আল-জামি` আল-কামিল
4208 - عن أبي بكرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"صوموا -الهلال- لرؤيته، وأفطروا لرؤيته، فإن غُمَّ عليكم فأكملوا العدّة ثلاثين. والشّهر هكذا وهكذا وهكذا" وعقد.
حسن: رواه الإمام أحمد (20432)، والبزار - كشف الأستار (970)، وأبو داود الطيالسيّ (914) وعنه البيهقيّ (4/ 206) كلّهم من حديث عمران القطان، عن قتادة، عن الحسن، عن أبي بكرة، فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن أبي بكرة إلا من هذا الوجه، تفرّد به عمران".
قلت: عمران هو ابن داور القطان مختلف فيه، فكان البخاريّ والترمذي والإمام أحمد وغيرهم حسن الرأي فيه، فإذا لم نجد في حديثه ما يخالفه فهو حسن الحديث؛ وهذا منها لكثرة شواهده والحسن هو الإمام المشهور اختلف في سماعه من أبي بكرة فأثبته بهز بن أسد ونفاه الدارقطني.
والصواب أنه سمع منه كما في الصحيحين، وسنن النسائي وغيرها.
وفي معناه ما روي عن طلق بن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا رأيتم الهلال فصوموا، وإذا رأيتموه فأفطروا، فإن أغمي عليكم فأتموا العدّة".
رواه الإمام أحمد (16290) عن موسى، قال: حدثنا محمد بن جابر، عن قيس بن طلق، عن أبيه، قال (فذكره).
ورواه الطبراني في"الكبير" (8/ 397) من وجهين يحيى بن إسحاق ومحمد بن سليمان لوين قالا: حدثنا محمد بن جابر بإسناده، فذكره.
ورواه أيضًا من حديث هشام بن حسان، عن محمد بن جابر بإسناده نحوه.
ورواه البيهقي (4/ 208) من وجه آخر عن هشام بن حسان، عن قيس بن طلق، عن أبيه، ولم يذكر بينهما"محمد بن جابر". فيا تُرى هل فيه سقط أو وجد هكذا؟
وقد قال البخاري:"محمد بن جابر أبو عبد الله السحيمي عن حماد بن أبي سليمان، وقيس بن طلق ليس بالقوي يتكلمون فيه".
وقال ابن معين: محمد بن جابر ليس بشيء. وقال النسائي: ضعيف. وقالوا: هو صدوق، ولكن ضاعت كتبه فصار يقبل التلقين فضعف من أجله.
ولكن رواه الطبراني (8/ 404) من وجه آخر عن محمد بن مسكين اليماميّ، ثنا عبد الرحمن بن عوف بن حبان، حدثني أبي، عن موسى بن عمير، عن قيس بن طلق، عن أبيه، فذكر الحديث.
وفيه:"حتي يروا الهلال أو تفي العدة، ثم لا نفطر حتى يروه أو تفي العدّة".
قال الهيثمي في المجمع" (3/ 148):"وفيه من لا أعرفه".
وفي معناه ما رُوي أيضًا عن عمر بن الخطاب أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تقدّموا هذا الشهر، صوموا لرؤيته، وأفطروا لرؤيته، فإن غمّ عليكم فعدّوا ثلاثين". رواه الفاكهي في"فوائده" (53) عن عبد السلام بن عاصم الرازي بمكة، أنا أبو زهير عبد الرحمن بن مغراء، أنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن مالك بن أبي عامر، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
ورواه البيهقيّ (4/ 207) من طريق الفاكهيّ.
ورواه الطبرانيّ في"الأوسط" -مجمع البحرين (1492) - من وجه آخر عن أبي زهير، عن عبد الرحمن بن مغراء، بإسناده مثله.
قال الطبراني: لا يُروى عن عمر إلَّا بهذا الإسناد، تفرّد به عبد الرحمن.
قلت: عبد الرحمن بن مغراء، مختلف فيه غير أنَّه حسن الحديث في غير الأعمش، فلا يضرّ تفرّده، ولكن فيه محمد بن إسحاق وهو مدلس، ولم أقف على تصريح منه. وأهل العلم لا يقبلونه في الأحكام إذا لم يصرّح.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: তোমরা চাঁদ দেখে রোযা রাখো এবং চাঁদ দেখে রোযা ভঙ্গ করো (ঈদ করো)। যদি তা [চাঁদ] তোমাদের কাছে মেঘাচ্ছন্ন থাকে, তাহলে তোমরা ত্রিশ দিনে সংখ্যা পূর্ণ করো। আর মাস হলো এমন, এমন এবং এমন। - এই বলে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দিয়ে ইশারা করলেন (আঙ্গুল ভাঁজ করলেন)।
4209 - عن أمِّ سلمة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم حلف لا يدخل على بعض أهله شهرًا، فلما مضى تسعةٌ وعشرون يومًا غدا عليهنّ أو راح، فقيل له: يا نبي الله، حلفتَ أن لا تدخل عليهن شهرًا؟ قال:"إنّ الشهر يكون تسعة وعشرين يومًا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5202)، ومسلم في الصيام (1058) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني يحيى بن عبد الله بن صيفي، أنّ عكرمة بن عبد الرحمن بن الحارث، أخبره، أنّ أمَّ سلمة أخبرته، ولفظهما سواء.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শপথ করেছিলেন যে, তিনি তাঁর কিছু স্ত্রীর কাছে এক মাস যাবেন না। যখন ঊনত্রিশ দিন পার হলো, তখন তিনি সকালে অথবা সন্ধ্যায় তাঁদের কাছে গেলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: হে আল্লাহর নবী! আপনি তো শপথ করেছিলেন যে, আপনি তাঁদের কাছে এক মাস প্রবেশ করবেন না? তিনি বললেন: "নিশ্চয় মাস ঊনত্রিশ দিনেরও হয়ে থাকে।"
4210 - عن أنس بن مالك، قال: آلى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من نسائه، وكانت انفكّت رجلُه، فأقام في مَشْربة تسعًا وعشرين ليلة، ثم نزل. فقالوا: يا رسول الله، آليتَ شهرًا؟ فقال:"إنّ الشهر يكون تسعًا وعشرين".
صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1911) عن عبد العزيز بن عبد الله، حدّثنا سليمان بن بلال، عن حميد (هو الطويل)، عن أنس، فذكره.
ورواه في الصلاة (378) من طريق يزيد بن هارون، أخبرنا حميد الطويل، به، بسياق أتم، وفيه صلاته صلى الله عليه وسلم بأصحابه جالسًا وهم قيام. وفيه قوله: إنّما جعل الإمام ليؤتم به … والحديث.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে (বিচ্ছিন্ন থাকার) শপথ (ইলা) করলেন। তখন তাঁর পা মচকে গিয়েছিল (বা: আঘাতপ্রাপ্ত হয়েছিল)। তাই তিনি একটি উঁচু কক্ষে ঊনত্রিশ রাত অবস্থান করলেন, অতঃপর নেমে আসলেন। লোকেরা বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো এক মাসের (শপথ) করেছিলেন? তিনি বললেন, "মাস ঊনত্রিশ দিনেও হয়ে থাকে।"
4211 - عن عبد الله بن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إنّا أمّة أميّة لا نكتبُ ولا نحسُب، الشّهر هكذا وهكذا" يعني مرة تسعة وعشرين، ومرّة ثلاثين.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1913)، ومسلم في الصيام (1080: 15) كلاهما من طريق شعبة، حدّثنا الأسود بن قيس، قال: سمعت سعيد بن عمرو بن سعيد، أنه سمع ابن عمر، فذكره. واللفظ للبخاريّ.
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আমরা একটি নিরক্ষর জাতি (উম্মাহ উম্মিয়্যাহ)। আমরা লিখি না এবং হিসাবও করি না। মাস হয় এভাবে এবং এভাবে।" অর্থাৎ একবার ঊনত্রিশ দিনে এবং একবার ত্রিশ দিনে।
4212 - عن ابن عباس، قال: أصبحنا يومًا ونساءُ النبيّ صلى الله عليه وسلم يبكين، عند كلِّ امرأة منهن أهلها، فخرج إلى المسجد فإذا هو ملآن من الناس، فجاء عمر بن الخطاب فصعِد إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو في غرفة له، فسلَّم فلم يجبه أحد، ثم سلَّم فلم يجبه أحد، ثم سلَّم فلم يجبه أحد، فناداه، فدخل على النبي صلى الله عليه وسلم فقال: أطلّقتَ نساءك؟ فقال:"لا؛ ولكن آليتُ منهنَّ شهرًا" فمكث تسعًا وعشرين ثم دخل على نسائه.
صحيح: رواه البخاريّ في النكاح (5203) عن علي بن عبد الله (هو ابن المديني)، حدّثنا مروان ابن معاوية، حدّثنا أبو يعفور، قال: تذاكرنا عند أبي الضُّحي، فقال: حدّثنا ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন সকালে আমরা দেখলাম যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ কাঁদছেন। তাদের প্রত্যেকের কাছেই তাদের পরিবার-পরিজন উপস্থিত ছিল। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদের দিকে গেলেন এবং দেখলেন যে মাসজিদ লোকে পরিপূর্ণ। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন, তিনি তখন একটি কামরায় অবস্থান করছিলেন। তিনি সালাম দিলেন, কিন্তু কেউ উত্তর দিল না। তারপর আবার সালাম দিলেন, কিন্তু কেউ উত্তর দিল না। এরপর তৃতীয়বার সালাম দিলেন, কিন্তু কেউ উত্তর দিল না। তখন তিনি তাঁকে ডাকলেন। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করে বললেন: আপনি কি আপনার স্ত্রীদের তালাক দিয়েছেন? তিনি বললেন: "না। তবে আমি তাদের থেকে এক মাসের জন্য ঈলা (শপথ/বিচ্ছিন্ন থাকা) করেছি।" অতঃপর তিনি উনত্রিশ দিন অবস্থান করলেন, এরপর তাঁর স্ত্রীদের কাছে গেলেন।
4213 - عن عمر بن الخطاب، قال: لما اعتزل رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءه، قلت: يا رسول الله، إنما كنتَ في الغرفة تسعًا وعشرين؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الشّهر تسعًا وعشرين".
