হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4228)


4228 - عن حسين بن الحارث الجدليّ -من جديلة قيس-، أنّ أمير مكة خطب، ثم قال: عهد إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن ننسُك للرؤية، فإن لم نره وشهد شاهدا عدل نسكنا بشهادتهما، فسألت الحسين بن الحارث: مَنْ أميرُ مكة؟ قال: لا أدري، ثم لقيني بعد قال: هو الحارث بن حاطب أخو محمد بن حاطب. ثم قال الأمير: إنّ فيكم من هو أعلم بالله ورسوله مني. وشهد هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم وأومأ بيده إلى رجل - قال الحسين: فقلت لشيخ إلى جنبي: من هذا الذي أومأ إليه الأمير؟ قال: هذا عبد الله بن عمر، وصدق. كان أعلم بالله منه. فقال: بذلك أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (2338) عن محمد بن عبد الرحيم أبي يحيى البزار، ثنا سعيد بن سليمان، ثنا عبّاد، عن أبي مالك الأشجعيّ، ثنا حسين بن الحارث الجدلي، فذكره.

ومن طريقه رواه البيهقيّ (4/ 248).

ورواه الدارقطنيّ (2191، 2192) مختصرًا ومطولًا من وجهين آخرين، عن سعيد بن سليمان، ومن أحد هذين الوجهين أخرجه البيهقيّ.

قال الدارقطني:"هذا إسناد متصل صحيح".

قلت: وهو كما قال، غير أن الحسين بن الحارث الجدلي لم يبلغ درجة الثقات الضابطين، كما أنه ليس بمجهول كما زعم ابن حزم في"المحلى" (6/ 238) لأنه روى عنه عدد، وقال ابن المديني: كان معروفًا، وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 155).

والخلاصة فيه كما قال الحافظ ابن حجر:"صدوق".

ورواه أحمد (18895) عن حسين بن الحارث الجدلي، قال: خطب عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب في اليوم الذي يشك فيه، فقال: ألا إني قد جالست أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم وسألتهم، ألا وإنهم حدّثوني أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته، وانسكوا لها، فإن غُمّ عليكم فأتمّوا ثلاثين. وإن شهد شاهدان مسلمان فصوموا وأفطروا" إلا أنه ضعيف.

رواه عن يحيى بن زكريا، قال: أخبرنا حجاج، عن حسين بن الحارث الجدلي، فذكره.

ورواه الدارقطني (2193) من حديث يزيد بن هارون، حدثنا الحجاج بإسناده.

والحجاج هو ابن أرطاة ضعيف.

ورواه النسائي (2116) من طريق يحيي بن زكريا بن أبي زائدة، عن حسين بن الحارث الجدلي ولم يذكر بينهما"الحجاج".
قال ابن عبد الهادي في"تنقيح التحقيق" (3/ 216):"وكأنه وهم".

وقال المزي:"والصواب ذكره".

قلت: قد يكون الوهم في هذا الحديث من الحجاج، فإن الصحيح أن الحسين بن الحارث يروي عن أمير مكة، وجعله الحجاج يرويه عن عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب أو صحّ ذلك من وجهين، ولكن النفس لا تطمئن من الحجاج.

وفي الباب ما جاء عن شقيق قال: جاءنا كتاب عمر ونحن بخانقين، قال في كتابه:"إنّ الأهلّة بعضُها أكبر من بعض، فإذا رأيتم الهلال نهارًا فلا تفطروا حتى يشهد شاهدان".

رواه الدارقطني (2196) عن أبي بكر النيسابوريّ، حدّثنا علي بن حرب، وسعدان بن نصر، قالا: حدّثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن شقيق، فذكره.

ورواه شعبة، عن الأعمش، فقال:"إذا رأيتم الهلال من أول النهار فلا تفطروا حتى يشهد شاهدان أنهما رأياه بالأمس".

قال الدارقطني: وهذا أصح إسنادًا من حديث ابن أبي ليلى، وقد تابع الأعمش منصور وكتبناه بعد هذا. ثم أخرج حديث منصور من طرق عنه.

ورواه البيهقي (4/ 248) من طريق شعبة، عن الأعمش، به، مثله.

وقال: هذا أثر صحيح عن عمر رضي الله عنه.

وأثر ابن أبي ليلى الذي أشار إليه الدارقطني رواه هو (2198) وعنه البيهقي (4/ 249) عن أبي بكر النيسابوري، حدّثنا محمد بن علي الوراق، حدثنا عبيدالله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن عبد الأعلى، عن ابن أبي ليلى، قال: كنت عند عمر، فأتاه راكب فزعم أنه رأى الهلال، فأمر الناس أن يفطروا.

قال محمد بن علي: قلت لأبي نعيم: سمع ابن أبي ليلى من عمر؟ قال: لا أدري. قال محمد ابن علي: قلت ليحيى بن معين: سمع ابن أبي ليلى من عمر؟ فلم يثبت ذلك.

وعبد الأعلى هو ابن عامر الثعلبي غيره أثبت منه.

وحديث أبي وائل أصح إسنادًا عن عمر منه. رواه الأعمش ومنصور عن أبي وائل. انتهى.

وزاد البيهقي عن العباس بن محمد الدوريّ، قال: سئل يحيى بن معين عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمر، فقال: لم يره. قلت: له الحديث الذي يروي كنا مع عمر نتراءى الهلال؟ فقال: ليس بشيء. انتهى.

ورواه أحمد (307)، والبيهقي (4/ 248) عن يزيد بن هارون، أخبرنا ورقاء بن عمر، عن عبد الأعلى الثعلبي، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال:"كنت مع البراء بن عازب وعمر بن الخطاب في البقيع ينظر إلى الهلال، فأقبل راكب، فتلقاه عمر، فقال: من أين جئتَ؟ فقال: من
المغرب. قال: أهللت؟ قال: نعم. قال عمر: الله أكبر إنما يكفي المسلمين الرجل. ثم قام عمر فتوضأ، فمسح على خفيه، ثم صلي المغرب، ثم قال: هكذا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم صنع". وإسناده ضعيف من أجل عبد الأعلى وعبد الرحمن بن أبي ليلى كما سبق.



