফিরিয়ে দেয় (অর্থাৎ সামান্য কিছু গ্রহণ করে সন্তুষ্ট হয়ে যায়)। বরং প্রকৃত মিসকীন হলো সেই ব্যক্তি যে (চাওয়া থেকে) বিরত থাকে/লজ্জাশীল। তোমরা চাইলে (আল্লাহর বাণী) পাঠ করতে পারো: 'তারা মানুষের কাছে কাকুতি-মিনতি করে ভিক্ষা চায় না।' (সূরা আল-বাকারা: ২৭৩)।"
4100 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لَيْسَ المِسْكِينُ الذي تَرُدُّهُ الأُكْلَةُ والأُكْلَتَانِ، وَلَكِن المِسْكِينُ الَّذِي لَيْسَ لَهُ غِنًى وَيَسْتَحْيِي أَوْ لا يَسْأَلُ النَّاسَ إِلْحَافًا".
صحيح: رواه البخاريّ في الزّكاة (1471) عن حجَّاج بن منهال، حَدَّثَنَا شعبة، أخبرني محمد ابن زياد، قال: سمعت أبا هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “মিসকীন (নিঃস্ব) সে নয়, যাকে এক বা দুই লোকমা খাবার ফিরিয়ে দেয় (যার কারণে সে ভিক্ষা থেকে বিরত হয়)। বরং মিসকীন তো সে-ই যার কোনো অভাব পূরণের সামর্থ্য নেই এবং যে লজ্জাবোধ করে (তাই চাইতে পারে না) অথবা লোকদের কাছে সে জোর করে (লেগে থেকে) যাচ্ঞা করে না।”