صحيح: رواه ابن خزيمة (1921)، وابن حبان (3453) كلاهما من حديث عمر بن يونس، ثنا عكرمة بن عمار، حدثني سماك أبو زميل، حدثني عبد الله بن عباس، حدثني عمر بن الخطاب، فذكره.
ورواه مسلم في الطلاق (1479) عن زهير بن حرب، عن عمر بن يونس الحنفي في سياق طويل في قصة اعتزاله صلى الله عليه وسلم نساءه، وسيأتي في موضعه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে আলাদা হয়ে যান, তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো কক্ষটিতে মাত্র ঊনত্রিশ দিন অবস্থান করেছেন? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মাস ঊনত্রিশ দিনেও হয়ে থাকে।"
4214 - عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أتاني جبريل عليه السلام، فقال: الشّهر تسع وعشرون يومًا".
صحيح: رواه النسائيّ (2133)، وأحمد (1885) كلاهما من حديث شعبة، عن سلمة بن كهيل، عن أبي الحكم، عن ابن عباس، فذكره.
وأبو الحكم اسمه عمران بن الحارث السلمي. وإسناده صحيح.
وفي رواية عنه، قال: هجر رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءه شهرًا، فلما مضى تسع وعشرون، أتاه جبريل فقال:"قد بَّرتْ يمينُك، وقد تمّ الشّهر".
رواه أحمد (2103) عن عمرو بن محمد أبي سعيد العنقريّ، أخبرنا سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن عمران، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح، وعمران هو ابن الحارث السلمي أبو الحكم كما مضى.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন: মাসটি ঊনত্রিশ দিনের।"
তাঁর থেকে অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে এক মাস দূরে থাকার (ইলা করার) শপথ করেছিলেন। যখন ঊনত্রিশ দিন পার হলো, তখন তাঁর কাছে জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন: "আপনার শপথ পূর্ণ হয়েছে, আর মাসও পূর্ণ হয়েছে।"
4215 - عن سعد بن أبي وقاص، قال: ضرب رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بيده على الأخرى،
فقال:"الشّهر هكذا وهكذا" ثم نقص في الثالثة إِصْبعًا.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1086) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثني محمد بن سعد، عن أبيه، سعد بن أبي وقاص، فذكره.
وفي رواية له بلفظ:"الشّهر هكذا وهكذا وهكذا، عشرًا وعشرًا وتسعًا مرّة".
সাদ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এক হাত অন্য হাতের উপর আঘাত করলেন (অর্থাৎ ইশারা করলেন) এবং বললেন: "মাস হলো এভাবে, এবং এভাবে।" এরপর তৃতীয়বারে তিনি একটি আঙুল কমালেন।
তাঁর (মুসলিমের) অন্য এক বর্ণনায় এই শব্দগুলো এসেছে: "মাস হলো এভাবে, এভাবে এবং এভাবে—একবার দশ, একবার দশ এবং একবার নয় (ঊনত্রিশ)।"
4216 - عن عائشة، قالت: لما مضتْ تسعٌ وعشرون ليلة أعدُّهنَّ، دخل عليَّ رسول الله. قالتْ: بدأ بي. فقلتُ: يا رسول الله، إنّك أقسمتَ أن لا تدخل علينا شهرًا، وإنّك دخلت من تسع وعشرين، أعدُّهنّ. فقال:"إنَّ الشّهرَ تسعٌ وعشرون".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1083) عن عبد بن حميد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، أخبرني عروة، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি গণনা করছিলাম, যখন ঊনত্রিশ রাত অতিবাহিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন। তিনি (আয়িশা) বললেন, তিনি আমার কাছেই প্রথমে এলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো কসম করেছিলেন যে আপনি এক মাস আমাদের কাছে আসবেন না। অথচ আপনি ঊনত্রিশ দিনে প্রবেশ করলেন, যা আমি গণনা করেছি। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয় মাস ঊনত্রিশ দিনেও হয়।"
4217 - عن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص الأمويّ، قال: قيل لعائشة: يا أمَّ المؤمنين، رؤي هذا الشّهر لتسع وعشرين! قالت: وما يعجبُكم من ذاك، لما صُمتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم تسعًا وعشرين أكثر مما صمتُ ثلاثين.
صحيح: رواه الإمام أحمد (24518)، والطبراني في الأوسط (5245)، والدارقطني (2351)، والبيهقي (4/ 250) كلّهم من طرق، عن إسحاق بن سعيد بن عمرو، عن أبيه سعيد بن عمرو بن سعيد ابن العاص الأمويّ، عن عائشة، فذكرته. قال الدارقطني:"هذا إسناد صحيح حسن".