فقه الباب:

استدل بأحاديث هذا الباب جمهور أهل العلم على أنّ هلال شوال لا يثبت إلّا بشهادة رجلين عدلين. قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (2/ 49 - 50): وكان من هديه صلى الله عليه وسلم أمر الناس بالصوم بشهادة الرجل الواحد المسلم، وخروجهم منه بشهادة اثنين".

وقال النووي في"المجموع" (6/ 281):"هذا مذهبنا، وبه قال العلماء كافّة إلا أبا ثور.

فحكى أصحابنا عنه أنه يقبل في شوال عدل واحد كهلال رمضان. وحكاه ابن المنذر عن أبي ثور وطائفة من أهل الحديث. قال إمام الحرمين: قال صاحب التقريب: لو قلت بما قاله أبو ثور لم أكن مبعدًا" انتهي.




হুসাইন ইবনুল হারিস আল-জাদালি—যিনি কায়স গোত্রের জাদিলা শাখার লোক—থেকে বর্ণিত, মক্কার আমীর ভাষণ দিলেন, অতঃপর বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমরা চাঁদ দেখে ইবাদত (রোজা, ঈদ ইত্যাদি) পালন করব। যদি আমরা তা দেখতে না পাই এবং দুজন নির্ভরযোগ্য সাক্ষী সাক্ষ্য দেয়, তবে আমরা তাদের সাক্ষ্য অনুযায়ী ইবাদত পালন করব।

(বর্ণনাকারী বলেন) আমি হুসাইন ইবনুল হারিসকে জিজ্ঞেস করলাম: মক্কার আমীর কে ছিলেন? তিনি বললেন: আমি জানি না। অতঃপর তিনি পরে আমার সাথে সাক্ষাৎ করে বললেন: তিনি হলেন হারিস ইবনু হাতিব, যিনি মুহাম্মাদ ইবনু হাতিবের ভাই।

অতঃপর আমীর বললেন: তোমাদের মাঝে এমন লোক আছেন যিনি আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে আমার চেয়ে বেশি জানেন। এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পক্ষ থেকে এই বিষয়ে (অর্থাৎ চান্দ্র মাসের হুকুমের বিষয়ে) সাক্ষ্য দিলেন—এই বলে তিনি (আমীর) এক ব্যক্তির দিকে হাত দ্বারা ইশারা করলেন।

হুসাইন (বলেন): আমি আমার পাশের এক বয়স্ক ব্যক্তিকে জিজ্ঞেস করলাম: আমীর কার দিকে ইশারা করলেন? তিনি বললেন: ইনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি (আমীর) সত্য বলেছেন। তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু উমর) আমীরের চেয়ে আল্লাহ সম্পর্কে অধিক জ্ঞানী ছিলেন। অতঃপর (আবদুল্লাহ ইবনু উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের এই রূপই আদেশ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4229)


4229 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: اختلف الناس في آخر يوم من رمضان. فقدم أعرابيان فشهدا عند النبيّ صلى الله عليه وسلم بالله لأهلا الهلال أمس عشية، فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس أن يفطروا.

زاد خلف في حديثه: وأن يغدوا إلى مصلاهم.

صحيح: رواه أبو داود (2339) عن مسدّد، وخلف بن هشام المقرئ، قالا: حدّثنا أبو عوانة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

ومن طريقه رواه الدارقطني (2202)، والبيهقي (4/ 250) وقال الدارقطني:"هذا إسناد حسن ثابت".

وللدارقطني طريق آخر عن عبيدة بن حميد، عن منصور، به.

وفيه:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أصبح صائمًا لتمام الثلاثين من رمضان فجاء أعرابيان، فشهدا أن لا إله إلا الله، وأنهما أهلّاه بالأمس، فأمرهم فأفطروا". وقال:"هذا صحيح".

ورواه الإمام أحمد (18824)، والبيهقي (4/ 248) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن منصور، به، مثله.

ولكن رواه الحاكم (1/ 297) وعنه البيهقي (4/ 248) من طريق إسحاق بن إبراهيم الطالقاني، ثنا سفيان بن عيينة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن أبي مسعود، قال (فذكر الحديث).

قال البيهقي: وكذلك رواه إبراهيم بن بشار عن سفيان.

وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين".
وهذا وهمٌ منه فإن إسحاق بن إسماعيل الطالقاني لم يخرج له الشيخان، وإنما أخرج له أبو داود وحده غير أنه ثقة، وتسمية الصحابي أو عدم تسميته لا يؤثّر في صحة الحديث.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষ রমযানের শেষ দিন নিয়ে দ্বিধায় পড়ে গেল। তখন দুজন বেদুঈন (আরব) আসল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আল্লাহর নামে সাক্ষ্য দিল যে, তারা গত সন্ধ্যায় চাঁদ দেখেছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদেরকে রোযা ভাঙার (ইফতার করার) নির্দেশ দিলেন।

খলফ তাঁর হাদীসে যোগ করেছেন: এবং তারা যেন পরদিন সকালে তাদের ঈদগাহের দিকে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (4230)


4230 - عن أبي عمير بن أنس، عن عمومة له من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم: أنّ ركْبًا جاءوا إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم يشهدون أنّهم رأوا الهلال بالأمس، فأمرهم أن يفطروا، وإذا أصبحوا يغدوا إلى مصلاهم.

حسن: رواه أبو داود (1157)، والنسائي (1556)، والدارقطني (2003) كلهم من حديث شعبة، عن جعفر بن إياس، عن أبي عمير بن أنس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي عمير بن أنس بن مالك، كان أكبر ولد أنس بن مالك، واسمه عبد الله، قال ابن سعد:"كان ثقة قليل الحديث". وذكره ابن حبان في"الثقات".

فلا يقبل فيه قول ابن عبد البر بأنه"مجهول".

وقد صحّح هذا الحديث أبو بكر بن المنذر وغيره.

وقال البيهقيّ:"إسناده حسن، وأبو عمر رواه عن عمومة له من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم كلّهم ثقات سواء سمّوا أو لم يسمّوا".

وأما ما رواه سعيد بن عامر، عن شعبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك: أنّ عمومة له شهدوا عند النبيّ صلى الله عليه وسلم على رؤية الهلال … فأخطأ فيه سعيد بن عامر.

ومن طريقه رواه ابن حبان في"صحيحه" (3456).

قال البيهقي:"تفرد به سعيد بن عامر، عن شعبة. وغلط فيه، وإنما رواه شعبة عن أبي بشر".

وهو كما قال. وقد تابعه على ذلك هشيم بن بشير عند ابن ماجه (1653)، وأبو عوانة عند البيهقي، كلاهما عن أبي بشر بإسناده، مثله.




আবু উমাইর ইবনু আনাস তাঁর এমন কতিপয় চাচা থেকে বর্ণনা করেন, যাঁরা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী ছিলেন, যে একদল আরোহী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে সাক্ষ্য দিলেন যে, তাঁরা গতকাল চাঁদ দেখেছেন। তখন তিনি তাদেরকে ইফতার করার (রোযা ভেঙ্গে ফেলার) নির্দেশ দিলেন এবং যখন তাঁরা সকালে উঠবে, তখন যেন তারা তাদের ঈদগাহের দিকে গমন করে।









আল-জামি` আল-কামিল (4231)


4231 - عن حفصة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من لم يبيّت الصّيام من اللّيل فلا صيام له".

صحيح: رواه أبو داود (2454)، وابن خزيمة (1933)، والبيهقي (4/ 202) كلّهم من طرق عن عبد الله بن وهب، حدّثني ابن لهيعة، ويحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، عن حفصة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكرته.

وهذا إسناد صحيح. ابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أنه من رواية أحد العبادلة عنه، كما أنه توبع.

ورواه النسائي (2332)، والترمذي (730)، والبيهقي من طرق عن يحيى بن أيوب، عن عبد الله ابن أبي بكر، بإسناده، مثله.

إلّا أن الترمذي أعلّه فقال:"حديث حفصة حديث لا نعرفه مرفوعًا إلّا من هذا الوجه"."وقد
رُوي عن نافع، عن ابن عمر قوله، وهو أصح"."وهكذا أيضًا روي هذا الحديث عن الزهري موقوفًا، ولا نعلم أحدًا رفعه إلّا يحيى بن أيوب" انتهي.

ويحيى بن أيوب هو الغافقي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا توبع، وقد رأيت في الإسناد تابعه ابن لهيعة، وروى عنه عبد الله بن وهب وهو أحد العبادلة الذين رووا عنه قبل اختلاطه، وحديثه صحيح، فكيف وقد تابعه يحيى بن أيوب.

فقول الترمذي:"لا نعرفه مرفوعًا إلّا من هذا الوجه" وهو بحسب علمه، وفوق كلّ ذي علم عليم.

وقال أبو داود:"رواه الليث وإسحاق بن حازم أيضًا جميعًا عن عبد الله بن أبي بكر، مثله".

ومعنى هذا أنّ أربعة وهم ابن لهيعة، ويحيى بن أيوب، والليث وإسحاق بن حازم اتفقوا على رفع هذا الحديث.

ويبدو أنه وقع وهم من أبي داود، فإنّ رواية الليث ليست عن عبد الله بن أبي بكر، وإنما هي عن يحيى بن أيوب، كما رواه النسائيّ (2331)، والدارمي (1740) كلاهما عن سعيد بن شرحبيل، حدّثنا الليث، عن يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر، عن سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر، عن حفصة، فذكرته. هذه رواية النسائي.

فيكون الليث بن سعد متابعًا لعبد الله بن وهب.

وأمّا رواية إسحاق بن حازم فرواها ابن أبي شية (3/ 31 - 32) عن خالد بن مخلد، عنه، قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن سالم، عن ابن عمر، عن حفصة، فذكرته.

وعنه رواه ابن ماجه (1700) إلّا أنّ خالد بن مخلد وهو القطوانيّ مختلف فيه إلا أنه لا بأس به في المتابعات.

إلا أنّ الليث بن سعد وإسحاق بن حازم أسقطا ابن شهاب، وكلاهما صحيح فإن عبد الله بن أبي بكر أدرك سالمًا، فإنه تارة روى هكذا، وأخرى هكذا وكلّه صحيح لأنه من الثقات الضابطين.

وقد اختلف على الزهريّ فجاء عنه مرفوعًا كما سبق، وجاء عنه موقوفًا كما قال أبو داود عقب الكلام السابق:"وأوقفه على حفصة: معمر، والزبيدي، وابن عيينة، ويونس الأيليّ كلهم عن الزهريّ".

قلت: حديث ابن عيينة ويونس ومعمر أخرجه النسائي (4/ 197) وزاد ممن رواه عن الزهري موقوفًا:"عبيدالله".

ولكن الحكم لمن زاد، فإن الزهري كثير الرواية فلا يعد أن يروي هؤلاء عنه مرفوعًا، وهؤلاء

عنه موقوفًا.

وقد وجدنا أيضًا ابن جريج ممن روى عن الزهري مرفوعًا. رواه النسائي (2334) من طريق

عبد الرزاق عنه، وابن جريج توبع.
وخلاصة القول: حديث حفصة صحيح مرفوعًا وموقوفًا.