قلت: إسناده صحيح ورجاله رجال الشيخين.
وأمّا ما رُوي عن ابن مسعود قال:"لقد صُمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم تسعًا وعشرين أكثر مما صمنا ثلاثين".
فهو غير ثابت كما قال الدّارقطنيّ (2350) لأنّ فيه عبد الأعلي بن أبي المساور، يروي عن حماد بن أبي سليمان، عن إبراهيم، عن علقمة، عنه."وعبد الأعلى بن أبي المساور متروك" انتهى.
قلت: ولكن رواه أبو داود (2322)، والترمذيّ (189) كلاهما عن أحمد بن منيع، حدّثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، أخبرني عيسي بن دينار، عن أبيه، عن عمرو بن الحارث بن أبي ضرار، عن ابن مسعود، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (1922) وأخرجه من هذا الوجه.
ورواه الإمام أحمد (4300) عن يحيي بن زكريا بإسناده مثله.
ورجاله ثقات غير دينار والد عيسى وهو الكوفي، انفرد بالرواية عنه ولده، ولم يوثقه غير ابن حبان (6/ 291) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، ولم يتابع فهو لين الحديث.
وقال الذهبي في"ميزانه":"مجهول".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাকে জিজ্ঞেস করা হলো: হে উম্মুল মু'মিনীন, এই মাসটি তো ঊনত্রিশ দিনে দেখা গেছে (অর্থাৎ ঊনত্রিশ দিনেই শেষ হয়েছে)! তিনি বললেন: এতে তোমাদের আশ্চর্যের কী আছে? কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে ত্রিশ দিনের চেয়ে ঊনত্রিশ দিনের রোজা বেশি রেখেছি।
4218 - عن جابر بن عبد الله، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتزل نساءه شهرًا، فخرج إلينا في
تسع وعشرين، فقلنا: إنّما الشهر، وصفّق بيديه ثلاث مرّات، وحبس إصْبعًا واحدة في الآخرة.
صحيح: رواه مسلم في الصّيام (1084) من طريق الليث، عن أبي الزبير، عن جابر، به، فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে এক মাস দূরে অবস্থান করেছিলেন। অতঃপর তিনি উনত্রিশ দিনের দিন আমাদের কাছে এলেন। আমরা বললাম: (মাস তো) কেবল এই পরিমাণ (২৯ দিন)। তখন তিনি নিজ হাত দ্বারা তিনবার তালি দিলেন এবং শেষবারে একটি আঙ্গুল চেপে রাখলেন।
4219 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كم مضى من الشهر؟" قال: قلنا: اثنان وعشرون، وبقيت ثمان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الشهر هكذا، والشهر هكذا، والشهر هكذا" ثلاث مرات، وأمسك واحدة.
صحيح: رواه ابن ماجه (1656) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (7423)، وابن حبان (3450)، والبيهقي (4/ 310) كلهم من حديث أبي معاوية بإسناده، نحوه.
وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (2179) ورواه من وجه آخر عن الأعمش، بإسناده وفيه: ذكرنا ليلة القدر عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كم مضى من الشّهر؟" فذكر الحديث مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মাসটির কত দিন চলে গেল?" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম: "বাইশ দিন চলে গেছে এবং আট দিন বাকি আছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মাস হয় এভাবে, মাস হয় এভাবে, এবং মাস হয় এভাবে"— এই কথা বলে তিনি তিনবার (দশ আঙুলে) ইশারা করলেন, এবং একবার একটি (আঙুল) চেপে ধরলেন।
4220 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يتقدّمنّ أحدُكم رمضان بصوم يوم أو يومين، إلّا أن يكون رجل كان يصومُ صومَه فلْيصُم ذلك اليوم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1914)، ومسلم في الصيام (1082) كلاهما من طريق هشام (هو ابن أبي عبد الله الدّستوائيّ)، حدّثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة (هو ابن عبد الرحمن بن عوف)، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.
ورواه عبد الرزاق (7315) ومن طريقه أحمد (7779) عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير بإسناده، بلفظ:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يتعجل شهر رمضان بصوم يوم أو يومين، إلّا رجل كان يصوم صيامًا فيأتي ذلك على صيامه". وإسناده صحيح.
قال الحافظ في"الفتح" (4/ 128):"قال العلماء: معنى الحديث لا تستقبلوا رمضان بصيام على نية الاحتياط لرمضان، قال الترمذي لما أخرجه (684): العمل على هذا عند أهل العلم، كرهوا أن يتعجّل الرجل بصيام قبل دخول رمضان لمعني رمضان" اهـ.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমাদের কেউ যেন এক বা দু’দিন সাওম (রোযা) পালনের মাধ্যমে রমযানকে এগিয়ে না আনে। তবে যদি কোনো ব্যক্তি তার (স্বাভাবিক) সাওম পালন করে থাকে, তবে সে ঐ দিন সাওম পালন করতে পারে।”
4221 - عن صلة، قال: كنا عند عمار في اليوم الذي يشك فيه، فأتي بشاة، فتنحى بعض القوم.