والموقوف هو الأصح، والمرفوع دونه في الصحة. وفيه زيادة علم وهي مقبولة عند جمهور العلماء. ويقوي هذه الزيادة بأن هذا الحكم لا يصدر إلا عن الشارع لما يترتب عليه الوجوب وعدمه، وهي قرينة قوية لرفع الحديث، وإن كان رجاله دون رجال الوقف.

وله شاهد ضعيف عن عائشة رواه الدارقطني (2/ 171 - 172)، والبيهقي (4/ 203) ولكن فيه عبد الله بن عباد البصريّ ثم المصريّ ضعيف جدًّا.

ومع ذلك قال الدارقطني:"تفرّد به عبد الله بن عباد، عن المفضل بهذا الإسناد وكلّهم ثقات".

ونقله عنه البيهقي وأقرّه. وفيه نظر لما قال ابن حبان في المجروحين (574) في ترجمة عبد الله بن عباد البصري أنه شيخ سكن مصر يقلب الأخبار، روي عن المفضل بن فضالة، عن يحيى بن أيوب، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.

وقال:"وهذا مقلوب، إنما هو عند يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن حفصة. فيما يشبه هذا، روى عنه روح بن الفرج أبو الزنباع نسخة موضوعة" انتهى.

فلا يستشهد بهذا الشاهد.

وله شاهد آخر عن ميمونة بنت سعد، تقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أجمع الصوم من الليل فليصم، ومن أصبح ولم يُجمعه فلا يصم".

رواه الدارقطني (1/ 173) وفيه الواقدي وهو متهم.



فقه الحديث:

ظاهر حديث الباب يفيد بأن من لم ينو الصيام من الليل فلا صيام له، وبه قال أحمد ومالك والشافعي؛ لأنّ الصوم عبادة يفتقر إلى النية كالصلاة وبقية العبادات.

هذا في صيام رمضان أو في قضاء رمضان، أو في صيام نذر، وتجزئه نية واحدة لجميع شهر رمضان عند الإمام أحمد. وأمّا صيام التطوع فمباح له أن ينويه بعد ما يصبح. انظر للمزيد:"المنة الكبري" (3/ 278).




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি রাত থেকে রোযার নিয়ত করে না, তার রোযা (সহীহ) হয় না।”









আল-জামি` আল-কামিল (4232)


4232 - عن أنس بن مالك، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"تسحَّروا، فإن في السَّحور بركة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1923) من طريق شعبة، ومسلم في الصيام (1095) من طريق ابن عليّة -كلاهما عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس، به.




আনাস ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহ্‌রী গ্রহণ করো, কারণ সাহ্‌রীর মধ্যে বরকত (কল্যাণ) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4233)


4233 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله:"تسحروا، فإن في السحور بركة".

حسن: رواه الإمام أحمد (8898) عن عبد الرزاق وهو في مصنفه (7601) قال: أخبرنا
سفيان، عن ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن أبي هريرة، فذكره.

وابن أبي ليلي ضعيف لسوء حفظه، ومن طريقه رواه النسائي (2150) عن يحيى بن آدم، عن سفيان، بإسناده مثله.

ولكنه لم ينفرد به بل تابعه عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء بن أبي رباح.

ومن طريقه رواه النسائّي (2147) ولكن اختلف على عبد الملك بن أبي سليمان، فرواه عنه منصور بن أبي الأسود عنه مرفوعًا كما مضى. ورواه يزيد عنه موقوفًا على أبي هريرة.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا النسائيّ (2148) وأشار إلى رفع ابن أبي ليلى، وزيادة الثقة مقبولة عند المحدثين.

وله إسناد آخر يقوي الرفع وهو ما رواه النسائيّ (2151) من طريق محمد بن فضيل، حدّثنا يحيى بن سعيد، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

ولكن قال النسائيّ:"يحيي بن سعيد هذا إسناده حسن، وهو منكر، وأخاف أن يكون الغلط من محمد ابن فضيل" انتهي.

قلت: لا وجه للحكم بالنكارة بعد تحسين إسناده، فإن محمد بن فضيل وهو ابن غزوان ثقة، وثقه كبار الأئمة مثل ابن معين، وابن المديني، والدارقطني، وابن سعد، وغيرهم. وروى له الشيخان.

وما سبق يقوي على رفعه، ولم يأت في حديثه ما بنكر عليه، فالله أعلم ما قصد به النّسائيّ من قوله هذا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সেহরি খাও, কারণ সেহরিতে বরকত রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4234)


4234 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا فإنّ في السحور بركة".

حسن: رواه النسائي (2144) عن محمد بن بشار، قال: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم، عن زرّ، عن عبد الله، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه أيضّا ابن خزيمة (1936) وقال: ثنا أبو يحيى محمد بن عبد الرحيم البزار، ثنا أحمد بن يونس، نا أبو بكر بن عياش، بهذا الإسناد مثله سواء مرفوعًا. وفيه ردّ لمن رواه موقوفًا.

وهو عبيدالله بن سعيد، عن عبد الرحمن بن مهدي، بإسناده.

وعنه رواه النسائي (2145) ولم يرجع النسائي أحدهما على الآخر.

ومن رفعه عنده زيادة في العلم وهي مقبولة.

وأبو بكر بن عياش ثقة فاضل إلا أنه لما كبر ساء حفظه، وعبد الرحمن بن مهدي روى عنه بوجهين مرفوعًا وموقوفًا. وقد تابعه على رفعه أحمد بن يونس، وله ما يشهد كما مضى.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহরী খাও, কারণ সাহরীতে বরকত রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4235)


4235 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: دخلت على النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يتسحّر
فقال:"إنّها بركة أعطاكم الله إياها فلا تَدَعُوه".

صحيح: رواه النسائيّ (2162) عن إسحاق بن منصور، قال: أنبأنا عبد الرحمن، قال: حدّثنا شعبة، عن عبد الحميد صاحب الزيادي، قال: سمعت عبد الله بن الحارث يحدّث عن رجل، فذكره.

ورواه الإمام أحمد من وجهين آخرين - عن محمد بن جعفر (23113)، وعن روح (23142) كلاهما عن شعبة، بإسناده، مثله.

وإسناده صحيح، وعبد الرحمن هو ابن المهدي. وعبد الله بن الحارث هو الأنصاري البصري أبو الوليد نسيب بن سيرين من رجال الشيخين.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে একজন ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম যখন তিনি সাহরী খাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় এটি এমন বরকত, যা আল্লাহ তোমাদের দিয়েছেন। সুতরাং তোমরা তা পরিত্যাগ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4236)


4236 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله وملائكته يصلون على المتسحّرين".

حسن: رواه ابن حبان (3467) عن أحمد بن الحسن بن أبي الصغير، حدّثنا إبراهيم بن منقذ، حدّثنا إدريس بن يحيي، عن عبد الله بن عياش بن عباس، عن عبد الله بن سليمان الطويل، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل رجال لا يرتقون إلى درجة الثقة منهم إدريس بن يحيى وهو الخولاني المصريّ، وشيخه عبد الله بن عياش بن عباس، وشيخه عبد الله بن سليمان الطويل. انظر: للمزيد"الإيمان بالملائكة".




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ ও তাঁর ফেরেশতাগণ সাহরী গ্রহণকারীদের উপর সালাত (রহমত) বর্ষণ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4237)


4237 - عن عبد الله بن عمرو، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تسحروا ولو بجرعة من ماء".

حسن: رواه ابن حبان في"صحيحه" (3476) عن أحمد بن يحيي بن زهير بتُستر، قال: حدّثنا إبراهيم بن راشد الآدميّ، قال: حدّثنا محمد بن بلال، قال: حدثنا عمران القطان، عن قتادة، عن عقبة بن وسّاج، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن راشد، وعمران القطان فهما حسنا الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহরী খাও, যদিও তা এক ঢোঁক পানি দিয়েই হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (4238)


4238 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"السحور أكله بركة، فلا تدَعوه، ولو أن يجرع أحدكم جرعة من ماء، فإنّ الله عز وجل وملائكته يصلون على المتسحّرين".

حسن: رواه الإمام أحمد (11086) عن إسماعيل (هو ابن علية)، عن هشام الدّستوائيّ، قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي رفاعة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

وأبو رفاعة هذا يقال له أيضًا أبو مطيع، واسمه رفاعة بن عوف ذكره البخاري في الكني (9/ 31)، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 371) ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا.

ولم يذكره ابن حبان في"ثقاته" مع أنه على شرطه.

وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول" وهو كذلك؛ لأنه توبع، تابعه عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر مثله.
رواه الإمام أحمد (11396) عن إسحاق بن عيسي، حدّثنا عبد الرحمن بن زيد، عن أبيه، عن عطاء بن يسار، بإسناده.

وعبد الرحمن بن زيد ضعيف إلا أنه توبع أيضًا في الإسناد الأوّل.

وله إسناد ثالث، رواه أيضًا الإمام أحمد (11281) عن مطلب، حدّثنا ابن أبي ليلى، عن عطية، عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا، فإنّ في السّحور بركة".

وفيه ابن أبي ليلى، وشيخه عطية ضعيفان. وبمجموع هذه الأسانيد يحسن هذا الحديث.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس بن مالك، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا ولو بجرعة من ماء".

رواه أبو يعلي (3340)، والعقيلي (3/ 50) كلاهما من حديث محمد بن أبي بكر المقدمي، حدّثنا عبد الواحد بن ثابت الباهليّ، قال: حدّثنا ثابت، عن أنس، فذكره.

وعبد الواحد بن ثابت الباهلي هذا قال فيه البخاري:"منكر الحديث" انظر:"الميزان" (2/ 671).

وقال العقيلي: لا يتابع على حديثه. وذكر له حديثًا آخر وهو قوله:"كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يُفطر على تمرات أو شيء لم يمسه النار".

وقال:"وروى جماعة من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم عنه بأسانيد جياد أنه قال:"تسحّروا فإنّ في السّحور بركة" وفي السحور أسانيد ثابتة.

وأمّا اللّفظتان اللتان جاء بهما هذا الشيخ:"ولو بجرعة من ماء""أو شيء لم يمسه النار" فليس يتابع عليهما ثقة" انتهى كلام العقيلي.

كذا قال! مع أنّ اللفظ الأول جاء بأسانيد حسان كما سبق.

وفي الباب عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أراد أن يصوم فليتسحّر بشيء".

رواه أحمد (14950)، وأبو يعلى (1930) كلاهما من حديث أبي أحمد الزبيري، حدّثنا شريك، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.

وشريك هو ابن عبد الله النخعي مختلف فيه، فإذا توبع يحسّن، وإلا فلا؛ لأنه تغيّر حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাহরীর খাবার বরকতময়। সুতরাং তোমরা তা ত্যাগ করো না, যদি তোমাদের কেউ এক ঢোক পানিও পান করে। কেননা মহান আল্লাহ এবং তাঁর ফেরেশতাগণ সাহরী গ্রহণকারীদের প্রতি রহমত বর্ষণ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4239)


4239 - عن عمرو بن العاص، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"فصل ما بين صيامنا وصيام أهل الكتاب، أكلةُ السَّحر".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1096) من طريق موسى بن عُلَي، عن أبيه، عن أبي قيس مولي عمرو بن العاص، عن عمرو بن العاص، فذكره.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের সিয়াম এবং আহলে কিতাবদের সিয়ামের মধ্যে পার্থক্যকারী হলো সাহরীর খাবার।"









আল-জামি` আল-কামিল (4240)


4240 - عن ابن عباس، قال: أرسل إلىَّ عمر بن الخطاب يدعوني إلى السّحور. وقال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سماه الغداء المبارك.

حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (505) عن أحمد بن القاسم بن مساور الجوهريّ، قال: حدّثنا محمد بن إبراهيم أخو أبي معمر، قال: حدّثنا سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن ميسرة، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه الخطيب في"تاريخه" (1/ 387) في ترجمة محمد بن إبراهيم بن معمر الهذلي أبو بكر، ونقل عن موسى بن هارون: أنه صدوق لا بأس به.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 151) ونقل عن موسى بن هارون الحمال، كما ذكره الخطيب. وقال: سئل ابن معين عن أبي معمر فقال: مثل أبي معمر لا يسأل عنه، وهو وأخوه من أهل الحديث. وبقية رجاله ثقات.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট লোক পাঠালেন আমাকে সাহরির জন্য ডাকার জন্য। আর তিনি (উমার) বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহরিকে বরকতময় প্রাতরাশ (আল-গাদাউল মুবারক) নামে অভিহিত করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4241)


4241 - عن المقدام بن معديكرب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عليكم بغداء السحور، فإنه هو الغداء المبارك".

حسن: رواه النسائيّ (2164) عن سويد بن نصر، قال: أنبأنا عبد الله (هو ابن المبارك)، عن بقية
ابن الوليد، قال: أخبرني بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معديكرب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد لأنه يدلس تدليس التسوية، إلّا أنه صرّح بالتحديث ويكفي عند الجمهور تصريحه في الطبقة الأولى.

ورواية بقية عن بحير بن سعد صحيحة كما قال ابن عبد الهادي.

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (17192).

ثم رواه النسائيّ (2065) من وجه آخر عن سفيان، وعبد الرزاق (7600) كلاهما عن ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل:"هلمّ إلى الغداء المبارك" يعني السّحور.

وهذا مرسل صحيح، وهو يقوي ما سبقه لاختلاف مخرجهما.

وفي الباب ما روي عن العرباض بن سارية، قال: دعاني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى السحور في رمضان فقال:"هلمّ إلى الغداء المبارك".

رواه أبو داود (2344)، والنسائي (2163)، والإمام أحمد (17143) كلهم من حديث يونس ابن سيف، عن الحارث بن زياد، عن أبي رُهم، عن العرباض بن سارية، فذكره.

والحارث بن زياد لم يرو عنه غير يونس بن سيف، ولم يوثقه غير ابن حبان، وأخرج حديثه في صحيحه (3465). وكذلك شيخه ابن خزيمة (1938).

والحارث بن زياد هذا غلط فيه أبو نعيم فذكره في الصحابة (2119)، وذلك تبعًا للحسن بن عرفة في جزئه (36). قال فيه: صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم. وروى عنه البغوي في"معجم الصحابة" (2/ 78) وقال:"لا أعلم لحارث بن زياد غير هذا الحديث" وهو يقصد به حديث معاوية بن سفيان:"اللهم علِّم معاوية الكتاب والحساب، وقه العذاب".

وقال الحافظ ابن عبد البر في"الاستيعاب": الحارث بن زياد هذا مجهول لا يعرف بغير هذا الحديث".

وقال المنذري في"مختصر أبي داود": قال أبو عمر النمري:"ضعيف مجهول، يروي عن أبي رهم السمعي، حديثه منكر". فزاد فيه كلمة:"ضعيف"، و"حديثه منكر".

وجاء الذهبي فقال في"الميزان":"مجهول".

وتعقبه الحافظ في التهذيب فقال:"وشرطه أن لا يطلق هذه اللفظة إلا إذا كان أبو حاتم الرّازيّ قالها، والذي قال فيه أبو حاتم: مجهول. آخر غيره فيما يظهر لي، نعم قال أبو عمر بن عبد البر في صاحب هذه الترجمة:"مجهول وحديثه منكر".

قلت: لعله تبع في ذلك الحافظ المنذريّ فيما سبق نقله عنه كلمة"حديثه منكر"، أو كان ذلك في بعض النسخ، والله أعلم.

وأبو رهم اختلف في اسمه، فقيل هو: أحزاب بن أسيد بفتح الهمزة، ويقال: بالضم. قاله البخاري. ويقال: ابن أسد السماعي، ويقال: السمعي مختلف في صحبته، والصحيح أنه ليس له
صحبة، كما قال أبو حاتم والبخاريّ. وذكره ابن حبان في"ثقات التابعين". وجهله ابن القطان الفاسي في الوهم والإبهام (4/ 264 - 265) ووثقه الحافظ في التقريب، لعلّه على قاعدته أنّ من اختلف في صحبته فهو ثقة.

والخلاصة فيه أن إسناده ضعيف لجهالة الحارث بن زياد، وأما أن يكون حديثه منكرًا فليس بصحيح لوجود شواهد كما سبق، كما أنّ قول البغويّ: لا أعلم لحارث بن زياد غير هذا الحديث، فهو بحسب علمه كما قال. وإلا فله حديث آخر وهو قول النبي صلى الله عليه وسلم للعرباض بن سارية:"هلّم إلى الغداء المبارك" وبالله التوفيق.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي الدّرداء، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"هو الغداء المبارك" يعني السحور.

رواه ابن حبان في صحيحه (3464) عن يحيى بن محمد بن عمرو بالفُسطاط، حدّثنا إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزبيديّ، أخبرنا عمرو بن الحارث، حدّثني عبد الله بن سالم، عن الزبيديّ، حدّثنا راشد بن سعد، عن أبي الدّرداء، فذكره.

وإسحاق بن إبراهيم بن العلاء كان أبو حاتم حسن الرأي فيه، فقال: شيخ لا بأس به، ولكنّهم يحسدونه. وذكره ابن حبان في"الثقات" وأخرج عنه في صحيحه.