فقال عمار: من صام هذا اليوم فقد عصى أبا القاسم صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (2334)، والترمذيّ (686)، والنسائيّ (2188)، وابن ماجه (1645) كلّهم من طرق عن عمرو بن قيس الملائيّ، عن أبي إسحاق، عن صلة بن زفر، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (1914)، وابن حبان (3585)، والحاكم (1/ 423). قال الترمذي: حديث حسن صحيح.
وقال الدارقطني: هذا إسناد حسن صحيح، ورواته كلهم ثقات.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعي اختلط بآخره، ولكنه لم يختلط في هذا لوجود طريق آخر يقويه.
وهو ما رواه ابن أبي شيبة (3/ 72) عن عبد العزيز بن عبد الصمد العمّي، عن منصور، عن ربعي، أنّ عمار بن ياسر وناسًا معه أتوهم بمسلوخة مشوية في اليوم الذي يشك فيه أنه من رمضان أو ليس من رمضان، فاجتمعوا واعتزلهم رجل، فقال له عمار: تعالَ، فكل. قال: فإني صائم.
فقال عمار: إن كنت تؤمن بالله واليوم الآخر فتعال فكل. وهذا إسناد صحيح.
সিলাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা শাবান মাসের সন্দেহের দিনে আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। তখন একটি বকরির গোশত আনা হলো। উপস্থিত কিছু লোক (তা খাওয়া থেকে) সরে গেল। তখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "যে ব্যক্তি এই দিনে রোযা রাখল, সে আবূল কাসেম (মুহাম্মদ) (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবাধ্যতা করল।"
4222 - عن محمد بن كعب القرظيّ، قال: دخلت على أنس بن مالك عند العصر يوم يشكون فيه رمضان، وأنا أريد أن أسلِّم عليه، فدعا بطعام فأكل. فقلت: هذا الذي تصنع سنة؟ قال: نعم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (9039) من طريق محمد بن جعفر بن أبي كثير، عن زيد ابن أسلم، عن محمد بن المنكدر، عن محمد بن كعب القرظي، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 148): رجاله رجال الصحيح.
قلت: وهو كما قال.
ومحمد بن جعفر بن أبي كثير وإن كان تفرّد به عن زيد بن أسلم كما قال الطبرانيّ فهو ثقة ثبت لا يضره تفرّده.
وممن روي عنه النهي عن صوم يوم الشك: عمر وعلي وعبد الله بن مسعود وعبد الله بن عباس وابن عمر وحذيفة وأنس بن مالك وغيرهم.
ذكرهم ابن أبي شيبة (3/ 71 - 72)، والبيهقي في السنن الكبرى (4/ 208 - 209).
وبه قال سفيان الثوريّ، ومالك بن أنس، وعبد الله بن المبارك، والشافعي وأحمد وإسحاق. كره هؤلاء أن يصوم الرجل اليوم الذي يشك فيه. انظر: الترمذي (3/ 61).
وكانت عائشة وأسماء ابنتا أبي بكر تصومان يوم الشك، وكانت عائشة تقول: لأن أصوم يومًا
من شعبان أحبّ إلي من أن أفطر يومًا من رمضان.
وكان ابن عمر يقول:"إذا لم يُر هلالُ رمضان ليلة ثلاثين من شعبان، وكان صحوًا فلا صيام رمضان، وإن لم يكن صحوًا، وكان في السماء غيم أصبح الناس صائمين، وأجزأهم من رمضان إن ثبت بعد أن الشهر كان من تسع وعشرين".
وليس في كلامه ما يدلّ على صوم يوم الشّك. وقد ثبت عنه أنه قال:"لو صمتُ السنة كلَّها، لأفطرتُ اليوم الذي يُشكّ فيه".
رواه ابن أبي شيبة (3/ 71) عن وكيع، عن سفيان، عن عبد العزيز بن حكيم، قال: سمعت ابن عمر، فذكره.
وقال الجمهور: إن جاء الخبر بعد ذلك اليوم أو بعدما أمسوا أو أخطأوا في تقدير الهلال كان عليهم قضاء ذلك اليوم.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে কা'ব আল-কুরযী বলেন: আমি এমন এক দিনে আসরের সময় আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম যেদিন লোকেরা রমজানের বিষয়ে সন্দেহ করছিল। আমি তাঁকে সালাম দিতে চাইছিলাম, তখন তিনি খাবার আনতে বললেন এবং খেলেন। আমি বললাম: আপনি যা করলেন, এটা কি সুন্নাহ (নবীজীর তরিকা)? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
4223 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصوم يوم تصومون، والفطر يوم تفطرون، والأضحى يوم تضحّون".
حسن: رواه الترمذي (697) عن محمد بن إسماعيل، حدثنا إبراهيم بن المنذر، حدثنا إسحاق ابن جعفر بن محمد، حدثني عبد الله بن جعفر، عن عثمان بن محمد الأخنسي، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره. قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في عثمان بن محمد الأخنسي فوثّقه ابن معين، وقال النسائي: ليس بذاك القري. وقيده علي بن المديني بأنه روي عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أحاديث مناكير.