ولكن قال النسائيّ: ليس بثقة إذا روى عن عمرو بن الحارث. وروايته هنا عنه. وأطلق محمد ابن عوف أنه يكذب كما ذكره الحافظ في التقريب، وقال:"صدوق يهم كثيرًا".

وفيه أيضًا عمرو بن الحارث وهو ابن الضحاك الزبيديّ. قال الذهبي:"لا تعرف عدالته".

وذكره ابن حبان في"الثقات" ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة.

وفي الباب أيضًا عن عتبة بن عبد وأبي الدرداء قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تسحّروا من آخر اللّيل". وكان يقول:"هو الغداء المبارك".

رواه الطبراني في"الكبير" (17/ 131) عن جعفر بن أحمد الشّامي الكوفي، ثنا جبارة بن مغلس، ثنا بشر بن عمارة، عن الأحوص بن حكيم، عن راشد بن سعد، عن عتبة بن عبد وأبي الدرداء" فذكرا الحديث.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 151):"فيه جبارة بن مغلس وهو ضعيف".

قلت: وفيه أيضًا الأحوص بن حكيم الدمشقي ضعّفه ابن معين والنسائي. وقال أبو حاتم: ليس بقوي منكر الحديث. وهو من رجال"التهذيب": روى عنه ابن ماجه.

وفي الباب أيضًا عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قربي إلينا الغداء المبارك" يعني السحور. وربما لم يكن إلا تمرتين. قال الزهري: السحور سنة.

رواه أبو يعلى (4679) عن أبي هشام محمد بن يزيد بن رفاعة، حدّثنا إسحاق بن سليمان الرازيّ، حدّثنا معاوية، عن الزهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 151):"رواه أبو يعلى، ورجاله ثقات".

قلت: ليس كما قال، بل فيه معاوية وهو ابن يحيى الصدفي يروي عنه إسحاق بن سليمان الرازي، وأهل العلم مطبقون على تضعيفه منهم ابن معين وأبو زرعة وأبو حاتم وأبو داود والنسائي وابن حبان وابن عدي وغيرهم.

وأظن أن الحافظ الهيثمي وهم في تعيينه لأنه ذكر غير منسوب فظن أنه معاوية بن سلام الدمشقي، وهو من طبقة معاوية بن يحيى الصدفي ومن رواة الزهري إلا أنه لم يرو عنه إسحاق بن سليمان ومعاوية بن يحيى الصدفي.

ذكره ابن حبان في"المجروحين"، ولم يذكره في"الثقات".




মিকদাম ইবনে মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সেহরির খাবার গ্রহণ করো। কারণ, এটি বরকতময় খাবার।"









আল-জামি` আল-কামিল (4242)


4242 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"نعم سحور المؤمن التمر".

حسن: رواه أبو داود (2345)، والبيهقي (4/ 236 - 237) كلاهما من طريق محمد بن أبي الوزير أبي المطرف، حدّثنا محمد بن موسى، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن موسى هو الفطري المدني"صدوق" من رجال الصحيح.

ومحمد بن أبي الوزير هو محمد بن عمر بن مطرف أبو المطرف، ابن أبي الوزير قال أبو حاتم: ثقة.

وصحّحه ابن حبان (3475) ولكنه رواه من حديث إبراهيم بن أبي الوزير بإسناده، مثله.

وإبراهيم هو أخو محمد بن عمر بن مطرف، ابن أبي الوزير يكنى أبا إسحاق وهو من رجال الصحيح وهو متابع لأخيه.

وفي الباب عن جابر مرفوعًا:"نعم السحور بالتّمر".

رواه البزار -كشف الأستار (978) - عن رجاء بن محمد السقطيّ، ومحمد بن معمر البحرانيّ، قالا: ثنا أبو عامر عبد الملك بن عمرو، ثنا زمعة، عن عمرو بن دينار، عن جابر، فذكره.

قال البزار: لا نعلمه عن جابر إلا بهذا الإسناد.

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 151):"ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال إلا أن زمعة (وهو ابن صالح الجندي اليماني) وإن كان من رجال مسلم فهو ضعيف باتفاق أهل العلم، وحديثه في صحيح مسلم مقرون.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের জন্য উত্তম সেহরি হলো খেজুর।









আল-জামি` আল-কামিল (4243)


4243 - عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم -وذلك عند السحور-:"يا أنس، إني أريد الصيام أطعمني شيئًا" فأتيته بتمر وإناء فيه ماء، وذلك بعد ما أذن بلال. فقال:
"يا أنس، انظر رجلًا يأكل معي" فدعوت زيد بن ثابت، فجاء فقال: إني قد شربت شربة سويق، وأنا أريد الصيام. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وأنا أريد الصيام" فتسحرت معه، ثم قام فصلى ركعتين، ثم خرج إلى الصّلاة.

صحيح: رواه النسائي (2167) من طريق عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7605) - وعنه الإمام أحمد (13033) عن معمر، عن قتادة، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"وذلك بعدما أذّن بلال" أي الأذان الأول الذي يكون بالليل لصلاة التهجّد.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহরীর সময় বললেন: "হে আনাস! আমি রোযা রাখতে চাই, আমাকে কিছু খেতে দাও।" তখন আমি তাঁর নিকট খেজুর ও এক পাত্র পানি নিয়ে এলাম। আর এটা ছিল যখন বিলাল আযান দিয়েছিলেন তার পরের ঘটনা। এরপর তিনি বললেন: "হে আনাস! আমার সাথে খাবার জন্য একজন লোক খোঁজ করো।" তখন আমি যায়দ ইবনু সাবিতকে ডাকলাম, তিনি এলেন এবং বললেন: "আমি তো এক ঢোঁক সাভীক পান করেছি এবং আমি রোযা রাখতে চাই।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আর আমিও রোযা রাখতে চাই।" অতঃপর আমি (আনাস) তাঁর সাথে সাহরী করলাম। এরপর তিনি দাঁড়িয়ে দু'রাক'আত সালাত আদায় করলেন, তারপর সালাতের জন্য বেরিয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4244)


4244 - عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ بلالًا يؤذّن بليل، فكلوا واشربوا حتى ينادي ابنُ أمّ مكتوم". ثم قال: وكان رجلًا أعمى، لا يُنادي حتى يقال له: أصبحتَ أصبحتَ.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (14) عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكر الحديث.