وذكره ابن حبان في"الثقات" والخلاصة فيه أنه حسن الحديث إذا لم يرو عن سعيد بن المسيب.
وللحديث طرق أخرى:
منها ما رواه أبو داود (2324) عن محمد بن عبيد، حدّثنا حماد في حديث أيوب، عن محمد ابن المنكدر، عن أبي هريرة، ذكر النبيّ صلى الله عليه وسلم فيه قال:"وفطركم يوم تفطرون، وأضحاكم يوم تضحون، كلّ عرفة موقف، وكلّ مني منحر، وكلّ فجاج مكة منحر، وكل جمع موقف".
فزاد فيه الجمل الأخيرة.
ومحمد بن المنكدر لم يلق أبا هريرة على الصحيح كما قال يحيى بن معين وأبو زرعة. وقال المنذري: روي عن أبي هريرة ولم يسمع منه.
ومنها ما رواه ابن ماجه (1660) عن محمد بن عمر المقريّ، قال: حدثنا إسحاق بن عيسي، قال: حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، قال:"الفطر يوم تفطرون، والأضحى يوم يضحون".
وفيه شيخ ابن ماجه محمد بن عمر المقريّ قال فيه الحافظ:"لا يعرف ولعله محمد بن أبي عمر الدوري". ثم هو خالف نجعل عن أيوب عن محمد بن سيرين، والصحيح أنه عن محمد بن المنكدر كما رواه الثقات.
ومنها جعله من مسند عائشة.
رواه الترمذي (802)، والدارقطني (2447) كلاهما من طريق يحيي بن اليمان، عن معمر، عن محمد بن المنكدر، عن عائشة -قال أبو هشام: أظنه رفعه- قال:"الفطر يوم يفطر الناس، والأضحى يوم يضحّي الناس".
قال الترمذي: سألت محمدًا قلت له: محمد بن المنكدر سمع من عائشة؟ قال: نعم، يقول في حديثه: سمعت عائشة.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب صحيح من هذا الوجه".
قلت: بل إسناده ضعيف من أجل الكلام في يحيي بن اليمان، ومخالفته للثقات الذين جعلوا هذا الحديث من مسند أبي هريرة.
إلا أنه اختلف في رفعه ووقفه كما ذكره الدّارقطني في كتابه"العلل" (1867).
والخلاصة أنّ الحديث حسن بالإسناد الذي ساقه الترمذي، والأسانيد الأخرى تقويه إلا جملًا يسيرة لم تثبت.
ومعنى الحديث: إنّ الصوم والفطر مع الجماعة وعُظْم الناس كما قال الترمذيّ.
فلا يجوز لأحد أن يشذّ عن الجماعة في بداية الصيام وعيدي الفطر والأضحى.
قال السندي:"والظاهر أن معناه أنّ هذه الأمور ليس للآحاد فيها دخل، وليس لهم التفرّد فيها، بل الأمر فيها إلى الإمام والجماعة، ويجب على الآحاد اتباعهم للإمام والجماعة، وعلى هذا فإذا رأى أحدٌ الهلالَ، وردّ الإمامُ شهادته ينبغي أن لا يثبت في حقّه شيء من هذه الأمور، ويجب عليه أن يتبع الجماعة في ذلك" اهـ.
وقيل: له أن يصوم أو يفطر إذا رأى الهلال إلا أنّه لا يعَيِّد إلّا مع النّاس.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: রোযা হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা রোযা রাখো; আর ঈদুল ফিতর হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা রোযা ভঙ্গ করো (ঈদ উদযাপন করো); এবং ঈদুল আযহা হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা কুরবানি করো।
4224 - عن أبي بكرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"شهران لا ينقصان، شهرا عيدٍ: رمضان، وذو الحجة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1912)، ومسلم في الصيام (1089) كلاهما من طريق معتمر بن سليمان، عن إسحاق بن سويد، وخالد الحذّاء، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، فذكره. واللفظ للبخاري.
قوله:"شهران لا ينقصان" قال أحمد معناه: شهرا عيدٍ لا ينقصان أي لا ينقصان معًا في سنة واحدة، شهر رمضان، وذو الحجة، إن نقص أحدهما تم الآخر". ذكره الترمذي عقب تخريج الحديث (692).
وقيل: معناه لا ينقصان في الفضيلة إن كانا تسعة وعشرين أو ثلاثين.
هذا القولان مشهوران عن السلف كما قال الحافظ في"الفتح" (4/
আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "দুটি মাস (তার পূর্ণতা থেকে) কম হয় না, আর তা হলো দুই ঈদের মাস: রমযান এবং যুলহাজ্জা।"
4225 - عن كريب، أنّ أمَّ الفضل بنت الحارث بعثته إلى معاوية بالشّام. قال: فقدمتُ الشام، فقضيتُ حاجتها، واستهل عليَّ رمضان وأنا بالشّام. فرأيت الهلال ليلة الجمعة، ثم قدمتُ المدينة في آخر الشّهر، فسألني عبد الله بن عباس رضي الله عنهما، ثم ذكر الهلال فقال: متى رأيتم الهلال؟ فقلت: رأيناه ليلة الجمعة. فقال: أنت رأيتَه؟ فقلتُ: نعم، ورآه الناس وصاموا وصام معاوية. فقال: لكنا رأيناه ليلة السبت، فلا نزال نصوم حتى نكمل ثلاثين أو نراه. فقلتُ: أو لا تكتفي برؤية معاوية وصيامه؟ فقال: لا، هكذا أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1087) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن محمد بن أبي حرملة، عن كريب، به، فذكره.
وقوله: هكذا أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم، أراد به قوله صلى الله عليه وسلم:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته" وقد يكون عنده حديث آخر أخصّ من هذا في مثل هذه الحادثة.
ولعلّ ابن عباس فهم من هذا النّص أنّ لكل بلد له رؤية؛ لاختلاف المطالع، وهو رأي لبعض أهل العلم.
وذهب آخرون إلى أنّ أهل بلد إذا رأوا الهلال لزم جميع البلاد الصوم، وهو مذهب أحمد والليث وبعض أصحاب الشافعي كما في المغني لابن قدامة.
وهو مذهب المالكية أيضًا.
وقد أفتت اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والدعوة والإفتاء فتوي (319):"يجب على من لم ير الهلال في مطلعهم في صحو أو غيم أن يتموا العدّة ثلاثين إن لم يره غيرهم في مطلع آخر.
فإن ثبت عندهم رؤية الهلال في غير مطلعهم لزمهم أن يتبعوا ما حكم به ولي الأمر العام المسلم
في بلادهم من الصوم أو الإفطار؛ لأن حكمه في مثل هذه المسألة يرفع الخلاف بين الفقهاء في اعتبار اختلاف المطالع وعدم اعتباره.
فإن لم يكن ولي أمرهم الحاكم في بلادهم مسلمًا عملوا بما يحكم به مجلس المركز الإسلامي في بلادهم من الصوم تبعًا لرؤية الهلال في غير مطلعهم أو الإفطار عملًا باعتبار اختلاف المطالع".
وقالت اللجة:"وربما استدل الفريقان بالنّص الواحد كاشتراكهما في الاستدلال بقوله: {فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ} [البقرة: 185]، وبقوله: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَهِلَّةِ قُلْ هِيَ مَوَاقِيتُ لِلنَّاسِ} [البقرة: 189]، وبقوله صلى الله عليه وسلم:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته" إلخ، وغير هذا من النّصوص؛ وذلك لاختلاف الفريقين في فهم النصوص وسلوك كل منهما طريقًا في الاستدلال بها، ولم يكن لهذا الاختلاف بينهم أثر سيء تخشى عاقبته لحسن قصدهم واحترام كل مجتهد منهم اجتهاد الآخر وحيث اختلف السابقون من أئمة الفقهاء في هذه المسألة وكان لكل أدلته".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, নিশ্চয় উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস তাঁকে (কুরাইবকে) সিরিয়ায় মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠান। কুরাইব বলেন, আমি সিরিয়ায় পৌঁছলাম এবং তাঁর প্রয়োজন পূরণ করলাম। আমি সিরিয়ায় অবস্থানকালে রমজান শুরু হয়ে গেল। আমি জুমুআর রাতে চাঁদ দেখলাম। এরপর মাসের শেষে আমি মদীনায় ফিরে এলাম। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন এবং চাঁদ প্রসঙ্গে আলোচনা করে বললেন: তোমরা কখন চাঁদ দেখেছিলে? আমি বললাম: আমরা জুমুআর রাতে চাঁদ দেখেছিলাম। তিনি বললেন: তুমি নিজে দেখেছো? আমি বললাম: হ্যাঁ, আর লোকেরা চাঁদ দেখেছে এবং রোজা রেখেছে, মুআবিয়াও রোজা রেখেছেন। তখন তিনি বললেন: কিন্তু আমরা তো শনিবার রাতে চাঁদ দেখেছি। সুতরাং আমরা ত্রিশ পূর্ণ না করা পর্যন্ত অথবা পুনরায় চাঁদ না দেখা পর্যন্ত রোজা রাখতেই থাকব। আমি বললাম: আপনি কি মুআবিয়ার দেখা ও রোজা রাখাকে যথেষ্ট মনে করেন না? তিনি বললেন: না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এভাবেই নির্দেশ দিয়েছেন।
4226 - عن عبد الله بن عمر، قال: تراءى الناس الهلال، فأخبرت رسول الله صلى الله عليه وسلم أني رأيته فصامه وأمر الناس بصيامه.
صحيح: رواه أبو داود (2342) عن محمود بن خالد وعبد الله بن عبد الرحمن السمرقنديّ -وأنا لحديثه أتقن-، قالا: حدّثنا مروان (وهو ابن محمد)، عن عبد الله بن وهب، عن يحيى بن عبد الله ابن سالم، عن أبي بكر بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر، قال: فذكره.