ورواه البخاري في الأذان (617، 620) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه في الصوم (1918) عن عبيد بن إسماعيل، عن أبي أسامة، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر. ثم عطف عليه حديث عائشة الآتي.

ورواه مسلم في الصيام (1092) من أوجه أخرى -غير طريق ابن دينار- عن ابن عمر، به، نحوه.

وفي رواية له من طريق نافع، عن ابن عمر، قال:"كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذِّنان: بلال وابنُ أمِّ

مكتوم الأعمى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ بلالًا يؤذّن بليل، فكلوا واشربوا حتى يؤذّن ابنُ أمِّ مكتوم". قال: ولم يكن بينهما إلا أن ينزل هذا ويرقى هذا.

قوله:"ولم يكن بينهما … إلخ" معناه أن بلالًا كان يؤذّن قبل الفجر ويتربّص بعد أذانه للدّعاء ونحوه، ثم يرقب الفجر، فإذا قارب طلوعُه نزل فأخبر ابنَ أمّ مكتوم، فيتأهب ابن أمّ مكتوم للطهارة وغيرها، ثم يرقي ويشرع في الأذان مع أول طلوع الفجر.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই বিলাল রাতে (ফজরের পূর্বে) আযান দেয়। সুতরাং তোমরা পানাহার করতে থাকো যতক্ষণ না ইবনু উম্মে মাকতূম আযান দেয়।" অতঃপর তিনি (রাবী) বলেন: তিনি (ইবনু উম্মে মাকতূম) ছিলেন একজন অন্ধ ব্যক্তি। ভোর হয়েছে, ভোর হয়েছে – এভাবে না বলা পর্যন্ত তিনি আযান দিতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (4245)


4245 - عن عائشة: أنّ بلالًا كان يؤذّن بليل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلُوا واشربوا حتى يؤذّن ابنُ أمِّ مكتوم، فإنه لا يؤذِّن حتى يطلع الفجر". قال القاسم: ولم يكن بين أذانهما إلّا أن يرقي ذا وينزل ذا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1918، 1919) عن عبيد بن إسماعيل، عن أبي أسامة، عن عبيدالله، عن نافع، عن ابن عمر، والقاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. ورواه مسلم في الصيام (1092/ 38) عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر وحده. ثم رواه عن عبيد الله، حدثنا
القاسم، عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم بمثله، ولم يسق لفظه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাতে আযান দিতেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা খাও এবং পান করো, যতক্ষণ না ইবনু উম্মে মাকতূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আযান দেন। কারণ তিনি ফজর উদয় না হওয়া পর্যন্ত আযান দেন না।" কাসিম বলেন: তাদের উভয়ের আযানের মধ্যে কেবল এতটুকু পার্থক্য ছিল যে, একজন উপরে উঠতেন এবং অন্যজন নেমে আসতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4246)


4246 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كلُوا واشربوا حتى يؤذّن بلال".

صحيح: رواه أبو يعلى (4385) عن مصعب بن عبد الله، حدثني ابن الدراوردي، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

والدراوردي هو عبد العزيز بن محمد، وقوله:"ابن الدراوردي" الابن زيادة لعله خطأ من النساخ، ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن خزيمة (406) وعنه ابن حبان (3472) وإسناده صحيح، وأصله في الصحيحين. انظر كتاب الأذان.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা পানাহার করো যতক্ষণ না বিলাল আযান দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4247)


4247 - عن ابن مسعود، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يمنعنَّ أحدَكم -أو أحدًا منكم- أذان بلال من سَحوره، فإنه يؤذّن -أو ينادي- بليل ليرجع قائمكم، ولينتبه نائمُكم، وليس أن يقول: الفجرُ أو الصبحُ، وقال بأصابعه ورفعها إلى فوق، وطأطأ إلى أسفل- حتى يقول هكذا".

وقال زهير (وهو ابن معاوية الجعفي) بسبَّابتيه إحداهما فوق الأخرى، ثم مدَّها عن يمينه وشماله. متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (621)، ومسلم في الصيام (1093) كلاهما من طريق سليمان التيميّ، عن أبي عثمان النّهدي، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযান শুনে সেহরি থেকে বিরত না হয়। কারণ তিনি রাতের বেলা আযান দেন—অথবা তিনি ঘোষণা দেন—যেন তোমাদের মধ্যে যে ইবাদতের জন্য দাঁড়িয়ে আছে সে ফিরে আসে (বিশ্রাম নিতে), এবং তোমাদের মধ্যে যে ঘুমিয়ে আছে সে যেন জেগে ওঠে (সেহরির জন্য)। তাঁর আযান এই জন্য নয় যে, তিনি বলছেন: ‘ফজর বা সকাল হয়ে গেছে।’ এই বলে (বর্ণনাকারী) তাঁর আঙ্গুলগুলো দিয়ে ইশারা করলেন এবং সেগুলোকে উপর দিকে উঠালেন ও নিচের দিকে নামালেন— যতক্ষণ না তিনি এভাবে (ফজরের সঠিক ইঙ্গিত দিয়ে) বলেন।

আর যুহাইর (ইবনু মু‘আবিয়া আল-জু‘ফি) তাঁর দুই তর্জনী দিয়ে ইশারা করে বললেন, একটার উপর আরেকটা রেখে, তারপর সেটিকে ডানে-বামে প্রসারিত করলেন (যা প্রকৃত ফজর)।