وإسناده صحيح. وعبد الله بن عبد الرحمن السّمرقنديّ هو الحافظ الدّارميّ صاحب السنن، والحديث في"سننه" (1733) ومن طريقه أخرجه أيضًا ابن حزم في"المحلي" (6/ 236) وقال:"هذا خبر صحيح".
وصحّحه أيضًا ابن حبان (3447). وقال الدارقطني (2146) تفرد به مروان بن محمد، عن ابن وهب، وهو ثقة.
قلت: وفات الدارقطني، فإنه رواه أيضًا هارون بن سعيد الأيلي وهو ثقة فاضل، عن عبد الله بن وهب، بإسناده مثله. ومن طريقه رواه الحاكم (1/ 423) وعنه البيهقيّ (4/ 212).
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা চাঁদ (অর্থাৎ রমজানের নতুন চাঁদ) দেখার চেষ্টা করল। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দিলাম যে আমি তা দেখেছি। অতঃপর তিনি সে দিন রোযা রাখলেন এবং লোকদেরকেও রোযা রাখার নির্দেশ দিলেন।
4227 - عن ابن عباس، قال: جاء أعرابيٌّ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني رأيت الهلال - يعني هلال رمضان- فقال:"أتشهد أن لا إله إلا الله؟" قال: نعم، قال:"أتشهد أنّ محمدًا رسول الله؟" قال: نعم. قال:"يا بلال، أذّن في الناس أن يصوموا غدًا".
حسن: رواه أبو داود (2333)، والترمذي (691) كلاهما من حديث الوليد بن أبي ثور، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وكذلك رواه زائدة بن قدامة، عن سماك، بإسناده مثله.
ومن طريقه رواه الترمذي (691)، وابن ماجه (1652)، والنسائي (3113). وصحّحه ابن خزيمة (1923)، وابن حبان (3446)، والحاكم (1/ 434) كلهم من هذا الطّريق موصولًا.
وقال الحاكم:"وقد احتجّ البخاريّ بأحاديث عكرمة، واحتج مسلمٌ بأحاديث سماك بن حرب، وحماد بن سلمة، وهذا الحديث صحيح ولم يخرجاه".
وكذلك رواه حماد بن سلمة، عن سماك بإسناده، مثله.
ومن طريقه رواه الحاكم (1/ 424) وعنه البيهقيّ.
وكذلك رواه حازم بن إبراهيم، عن سماك بإسناده مثله.
ومن طريقه رواه الطبراني في الكبير (11/ 235).
وهؤلاء أصحاب سماك رووه عنه موصولًا - بذكر ابن عباس.
ورواه سفيان بن عيينة، عنه، ولكن اختلف أصحابه عليه.
فرواه الفضل بن موسى السينانيّ، عن سفيان، عنه موصولًا.
ومن طريقه رواه النسائي (2112)، والبيهقي (4/ 212) وقال: وكذلك روي عن أبي عاصم، عن الثوريّ موصولًا. ورواه غيرهما عن الثوريّ مرسلًا.
قلت: ومن هؤلاء أبو داود الطيالسي، وابن المبارك كلاهما عن سفيان، عن سماك، مرسلًا.
ولم يذكرا ابن عباس.
ومن طريقهما رواه أيضًا النسائي (2114، 2116).
والحكم لمن وصل لأنه ليس لابن عباس أن يقول لبلال: أذّنْ في الناس …
وسماك بن حرب، وإنْ كان اضطربَ في رواية عكرمة إلا وله ما يشهد له بأنه لم يضطرب في هذا.
قال الترمذي:"والعمل على هذا الحديث عند أكثر أهل العلم. قالوا: تقبل شهادة رجل واحد في الصيام. وبه يقول ابن المبارك والشافعي وأحمد وأهل الكوفة. قال إسحاق: لا يُصام إلّا بشهادة رجلين. ولم يختلف أهل العلم في الإفطار أنه لا يقبل فيه إلّا شهادة رجلين" انتهي.
انظر للمزيد"المنة الكبري" (3/ 292 - 295).
وأزيد هنا أن آخر قولي الشافعي أنه لا بد من عدلين ففي الأم. قال الربيع: قال الشافعي بعد:"لا يجوز على رمضان إلّا شاهدان".
وأمّا الحنفية فوافقوا الجمهور على الاكتفاء في ثبوت هلال رمضان بعدل واحد، لكن خصُّوا ذلك بما إذا كان في السماء علة من غيم أو غبار ونحو ذلك، وإلا لم يقبل إلا من جمع كثير يقع
العلم بخبرهم. انظر: طرح التثريب (4/
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, আমি চাঁদ দেখেছি—অর্থাৎ রমাদানের চাঁদ। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই?’ সে বলল, হ্যাঁ। তিনি আবার জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল?’ সে বলল, হ্যাঁ। তিনি তখন বললেন: ‘হে বিলাল, লোকদের মাঝে ঘোষণা করে দাও যেন তারা আগামীকাল রোযা রাখে।’
